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प्यार के फूल…..
बाइक से आफिस जाते वक्त रास्ते पर बिरजू की नजर एक फूलो की दुकान पर गई जहां गुलाब के फूलों का अंबार लगा हुआ था ग्राहकों की भीड़ भी मौजूद थीं
उसे याद आया कल आफिस में सब रोज डे ,रोज डे कह रहे थे
क्या होता है भाई ये बिरजू ने आश्चर्य से अपने एक सहकर्मी से पूछा था
अरे यार बिरजू ये रोज डे मतलब आप जिसे चाहते हो प्यार करते हो उसे अपने प्यार का इजहार करने के लिए गुलाब के फूलों का गुलदस्ता या कम से कम एक गुलाब देकर दिल की फीलिंग्स बताने का दिन….. मगर तू कयुं पूछ रहा है ना तो तुमने अबतक शादी की और यहां तक मुझे पता है तुम्हारी कोई गर्लफ्रेंड भी नहीं है कहकर वह मुस्कुराने लगा था
क्या प्यार बस एक लड़का लड़की के बीच में ही होता है मां बेटे के बीच जो प्यार होता है वैसे प्यार तो कोई हो ही नहीं सकता कितना कुछ नहीं करा उसकी परवरिश के लिए मां ने पिताजी के जल्दी चले जाने के बाद लोगों के घरों में झाड़ू पोंछा लोगों के रातों को बैठकर कपड़े तक सिले थे आज उसी के लिए तो वो उससे दूर शहर में नौकरी करता है उसे मां के सिर पर चढ़ा कर्ज उतारना है मां उससे दूर नहीं रहना चाहती थी मगर उसी ने जिद की थी कुछ नहीं होता दूर रहने से …
बिरजू ….मत जा ….में अब भी लोगों के घरों में झाड़ू पोंछा लगा सकती हूं हम यही रहकर कोई काम करते हुए कर्ज चुका देंगे मगर वो शहर जाकर कमाऊंगा कहकर चला आया था मां अक्सर वीडियो काल पर कहती हैं
बिरजू कब आएगा तू…
जल्दी आऊंगा कहकर वो बात टाल दिया करता है क्योंकि उसे बहुत पैसे कमाने है … मां मुझसे बहुत प्यार करती है तो कयुं ना में मां को गांव में फूलों का गुलदस्ता बनवाकर भेजूं यही सोचकर बिरजू ने बाइक दुकान पर जाकर खड़ी कर दी और एक शानदार गुलदस्ता बनवा लिया उसने सोचा रास्ते से वो इसे कोरियर के जरिए गांव में मां तक पहुंचवा देगा अभी वो दुकानदार को पैसे दे ही रहा था कि इतने में एक छोटी बच्ची वहा आयी और उससे बोली …. भैया…
मैं अपनी मां के लिए गुलाब खरीदना चाहती हूं लेकिन मेरे पास दस रूपये कम पड़ रहे है इसलिए अगर मेरी दस रूपये की मदद कर दे तो मैं भी फूलों को खरीद सकती हूं
बच्ची की बात और मां के लिए प्यार देखकर बिरजू मुस्कुरा उठा और बोला ….ठीक है …तुम खरीद लो में दस रूपये दे देता हूं कहकर उसने अपने पैसों से दस रुपए अधिक दुकानदार को दे दिए
उसके बाद जैसे ही वह फूलों का गुलदस्ता लिए चलने को हुआ तो वह छोटी सी बच्ची बोली … भैया आप आगे इसी तरफ जा रहे है तो मुझे भी आगे मेरी मां के पास तक छोड़ देगे…
बिरजू ने मुस्कुराते हुए कहा ….हूह ठीक है चलो
वह छोटी सी बच्ची बाइक पर फूलों को लिए बैठ गई कुछ दूर चलने के बाद वह बच्ची एक कब्रिस्तान के पास बाइक रोकने को बोली
यहां …. यहां तो कोई बस्ती वगैरह नहीं है आसपास
मेरी मां यहीं रहती है भैया …. कहकर वह तेजी से कब्रिस्तान की और दौड़ गई उत्सुकतावश बिरजू भी उस बच्ची के पीछे पीछे चल दिया
बिरजू ने देखा कि एक कब्र पर वह बच्ची फूलो को सजा रही है और फिर कब्र से लिपट गयी
जिसे देखकर बिरजू की आँखे भीग गई ….
वह अब समझ चुका था कि अपनों के खोने का क्या गम होता है और वह बच्ची तक पहुंचा और वो गुलदस्ता उसे देकर उसके सिर पर स्नेहिल हाथ रखकर चुपचाप वहां से निकल गया अब उसने तय किया था अपना प्यार के फूलों को किसी कोरियर से नहीं भेजेगा बल्कि वह स्वयं फूलों का गुलदस्ता लेकर अपने हाथों से मां को देने के लिए गांव निकल पड़ा आखिर आज प्यार के फूलों का दिन जो है और देर से ही सही मगर इसी बहाने उसे अपनों के होने का उनकी अहमियत का अहसास जो हो गया था
एक दोस्त की सुंदर रचना
🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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. ” ब्रेक “

🟣आपके जीवन में कभी ब्रेक लगता है कैसे कब लगता है पढिए यह कहानी🟣

एक बार भौतिक विज्ञान की कक्षा में शिक्षक ने विद्यार्थियों से पूछा, “कार में ब्रेक क्यों लगाते हैं?”

एक छात्र ने उठकर उत्तर दिया, “सर, कार को रोकने के लिए।” एक अन्य छात्र ने उत्तर दिया, “कार की गति को कम करने और नियंत्रित करने के लिए।” एक अन्य ने कहा, “टक्कर से बचने के लिए।”

जल्द ही, जवाब दोहराए जाने लगे। इसलिए शिक्षक ने स्वयं प्रश्न का उत्तर देने का निर्णय लिया।

चेहरे पर एक मुस्कान के साथ उन्होंने कहा, “मैं आप सभी की सराहना करता हूँ कि आप इस सवाल का जवाब देने की कोशिश कर रहे हैं। हालाँकि मेरा मानना ​​​​है कि यह सब व्यक्तिगत धारणा का मामला है। पर मैं इसे इस तरह से देखता हूँ, ” कार में ब्रेक, हमें इसे और तेज चलाने में सक्षम बनाते हैं।

कक्षा में गहरा सन्नाटा छा गया! इस जवाब की किसी ने कल्पना नहीं की थी।

शिक्षक ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “एक पल के लिए, मान लेते हैं कि हमारी कार में कोई ब्रेक नहीं है। अब हम अपनी कार को कितनी तेज चलाने के लिए तैयार होंगे?”

आगे उन्होंने कहा, “यह ब्रेक ही हैं जिनके कारण हम कार को तेजी से चलाने की हिम्मत करते हैं और अपने गंतव्य तक पहुँच सकते हैं।”

कक्षा के सभी छात्र सोच में पड़ गए। उन्होंने पहले कभी इस तरह से “ब्रेक” के बारे में नहीं सोचा था।

आइए विचार करें!

जीवन में हमारे सामने कई ऐसे ब्रेक आते हैं, जो हमें निराश करते हैं। हमारे माता-पिता, शिक्षक, शुभचिंतक और हमारे मित्र, हमारी प्रगति की दिशा या जीवन में निर्णय के बारे में हमसे पूछते है।

हम उनके प्रश्नों तथा जीवन की कठिन स्थितियों को “ब्रेक” के रूप में देखते हैं, जो हमारी गति को बाधित करते हैं।

लेकिन कैसा हो अगर हम उन्हें अपने समर्थक या उत्प्रेरक के रूप में देखें? ऐसे उपकरण के रूप में जो हमें जोखिम लेने में सक्षम बनाते हैं, साथ ही यह सुनिश्चित करते हैं कि हम अपनी रक्षा कर सकें।

क्योंकि, कभी-कभी हमें रुकना पड़ता है। यहाँ तक की एक कदम पीछे भी हटना पड़ता है, ताकि हम एक लंबी छलांग लगा सकें।

ऐसे सवालों और परिस्थितियों (समय-समय पर ब्रेक) के कारण ही हम आज जहॉं हैं, वहाँ पहुँचने में कामयाब रहे हैं।

जीवन में इन “ब्रेक” के बिना हम फिसल सकते थे, दिशा खो सकते थे या एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना का शिकार हो सकते थे।

ब्रेक हमें वापस पीछे धकेलने या हमें बांधने के लिए नहीं होते हैं। इसके बजाय वे हमें पहले की तुलना में तेजी से आगे बढ़ने में सहायक होते है। ताकि हम अपने गंतव्य तक शीघ्र और सुरक्षित पहुँच सके।

क्या हम अपने जीवन में ‘ब्रेक’ के लिए आभारी हैं । या हम उन्हें केवल अपने काम में बाधा के रूप में देखते हैं?
♾️
“जब आप जीवन में कठिन परिस्थितियों से गुजरते हैं, तो आप पहले से ज्यादा मजबूत होकर उभरते हैं।”
🌹🙏🏻जय श्री जिनेन्द्र🙏🏻🌹
🌹पवन जैन🌹

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श्रद्धा और विश्वास

एक सेठ बड़ा धार्मिक था संपन्न भी था। एक बार उसने अपने घर पर पूजा पाठ रखी और पूरे शहर को न्यौता दिया। पूजा पाठ के लिए बनारस से एक विद्वान शास्त्री जी को बुलाया गया और खान पान की व्यवस्था के लिए शुद्ध घी के भोजन की व्यवस्था की गई। जिसके बनाने के लिए एक महिला जो पास के गांव में रहती थी को सुपुर्द कर दिया गया।

शास्त्री जी कथा आरंभ करते हैं, गायत्री मंत्र का जाप करते हैं और उसकी महिमा बताते हैं उसके हवन पाठ इत्यादि होता है लोग बाग आने लगे और अंत में सब भोजन का आनंद लेते घर वापस हो जाते हैं। ये सिलसिला रोज़ चलता है।

भोज्य प्रसाद बनाने वाली महिला बड़ी कुशल थी वो अपना काम करके बीच बीच में कथा आदि सुन लिया करती थी।

रोज की तरह एक दिन शास्त्री जी ने गायत्री मंत्र का जाप किया और उसकी महिमा का बखान करते हुए बोले कि इस महामंत्र को पूरे मन से एकाग्रचित होकर किया जाए तो इस भव सागर से पार जाया जा सकता है। इंसान जन्म मरण के झंझटों से मुक्त हो सकता है।

खैर करते करते कथा का अंतिम दिन आ गया। वह महिला उस दिन समय से पहले आ गई और शास्त्री जी के पास पहुंची, उन्हें प्रणाम किया और बोली कि शास्त्री जी आपसे एक निवेदन है।”

शास्त्री उसे पहचानते थे उन्होंने उसे चौके में खाना बनाते हुए देखा था। वो बोले कहो क्या कहना चाहती हो ?”

वो थोड़ा सकुचाते हुए बोली शास्त्री जी मैं एक गरीब महिला हूँ और पड़ोस के गांव में रहती हूँ। मेरी इच्छा है कि आज का भोजन आप मेरी झोपड़ी में करें।”

सेठ जी भी वहीं थे, वो थोड़ा क्रोधित हुए लेकिन शास्त्री जी ने बीच में उन्हें रोकते हुए उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया और बोले आप तो अन्नपूर्णा हैं। आप ने इतने दिनों तक स्वादिष्ट भोजन करवाया, मैं आपके साथ कथा के बाद चलूंगा।”

वो महिला प्रसन्न हो गई और काम में व्यस्त हो गई। कथा खत्म हुई और वो शास्त्री जी के समक्ष पहुंच गई, वायदे के अनुसार वो चल पड़े गांव की सीमा पर पहुंच गए देखा तो सामने नदी है।

*शास्त्री जी ठिठक कर रुक गए बारिश का मौसम होने के कारण नदी उफान पर थी कहीं कोई नाव भी नहीं दिख रही थी। शास्त्री जी को रुकता देख महिला ने अपने वस्त्रों को ठीक से अपने शरीर पर लपेट लिया व इससे पहले की शास्त्रीजी कुछ समझते उसने शास्त्री जी का हाथ थाम कर नदी में छलांग लगा दी और जोर जोर से *ऊँ भूर्भुवः स्वः ….. ऊँ भूर्भुवः स्वः बोलने लगी और एक हाथ से तैरते हुए कुछ ही क्षणों में उफनती नदी की तेज़ धारा को पार कर दूसरे किनारे पहुंच गई।*

शास्त्री जी पूरे भीग गए और क्रोध में बोले मूर्ख औरत ये क्या पागलपन था अगर डूब जाते तो…?”

महिला बड़े आत्मविश्वास से बोली शास्त्री जी डूब कैसे जाते ? आप का बताया मंत्र जो साथ था। मैं तो पिछले दस दिनों से इसी तरह नदी पार करके आती और जाती हूँ।

शास्त्री जी बोले क्या मतलब ??”

महिला बोली की आप ही ने तो कहा था कि इस मंत्र से भव सागर पार किया जा सकता है। लेकिन इसके कठिन शब्द मुझसे याद नहीं हुए बस मुझे ऊँ भूर्भुवः स्वः याद रह गया तो मैंने सोचा “भव सागर” तो निश्चय ही बहुत विशाल होगा जिसे इस मंत्र से पार किया जा सकता है तो क्या आधा मंत्र से छोटी सी नदी पार नहीं होगी और मैंने पूरी एकाग्रता से इसका जाप करते हुए नदी सही सलामत पार कर ली। बस फिर क्या था मैंने रोज के 20 पैसे इसी तरह बचाए और आपके लिए अपने घर आज की रसोई तैयार की।”

शास्त्री जी का क्रोध व झुंझलाहट अब तक समाप्त हो चुकी थी। किंकर्तव्यविमूढ़ उसकी बात सुन कर उनकी आँखों में आंसू आ गए और बोले माँ मैंने अनगिनत बार इस मंत्र का जाप किया, पाठ किया और इसकी महिमा बतलाई पर तेरे विश्वास के आगे सब बेसबब रहा।”

“इस मंत्र का जाप जितनी श्रद्धा से तूने किया उसके आगे मैं नतमस्तक हूं। तू धन्य है कह कर उन्होंने उस महिला के चरण स्पर्श किए। उस महिला को कुछ समझ नहीं आ रहा था वो खड़ी की खड़ी रह गई। शास्त्री भाव विभोर से आगे बढ़ गए वो पीछे मुड़ कर बोले मां चलो भोजन नहीं कराओगी बहुत भूख लगी है।”
।। जय सियाराम।।🙏🙏

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┈┉══❀((हरि ॐ))❀══┉┈
भगवान का मंगल विधान
-:- सत्य घटना -:-
पुरानी बात है – कलकत्ते में सर कैलासचन्द्र वसु प्रसिद्ध डॉक्टर हो गये हैं। उनकी माता बीमार थीं। एक दिन श्रीवसु महोदय ने देखा—माता की बीमारी बढ़ गयी है, कब प्राण चले जायँ, कुछ पता नहीं।

रात्रि का समय था। कैलास बाबू ने बड़ी नम्रता के साथ माताजी से पूछा- ‘माँ, तुम्हारे मन में किसी चीज की इच्छा हो तो बताओ, मैं उसे पूरी कर दूँ।’ माता कुछ देर चुप रहकर बोलीं- ‘बेटा! उस दिन मैंने बम्बई के अंजीर खाये थे। मेरी इच्छा है अंजीर मिल जायँ तो मैं खा लूँ।

उन दिनों कलकत्ते के बाजार में हरे अंजीर नहीं मिलते थे। बम्बई से मँगाने में समय अपेक्षित था । हवाई जहाज थे नहीं। रेल के मार्ग से भी आजकल की अपेक्षा अधिक लगता था।

कैलास बाबू बड़े दुखी हो गये – माँ ने अन्तिम समय में एक चीज माँगी और मैं माँ की उस माँग को पूरी नहीं कर सका, इससे बढ़कर मेरे लिये दु:ख की बात और क्या होगी ? पर कुछ भी उपाय नहीं सूझा । रुपयों से मिलने वाली चीज होती तो कोई बात नहीं थी ।

कलकत्ते या बंगाल में कहीं अंजीर होते नहीं, बाजार में मिलते नहीं। बम्बई से आने में तीन दिन लगते हैं। टेलीफोन भी नहीं, जो सूचना दे दें। तब तक पता नहीं – माता जी जीवित रहें या नहीं, अथवा जीवित भी रहें तो खा सकें या नहीं।

कैलास बाबू निराश होकर पड़ गये और मन-ही-मन रोते हुए कहने लगे—’हे भगवन्! क्या मैं इतना अभागा हूँ कि माँ की अन्तिम चाह को पूरी होते नहीं देखूँगा।

रात के लगभग ग्यारह बजे किसी ने दरवाजा खोलने के लिये बाहर से आवाज दी। डॉक्टर वसु ने समझा, किसी रोगी के यहाँ से बुलावा आया होगा। उनका चित्त बहुत खिन्न था। उन्होंने कह दिया-‘इस समय मैं नहीं जा सकूँगा।’ बाहर खड़े आदमी ने कहा- ‘मैं बुलाने नहीं आया हूँ, एक चीज लेकर आया हूँ-दरवाजा खोलिये।’

दरवाजा खोला गया। सुन्दर टोकरी हाथ में लिये एक दरवान ने भीतर आकर कहा-‘डॉक्टर साहब! हमारे बाबूजी अभी बम्बई से आये हैं, वे सबेरे ही रंगून चले जायँगे, उन्होंने यह अंजीर की टोकरी भेजी है, वे बम्बई से लाये हैं। मुझसे कहा है कि मैं सबेरे चला जाऊँगा अभी अंजीर दे आओ । इसीलिये मैं अभी लेकर आ गया। कष्ट के लिये क्षमा कीजियेगा ।

कैलास बाबू अंजीर का नाम सुनते ही उछल पड़े। उन्हें उस समय कितना और कैसा अभूतपूर्व आनन्द हुआ, इसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता।

उनकी आँखों में हर्षके आँसू आ गये, शरीर में आनन्द से रोमांच हो आया। अंजीर की टोकरी को लेकर वे माताजी के पास पहुँचे और बोले ‘माँ! लो – भगवान् ने अंजीर तुम्हारे लिये भेजे हैं।

उस समय माता का प्रसन्न मुख देखकर कैलास बाबू इतने प्रसन्न हुए, मानो उन्हें जीवन का परम दुर्लभ महान् फल प्राप्त हो गया हो ।

बात यह थी, एक गुजराती सज्जन, जिनका फार्म कलकत्ते और रंगून में भी था, डॉक्टर कैलास बाबू के बड़े प्रेमी थे। वे जब-जब बम्बई से आते, तब अंजीर लाया करते थे।

भगवान्‌ के मंगल विधान का आश्चर्य देखिये, कैलास बाबू की मरणासन्न माता आज रात को अंजीर चाहती है और उसकी चाह को पूर्ण करने की व्यवस्था बम्बईमें चार दिन पहले ही हो जाती है और ठीक समय पर में अंजीर कलकत्ते उनके पास आ पहुँचते हैं! एक दिन पीछे भी नहीं, पहले भी नहीं। *-:- सीख -:-*

इसे कहते हैं कि परमात्मा जिसको जो चीज देना चाहते हैं । उसके लिए किसी न किसी को निमित्त बना ही देते हैं।

इसलिए यदि कभी किसी की मदद करने को मिल जाये तो अहंकार न कीजियेगा। बस इतना समझ लीजियेगा कि परमात्मा आपको निमित्त बनाकर किसी की सहायता करना चाह रहे हैं।

इसका अर्थ ये हुआ कि
आप परमात्मा की नजर में हैं।

┈┉══❀((हरि ॐ))❀══┉┈ ▬▬▬▬▬๑⁂❋⁂๑▬▬▬▬▬

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नम्रता


संघ की पत्रिका “राष्ट्रधर्म” के प्रथम प्रकाशक राधेश्याम प्रसाद जी एक प्रसंग में लिखते हैं:-

‘एक दिन नाना जी देशमुख मेरी दुकान पर आए और बोले, ‘प्रेस आकर हिसाब-किताब तो देख लो।’

उन दिनों राष्ट्रधर्म का प्रकाशन सदर बाजार से होता था। दुकान बंद करके एक रात मैं प्रेस गया। वहां देखा कि हॉल में दोनों ओर तार लगाकर कपड़े के परदों से केबिन बना दिए गए हैं। अंदर एक मेज और बरामदे में एक तख्त।

गर्मियों के दिन थे।

रात में काम खत्म हुआ तो दीनदयाल जी ने मुझे दरी, चादर और तकिया दे दिया। मुझे उन लोगों से पूछने का भी ध्यान नहीं रहा और तख्त पर सो गया। प्रात: काल नींद खुली तो वहां के दृश्य देख अचंभित रह गया। आंखों में आंसू भी आ गए।

दृश्य यह था कि मेरे ही बराबर नीचे जमीन पर दीनदयाल जी और अटल जी चटाई पर सो रहे थे। तकिया के स्थान पर दोनों लोगों ने अपने सिर के नीचे एक-एक ईंट लगा रखी थी। मैं हड़बड़ा कर उठा और दोनों लोगों को जगाया। फिर कहा, ‘आप लोगों ने तो बड़ा अनर्थ कर दिया। ऊपर सोइए।’

पं. दीनदयाल उपाध्याय बोले, ‘आदत न खराब करिये।’

अटल जी ने हंसते हुए कहा, ‘जमीन छोड़ दी तो पैर कहां ठहरेंगे।’

शत-शत नमन ऐसी महान पुण्यात्माओ को। वन्देमातरम् । 🙏

आचार्य अशोक

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बचपन से ही हमलोग एक कथा सुनते आ रहे हैं कि….

एक बिच्छू जल में छटपटा रहा था और एक महात्मा उसे बचा रहे थे…!

लेकिन, जैसे ही महात्मा उसे उठाते थे… बिच्छू उन्हें डंक मार कर काट लेता था.
ये देख कर… लोगों ने महात्मा को समझाया कि….
महात्मा… ऐसे जीव को क्यों बचाना, जो खुद को बचाने वाले को ही काट रहा है ???
जाने दो न…!

लेकिन, ये सुनते ही महात्मा जी पर “महात्मागीरी” हावी हो गई…
और, वे कहने लगे… “जब यह छोटा सा जीव अपना स्वभाव नहीं छोड़ता…
तो, फिर मैं क्यों छोड़ दूँ ???”

‘पंचतंत्र’ में इतनी कथा के बाद विराम लग गया…!

पर, असलियत में ये कथा आगे भी चलती रही.

लोगों ने उस नदी वाली बात को भुला दिया….
पर, महात्मा अपनी “महात्मागीरी” में लगे रहे…

और, ढेरों बिच्छू बचा बचा कर अपने इर्द-गिर्द जमा कर लिए …

चूंकि, बिच्छुओं की प्रजनन दर भी बहुत तेज थी तो जल्द ही हर तरफ बिच्छू ही नजर आने लगे.

अब वे सारे बिच्छू…. जो पहले सिर्फ छूने पर ही डंक मारते थे,
अब, बिना छुए ही खुद से पहल कर महात्मा को “काटने” लगे.

यहाँ तक कि… उन्हें “ध्यान-साधना” भी न करने दें.

तब तंग आकर महात्मा बोले…
“अरे…!
मुझे मेरी पूजा तो करने दो,
वरना मैं महात्मा कैसे बना रह पाऊंगा ??”

इस पर बिच्छू कहते हैं….
“अब हमारी गिनती ज्यादा है.
इसीलिए, अब रहना है तो हम जैसा बन के रहो,
वरना हम तेरा जीवन ही समाप्त कर देंगे।”

यह देखकर… हैरान- परेशान महात्मा ने “डंडा” लेकर बिच्छुओं की खातिरदारी करनी शुरू की..

तो झट से…. सारी “बिच्छू जमात” चिल्लाने लगी कि…
तुम तो महात्मा हो,
तुम्हें हिंसा नहीं करनी चाहिए,
तुम तो वसुधैव कुटुम्बकम वाले लोग हो..
तुम अपना स्वभाव कैसे बदल सकते हो ???
तुम असहिष्णु कैसे हो गये ???”

पहले यही गुजरात में हुआ…
फिर up में हुआ…
और, अब यही असम और तिरिपुरा में हो रहा है.

असल में इसमें गलती बिच्छुओं की नहीं है बल्कि महात्मा की ही है..
क्योंकि, सांप और बिच्छू का स्वभाव ही है काटना…!

और, सांप की वो प्रवृति कभी बदल नहीं सकती…!
उसे तो एक दिन डसना ही है…
फिर चाहे… उसे दूध पिलाओ अथवा न पिलाओ..

आचार्य अशोक

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विवाह में सात फेरे ही क्यों लेते हैं?


आखिर हिन्दू विवाह के समय अग्नि के समक्ष सात फेरे ही क्यों लेते हैं? दूसरा यह कि क्या फेरे लेना जरूरी है?

पाणिग्रहण का अर्थ : – पाणिग्रहण संस्कार को सामान्य रूप से ‘विवाह’ के नाम से जाना जाता है। वर द्वारा नियम और वचन स्वीकारोक्ति के बाद कन्या अपना हाथ वर के हाथ में सौंपे और वर अपना हाथ कन्या के हाथ में सौंप दे। इस प्रकार दोनों एक-दूसरे का पाणिग्रहण करते हैं। कालांतर में इस रस्म को ‘कन्यादान’ कहा जाने लगा, जो कि अनुचित है।

नीचे लिखे मंत्र के साथ कन्या अपना हाथ वर की ओर बढ़ाए, वर उसे अंगूठा सहित (समग्र रूप से) पकड़ ले। भावना करें कि दिव्य वातावरण में परस्पर मित्रता के भाव सहित एक-दूसरे के उत्तरदायित्व को स्वीकार कर रहे हैं।

ॐ यदैषि मनसा दूरं, दिशोऽ नुपवमानो वा।
हिरण्यपणोर् वै कर्ण, स त्वा मन्मनसां करोतु असौ।। -पार.गृ.सू. 1.4.15

विवाह का अर्थ : – विवाह को शादी या मैरिज कहना गलत है। विवाह का कोई समानार्थी शब्द नहीं है। विवाह= वि+वाह, अत: इसका शाब्दिक अर्थ है- विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) वहन करना।

विवाह एक संस्कार : – अन्य धर्मों में विवाह पति और पत्नी के बीच एक प्रकार का करार होता है जिसे कि विशेष परिस्थितियों में तोड़ा भी जा सकता है, लेकिन हिन्दू धर्म में विवाह बहुत ही भली-भांति सोच- समझकर किए जाने वाला संस्कार है। इस संस्कार में वर और वधू सहित सभी पक्षों की सहमति लिए जाने की प्रथा है। हिन्दू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संबंध से अधिक आत्मिक संबंध होता है और इस संबंध को अत्यंत पवित्र माना गया है।

सात फेरे या सप्तपदी : – हिन्दू धर्म में 16 संस्कारों को जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। विवाह में जब तक 7 फेरे नहीं हो जाते, तब तक विवाह संस्कार पूर्ण नहीं माना जाता। न एक फेरा कम, न एक ज्यादा। इसी प्रक्रिया में दोनों 7 फेरे लेते हैं जिसे ‘सप्तपदी’ भी कहा जाता है। ये सातों फेरे या पद 7 वचन के साथ लिए जाते हैं। हर फेरे का एक वचन होता है जिसे पति-पत्नी जीवनभर साथ निभाने का वादा करते हैं। ये 7 फेरे ही हिन्दू विवाह की स्थिरता का मुख्य स्तंभ होते हैं। अग्नि के 7 फेरे लेकर और ध्रुव तारे को साक्षी मानकर दो तन, मन तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं।

सात अंक का महत्व…

ध्यान देने योग्य बात है कि भारतीय संस्कृति में 7 की संख्या मानव जीवन के लिए बहुत विशिष्ट मानी गई है। संगीत के 7 सुर, इंद्रधनुष के 7 रंग, 7 ग्रह, 7 तल, 7 समुद्र, 7 ऋषि, सप्त लोक, 7 चक्र, सूर्य के 7 घोड़े, सप्त रश्मि, सप्त धातु, सप्त पुरी, 7 तारे, सप्त द्वीप, 7 दिन, मंदिर या मूर्ति की 7 परिक्रमा, आदि का उल्लेख किया जाता रहा है।

उसी तरह जीवन की 7 क्रियाएं अर्थात- शौच, दंत धावन, स्नान, ध्यान, भोजन, वार्ता और शयन। 7 तरह के अभिवादन अर्थात- माता, पिता, गुरु, ईश्वर, सूर्य, अग्नि और अतिथि। सुबह सवेरे 7 पदार्थों के दर्शन- गोरोचन, चंदन, स्वर्ण, शंख, मृदंग, दर्पण और मणि। 7 आंतरिक अशुद्धियां- ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, घृणा और कुविचार। उक्त अशुद्धियों को हटाने से मिलते हैं ये 7 विशिष्ट लाभ- जीवन में सुख, शांति, भय का नाश, विष से रक्षा, ज्ञान, बल और विवेक की वृद्धि।

स्नान के 7 प्रकार- मंत्र स्नान, मौन स्नान, अग्नि स्नान, वायव्य स्नान, दिव्य स्नान, मसग स्नान और मानसिक स्नान। शरीर में 7 धातुएं हैं- रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मजा और शुक्र। 7 गुण- विश्वास, आशा, दान, निग्रह, धैर्य, न्याय, त्याग। 7 पाप- अभिमान, लोभ, क्रोध, वासना, ईर्ष्या, आलस्य, अति भोजन और 7 उपहार- आत्मा के विवेक, प्रज्ञा, भक्ति, ज्ञान, शक्ति, ईश्वर का भय।

यही सभी ध्यान रखते हुए अग्नि के 7 फेरे लेने का प्रचलन भी है जिसे ‘सप्तपदी’ कहा गया है। वैदिक और पौराणिक मान्यता में भी 7 अंक को पूर्ण माना गया है। कहते हैं कि पहले 4 फेरों का प्रचलन था। मान्यता अनुसार ये जीवन के 4 पड़ाव- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक था।

हमारे शरीर में ऊर्जा के 7 केंद्र हैं जिन्हें ‘चक्र’ कहा जाता है। ये 7 चक्र हैं- मूलाधार (शरीर के प्रारंभिक बिंदु पर), स्वाधिष्ठान (गुदास्थान से कुछ ऊपर), मणिपुर (नाभि केंद्र), अनाहत (हृदय), विशुद्ध (कंठ), आज्ञा (ललाट, दोनों नेत्रों के मध्य में) और सहस्रार (शीर्ष भाग में जहां शिखा केंद्र) है।

उक्त 7 चक्रों से जुड़े हैं हमारे 7 शरीर। ये 7 शरीर हैं- स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर, मानस शरीर, आत्मिक शरीर, दिव्य शरीर और ब्रह्म शरीर।

विवाह की सप्तपदी में उन शक्ति केंद्रों और अस्तित्व की परतों या शरीर के गहनतम रूपों तक तादात्म्य बिठाने करने का विधान रचा जाता है। विवाह करने वाले दोनों ही वर और वधू को शारीरिक, मानसिक और आत्मिक रूप से एक-दूसरे के प्रति समर्पण और विश्वास का भाव निर्मित किया जाता है।

मनोवैज्ञानिक तौर से
दोनों को ईश्वर की शपथ के साथ जीवनपर्यंत तक दोनों से साथ निभाने का वचन लिया जाता है इसलिए विवाह की सप्तपदी में 7 वचनों का भी महत्व है।

सप्तपदी में पहला पग भोजन व्यवस्था के लिए, दूसरा शक्ति संचय, आहार तथा संयम के लिए, तीसरा धन की प्रबंध व्यवस्था हेतु, चौथा आत्मिक सुख के लिए, पांचवां पशुधन संपदा हेतु, छठा सभी ऋतुओं में उचित रहन-सहन के लिए तथा अंतिम 7वें पग में कन्या अपने पति का अनुगमन करते हुए सदैव साथ चलने का वचन लेती है तथा सहर्ष जीवनपर्यंत पति के प्रत्येक कार्य में सहयोग देने की प्रतिज्ञा करती है।

‘मैत्री सप्तपदीन मुच्यते’ अर्थात एकसाथ सिर्फ 7 कदम चलने मात्र से ही दो अनजान व्यक्तियों में भी मैत्री भाव उत्पन्न हो जाता है अतः जीवनभर का संग निभाने के लिए प्रारंभिक 7 पदों की गरिमा एवं प्रधानता को स्वीकार किया गया है। 7वें पग में वर, कन्या से कहता है कि ‘हम दोनों 7 पद चलने के पश्चात परस्पर सखा बन गए हैं।’

मन, वचन और कर्म के प्रत्येक तल पर पति-पत्नी के रूप में हमारा हर कदम एकसाथ उठे इसलिए आज अग्निदेव के समक्ष हम साथ-साथ 7 कदम रखते हैं। हम अपने गृहस्थ धर्म का जीवनपर्यंत पालन करते हुए एक-दूसरे के प्रति सदैव एकनिष्ठ रहें और पति-पत्नी के रूप में जीवनपर्यंत हमारा यह बंधन अटूट बना रहे तथा हमारा प्यार 7 समुद्रों की भांति विशाल और गहरा हो।

संकलन : पुराण आदि हिन्दू ग्रंथों से

आचार्य अशोक

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Grant Trunk Road


ग्रैंडट्रंकरोड(Grand Trunk Road) को भारत ही नहीं बल्कि एशिया की सबसे पुरानी, लंबी एवं प्रमुख सड़क के रुप में जाना जाता है।

यह सड़क “बांग्लादेश के चटगांव से शुरू होकर भारत,पाकिस्तान से होते हुए अफगानिस्तान के काबुल में जाकर समाप्त होती है।”

वर्तमान के इन 4 देशों को मिलाकर इसकी कुल लंबाई 3670 कि.मी. है।

लेकिन, अगर अपने आसपास के 10 लोगों से पूछेंगे तो उनमें से 9 लोग बताएंगे कि ग्रैंड ट्रैंक रोड को “शेरशाह सूरी” ने बनवाया था।

क्योंकि, उन्होंने अपनी इतिहास की किताब में यही पढ़ा हुआ है।

जबकि, यह बिल्कुल एक गलत एवं भ्रामक तथ्य है।

असलियत यह है कि…. भारत की इस सबसे लंबी एवं प्रसिद्ध सड़क को शेरशाह ने नहीं बल्कि शेरशाह से 1850 साल पहले “#चंद्रगुप्त_मौर्य” ने बनवाया था।

हमारे भारतीय इतिहासकारों ने शेरशाह के महिमामंडन हेतु उसे GT ROAD का निर्माता घोषित कर दिया।

जबकि, ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि GT ROAD शेरशाह (1540-1545) से 1850 साल पहले 329 ईसा पूर्व से ही भारत में मौजूद है।

चंद्रगुप्त मौर्य के समय यह सड़क “उत्तरा पथ” के नाम से जाना जाता था।

वास्तव में मुसलमानों ने हमारी अधिकांश प्राचीन धरोहरों को अपने नाम से बनवाया हुआ प्रचारित करने का धूर्ततापूर्ण कृत्य करते हुये झूठा इतिहास गढ़ने का ही काम किया है और जहां वे ऐसा करने में असफल हुये उन मंदिरों और धरोहरों को तोड़कर उनपर अपना घटिया निर्माण थोपने का काम किया है। बात चाहे मथुरा की हो या काशी विश्वनाथ की या फिर अढ़ाई दिन का झोपड़ा हो या कुतुबमीनार या लाल किला आदि, ये सभी ऐसे ही उदाहरण हैं।

सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा निर्मित उत्तरापथ की भी यही कहानी है। शेरशाह सूरी ने भी इसका नाम बदल कर “सड़क-ए-आजम” कर दिया और इतिहासकारों ने इसे “सड़क-ए-शेरशाह” कह कर पुकारना शुरू कर दिया।

और, इसका वर्तमान नाम “ग्रैंड ट्रैंक रोड” अंग्रेजों का दिया हुआ है।

और हाँ…. जिस शेरशाह सूरी के बारे में इतिहास की किताब में कसीदे पढ़े गए हैं…

वो महज 4 साल (1540-1545) तक ही सत्ता में रहा था लेकिन उतने छोटे अंतराल में भी वो उत्तरा पथ का नाम बदलना नहीं भूला।

तथा… हिन्दुओं पर “”जजिया कर”” लगाना नहीं भूला।

शेरशाह सूरी एक पश्तून अफगानी था शायद इसीलिए इरफान हबीब और रोमिला थापर सरीखे कुंठित वामपंथी इतिहासकारों ने शेरशाह जैसे जे हादी मानसिकता के लोगों को भारत का निर्माणकर्ता बता कर महिमामंडित कर दिया।

अब समय आ गया है कि कुत्सित मानसिकता से ग्रस्त हबीब और थापर जैसे इस्लामी और वामपंथी धूर्तों द्वारा लिखे झूठे इतिहास को अपने शिक्षा पाठ्यक्रम से बाहर कर कूड़ेदान में डाला जाये और ऐतिहासिक तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर वास्तविक गौरवशाली इतिहास को पढ़ाया जाये।
साभार

आचार्य अशोक

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लीलावती


गणित विद्या की 12 वी शताब्दी की महान आचार्या : #लीलावती
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महान गणितज्ञ लीलावती के नाम से अधिकांश लोग परीचित नहीं हैं। आज विश्व के सैंकड़ो देश जिस गणित की महान पुस्तक से गणित को पढ़ा रहे हैं, उसकी रचयिता गणितज्ञ भास्कराचार्य हैं, जो कि उनकी बेटी महान विदुषी गणितज्ञा लीलावती के नाम पर रखा गया था। लीलावती पेड़ के पत्ते तक गिन लेती थीं।
भारतवर्ष में गणित की जड़ें बहुत पुरानी और गहरी हैं। 12 वी शताब्दी में लीलावती नाम की महिला जानी-मानी गणितज्ञ थीं।
जहाँ आज भारतीय नारी समाज में अपनी जगह बनाने में लगी हैं और फिर से अपने को स्थापित करने में लगी हैं, वहीं प्राचीन काल में भारतीय नारी प्रायः सभी विषयों में रूचि लेती थी. सिर्फ रूचि ही नहीं, वो उन विषयों की सभाओ में तर्क-वितर्क करने के लिए भाग लेती थीं। लीलावती गणित विद्या की आचार्या थीं. जिस समय पाश्चात्य लोग शायद पढ़ने-लिखने की कल्पना तक नहीं करते थे, उस समय उसने गणित के ऐसे-ऐसे सिद्धांत सोच डाले, जिन पर आधुनिक गणितज्ञों की भी बुद्धि चकरा जाती है।

लीलावती दुर्भाग्यवश शीघ्र ही वैधव्य को प्राप्त हो गई थी। इस आकस्मिक घटना से पिता और पुत्री दोनों के धैर्य का बांध टूट गया। लीलावती अपने पिता के घर में ही रहने लगी। पुत्री का दु:ख दूर करने के लिए उनके पिता भास्कराचार्य ने उसे गणित पढ़ाना आरंभ किया। उसने भी गणित के अध्ययन में ही शेष जीवन की उपयोगिता समझी। थोड़े ही दिनों में वह उक्त विषय में पूर्ण पंडिता हो गई।
भास्कराचार्य ने अपनी बेटी लीलावती को गणित सिखाने के लिए गणित के ऐसे सूत्र निकाले थे जो काव्य में होते थे। वे सूत्र कंठस्थ करना होते थे। उसके बाद उन सूत्रों का उपयोग करके गणित के प्रश्न हल करवाए जाते थे। कंठस्थ करने के पहले भास्कराचार्य लीलावती को सरल भाषा में, धीरे-धीरे समझा देते थे। वे बच्ची को प्यार से संबोधित करते चलते थे, “हिरन जैसे नयनों वाली प्यारी बिटिया लीलावती, ये जो सूत्र हैं…।” बेटी को पढ़ाने की इसी शैली का उपयोग करके भास्कराचार्य ने गणित का एक महान ग्रंथ लिखा, उस ग्रंथ का नाम ही उन्होंने “लीलावती” रख दिया।
आजकल गणित एक शुष्क विषय माना जाता है, पर भास्कराचार्य का ग्रंथ ‘लीलावती‘ गणित को भी आनंद के साथ मनोरंजन, जिज्ञासा आदि का सम्मिश्रण करते हुए कैसे पढ़ाया जा सकता है, इसका उत्कृष्ट नमूना है। लीलावती का एक उदाहरण देखें- ‘निर्मल कमलों के एक समूह के तृतीयांश, पंचमांश तथा षष्ठमांश से क्रमश: शिव, विष्णु और सूर्य की पूजा की, चतुर्थांश से पार्वती की और शेष छ: कमलों से गुरु चरणों की पूजा की गई। अये, बाले लीलावती, शीघ्र बता कि उस कमल समूह में कुल कितने फूल थे..?’
लीलावती ने उत्तर दिया ‘१२० कमल के फूल।’
“पिताजी, यह पृथ्वी, जिस पर हम निवास करते हैं, किस पर टिकी हुई है?” लीलावती ने शताब्दियों पूर्व यह प्रश्न अपने पिता भास्कराचार्य से पूछा था।
इसके उत्तर में भास्कराचार्य ने कहा, “बाले लीलावती, कुछ लोग जो यह कहते हैं कि यह पृथ्वी शेषनाग, कछुआ या हाथी या अन्य किसी वस्तु पर आधारित है, तो वे गलत कहते हैं। यदि यह मान भी लिया जाए कि यह किसी वस्तु पर टिकी हुई है, तो भी प्रश्न बना रहता है कि वह वस्तु किस पर टिकी हुई है और इस प्रकार कारण का कारण और फिर उसका कारण…यह क्रम चलता रहा, तो न्यायशास्त्र में इसे अनवस्था-दोष कहते हैं। लीलावती ने कहा-‘फिर भी यह प्रश्न रहता है पिताजी कि पृथ्वी किस चीज पर टिकी है?’ तब भास्कराचार्य ने कहा, ‘क्या हम यह नहीं मान सकते कि पृथ्वी किसी भी वस्तु पर आधारित नहीं है।….. यदि हम यह कहें कि पृथ्वी अपने ही बल से टिकी है और इसे धारणात्मिका शक्ति कह दें तो क्या दोष है?’ इस पर लीलावती ने पूछा यह कैसे संभव है?
तब भास्कराचार्य सिद्धान्त की बात कहते हैं कि वस्तुओं की शक्ति बड़ी विचित्र है-मरुच्लो भूरचला स्वभावतो यतो विचित्रावतवस्तु शक्त्य:।।(सिद्धांत शिरोमणी गोलाध्याय-भुवनकोश।) आगे कहते हैं-आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं
गुरुस्वाभिमुखं स्वशक्तत्या।आकृष्यते तत्पततीव भाति समेसमन्तात् क्व पतत्वियंखे।। (सिद्धांत शिरोमणी गोलाध्याय-भुवनकोश।) अर्थात् पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर खींचती है और आकर्षण के कारण वह जमीन पर गिरते हैं, पर जब आकाश में समान ताकत चारों ओर से लगे, तो कोई कैसे गिरे? अर्थात् आकाश में ग्रह निरावलम्ब रहते हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरुत्व शक्तियां संतुलन बनाए रखती हैं।
उपरोक्त श्लोकों को श्रीभास्कराचार्य जी ने अपनी आत्मजा के नाम पर स्वरचित ग्रंन्थ “लीलावती” में संकलित किया था और वे स्वयं इस महान ग्रन्थ को वैदिक साहित्य से सम्बद्ध मानते है।

यह विडंबना है कि आजकल हम अपने अतीत को भुलाकर यह मानकर बैठे हैं कि न्यूटन ने ही सर्वप्रथम गुरुत्वाकर्षण की खोज की, परन्तु भास्कराचार्य ( 1114-1185 ) ने यह वैदिक दर्शन के आधार पर बता दिया था।
भास्कराचार्य जितने उच्चकोटि के वैज्ञानिक गणितज्ञ थे, उसी प्रकार उनकी पुत्री लीलावती भी विदुषी थीं, जिनको गढ़ने का श्रेय उनके पिता को ही जाता है। आज की युवा पीढ़ी को ऐसे कर्मठ विद्वान-विदुषी पिता-पुत्री से अवश्य ही प्रेरणा लेनी चाहिए।
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आचार्य अशोक

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हम होंगे कामयाब

काश्मीरी हिन्दू अगर काश्मीर वापस जाएँगे तो वहाँ कैसे रहेंगे? 98% जनसँख्या जो आपके अस्तित्व sसे घृणा करती हो, उसके बीच में आप कैसे रहेंगे.
एक उदाहरण याद आता है…जैसे यहूदी फिलिस्तीन में अरबों के बीच जीवित रहे, लड़े और अपने लिए एक इस्राएल बनाया.
फिर ले दे कर बात इसपर आती है कि हम यहूदियों जैसे नहीं हैं…

पर यहूदी हमेशा ऐसे नहीं थे जैसे आज हैं. यहूदी 1500 सालों तक फिलिस्तीनियों से मार खाकर भागे रहे. अपना एक मुल्क नहीं था. यहूदी पूरी दुनिया में फैला रहा, उसे सिर्फ अपने पैसे कमाने से मतलब रहा. दुनिया की सबसे पढ़ी-लिखी और संपन्न कौम होने के बावजूद यहूदी पूरी दुनिया की घृणा और वितृष्णा का पात्र रहा. और यहूदी भी तब तक नहीं जागे जब तक उनका अस्तित्व खतरे में नहीं आ गया. हिटलर अकेला उन्हें नहीं मार रहा था, पूरा यूरोप उनके मार खाने पर खुश था.
इंग्लैंड की विदेश नीति में द्वितीय विश्व युद्ध तक यहूदियों के लिए कोई सहानुभूति नहीं थी. आपने अगर लॉरेंस ऑफ़ अरबिया फिल्म देखी हो तो याद होगा…पहले विश्वयुद्ध में अंग्रेजों और अरबों में बहुत याराना था. यह दूसरे विश्वयुद्ध तक चला, और जब दुनिया भर के यहूदी फिलिस्तीन में छुप कर सर्वाइव करने का प्रयास कर रहे थे तब भी सरकारी ब्रिटिश नीति अरबों के पक्ष में थी. उस समय एक अँगरेज़ फौजी अफसर फिलिस्तीन में इंटेलिजेंस ऑफिसर बन कर आया. नाम था कैप्टेन ऑर्ड विनगेट. विनगेट एक अजीब सी, पर असाधारण शख्सियत था. वह एक इन्फेंट्री जीनियस था. व्यक्तिगत रूप से उसे यहूदियों से बहुत सहानुभूति थी. और सरकारी ब्रिटिश नीति के विरुद्ध जाकर उसने यहूदियों को एकत्र करना और उन्हें लड़ाई के लिए तैयार करना शुरू किया. बेन गुरिएन, ज़्वी ब्रेनर और मोशे दयान जैसे भविष्य के इसरायली मिलिट्री लीडर उसके शिष्य बने. विनगेट ने इस्राएलियों को उनकी यह आक्रामक नीति दी...उसके पहले इसरायली कैम्पों में बैठे रक्षात्मक मोर्चे लिए रहते थे. अरब गैंग आते और उनपर हमले करके चले जाते, इसरायली सिर्फ जरूरत भर रक्षात्मक कार्रवाई करते थे. एक दिन विनगेट ने ज़्वी ब्रेनर से बात करते हुए पूछा - तुम्हें पता है, इन पहाड़ियों के पार जो अरब हैं, वे तुम्हारे खून के प्यासे हैं...एक दिन ये आएंगे और तुम्हारा अस्तित्व मिटा देंगे? ब्रेनर ने कहा - वे यह आसानी से नहीं कर पाएंगे...हम बहादुरी से उनका मुकाबला करेंगे...

विनगेट ब्रेनर पर बरस पड़ा – तुम यहूदी भी ना, masochist (आत्मपीड़क) हो…तुम कहते हो – आओ, मुझे मारो…जब तक वह तुम्हारे भाई का क़त्ल नहीं कर दे, तुम्हारी बहन का रेप नहीं कर दे, तुम्हारे माँ-बाप को नाले में नहीं फेंक दे, तुम हाथ नहीं उठाओगे…
तुम लड़ कर जीत सकते हो, पर मैं तुम्हें सिखाऊंगा कि लड़ना कैसे है…
फिर विनगेट ने यहूदियों की टुकड़ियों का कई सैनिक अभियानों में नेतृत्व किया. वह अरब ठिकानों का पता लगाता, उनपर घात लगा कर हमला करता, उन्हें बेरहमी से मार डालता और कई बार अरबों की लाशें लॉरी में लादकर फिलिस्तीनी पुलिस स्टेशन के सामने फेंक आता…
विनगेट ने यहूदियों की मिलिट्री स्ट्रेटेजी ही नहीं, उनकी मानसिक अवस्था बदल दी. उन्हें रक्षात्मक से आक्रामक बनाया…इजराइल को मोशे दयान जैसे जनरल तैयार करके दिए…विनगेट अकेला एक ऐसा गैर-यहूदी है जिसकी मूर्ति इजराइल में लगाई गई है… आप भेड़ियों के बीच में भेड़ बनकर नहीं जी सकते. जान पर बनती है तो भेंड़ बना यहूदियों का झुण्ड इजराइल बन कर शेर की तरह रहना सीख लेता है...तो हम तो भरत वंशी हैं जिनका बचपन ही सिंह शावकों के साथ बीता था...

🌹👍👍जय👍भवानी👍👍🌹

आचार्य अशोक