Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🌳🦚आज की कहानी🦚🌳 💐💐माता – पिता का सम्मान💐💐…


🌳🦚आज की कहानी🦚🌳 💐💐माता – पिता का सम्मान💐💐 एक वृद्ध माँ रात को 11:30 बजे रसोई में बर्तन साफ कर रही है, घर में दो बहुएँ हैं, जो बर्तनों की आवाज से परेशान होकर अपने पतियों को सास को उल्हाना देने को कहती हैं। वो कहती है आपकी माँ को मना करो इतनी रात को […]

🌳🦚आज की कहानी🦚🌳 💐💐माता – पिता का सम्मान💐💐…
Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐अनुभवी संदेश💐💐

एक युवा युगल के पड़ोस में एक वरिष्ठ नागरिक युगल रहते थे , जिनमे पति की आयु लगभग अस्सी वर्ष थी , और पत्नी की आयु उनसे लगभग पांच वर्ष कम थी .

युवा युगल उन वरिष्ठ युगल से बहुत अधिक लगाव रखते थे , और उन्हें दादा दादी की तरह सम्मान देते थे . इसलिए हर रविवार को वो उनके घर उनके स्वास्थ्य आदि की जानकारी लेने और कॉफी पीने जाते थे .

युवा युगल ने देखा कि हर बार दादी जी जब कॉफ़ी बनाने रसोईघर में जाती थी तो कॉफ़ी की शीशी के ढक्कन को दादा जी से खुलवाती थी .

इस बात का संज्ञान लेकर युवा पुरुष ने एक ढक्कन खोलने के यंत्र को लाकर दादी जी को उपहार स्वरूप दिया ताकि उन्हें कॉफी की शीशी के ढक्कन को खोलने की सुविधा हो सके .

उस युवा पुरुष ने ये उपहार देते वक्त इस बात की सावधानी बरती की दादा जी को इस उपहार का पता न चले ! उस यंत्र के प्रयोग की विधि भी दादी जी को अच्छी तरह समझा दी .

उसके अगले रविवार जब वो युवा युगल उन वरिष्ठ नागरिक के घर गया तो वो ये देख के आश्चर्य में रह गया कि दादी जी उस दिन भी कॉफी की शीशी के ढक्कन को खुलवाने के लिए दादा जी के पास लायी !

युवा युगल ये सोचने लगे कि शायद दादी जी उस यंत्र का प्रयोग करना भूल गयी या वो यंत्र काम नही कर रहा !

जब उन्हें एकांत में अवसर मिला तो उन्होंने दादी जी से उस यंत्र के प्रयोग न करने का कारण पूछा . दादी जी के उत्तर ने उन्हें निशब्द कर दिया..!

दादी जी ने कहा – “ओह ! कॉफी की शीशी के ढक्कन को मैं स्वयं भी अपने हाथ से , बिना उस यंत्र के प्रयोग के आसानी से खोल सकती हूँ , पर मैं कॉफी की शीशी का ढक्कन उनसे इसलिए खुलवाती हूँ कि उन्हें ये अहसास रहे कि आज भी वो मुझसे ज्यादा मजबूत हैं . और मैं उन्हीं पर आश्रित हूँ , इसीलिए वे हमारे घर के पुरुष हैं !

इस बात से मुझे भी ये लाभ मिलता है कि मैं ये महसूस करती हूँ कि मैं आज भी उन पर निर्भर हूँ , और वो मेरे लिए आज भी बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं . यही बात हम दोनों के स्नेह के बंधन को शक्ति प्रदान करती है .

किसी भी युगल की एकजुटता ही उनके सम्बन्ध की बुनियाद होती है ! अब हम दोनों के पास अधिक आयु नही बची है , इसलिए हमारी एकजुटता हम दोनों के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है .”

शिक्षा:-
उस युवा युगल को एक बहुत ही महत्वपूर्ण सीख मिली. वरिष्ठ नागरिक चाहे घर में किसी भी प्रकार की आमदनी का कोई सहयोग ना दे रहे हों, पर उनके अनुभव हमें पल पल महत्वपूर्ण सीख देते रहते हैं..!!

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

Posted in हिन्दू पतन

यहज़हरकहांसेआता_है ???

इतिहास में सैकड़ों ऐसी घटनाएं दर्ज हैं जहां हिंदू से नये नये मुसलमान बने लोगों ने हिंदुओं पर अवर्णनीय अत्याचार किया या अगर अत्याचार करने की स्थिति में नहीं थे तो हिन्दू-द्रोह और देश-द्रोह में कोई कसर नहीं छोड़ी । समय और स्थान की बाध्यता का ध्यान रखते हुए मैं सिर्फ पांच ऐसे उदाहरण लूंगा जो अपने आप में क्लासिकल है और जिसके विषय में आप लोगों में से अधिकतर लोग थोड़ा-बहुत जानते हैं।

  1. #सुहा_भट्ट कश्मीर का एक सम्मानित और प्रसिद्ध ब्राह्मण था और सिकन्दर बुतसिकन का समकालीन । 1389 से 1413 के दौरान सिकन्दर (बुतसिकन) की बादशाहत थी । सिकन्दर हिन्दू धर्म और मूर्तियों का इतना बड़ा दुश्मन था कि उसे “बुतशिकन” यानि “मूर्तिभंजन” की उपाधि मिली थी/है। इस दौरान कश्मीर में हिंदुओं के ऊपर बहुत अत्याचार हो रहा था । सुहा भट्ट को भी मुसलमान बनाने के लिए सताया गया। प्रारंभ में उसने उसका विरोध किया लेकिन बाद में उसने इस्लाम स्वीकार कर लिया। इस्लाम स्वीकार करने के बाद उसे सिकन्दर बुतसिकन ने अपना प्रधानमंत्री बना दिया और सुहा भट्ट “#सैफुद्दीन” के नये नाम से प्रसिद्ध हुआ । कश्मीर के सुल्तान का प्रधानमंत्री होने के कारण उसके पास बहुत शक्तियां थी। सुल्तान स्वयं एक कट्टरपंथी मुस्लिम था । लेकिन मैं अभी सुल्तान के अत्याचारों की बात नहीं करूंगा।

सुहा भट्ट यानि सैफुद्दीन ने जो किया उसका संक्षिप्त वर्णन कर रहा हूं । सुहा भट्ट यानी नए धर्म परिवर्तित सैफुद्दीन ने अनंतनाग जिले में ही लगभग 300 मंदिरों का विनाश किया । उसी के समय विश्व प्रसिद्ध मार्तंड मंदिर को तोड़ा गया । यह मंदिर इतना मजबूत था कि इसे तोड़ने में एक वर्ष के बाद भी जब सफलता नहीं मिली तो इसकी नींव को खुदवा कर इसे पूरी तरह नष्ट करने का प्रयास किया। बाद में इसमें आग लगा दी गई। कश्मीर के अनंतनाग जिले में यह स्थान अब मट्टन (मार्तंड का तद्भव “मट्टन”) के नाम से जाना जाता है ।

सुहा भट्ट का आदेश था जितने भी मंदिर हैं उनमें जो भी मूर्तियां सोने, चांदी या कीमती धातुओं की मिले उन्हें उठाकर पिघला दिया जाए और राजकोष में जमा कर दिया जाए। जिन्हें तोड़ा जा सकता है उन्हें तोड़ दिया जाए और जिसे तोड़ा नहीं जा सकता उनमें मानव मल से प्रतिदिन स्नान कराया जाए। कश्मीरी पंडितों का इस दौरान सामूहिक धर्मांतरण हुआ। जिन्होंने धर्मांतरण नहीं किया या तो मार डाले गये या कश्मीर से भगा दिए गए। उनकी भूमि, सम्पत्ति छीन ली गई। यह सब कुछ इतिहास में दर्ज है।

कश्मीर से अधिक बेहतर लिखित इतिहास भारत के किसी अन्य राज्य या क्षेत्र का नहीं है। आप सभी को पता है कि भारत का पहला इतिहासकार कल्हण (बारहवीं शताब्दी) कश्मीरी पंडित था जिसने “राजतरंगिणी” (1148-49) में कश्मीर सहित भारत के अन्य राजाओं के इतिहास का भी वर्णन किया है। कल्हण के बाद उस परंपरा को जारी रखते हुए दूसरे कश्मीरी पंडित “जोनाराजा” (चौदहवीं शताब्दी) ने “द्वितीय राजतरंगिणी” की रचना की और उनके शिष्य “श्रीवर” ने तृतीय राजतरंगिणी की रचना की।

उपरोक्त विवरण द्वितीय राजतरंगिणी में लिपिबद्ध हैं। जोनाराजा लिखते हैं कि सुहाभट्ट यानी सैफुद्दीन के समय में कश्मीर घाटी में अभी भी हिंदू बहुसंख्यक थे। सुहाभट्ट यानी (इस्लाम में नया नाम प्राप्त किया हुआ) सैफुद्दीन ने कल के अपने ही पंडित भाइयों के ऊपर बहुत अत्याचार किए। अब सवाल यह आता है कि कल का कश्मीरी ब्राह्मण आज इतना बड़ा कट्टरपंथी मुसलमान बनकर इतने अत्याचार क्यों करता है ? मुसलमान बनने के बाद उसने ऐसा क्या सीखा, क्या समझा जिसकी वजह से वह अपने ही भाइयों का और संपूर्ण कश्मीरी संस्कृत का दुश्मन हो गया। कलमा पढ़ा, आसमानी किताब पढ़ी और मौलवियों से दीक्षा ली बस। तैयार हो गया मानवता और मानव संस्कृति को नष्ट करने वाला ज़हर।

२. #अल्लामा_इक़बाल

अल्लामा मोहम्मद इकबाल के पूर्वज, अधिकतर कश्मीरी मुस्लिमों की तरह ब्राह्मण थे। इनका गोत्र सप्रू था और ये शैव मत का अनुयायी था। उनके पिता भी जन्म से हिन्दू थे और उनका नाम रतन लाल सप्रू था। वे लोग शोपियां से कुलगाम जाने वाली सड़क पर स्थित सपरैन नामक गांव में रहते थे, इसी कारण उन्हें सप्रू कहा जाता था। कुछ लोग इन्हें आज के “सोपोर” का रहने वाला बताते हैं जिससे ये “सोपोरू” (सप्रू) कहलाया। बाद में यह परिवार श्रीनगर चला गया और श्रीनगर से सियालकोट (अब पाकिस्तान) जो भारत के पठानकोट से बहुत निकट ही सीमा पार है।
लेकिन मुसलमान बनने के बाद यह कितना जहरीला हो गया इसका अनुमान आप इस बात से लगाइये कि इक़बाल को पाकिस्तान का मानस पिता (ideological father) कहा जाता है। 29 दिसंबर 1930 को इलाहाबाद में जब “अल्लामा इकबाल” की अध्यक्षता में मुस्लिम लीग का 25 वां सम्मलेन हुआ तब इकबाल ने अपने भाषण के दौरान यह कहा था:

हो जाये अगर शाहे-खुरासां का इशारा ,
सिजदा न करूँ हिन्द की नापाक जमीं पर।

यानी

“अगर तुर्की (खुरासान, अब यह ईरान का उत्तरी राज्य है) का खलीफा इशारा भी कर दे तो भारत की नापाक (अपवित्र) जमीन पर नमाज भी नहीं पढूंगा।”

चूँकि नापाक का अर्थ अपवित्र होता है, और उसका विलोम शब्द “पाक” यानि पवित्र होता है| यही शब्द पाकिस्तान की नींव बनी। पाकिस्तान एक विचार था जो अल्लामा इकबाल के दिमाग की उपज थी।

जब 1913 में रवींद्र नाथ टैगोर को बांग्ला भाषा में उनकी कृति “गीतांजलि” पर नोबल पुरस्कार मिला तो अल्लामा इक़बाल बहुत व्यथित था। रवींद्र नाथ टैगोर पहले एशियाई थे जिन्हें नोबल पुरस्कार मिला था। इसके पूर्व एशियाई मूल के किसी भी व्यक्ति को किसी भी विषय में नोबल नहीं मिला था। इक़बाल को इस बात का बहुत दुःख था फारसी की बजाय बांग्ला को पुरस्कार कैसे मिला और किसी मुसलमान (उसे स्वयं को) की बजाय टैगोर ( एक हिंदू ब्राह्मण) को कैसे मिला। इक़बाल ने तुर्की के खलीफा को पत्र लिखकर प्रार्थना की कि वह नोबल कमीटी से यह पुरस्कार निरस्त करायें।

सवाल वही है कि बस एक पीढ़ी बाद ही अपने देश जाति, धर्म, समाज और गैर-मुस्लिमों से इतनी धृणा?

तो ये ज़हर कहां से आता है?

३. #मोहम्मदअलीजिन्ना: (25 दिसंबर 1876 -11 सितंबर 1948)

जिन्नाह, मिठीबाई और जिन्नाहभाई पुँजा की सात सन्तानों में सबसे बड़ा था। उनके पिता जिन्नाभाई एक सम्पन्न गुजराती व्यापारी थे, लेकिन जिन्ना के जन्म के पूर्व वे काठियावाड़ छोड़ सिन्ध में जाकर बस गये। जिन्नाह के पूर्वज हिन्दू राजपूत थे, जिन्होंने इस्लाम क़बूल कर लिया।
बताने की आवश्यकता नहीं कि उसने भारत और उसकी संस्कृति को कैसे तार तार किया। वह लगभग बीस लाख लोगों की मौत कि कारण बना और उसके कारण डेढ़ करोड़ बेघर हुए। हजारों महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। पीढ़ियां नष्ट हो गयी और पाकिस्तान नाम का नासूर जाने कितने वर्षों तक हमें खाता रहेगा। आज पाकिस्तान आतंकवाद की नर्सरी है। एक क्षत्रिय राजपूत व्यापारी से मुसलमान और बैरिस्टर फिर इस्लाम का अलम्बरदार। आखीर में मानवता का दरिन्दा।

तो ये ज़हर कहां से आता है?

४. #शेख #और #फारूक_अब्दुल्ला:

फारूक़ के पिता शेख़ अब्दुल्ला कश्मीर के बड़े राजनीतिज्ञ थे। राजनीतिक दल ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस’ की स्थापना उन्होंने की थी जिसे पहले ‘मुस्लिम कॉन्फ्रेंस’ कहा जाता था। शेख़ कश्मीर के भारत में विलय से पहले उसे मुस्लिम देश बनाना चाहते थे।

अपनी आत्मकथा (ऑटोबायोग्राफी) ‘आतिश-ए- चिनार’ में इसका ज़िक्र किया है कि उसके पूर्वज हिंदू और कश्मीरी पंडित थे। इस पुस्तक में उसने बताया है कि उसके परदादा का नाम #बालमुकुंदकौल था। उसके पूर्वज मूल रूप से #सप्रू गोत्र के #कश्मीरीब्राह्मण थे।

तीन पीढ़ियों की इनकी करतूतों और इनके विषय में अभी कुछ बताने की आवश्यकता है क्या?

शेख अब्दुल्ला देश द्रोह के आरोप में अपने ही भाई “नेहरू” द्वारा जेल में डाला गया था। फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला अभी देशद्रोह के कारण ही preventive detention में हैं।

५. #ओवैसी

तुलसीराम_दास एक तैलंग हिन्दू था। अपनी योग्यता के कारण निज़ाम के यहां अच्छे पद पर नौकरी मिल गयी। फिर निज़ाम के प्रभाव में आकर कलमा पढ़ा। फिर रजाकार बन गया। भारत विभाजन के समय तेलंगाना के हिन्दुओं पर तमाम अत्याचार किया।

अब उसका एक परपोता संसद से हैदराबाद तक हिन्दू-द्रोह का नेता है। वह CAA विरोध के अग्रणी नेताओं में है। उसका छोटा भाई सामाजिक वैमनस्य फैलाने के लिए जेल जा चुका है। उसने भाषण में कहा था “बस पंद्रह मिनट के लिए पुलिस हटा लो हम बता देगे हम कौन हैं।”

तो ये ज़हर कहां से आता है?

आज पूरी दुनिया में आसमानी किताब की शिक्षा आतंकवाद का दूसरा नाम है।

निदा फ़ाज़ली तक के मुंह से निकल गया:

उठ-उठ के मस्जिदों से नमाज़ी चले गए,
दहशत गरों के हाथ में इस्लाम रह गया।

रवि कांत

Posted in હાસ્ય કવિતા

उत्तम हास्य – व्यंग्य

_ट्रेन में मेल एक्सप्रेस ही होती है
फीमेल एक्सप्रेस क्यों नहीं चलाई जाती है!!

“एक औरत गुस्साती हुई,
स्टेशन मास्टर के पास आयी,
इक्कीसवीं सदी की रागिनी सुनायी…

महिलाओं के लिए
तीस-प्रतिशत
आरक्षण का सिद्धांत
क्यूँ नहीं अपना रहे हो,

वर्षों से मेल-एक्सप्रेस चला रहे हो,
फीमेल-एक्सप्रेस क्यूँ नहीं ला रहे हो ?

स्टेशन मास्टर घबराया,
मुश्किल से जवाब दे पाया,

मैडम….. ‌ मैडम…
मेल-एक्सप्रेस ही मेकअप,
करते-करते लेट हो जाती है,
फिमेल-एक्सप्रेस तो
मेकअप ही करती रह जाएगी,
सवारी को कब पहुंचाएगी ?

और…..

आज की रेल व्यवस्था में,
जहाँ लोग, मेल-एक्सप्रेस को रोक-रोक कर
छेड़खानी करते हैं,
फीमेल-एक्सप्रेस के साथ तो,
जाने क्या हो सकता है,

इल्जाम में ड्राइवर फँस सकता है,
उसकी नौकरी जा सकती है,
ड्राईवर की पत्नी गुस्सा सकती है,

और फिर मैडम…
अपना आँचल संभालिए
और दूसरा पहलू देखिए,

फीमेल-एक्सप्रेस चैन से न चल पाएगी,
बगल की लाइन के मेल-एक्सप्रेस उसे देखकर,
सीटी बजाएंगे,
उनकी हेडलाइट
बंद हो जाएगी,
ठौर पर वह रोते हुए ही पहुँच पाऐंगे,
वहाँ पर सिर्फ
“मी टू” की फरियाद सुनाएंगे,

और भी परेशानी है … फीमेल-एक्सप्रेस,
ड्राइवर के साथ भाग सकती है,
सिग्नल-मैन का कहा
टाल सकती है,
रेल-एमप्लाई का कैरेक्टर ,
बिगाड़ सकती है,
इमोशनल होकर,
पटरी उखाड़ सकती है…

जबकि मेल-एक्सप्रेस,
सिर्फ मोशन में रहती है,
इमोशन में नहीं आती है,

देर से ही सही,
पहुँच तो जाती है…!!”

😊🚉😊😊😊

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐गरीबों के प्रति हमदर्दी💐 बहुत ही मर्मस्पर्शी व्यथा😭

मैं एक घर के करीब से गुज़र रहा था की अचानक से मुझे उस घर के अंदर से एक बच्चे की रोने की आवाज़ आई। उस बच्चे की आवाज़ में इतना दर्द था कि अंदर जा कर वह बच्चा क्यों रो रहा है, यह मालूम करने से मैं खुद को रोक ना सका।

अंदर जा कर मैने देखा कि एक माँ अपने दस साल के बेटे को आहिस्ता से मारती और बच्चे के साथ खुद भी रोने लगती। मैने आगे हो कर पूछा बहनजी आप इस छोटे से बच्चे को क्यों मार रही हो? जब कि आप खुद भी रोती हो।

उस ने जवाब दिया भाई साहब इस के पिताजी भगवान को प्यारे हो गए हैं और हम लोग बहुत ही गरीब हैं, उन के जाने के बाद मैं लोगों के घरों में काम करके घर और इस की पढ़ाई का खर्च बामुश्किल उठाती हूँ और यह कमबख्त स्कूल रोज़ाना देर से जाता है और रोज़ाना घर देर से आता है।

जाते हुए रास्ते मे कहीं खेल कूद में लग जाता है और पढ़ाई की तरफ ज़रा भी ध्यान नहीं देता है जिस की वजह से रोज़ाना अपनी स्कूल की वर्दी गन्दी कर लेता है। मैने बच्चे और उसकी माँ को जैसे तैसे थोड़ा समझाया और चल दिया।

इस घटना को कुछ दिन ही बीते थे की एक दिन सुबह सुबह कुछ काम से मैं सब्जी मंडी गया। तो अचानक मेरी नज़र उसी दस साल के बच्चे पर पड़ी जो रोज़ाना घर से मार खाता था। मैं क्या देखता हूँ कि वह बच्चा मंडी में घूम रहा है और जो दुकानदार अपनी दुकानों के लिए सब्ज़ी खरीद कर अपनी बोरियों में डालते तो उन से कोई सब्ज़ी ज़मीन पर गिर जाती थी वह बच्चा उसे फौरन उठा कर अपनी झोली में डाल लेता।

मैं यह नज़ारा देख कर परेशानी में सोच रहा था कि ये चक्कर क्या है, मैं उस बच्चे का चोरी चोरी पीछा करने लगा। जब उस की झोली सब्ज़ी से भर गई तो वह सड़क के किनारे बैठ कर उसे ऊंची ऊंची आवाज़ें लगा कर वह सब्जी बेचने लगा। मुंह पर मिट्टी गन्दी वर्दी और आंखों में नमी, ऐसा महसूस हो रहा था कि ऐसा दुकानदार ज़िन्दगी में पहली बार देख रहा हूँ ।

अचानक एक आदमी अपनी दुकान से उठा जिस की दुकान के सामने उस बच्चे ने अपनी नन्ही सी दुकान लगाई थी, उसने आते ही एक जोरदार लात मार कर उस नन्ही दुकान को एक ही झटके में रोड पर बिखेर दिया और बाज़ुओं से पकड़ कर उस बच्चे को भी उठा कर धक्का दे दिया।

वह बच्चा आंखों में आंसू लिए चुप चाप दोबारा अपनी सब्ज़ी को इकठ्ठा करने लगा और थोड़ी देर बाद अपनी सब्ज़ी एक दूसरे दुकान के सामने डरते डरते लगा ली। भला हो उस शख्स का जिस की दुकान के सामने इस बार उसने अपनी नन्ही दुकान लगाई उस शख्स ने बच्चे को कुछ नहीं कहा।

थोड़ी सी सब्ज़ी थी ऊपर से बाकी दुकानों से कम कीमत। जल्द ही बिक्री हो गयी, और वह बच्चा उठा और बाज़ार में एक कपड़े वाली दुकान में दाखिल हुआ और दुकानदार को वह पैसे देकर दुकान में पड़ा अपना स्कूल बैग उठाया और बिना कुछ कहे वापस स्कूल की और चल पड़ा। और मैं भी उस के पीछे पीछे चल रहा था।

बच्चे ने रास्ते में अपना मुंह धो कर स्कूल चल दिया। मै भी उस के पीछे स्कूल चला गया। जब वह बच्चा स्कूल गया तो एक घंटा लेट हो चुका था। जिस पर उस के टीचर ने डंडे से उसे खूब मारा। मैने जल्दी से जा कर टीचर को मना किया कि मासूम बच्चा है इसे मत मारो। टीचर कहने लगे कि यह रोज़ाना एक डेढ़ घण्टे लेट से ही आता है और मै रोज़ाना इसे सज़ा देता हूँ कि डर से स्कूल वक़्त पर आए और कई बार मै इस के घर पर भी खबर दे चुका हूँ।

खैर बच्चा मार खाने के बाद क्लास में बैठ कर पढ़ने लगा। मैने उसके टीचर का मोबाइल नम्बर लिया और घर की तरफ चल दिया। घर पहुंच कर एहसास हुआ कि जिस काम के लिए सब्ज़ी मंडी गया था वह तो भूल ही गया। मासूम बच्चे ने घर आ कर माँ से एक बार फिर मार खाई। सारी रात मेरा सर चकराता रहा।

सुबह उठकर फौरन बच्चे के टीचर को कॉल की कि मंडी टाइम हर हालत में मंडी पहुंचें। और वो मान गए। सूरज निकला और बच्चे का स्कूल जाने का वक़्त हुआ और बच्चा घर से सीधा मंडी अपनी नन्ही दुकान का इंतेज़ाम करने निकला। मैने उसके घर जाकर उसकी माँ को कहा कि बहनजी आप मेरे साथ चलो मै आपको बताता हूँ, आप का बेटा स्कूल क्यों देर से जाता है।

वह फौरन मेरे साथ मुंह में यह कहते हुए चल पड़ीं कि आज इस लड़के की मेरे हाथों खैर नही। छोडूंगी नहीं उसे आज। मंडी में लड़के का टीचर भी आ चुका था। हम तीनों ने मंडी की तीन जगहों पर पोजीशन संभाल ली, और उस लड़के को छुप कर देखने लगे। आज भी उसे काफी लोगों से डांट फटकार और धक्के खाने पड़े, और आखिरकार वह लड़का अपनी सब्ज़ी बेच कर कपड़े वाली दुकान पर चल दिया।
अचानक मेरी नज़र उसकी माँ पर पड़ी तो क्या देखता हूँ कि वह बहुत ही दर्द भरी सिसकियां लेकर लगा तार रो रही थी, और मैने फौरन उस के टीचर की तरफ देखा तो बहुत शिद्दत से उसके आंसू बह रहे थे। दोनो के रोने में मुझे ऐसा लग रहा था जैसे उन्हों ने किसी मासूम पर बहुत ज़ुल्म किया हो और आज उन को अपनी गलती का एहसास हो रहा हो।

उसकी माँ रोते रोते घर चली गयी और टीचर भी सिसकियां लेते हुए स्कूल चला गया। बच्चे ने दुकानदार को पैसे दिए और आज उसको दुकानदार ने एक लेडी सूट देते हुए कहा कि बेटा आज सूट के सारे पैसे पूरे हो गए हैं। अपना सूट ले लो, बच्चे ने उस सूट को पकड़ कर स्कूल बैग में रखा और स्कूल चला गया।

आज भी वह एक घंटा देर से था, वह सीधा टीचर के पास गया और बैग डेस्क पर रख कर मार खाने के लिए अपनी पोजीशन संभाल ली और हाथ आगे बढ़ा दिए कि टीचर डंडे से उसे मार ले। टीचर कुर्सी से उठा और फौरन बच्चे को गले लगा कर इस क़दर ज़ोर से रोया कि मैं भी देख कर अपने आंसुओं पर क़ाबू ना रख सका।

मैने अपने आप को संभाला और आगे बढ़कर टीचर को चुप कराया और बच्चे से पूछा कि यह जो बैग में सूट है वह किस के लिए है। बच्चे ने रोते हुए जवाब दिया कि मेरी माँ अमीर लोगों के घरों में मजदूरी करने जाती है और उसके कपड़े फटे हुए होते हैं कोई जिस्म को पूरी तरह से ढांपने वाला सूट नहीं और और मेरी माँ के पास पैसे नही हैं इस लिये अपने माँ के लिए यह सूट खरीदा है।

तो यह सूट अब घर ले जाकर माँ को आज दोगे? मैने बच्चे से सवाल पूछा। जवाब ने मेरे और उस बच्चे के टीचर के पैरों के नीचे से ज़मीन ही निकाल दी। बच्चे ने जवाब दिया नहीं अंकल छुट्टी के बाद मैं इसे दर्जी को सिलाई के लिए दे दूँगा। रोज़ाना स्कूल से जाने के बाद काम करके थोड़े थोड़े पैसे सिलाई के लिए दर्जी के पास जमा किये हैं।

टीचर और मैं सोच कर रोते जा रहे थे कि आखिर कब तक हमारे समाज में गरीबों के साथ ऐसा होता रहेगा उन के बच्चे त्योहार की खुशियों में शामिल होने के लिए जलते रहेंगे आखिर कब तक।

क्या ऊपर वाले की खुशियों में इन जैसे गरीब का कोई हक नहीं ? क्या हम अपनी खुशियों के मौके पर अपनी ख्वाहिशों में से थोड़े पैसे निकाल कर अपने समाज मे मौजूद गरीब और बेसहारों की मदद नहीं कर सकते।

अगर हो सके तो इस लेख को उन सभी सक्षम लोगो को बताना ताकि हमारी इस छोटी सी कोशिश से किसी भी सक्षम के दिल मे गरीबों के प्रति हमदर्दी का जज़्बा ही जाग जाये और यही लेख किसी भी गरीब के घर की खुशियों की वजह बन जाये। s✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻
आप-सब-भी-ठंडे-दिमाग-से-एक-बारजरूर-सोचना।s✍🏻✍🏻s✍🏻✍🏻
🫐🫐🫐🫐🫐🫐🫐🫐🫐
🍓🍓🍓🍓🍓🍓🍓🍓🍓
सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।
🙏🌳🌳🌳🙏