Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ये कहानी आप ने बचपन मे पढ़ी होगी,,,

. हाथी और अंधे व्यक्ति,,,,,,,

बहुत समय पहले की बात है , किसी गावं में 6 अंधे आदमी रहते थे. एक दिन गाँव वालों ने उन्हें बताया , ” अरे , आज गावँ में हाथी आया है.” उन्होंने आज तक बस हाथियों के बारे में सुना था पर कभी छू कर महसूस नहीं किया था. उन्होंने ने निश्चय किया, ” भले ही हम हाथी को देख नहीं सकते , पर आज हम सब चल कर उसे महसूस तो कर सकते हैं ना?” और फिर वो सब उस जगह की तरफ बढ़ चले जहाँ हाथी आया हुआ था।

सभी ने हाथी को छूना शुरू किया।

” मैं समझ गया, हाथी एक खम्भे की तरह होता है”, पहले व्यक्ति ने हाथी का पैर छूते हुए कहा.।

“अरे नहीं, हाथी तो रस्सी की तरह होता है.” दूसरे व्यक्ति ने पूँछ पकड़ते हुए कहा।

“मैं बताता हूँ, ये तो पेड़ के तने की तरह है.”, तीसरे व्यक्ति ने सूंढ़ पकड़ते हुए कहा।

” तुम लोग क्या बात कर रहे हो, हाथी एक बड़े हाथ के पंखे की तरह होता है.” , चौथे व्यक्ति ने कान छूते हुए सभी को समझाया।

“नहीं-नहीं , ये तो एक दीवार की तरह है.”, पांचवे व्यक्ति ने पेट पर हाथ रखते हुए कहा।

” ऐसा नहीं है , हाथी तो एक कठोर नली की तरह होता है.”, छठे व्यक्ति ने अपनी बात रखी।

और फिर सभी आपस में बहस करने लगे और खुद को सही साबित करने में लग गए.. ..उनकी बहस तेज होती गयी और ऐसा लगने लगा मानो वो आपस में लड़ ही पड़ेंगे।

तभी वहां से एक बुद्धिमान व्यक्ति गुजर रहा था. वह रुका और उनसे पूछा,” क्या बात है तुम सब आपस में झगड़ क्यों रहे हो?”

” हम यह नहीं तय कर पा रहे हैं कि आखिर हाथी दीखता कैसा है.” , उन्होंने ने उत्तर दिया।

और फिर बारी बारी से उन्होंने अपनी बात उस व्यक्ति को समझाई।

बुद्धिमान व्यक्ति ने सभी की बात शांति से सुनी और बोला ,” तुम सब अपनी-अपनी जगह सही हो. तुम्हारे वर्णन में अंतर इसलिए है क्योंकि तुम सबने हाथी के अलग-अलग भाग छुए
हैं, पर देखा जाए तो तुम लोगो ने जो कुछ भी बताया वो सभी बाते हाथी के वर्णन के लिए सही बैठती हैं।”

” अच्छा !! ऐसा है.” सभी ने एक साथ उत्तर दिया . उसके बाद कोई विवाद नहीं हुआ ,और सभी खुश हो गए कि वो सभी सच कह रहे थे।

शिक्षा,,,,,,,,,,

दोस्तों, कई बार ऐसा होता है कि हम अपनी बात को लेकर अड़ जाते हैं कि हम ही सही हैं और बाकी सब गलत है. लेकिन यह संभव है कि हमें सिक्के का एक ही पहलु दिख रहा हो और उसके आलावा भी कुछ ऐसे तथ्य हों जो सही हों. इसलिए हमें अपनी बात तो रखनी चाहिए पर दूसरों की बात भी सब्र से सुननी चाहिए , और कभी भी बेकार की बहस में नहीं पड़ना चाहिए. वेदों में भी कहा गया है कि एक सत्य को कई तरीके से बताया जा सकता है। तो जब अगली बार आप ऐसी किसी बहस में पड़ें तो याद कर लीजियेगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आपके हाथ में सिर्फ पूँछ है और बाकी हिस्से किसी और के पास हैं।
जय महादेव
🚩

विरभद्र आर्य

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*आज की कहानी*

एक बार राजा भोज की सभा में एक व्यापारी ने प्रवेश किया. राजा भोज की दृष्टि उस पर पड़ी तो उसे देखते ही अचानक उनके मन में विचार आया कि कुछ ऐसा किया जाए ताकि इस व्यापारी की सारी संपत्ति छीनकर राजकोष में जमा कर दी जाए.
व्यापारी जब तक वहां रहा भोज का मन रह रहकर उसकी संपत्ति को हड़प लेने का करता. कुछ देर बाद व्यापारी चला गया. उसके जाने के बाद राजा को अपने राज्य के ही एक निवासी के लिए आए ऐसे विचारों के लिए बड़ा खेद होने लगा.
राजा भोज ने सोचा कि मैं तो प्रजा के साथ न्यायप्रिय रहता हूं. आज मेरे मन में ऐसा कलुषित विचार क्यों आया? उन्होंने अपने मंत्री से सारी बात बताकर समाधान पूछा. मन्त्री ने कहा- इसका उत्तर देने के लिए आप मुझे कुछ समय दें. राजा मान गए.

मंत्री विलक्षण बुद्धि का था. वह इधर-उधर के सोच-विचार में समय न खोकर सीधा व्यापारी से मैत्री गाँठने पहुंचा. व्यापारी से मित्रता करने के बाद उसने पूछा- मित्र तुम चिन्तित क्यों हो? भारी मुनाफे वाले चन्दन का व्यापार करते हो, फिर चिंता कैसी?
व्यापारी बोला- मेरे पास उत्तम कोटि के चंदन का बड़ा भंडार जमा हो गया है. चंदन से भरी गाडियां लेकर अनेक शहरों के चक्कर लगाए पर नहीं बिक रहा है. बहुत धन इसमें फंसा पडा है. अब नुकसान से बचने का कोई उपाय नहीं है.
व्यापारी की बातें सुनकर मंत्री ने पूछा- क्या हानि से बचने का कोई उपाय नहीं? व्यापारी हंसकर कहने लगा- अगर राजा भोज की मृत्यु हो जाए तो उनके दाह-संस्कार के लिए सारा चन्दन बिक सकता है. अब तो यही अंतिम मार्ग दिखता है.

व्यापारी की इस बात से मंत्री को राजा के उस प्रश्न का उत्तर मिल चुका था जो उन्होंने व्यापारी के संदर्भ में पूछा था.
मंत्री ने कहा- तुम आज से प्रतिदिन राजा का भोजन पकाने के लिए चालीस किलो चन्दन राजरसोई भेज दिया करो. पैसे उसी समय मिल जाएंगे.

व्यापारी यह सुनकर बड़ा खुश हुआ. प्रतिदिन और नकद चंदन बिक्री से तो उसकी समस्या ही दूर हो जाने वाली थी. वह मन ही मन राजा के दीर्घायु होने की कामना करने लगा ताकि राजा की रसोई के लिए चंदन लंबे समय तक बेचता रहे.

एक दिन राजा अपनी सभा में बैठे थे. वह व्यापारी दोबारा राजा के दर्शनों को वहां आया. उसे देखकर राजा के मन में विचार आया कि यह कितना आकर्षक व्यक्ति है. इसे कुछ पुरस्कारस्वरूप अवश्य दिया जाना चाहिए…

राजा ने मंत्री से कहा- यह व्यापारी पहली बार आया था तो उस दिन मेरे मन में कुछ बुरे भाव आए थे और मैंने तुमसे प्रश्न किया था. आज इसे देखकर मेरे मन के भाव बदल गए. इसे दूसरी बार देखकर मेरे मन में इतना परिवर्तन कैसे हो गया?

मन्त्री ने उत्तर देते हुए कहा- महाराज! मैं आपके दोनों ही प्रश्नों का उत्तर आज दे रहा हूं. यह जब पहली बार आया था तब यह आपकी मृत्यु की कामना रखता था. अब यह आपके लंबे जीवन की कामना करता रहता है…
इसलिए आपके मन में इसके प्रति दो तरह की भावनाओं ने जन्म लिया है. “जैसी भावना अपनी होती है, वैसा ही प्रतिबिम्ब दूसरे के मन पर पडने लगता है. यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है.”…

हम किसी व्यक्ति का मूल्यांकन कर रहे होते हैं तो उसके मन में उपजते भावों का उस मूल्यांकन पर गहरा प्रभाव पड़ता है…

बोध – जब भी किसी से मिलें तो एक सकारात्मक सोच के साथ ही मिलें.
ताकि आपके शरीर से सकारात्मक ऊर्जा निकले और वह व्यक्ति उस सकारात्मक ऊर्जा से प्रभावित होकर आसानी से आप के पक्ष में विचार करने के लिए प्रेरित हो सके क्योंकि,
*“जैसी दृष्टि होगी, वैसी सृष्टि होगी”*

🙏🏻🙏🏻

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!! अच्छाई की तलाश करें !!

किसी गाँव में एक किसान को बहुत दूर से पीने के लिए पानी भरकर लाना पड़ता था. उसके पास दो बाल्टियाँ थीं जिन्हें वह एक डंडे के दोनों सिरों पर बांधकर उनमें तालाब से पानी भरकर लाता था.
उन दोनों बाल्टियों में से एक के तले में एक छोटा सा छेद था जबकि दूसरी बाल्टी बहुत अच्छी हालत में थी.
तालाब से घर तक के रास्ते में छेद वाली बाल्टी से पानी रिसता रहता था और घर पहुँचते-पहुँचते उसमें आधा पानी ही बचता था.
बहुत लम्बे अरसे तक ऐसा रोज़ होता रहा और किसान सिर्फ डेढ़ बाल्टी पानी लेकर ही घर आता रहा.

अच्छी बाल्टी को रोज़-रोज़ यह देखकर अपने पर घमंड हो गया. वह छेदवाली बाल्टी से कहती थी की वह आदर्श बाल्टी है और उसमें से ज़रा सा भी पानी नहीं रिसता.

छेदवाली बाल्टी को यह सुनकर बहुत दुःख होता था और उसे अपनी कमी पर लज्जा आती थी.

छेदवाली बाल्टी अपने जीवन से पूरी तरह निराश हो चुकी थी. एक दिन रास्ते में उसने किसान से कहा – “मैं अच्छी बाल्टी नहीं हूँ. मेरे तले में छोटे से छेद के कारण पानी रिसता रहता है और तुम्हारे घर तक पहुँचते-पहुँचते मैं आधी खाली हो जाती हूँ.”

किसान ने छेदवाली बाल्टी से कहा – “क्या तुम देखती हो कि पगडण्डी के जिस और तुम चलती हो उस और हरियाली है और फूल खिलते हैं लेकिन दूसरी ओर नहीं.

ऐसा इसलिए है कि मुझे हमेशा से ही इसका पता था और मैं तुम्हारे तरफ की पगडण्डी में फूलों और पौधों के बीज छिड़कता रहता था जिन्हें तुमसे रिसने वाले पानी से सिंचाई लायक नमी मिल जाती थी. दो सालों से मैं इसी वजह से अपने देवता को फूल चढ़ा पा रहा हूँ. यदि तुममें वह बात नहीं होती जिसे तुम अपना दोष समझती हो तो हमारे आसपास इतनी सुन्दरता नहीं होती.”

मुझमें और आपमें भी कई दोष हो सकते हैं. दोषों से कौन अछूता रह पाया है. कभी-कभी ऐसे दोषों और कमियों से भी हमारे जीवन को सुन्दरता और पारितोषक देनेवाले अवसर मिलते हैं. इसीलिए दूसरों में दोष ढूँढने के बजाय उनमें अच्छाई की तलाश करें।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, रामायण - Ramayan

सुबह मेघनाथ से लक्ष्मण का अंतिम युद्ध होने वाला था। वह मेघनाथ जो अब तक अविजित था। जिसकी भुजाओं के बल पर रावण युद्ध कर रहा था। अप्रितम योद्धा ! जिसके पास सभी दिव्यास्त्र थे।

सुबह लक्ष्मण जी , भगवान राम से आशीर्वाद लेने गये।

उस समय भगवान राम पूजा कर रहे थे !
पूजा समाप्ति के पश्चात प्रभु श्री राम ने हनुमानजी से पूछा अभी कितना समय है युद्ध होने में?

हनुमानजी ने कहा कि अभी कुछ समय है! यह तो प्रातःकाल है।

भगवान राम ने लक्ष्मण जी से कहा ! यह पात्र लो भिक्षा मांगकर लाओ , जो पहला व्यक्ति मिले उसी से कुछ अन्न मांग लेना।

सभी बड़े आश्चर्य में पड़ गये। आशीर्वाद की जगह भिक्षा! लेकिन लक्ष्मण जी को जाना ही था।

लक्ष्मण जी जब भिक्षा मांगने के लिए निकले तो उन्हें सबसे पहले रावण का सैनिक मिल गया! आज्ञा अनुसार मांगना ही था। यदि भगवान की आज्ञा न होती तो उस सैनिक को लक्ष्मण जी वहीं मार देते। परंतु वे उससे भिक्षा मांगते है।
सैनिक ने अपनी रसद से लक्ष्मण जी को कुछ अन्न दे दिए।

लक्ष्मण जी वह अन्न लेकर भगवान राम को अर्पित कर दिए। तत्पश्चात भगवान राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया…विजयी भवः।

भिक्षा का मर्म किसी के समझ नहीं आया ! कोई पूछ भी नहीं सकता था… फिर भी यह प्रश्न तो रह ही गया।

फ़िर भीषण युद्ध हुआ! अंत मे मेघनाथ ने त्रिलोक कि अंतिम शक्तियों को लक्ष्मण जी पर चलाया। ब्रह्मास्त्र , पशुपात्र , सुदर्शन चक्र ! इन अस्त्रों कि कोई काट न थी।

लक्ष्मण जी सिर झुकाकर इन अस्त्रों को प्रणाम किए। सभी अस्त्र उनकोआशीर्वाद देकर वापस चले गए।

उसके बाद राम का ध्यान करके लक्ष्मण जी ने मेघनाथ पर बाण चलाया ! वह हँसने लगा और उसका सिर कटकर जमीन पर गिर गया।उसकी मृत्यु हो गई।

उसी दिन सन्ध्याकालीन समय भगवान राम शिव की आराधना कर रहे थे। वह प्रश्न तो अबतक रह ही गया था। हनुमानजी ने पूछ लिया! प्रभु वह भिक्षा का मर्म क्या है ?

भगवान मुस्कराने लगे , बोले मैं लक्ष्मण को जानता हूँ….वह अत्यंत क्रोधी है।लेकिन युद्ध में बहुत ही विन्रमता कि आवश्यकता पड़ती है! विजयी तो वही होता है जो विन्रम हो। मैं जानता था मेघनाथ! ब्रह्मांड कि चिंता नहीं करेगा। वह युद्ध जीतने के लिये दिव्यास्त्रों का प्रयोग करेगा! इन अमोघ शक्तियों के सामने विन्रमता ही काम कर सकती थी। इसलिये मैंने लक्ष्मण को सुबह झुकना बताया!एक वीर शक्तिशाली व्यक्ति जब भिक्षा मांगेगा तो विन्रमता स्वयं प्रवाहित होगी। लक्ष्मण ने मेरे नाम से बाण छोड़ा था …यदि मेघनाथ उस बाण के सामने विन्रमता दिखाता तो मैं भी उसे क्षमा कर देता।

भगवान श्रीरामचन्द्र जी एक महान राजा के साथ अद्वितीय सेनापति भी थे। युद्धकाल में विन्रमता शक्ति संचय का भी मार्ग है ! वीर पुरुष को शोभा भी देता है।इसलिए किसी भी बड़े धर्म युद्ध में विजय प्राप्ति के लिए विनम्रता औऱ धैर्य का होना अत्यंत आवश्यक है……

वर्तमान काल भी हमारी इसी प्रकार परीक्षा ले रहा है इस कांग्रेस, बामपंथी एवं अन्य तथाकथित सेकुलरों द्वारा प्रेरित अनैतिक वैचारिक युद्ध को भी हम विनम्रता और धैर्य से ही जीत सकेंगे।

रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा भी है……………….

धीरज धर्म मित्र अरु नारी…
आपद काल परिखिअहिं चारी…!!
जय सियाराम । जय जय हनुमान ।।

राम चंद्र आर्य

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

ज्ञानवापि


ज्ञानवापी मंदिर के बारे मे विस्तृतजानकारी
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पुराणों के अनुसार, ज्ञानवापी की उत्पत्ति तब हुई थी जब धरती पर गंगा नहीं थी और इंसान पानी के लिए बूंद-बूंद तरसता था तब भगवान शिव ने स्वयं अपने अभिषेक के लिए त्रिशूल चलाकर जल निकाला। यही पर भगवान शिव ने माता पार्वती को ज्ञान दिया। इसीलिए, इसका नाम ज्ञानवापी पड़ा और जहां से जल निकला उसे ज्ञानवापी कुंड कहा गया। ज्ञानवापी का उल्लेख हिंदू धर्म के पुराणों मे मिलता है तो फिर ये मस्जिद के साथ नाम कैसे जुड़ गया?

वापी का अर्थ होता है तालाब। #ज्ञानवापी का सम्पूर्ण अर्थ है ज्ञान का तालाब। काशी की छः वापियों का उल्लेख पुराणों मे भी मिलता है।

पहली वापी: ज्येष्ठा वापी, जिसके बारे मे कहा जाता है की ये काशीपुरा मे थी, अब लुप्त हो गई है।

दूसरी वापी: ज्ञानवापी, जो काशी विश्वनाथ मंदिर के उत्तर मे है।

तीसरी वापी: कर्कोटक वापी, जो नागकुंआ के नाम से प्रसिद्ध है।

चौथी वापी: भद्रवापी, जो भद्रकूप मोहल्ले मे है।

पांचवीं वापी: शंखचूड़ा वापी, लुप्त हो गई।

छठी वापी: सिद्ध वापी, जो बाबू बाज़ार मे है और अब लुप्त हो गई।

अठारह (18) पुराणों मे से एक लिंग पुराण मे कहा गया है:

“देवस्य दक्षिणी भागे वापी तिष्ठति शोभना।
तस्यात वोदकं पीत्वा पुनर्जन्म ना विद्यते।”

इसका अर्थ है: प्राचीन विश्ववेश्वर मंदिर के दक्षिण भाग में जो वापी है, उसका पानी पीने से जन्म मरण से मुक्ति मिलती है।

स्कंद पुराण मे कहा गया है: उपास्य संध्यां ज्ञानोदे यत्पापं काल लोपजं |
क्षणेन तद्पाकृत्य ज्ञानवान जायते नरः |

अर्थात इसके जल से संध्यावंदन करने का भी बड़ा फल है, इससे भी ज्ञान उत्पन्न होता है, पाप से मुक्ति मिलती है।

स्कंद पुराण:

योष्टमूर्तिर्महादेवः पुराणे परिपठ्यते ।।
तस्यैषांबुमयी मूर्तिर्ज्ञानदा ज्ञानवापिका।।

अर्थात ज्ञानवापी का जल भगवान
शिव का ही स्वरूप है।

पुराण जो ना जाने कितनी सदियों पहले लिखे गए, उसमें भी ज्ञानवापी को भगवान शिव का स्वरूप बताया गया है। सारे पुराण, कह रहे है की ज्ञानवापी हिंदुओं से जुड़ा हुआ है लेकिन आज 2022 मे आप सुनते है की मस्जिद का नाम है ज्ञानवापी मस्जिद। मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमण से पहले काशी को अविमुक्त और भगवान शिव को अविमुक्तेश्वर कहा जाता था।

काशी मे अविमुक्तेश्वर के स्वयं प्रकट हुए शिवलिंग की पूजा होती थी जिसे आदिलिंग कहा जाता था लेकिन मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमणो ने काशी के मंदिरों को कई बार नष्ट किया।मुहम्मद गोरी ने कुतुबुद्दीन ऐबक को बनारस विजय के लिए भेजा। कुतुबुद्दीन ऐबक के हमले में बनारस के 1000 से भी अधिक मंदिर तोड़े गए और मंदिर की संपत्ति कहा जाता है 1400 ऊंटों पर लादकर मोहम्मद गोरी को भेज दी गई। बाद मे कुतुबुद्दीन को सुल्तान बनाकर, गोरी अपने देश वापिस लौट गया।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनारस मे शासन के लिए 1197 मे एक अधिकारी नियुक्त किया था।बनारस मे ऐबक के शासन ने बड़ी कड़ाई के साथ मूर्तिपूजा हटाने की पूरी कोशिश की। इसका नतीजा ये हुआ की क्षतिग्रस्त मंदिर वर्षों तक ऐसी ही पड़े रहे क्योंकि इन्होंने ऐसा तोड़ा और ऐसा इनका राज चलता था की किसी की हिम्मत ही नहीं हुई की इन मंदिरों को फिर से बनाए। लेकिन 1296 आते -आते, बनारस के मंदिर फिर से बन गए और फिर से काशी की शोभा बढ़ाने लगे।

बाद मे अलाउद्दीन खिलजी के समय, बनारस के मंदिर फिर से तोड़े गए।फिर 14वी सदी मे तुगलक शासकों के दौर मे जौनपुर और बनारस मे कई मस्जिदो का निर्माण हुआ।कहा जाता है, ये सभी मस्जिदे, मंदिरो के अवशेषों पर बनाई गई थी। 14वी सदी मे जौनपुर मे शर्की सुल्तानो ने पहली बार, काशी विश्वनाथ मंदिर को तुड़वाया। 15वी सदी मे सिकंदर लोदी के समय भी बनारस के सभी मंदिरों को फिर से तोड़ा गया।वर्षों तक मंदिर खंडहर ही बने रहे।

16वीं सदी मे अकबर के शासन मे उनके वित्त मंत्री टोडरमल ने अपने गुरु नारायण भट्ट के आग्रह पर 1585 मे विश्वेश्वर का मंदिर बनवाया जिसके बारे मे कहा जाता है की यही काशी विश्वनाथ का मंदिर है। टोडरमल ने विधिपूर्वक ,विश्वनाथ मंदिर की स्थापना ज्ञानवापी क्षेत्र मे की। इसी ज़माने मे जयपुर के राजा मानसिंह ने बिंदुमाधव का मंदिर बनवाया लेकिन दोनों भव्य मंदिरों को औरंगजेब के शासनकाल मे फिर से तोड़ दिया गया।

1669 मे औरंगजेब ने बनारस के सभी मंदिरों को तोड़ने का फरमान दे दिया था जिसके बाद बनारस मे चार मस्जिदो का निर्माण हुआ जिसमें से तीन उस वक्त के प्रसिद्ध मंदिरों को तोड़कर बनी थी। इसमे विश्वेश्वर मंदिर की जगह जो मस्जिद बनी उसे ज्ञानवापी मस्जिद कहा जाता है ये दावा है लोगों का। दूसरा दावा यह है की बिंदुमाधव मंदिर के स्थान पर धरहरा मस्जिद बनी। फिर है आलमगीर मस्जिद जो कृतिवासेशवर मंदिर की जगह बनाई गई।

📷2: काशी विश्वनाथ मंदिर का 16वी सदी का पुराना नक्शे मे कही भी मस्जिद का कोई भी ज़िक्र नहीं है।बीच मे आप जो हिस्सा देख रहे है वो ज्योतिर्लिंग दिख रहा है।नक्शे को 1820-1830 के बीच ब्रिटिश अधिकारी James Princep ने तैयार किया था।इसमें कहीं भी मस्जिद का ज़िक्र नहीं है। हर जगह, मंदिर बताया गया है और इस नक्शे के मुताबिक मंदिर प्रांगण के चारों कोनो पर तारकेश्वर, मनकेश्वर, गणेश और भैरव मंदिर दिख रहे है। बीच का हिस्सा गृभगृह है जहां शिवलिंग स्थापित है और उसके दोनो तरफ शिव मंदिर भी दिखते है।

📷3+4: ये जो आप लाल border वाला हिस्सा देख रहे है, इसके बारे मे कहा जाता है की ये आज की मस्जिद की boundary है।पुराने नक्शे मे आपको शिवलिंग दिखाया जा रहा है। अब अगर आज की तारीख मे आप जाइएगा, तो शिवलिंग , मस्जिद परिसर के अंदर दिखता है। अब सवाल यह उठता है की नंदी जी मस्जिद की तरफ क्यों देख रहे है जबकि काशी विश्वनाथ मंदिर तो उनके पीछे स्थित है। नंदी जी तो सदैव शिवलिंग की तरफ ही देखते है।

दावा यह भी किया जाता है की जब औरंगजेब ने मंदिर तोड़ने के बाद वहीं पर मस्जिद बनाने का फरमान दिया था तब मंदिर के गृभगृह को ही मस्जिद का मुख्य कक्ष बनाने की योजना बनाई गई थी। इस योजना के अनुसार पश्चिम के दोनों छोटे मंदिर और श्रंगार मंडप तोड़ दिए गए और गृभगृह का मुख्य द्वार जो पश्चिम की तरफ था उसे चुन दिया गया। ऐश्वर्य मंडप और मुक्ति मंडप के मुख्य द्वार बंद कर दिए गये और मंदिर का यही भाग, मस्जिद की पश्चिमी दीवार बन गया।

📷5+6+7: मंदिर की पश्चिमी दीवार को ऐसे ही टूटी सिथति मे इसलिए रख दिया गया क्योंकि औरंगजेब चाहता था की हिन्दू समाज को नीचा महसूस हो। जब मंदिर तोड़ा गया उसके मलबे को भी वहीं पड़े रहने दिया गया। दीवारे ,आज भी वैसी ही है। ज्ञानवापी कुंड का जिक्र, पंचकोसी परिक्रमा मे भी है और मध्यकाल की पुरानी कलाकृतियों मे भी ज्ञानवापी कुंड को मंदिर का हिस्सा दिखाया गया है, जहां जाकर भक्त संकल्प लेते है और संकल्प पूरा होने के बाद फिर से ज्ञानवापी आते है।

#ज्ञानवापी मे ,पंडितजी, भक्तों का संकल्प छुड़वाते हुए कहते है :हे, ज्ञानवापी के पीठाधीश्वर, मैं, पंचकौसी परिक्रमा का वाचिक, मानसिक रुप से समर्पित करते हुए, मेरे प्राण छूटे तो आपकी शरण प्राप्त हो।

सारे नक्शे, पंचकौसी परिक्रमा, ज्ञानवापी, सारा ज़िक्र, हिंदुओं के साथ मिलता है।काशी की पंचकौसी परिक्रमा का सनातन धर्म मे बड़ा महत्व है।मान्यता है की 25 कौस के इस क्षेत्र मे 33 कोटि देवताओं का वास है। औरंगजेब के मंदिर तुड़वाने के 125 साल बाद इसका पुनर्निर्माण इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने करवाया था।

1777 मे महारानी अहिल्याबाई ने ज्ञानवापी के बगल मे दोबारा विश्वानाथ मंदिर बनवाया।1828 के आसपास, नेपाल के राजा ने मंदिर परिसर मे नंदी की स्थापना करवाई। इसके बाद, महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के शिखर को सोने से मढ़वाया था।ये सब अभी वाला जो आप काशीविश्वनाथ मंदिर देखते है, उसके बारे मे बताया जा रहा है।

📷8: एक इतिहास यह भी है की 18वी सदी के दौरान 📷 मराठा सरदार मलहार राव ने काफी कोशिश की थी की ज्ञानवापी मस्जिद की जगह मुस्लिम ,वाजिब मुआवजा लेकर, विश्वनाथ मंदिर फिर बनवा दे लेकिन अंग्रेज, मस्जिद तोड़कर मुस्लिम समाज को नाराज़ नहीं करना चाहते थे।

काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का मामला 1936 मे कोर्ट भी पहुंचा था। तब मुस्लिम पक्ष ने पूरे परिसर को मस्जिद करार करने की अपील भी की थी। 1037 मे वाराणसी ज़िला अदालत ने मुस्लिम पक्ष की अपील को खारिज करते हुए कहा था की ज्ञानकूप के उत्तर मे ही भगवान विश्वनाथ का मंदिर है क्योंकि कोई दूसरा ज्ञानवापी कूप बनारस मे नहीं है।जज ने ये भी लिखा की एक ही विश्वनाथ मंदिर है जो ज्ञानवापी परिसर के अंदर है।

इतिहासकार अनंत सदाशिव अलतेकर ने 1937 मे एक किताब प्रकाशित करते है ‘History Of Banaras’। इसमें भी कहा गया है की मस्जिद के चबूतरे पर स्थित खंबों और नक्काशी को देखने से प्रतीत होता है कि ये 14वी-15वी शताब्दी के है।प्राचीन विश्वनाथ मंदिर मे ज्योतिर्लिंग 100 फीट का था।अरघा भी 100 फीट का बताया गया है। ज्योतिर्लिंग पर गंगाजल, बराबर गिरता रहा है, जिसे पत्थर से ढक दिया गया।यहां, शृंगार-गौरी की पूजा-अर्चना होती है। तहखाना यथावत है, ये खुदाई से सपष्ट हो जाएगा।

विश्वनाथ मंदिर, बार-बार गिराए जाने का उल्लेख, विद्वान नारायण भट्ट ने अपनी किताब ‘त्रिस्थली सेतु’ मे भी किया है।ये किताब संस्कृत मे 1585 मे लिखी गई थी। नारायण भट्ट ने अपनी किताब मे लिखा है की अगर कोई मंदिर तोड़ दिया गया हो और वहां से शिवलिंग हटा दिया गया हो या नष्ट कर दिया गया हो, तब भी वो स्थान महात्म्य की दृष्टि से विशेष पूजनीय है।अगर मंदिर नष्ट कर दिया गया हो तो खाली जगह की भी पूजा की जा सकती है।

इतिहासकार डा. मोतीचंद ने अपनी किताब ‘काशी का इतिहास’ मे लिखा है की “विद्वान नारायण भट्ट का समय 1514 से 1595 तक था और ऐसा जान पड़ता है की उनके जीवन के बड़े काल मे काशी मे विश्वनाथ मंदिर नहीं था”। मतलब उस दौर मे मंदिर तोड़ा हुआ था, उसका पुनर्निर्माण नहीं हुआ था और ऐसा पता चलता है की औरंगजेब से पहले विश्वनाथ के 15वीं सदी के मंदिर के स्थान पर कोई मस्जिद नही बनी थी।ज्ञानवापी मस्जिद का 125×18 फुट नाप का पूरब की ओर का चबूतरा शायद 14वीं सदी के विश्वनाथ मंदिर का बचा हुआ भाग है।”

डा. मोतीचंद यह भी बताते है की मंदिर केवल गिराया ही नहीं गया उस पर #ज्ञानवापी की मस्जिद भी उठा दी गई।मस्जिद बनाने वालों ने पुराने मंदिर की पश्चिमी दीवार गिरा दी और छोटे मंदिरों को जमीदोंज कर दिया।पश्चिमी उत्तरी और दक्षिणी द्वार भी बंद कर दिए गए।द्वारों पर उठे शिखरों को गिरा दिया गया और उनकी जगह पर गुंबद खड़े कर दिए गए।गर्भगृह मस्जिद के मुख्य दालान में परिणित हो गया। चारों अंतरगृह बचा लिए गए और उन्हें मंडपों से मिलाकर 24 फुट दालान निकाल दी गई।मंदिर का पूर्वी भाग तोड़कर एक बरामदे में बदल दिया गया।

इसमें अब भी पुराने खंभे लगे हैं। मंदिर का पूर्वी मंडप, जो 125×35 फुट का था, उसे एक लंबे चौक में बदल दिया गया।

“तीन चीजें ज्यादा देर तक छिपी नहीं रह सकतीं: सूर्य, चंद्रमा और सत्य” – भगवान बुद्ध
शिव ही सत्य हैं।
नंदी महाराज का वर्षों का इंतजार खत्म हुआ, बाबा मिल गए।

हर हर महादेव!