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The ARROGANCE

After travelling long through a forest, Kalidasa reached a village. He felt very thirsty and looked around for water, whereupon he saw an old woman drawing water from a well.
He went up to her and asked her for water. She agreed to give him water, but asked him to first introduce himself, “Who are you ? Introduce yourself.” (apna parichay do)

Now Kalidasa, who was a renowned and revered scholar of his time, thought that an ordinary and old village woman was not worthy of knowing who great Kalidasa was.
So he said, “I am a traveller.”
But the old lady replied, “No, you cannot be a traveller. In this world there are only 2 travellers – the Sun and the Moon. Both Rise and Set every day and keep travelling perpetually.”
Who are you ?
Then thirsty Kalidasa said, “Alright then, treat me as a guest.”
The lady promptly replied, “No you cannot be a guest, son. In this world there are only 2 guests – Youth and Wealth … both are temporary and do not stay even if you plead with them a million times, and hence can only they be called as guests.”
Who are you ?
Thirsty but now quite intrigued with the profoundness of this old lady, Kalidasa said, “I am a Tolerant person, mata (sahansheel vyakti).”
Now the old lady replied, “You don’t quite look tolerant, young man. In this world only 2 truly know the meaning of Tolerance – Bhoomi (Earth) and Tree . How much ever you stamp the earth or throw stones at the tree (for the fruits), both continue to nurture us.”
So, who are you ?
With unquenched thirst, Kalidasa was increasingly becoming irritable. He said, “Fine then, consider me a stubborn person (hatavaadi)”
The lady smiled and said, “No my child, you are not that stubborn. There are only 2 truly stubborn personalities our nails and our hair. We keep cutting them non-stop, but they continue to grow.”
Who are you ?
Kalidasa had been patient so far, but now in anger he said, “Alright, I am a fool”.
Now the lady gave a wide smile and said, “There are only 2 kinds of fools in this world a King who rules without having any capability or knowledge & a Minister who is a sycophant to such a King and lavishes praises on such a useless king.”
Who are you ?
Kalidasa realised that he had been outsmarted by an old illiterate village woman. In complete awe and humility, he fell at the feet of the lady, saying, “O mother! How ignorant I was to think that I know myself. I am ashamed of myself. Pardon my ignorance. Show mercy, and grant me water, I beg of you.
When he touched her feet and then got up, whom did he see?
Mata Saraswati the Goddess of Learning and Wisdom.
She said, “Kalidasa, you are wise. But only if you know yourself do you become a true Manushya (human being). Your ego has overshadowed your achievements. You are educated, but you are _also given to arrogance. Hence, I had to come to guide you.
The mark of a true human being is not his knowledge, but his humility. Your intellect and education is of no use if it only feeds your ego.

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐विद्याभ्यास 💐💐

प्राचीनकाल में एक गुरुकुल से एक विद्यार्थी स्नातक की उपाधि प्राप्त करके जब घर जाने लगा, तो गुरुजी ने उसे उपदेश दिया कि प्रतिदिन कुछ न कुछ अवश्य पढ़ना और पढ़ाना चाहिए।

शिष्य ने गुरु की बात गांठ बांध ली। घर वापस आकर उसने प्रतिदिन अध्ययन करना प्रारंभ कर दिया। लेकिन गुरु की आज्ञा के अनुसार प्रतिदिन पढ़ाना भी आवश्यक था। इसके लिए उसने गांव के बच्चों को पढ़ाने का विचार किया।

उसने ग्रामीणों से बात की तो वे अपने बच्चों को उसके पास भेजने को तैयार हो गए। विद्यालय से वापस आकर बच्चे उस स्नातक के पास अध्ययन के लिए आने लगे। धीरे-धीरे वे बच्चे इतने होशियार हो गए कि विद्यालय में अपने शिक्षकों के पढ़ाने में भी कमियां निकालने लगे।

शिक्षकों ने सोचा कि ये अचानक इतने तेज कैसे हो गए ? पता करने पर पता चला कि गांव में एक स्नातक आया है जो रोज इन बच्चों को पढ़ाता है। शिक्षकों ने सोचा कि वही इन्हें सिखाता होगा कमियां निकालने के लिए।

इसलिए सभी शिक्षकों ने मिलकर विचार किया कि बच्चों को इसके पास जाने से रोका जाए। सभी ने किसी बच्चे को प्रलोभन देकर तो किसी को भय दिखाकर स्नातक के पास पढ़ने जाने से रोक दिया।

दूसरे दिन बच्चे उसके पास पढ़ने नहीं गए। तब दूसरे दिन शिक्षकों ने सोचा कि चलकर देखना चाहिए कि अब वह स्नातक क्या कर रहा है ? जब वे लोग उसके घर पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उसके घर के सामने दस-बारह खूंटे गड़े हैं और वह उनके सामने बैठकर विद्याभ्यास कर रहा है।

शिक्षकों ने उससे पूछा कि यह क्या है ? तब उसने उत्तर दिया कि मुझे केवल विद्याभ्यास से मतलब है। जब बच्चे नहीं आ रहे हैं तो मैं इन खूँटों के सामने ही अभ्यास कर रहा हूँ। यह सुनकर सभी शिक्षकों को आभास हुआ कि यह सच्चा विद्याध्यायी है।

उन्होंने उसे आचार्य की उपाधि प्रदान की। संस्कृत में खूंटे को शंकु कहा जाता है। इसलिए उसका नाम आचार्य शंकुक पड़ा। जो कि काव्यशास्त्र एवं न्यायशास्त्र के मूर्धन्य विद्वान माने जाते हैं। जिनका रस संबंधी अभिमत- अनुमितिवाद (चित्र- तुरगन्याय) आज भी पढ़ा और पढ़ाया जाता है।

किसी भी विद्या अथवा कला का नियमित अभ्यास आवश्यक है। अन्यथा वह क्षीण हो जाती है। इसलिए विद्यार्थियों, विद्वानों एवं कलाकारों को नियमित अभ्यास अवश्य करना चाहिए।”

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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पुण्य का अधिकारी…

एक निर्धन व्यक्ति था, वह सरसों के तेल का दीपक जलाकर नित्य गली में रख देता था। चूंकि ‘गली अँधेरी थी इसलिए वहाँ से गुज़रने वाले राहगीरों को बहुत लाभ मिलता था। निकट रहने वाला एक धनवान व्यक्ति प्रतिदिन भगवान के मंदिर में एक घी का दीपक जलाया करता था।

मृत्यु होने पर जब दोनो यमलोक पहुँचे तो धनपति को निम्न श्रेणी और निर्धन को उच्च ‘श्रेणी की सुविधा प्रदान की गयी। धनपति को यमराज का यह न्याय ठीक नहीं लगा और उन्होंने यमराज से इस संदर्भ में प्रश्न किया तो यमराज बोले – “पुण्य की महता।

“धन से नहीं कार्य के उपयोगिता सन्निहित भावना के आधार पर होता है, मंदिर तो पहले से ही प्रकाशित किया गया था।”

उस व्यक्ति ने ऐसे स्थान पर प्रकाश फैलाया, जिससे हज़ारों ज़रूरतमंदों तक प्रकाश पहुँचा – इसी से वह ज्यादा पुण्य का अधिकारी बना है।