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आज का प्रेरक प्रसङ्ग

!! ज्ञान पिपासु !!

एक गुरु के दो शिष्य थे। एक पढ़ाई में बहुत तेज और विद्वान था और दूसरा फिसड्डी। पहले शिष्य की हर जगह प्रसंशा और सम्मान होता था। जबकि दूसरे शिष्य की लोग उपेक्षा करते थे। एक दिन रोष में दूसरा शिष्य गुरू जी के जाकर बोला, “गुरूजी! मैं उससे पहले से आपके पास विद्याध्ययन कर रहा हूँ। फिर भी आपने उसे मुझसे अधिक शिक्षा दी।” गुरुजी थोड़ी देर मौन रहने के बाद बोले, “पहले तुम एक कहानी सुनो। एक यात्री कहीं जा रहा था। रास्ते में उसे प्यास लगी। थोड़ी दूर पर उसे एक कुआं मिला। कुएं पर बाल्टी तो थी लेकिन रस्सी नही थी। इसलिए वह आगे बढ़ गया। थोड़ी देर बाद एक दूसरा यात्री उस कुएं के पास आया। कुएं पर रस्सी न देखकर उसने इधर-उधर देखा।

पास में ही बड़ी बड़ी घास उगी थी। उसने घास उखाड़कर रस्सी बटना प्रारम्भ किया। थोड़ी देर में एक लंबी रस्सी तैयार हो गयी। जिसकी सहायता से उसने कुएं से पानी निकाला और अपनी प्यास बुझा ली।” गुरु जी ने उस शिष्य से पूछा, “अब तुम मुझे यह बताओ कि प्यास किस यात्री को ज्यादा लगी थी?” शिष्य ने तुरंत उत्तर दिया कि दूसरे यात्री को। गुरूजी फिर बोले, “प्यास दूसरे यात्री को ज्यादा लगी थी। यह हम इसलिए कह सकते हैं क्योंकि उसने प्यास बुझाने के लिए परिश्रम किया। उसी प्रकार तुम्हारे सहपाठी में ज्ञान की प्यास है। जिसे बुझाने लिए वह कठिन परिश्रम करता है। जबकि तुम ऐसा नहीं करते।”

शिष्य को अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था। वह भी कठिन परिश्रम में जुट गया।

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⚜️ आज का प्रेरक प्रसंग ⚜️ *!! कभी किसी को छोटा न समझें !!*

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एक जंगल में एक शेर सो रहा था। अचानक एक चूहा शेर को सोता देखकर उसके ऊपर आकर खेलने लगा। जिसके कारण उछलकूद से शेर की नींद खुल गयी और उसने उस चूहे को पकड़ लिया। चूहा डर से कांपने लगा और शेर से बोला- हे राजन! हमें माफ़ कर दो। जब कभी आपके ऊपर कोई दुःख आएगा तो मैं आपकी सहायता कर दूंगा। तो शेर हंसते हुए बोला- मैं सबसे अधिक शक्तिशाली हूं, मुझे किसी की सहायता की क्या जरूरत, यह कहते हुए उसने चूहे को छोड़ दिया।

कुछ दिनों बाद वही शेर शिकारी द्वारा फैलाये गये जाल में फंस गया और फिर खूब जोर लगाया लेकिन वह जाल से छुटने की अपेक्षा और अधिक फंसता चला गया। यह सब देखकर पास में ही उस चूहे की नजर शेर पर पड़ी तो उसने शेर की सहायता वाली बात याद दिलाकर अपने नुकीले दांतों से जाल काट दिया और फिर शेर जाल से आजाद हो गया। इस प्रकार चूहे ने अपने जान की कीमत शेर की जान को बचाकर पूरा किया।

शिक्षा:-
कभी किसी को छोटा समझकर उसकी शक्ति नहीं आंकनी चाहिए क्यूंकी मुसीबत में किसी की भी सहायता की जरूरत पड़ सकती है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।
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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐सेवादार का श्रा🌷🌷🌷

एक दिन गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज के दरबार में एक मदारी अपने रीछ के साथ प्रस्तुत हुआ।

मदारी के द्वारा सिखाए गए करतब रीछ ने संगत के सामने प्रस्तुत करने शुरू किए। कुछ खेल इतने हास्य से भरपूर थे, कि संगत की हसी रोके से ना रुक रही थी। करतब देख कर गुरु जी मुस्कुरा रहे थे,,एक सिख के ठहाकों से सारा दरबार गुंजायमान था। वो सिख था, गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज पर चवर झुलाने की सेवा करने वाला भाई कीरतिया…
भाई कीरतिया आप इन करतबों को देख,बड़े आनंदित हो गुरु साहब जी ने कहा। महाराज इस रीछ के करतब हैं,ही इतने हास्य पूर्ण सारी संगत ठहाके लगा रही है। मुस्कुरा तो आप भी रहें हैं, दातार,, भाई कीरतिया ने कहा।

हम तो कुदरत के करतब देख कर मुस्कुरा रहे हैं,भाई कीरतिया। कुदरत के करतब? कैसे महाराज
भाई कीरतिया, क्या आप जानते हो इस रीछ के रूप में ये जीवात्मा कौन है? नही दाता, ये बात मुझ जैसे साधारण जीव के बस में कहाँ? भाई कीरतिया,,रीछ के रूप में संगत का मनोरंजन करने वाला और कोई नही,,आप का पिता भाई शोभाराम है। भाई कीरतिया जी को जैसे एक आघात सा लगा। सर से लेकर पाँव तक सारा शरीर कांप गया। कुछ संभला तो हाथ में पकड़े चंवर को गुरुपिता के चरनों में रख दिया और बोले- सारा संसार जानता है, मेरे पिता भाई शोभाराम ने गुरु दरबार की ताउम्र सेवा की,, उन्होंने एक दिन भी गुरुसेवा के बिना व्यतीत नही किया। अगर उन जैसे सेवक की गति ऐसी है, तो गुरु जी,, सेवा करने का कोई लाभ नही। भाई कीरतिया,,आपके पिता भाई शोभाराम ने गुरुघर में सेवा तो खूब की लेकिन सेवा के साथ स्वयं की हस्ती को नही मिटाया। अपनी समझ को गुरु विचार से उच्च समझा। एक दिन हमारा एक सिख(शिष्य)अपनी फसल बैलगाड़ी पर लाद कर मण्डी में बेचने जा रहा था। राह में गुरुद्वारा देख मन में गुरुदर्शन करके कार्य पर जाने की प्रेरणा हुई। बैलगाड़ी को चलता छोड़,, वो सिख गुरुघर में अंदर आ गया। गुरबानी का पाठ चल रहा था। पाठ सम्पूर्ण हुआ, भाई शोभाराम ने प्रसाद बाँटना शुरू किया,,भाई शोभाराम जी, मुझे प्रसाद जरा जल्दी दे दीजिये, मेरी बैलगाडी़ चलते चलते कहीं दूर ना निकल जाएं। सिख ने विनती की..मेरे सिख के मैले कपड़ो से अपने सफेद कपड़े बचाते हुए, तेरे पिता भाई शोभाराम ने कहा अच्छा, अच्छा, थोड़ा परे हो कर बैठ, बारी आने पर देता हूँ। बैलगाड़ी की चिंता, सिख को अधीर कर रही थी। सिख ने दो तीन बार फिर बिनती की तो तेरे पिता भाई शोभाराम ने प्रसाद तो क्या देना था मुख से दुर्वचन कह दिए। कहा- अपनी जगह पर बैठ, समझ नही आती क्या। क्यों रीछ के जैसे उछल उछल कर आगे आ रहा है। तेरे पिता के ये कहे अपशब्द मेरे सिख के साथ साथ, मेरा भी हृदय वेधन कर गए। सिख की नजर जमीन पर गिरे प्रसाद के एक कण पर पड़ी, उसी कण को गुरुकृपा मान कर अपने मुख में डाल कर सिख तो अपने गन्तव्य को चला गया लेकिन व्यथित हृदय से ये कह गया कि सेवादार होने का मतलब जो सब जीवों को गुरु नानक जान कर सेवा करे। गुरू नानक जान कर आदर दे, जो सेवा करते समय सोचे कि वह वचन गुरु नानक जी को कह रहा है। प्रभु से किसी की भावना कहाँ छिपी है। हर कोई अपने कर्म का बीजा खायेगा,, रीछ मैं हूँ या आप,, गुरु पातशाह जाने
सिख तो चला गया,,लेकिन तेरे पिता की सर्व चर्चित सेवा को गुरु नानक साहब ने स्वीकार नही किया, उसी कर्म की परिणिति तेरा पिता भाई सोभाराम आज रीछ बन कर संसार में लोगो का मनोरंजन करता फिरता है। इस का उछलना,, कूदना,, लिपटना, आंसू, सब के लिए मनोरंजन है।
गुरु पिता, मेंरे पिता को इस शरीर से मुक्त कर के अपने चरणों में निवास दीजिये। हम बारिक मुग्ध इयान,, पिता समझावेंगे मोहे दूजी नाही ठौर, जिस पे हम जावेंगे। हे करुणा निधान, कृपा करें, मेरे पिता की आत्मा को इस रीछ के शरीर से मुक्त करें,, गुरु जी ने अपने हाथों से रीछ बने भाई सोभाराम को प्रसाद दिया, भाई शोभाराम ने रीछ का शरीर त्याग, गुरु चरणों में स्थान पाया। गुरु जी से क्षमा मांग, चवर को उठाकर भाई किरतिया फिर से चवर की सेवा करने लगे।

इससे हमें यह शिक्षा मिलती है, कि हमें अपनी बोलवानी सभी के प्रति ठीक रखनी चाहिए। चाहे वो कोई भी हो! बूढ़ा हो, जवान हो, या फिर बच्चा हो। अगर हम अपनी बोल बानी और अपना व्यवहार दूसरों के प्रति अच्छा रखते हैं। तो उस परमात्मा को उतनी ही खुशी मिलेगी। अगर हम किसी से दुर्व्यवहार करते हैं, तो वह गुरु का निरादर होगा। इसलिए सभी से अच्छे बोल बोलिए, अच्छी वाणी बोलिए, अच्छा व्यवहार कीजिए। तभी परमात्मा हमारे ऊपर खुश होंगे। अगर हम किसी का निरादर करते हैं, तो वह भगवान का निरादर होगा। तो गुरु कतई नहीं चाहेगे कि, कोई भी उन के किसी भी शिष्य का निरादर करें।

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

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हरिराम एक मेडिकल का मालिक था। सारी दवाइयों की उसे अच्छी जानकारी थी,

दस साल का अनुभव होने के कारण उसे अच्छी तरह पता था कि कौन सी दवाई 💊कहाँ रखी है।

वह इस व्यवसाय को बड़ी सावधानी और बहुत ही निष्ठा से करता था।

दिन भर उसकी दुकान में भीड़ लगी रहती थी, वह ग्राहकों को वांछित दवाइयों💊 को सावधानी और समझदारी से देता था।

परन्तु उसे भगवान पर कोई भरोसा नहीं था । वह एक नास्तिक था,उसका मानना था की प्राणी मात्र की सेवा करना ही सबसे बड़ी पूजा है। और वह जरूरतमंद लोगों को दवा निशुल्क भी दे दिया करता था।

और समय मिलने पर वह मनोरंजन हेतु अपने दोस्तों के संग दुकान में लूडो खेलता था।

एक दिन अचानक बारिश होने लगी,बारिश की वजह से दुकान में भी कोई नहीं था। बस फिर क्या, दोस्तों को बुला लिया और सब दोस्त मिलकर लूडो खेलने लगे।

तभी एक छोटा लड़का उसके दूकान में दवाई लेने पर्चा लेकर आया। उसका पूरा शरीर भींगा था।
हरिराम लूडो खेलने में इतना मशगूल था कि बारिश में आए हुए उस लड़के पर उसकी नजर नहीं पड़ी।

ठंड़ से ठिठुरते हुए उस बच्चे ने दवाई का पर्चा बढ़ाते हुए कहा- “साहब जी मुझे ये दवाइयाँ चाहिए, मेरी माँ बहुत बीमार है, उनको बचा लीजिए।

बाहर और सब दुकानें बारिश की वजह से बंद है। आपके दुकान को देखकर मुझे विश्वास हो गया कि अब मेरी मां बच जाएगी।

उस लड़के की पुकार सुनकर लूडो खेलते-खेलते ही हरिराम ने दवाई के उस पर्चे को हाथ में लिया और दवाई देने को उठा, लूडो के खेल में व्यवधान के कारण अनमने से दवाई देने के लिए उठा ही था की बिजली चली गयी। अपने अनुभव से अंधेरे में ही दवाई की शीशी को झट से निकाल कर उसने लड़के को दे दिया।

दवा के पैसे दे कर लड़का👨 खुशी-खुशी दवाई की शीशी लेकर चला गया।

अंधेरा होने के कारण खेल बन्द हो गया और दोस्त भी चले गऐ।

अब वह दूकान को जल्दी बंद करने की सोच रहा था। तभी लाइट आ गई और वह यह देखकर दंग रह गया कि उसने दवाई समझकर उस लड़के को दिया था, वह चूहे मारने वाली जहरीली दवा की शीशी थी। जिसे उसके किसी ग्राहक ने थोड़ी ही देर पहले लौटाया था और लूडो खेलने की धुन में उसने अन्य दवाइयों के बीच यह सोच कर रख दिया था कि खेल समाप्त करने के बाद फिर उसे अपनी जगह वापस रख देगा !!

उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसकी दस साल की विश्वसनीयता पर मानो जैसे ग्रहण लग गया। उस लड़के बारे में वह सोच कर तड़पने लगा।

यदि यह दवाई उसने अपनी बीमार माँ को पिला दी, तो वह अवश्य मर जाएगी।

एक पल वह अपने लूडो खेलने के शौक को कोसने लगा और दूकान में खेलने के अपने शौक को छोड़ने का निश्चय कर लिया पर यह बात तो बाद के बाद देखी जाएगी। अब उस गलत दी दवा का क्या किया जाए ?

उस लड़के का पता ठिकाना भी तो वह नहीं जानता। कैसे उस बीमार माँ को बचाया जाए?

सच कितना विश्वास था उसलड़के की आंखों में।

हरिराम को कुछ सूझ नहीं रहा था। घर जाने की उसकी इच्छा अब ठंडी पड़ गई। दुविधा और बेचैनी उसे घेरे हुए था। घबराहट में वह इधर-उधर देखने लगा।

पहली बार श्रद्धा से उसकी दृष्टि दीवार के उस कोने में पड़ी, जहाँ उसके पिता ने जिद्द करके श्री बांके बिहारी का छोटा सा चित्र दुकान के उदघाटन के वक्त लगा दिया था ,
पिता से हुई बहस में एक दिन उन्होंने हरिराम से श्री बांके बिहारी को कम से कम एक शक्ति के रूप मानने और पूजने की मिन्नत की थी।

उन्होंने कहा था कि भगवान की भक्ति में बड़ी शक्ति होती है, वह हर जगह व्याप्त है और श्री बांके बिहारी जी में हर बिगडे काम को ठीक करने की शक्ति है ।
हरिराम को यह सारी बात याद आने लगी। उसने कई बार अपने पिता को भगवान की तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर, आंखें बंद करके कुछ बोलते हुऐ देखा था।

उसने भी आज पहली बार दूकान के कोने में रखी उस धूल भरी श्री बांके बिहारी श्री कृष्ण की तस्वीर को देखा और आंखें बंद कर दोनों हाथों को जोड़कर वहीं खड़ा हो गया।

थोड़ी देर बाद वह छोटा लड़का फिर दुकान में आया। हरिराम बहुत अधीर हो उठा। क्या बच्चे ने माँ को दवा समझ के जहर पिला दिया ?

इसकी माँ मर तो नही गयी !!
हरिराम का रोम रोम कांप उठा ।पसीना पोंछते हुए उसने शान्त हो कर धीरे से कहा- क्या बात है बेटा अब तुम्हें क्या चाहिए?

लड़के की आंखों से पानी छलकने लगा। उसने रुकते-रुकते कहा- बाबूजी… बाबूजी माँ को बचाने के लिए मैं दवाई की शीशी लिए भागे जा रहा था, घर के निकट पहुँच भी गया था, बारिश की वजह से ऑंगन में पानी भरा था और मैं फिसल गया।

दवाई की शीशी गिर कर टूट गई। क्या आप मुझे दवाई की दूसरी शीशी दे सकते हैं बाबूजी?

हरिराम हक्का बक्का रह गया। क्या ये सचमुच श्री बांके बिहारी जी का चमत्कार है !

हाँ! हाँ ! क्यों नहीं? हरिराम ने चैन की साँस लेते हुए कहा। लो, यह दवाई!

पर मेरे पास पैसे नहीं है।”उस लड़के ने हिचकिचाते हुए बड़े भोलेपन से कहा।

कोई बात नहीं- तुम यह दवाई ले जाओ और अपनी माँ को बचाओ। जाओ जल्दी करो, और हाँ अब की बार ज़रा संभल के जाना।

लड़का, अच्छा बाबूजी कहता हुआ खुशी से चल पड़ा।

हरिराम की आंखों से अविरल आंसुओं की धार बह निकली। श्री बांके बिहारी को धन्यवाद देता हुआ अपने हाथों से उस धूल भरे तस्वीर को लेकर अपनी छाती से पोंछने लगा और अपने माथे से लगा लिया

जल्दी से दुकान बंद करके वह घर को रवाना हुआ। उसकी नास्तिकता की घोर अंधेरी रात भी अब बीत गई थी और अगले दिन की नई सुबह एक नए हरिराम की प्रतीक्षा कर रही

🙏🙏 हरे कृष्णा हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा हरे हरे। हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे।।🙏🙏

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🙏🏻🙏🏻 भगवान पर विश्वास रखिए। और सुखी रहिए।।🙏

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. 🌹 सच्चे दोस्त 🌹
🟣एक वेटर🟣
अचानक उन चारों को होटल में बैठा देखकर…. मोहन हड़बड़ा सा गया…. अरे ये ….ये तो मेरे स्कूल के दोस्त है
राजू किशन …..और जगदीश…. और वो ….वो ….आकाश है …..ये सब यहां…….
मिलूं कया ……इन सब से….
नहीं मोहन…पागल है कया …..देख इनसबको …..
वो सभी सूटबूट मे है ….लगता है कामयाब आदमी बन गए है …..और तू ….तू …यहां एक छोटे से होटल में एक मामूली सा वेटर ….पहचानेगे भी वो ….और अगर पहचान भी लिया तो …..तो चारों तुझपर हंसेंगे ….
नहीं मोहन …..नहीं…..
पर अब यहां ये हमारे होटल के कस्टमर है और मे यहां का वेटर ….तो आर्डर तो मुझे ही ….और खाना भी मुझे ही परोसना होगा …..
खैर ….मेरा काम है और पापा कहते थे कोई भी मेहनत वाला काम छोटा या शर्मिंदगी वाला नहीं होता ….
आज लगभग 15 सालों बाद मोहन के स्कूल के चारों दोस्त उसके सामने थे…..
मोहन ने चारों से आर्डर लिया और अपने काम को बखूबी अंजाम देते हुए खाना परोसने लगा …..
चारों ने उसकी और देखा तक नहीं लगभग सभी अपने अपने मोबाइल फोन पर व्यस्त थे ……
पिता के आकस्मिक निधन के चलते मोहन अपनी दसवीं की पढ़ाई भी पूरी नही कर पाया था….. मगर मोहन को लगा था उसके जिगरी दोस्त उसे पहचान जाऐंगे लेकिन उन्होंने उसे पहचानने का प्रयास भी नही किया….
वे चारों खाना खा कर बिल चुका कर चले गये…..
मोहन को लगा उन चारों ने शायद उसे पहचाना नहीं या उसकी गरीबी देखकर जानबूझ कर कोशिश नहीं की….
उसने एक गहरी लंबी सांस ली और टेबल साफ करने लगा…..
वो टिश्यु पेपर उठाकर कचरे मे डलने ही वाला था….की उसपर कुछ लिखा हुआ सा दिखा….
ओह…..शायद उन्होने उस पे कुछ जोड़-घटाया …
अचानक उसकी नजर उस पर लिखे हुए शब्दों पर पड़ी….
जिसपर लिखा था – अबे साले तू हमे खाना खिला रहा था तो तुझे क्या लगा तुझे हम पहचानें नही….
अबे 15 साल क्या अगले जनम बाद भी मिलता तो तुझे पहचान लेते….
तुझे टिप देने की हिम्मत हममे नही थी…
देख हमने पास ही फैक्ट्री के लिये जगह खरीदी है….
औरअब हमारा इधर आन-जाना तो लगा ही रहेगा….
आज तेरा इस होटल का आखरी दिन है….
हमारे फैक्ट्री की कैंटीन कौन चलाएगा बे….
तू चलायेगा ना…..
अबे तुझसे अच्छा पार्टनर और कहां मिलेगा….
याद हैं ना स्कूल के दिनों हम पांचो एक दुसरे का टिफिन खा जाते थे…आज के बाद रोटी भी मिल बाँट कर साथ-साथ खाएंगे…..
मोहन की आंखें भर आई….
उसने डबडबाई आँखों से आसमान की तरफ देखा और उस पेपर को होंठो से लगाकर करीने से दिल के पास वाली जेब मे रख लिया…..
मेरे दोस्तो…..सच्चे दोस्त वही तो होते है…
जो दोस्त की कमजोरी नही सिर्फ दोस्त देख कर ही खुश हो जाते है..
अच्छे दोस्त किस्मत से मिलते है
हमेशा अपने अच्छे दोस्त की कद्र करे…
“दोस्तों दोस्त वादे नहीं करते, फिर भी हर मोड़ पे अपनी यारी निभाते है…..”.
मोहन सोच रहा था जब कोई हाथ और साथ दोनों छोड़ देता है तो ऊपरवाला किसी ना किसी को सहारे के लिए जरूर भेज देता है
यही है सच्ची दोस्ती

अपने दोस्तों और रिश्तेदार तक जरूर शेयर करना!

🌹🙏🏻जय श्री जिनेन्द्र🙏🏻🌹
🌹पवन जैन🌹

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जब भगवान ने मछली का निर्माण करना चाहा, तो उसके जीवन के लिये उनको समुद्र से वार्ता करनी पड़ी।

जब भगवान ने पेड़ों का निर्माण करना चाहा, तो उन्होंने पृथ्वी से बात की।

लेकिन जब भगवान ने मनुष्य को बनाना चाहा, तो उन्होंने खुद से ही विचार विमर्श किया।

तब भगवान ने कहा: “मुझे अपने आकार और समानता वाला मनुष्य का निर्माण करना है और उन्होंने अपने समान मनुष्य को बनया।”

अब यह बात ध्यान देने योग्य है:

यदि आप एक मछली को पानी से बाहर निकालते हैं तो वह मर जाएगी; और जब आप जमीन से एक पेड़ उखाड़ते हैं, तो वह भी मर जाएगा।

इसी तरह, जब मनुष्य भगवान से अलग हो जाता है, तो वह भी ‘मर’ जाता है।

भगवान हमारा एकमात्र सहारा है। हम उनकी सेवा और शरणागति के लिए बनाए गए हैं। हमें हमेशा उनके साथ जुड़े रहना चाहिए क्योंकि केवल उनकी कृपा के कारण ही हम ‘जीवित’ रह सकते हैं।

अतः भगवान से जुड़े रहें।

हम देख सकते हैं कि मछली के बिना पानी फिर भी पानी है लेकिन पानी के बिना मछली कुछ भी नहीं है।

पेड़ के बिना पृथ्वी फिर भी पृथ्वी ही है, लेकिन पृथ्वी के बगैर पेड़ कुछ भी नहीं …

इसी तरह, मनुष्य के बिना भगवान, भगवान ही है लेकिन बिना भगवान के मनुष्य कुछ भी नहीं !

इस युग में भगवान से जुड़ने का एक सरल उपाय ‘नाम सिमरन ‘ है

जपते रहो परमात्मा का नाम,
किसी भी नाम से
किसी भी रूप से ।
एक ही है,एक ही है

आप सभी धर्म प्रेमियों को सादर सप्रेम, जय सद्गुरुदेव