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♦️♦️♦️ रात्रि कहांनी ♦️♦️♦️

👉 ईश्वर☝🏻

एक राजा था,वह जब भी मंदिर जाता,तो वहां पर 2 भिखारी दाएं और बाएं बैठा करते,
दाई तरफ़ वाला कहता-हे ईश्वर, तूने राजा को बहुत कुछ दिया है, मुझे भी दे दे!

बायी तरफ़ वाला कहता-ऐ राजा!ईश्वर ने तुझे बहुत कुछ दिया है,मुझे भी कुछ दे दे।
दाईं तरफ़ वाला भिखारी बायी तरफ़ वाले से कहता-ईश्वर से माँग वह सबकी सुनने वाला है।
बायी तरफ़ वाला जवाब देता -चुपकर मूर्ख
एक बार राजा ने अपने मंत्री को बुलाया और कहा कि मंदिर में दाईं तरफ जो भिखारी बैठता है वह हमेशा ईश्वर से मांगता है तो अवश्य ईश्वर उसकी ज़रूर सुनेगा
लेकिन जो बायी तरफ बैठता है वह हमेशा मुझसे निवेदन करता रहता है,तो तुम ऐसा करो कि एक बड़े से बर्तन में खीर भरके उसमें स्वर्ण मुद्रा डाल दो और वह उसको दे आओ।
मंत्री ने ऐसा ही किया -अब वह भिखारी मज़े से खीर खाते-खाते दूसरे भिखारी को चिड़ाता हुआ बोला~हुह बड़ा आया ईश्वर देगा,यह देख राजा से माँगा,मिल गया ना।खाते खाते जब इसका पेट भर गया तो इसने बची हुई खीर का बर्तन उस दूसरे भिखारी को दे दिया और कहा-ले पकड़ तू भी खाले।
अगले दिन जब राजा आया तो देखा कि बायी तरफ वाला भिखारी तो आज भी वैसे ही बैठा है लेकिन दाईं तरफ वाला ग़ायब है,राजा नें चौंककर उससे पूछा-“क्या तुझे खीर से भरा बर्तन नहीं मिला?
भिखारी-जी मिला था राजाजी, क्या स्वादिष्ट खीर थी,मैंने ख़ूब पेट भरकर खायी।
राजा-फिर?
भिखारी-फ़िर जब मेरा पेट भर गया तो वह जो दूसरा भिखारी यहाँ बैठता है मैंने उसको दे दी, मूर्ख हमेशा कहता रहता है ईश्वर देगा,ईश्वर देगा!
राजा मुस्कुराकर बोला अवश्य ही,ईश्वर ने उसे दे ही दिया।
ईश्वर पर भरोसा रखें |

नित याद करो मन से शिव परमात्मा को☝🏻

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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राम जन्म भूमि


बात ज्यादा पुरानी नहीं है।

अंग्रेजो के ज़माने में एक दंगा हुआ था श्री राम जन्मभूमि को ले लेकर और फैज़ाबाद की तरफ से मुस्लिम भीड़ ने हमला किया था।

तब दंगे के बीच सबने देखा कि हनुमान गढ़ी की सीढ़ियों से ६ फुट से ज्यादा ऊंचा विशालकाय नागा साधु हाथ मे तलवार लिए उतरा और दंगाई भीड़ पे अकेले टूट पड़ा और गाजर मूली की तरहः काटता हुआ फैज़ाबाद की तरफ निकल गया।

हनुमान गढ़ी में रहने वाले अन्य महंत पुजारी नागा भी हैरान रह गए क्योंकि किसी ने उस नागा साधु को न उस दिन के पहले देखा था न उस दिन के बाद देखा लेकिन उस अकेले नागा ने ऐसी मार काट की थी कि फैज़ाबाद तक सड़क पे दंगाइयों की लाशें पड़ी थी और दंगा खत्म हो गया था।अयोध्या शहर के कोतवाल हनुमान जी है और अयोध्या की सुरक्षा का जिम्मा उनके ऊपर है और जब अयोध्या पर संकट आता है तो वो किसी न किसी साधु रूप में आते है।

६ दिसम्बर वाले दिन बाबरी ढांचे के चारो तरफ प्रशाशन ने कई स्तर की बैरिकेड लगाया हुआ था और कार सेवक अंदर नही जा पा रहे थे, तभी एक नागा साधु एक सरकारी बस स्टार्ट कर के तेज़ी से बस ले कर बैरिकेड के एक के बाद एक स्तर तोड़ता हुआ अंदर घुसता गया
उसके पीछे भीड़ घुस गई और वो नागा उस भीड़ में गायब हो गया।

ये घटना फ़ोटो और वीडियो में रिकॉर्ड हुई थी अखबारों में भी छपी लेकिन वो नागा कभी दुबारा नही दिखा लेकिन उसने ढांचा गिराने के लिए कारसेवकों के लिए रास्ता खोल दिया था ।प्रशाशन देखता रह गया और कुछ नही कर सका थाअयोध्या में हनुमान जी का किला है हनुमान गढ़ी और देश भर के सभी प्रमुख हनुमान मंदिरों का मुख्यालय भी है।।

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23 फरवरी 1881 सरदार अजीत सिंह का जन्म : अधिकाँश जीवन जेल में बीता
भारत विभाजन से दुखी, प्राण दिये
सरदार अजीत सिंह का जन्म पंजाब के जालंधर जिले के खटकड़ कड़ा गाँव में हुआ था । वे सुप्रसिद्ध राष्ट्रभक्त और क्राँतिकारी सरदार भगत सिंहके चाचा थे। उन्होने भारत में ब्रितानी शासन को चुनौती दी और जीवन का अधिकाँश हिस्सा जेल में बिताया । उन्होने अंग्रेजी शासन और उनके द्वारा किये जा रहे शोषण का खुलकर विरोध किया । सरकार ने उन्हें राजनीतिक ‘विद्रोही’ घोषित करके जेल में डाल दिया । बाद में लाला लाजपत राय जी के साथ ही साथ देश निकाले का दण्ड मिला ।
उनके बारे कभी बाल गंगाधर तिलक जी ने कहा था कि उनमें नेतृत्व की अद्भुत क्षमता है और उन्हें जो दायित्व मिलेगा उसका वे सफलता पूर्वक संचालन कर सकते हैं । यह बात 1906 की है तब सरदार अजीत सिंह की उम्र २५ वर्ष की थी । वे १९०९ में अपना घर बार छोड़ कर विदेश यात्रा पर निकल पड़े जहाँ उन्होंने भारतीय जनों को संगठित करके क्रांति की शुरुआत की । उन्होंने ईरान तुर्की, जर्मनी, ब्राजील, स्विट्जरलैंड, इटली, जापान आदि देशों की यात्रा की और उन सभी देशों के प्रमुखों से संपर्क साधा जो अंग्रेजों के विरुद्ध रहे या जो अंग्रेजों से पीड़ित रहे । । सरदार अजीत सिंह आजाद हिन्द फौज के संस्थापकों में से एक थे । उन्होंने ही नेताजी सुभाष चन्द्र बोस हिटलर, मुसोलिनी आदि उन नेताओं से भेंट कराई जो अंग्रेजों के विरुद्ध थे । उन्होंने विभिन्न भाषायें सीखी । उन्हें विश्व की ४० भाषाओं पर अधिकार प्राप्त हो गया था । रोम रेडियो को तो उन्होंने नया नाम दे दिया था, ‘आजाद हिन्द रेडियो’ तथा इसके माध्यम से क्रांति का प्रचार प्रसार किया ।
वे भारत विभाजन के विरुद्ध थे । 1947 के आरंभ में ही भारत विभाजन की रूपरेखा बन गयी थी । स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर सख्ती कम हो गयी थी । सरदार अजीत सिंह मार्च १९४७ में भारत वापस लौटे । वे छत्तीस वर्ष तक भारत से बाहर रहे । इस बीच पत्नी हरनाम कौर उनका चेहरा ही भूल गयीं थीं । उन्हें पहचानने में बड़ी कठिनाई हुई । बड़ी मुश्किल से परिवार में सम्मलित हुये और अपना नावास हिमाचल प्रदेश के चंबा जिलेमें बनाया । यह स्थान डलहौजी हिल स्टेशन क्षेत्र में पड़ता है । यहां इनकी स्मृति में स्मारक भी बन गया है । भारत लौटकर वे भारत विभाजन के विरूद्ध अभियान में लग गये । लेकिन चारों ओर हिँसा और तनाव का वातावरण था । इससे बहुत दुःखी रहने लगे । समय की अपनी गति होती है । 15 अगस्त 1947 आ गया । भारत का विभाजन हो गया । भारत के हिस्से पर पाकिस्तान नाम से नये देश का उदय हो गया । उनके बलिदान के बारे में दो अलग-अलग विवरण मिलता है एक विवरण में कहा जाता है कि भारत विभाजन के समय उन्हें हृदयाघात हुआ और उन्होंने शरीर त्याग दिया था जबकि दूसरे विवरण में कहा जाता है कि भारत विभाजन से वे इतने दुःखी हुये कि उन्होंने १५ अगस्त १९४७ के प्रातः पूरे परिवार को एकत्र किया, और जय हिन्द कह कर अपनी कनपटी पर गोली मार ली । इसके साथ ही राष्ट्र की अस्मिता पर अपना बलिदान दे दिया ।

–रमेश शर्मा

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શંકરાચાર્યએ નર્મદા કિનારે જીવન નો ઘણો ભાગ વિતાવેલો
તેમનું જીવન ટૂંકું હતું
ચોમાસામાં પૂર આવે તેમ થોડું જીવીને તે ધર્મ અને સંસ્કૃતિને છલોછલ કરી ગયા
શંકરે માતા નર્મદાના અનેક ભાવ એક તપસ્વી તરીખે જોયા હતા

એક શ્રાવણ માસમાં નર્મદા નદીએ પોતાનું ભીષણ રૂપ દેખાડવું શરુ કર્યું
ને શંકરાચાર્યના ગુરુ ગોવિંદપાદની ગુફા સુધી પાણી પહોંચ્યું
કાંઠા ઉપર રહેતા તપસ્વીઓ , માછીમારો નૌકા નાયકો
અને ખારવાઓ ઊંચાઈ વાળા વિસ્તારમાં આવી ગયા
ગાયો બકરી જેવા અબોલ જીવો પણ તેમની સાથે હતા
પાણી સામે જાણે બધા લાચાર નિસહાય

નદીના પાણીએ મહાદેવેનું તાંડવ શરુ કર્યું હોય તેમ શિલાઓ ઉપર મોજા ઉછળતા હતા
ગુફાની અંદર સુધી પહોચતા તિર જેવા પાણી ના ફોરા શંકરના દેહ સાથે અથડાવા લાગ્યા

યુવાન શંકર ગુફામાથી બહાર આવ્યા
પોતાનું કમન્ડળ નીચે મૂક્યું
મૈયા નર્મદા ના પાણી સામે જોઈ
તેમના કરુણાસભર હૃદયમાંથી એક પછીએક પ્રાથના શબ્દો નીકળવા મંડ્યા
ચમત્કાર થતો હોઈ તેમ
નર્મદા નદી થંભી ગયા
તેમના એક એક શ્લોકના રણકાર સાથે, નર્મદાના પાણી ઉતરવા લાગ્યા
શંકર બોલતા રહ્યા …પાણી ઉતરતા રહ્યા
શબ્દો હતા ….
.
सबिंदु सिन्धु सुस्खल तरंग भंग रंजितम
द्विषत्सु पाप जात जात कारि वारि संयुतम
कृतान्त दूत काल भुत भीति हारि वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ||

त्वदम्बु लीन दीन मीन दिव्य सम्प्रदायकम
कलौ मलौघ भारहारि सर्वतीर्थ नायकं
सुमस्त्य कच्छ नक्र चक्र चक्रवाक् शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ||

महागभीर नीर पुर पापधुत भूतलं
ध्वनत समस्त पातकारि दरितापदाचलम
जगल्ल्ये महाभये मृकुंडूसूनु हर्म्यदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ||

गतं तदैव में भयं त्वदम्बु वीक्षितम यदा
मृकुंडूसूनु शौनका सुरारी सेवी सर्वदा
पुनर्भवाब्धि जन्मजं भवाब्धि दुःख वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ||

अलक्षलक्ष किन्न रामरासुरादी पूजितं
सुलक्ष नीर तीर धीर पक्षीलक्ष कुजितम
वशिष्ठशिष्ट पिप्पलाद कर्दमादि शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ||

सनत्कुमार नाचिकेत कश्यपात्रि षटपदै
धृतम स्वकीय मानषेशु नारदादि षटपदै:
रविन्दु रन्ति देवदेव राजकर्म शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ||

अलक्षलक्ष लक्षपाप लक्ष सार सायुधं
ततस्तु जीवजंतु तंतु भुक्तिमुक्ति दायकं
विरन्ची विष्णु शंकरं स्वकीयधाम वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ||

अहोमृतम श्रुवन श्रुतम महेषकेश जातटे
किरात सूत वाड़वेषु पण्डिते शठे नटे
दुरंत पाप ताप हारि सर्वजंतु शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ||

કુલ આઠ શ્લોક
શંકરાચાર્ય ના મોઠામાંથી અસ્ખલિત રીતે વહ્યા
ગુરુ ગુરુપદ પણ ગુફાની બહાર આવી તેમના મહાન શિષ્યને જોઈ રહ્યા
આદિ શંકરાચાર્ય ની રચના પૂર્ણ થતાં
વધારાનું તમામ જળ
શંકરના કમંડળમાં પોરો ખાવા બેસી ગયા હોય એ રીતે
જરા તરા જળના વમળો રાખીને, ધીમે ધીમે ઓસરવા લાગ્યું

કોઈ કહે છેકે માતા નર્મદા પરચો આપવા આવેલા હતા
કોઈ કહે છે કે થોડો સમય શંકરાચાર્ય કમંડળ માં વિશ્રામ કરી
શંકરના દિવ્ય ભાવને સ્પર્શવા નર્મદા આવેલા

શંકરાચાર્ય આ રચના તે નર્મદા અષ્ટક તરીખે ઓળખાઈ છે

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સોબત

કાગડો મારો પડોશી મિત્ર હતો .તે મને ઘણીવાર પૂછતો ,
‘ દોસ્ત , શું તને ખરેખર દૂર સુધી દેખાય છે ! ‘
હું હા કહેતો . તે મારી પરીક્ષા કરવાં કહેતો , ‘ પેલાં દૂરનાં ઝાડ પાછળ શું દેખાય છે ? ‘
હું દૂર ક્ષિતિજમાં નજર નોંધી કહેતો , ત્યાં ઝાડની ડાળીએ બેઠેલો પોપટ ફળ ખાય છે .’
તેનું મોં કટાણું થઈ જતું ,તે વળી પૂછતો , ‘ ત્યાંથી દૂર !’
‘ ત્યાંથી દૂર ફૂલો પર ભમરાઓ ગુંજારવ કરી રહ્યાં છે ! ‘
‘ ત્યાંથી દૂર ?’
‘ ત્યાંથી દૂર એક ચિતો હરણાંઓનું મારણ કરવાં દોડી રહ્યો છે ! ‘
તેની આંખોમાં ચમક આવી જતી !
‘ ચાલ દોસ્ત , એ બાજું જરાં ફરી આવીએ ! ‘ તે મને બળજબરીથી ત્યાં ધસડી જતો ને જંગલી પ્રાણીઓએ મારણ કરેલાં પશુઓનાં હાડમાંસ ચૂંથતો ! મને તેની આદત ગમતી નહિ પરંતુ તે મારો એકમાત્ર સાથીદાર હતો એટલે હું તેની ગુસ્તાખી ચલાવી લેતો ! તે પોતાનાં ખોરાકનાં સ્વાદનાં વખાણ કરી મને લલચાવતો ! પરંતુ હું અચળ રહેતો ! તે માંસની જાફત ઉડાવતો જયારે હું ફળ – ફૂલ ખાઈને જીવતો !
એક વાર જંગલમાં દુઃકાળ પડ્યો ! વૃક્ષો – પાંદડા સૂકાવા લાગ્યાં ! કાગડાને હવે ખોરાક શોધવાં મારી જરૂર ન હતી .પરંતુ અમારી દોસ્તી કાયમ હતી .
હું કાયમ તેની સાથે રહેતો . ભૂખને કારણે મારે ઉપવાસ થતાં હતાં, જયારે તેને રોજ ઉજાણી હતી . તે મને તેની સાથે જોડાવા આમંત્રણ આપતો …. ધીમેધીમે હું પણ તેના જેવો જ માંસભક્ષી થઈ ગયો !
પછી તો વરસાદ વરસ્યો , વસંત આવી પરંતુ હવે મારી આદત છૂટતી નથી . હવે મને પણ મારી તિક્ષ્ણ નજરમાં મરેલાં પશુઓ જ દેખાય છે .
આકર્ષક ફૂલો , મધુરાં ફળો કે ક્ષિતિજનાં બદલાતાં જતાં રંગોનું મેઘધનુષી દ્રશ્ય ! મેં બધુ જ ગુમાવ્યું છે કાગડાની સંગતને કારણે !
~ અંકુર બાપુ
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🌹🌹आलस रूपी भैंस🌹🌹
एक बार की बात है। एक महात्मा अपने शिष्य के साथ एक गांव से गुजर रहे थे। दोनों को बहुत भूख लगी थी। पास में ही एक घर था।

दोनों घर के पास पहुंचे और दरवाजा खटखटाया। अंदर से फटे-पुराने कपड़े पहना एक आदमी निकला।
महात्मा ने उससे कहा- हमें बहुत भूख लगी है। कुछ खाने को मिल सकता है क्या?

उस आदमी ने उन दोनों को खाना खिलाया।
खाना खाने के बाद महात्मा ने कहा…

तुम्हारी जमीन बहुत उपजाऊ लग रही है, लेकिन फसलों को देखकर लगता है कि तुम खेत पर ज्यादा ध्यान ही नहीं देते। फिर तुम्हारा गुजारा कैसे होता है?

आदमी ने उत्तर दिया- हमारे पास एक भैंस है, जो काफी दूध देती है। उससे मेरा गुजारा हो जाता है।

रात होने लगी थी, इसलिए महात्मा शिष्य सहित वहीँ रुक गए।

रात को उस महात्मा ने अपने शिष्य को उठाया और कहा- चलो हमें अभी ही यहां से निकलना होगा और इसकी भैंस भी हम साथ ले चलेंगे।

शिष्य को गुरु की बात अच्छी नहीं लगी, लेकिन करता क्या! दोनों भैंस को साथ लेकर चुपचाप निकल गए।

यह बात उस शिष्य के मन में खटकती रही।

कुछ सालों बाद एक दिन शिष्य उस आदमी से मिलने का मन बनाकर उसके गांव पहुंचा।

जब शिष्य उस खेत के पास पहुंचा, तो देखा खाली पड़े खेत अब फलों के बगीचों में बदल चुके थे।

उसे यकीन नहीं आ रहा था, तभी वह आदमी सामने दिख गया।

शिष्य उसके पास जाकर बोला- सालों पहले मैं अपने गुरु के साथ आपसे मिला था।

आदमी ने शिष्य को आदर पूर्वक बिठाया और बताने लगा… उस दिन मेरी भैंस खो गई। पहले तो समझ में नहीं आया कि क्या करूं।

फिर, जंगल से लकड़ियां काटकर उन्हें बाजार में बचने लगा। उससे कुछ पैसे मिले, तो मैंने बीज खरीद कर खेतो में बो दिए।

उस साल फसल भी अच्छी हो गई। उससे जो पैसे मिले उन्हें मैंने फलों के बगीचे लगाने में इस्तेमाल किया।

अब काम बहुत ही अच्छा चल रहा है। और इस समय मैं इस इलाके में फलों का सबसे बड़ा व्यापारी हूं।

कभी-कभी सोचता हूं उस रात मेरी भैंस न खोती तो यह सब न होता।

शिष्य ने उससे पूछा, यह काम आप पहले भी तो कर सकते थे?

तब वह बोला, उस समय मेरी जिंदगी बिना मेहनत के चल रही थी। मुझे कभी लगा ही नहीं कि मैं इतना कुछ कर सकता हूं।

मित्रों, अगर आपके जीवन में भी तो कोई ऐसी आलस रूपी भैंस है, जो आपको बड़ा बनने से रोक रही है, तो उसे आज ही छोड़ दें। यह करना बहुत ही मुश्किल है, लेकिन असंभव नहीं है।
🌹🙏🏻जय श्री जिनेन्द्र🙏🏻🌹
🌹पवन जैन🌹

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐हनुमानजी की चुटकी सेवा💐💐

अयोध्या में प्रभु श्रीराम का राज्याभिषेक होने के बाद हनुमानजी वहीं रहने लगे । उन्हें तो श्रीराम की सेवा का व्यसन (नशा) था । सच्चे सेवक का लक्षण ही है कि वह आराध्य के चित्त की बात जान लिया करता है । उसे पता रहता है कि मेरे स्वामी को कब क्या चाहिए और कब क्या प्रिय लगेगा ? श्रीराम को कोई वस्तु चाहिए तो हनुमानजी पहले से लेकर उपस्थित । किसी कार्य, किसी पदार्थ के लिए के लिए संकेत तक करने की आवश्यकता नहीं होती थी।

हनुमानजी की सेवा का परिणाम यह हुआ कि भरत आदि भाइयों को श्रीराम की कोई भी सेवा प्राप्त करना कठिन हो गया। इससे घबराकर सबने मिलकर एक योजना बनाई और श्रीजानकीजी को अपनी ओर मिला लिया । प्रभु की समस्त सेवाओं की सूची बनाई गयी । कौन-सी सेवा कब कौन करेगा, यह उसमें लिखा गया । जब हनुमानजी प्रात:काल सरयू-स्नान करने गए तब अवसर का लाभ उठाकर तीनों भाइयों ने सूची श्रीराम के सामने रख दी । प्रभु ने देखा कि सूची में कहीं भी हनुमानजी का नाम नहीं है । उन्होंने मुसकराते हुए उस योजना पर अपनी स्वीकृति दे दी । हनुमानजी को कुछ पता नहीं था।

दूसरे दिन प्रात: सरयू में स्नान करके हनुमानजी जब श्रीराम के पास जाने लगे तो उन्हें द्वार पर भाई शत्रुघ्न ने रोक दिया और कहा–’आज से श्रीराम की सेवा का प्रत्येक कार्य विभाजित कर दिया गया है। जिसके लिए जब जो सेवा निश्चित की गयी है, वही वह सेवा करेगा । श्रीराम ने इस व्यवस्था को अपनी स्वीकृति दे दी है।’

हनुमानजी बोले—‘प्रभु ने स्वीकृति दे दी है तो उसमें कहना क्या है ? सेवा की व्यवस्था बता दीजिये, अपने भाग की सेवा में करता रहूंगा।’

सेवा की सूची सुना दी गयी, उसमें हनुमानजी का कहीं नाम नहीं था । उनको कोई सेवा दी ही नहीं गयी थी क्योंकि कोई सेवा बची ही नहीं थी । सूची सुनकर हनुमानजी ने कहा—‘इस सूची में जो सेवा बच गयी, वह मेरी।’

सबने तुरन्त सिर हिलाया ’हां, वह आपकी।’ हनुमानजी ने कहा—‘इस पर प्रभु की स्वीकृति भी मिलनी चाहिए ।’ श्रीराम मे भी इस बात पर अपनी स्वीकृति दे दी ।

स्वामी श्रीराम का जिस प्रकार कार्य सम्पन्न हो, हनुमानजी वही उपाय करते हैं, उन्हें अपने व्यक्तिगत मान-अपमान की जरा भी चिन्ता नहीं रहती ।

हनुमानजी बोले—‘प्रभु को जब जम्हाई आएगी, तब उनके सामने चुटकी बजाने की सेवा मेरी ।’ यह सुनकर सब चौंक गये। इस सेवा पर तो किसी का ध्यान गया ही नहीं था लेकिन अब क्या करें ? अब तो इस पर प्रभु की स्वीकृति हनुमानजी को मिल चुकी है ।

चुटकी सेवा के कारण हनुमानजी राज सभा में दिन भर श्रीराम के चरणों के पास उनके मुख की ओर टकटकी लगाए बैठे रहे क्योंकि जम्हाई आने का कोई समय तो है नहीं । रात्रि हुई, स्नान और भोजन करक श्रीराम अंत:पुर में विश्राम करने पधारे तो हनुमानजी उनके पीछे-पीछे चल दिए । द्वार पर सेविका ने रोक दिया—‘आप भीतर नहीं जा सकते ।’ हनुमानजी वहां से हट कर राजभवन के ऊपर एक कंगूरे पर जाकर बैठ गए और लगे चुटकी बजाने।

पर यह क्या हुआ ? श्रीराम का मुख तो खुला रह गया । न वे बोलते हैं, न संकेत करते हैं, केवल मुख खोले बैठे हैं । श्रीराम की यह दशा देखकर जानकीजी व्याकुल हो गईं । तुरन्त ही माताओं को, भाइयों को समाचार दिया गया । सब चकित और व्याकुल पर किसी को कुछ सूझता ही नहीं । प्रभु का मुख खुला है, वे किसी के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दे रहे हैं ।

अंत में गुरु वशिष्ठ बुलाए गये । प्रभु ने उनके चरणों में मस्तक रखा; किन्तु मुंह खुला रहा, कुछ बोले नहीं ।

वशिष्ठजी ने इधर-उधर देखकर पूछा—‘हनुमान कहां हैं, उन्हें बुलाओ तो ?’

जब हनुमानजी को ढूंढ़ा गया तो वे श्रीराम के कक्ष के कंगूरे पर बैठे चुटकी बजाए जा रहे हैं, नेत्रों से अश्रु झर रहे हैं, शरीर का रोम-रोम रोमांचित है, मुख से गद्गद् स्वर में कीर्तन निकल रहा है—‘श्रीराम जय राम जय जय राम ।’

भाई शत्रुघ्न ने हनुमानजी से कहा—‘आपको गुरुदेव बुला रहे हैं ।’ हनुमानजी चुटकी बजाते हुए ही नीचे पहुंचे।

गुरुदेव ने हनुमानजी से पूछा—‘आप यह क्या कर रहे हैं ?’

हनुमानजी ने उत्तर दिया—‘प्रभु को जम्हाई आए तो चुटकी बजाने की सेवा मेरी है । मुझे अन्तपुर में जाने से रोक दिया गया । अब जम्हाई का क्या ठिकाना, कब आ जाए, इसलिए मैं चुटकी बजा रहा हूँ, जिससे मेरी सेवा में कोई कमी न रह जाए ।’

वशिष्ठजी ने कहा—‘तुम बराबर चुटकी बजा रहे हो, इसलिए श्रीराम को तुम्हारी सेवा स्वीकार करने के लिए जृम्भण मुद्रा (उबासी की मुद्रा) में रहना पड़ रहा है । अब कृपा करके इसे बंद कर दो।’

श्रीराम के रोग का निदान सुनकर सबकी सांस में सांस आई । हनुमानजी ने चुटकी बजाना बंद कर दिया तो प्रभु ने अपना मुख बंद कर लिया।

अब हनुमानजी हंसते हुए बोले—‘तो मैं यहीं प्रभु के सामने बैठूँ ? और सदैव सभी जगह जहां-जहां वे जाएं, उनके मुख को देखता हुआ साथ बना रहूँ, क्योंकि प्रभु को कब जम्हाई आएगी, इसका तो कोई निश्चित समय नहीं है।’

प्रभु श्रीराम ने कनखियों से जानकीजी को देखकर कहा, मानो कह रहे हों—‘और करो सेवा का विभाजन ! हनुमान को मेरी सेवा से वंचित करने का फल देख लिया।’

स्थिति समझकर वशिष्ठजी ने कहा—‘यह सब रहने दो, तुम जैसे पहले सेवा करते थे, वैसे ही करते रहो ।’

अब भला, गुरुदेव की व्यवस्था में कोई क्या कह सकता था । उनका आदेश तो सर्वोपरि है ।

यही कारण है कि श्रीराम-पंचायतन में हनुमानजी छठे सदस्य के रूप में अपने प्रभु श्रीराम के चरणों में निरन्तर उनके मुख की ओर टकटकी लगाए हाथ जोड़े बैठे रहते हैं ।

हनुमानजी की सेवा के अधीन होकर प्रभु श्रीराम ने उन्हें अपने पास बुला कर कहा—
कपि-सेवा बस भये कनौड़े, कह्यौ पवनसुत आउ ।
देबेको न कछू रिनियाँ हौं, धनिक तूँ पत्र लिखाउ ।। (विनय-पत्रिका पद १००।७)

‘भैया हनुमान ! तुम्हें मेरे पास देने को तो कुछ है नहीं; मैं तेरा ऋणी हूँ तथा तू मेरा धनी (साहूकार) है । बस इसी बात की तू मुझसे सनद लिखा ले ।’

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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