Posted in लक्ष्मी प्राप्ति - Laxmi prapti

लक्ष्मी प्राप्ति के लिए जलायें संध्या काल में दीपक!!!!!!!!!

शास्त्रों में दिन के अवसान (अन्त) और रात के आगमन अर्थात् दिन और रात के संधि काल को, जब आकाश में न सूर्य हो और न तारे, संध्या काल या सायं काल माना गया है । साधारण भाषा में सूर्यास्त के समय को संध्या काल कहते हैं । हिन्दू धर्म में संध्या काल में भगवान के सामने व तुलसी चौबारे में दीपक जलाने का विधान है, इसी को ‘सांध्य दीप’ कहते हैं ।

संध्या काल में दीप जलाने का महत्व!!!!!!

शास्त्रों में लक्ष्मी प्राप्ति, पापों के नाश, आरोग्य की प्राप्ति व अविद्या रूपी अंधकार (शत्रुओं) के नाश के लिए सांध्य दीप जलाने का बहुत महत्व बताया गया है ।

दीपक जलाते समय रखें इस बात का ध्यान
दीपक को दीवट या थोड़े से चावलों पर ही रखकर जलाना चाहिए । सीधे जमीन पर दीपक जलाकर नहीं रखना चाहिए । इसका कारण यह बताया गया है कि यदि कभी भूल वश दीपक बढ़ (बुझ) जाए तो चावलों या दीवट में रखे होने पर उसका दोष नहीं माना जाता है।

दीपक जलाने के बाद उसे प्रकाश रूप परमात्मा मान कर इस मन्त्र से नमस्कार करना चाहिए—नमस्कार का मन्त्र!!!!!

दीपो ज्योति: परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दन: ।
दीपो हरतु मे पापं सांध्यदीप ! नमोस्तु ते ।।
शुभं करोतु कल्याणमारोग्यं सुख सम्पदम् ।
शत्रुबुद्धि विनाशं च दीपज्योति नमोऽस्तु ते ।।

अर्थात्—हे सांध्य दीप ! आपकी ज्योति (प्रकाश) परब्रह्म परमात्मा है, आपका प्रकाश भगवान जनार्दन का रूप है । यह प्रकाश मेरे पापों का नाश कर दे, मैं आपको नमस्कार करता हूँ । हे सांध्य दीप ! आपका प्रकाश मंगलकारी, कल्याण करने वाला, आरोग्य व सुख-सम्पत्ति देने वाला और शत्रु की बुद्धि भ्रष्ट करने वाला है, मैं आपको नमस्कार करता हूँ ।

पूज्य संत श्रीरामचन्द्र डोंगरेजी महाराज द्वारा सांध्य दीप जलाने की सुन्दर व्याख्या!!!!!

पूज्य सन्त श्रीरामचन्द्र डोंगरेजी महाराज ने संध्या समय दीपक जलाने की बहुत सुन्दर व्याख्या की है । भगवान सूर्य बुद्धि के देवता हैं। सूर्य अस्त होने पर मनुष्य की बुद्धि-विवेक कमजोर हो जाते हैं और वासनाएं प्रबल हो जाती हैं । संध्या काल प्रदोष काल है । इस समय शंकरजी की पूजा होती है । इसीलिए संध्या काल में भक्ति करने (जप, कीर्तन, भजन, आरती) का बहुत महत्व है ।

संध्या समय भगवान के नाम का दीपक जलाना चाहिए । भगवान को दीपक की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि परमात्मा स्वयं प्रकाशमय है । भगवान का श्रीअंग करोड़ों सूर्यों के प्रकाश के समान है—‘कोटिसूर्य समप्रभ’ । इसलिए भगवान जहां विराजते हैं वहां अंधेरा आता ही नहीं है । दीपक के प्रकाश की आवश्यकता मानव को है । मानव के मन में अज्ञान का, वासना का अंधकार रहता है । इसलिए भगवान के समक्ष दीपक जलाकर प्रार्थना करनी चाहिए मेरे अंदर आपका प्रकाश (सद्बुद्धि) सदैव बनी रहे ।

प्राय: हम कहते हैं दीपक जोड़ दो अर्थात् जला दो । इसका सीधा अर्थ है कि अपने मन-बुद्धि को प्रकाश रूपी परमात्मा से जोड़ देना । जब बुद्धि परमात्मा से जुड़ जाती है, तब वह सद्बुद्धि हो जाती है । जहां सद्बुद्धि है वहां धर्म है, जहां धर्म है वहीं लक्ष्मी निवास करती है।

विशेष बात : संध्या काल में क्या न करें ?

संध्या काल प्रकाश रूप परमात्मा से जुड़ने का समय है इसलिए इस समय न तो खाना खाना चाहिए क्योंकि इससे अस्वस्थता आती है, न पढ़ना चाहिए क्योंकि पढ़ा हुआ याद नहीं रहता और न ही काम भावना रखनी चाहिए क्योंकि ऐसे समय के बच्चे आसुरी गुणों के होते हैं । यह समय केवल भगवान से जुड़ने और उनको स्मरण करने का है ।

संध्या आरती!!!!!!!

संतों ने भगवान की आरती की तरह संध्या काल की आरती का भी बहुत महत्व बताया है, इसे ‘संध्या आरती’ कहते हैं । एक बहुत ही सुन्दर व भावपूर्ण संध्या आरती पाठकों की सुविधा के लिए दी गयी है । इसको यदि कंठस्थ करके सांध्य दीप जलाते समय गा लिया जाए तो मन में बहुत शान्ति मिलती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है ।

व्रज में संध्या काल को संजा कहते हैं, चूंकि यह व्रज में गाया जाने वाला भजन है इसलिए इसमें संध्या के लिए ‘संजा’ शब्द का प्रयोग हुआ है । इस संध्या आरती में साधक अपने मन को सांध्य दीप जलाकर ईश्वर को स्मरण करने के लिए कह रहा है ।

संध्या आरती (भजन)!!!!!!

मन रे तू संजा सुमिरन कर ले,
अरे मन संजा सुमिरन कर ले ।
भोले मन संजा सुमिरन कर ले ।।
काहे को दिवला काहे की बाती,
काहे को घृत जले दिन-राती ।
अरे मन संजा तू …….।।
सोने का दिवला कपूर की बाती,
सुरही (गाय) का घृत जले दिन-राती ।
दीपक जोड़ धरौ मन्दिर में, जगमग होय उजालो,
अरे मन संजा तू …….।।
मेरे ही अंगना तुलसी को बिरवा, जाय ही सींचों करो रे,
संजा, सवेरे और दुपहरी तीनों वक्त हरि कू भजो रे ।
चोरी, बुराई पर-घर निंदा इन तीनन से बचो रे ।।
अरे मन संजा तू …….।।
जा काहू को लेनो और देनो, याही जनम चुकता कर ले,
पाप-पुण्य की बांधि गठरिया, अपने ही सिर पर रखो रे ।
मात-पिता और गुरु अपने की, इनकी सेवा कर ले ।।
अरे मन संजा तू …….।।
काहे की नाव, काहे को खेवा, कौन लगावै बेड़ा पार रे,
सत्य की नाव, धर्म को खेवा, कृष्ण लगावें बेड़ा पार रे ।।
अरे मन संजा तू …….।।
काहे के चंदा, काहे के सूरज, कौन बसै संसार रे ।
सत्य के चंदा,धर्म के सूरज,पाप बसै संसार रे।।
अरे मन संजा तू …….।।

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐दुकान 💐🌷*

एक दिन मैं सड़क से जा रहा था, रास्ते में एक जगह बोर्ड लगा था, ईश्वरीय किराने की दुकान…*

मेरी जिज्ञासा बढ़ गई क्यों ना इस दुकान पर जाकर देखूं इसमें बिकता क्या है?

जैसे ही यह ख्याल आया दरवाजा अपने आप खुल गया, जरा सी जिज्ञासा रखते हैं तो द्वार अपने आप खुल जाते हैं, खोलने नहीं पड़ते, मैंने खुद को दुकान के अंदर पाया…

मैंने दुकान के अंदर देखा जगह-जगह देवदूत खड़े थे, एक देवदूत ने मुझे टोकरी देते हुए कहा, मेरे बच्चे ध्यान से खरीदारी करना, यहां सब कुछ है जो एक इंसान को चाहिए है…

देवदूत ने कहा एक बार में टोकरी भर कर ना ले जा सको, तो दोबारा आ जाना फिर दोबारा टोकरी भर लेना…

अब मैंने सारी चीजें देखी, सबसे पहले “धीरज” खरीदा, फिर “प्रेम”, फिर “समझ”, फिर एक दो डिब्बे “विवेक” के भी ले लिए…

आगे जाकर “विश्वास” के दो तीन डिब्बे उठा लिए, मेरी टोकरी भरती गई…

आगे गया “पवित्रता” मिली सोचा इसको कैसे छोड़ सकता हूं, फिर “शक्ति” का बोर्ड आया शक्ति भी ले ली..

“हिम्मत” भी ले ली सोचा हिम्मत के बिना तो जीवन में काम ही नहीं चलता…

*थोड़ा और आगे “सहनशीलता” ली फिर “मुक्ति” का डिब्बा भी ले लिया…

*मैंने वह सब चीजें खरीद ली जो मेरे प्रभुजी मालिक को पसंद है, फिर एक नजर “प्रार्थना” पर पड़ी मैंने उसका भी एक डिब्बा उठा लिया..

वह इसलिए कि सब गुण होते हुए भी अगर मुझसे कभी कोई भूल हो जाए तो मैं प्रभु से प्रार्थना कर लूंगा कि मुझे भगवान माफ कर देना…

आनंदित होते हुए मैंने बास्केट को भर लिया, फिर मैं काउंटर पर गया और देवदूत से पूछा, सर.. मुझे इन सब समान का कितना बिल चुकाना होगा…

देवदूत बोला मेरे बच्चे यहां बिल चुकाने का ढंग भी ईश्ववरीय है, अब तुम जहां भी जाना इन चीजों को भरपूर बांटना और लुटाना, जो चीज जितनी ज्यादा तेजी से लूटाओगे, उतना तेजी से उसका बिल चुकता होता जाएगा और इन चीजों का बिल इसी तरह चुकाया किया जाता है…

कोई- कोई विरला इस दुकान पर प्रवेश करता है, जो प्रवेश कर लेता है वह माला-माल हो जाता है, वह इन गुणों को खूब भोगता भी है और लुटाता भी है…

प्रभू की यह दुकान का नाम है “सत्संग की दुकान”
सब गुणों के खजाने हमें ईश्वर से मिले हुए हैं, फिर कभी खाली हो भी जाए तो फिर सत्संग में आ कर बास्केट भर लेना…
हे प्रभू ! इस दुकान से एक चीज भी ग्रहण कर सकूं ऐसी कृपा करना।

💐💐प्रेषक अभिनीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

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ફિઝિક્સની વાઇવા – મૌખિક પરીક્ષા હતી,
બે વિદ્યાર્થી બહાર બેઠા હતા, એક ને અંદર બોલાવામાં આવ્યો….

પ્રોફેસરે પ્રશ્ન પૂછ્યો – તું ટ્રેનમાં જતો હો અને ગરમી લાગે તો શું કરે?
વિદ્યાર્થીએ જવાબ આપ્યો- બારી ખોલી નાખુ….

પ્રોફેસરે ખુશ થઈને કહું – વાહ, ગુડ.. હવે એ કહે કે.. ધારો કે બારીનું ક્ષેત્રફળ ૩ વર્ગ મીટર હોય, ટ્રેન ઉત્તર થી દક્ષિણ તરફ જતી હોય અને પવન પૂર્વ થી પશ્ચિમ તરફ જતો હોત અને હવાની ઘનતા ૧.૨૨ કી.ગ્રા./મીટર સ્કવેર હોય, હવાની ગતિ ૪૦ માઈલ પર અવર હોય, ડબ્બાની સાઈઝ લગભગ ૫૪ ફૂટ હોય તો આખા ડબ્બાને હવાથી ફ્રેશ થતા કેટલો સમય લાગે ?

વિદ્યાર્થી જવાબ ન આપી શક્યો અને તેને નાપાસ જાહેર કરાયો.

😳😳😳

તેણે બહાર આવીને બીજા વિદ્યાર્થીને કહ્યું કે ભાઈ તુ બારી ખોલતો નહી.

બીજો વિદ્યાર્થીઓ અંદર ગયો અને પ્રોફેસરે તેને એજ સવાલ પૂછ્યો- તું ટ્રેનમાં જતો હો અને ગરમી લાગે તો શું કરે?

જવાબ આવ્યો- સર, હું કોટ કાઢી નાખું …
પ્રોફેસર થોડા અચકાયા, ફરી પૂછ્યું- પણ જો વધુ ગરમી લાગે તો શું કરે?

વિદ્યાર્થીએ જવાબ આપ્યો – જો બહુ ગરમી લાગે તો હું શર્ટ પણ ઉતારી દઉં..
હવે પ્રોફેસર ખુરશીમાંથી થોડા ઊંચા થયા, એમનો અવાજ પણ સહેજ ઊંચો થયો – ભાઈ ,જો ખુબજ ગરમી લાગે તો શું કરે?

જવાબ આવ્યો – આમ તો સર બહુ ગરમી હોય તો હું એસીમાં જ મુસાફરી કરું..

પ્રોફેસરની ધીરજ ખૂટી, ટેબલ પર હાથ પછાડીને જોરથી બોલ્યા – ભાઈ તું જનરલ કોચમાં જાય અને બઉં ગરમી લાગે તો શું કરે?

વિદ્યાર્થીએ કહ્યું -તો પછી હું બનિયાન અને પેન્ટ, મોજા, બુટ પણ કાઢી નાખું ..
પ્રોફેસર સમસમી ગયા, ઊંડો શ્વાસ લીધો અને પૂછ્યું – ધાર કે તારી આવી સ્થિતિમાં કોઈ તારો સમાન લૂંટીને જતું રહે તો ?
વિદ્યાર્થી- સાહેબ..મને ગમે તે થાય, કે મારા સમાન ને ગમે તે થાય પણ..

હું બારી તો નઈ જ ખોલું, નઈ જ ખોલું અને નઈ જ ખોલું.

🤣😅😂😃🤣

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भारत में सेवा करने वाले ब्रिटिश अधिकारियों को इंग्लैंड लौटने पर सार्वजनिक पद/जिम्मेदारी नहीं दी जाती थी। तर्क यह था कि उन्होंने एक गुलाम राष्ट्र पर शासन किया है जिस जी वजह से उनके दृष्टिकोण और व्यवहार में फर्क आ गया होगा। अगर उनको यहां ऐसी जिम्मेदारी दी जाए, तो वह आजाद ब्रिटिश नागरिकों के साथ भी उसी तरह से ही व्यवहार करेंगे।
इस बात को समझने के लिए नीचे दिया गया वाक्य जरूर पढ़ें
एक ब्रिटिश महिला जिसका पति ब्रिटिश शासन के दौरान पाकिस्तान और भारत में एक सिविल सेवा अधिकारी था। महिला ने अपने जीवन के कई साल भारत के विभिन्न हिस्सों में बिताए। अपनी वापसी पर उन्होंने अपने संस्मरणों पर आधारित एक सुंदर पुस्तक लिखी।

महिला ने लिखा कि जब मेरे पति एक जिले के डिप्टी कमिश्नर थे तो मेरा बेटा करीब चार साल का था और मेरी बेटी एक साल की थी। डिप्टी कलेक्टर को मिलने वाली कई एकड़ में बनी एक हवेली में रहते थे। सैकड़ों लोग डीसी के घर और परिवार की सेवा में लगे रहते थे। हर दिन पार्टियां होती थीं, जिले के बड़े जमींदार हमें अपने शिकार कार्यक्रमों में आमंत्रित करने में गर्व महसूस करते थे, और हम जिसके पास जाते थे, वह इसे सम्मान मानता था। हमारी शान और शौकत ऐसी थी कि ब्रिटेन में महारानी और शाही परिवार भी मुश्किल से मिलती होगी।
ट्रेन यात्रा के दौरान डिप्टी कमिश्नर के परिवार के लिए नवाबी ठाट से लैस एक आलीशान कंपार्टमेंट आरक्षित किया जाता था। जब हम ट्रेन में चढ़ते तो सफेद कपड़े वाला ड्राइवर दोनों हाथ बांधकर हमारे सामने खड़ा हो जाता। और यात्रा शुरू करने की अनुमति मांगता। अनुमति मिलने के बाद ही ट्रेन चलने लगती।

एक बार जब हम यात्रा के लिए ट्रेन में सवार हुए, तो परंपरा के अनुसार, ड्राइवर आया और अनुमति मांगी। इससे पहले कि मैं कुछ बोल पाती, मेरे बेटे का किसी कारण से मूड खराब था। उसने ड्राइवर को गाड़ी न चलाने को कहा। ड्राइवर ने हुक्म बजा लाते हुए हुए कहा, जो हुक्म छोटे सरकार। कुछ देर बाद स्टेशन मास्टर समेत पूरा स्टाफ इकट्ठा हो गया और मेरे चार साल के बेटे से भीख मांगने लगा, लेकिन उसने ट्रेन को चलाने से मना कर दिया. आखिरकार, बड़ी मुश्किल से, मैंने अपने बेटे को कई चॉकलेट के वादे पर ट्रेन चलाने के लिए राजी किया, और यात्रा शुरू हुई।

कुछ महीने बाद, वह महिला अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने यूके लौट आई। वह जहाज से लंदन पहुंचे, उनकी रिहाइश वेल्स में एक काउंटी मेथी जिसके लिए उन्हें ट्रेन से यात्रा करनी थी। वह महिला स्टेशन पर एक बेंच पर अपनी बेटी और बेटे को बैठाकर टिकट लेने चली गई।लंबी कतार के कारण बहुत देर हो चुकी थी, जिससे उस महिला का बेटा बहुत परेशान हो गया था। जब वह ट्रेन में चढ़े तो आलीशान कंपाउंड की जगह फर्स्ट क्लास की सीटें देखकर उस बच्चे को फिर गुस्सा आ गया। ट्रेन ने समय पर यात्रा शुरू की तो वह बच्चा लगातार चीखने-चिल्लाने लगा। “वह ज़ोर से कह रहा था, यह कैसा उल्लू का पट्ठा ड्राइवर है है। उसने हमारी अनुमति के बिना ट्रेन चलाना शुरू कर दी है। मैं पापा को बोल कर इसे जूते लगवा लूंगा।” महिला को बच्चे को यह समझाना मुश्किल हो रहा था कि “यह उसके पिता का जिला नहीं है, यह एक स्वतंत्र देश है। यहां डिप्टी कमिश्नर जैसा तीसरे दर्जे का सरकारी अफसर तो क्या प्रधान मंत्री और राजा को भी यह अख्तियार नहीं है कि वह लोगों को उनके अहंकार को संतुष्ट करने के लिए अपमानित कर सके

आज यह स्पष्ट है कि हमने अंग्रेजों को खदेड़ दिया है। लेकिन हमने गुलामी को अभी तक देश बदर नहीं किया। आज भी कई डिप्टी कमिश्नर, एसपी, मंत्री, सलाहकार और राजनेता अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए आम लोगों को घंटों सड़कों पर परेशान करते हैं। इस गुलामी से छुटकारा पाने का एक ही तरीका है कि सभी पूर्वाग्रहों और विश्वासों को एक तरफ रख दिया जाए और सभी प्रोटोकॉल लेने वालों का विरोध किया जाए।

नहीं तो 15 अगस्त को झंडा फहराकर और मोमबत्तियां जलाकर लोग खुद को धोखा देते हैं के हम आजाद हैं…
प्रोटोकॉल को ना कहें।
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