Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक बार की बात है.

अपने चातुर्य और विद्वता के लिए मशहूर मंत्री तेनालीराम से… एक बड़ी गलती हो गई जिससे राजा कृष्णदेव राय काफी रूष्ट हो गए.

और, राजा कृष्णदेव राय ने तेनालीराम को सजा देने की ठानी.

सजा के लिए उन्होंने मन ही मन 1 लाख स्वर्ण मुद्रा की दंड देने की सोची.

लेकिन , राजा द्वारा सीधे दंड की घोषणा करने पर तेनालीराम उनपर दुराग्रह का आरोप लगा सकते थे.

इसीलिए, राजा ने तेनालीराम से कहा कि… तुम्हारे गलती सजा तो तुम्हें जरूर मिलेगी लेकिन चूंकि तुम मेरे बहुत प्रिय भी हो इसीलिए मैं तुम्हें अपने पसंद का सरपंच चुनने का अधिकार देता हूँ.

मैं ध्यान दिला दूँ कि उस समय सरपंच… अभी पंचायती राज वाले एक आदमी सरपंच नहीं हुआ करते थे.. बल्कि, वो ज्यूरी की तरह 5 आदमियों की कमिटी होती थी… और, बहुमत (3 लोगों) का फैसला ही सरपंच का फैसला माना जाता था.

खैर… तेनालीराम ने अपने लिए बेहद ही गरीब (अंत्योदय टाइप के) 5 लोगों का एक पैनल सरपंच के तौर पर चुन लिया .

और, सुनवाई शुरू हो गई.

सुनवाई के उपरांत पैनल के सभी सदस्य एकमत थे कि तेनालीराम ने गलती की है और उसकी सजा उसे मिलनी ही चाहिए.

राजा एवं तेनालीराम को भी ये बता दिया गया कि तेनालीराम दोषी है और उसे सजा मिलनी ही चाहिए.

अब पैनल में सजा के तौर पर आर्थिक दंड पर चर्चा होने लगी.

जिसमें से पैनल के एक सदस्य ने सलाह दी कि… तेनालीराम बहुत बड़ा मंत्री है इसीलिए उसपर 10,000 (दस हजार) स्वर्ण मुद्राओं का दंड लगाया जाए..

10,000 स्वर्ण मुद्राओं की बात सुनते ही पैनल के बाकी सदस्यों का मुँह खुला का खुला रह गया और उन्होंने इसका पुरजोर विरोध किया कि….
इतना पैसा तो इसने कभी देखा भी नहीं होगा तो भला देगा कहाँ से …???

फिर, बात 5,000 स्वर्ण मुद्राओं पर आई.

उसपर भी बाकी सदस्यों ने आपत्ति किया कि इतना पैसा कमाने में तो इसकी पीढ़ियाँ गुजर जाएगी.

इस तरह… आर्थिक दंड की रकम घटते घटते 3 स्वर्ण स्वर्ण मुद्राओं पर आ गई.

फिर भी पैनल के 3 सदस्य इसपर राजी नहीं थे कि इस अपराध के लिए ये दंड बहुत है…
और, 3 स्वर्ण मुद्राएं बहुत होती है.

अंत में पैनल में 1 स्वर्ण मुद्रा पर सहमति बनी और तेनालीराम पर “बेमन से” सहानुभूति के साथ 1 स्वर्ण मुद्रा का आर्थिक दंड लगा दिया गया और पैनल के सदस्य चर्चा करने लगे कि…
बेचारे तेनालीराम पर बहुत आर्थिक बोझ पड़ गया इस आर्थिक दंड पर.

👉 ऐसा इसीलिए हुआ और तेनालीराम पर 1 लाख स्वर्ण मुद्रा की जगह 1 स्वर्ण मुद्रा का दंड इसीलिए लगा क्योंकि सरपंच के पैनल के लोग बेहद गरीब थे और उन्होंने धन कभी देखा नहीं था… वे खुद बेहद मुश्किल से अपना पेट भर पाते थे…
इसीलिए, ज्यादा सोच पाना उनकी कल्पना से भी परे था.

👉👉 ठीक वही गरीबों वाली हालत आज हम हिनुओं की है.

हमें शुरू से ही दबा कर डिप्रेस रखा है कि हम ज्यादा सोच ही नहीं पाते हैं.

हमारी सोच है कि… किसी तरह अयोध्या में राम मंदिर बन जाये, मथुरा में कृष्ण मंदिर और काशी में ज्ञानवापी मंदिर मिल जाये.

और, ज्यादा से ज्यादा किसी तरह ताजमहल, कुतुबमीनार, लालकिला आदि को हम हिन्दुओं का बनवाया हुआ घोषित कर दिया जाए.

इसके आगे हमारी सोच जाती ही नहीं है.

इसीलिए…. आजकल 3-4 दिन से लगभग हर जगह चर्चा इस पर हो रही है कि अयोध्या के बाद…. काशी, मथुरा, कुतुब मीनार और अब ताजमहल का वास्तविक इतिहास क्या है ?
आखिर देश में हो क्या रहा है ???

जबकि चर्चा इस पर होनी चाहिए कि आखिर हर मस्जिद के अंदर से मंदिरों के प्रमाण कैसे निकल रहे हैं ??

साथ ही… चर्चा इस पर होनी चाहिए कि इतने सारे मंदिरों को तोड़कर उसी पर मस्जिद क्यों बनाई गई ????

चर्चा इस पर भी खुलकर होना चाहिए कि क्या हिंदू आर्किटेक्चर को तोड़ना ही मुगल आर्किटेक्चर था… जिसकी प्रशंसा (वामपंथी) इतिहासकार करते नहीं थकते थे.

और, सबसे प्रमुख चर्चा तो इतिहासकारों के झूठ की भी होनी चाहिए जिन्होंने इतिहास के ‘सच’ को सेलेक्टिव इतिहास की ‘कब्र’ में दफन कर दिया और उसके ऊपर झूठे प्रोपेगैंडा का स्ट्रक्चर खड़ा कर देश को अंधेरे में रखा.

इसीलिए… सिर्फ सभी ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहरों को वापस लेना ही पर्याप्त नहीं है.

बल्कि…. मुगलों के कुकृत्य का बचाव करने वालों की जिम्मेदारी तय होनी जरूरी है.

तथा… जो भी लोग/समुदाय/संगठन खुद को मुगलों का वंशज घोषित करने पर आमादा हैं और उन आक्रांताओं का पक्ष ले रहे हैं…
उन सबसे माफी मंगवाने एवं हर्जाना वसूले जाने की जरूरत है..

भले ही उस हर्जाने को चुकाने में इन पंचरवालों की सैकड़ों पुश्तें क्यों न बीत जाए…!

एवं, इस संबंध में एक स्पष्ट नीति बने कि जबतक वे हर्जाने की इस रकम को चुका नहीं देते हैं तबतक वे पीड़ित हिन्दू समुदाय के गुलाम रहेंगे जिन्हें जिंदा रहने भर खाने पीने के अलावा और कोई अधिकार नहीं होगा.

तथा… उन गुलामों को अपनी सुविधा अनुसार खरीदा एवं बेचा जा सकेगा.

और हाँ… अगर गुलामी के दौर में भी अगर कोई म्लेच्छ हिन्दू सनातन धर्म में घर वापसी कर लेता है तो फिर वो उस गुलामी से बाहर आ जायेगा क्योंकि तब वो भी हिन्दू सनातन धर्म का ही एक हिस्सा बन जायेगा.

इस स्थिति में… उसके पुराने मजहब के बाकी लोग… इस नए सनातनी के भी गुलाम माने जाएंगे.

बनाओ ऐसा स्ट्रिक्ट नियम… फिर देखते हैं कि कौन खड़ा होता है उन आक्रांताओं के पक्ष में और बताता है खुद मुगलों का वंशज..

पुरानी कहावत है कि…
लात के भूत बात से नहीं मानते…!

इसीलिए… जो जैसे मानता है… उसे, उसी तरह मनवाने से देश की अस्मिता एवं सभ्यता संस्कृति सुरक्षित रहेगी.

जय महाकाल…!!!

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