Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🙏प्रसाद🙏

अनभिज्ञता में हम कहीं दरिद्रता तो नहीं लेकर जा रहे ??

सभी की आँखें खोलने के लिए ये संदेश है… जो मंदिर/ गुरुद्वारा से लंगर- भंडारा को अपने घर बांध बांध कर ले जाते हैं..!!

एक बार गुरु देव जी एक नगर को गए। वहाँ सारे नगर वासी इकठे हो गए।

वहाँ एक महिला भक्त श्री गुरु देव जी से कहने लगी- महाराज! मैंने तो सुना है, आप सभी के दुःख दूर करते हो। मेरे भी दुःख दूर करो, मैं बहुत दुखी हूँ। मैं तो आप के मंदिर में रोज 50 रोटी अपने घर से बना कर बाँटती हूँ, फिर भी दुखी हूँ।

ऐसा क्यों ? गुरु देव जी ने कहा- कि तू दुसरों का दुःख अपने घर लाती हो, इस लिए दुखी हो। वो कहने लगी – महाराज! मुझे कुछ समझ नहीं आया, मुझ अज्ञानी को ज्ञान दो। गुरु देव जी कहने लगे- तू 50 रोटी मंदिर द्वार में बांटती तो हो… पर बदले में क्या ले जाती हो ? वो कहने लगी- सिर्फ आप के भंडारे में बंट रही प्रसाद के सिवा और कुछ भी नहीं।

गुरु देव जी कहने लगे- लंगर या भंडारा का मतलब है एक रोटी खाना और अपने गुरु या भगवान का कृतज्ञता मानना। पर तू तो रोज बड़ी- बड़ी थैलियों में दाल मखनी , मटर पनीर, रायता, खीर और 15- 20 रोटी भर- भर के ले जाती हो। तीन दिन वो लंगर अर्थात प्रसाद तेरे घर में रहता है।

तू अपने घर में सभी परिवार को वो खिलाती हो। तू नहीं जानती कि भगवान और गुरु के घर की रोटी के एक टुकड़े में भी भगवान जी की वो ही कृपा रहती है, जितना भगवान जी के भंडारे में होती है।

तू कहती है मेरे बच्चे घर पर हैं उनके लिए, मेरे पोतों के लिए, मेरी बहू के लिए, मेरे बेटे के लिए इन सब के लिए भरपूर भंडारा, लंगर ले जाना है। सब को ये कहकर तू भर – भर कर लंगर/ प्रसाद अपने घर ले जाती है। पर तू ये नहीं जानती कि मंदिर में इस लंगर को चखने से कितनों के दुःख दूर होने थे।

पर तूने अपने सुख के लिए दुसरों के दुख दूर नहीं होने दिए। इसी लिए तू उनके सारे दुख अपने घर ले जाती हो और दुखी रहती हो। तेरे दुख तो दिन दुगने रात चौगुने बढ़ रहे हैं। उसमें हम क्या करें बता ? उसकी आँखों से अंधकार हट गया।

वो जोर से रोने लगी और बोली- महाराज मैं अंधकार में डूबी थी। मुझे क्षमा करो, अपने चरणों से लगाओ। अब से मैं एक ही चम्मच का लंगर करूंगी। गुरु देव जी ने समझाया कि इंसान अपने दुःख खुद खरीदता है, पर उसे कभी पता नहीं चलता।

इसलिए लंगर में अपनी भूख जितना ही खाना चाहिए और लंगर प्रसाद को भर भर कर घर कभी नहीं लाना चाहिए। प्रसाद का एक कण भी कृपा से भरपूर होता है। इसलिए ध्यान अवश्य रखें।। भंडारे का प्रसाद घर लाना दरिद्रता को लाना होता है।।
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!!जय श्री कृष्णा राधे राधे!!

हरीश शर्मा

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*ईश्वर अवश्य देगा*
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एक बार एक राजा था, वह जब भी मंदिर जाता, तो 2 भिखारी उसके दाएं और बाएं बैठा करते..
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दाईं तरफ़ वाला कहता: “हे ईश्वर, तूने राजा को बहुत कुछ दिया है, मुझे भी दे दे.!”
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बाईं तरफ़ वाला कहता: “ऐ राजा.! ईश्वर ने तुझे बहुत कुछ दिया है, मुझे भी कुछ दे दे.!”
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दाईं तरफ़ वाला भिखारी बाईं तरफ़ वाले से कहता: ईश्वर से माँग वह सबकी सुनने वाला है..
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बाईं तरफ़ वाला जवाब देता: “चुप कर मुर्ख..”
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एक बार राजा ने अपने मंत्री को बुलाया और कहा कि मंदिर में दाईं तरफ जो भिखारी बैठता है वह हमेशा ईश्वर से मांगता है तो अवश्य ईश्वर उसकी ज़रूर सुनेगा..
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लेकिन जो बाईं तरफ बैठता है वह हमेशा मुझसे फ़रियाद करता रहता है, तो तुम ऐसा करो कि एक बड़े से बर्तन में खीर भर के उसमें स्वर्ण मुद्रा डाल दो और वह उसको दे आओ.!
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मंत्री ने ऐसा ही किया.. अब वह भिखारी मज़े से खीर खाते-खाते दूसरे भिखारी को चिड़ाता हुआ बोला: “हुह… बड़ा आया ईश्वर देगा..’, यह देख राजा से माँगा, मिल गया ना.?”
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खाते खाते जब इसका पेट भर गया तो इसने बची हुई खीर का बर्तन उस दूसरे भिखारी को दे दिया और कहा: “ले पकड़… तू भी खाले, मुर्ख..”
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अगले दिन जब राजा आया तो देखा कि बाईं तरफ वाला भिखारी तो आज भी वैसे ही बैठा है लेकिन दाईं तरफ वाला ग़ायब है..
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राजा नें चौंक कर उससे पूछा: “क्या तुझे खीर से भरा बर्तन नहीं मिला.?”
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भिखारी: “जी मिला था राजा जी, क्या स्वादिस्ट खीर थी, मैंने ख़ूब पेट भर कर खायी.!”
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राजा: “फिर..?!!?”
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भिखारी: “फ़िर जब मेरा पेट भर गया तो वह जो दूसरा भिखारी यहाँ बैठता है मैंने उसको दे दी, मुर्ख हमेशा कहता रहता है: ‘ ईश्वर देगा, ईश्वर देगा.!’ ले खा ले !
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राजा मुस्कुरा कर बोला: “अवश्य ही, ईश्वर ने उसे दे ही दिया.!”
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इसी तरह हमें भी उस भगवान से ही विनती करनी चाहिए। वही हमें देने वाला है, दुनिया के जीव तो एक जरिया है। बाकी उसकी मर्जी से ही मिलता है।
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इसलिए उस कुल मालिक को हमेशा याद रखो। हर रोज भजन बंदगी सिमरन करो, तब जाकर हमारा परमार्थ और स्वार्थ दोनों बन पाएंगे..!!

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—– साबुन —–

“यह संस्कार दे रही हो भाभी… अपनी बच्ची को।” संजना तमतमा कर बोली।
अमीर घर में ब्याही संजना गर्मी की छुट्टियों में अपने गाँव मायके छह बरस के बेटे लवी को लेकर आई है। अपने साथ मँहगी खुशबूदार साबुन लाई है… बेटे को सदा से इसी साबुन की आदत है।वह बेटे को नहलाने के बाद अपने किट में वापस रख लेती है…पर सात बरस की रिया ने बुआ की किट से साबुन निकालकर खूब नहाया।
“क्या हुआ दीदी….!” रजनी किचन से दौड़ी- दौड़ी आई उसने देखा,
रिया बुआ के सामने डरी हुई खड़ी थी।
“यहाँ वह साबुन मिलता नहीं है, दस दिन तक लवी को क्या लगाऊंगी… बिना पूछे किसी की चीज लेना चोरी है… आपने बताया नहीं क्या?” संजना के तेवर कम न हुए।
रजनी बुरी तरह से क्षोभ से भर उठी। पूरे गुस्से से रिया को जोरदार चाँटा मारने को ही थी कि सासू माँ की कड़क आवाज गूंज उठी,” खबरदार बहू … जो रिया पर हाथ उठाया…।”
रजनी ने बेचारगी से खुद को रोक तो लिया पर उसकी आंखों में विवशता की नमी तैर गई।
संजना माँ को कुछ बोलने को थी पर उनकी इस प्रतिक्रिया ने उसे रोक लिया।
“बच्चे चोर नहीं होते…नासमझ मासूम होते हैं…संजना बेटा संस्कार देना तो शायद मैं तुम्हे भूल गई…।”
बेटी ने आश्चर्य से अपनी माँ को देखा।
“बच्चे सब एक से होते हैं… छोटी- छोटी चीजों में हम उन्हें भेद-भाव करना सिखा देते हैं… और एक दिन वे यही व्यवहार हमारे साथ करते हैं।”
दबे पाँव दोनों बच्चे कब खेलने बाहर भाग गए थे किसी को पता न था।

—– रश्मि स्थापक

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बुद्धिमान कौन

बहुत पुरानी बात है, उन दिनों आज की तरह स्कूल नही होते थें. गुरुकुल शिक्षा प्रणाली थी और छात्र गुरुकुल में ही रहकर पढ़ते थे. उन्हीं दिनों की बात है. एक विद्वान पंडित थे, उनका नाम था- राधे गुप्त. उनका गुरुकुल बड़ा ही प्रसिद्ध था, जहाँ दूर दूर से बालक शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे.

राधे गुप्त की पत्नी का देहांत हो चूका था, उनकी उम्रः भी ढलने लगी थी, घर में विवाह योग्य एक कन्या थी, जिनकीं चिंता उन्हें हर समय सताती थी. पंडित राधे गुप्त उसका विवाह ऐसे योग्य व्यक्ति से करना चाहते थे, जिसके पास सम्पति भले न हो पर बुद्धिमान हो.

एक दिन उनकें मन में विचार आया, उनहोंने सोचा कि क्यों न वे अपने शिष्यों में ही योग्य वर की तलाश करें. ऐसा विचार कर उन्होंने बुद्धिमान शिष्य की परीक्षा लेने का निर्णय लिया, उन्होंने सभी शिष्यों को एकत्र किया और उनसें कहा-”मैं एक परीक्षा आयोजित करना चाहता हूँ, इसका उद्देश्य यह जानना है कि कौन सबसें बुद्धिमान है.

मेरी पुत्री विवाह योग्य हो गईं है और मुझें उसके विवाह की चिंता है, लेकिन मेरे पास पर्याप्त धन नही है. इसलिए मैं चाहता हूँ कि सभी शिष्य विवाह में लगने वाली सामग्री एकत्र करे. भले ही इसके लिए चोरी का रास्ता क्यों न चुनना पड़े. लेकिन सभी को एक शर्त का पालन करना होगा, शर्त यह है कि किसी भी शिष्य को चोरी करते हुए कोई देख न सके.

अगले दिन से सभी शिष्य अपने अपने काम में जुट गये. हर दिन कोई न कोई न कोई शिष्य अलग अलग तरह की वस्तुएं चुरा कर ला रहा था और गुरूजी को दे रहा था. राधे गुप्त उन वस्तुओं को सुरक्षित स्थान पर रखते जा रहे थे. क्योंकि परीक्षा के बाद उन्हें सभी वस्तुएं उनकें मालिक को वापिस करनी थी.

परीक्षा से वे यही जानना चाहते थे कि कौन सा शिष्य उनकी बेटी से विवाह करने योग्य है. सभी शिष्य अपने अपने दिमाग से कार्य कर रहे थे. लेकिन उनमें से एक छात्र रामास्वामी, जो गुरुकुल का सबसे होनहार छात्र था, चुपचाप एक वृक्ष के नीचे बैठा कुछ सोच रहा था.

उसे सोच में बैठा देख राधे गुप्त ने कारण पूछा. रामास्वामी ने बताया, “आपने परीक्षा की शर्त के रूप में कहा था कि चोरी करते समय कोई देख न सके. लेकिन जब हम चोरी करते है, तब हमारी अंतरात्मा तो सब देखती है, हम खुद से उसे छिपा नही सकते. इसका अर्थ यही हुआ न कि चोरी करना व्यर्थ है.”

उसकी बात सुनकर राधे गुप्त का चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा. उन्होंने उसी समय सभी शिष्यों को एकत्र किया और उनसें पूछा-”आप सबने चारी की.. क्या किसी ने देखा? सभी ने इनकार में सिर हिलाया. तब राधे गुप्त बोले ”बच्चों ! क्या आप अपने अंतर्मन से भी इस चोरी को छुपा सके?”

इतना सुनते ही सभी बच्चों ने सिर झुका लिया. इस तरह गुरूजी ने अपनी पुत्री के लिए योग्य और बुद्धिमान वर मिल गया. उन्होंने रामास्वामी के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर दिया. साथ ही शिष्यों द्वारा चुराई गई वस्तुएं उनके मालिकों को वापिस कर बड़ी विनम्रता से क्षमा मांग ली.

शिक्षा:-
इस प्रसंग से यह शिक्षा मिलती है कि कोई भी कार्य अंतर्मन से छिपा नहीं रहता और अंतर्मन ही व्यक्ति को सही रास्ता दिखाता है. इसलिए मनुष्य को कोई भी कार्य करते समय अपने मन को जरुर टटोलना चाहिए, क्योंकि मन सत्य का ही साथ देता है ।

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गुप्ता जी अपने परिवार के साथ अपने पैतृक गाँव से निकलकर एक शहर में रहने के लिए आ गए।

अपनी आजीविका कमाने के लिए उन्होंने मिठाई की एक दुकान खोली। ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए उन्होंने एक स्लेट टांग दी, जिस पर उन्होंने लिखा: “यहाँ ताज़ा मिठाई बिकती है।” फिर वह दुकान पर बैठकर ग्राहकों के मिठाई खरीदने का इंतज़ार करने लगे।

एक राहगीर दुकान पर रुका। उसने बोर्ड की ओर देखा और कहा, ” ‘ताज़ा’ क्यों लिखा है? कोई भी बासी मिठाई नहीं बेचता है, क्या कोई बेचता है?” गुप्ता जी ने उसे धन्यवाद दिया और ‘ताज़ा’ शब्द मिटा दिया।

बोर्ड पर अब लिखा था, “यहाँ मिठाई बिकती है।”

उसी दिन, एक और व्यक्ति दुकान पर आया, उसने बोर्ड की ओर देखा और असहमति में अपना सिर हिलाया।

उसने गुप्ता जी से कहा , “यहाँ, क्या ‘यहाँ’ लिखना ज़रूरी है? जिस क्षण कोई भी मिठाई देखेगा, वह समझ जाएगा कि मिठाई यहाँ बिकती है।”

गुप्ता जी ने उसे धन्यवाद दिया और उसकी बात मान ली। उसने ‘यहाँ’ शब्द को मिटा दिया। अब बोर्ड पर लिखा था, “मिठाई बिकती है।”

कुछ समय बाद उस शहर के स्कूल के शिक्षक दुकान पर आए। बोर्ड की ओर देखा और कहा, “बिकती? बेशक, आपने मिठाइयाँ बेचने के लिए रखी हैं, दान में देने के लिए नहीं।”

गुप्ता जी ने उसे धन्यवाद दिया और ‘बिकती’ शब्द को मिटा दिया। बोर्ड पर अब लिखा था, “मिठाई।” अब फिर से वे ग्राहकों का धैर्यपूर्वक इंतज़ार करने लगे।

अब शहर के एक बुद्धिमान व्यक्ति दुकान पर आए और उन्होंने कहा, “दुकान के आधा मील दूर से ही मिठाई की खुशबु आने लगती है। क्या लिख कर के ये बताना जरूरी है कि यह मिठाई की दुकान है?”

गुप्ता जी ने उसे धन्यवाद दिया, और बोर्ड पर जो एकमात्र शब्द लिखा था, ‘*मिठाई*’ उसे भी मिटा दिया।

अब ऊपर एक स्लेट लटक रही थी जिस पर कुछ भी नहीं लिखा था।

गुप्ता जी फिर से ग्राहकों का इंतज़ार करने लगे ।

तभी उसकी पत्नी आई। उसने पूछा, “यहाँ खाली स्लेट क्यों लटका हुआ है। क्या यह ग्राहकों को आकर्षित करने का तरीका है?”

उसने गुप्ता जी से गुस्से में कहा, “आप स्लेट पर लिखते क्यों नहीं हैं: ‘ताज़ा मिठाइयाँ यहाँ बिकती हैं?”

उस दिन गुप्ता जी को एक बात अच्छी तरह समझ में आ गई, कि किसी भी एक वस्तु को देखने और समझने का सब का नज़रिया अलग-अलग होता है।
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हम सभी के पास किसी भी चीज़ को देखने और समझने के लिए एक जैसी इंद्रियाँ होती हैं लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि हर कोई इसे एक ही तरह से समझे और देखे।
*”जब हम ह्रदय की सुनते हैं, तो निष्क्रिय करने वाले संदेह एवं भ्रम के बजाय, हम केवल आत्मविश्वास से भरे निर्णय लेते हैं।”*

रवि kant

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न्यायधीश का अनोखा दंड 🙏🙏

अमेरिका में एक पंद्रह साल का लड़का था, स्टोर से चोरी करता हुआ पकड़ा गया। पकड़े जाने पर गार्ड की गिरफ्त से भागने की कोशिश में स्टोर का एक शेल्फ भी टूट गया।

जज ने जुर्म सुना और लड़के से पूछा, “क्या तुमने सचमुच चुराया था ब्रैड और पनीर का पैकेट”?

लड़के ने नीचे नज़रें कर के जवाब दिया- जी हाँ।

जज :- क्यों ?

लड़का :- मुझे ज़रूरत थी।

जज :- खरीद लेते।

लड़का :- पैसे नहीं थे।

जज:- घर वालों से ले लेते।

लड़का:- घर में सिर्फ मां है। बीमार और बेरोज़गार है, ब्रैड और पनीर भी उसी के लिए चुराई थी।

जज:- तुम कुछ काम नहीं करते ?

लड़का:- करता था एक कार वाश में। मां की देखभाल के लिए एक दिन की छुट्टी की थी, तो मुझे निकाल दिया गया।

जज:- तुम किसी से मदद मांग लेते?

लड़का:- सुबह से घर से निकला था, लगभग पचास लोगों के पास गया, बिल्कुल आख़िर में ये क़दम उठाया।

जिरह ख़त्म हुई, जज ने फैसला सुनाना शुरू किया, चोरी और विशेषतौर से ब्रैड की चोरी बहुत ही शर्मनाक अपराध है और इस अपराध के हम सब ज़िम्मेदार हैं।

“अदालत में मौजूद हर शख़्स.. मुझ सहित सभी अपराधी हैं, इसलिए यहाँ मौजूद प्रत्येक व्यक्ति पर दस-दस डालर का जुर्माना लगाया जाता है। दस डालर दिए बग़ैर कोई भी यहां से बाहर नहीं जा सकेगा।”

ये कह कर जज ने दस डालर अपनी जेब से बाहर निकाल कर रख दिए और फिर पेन उठाया लिखना शुरू किया:- इसके अलावा मैं स्टोर पर एक हज़ार डालर का जुर्माना करता हूं कि उसने एक भूखे बच्चे से इंसानियत न रख कर उसे पुलिस के हवाले किया।

अगर चौबीस घंटे में जुर्माना जमा नहीं किया तो कोर्ट स्टोर सील करने का हुक्म देगी।

जुर्माने की पूर्ण राशि इस लड़के को देकर कोर्ट उस लड़के से माफी चाहती है।

फैसला सुनने के बाद कोर्ट में मौजूद लोगों के आंखों से आंसू तो बरस ही रहे थे, उस लड़के की भी हिचकियां बंध गईं। वह लड़का बार बार जज को देख रहा था जो अपने आंसू छिपाते हुए बाहर निकल गये।

क्या हमारा समाज, सिस्टम और अदालत इस तरह के निर्णय के लिए तैयार हैं?

चाणक्य ने कहा था कि “यदि कोई भूखा व्यक्ति रोटी चोरी करता पकड़ा जाए तो उस देश के लोगों को शर्म आनी चाहिए।”

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भंडारा…..

तीन दोस्त भंडारे मे भोजन कर रहे थे कि-
उनमें से पहला बोला…. काश….हम भी ऐसे भंडारा कर पाते …..

दूसरा बोला…. हां यार ….सैलरी आने से पहले जाने के रास्ते बनाकर आती हैं …

तीसरा बोला…. खर्चे इतने सारे होते है तो कहा से करें भंडारा ….

पास बैठे एक महात्मा भी भंडारे का आनंद ले रहे थे वो उन दोस्तों की बाते सुन रहे थे;

महात्मा उन तीनों से बोले….बेटा भंडारा करने के लिए धन नहीं केवल अच्छे मन की जरूरत होती है ….

वह तीनो आश्चर्यचकित होकर महात्मा की ओर देखने लगे ….

महात्मा ने सभी की उत्सुकता को देखकर हंसते हुए कहा

बच्चों …..बिस्कुट का पैकेट लो और उन्हें चीटियों के स्थान पर बारीक चूर्ण बनाकर उनके खाने के लिए रख दो देखना अनेकों चीटियां उन्हें खुश होकर खाएगी हो गया भंडारा …..

चावल-दाल के दाने लाओ उसे छतपर बिखेर दो चिडिया कबूतर आकर खाऐंगे …हो गया भंडारा …

बच्चों ….ईश्वर ने सभी के लिए अन्न का प्रबंध किया है ये जो तुम और मैं यहां बैठकर पूड़ी सब्जी का आनंद ले रहे है ना इस अन्न पर ईश्वर ने हमारा नाम लिखा हुआ है…
बच्चों तुम भी जीव जन्तुओं के लिए उनके नाम के भोजन का प्रबंध करने के लिए जो भी करोगे वो भी उस ऊपरवाले की इच्छाओं से होगा ….यही तो है भंडारा …

जाने कौन कहा से आ रहा है या कोई कही जा रहा है किसी को पता भी नहीं होता कि किसको कहाँ से क्या मिलेगा ….सब उसी की माया है …..

तीनों युवकों के चेहरे पर एक अच्छी सुकून देने वाली खुशी थी ….

ऐसे अच्छे दान पुण्य के काम करते रहिए, अपार प्रसन्नता मिलती रहेगी

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

68 તીર્થ ….. તીર્થ (સ્કંદ પૂરાણ ની સૂચી)
આપણે (અડસઠ તિરથ સંતોના શરણે..)
એમ ગાઇએ તો છીએ. પણ તે ક્યાં..??
એ જાણ્યું હોય તો કામ લાગે…..

1. અટ્ટહાસ
2. અમરકંટક
3. અયોધ્યા
4. અર્કેશ્વર
5. ઉજ્જૈન
6. કનલ્હલ
7. કરવીર
8.કર્ણભાર
9. કાયાવરોહણ
10. કર્તિકેશ્વર
11. કાલિંજર
12. કાશી
13. કાશ્મીર
14. કુક્કુટેશ્વર
15. કુરુક્ષેત્ર
16. કૃમિજાંગલ
17. કેદારનાથ
18. કૈલાસ
19. ગયા
20. ગંધમાદન
21. ગીરનાર
22. ગોકર્ણ
23. છગલેય
24. જલલિંગ
25. જલેશ્વર
26. જમગ્ન્યતીર્થ
27. જાલંધર
28. ત્રિદંડ
29. ત્રિસંધ્યા
30. દંડકારણ્ય
31. દુષ્કર્ણ
32. દેવિકા.
33. નિર્મલેશ્વર
34. નૈમિષારણ્ય
35. પશુપતિનાથ
36. પુરશ્ચંદ્ર
37. પુષ્કર
38. પ્રભાસ
39. પ્રયાગ
40. બડવાડિન
41. બદરિકાશ્રમ
42. ભદ્રકર્ણ
43. ભસ્મગાત્ર
44. ભૂવનેશ્વર
45. ભૈરવ
46. મધ્યમેશ્વર
47. મરૂકોટ
48. મલકેશ્વર
49. મહેન્દ્ર
50. મંડલેશ્વર
51. શ્રીલંકા
52. લિંગેશ્વર
53. વામેશ્વર
54. વિંધ્યાચલ
55. વિરજા
56. વિશ્વેશ્વર
57. વૃષભપર્વત
58. વેંકટ
59. શતદ્રુ કે શતલજ
60. શંકુકર્ણ
61. શ્રીશૈલ-વેંકટાચલ
62. સપ્તગોદાવરી
63. હરદ્વાર
64. હર્ષિત
65. શ્રેષ્ઠસ્થાન
66. હાટકેશ્વર
67. હેમકૂટ
68. હૃષિકેશ.

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एक राजा था। उसने एक सपना देखा। सपने में उससे एक परोपकारी साधु कह रहा था कि, बेटा! कल रात को तुम्हें एक विषैला सांप काटेगा और उसके काटने से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी। वह सर्प अमुक पेड़ की जड़ में रहता है। वह तुसम पूर्व जन्म की शत्रुता का बदला लेना चाहता है।
सुबह हुई। राजा सोकर उठा। और सपने की बात अपनी आत्मरक्षा के लिए क्या उपाय करना चाहिए? इसे लेकर विचार करने लगा।
सोचते- सोचते राजा इस निर्णय पर पहुंचा कि मधुर व्यवहार से बढ़कर शत्रु को जीतने वाला और कोई हथियार इस पृथ्वी पर नहीं है। उसने सर्प के साथ मधुर व्यवहार करके उसका मन बदल देने का निश्चय किया।
शाम होते ही राजा ने उस पेड़ की जड़ से लेकर अपनी शय्या तक फूलों का बिछौना बिछवा दिया, सुगन्धित जलों का छिड़काव करवाया, मीठे दूध के कटोरे जगह जगह रखवा दिये और सेवकों से कह दिया कि रात को जब सर्प निकले तो कोई उसे किसी प्रकार कष्ट पहुंचाने की कोशिश न करें।
रात को सांप अपनी बांबी में से बाहर निकला और राजा के महल की तरफ चल दिया। वह जैसे आगे बढ़ता गया, अपने लिए की गई स्वागत व्यवस्था को देख देखकर आनन्दित होता गया। कोमल बिछौने पर लेटता हुआ मनभावनी सुगन्ध का रसास्वादन करता हुआ, जगह-जगह पर मीठा दूध पीता हुआ आगे बढ़ता था।
इस तरह क्रोध के स्थान पर सन्तोष और प्रसन्नता के भाव उसमें बढ़ने लगे। जैसे-जैसे वह आगे चलता गया, वैसे ही वैसे उसका क्रोध कम होता गया। राजमहल में जब वह प्रवेश करने लगा तो देखा कि प्रहरी और द्वारपाल सशस्त्र खड़े हैं, परन्तु उसे जरा भी हानि पहुंचाने की चेष्टा नहीं करते।
यह असाधारण सी लगने वाले दृश्य देखकर सांप के मन में स्नेह उमड़ आया। सद्व्यवहार, नम्रता, मधुरता के जादू ने उसे मंत्रमुग्ध कर लिया था। कहां वह राजा को काटने चला था, परन्तु अब उसके लिए अपना कार्य असंभव हो गया। हानि पहुंचाने के लिए आने वाले शत्रु के साथ जिसका ऐसा मधुर व्यवहार है, उस धर्मात्मा राजा को काटूं तो किस प्रकार काटूं? यह प्रश्न के चलते वह दुविधा में पढ़ गया।
राजा के पलंग तक जाने तक सांप का निश्चय पूरी तरह से बदल दिया। उधर समय से कुछ देर बाद सांप राजा के शयन कक्ष में पहुंचा। सांप ने राजा से कहा, राजन! मैं तुम्हें काटकर अपने पूर्व जन्म का बदला चुकाने आया था, परन्तु तुम्हारे सौजन्य और सद्व्यवहार ने मुझे परास्त कर दिया।
अब मैं तुम्हारा शत्रु नहीं मित्र हूं। मित्रता के उपहार स्वरूप अपनी बहुमूल्य मणि मैं तुम्हें दे रहा हूं। लो इसे अपने पास रखो। इतना कहकर और मणि राजा के सामने रखकर सांप चला गया।
यह महज कहानी नहीं जीवन की सच्चाई है। अच्छा व्यवहार कठिन से कठिन कार्यों को सरल बनाने का माद्दा रखता है। यदि व्यक्ति व्यवहार कुशल है तो वो सब कुछ पा सकता है जो पाने की वो हार्दिक इच्छा रखता है।

मुनिन्द्र मिश्रा