Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक आदमी को स्वर्ग सिधारे दस वर्ष बीत गए थे। आज उनके एक पुराने मित्र का उनके घर आना हुआ। उसके पुत्रों ने उन मित्र की बड़ी आवभगत की। चाए नाश्ता हो गया तो पुत्र उन्हें हवेली दिखाने लगे।
देखते देखते वे हवेली में बने एक मंदिर में पहुँचे। यह क्या? मंदिर में कोई चित्र था न मूर्ति। वहाँ तो मात्र एक संगमरमरी खम्बा था।
उसे देख मित्र ने पूछा- यह कैसा मंदिर है, जिसके बीचों बीच खम्बा है?
पुत्र बोले- यह खम्बा महाराज का ही मंदिर है। हम इन्हीं की पूजा करते हैं।
मित्र- पर क्यों?
पुत्र- चाचा जी! आपको मालूम ही है कि हमने कितनी गरीबी में जीवन बिताया है। हमारे पिता जी का एक नियम था। वे प्रतिदिन भोजन पश्चात, हम सब से छिपाकर, हाथी दाँत की एक तिल्ली की कुछ पूजा आदि किया करते थे। उनके गुजर जाने पर, हमें उनकी पेटी से वह तिल्ली मिली। हमने उसे अपने मंदिर में रख दिया। और तभी से हमारा जीवन बदल गया।
तो हमने उस तिल्ली जैसा ही, यह संगमरमरी खम्बा बनवा लिया है। आज हमारे पास जो कुछ भी है, इस खम्बा महाराज की ही कृपा है।
मित्र ने अपना माथा पीट लिया। कहने लगे- मूर्खों! वह तिल्ली मेरी ही दी हुई थी। तुम्हारा बाप उससे कोई पूजा नहीं करता था, दाँत करेलता था। और छिपाकर इसीलिए रखता था, कि कहीं वह गुम न हो या टूट न जाए।
यह जो भी तुम्हारे पास है, वह भगवान का ही दिया हुआ है, इस खम्बे का नहीं। तुमने भगवान को तो छोड़ दिया, उस तिल्ली का ताड़ बना दिया?
*दुनिया में यही मूर्खता चली आती है। जगत का ऐश्वर्य तो प्रारब्ध का फल है, मिलता है तो मिलता है, नहीं मिलता तो नहीं ही मिलता। पर लोभवश हम उन भगवान को छोड़कर, न मालूम कहाँ कहाँ अपनी श्रद्धा जोड़कर, माथा पटकते घूम रहे हैं। जड़ को सींचना छोड़कर, पत्तों पर पानी छिड़क रहे हैं। जबकि परमात्मा एक है। वह एक से कभी सवा नहीं हुआ, दो कि कौन कहे? एक ही परमात्मा जगत के कण कण में व्याप्त है, दूसरे परमात्मा को होने के लिए दूसरी सृष्टि चाहिए होगी, वह रहेगा कहाँ?*

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♦️♦️♦️ रात्रि कहांनी ♦️♦️♦️


*👉 भक्त और भगवान का संबंध 🏵️
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एक बार की बात है –
एक संत जग्गनाथ पूरी से मथुरा की ओर
आ रहे थे, उनके पास बड़े सुंदर ठाकुर जी थे ।
वे संत उन ठाकुर जी को हमेशा
साथ ही लिए रहते थे और बड़े प्रेम से उनकी पूजा अर्चना कर लाड़ लड़ाया करते थे ।

ट्रेन से यात्रा करते समय बाबा ने ठाकुर जी को अपनें बगल की सीट पर रख दिया और
अन्य संतो के साथ हरी चर्चा में मग्न हो गए ।

जब ट्रेन रुकी और सब संत उतरे
तब वे सत्संग में इतनें मग्न हो चुके थे कि
झोला गाड़ी में ही रह गया !
उसमें रखे ठाकुर जी भी वहीं गाड़ी में रह गए । संत सत्संग की मस्ती में भावनाओं में
ऐसा बहे कि ठाकुर जी को साथ लेकर
आना ही भूल गए ।

बहुत देर बाद जब उस संत के आश्रम पर
सब संत पहुंचे और भोजन प्रसाद पाने का
समय आया तो उन प्रेमी संत ने अपने ठाकुर जी को खोजा और देखा कि-
हमारे ठाकुर जी तो हैं ही नहीं ।

संत बहुत व्याकुल हो गए,
बहुत रोने लगे परंतु ठाकुर जी मिले नहीं ।
उन्होंने ठाकुर जी के वियोग में अन्न जल लेना स्वीकार नहीं किया ।
संत बहुत व्याकुल होकर विरह में
अपने ठाकुर जी को पुकारकर रोने लगे ।

तब उनके एक पहचान के संत ने कहा – महाराज मै आपको बहुत सुंदर चिन्हों से
अंकित नये ठाकुर जी दे देता हूँ ,
परंतु उन संत ने कहा कि हमें अपने
वही ठाकुर चाहिए जिनको हम अब तक
लाड़ लड़ाते आये हैं।

तभी एक दूसरे संत ने पूछा –
आपने उन्हें कहा रखा था ?
मुझे तो लगता है गाड़ी में ही छूट गए होंगे।

एक संत बोले – अब कई घंटे बीत गए है ।
गाड़ी से किसी ने निकाल लिए होंगे और
फिर गाड़ी भी बहुत आगे निकल चुकी होगी ।

इस पर वह संत बोले –
मैं स्टेशन मास्टर से बात करना चाहता हूँ
वहाँ जाकर ।
सब संत उन महात्मा को लेकर स्टेशन पहुंचे । स्टेशन मास्टर से मिले और ठाकुर जी के
गुम होने की शिकायत करने लगे ।
उन्होंने पूछा कि कौन-सी गाड़ी में
आप बैठ कर आये थे ।

संतो ने गाड़ी का नाम स्टेशन मास्टर को
बताया तो वह कहने लगा – महाराज !
कई घंटे हो गए,
यही वाली गाड़ी ही तो यहां खड़ी हो गई है,
और किसी प्रकार भी आगे नहीं बढ़ रही है ।
न कोई खराबी है न अन्य कोई दिक्कत,
कई सारे इंजीनियर सब कुछ चेक कर चुके हैं, परंतु कोई खराबी दिखती है नहीं ।
महात्मा जी बोले – अभी आगे बढ़ेगी,
मेरे बिना मेरे प्यारे कही अन्यत्र
कैसे चले जायेंगे ?


वे महात्मा अंदर ट्रेन के डिब्बे के अंदर गए
और ठाकुर जी वहीं रखे हुए थे
जहां महात्मा ने उन्हें पधराया था ।
अपने ठाकुर जी को महात्मा ने गले लगाया और जैसे ही महात्मा जी उतरे-
गाड़ी आगे बढ़ने लग गयी ।
ट्रेन का चालक,
स्टेशन मास्टर तथा सभी इंजीनियर
सभी आश्चर्य में पड़ गए और बाद में
उन्होंने जब यह पूरी लीला सुनी तो
वे गद्गद् हो गए ।
उसके बाद वे सभी जो वहां उपस्थित
उन सभी ने अपना जीवन संत और
भगवन्त की सेवा में लगा दिया…

भगवान जी भी खुद कहते है ना….

भक्त जहाँ मम पग धरे, तहाँ धरूँ में हाथ !
सदा संग लाग्यो फिरूँ, कबहू न छोडू साथ !!



*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🙏🙏🙏🙏

Posted in संस्कृत साहित्य

વૈદિક ઘડિયાળ
નામના અર્થ સાથે

🕉️1:00 વાગ્યાના સ્થાન પર ब्रह्म લખેલું છે જેનો અર્થ થાય છે;
બ્રહ્મ એક જ છે બે નથી

🕉️2:00 વાગ્યાના સ્થાને अश्विनौ લખેલું છે તેનો અર્થ થાય કે;
અશ્વિની કુમારો બે છે

🕉️3:00 વાગ્યાના સ્થાને त्रिगुणाः લખેલું છે તેનો અર્થ થાય ત્રણ પ્રકારના ગુણો
સત્વ રજસ્ અને તમસ્

🕉️4:00 વાગ્યાના સ્થાને चतुर्वेदाः લખેલું છે તેનો અર્થ થાય વેદો ચાર છે
ઋગ્વેદ યજુર્વેદ સામવેદ અને અથર્વવેદ

🕉️5:00 વાગ્યાના સ્થાને पंचप्राणा લખેલું છે જેનો અર્થ થાય પાંચ પ્રકારના પ્રાણ છે
પ્રાણ, અપાન, સમાન, વ્યાન અને ઉદાન

🕉️6:00 વાગ્યાના સ્થાને લખેલું છે षड्रसाः એનો અર્થ થાય કે રસ છ પ્રકારના છે
મધુર, ખાટો, ખારો, કડવો, તીખો, તૂરો

🕉️7:00 વાગ્યાના સ્થાને લખેલું છે सप्तर्षियः તેનો અર્થ થાય સાત ઋષિ છે
કશ્યપ, અત્રી, ભારદ્વાજ, વિશ્વામિત્ર, ગૌતમ, જમદગ્નિ અને વસિષ્ઠ

🕉️8:00 વાગ્યાના સ્થાને લખેલું છે अष्टसिद्धि જેનો અર્થ થાય આઠ પ્રકારની સિદ્ધિ છે
અણીમા, મહિમા, દધીમા, ગરીમા, પ્રાપ્તિ, પ્રાકામ્ય, ઈશિત્વ અને વશિત્વ

🕉️9:00 વાગ્યાના સ્થાને લખેલું છે नव द्रव्याणी જેનો અર્થ થાય નવ પ્રકારની નિધિઓ હોય છે
પદ્મા, મહાપદ્મ, નીલ, શંખ, મુકુંદ, નંદ, મકર, કશ્યપ અને ખર્વ

🕉️10:00 વાગ્યના સ્થાને લખેલું છે दशदिशः, જેનો અર્થ થાય દશ દિશાઓ
પૂર્વ, પશ્ચિમ, ઉત્તર, દક્ષિણ, ઈશાન, અગ્નિ, નૈઋત્ય, વાયવ્ય, આકાશ અને પાતાળ

🕉️11:00 ના સ્થાને લખેલું છે रुद्राः જેનો અર્થ થાય રુદ્રા અગિયાર છે
કપાલી, પિંગલ, ભીમ, વિરુપાક્ષ, વલોહિત, શાસ્તા, અજપાદ, અહિર્બુધ્ન્ય, ચંડ, ભવ

🕉️12:00 વાગ્યાના સ્થાને લખેલું છે आदित्याः જેનો અર્થ થાય છે આદિત્યો બાર છે
અંસુમાન, અર્યમાન, ઈંદ્ર, ત્વષ્ટા, ધાતુ, પર્જન્ય, પૂષા, ભગ્,મિત્ર, વરુણ, વિવસ્વાન, વિષ્ણુ