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📔🏆आज का प्रेरक प्रसंग🏆📔

गुरु- शिष्य और तितली

एक समय एक गुरु और शिष्य बगीचे में बैठे हुए अपने ध्यान चिंतन में मग्न थे, ध्यान चिंतन करते-करते शिष्य देखता है, की एक पौधे के नीचे पत्तों व घांस में एक अण्डा पड़ा हुआ है। और उस उस अंडे के अंदर जो भी जीव, प्राणी है वह अंडे को तोड़ कर बाहर निकलने का प्रयास कर रहा है।

और यह प्रयास लगातार चलता रहा, सुबह से दोपहर हो गया फीर दोपहर से शाम हो गया, लेकिन वह प्राणी अंडे से बाहार नहीं निकल पाया था। हालांकि उसके लगातार प्रयास से अण्डा जगह-जगह से टूट गया था और इल्ली (तितली) का थोड़ा सा मुँह बाहर निकल गया।

इसी तरह यह कोशिश लगातार दिन रात चलती रही और कई दिन बीत गए, परन्तु इल्ली अभी भी अंडे से बाहर नहीं निकल पायी थी।

शिष्य उसे ध्यान से देखता रहता था, शिष्य को इल्ली पर बड़ी दया आ रही थी, की वह प्राणी दिन-रात मेहनत कर रहा है और अण्डा से बाहर आना चाह रहा है परन्तु अण्डा तो थोड़ा-थोड़ा करके ही टूट रहा है।

शिष्य को लगा की इस इल्ली के लिए कुछ करना चाहिए। परन्तु गुरजी शिष्य को बोलते की तुम इधर-उधर अपना ध्यान मत भटकाओ और केवल ध्यान में अपना मन लगाओ।

अंत में शिष्य से रहा नहीं गया और उसने अण्डे के खोल को तोड़कर इल्ली बाहर निकाल ली, शिष्य इल्ली को अपने हाँथ में लेकर उसे देखने, निहारने लगा।

वह बहुत ही प्रसन्न हुआ की मैने इस इल्ली पर दया दिखाते हुए इसकी जान बचा ली, परन्तु वह इल्ली मुश्किल से 2, 3 घंटे तक जीवित रही फिर मर गयी। शिष्य को बहुत दुःख हुआ वह समझ नहीं पाया की आखिर ऐसा क्यों हुआ।

उसने गुरूजी से पूछा की गुरूजी ऐसा क्यों हो गया।

गुरूजी बोले – तुमने इस अण्डे को जीवन देने के बजाय इसकी जीवन ले ली।

तुमने उस इल्ली की पीड़ा देखी जबकि वास्तव में वह पीड़ा थी ही नहीं, इल्ली बार-बार अपने पंख से अण्डे पर प्रहार किये जा रही थी। जिससे उसके पंखो पर मजबूती आ रही थी और कुछ दिन बाद उसके पैर मजबूत हो भी जाते, वह खुद से उस अण्डे को तोड़ पाती, फीर वह स्वतंत्र होकर घूमती फिरती फूलों का आनंद लेती।

दोस्तों इस छोटी सी कहानी का सार यह है की हम अपने बच्चों को या किसी अपने को या फिर खुद को तकलीफ देना ही नहीं चाहते हम चाहते है की उन्हें बिना तकलीफ किये ही सारा सुख मिले।

प्रयाश करना, हार जाना, फिर प्रयास करना, और प्रयाश करते रहना। हम ये नहीं चाहते, हम यह चाहते है की हमे बिना प्रयास किये सफलता मिले, हमे जीवन में कोई कष्ट उठाना ना पड़े।

दुःख तकलीफ होने पर रोते तो सभी हैं, पर बहुत कम ही ऐसे लोग होते हैं जो संघर्ष करते हैं।

अधिकतर लोग अपने जीवन से समझौता किये हुए होते है और डर-डर कर अपना जीवन गुजार देते हैं। याद रखिये परिस्थितियों को बदलने का नाम ही संघर्ष है।

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🌹भक्ति और संत निष्ठां…..🌹

प्रभु को पाना है तो प्रेम की गली में से गुजरना है।और प्रेम की गली इतनी पतली है कि दो उसमें चल ही नहीं सकते हमें एक होना ही है।

यह प्रसंग एक राजा की जिन्दगी का है, उसका नाम था राजा पीपा। उसने दुनिया में जो कुछ इन्सान पाना चाहता है, वो सब कुछ पाया था, महल, हीरे-जवाहरात, नौकर-चाकर, सब उसका आदेश मानते थे।

इतना सब कुछ पाने के बावजूद अचानक एक दिन उसे लगा कि कुछ कमी है, कुछ ऐसा है जो नहीं है।

अंदर एक तलब-सी जग गई प्रभु को पाने की। अब राजा कभी एक महापुरुष के पास जाएं, कभी दूसरे के पास, पर प्रभु को पाने का रास्ता मिले ही नहीं।

राजा बड़ा निराश था तब किसी ने बताया कि एक संत हैं रविदास जी महाराज! आप उनके पास जाएं।
राजा पीपा संत रविदास जी के पास पहुँचे।

वहाँ देखा कि वो एक बहुत छोटी-सी झोपड़ी में रहते थे-भयानक गरीबी, उस झोपड़ी में तो कुछ था ही नहीं।
राजा को लगा, ये तो खुद ही झोपड़ी में जी रहे हैं,

यहाँ से मुझे क्या मिलेगा।
लेकिन वहाँ पहुँच ही गए थे तो अन्दर भी गए और राजा ने संत रविदास जी को प्रणाम किया।

संत रविदास जी ने पूछा, किस लिए आए हो ?
राजा ने इच्छा बता दी, प्रभु को पाना चाहता हूँ।

उस समय संत रविदास महाराज एक कटोरे में चमड़ा भिगो रहे थे-मुलायम करने के लिए, तो उन्होंने कहा, ठीक है,

अभी बाहर से आए हो थके होगे, प्यास लगी होगी लो तब तक यह जल पियो।

कह कर वही चमड़े वाला कटोरा राजा की ओर बढ़ा दिया।

राजा ने सोचा, ये क्या कर दिया कटोरे में पानी है, उसमें चमड़ा डला हुआ है, वो गन्दगी से भरा हुआ है, उसको कैसे पी लूँ ?

फिर लगा कि अब यहाँ आ गया हूँ, सामने बैठा हूँ तो करूँ क्या ?

इन संत जी का आग्रह कैसे ठुकराऊँ ?

उस समय बिजली होती नहीं थी, झोपड़ी में अन्धेरा था, सो राजा ने मुँह से लगाकर सारा पानी अपने कपडो के अन्दर उडेल दिया और पीये बगैर वहाँ से चला आया।

वापस घर आ कर उसने कपडे उतारे धोबी को बुलाया और कहा कि इसको धो दो।

धोबी ने राजा का वो कपडा अपनी लड़की को दे दिया धोने के लिए।
लड़की उसे ज्यों-ज्यों धोने लगी,

उस पर प्रभु का रंग चढ़ना शुरू हो गया।
उसमें मस्ती आनी शुरू हो गई और इतनी मस्ती आनी शुरू हो गई कि आस-पास के दूसरे लोग भी उसके साथ आ कर प्रभु के भजन मे गाने-नाचने लगे।

धोबी की लड़की बड़ी मशहूर भक्तिन हो गई।
अब धीरे-धीरे खबर राजा के पास भी पहुँची। राजा उससे भी मिलने पहुँचा, बोला कि कुछ मेरी भी मदद कर दो।

धोबी की लड़की ने बताया कि जो कपडा आपने भेजा था, मैं तो उसी को साफ कर रही थी, तभी से लौ लग गई है, मेरी रूह अन्दर की ओर उड़ान कर रही है।

राजा को सारी बात याद आ गई और राजा भागा- भागा फिर संत रविदास जी महाराज के पास गया और उनके पैरों में पड़ गया।
फिर रविदास महाराज ने उसको नाम की देन दी।

जब तक इन्सान अकिंचन न बन जाए, छोटे से भी छोटा, तुच्छ से भी तुच्छ न हो जाये, तब तक नम्रता नहीं आती।
और जब तक विनम्र न हो जायें, प्रभु नहीं मिल सकते।

राधे राधे❤️🙏

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♦️♦️♦️ रात्रि कहांनी ♦️♦️♦️

👉 असली शांति🏵️
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एक राजा था जिसे चित्रकला से बहुत प्रेम था। एक बार उसने घोषणा की कि जो कोई भी चित्रकार उसे एक ऐसा चित्र बना कर देगा जो शांति को दर्शाता हो तो वह उसे मुँह माँगा पुरस्कार देगा।

निर्णय वाले दिन एक से बढ़ कर एक चित्रकार पुरस्कार जीतने की लालसा से अपने-अपने चित्र लेकर राजा के महल पहुँचे। राजा ने एक-एक करके सभी चित्रों को देखा और उनमें से दो चित्रों को अलग रखवा दिया। अब इन्ही दोनों में से एक को पुरस्कार  के लिए चुना जाना था।

पहला चित्र एक अति सुंदर शांत झील का था। उस झील का पानी इतना स्वच्छ  था कि उसके अंदर की सतह तक दिखाई दे रही थी। और उसके आस-पास विद्यमान हिमखंडों की छवि उस पर ऐसे उभर रही थी मानो कोई दर्पण रखा हो।

ऊपर की ओर नीला आसमान था जिसमें रुई के गोलों के सामान सफ़ेद बादल तैर रहे थे। जो कोई भी इस चित्र को देखता उसको यही लगता कि शांति को दर्शाने के लिए इससे अच्छा कोई चित्र हो ही नहीं सकता। वास्तव में यही शांति का एक मात्र प्रतीक है।

दूसरे चित्र में भी पहाड़ थे, परंतु वे बिलकुल सूखे, बेजान, वीरान थे और इन पहाड़ों के ऊपर घने गरजते बादल थे जिनमें बिजलियाँ चमक रहीं थीं -घनघोर वर्षा होने से नदी उफान पर थी…

तेज हवाओं से पेड़ हिल रहे थे… और पहाड़ी के एक ओर स्थित झरने ने रौद्र रूप धारण कर रखा था। जो कोई भी इस चित्र को देखता यही सोचता कि भला इसका ‘शांति’ से क्या लेना देना… इसमें तो बस अशांति ही अशांति है।

सभी आश्वस्त थे कि पहले चित्र बनाने वाले चित्रकार को ही पुरस्कार मिलेगा। तभी राजा अपने सिंहासन से उठे और घोषणा की कि दूसरा चित्र बनाने वाले चित्रकार को वह मुँह माँगा पुरस्कार देंगे। हर कोई आश्चर्य में था!

पहले चित्रकार से रहा नहीं गया, वह बोला, “लेकिन महाराज उस चित्र में ऐसा क्या है जो आपने उसे पुरस्कार देने का फैसला लिया जबकि हर कोई यही कह रहा है कि मेरा चित्र ही शांति को दर्शाने के लिए सर्वश्रेष्ठ है?

आओ मेरे साथ!”, राजा ने पहले चित्रकार को अपने साथ चलने के लिए कहा।दूसरे चित्र के समक्ष पहुँच कर राजा बोले, “झरने के बायीं ओर हवा से एक ओर झुके इस वृक्ष को देखो। उसकी डाली पर बने उस घोंसले को देखो… देखो कैसे एक चिड़िया इतनी कोमलता से, इतने शांत भाव व प्रेमपूर्वक अपने बच्चों को भोजन करा रही है…

फिर राजा ने वहाँ उपस्थित सभी लोगों को समझाया, “शांत होने का अर्थ यह नहीं है कि आप ऐसी स्थिति में हों जहाँ कोई शोर नहीं हो…

कोई समस्या नहीं हो…
जहाँ कड़ी मेहनत नहीं हो…
जहाँ आपकी परीक्षा नहीं हो… शांत होने का सही अर्थ है कि आप हर तरह की अव्यवस्था, अशांति, अराजकता के बीच हों और फिर भी आप शांत रहें, अपने काम पर केंद्रित रहें… अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहें।

अब सभी समझ चुके थे कि दूसरे चित्र को राजा ने क्यों चुना है।

मित्रों, हर कोई अपने जीवन में शांति चाहता है। परंतु प्राय: हम ‘शांति’ को कोई बाहरी वस्तु समझ लेते हैं, और उसे दूरस्थ स्थलों में ढूँढते हैं, जबकि शांति पूरी तरह से हमारे मन की भीतरी चेतना है, और सत्य यही है कि सभी दुःख-दर्दों, कष्टों और कठिनाइयों के बीच भी शांत रहना ही वास्तव में शांति है। ओम शांति


नित याद करो मन से शिव परमात्मा को☝🏻
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टालस्टाय ने एक छोटी सी कहानी लिखी है। टालस्टाय ने लिखा है कि एक झील के किनारे तीन फकीर थे। तीनों बेपढ़े लिखे थे। लेकिन उनकी बड़ी ख्याति हो गई, और दूर दूर से लोग उनके दर्शन करने को आने लगे। तो रूस का जो सबसे बड़ा पुरोहित था, उसके कानों में भी खबर पहुंची कि तीन पवित्र पुरुष झील के उस पार हैं। पर उसने कहा कि मुझे उनका पता ही नहीं! और उन्होंने कभी चर्च में दीक्षा भी नहीं ली, वे पवित्र हो कैसे सकते हैं! और हजारों लोग वहां जा रहे हैं और दर्शन करके कृतार्थ हो रहे हैं! तो वह भी देखने गया कि मामला क्या है?

नाव पर सवार हुआ, झील के उस पर पहुंचा। वे तीनों तो बिलकुल बेपढ़े लिखे गंवार थे। वे अपने झाडू के नीचे बैठे थे। जब महापुरोहित उनके सामने गया तो उन तीनों ने झुककर उसको प्रणाम किया। महापुरोहित तभी आश्वस्त हो गया कि कोई डर की बात नहीं है। जब तीनों चरण छू रहे हैं, इनसे कोई ईसाई-धर्म को खतरा नहीं है। उस महापुरोहित ने कहा कि तुम क्या करते हो? क्या है तुम्हारी साधना? तुम्हारी पद्धति क्या है? उन्होंने कहा, पद्धति? वे एक दूसरे की तरफ देखने लगे।

पुरोहित ने कहा, बोलो, तुम करते क्या हो? तुमने साधा क्या है? उन्होंने कहा कि हम ज्यादा तो कुछ भी जानते नहीं। पढ़े-लिखे हम हैं नहीं। किसी ने हमें सिखाया नहीं। हमारी तो एक छोटी-सी प्रार्थना है, वही हम करते हैं। पर वे बड़े संकोच में भर गए कि इतने बड़े पुरोहित को कैसे…! उन्होंने कहा, फिर प्रार्थना भी हमारी खुद की ही गढ़ी हुई है, क्योंकि हमने किसी से सीखा नहीं और किसी ने हमें कभी बताया नहीं। क्या है तुम्हारी प्रार्थना? पुरोहित तो अकड़ता चला गया। उसने कहा कि बिलकुल ही गंवार हैं! क्या है तुम्हारी प्रार्थना? उन्होंने कहा कि अब आपसे हम कैसे कहें, बड़ी छोटी-सी है। हमने सुन रखा है कि परमात्मा तीन हैं, ट्रिनिटि, त्रिमूर्ति।

ईसाई मानते हैं, तीन हैं परमात्मा-परम पिता, उसका बेटा जीसस और दोनों के बीच में एक पवित्र आत्मा, होली घोस्ट–इन तीन के जोड़ से परमात्मा बना है, ट्रिनिटि। जैसा हम त्रिमूर्ति मानते हैं–शंकर विष्णु, ब्रह्मा।

तो उन्होंने कहा कि हमने एक प्रार्थना बना ली सोच-सोचकर तीनों ने। हमारी प्रार्थना यह है कि यू आर थ्री, वी आर ऑल्सो थ्री, हैव मर्सी ऑन अस। तुम भी तीन हो, हम भी तीन हैं, हम पर कृपा करो।

उस पुरोहित ने कहा कि बंद करो यह। यह कोई प्रार्थना है! प्रार्थना तो ऑथराइड होती है। चर्च के द्वारा उसके लिए स्वीकृति और प्रमाण होना चाहिए। तो मैं तुम्हें प्रार्थना बताता हूं। इसको याद करो और आज से यह प्रार्थना शुरू करो। उन्होंने कहा, आपकी कृपा, बता दें। महापुरोहित ने, लंबी प्रार्थना थी चर्च की, वह बताई।

उन लोगों ने कहा कि क्षमा करें, हम बिलकुल गंवार हैं, इतनी लंबी याद न रहेगी। आप थोड़ा संक्षिप्त क़र दें, कुछ थोड़ा सरल! पुरोहित ने कहा कि न तो यह सरल हो सकती है और न संक्षिप्त। यह प्रमाणित प्रार्थना है। और जो इसको नहीं करेगा, उसके लिए स्वर्ग के द्वार बंद हैं। तो उन्होंने कहा कि एक दफा आप फिर से दोहरा दें, ताकि हम याद कर लें। दुबारा कही। फिर भी उन्होंने कहा, एक बार और सिर्फ दोहरा दें। और तीनों ने दोहराने की भी कोशिश की और उन्होंने धन्यवाद दिया पुरोहित को, फिर चरण छुए। पुरोहित प्रसन्न नाव पर वापस लौटा।

आधी झील में आया था कि देखा कि पीछे से एक बवंडर चला आ रहा है पानी पर। वह तो घबड़ाया कि यह क्या चला आ रहा है? थोड़ी देर में साफ हुआ कि वे तीनों पानी पर दौड़ते चले आ रहे हैं! पुरोहित के तो प्राण निकल गए। वे पानी पर चल रहे हैं! और तीनों आकर पास, पकड़कर बोले कि एक बार और दोहरा दें। वह हम भूल गए। हम गरीब बेपढ़े-लिखे लोग। उस पुरोहित ने कहा कि क्षमा करो। तुम्हारी प्रार्थना काम कर रही है। तुम अपनी वही जारी रखो कि वी आर श्री, यू आर थ्री, हैव मर्सी ऑन अस।

प्रेम एक हार्दिक घटना है। न तो उसकी कोई प्रामाणिक व्यवस्था है; न कोई विधि है, न कोई तंत्र है न कोई मंत्र है। प्रेम एक हार्दिक भाव है। प्रार्थना एक हार्दिक भाव है। उसे सिखाने का कोई भी उपाय नहीं है। और पृथ्वी पर चूंकि सभी धर्म सिखाने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए लोग अधार्मिक हो गए हैं। सिखाने से कभी भी कोई आदमी धार्मिक नहीं हो सकता। ओशो, कठोउपनिषद

संकलन-रामजी🙏🌹🌹

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🌹🙏संगत का प्रभाव🙏🌹
एक राजा का तोता मर गया। उन्होंने कहा– मंत्रीप्रवर! हमारा पिंजरा सूना हो गया। इसमें पालने के लिए एक तोता लाओ।
तोते सदैव तो मिलते नहीं। राजा पीछे पड़ गये तो मंत्री एक संत के पास गये और कहा– भगवन्!
राजा साहब एक तोता लाने की जिद कर रहे हैं। आप अपना तोता दे दें तो बड़ी कृपा होगी। संत ने कहा- ठीक है, ले जाओ।
*राजा ने सोने के पिंजरे में बड़े स्नेह से तोते की सुख-सुविधा का प्रबन्ध किया।
तोता ब्रह्ममुहूर्त में बोलने लगा– जय श्री राम ,,, ओम् तत्सत्….
ओम् तत्सत् … उठो राजा! उठो महारानी!
दुर्लभ मानव-तन मिला है। यह सोने के लिए नहीं, भजन करने के लिए मिला है।
‘चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर। तुलसीदास चंदन घिसै तिलक देत रघुबीर।।’
कभी रामायण की चौपाई तो कभी गीता के श्लोक उसके मुँह से निकलते। पूरा राजपरिवार बड़े सवेरे उठकर उसकी बातें सुना करता था। राजा कहते थे कि तोता क्या मिला, एक संत मिल गये।
हर जीव की एक निश्चित आयु होती है। एक दिन वह तोता मर गया। राजा, रानी, राजपरिवार और पूरे राष्ट्र ने हफ़्तों शोक मनाया। झण्डा झुका दिया गया।
किसी प्रकार राजपरिवार ने शोक संवरण किया और राजकाज में लग गये। पुनः राजा साहब ने कहा– मंत्रीवर ! खाली पिंजरा सूना-सूना लगता है, एक तोते की व्यवस्था करें!
मंत्री ने इधर-उधर देखा, एक कसाई के यहाँ वैसा ही तोता एक पिंजरे में टँगा था। मंत्री ने कहा कि राजा साहब चाहते की ये तोता उन्हें मिले।
कसाई ने कहा कि हम आपके राज्य में ही तो रहते हैं। हम नहीं भी देंगे तब भी आप उठा ही ले जायेंगे।
मंत्री ने कहा– नहीं नहीं, हमारी विनती है।
कसाई ने बताया कि किसी बहेलिये ने एक वृक्ष से दो तोते पकड़े थे। एक को उसने महात्माजी को दे दिया था और दूसरा मैंने खरीद लिया था। राजा को चाहिये तो आप ले जाएं।
अब कसाईवाला तोता राजा के पिंजरे में पहुँच गया।
राजपरिवार बहुत प्रसन्न हुआ। सबको लगा कि वही तोता जीवित होकर चला आया है।
दोनों की नासिका, पंख, आकार, चितवन सब एक जैसे थे। लेकिन बड़े सवेरे तोता उसी प्रकार राजा को बुलाने लगा जैसे वह कसाई अपने नौकरों को उठाता था कि..
उठ ! हरामी के बच्चे! राजा बन बैठा है। मेरे लिए ला अण्डे, नहीं तो पड़ेंगे डण्डे!
ये ही बात बार बार दोहराने लगा राजा को इतना क्रोध आया कि उसने तोते को पिंजरे से निकाला और गर्दन मरोड़कर किले से बाहर फेंक दिया।
दोनों तोते, सगे भाई थे। एक की गर्दन मरोड़ दी गयी, तो दूसरे के लिए झण्डे झुक गये, भण्डारा किया गया, शोक मनाया गया।
आखिर भूल कहाँ हो गयी ? अन्तर था तो संगति का ! सत्संग की कमी थी।
‘संगत ही गुण होत है, संगत ही गुण जाय।
बाँस फाँस अरु मीसरी, एकै भाव बिकाय।।’
पूरा सद्गुरु ना मिला, मिली न साँची सीख।
भेष जती का बनाय के, घर-घर माँगे भीख।
शिक्षा :- अपने बच्चों को उच्चशिक्षा के साथ साथ अच्छे संस्कार भी दीजिए ताकि वो जहां भी जाये सबका समान करे और अपने आचरण से खुद के साथ परिवार का नाम भी रोशन करे ।
🌹🙏Radhe radhe ji 🙏🌹

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आज सोने से पहले

आत्मा

गुरू शिष्य संवाद

प्रातः काल का समय था….. गुरुकुल में हर दिन की भांति गुरूजी अपने शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे…..

आज का विषय है:- आत्मा

आत्मा के बारे में बताते हुए गुरु जी ने गीता का यह श्लोक बोला

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः |
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ||

अर्थात -> आत्मा को न शस्त्र छेद सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल गला सकता है और न हवा सुखा सकती है। इस आत्मा का कभी भी विनाश नहीं हो सकता है, यह अविनाशी है।

( यह सुनकर एक शिष्य को जिज्ञासा हुई । )

शिष्य -> किन्तु गुरुवर यह कैसे संभव है? यदि आत्मा का अस्तित्व है, वो अविनाशी है, तो भला वो इस नाशवान शरीर में कैसे वास करती है और वो हमें दिखाई क्यों नहीं देती? क्या सचमुच आत्मा होती है?

गुरु जी -> पुत्र आज तुम रसोईघर से एक कटोरा दूध ले लेना और उसे सुरक्षित अपने कमरे में रख देना….. और कल इसी समय वह कटोरा लेकर यहाँ उपस्थित हो जाना

( अगले दिन शिष्य कटोरा लेकर उपस्थित हो गया । )

गुरु जी -> क्या दूध आज भी पीने योग्य है?

शिष्य ->नहीं गुरूजी, यह तो कल रात ही फट गया था लेकिन इसका मेरे प्रश्न से क्या लेना-देना?

गुरु जी ->आज भी तुम रसोई में जाना और एक कटोरा दही ले लेना, और कल इसी समय कटोरा लेकर यहाँ उपस्थित हो जाना।

( अगले दिन शिष्य सही समय पर उपस्थित हो गया। )

गुरु जी -> क्या दही आज भी उपभोग हेतु ठीक है ?

शिष्य -> जी हाँ गुरूजी ये अभी भी ठीक है।

गुरू जी ->अच्छा ठीक है कल तुम फिर इसे लेकर यहाँ आना।

( अगले दिन जब गुरु जी ने शिष्य से पुछा । )

शिष्य ->दही में खटास आ चुकी है और वह कुछ खराब लग रहा है।

गुरूजी ->कोई बात नहीं, आज तुम रसोई से एक कटोरा घी लेकर जाना और उसे तब लेकर आना जब वो खराब हो जाए।

( दिन बीतते गए पर घी खराब नहीं हुआ और शिष्य रोज खाली हाथ ही गुरु के समक्ष उपस्थित होता रहा।
फिर एक दिन शिष्य से रहा नहीं गया और उसने पूछ ही लिया । )

शिष्य ->गुरुवर मैंने बहुत दिनों पहले आपसे पश्न किया था कि -“ यदि आत्मा का अस्तित्व है, वो अविनाशी है, तो भला वो वो इस नाशवान शरीर में कैसे वास करती है और व हमें दिखाई क्यों नहीं देती? क्या सचमुच आत्मा होती है?”, पर उसका उत्तर देने की बजाये आपने मुझे दूध, दही, घी में उलझा दिया। क्या आपके पास इसका कोई उत्तर नहीं है?

गुरूजी ->वत्स मैं ये सब तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देने के लिए ही तो कर रहा था- देखो दूध, दही और घी सब दूध का ही हिस्सा हैं…लेकिन दूध एक दिन में खराब हो जाता है..दही दो-तीन दिनों में लेकिन शुद्ध घी कभी खराब नहीं होता।

इसी प्रकार आत्मा इस नाशवान शरीर में होते हुए भी ऐसी है कि उसे कभी नष्ट नहीं किया जा सकता।

शिष्य -> ”ठीक है गुरु जी, मान लिया कि आत्मा अविनाशी है लेकिन हमें घी तो दिखायी देता है पर आत्मा नहीं दिखती?”

गुरु जी -> ““ घी अपने आप ही तो नहीं दिखता न? पहले दूध में जामन डाल कर दही में बदलना पड़ता है, फिर दही को मथ कर उसे मक्खन में बदला जाता है, फिर कहीं जाकर जब मक्खन को सही तापमान पर घंटों पिघलाया जाता है तब जाकर घी बनता है!…..

हर इंसान आत्मा का दर्शन यानी आत्म-दर्शन कर सकता है, लेकिन उसके लिए पहले इस दूध रुपी शरीर को भजन रूपी जामन से पवित्र बनाना पड़ता है उसके बाद कर्म की मथनी से इस शरीर को दीन-दुखियों की सेवा में मथना होता है और फिर सालों तक साधना व तपस्या की आंच पर इसे तपाना होता है…तब जाकर आत्म-दर्शन संभव हो पाता है।

शुभरात्रि
जय श्री कृष्णा
😊🙏🏻😊

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बर्हापीडं नटवर वपुः कर्णयोः कर्णिकारं,
बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्।
रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै,
र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः।।

भगवान श्री कृष्ण ने अपने सिर पर मयूर का पिछ धारण कर रखा है श्रेष्ठ नट के समान उनका सुंदर वेश है कान में कनेर का पुष्प शरीर में पीतांबर और गले में एक वनमाला शोभायमान हो रही है अपने चरण कमलों से वृंदावन को पवित्र करते हुए भगवान श्री कृष्ण ग्वाल बालों के साथ वन में प्रवेश कर रहे हैं ग्वाल-बाल भगवान के कीर्ति का गान कर रहे हैं।
श्रीकृष्ण ग्वालबालों के साथ वृन्दावन में प्रवेश कर रहे हैं, उन्होंने मस्तक पर मोर-पंख धारण किया हुआ है, कानों पर पीले-पीले कनेर के पुष्प, शरीर पर सुन्दर मनोहारी पीताम्बर शोभायमान हो रहा है तथा गले में सुन्दर सुगन्धित पुष्पों की वैजयन्ती माला धारण किये हैं। रंगमंच पर अभिनय करने वाले नटों से भी सुन्दर और मोहक वेष धारण किये हैं श्यामसुन्दर बांसुरी को अपने अधरों पर रख कर उसमें अधरामृत फूंंक रहे हैं, ग्वालबाल उनके पीछे-पीछे लोकपावन करने वाली कीर्ति का गायन करते हुए चल रहे हैं, और वृन्दावन आज श्यामसुन्दर के चरणों के कारण वैकुण्ठ से भी अधिक सुन्दर और पावन हो गया है।

भगवान के स्वभाव का वर्णन

अहो बकीं यं स्तनकाल कूटं,
जिघांसयापाययदप्य साध्वी।
लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोन्यं,
कं वा दयालुं शरणं व्रजेम्।।

अहो बक दैत्य की बहन पूतना श्री कृष्ण को मारने की इच्छा से अपने स्तनों में कालकूट जहर लगा कर आई थी परंतु भगवान की करुणा कृपा तो देखो उसे भी माता की गति प्रदान कर दी ऐसे श्री कृष्ण को छोड़ कर हम किसकी शरण ग्रहण करें।

पूतना पिछले जन्म में राजा बलि की पुत्री रत्नमाला थी, एक दिन राजा बलि के यहां भगवान वामन की सुंदर और मनमोहक छवि देखकर रत्नमाला के मन में ममत्व जाग उठा, भगवान वामन को देखकर वह मन ही मन सोचने लगी कि मेरा भी ऐसा ही पुत्र हो ताकि वह उसे हृदय से लगाकर दुग्धपान कराती बहुत दुलार करती।

भगवान ने उसकी मन की इच्छा को जान लिया और तथास्तु कहा,लेकिन इसके बाद भगवान ने राजा बलि का अहंकार दूर करने के लिए तीन पग में भूमि नाप दी,राजा समझ गए और अपनी गलती का उन्हे अहसास हो गया।

राजा ने वामनदेव से क्षमा मांगी, इस घटना को रत्नमाला दूर से देख रही थीं, रत्नमाला को प्रतीत हुआ कि उसके पिता का घोर अपमान हुआ है,इससे वह बुरी तरह से क्रोधित हो उठी, उसने मन ही मन भगवान को बुरा कहना आरंभ कर दिया उसने कहा कि अगर ऐसा मेरा पुत्र होता तो मैं इसे विष दे देती, भगवान ने उसके इस भाव को भी जानकर तथास्तु कह दिया।

अगले जन्म में पूतना राक्षसी के रूप में जन्म लिया, पूतना कंस की सबसे विश्वासपात्र दासी थी,कंस ने अष्टमी की तिथि के दिन जन्म लेने वाले सभी बच्चों को मारने का आदेश दिया।

पूतना गोकुल पहुंचकर सुंदर स्त्री का भेष धारण किया और भगवान कृष्ण को दुग्धपान कराने लगी, भगवान ने उसे पहचान लिया और उसका वध कर दिया।

इस प्रकार से भगवान के हाथों पूतना को वध हुआ और जन्म मरण के बंधन से मुक्त कर दिया,वहीं पूतना की दुग्ध और विष पिलाने की इच्छा को भी पूर्ण किया।

राजेशकुमार मिश्रा

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अल्पसंख्यक


इस खूबसूरत पाकिस्तानी अभिनेत्री का असली नाम झरना बासक था लेकिन फ़िल्म इंडस्ट्रीज के लिए वह शबनम थी ! वह पैदाईश बंगाली थी लेकिन उसे शबनम नाम से काम करने मे सुरक्षा महसूस होती थी ! झरना अपने समय की चर्चित अभिनेत्री थी ! उसने कई कामयाब फिल्मो में काम किया और कई पुरस्कार भी जीते थे

१९७१ में बांग्लादेश के पाकिस्तान से अलग होने के बावजूद उसने पाकिस्तान में रहना मुनासिब समझा था ! उसके मन में वही निश्चिंतता रही होगी जो आज भारत के लाखो करोडो सेक्युलर लोगो के मन रहती रहती कि ,यह हैं तो आखिर हमारे अपने ही ही लोग ! बरसो से साझी संस्कृति का हिस्सा रहे यह लोग कभी हमसे नजरे नहीं फिर सकते ! शायद तब तक किसी ने उसे काफिर शब्द का मतलब नहीं समझाया होगा

उसने रुबिन घोष से शादी की और उनका एक बच्चा रूनी घोष भी हो चुका था ! पति सुलझे विचारो वाले बुध्दिजीवी तबके के बाशिंदे थे जिन्हे आम बोलचाल में वामी रुझान वाला माना जाता हैं

उस दौर में खबर बनी की झरना के घर कुछ हथियारबंद लोगो ने डकैती डाली ! जिन्हे बाद में गिरफ्तार भी कर लिया गया ! लेकिन जब सच्चाई सामने आई तब रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी सामने आई

दरअसल वह चार लोग डकैत नहीं थे बल्कि सम्पन्न ,रसूखदार और राजनैतिक घराने के लड़के थे ! डकैती की खबर तो सिर्फ मीडिया में मैनेज की गई थी ! उन्होंने रोबिन घोष और रूनी घोष के हाथ मुँह बाँध कर उन्ही के सामने काफिर झरना संग बलात्कार किया और कई बार किया ! और फिर ठहाके लगाते हुए चले गए !वैसे भी पाकिस्तान में बंगालियों संग कोई सहानुभूति नहीं थी लेकिन यहाँ मामला चर्चित अभिनेत्री का था सो FIR हुई और गिरफ्तारी भी हुई

कोर्ट से मुजरिमो को फांसी हुई तो मामला मुस्लिम बनाम बंगाली का बन गया ! झरना और उसके परिवार पर दबाव बढ़ने लगा ,धार्मिक राजनैतिक नेताओ के अलावा फिल्म इंडस्ट्रीज से भी दबाव बढ़ने लगा ! अंत में भविष्य की सुरक्षा के मद्देनजर रख कर उसने अदालत में अपराधियों को माफ़ करने की सहमति दी तब जिया उल हक़ सरकार ने दोषियों की फांसी की सज़ा को उम्र कैद में बदल दिया और आगे चल कर वह अपराधी कब और क्यों रिहा हो गए किसी को भी पता न चला

उन चारो मुजरिमो में एक का नाम फारूख बांदियाल हैं जिसने हालिया चुनाव जीत कर इमरान खान की तहरीके इन्साफ पार्टी ज्वाइन की ! उसे मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था लेकिन सोशल मीडिया में उसके अतीत के किस्से छपने के बाद उसके खिलाफ बहुत ट्रोलिंग होने के कारण उसे मंत्री मंडल से बाहर रखना पड़ा

अभी जब इमरान खान ने भारत के खिलाफ वक्तव्य दिया की हम पाकिस्तान में बताएँगे की अल्पसंख्यको संग कैसे बर्ताव किया जाता हैं , तब मुझे झरना बासक की कहानी याद आ गई जो यह पढ़ कर कही अपने आँसू पोछ रही होगी ! और ना जाने ऐसी कितनी अनगिनत कहानियां भी रही होगी जो कभी सामने नहीं आ पाई

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प्रभु की प्राप्ति


एक राजा था। वह बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था। वह नित्य शनि देव की बडी श्रद्धा से पूजा-पाठ व स्तुति करता था।
एक दिन शनि देव ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये तथा कहा — “राजन् मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं। बोलो तुम्हारी कोई इच्छा है?”

प्रजा को चाहने वाला राजा बोला — “भगवन् मेरे पास आपका दिया सब कुछ है आपकी कृपा से राज्य में सब प्रकार से सुख-शान्ति है। फिर भी मेरी एक ही इच्छा है कि जैसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया, वैसे ही मेरी सारी प्रजा को भी कृपा कर दर्शन दीजिये।”

“यह तो सम्भव नहीं है” — ऐसा कहते हुए शनि देव ने राजा को समझाया। परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा भगवान् से जिद्द् करने लगा।

आखिरकार भगवान को अपने साधक के सामने झुकना पडा और वे बोले — “ठीक है, कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाड़ी के पास ले आना और मैं पहाडी के ऊपर से सभी को दर्शन दूँगा ।”
ये सुन कर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और भगवान को धन्यवाद दिया। अगले दिन सारे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल सभी पहाड़ के नीचे मेरे साथ पहुँचे, वहाँ भगवान् आप सबको दर्शन देंगे। दूसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा और स्वजनों को साथ लेकर पहाडी की ओर चलने लगा।

चलते-चलते रास्ते में एक स्थान पर तांबे के सिक्कों का पहाड दिखा। प्रजा में से कुछ एक लोग उस और भागने लगे। तभी ज्ञानी राजा ने सबको सतर्क किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे, क्योंकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो, इन तांबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो ।

परन्तु लोभ-लालच के वशीभूत प्रजा के कुछ एक लोग तो तांबे के सिक्कों वाली पहाड़ी की ओर भाग ही गये और सिक्कों कि गठरी बनाकर अपने घर कि और चलने लगे। वे मन ही मन सोच रहे थे, पहले ये सिक्कों को समेट लें, भगवान से तो फिर कभी मिल ही लेंगे ।
राजा खिन्न मन से आगे बढे।

कुछ दूर चलने पर चांदी के सिक्कों का चमचमाता पहाड़ दिखाई दिया । इस बार भी बचे हुये प्रजा में से कुछ लोग, उस और भागने लगे और चांदी के सिक्कों की गठरी बनाकर अपने घर की ओर चलने लगे। उनके मन में विचार चल रहा था कि ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता है। चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिलें न मिलें, भगवान तो फिर कभी मिल ही जायेंगे।

इसी प्रकार कुछ दूर और चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड़ नजर आया। अब तो प्रजा जनों में बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस और भागने लगे।
वे भी दूसरों की तरह सिक्कों की गठरीयां लाद-लाद कर अपने-अपने घरों की
ओर चल दिये।

अब केवल राजा ओर रानी ही शेष रह गये थे। राजा रानी से कहने लगे — “देखो कितने लोभी हैं ये लोग। भगवान से मिलने का महत्व ही नहीं जानते हैं। भगवान के सामने सारी दुनियां की दौलत क्या चीज है..?”
सही बात है — रानी ने राजा कि बात का समर्थन किया और वह आगे बढने लगे ।

कुछ दूर चलने पर राजा ओर रानी ने देखा कि सप्तरंगी आभा बिखेरता हुआ हीरों का एक पहाड़ है। अब तो रानी से भी रहा नहीं गया, हीरों के आर्कषण में वह भी दौड पड़ी और हीरों कि गठरी बनाने लगी । फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साड़ी के पल्लू मेँ भी बांधने लगी । वजन के कारण रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये, परंतु हीरों की तृष्णा अभी भी नहीं मिटी। यह देख राजा को अत्यन्त ही ग्लानि और विरक्ति हुई । बड़े दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढते गये।

वहाँ सचमुच भगवान खड़े उनका इन्तजार कर रहे थे । राजा को देखते ही भगवान मुसकुराये और पूछा — “कहाँ है तुम्हारी प्रजा और तुम्हारे प्रियजन । मैं तो कब से उनसे मिलने के लिये बेकरारी से उनका इन्तजार कर रहा हूॅ ।” राजा ने शर्म और आत्मग्लानि से अपना सर झुका दिया।
तब भगवान ने राजा को समझाया —

“राजन, जो लोग अपने जीवन में भौतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हैं, उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती और वह मेरे स्नेह तथा कृपा से भी वंचित रह जाते हैं..!!”

सार..
जो जीव अपनी मन, बुद्धि और आत्मा से मेरी शरण में आते हैं, और सर्व लौकिक सम्बंधों को छोड कर मुझको ही अपना मानते हैं वो ही मेरे प्रिय बनते है।

💐💐प्रेषक अभिनीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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रैदास


संत रविदास.
परम पूज्य रविदास महान संत थे. आप काशी में रहते थे और पू. रामानंदाचार्यजी महाराज के शिष्य थे. संत रविदास जी ने जाति भेद मिथ्या है, यह कहा. जन्म से कोई उँच-नीच नहीं होता, कर्म से व्यक्ति बड़ा होता है. उन्होने कहा, जाति कोई भी हो भगवत् भक्ति सभी का उद्धार करेगी. संत रविदास काफी प्रभावशाली संत थे, संत रविदास अगर मुसलमान बनेंगे तो उनके हजारों अनुयायी भी मुसलमान बनेंगे, ऐसा सोचकर उन पर मुसलमान बनने के लिए अनेक प्रकार के दबाव आये. सदना पीर उन्हें मुसलमान बनाने के लिए आया, दोनों का शास्त्रार्थ हुआ, सदना पीर रविदास जी के सामने निरूत्तर हुआ, उसने हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता मान ली. रविदास जी की भक्ति और अध्यात्मिक साधना से भी वह प्रभावित हुआ और वह हिन्दू बन गया, रामदास नाम से संत रविदास जी का शिष्य बन गया और भी मुसलमान हिन्दू बने.
उस समय सिकंदर लोदी सुल्तान था, उसके पास मौलवियों ने शिकायतें की, सुल्तान ने रविदास जी को बन्दी बनाया. मुस्लिम होने के लिए दबाव डाला, कष्ट दिया, प्रलोभन भी दिखाया, संत रविदास टस से मस नहीं हूए. उन्होंने दृढ़ता से हिन्दू धर्म में श्रद्धा, निष्ठा व्यक्त की –

“वेद धरम त्यागूँ नहीं, जो गल चलै कटार.”

धमकी आने पर वे बोले –

“प्राण तजूँ पर धर्म न देऊँ.”

परंन्तु बाद में चमत्कार हुआ और सिकंदर लोदी ने क्षमा मांगकर रविदास जी को कारागार से मुक्त किया.
संत रविदास राम के भक्त थें. उनका भक्ति भाव देखकर काशी नरेश उनके शिष्य बने, चित्तौड़ की महारानी झाली बाईसा जी, कुलवधू संत मीरा जी उनकी शिष्या बनीं. चित्तौड़ में संत रविदास जी की समाधि है. चित्तौड़ के महाराणा ने मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के लिए रविदास जी को बुलाया, ब्राह्मण पंडि़तों ने विरोध किया तो भी राजा ने रविदास जी का सम्मान किया.
संत रविदास जी चंवर क्षत्रिय थे और पिप्पल गोत्र के थे. संत रविदास जी अपने भजन में कहते है –

”जाके कुटुम्ब सब ढोर ढोवंत,
आज बानारसी आस पासा.
आचार सहित विप्र करहिं दंडवत,
तिन तनय रैदास दासानुदासा.“

अर्थात – “रविदास जी के जाति भाई आज वाराणसी के आस पास मरे पशु ढो रहे हैं, परंतु उनके पूर्वज प्रतिष्ठित व्यक्ति थे, जिन्हें ब्राहमण आचार सहित साष्टांग प्रणाम करते थे, इस क्षत्रिय चंवर कुल को इस तरह नीचे उतारने का काम सिकंदर लोधी ने किया था.”

हम सब एक बात ध्यान रखे कि भारत में इस्लाम के आक्रमण के बाद अस्पृश्यता आयी, पूर्व काल में हमारे ऋषि मुनि मृगचर्म, व्याघ्रचर्म रखते थे, जंगलो में कोई मृत हिरण या शेर मिलता था तो उसका चमडा उतारना और उसे साफ करने का कार्य वे और उनके शिष्य ही करते थे. परंतु इन ऋषि मुनियो को हमने चर्मकार (अछूत) नहीं कहा.
हम सूत के, रेशम के वस्त्र पहनते थे और निर्यांत भी करते थे. रस्सी, धागा सूत या रेशम के होते थें. चमडे के जूते नहीं थे, लकडी की खडाऊ होती थी. परंतु अरबस्थान में सूत या रेशीम नहीं था, वहाँ चमडे के अधोवस्त्र बनते थे, चमडे के जूते, चमडे की थैली, चमडे की रस्सी और चमडे की जीन होती थी, वहाँ खेती नहीं थी, सभी मांसाहारी थे. जब वे भारत में आये तो ये सब काम उन्होने भारत में शुरू किया, चमडे की मांग सैकडों गुना बढ गयी. मांसाहार भी सैकडो गुना बढ़ गया, लाखों की संख्या में गाय, बैल और अन्य पशुओं की हत्या होने लगी. गोमांस भक्षक मुस्लिम आक्रांताओं ने बलपूर्वक, जबरदस्ती से परास्त हुए, गुलाम बने हिन्दु बंदियों को इस काम में लगाया. चमडा उतारना, जुता चप्पल बनाना, ढाल या अन्य युद्ध सामग्री बनाना आदि ये चमडे का काम करने वाले हिन्दु बन्दी चर्मकार हो गये – धीरे धीरे अछूत बन गये. जिन्हें पशु काटने का काम करना पडा वे हिन्दु खटीक बन गये और अछुत बन गये, परंतु इन सभी ने अपना हिन्दु धर्म नहीं छोड़ा – ये सारे धर्मयोद्धा हैं.

”वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान,
फिर मै क्यों छोडू इसे, पढ़ लू झूठ कुरान.
वेद धर्म छोडू नहीं, कोशिस करो हज़ार,
तिल-तिल काटो चाहि, गोदो अंग कटार.”
रैदास रामायण.