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श्रीकृष्ण ने लड़े थे ये 10 प्रमुख युद्ध…

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में कई युद्धों का संचालन किया।कहना चाहिए कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में युद्ध ही युद्ध किए। श्रीकृष्ण की जो रसिक बिहारी की छवि ‍निर्मित हुई, वह मध्यकाल के भक्त कवियों द्वारा निर्मित की गई है, क्योंकि वे अपने आराध्य को हिंसक मानने के लिए तैयार नहीं थे।

मध्यकाल के भक्तों ने श्रीकृष्ण के संबंध में कई मनगढ़ंत बातों का प्रचार किया और महाभारत के कृष्ण की छवि को पूर्णत: बदलकर रख दिया। उन्होंने कृष्ण के साथ राधा का नाम जोड़कर दोनों को प्रेमी और प्रेमिका बना दिया। उनका यह रूप आज भी जनमानस में व्यापक रूप से प्रचलित है।

श्रीकृष्ण की प्रेमिका राधा का जिक्र महाभारत में कहीं भी नहीं मिलता है। इसके अलावा सबसे पुराने हरिवंश और विष्णु पुराण में भी राधा का जिक्र नहीं मिलता। भागवत पुराण में भी राधा का जिक्र नहीं है। दरअसल, ब्रह्मवैवर्त पुराण, गीत गोविंद और जनश्रुतियों में इसका जिक्र है। इसी के आधार पर भक्तिकाल के कवियों ने तिल का ताड़ बना दिया। ब्रह्मवैवर्त पुराण गुप्तकाल में लिखा गया माना जाता है।

खैर, हालांकि भगवान कृष्ण ने यूं तो कई असुरों का वध किया जिनमें पूतना,शकटासुर,कालिया,यमुलार्जन, धेनुक, प्रलंब, अरिष्ठ आदि। लेकिन हम आपको बताएंगे कि श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में कौन-कौन से युद्ध लड़े या उनका संचालन किया। उनमें से भी प्रमुख कौन से हैं। आओ जानते हैं, श्रीकृष्ण के प्रमुख 10 युद्धों के बारे में जानकारी…

युद्ध के बारे में जानने से पहले जानते हैं श्रीकृष्ण की शक्ति के स्रोत…

श्रीकृष्ण की शक्ति के स्रोत : भगवान श्रीकृष्ण 64 कलाओं में दक्ष थे। एक ओर वे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे तो दूसरी ओर वे द्वंद्व युद्ध में भी माहिर थे। इसके अलावा उनके पास कई अस्त्र और शस्त्र थे। उनके धनुष का नाम ‘सारंग’ था। उनके खड्ग का नाम ‘नंदक’, गदा का नाम ‘कौमौदकी’ और शंख का नाम ‘पांचजञ्य’ था, जो गुलाबी रंग का था। श्रीकृष्ण के पास जो रथ था उसका नाम ‘जैत्र’ दूसरे का नाम ‘गरुढ़ध्वज’ था। उनके सारथी का नाम दारुक था और उनके अश्वों का नाम शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक था।

श्रीकृष्ण के पास कई प्रकार के दिव्यास्त्र थे। भगवान परशुराम ने उनको सुदर्शन चक्र प्रदान किया था, तो दूसरी ओर वे पाशुपतास्त्र चलाना भी जानते थे। पाशुपतास्त्र शिव के बाद श्रीकृष्ण और अर्जुन के पास ही था। इसके अलावा उनके पास प्रस्वपास्त्र भी था, जो शिव, वसुगण, भीष्म के पास ही था।

कंस से युद्ध : कंस से युद्ध तो श्रीकृष्‍ण ने जन्म लेते ही शुरू कर दिया था। कंस के कारण ही तो श्रीकृष्ण को ताड़का, पूतना, शकटासुर आदि का बचपन में ही वध करना पड़ा। भगवान कृष्ण का मामा था कंस। वह अपने पिता उग्रसेन को राजपद से हटाकर स्वयं शूरसेन जनपद का राजा बन बैठा था। कंस बेहद क्रूर था। कंस अपने पूर्व जन्म में ‘कालनेमि’ नामक असुर था जिसे भगवान विष्णु अवतार श्रीराम ने मारा था।

कंस के काका शूरसेन का मथुरा पर राज था और शूरसेन के पुत्र वसुदेव का विवाह कंस की बहन देवकी से हुआ था। कंस अपनी चचेरी बहन देवकी से बहुत स्नेह रखता था, लेकिन एक दिन वह देवकी के साथ रथ पर कहीं जा रहा था, तभी आकाशवाणी सुनाई पड़ी- ‘जिसे तू चाहता है, उस देवकी का 8वां बालक तुझे मार डालेगा।’ बस इसी भविष्यवाणी ने कंस का दिमाग घुमा दिया।

कंस ने अपनी बहन और बहनोई वसुदेव को जेल में डाल दिया। बाद में कंस ने 1-1 करके देवकी के 6 बेटों को जन्म लेते ही मार डाला। 7वें गर्भ में श्रीशेष (अनंत) ने प्रवेश किया था। भगवान विष्णु ने श्रीशेष को बचाने के लिए योगमाया से देवकी का गर्भ ब्रजनिवासिनी वसुदेव की पत्नी रोहिणी के उदर में रखवा दिया। तदनंतर 8वें बेटे की बारी में श्रीहरि ने स्वयं देवकी के उदर से पूर्णावतार लिया। कृष्ण के जन्म लेते ही माया के प्रभाव से सभी संतरी सो गए और जेल के दरवाजे अपने आप खुलते गए। वसुदेव मथुरा की जेल से शिशु कृष्ण को लेकर नंद के घर पहुंच गए।

बाद में कंस को जब पता चला तो उसके मंत्रियों ने अपने प्रदेश के सभी नवजात शिशुओं को मारना प्रारंभ कर दिया। बाद में उसे कृष्ण के नंद के घर होने के पता चला तो उसने अनेक आसुरी प्रवृत्ति वाले लोगों से कृष्ण को मरवाना चाहा, पर सभी कृष्ण तथा बलराम के हाथों मारे गए।

तब योजना अनुसार कंस ने एक समारोह के अवसर पर कृष्ण तथा बलराम को आमंत्रित किया। वह वहीं पर कृष्ण को मारना चाहता था, किंतु कृष्ण ने उस समारोह में कंस को बालों से पकड़कर उसकी गद्दी से खींचकर उसे भूमि पर पटक दिया और इसके बाद उसका वध कर दिया। कंस को मारने के बाद देवकी तथा वसुदेव को मुक्त किया और उन्होंने माता-पिता के चरणों में वंदना की।

जरासंध से युद्ध : कंस वध के बाद जरासंध से तो कृष्ण ने कई बार युद्ध किया। जरासंध कंस का ससुर था इसलिए उसने श्रीकृष्ण को मारने के लिए मथुरा पर कई बार आक्रमण किया। जरासंध मगध का अत्यंत क्रूर एवं साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का शासक था। हरिवंश पुराण के अनुसार उसने काशी, कोशल, चेदि, मालवा, विदेह, अंग, वंग, कलिंग, पांडय, सौबिर, मद्र, कश्मीर और गांधार के राजाओं को परास्त कर सभी को अपने अधीन बना लिया था। इसी कारण पुराणों में जरासंध की बहुत चर्चा मिलती है।

जरासंध ने पूरे दल-बल के साथ शूरसेन जनपद (मथुरा) पर एक बार नहीं, कई बार चढ़ाई की, लेकिन हर बार वह असफल रहा। पुराणों के अनुसार जरासंध ने 18 बार मथुरा पर चढ़ाई की। 17 बार वह असफल रहा। अंतिम चढ़ाई में उसने एक विदेशी शक्तिशाली शासक कालयवन को भी मथुरा पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया।

जरासंध के कई साथी राजा थे- कामरूप का राजा दंतवक, चेदिराज शिशुपाल, कलिंगपति पौंड्र, भीष्मक पुत्र रुक्मी, काध अंशुमान तथा अंग, बंग, कोशल, दषार्ण, भद्र, त्रिगर्त आदि के राजा थे। इनके अतिरिक्त शाल्वराज, पवनदेश का राजा भगदत्त, सौवीरराज, गांधार का राजा सुबल, नग्नजित का राजा मीर, दरद देश का राजा गोभर्द आदि। महाभारत युद्ध से पहले भीम ने जरासंध के शरीर को 2 हिस्सों में विभक्त कर उसका वध कर दिया था।

कालयवन से युद्ध : पुराणों के अनुसार जरासंध ने 18 बार मथुरा पर चढ़ाई की। 17 बार वह असफल रहा। अंतिम चढ़ाई में उसने एक विदेशी शक्तिशाली शासक कालयवन को भी मथुरा पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया।

कालयवन की सेना ने मथुरा को घेर लिया। उसने मथुरा नरेश के नाम संदेश भेजा और युद्ध के लिए एक दिन का समय दिया। श्रीकृष्ण ने उत्तर में भेजा कि युद्ध केवल कृष्ण और कालयवन में हो, सेना को व्यर्थ क्यूं लड़ाएं? कालयवन ने स्वीकार कर लिया। ऐसा कहा जाता है कि इसी युद्ध के बाद श्रीकृष्ण का नाम रणछोड़ पड़ा।

कृष्ण और कालयवन का युद्ध हुआ और कृष्‍ण रण की भूमि छोड़कर भागने लगे, तो कालयवन भी उनके पीछे भागा। भागते-भागते कृष्ण एक गुफा में चले गए। कालयवन भी वहीं घुस गया। गुफा में कालयवन ने एक दूसरे मनुष्य को सोते हुए देखा। कालयवन ने उसे कृष्ण समझकर कसकर लात मार दी और वह मनुष्य उठ पड़ा।

उसने जैसे ही आंखें खोली और इधर-उधर देखने लगे, तब सामने उसे कालयवन दिखाई दिया। कालयवन उसके देखने से तत्काल ही जलकर भस्म हो गया। कालयवन को जो पुरुष गुफा में सोए मिले, वे इक्ष्वाकु वंशी महाराजा मांधाता के पुत्र राजा मुचुकुन्द थे, जो तपस्वी और प्रतापी थे।

कृष्ण और अर्जुन का युद्ध : कहते हैं कि एक बार श्रीकृष्ण और अर्जुन में द्वंद्व युद्ध हुआ था। यह श्रीकृष्ण के जीवन का भयंकर द्वंद्व युद्ध था। माना जाता है कि यह युद्ध कृष्ण की बहन सुभद्रा की प्रतिज्ञा के कारण हुआ था।

अंत में इस युद्ध में दोनों ने अपने-अपने सबसे विनाशक शस्त्र क्रमशः सुदर्शन चक्र और पाशुपतास्त्र निकाल लिए थे, लेकिन देवताओं के हस्तक्षेप करने से ही वे दोनों शांत हुए थे।

शिव और कृष्ण का जीवाणु युद्ध : माना जाता है कि कृष्ण ने असम में बाणासुर और भगवान शिव से युद्ध के समय ‘माहेश्वर ज्वर’ के विरुद्ध ‘वैष्णव ज्वर’ का प्रयोग कर विश्व का प्रथम ‘जीवाणु युद्ध’ लड़ा था।

बलि के 10 पुत्रों में ज्येष्ठ पुत्र का नाम बाण था। बाण ने घोर तपस्या के फलस्वरूप शिव से अनेक दुर्लभ वर प्राप्त किए थे। वह शोणितपुर पर राज्य करता था। बाणासुर को भगवान शिव ने अपना पुत्र माना था इसलिए उन्होंने उसकी जान बचाने के लिए श्रीकृष्ण से युद्ध किया था। बाणासुर अहंकारी, महापापी और अधर्मी था।

कहते हैं कि इस युद्ध में श्रीकृष्ण ने शिव पर जृंभास्त्र का प्रयोग किया था। इस युद्ध में बाणासुर की जान बचाने की लिए स्वयं मां पार्वती जब सामने आकर खड़ी हो गईं, तब श्रीकृष्ण ने बाणासुर को अभयदान दिया।

युद्ध का कारण : दरअसल, बाणासुर की सुंदर कन्या उषा को अनिरुद्ध अपना दिल दे बैठे थे। श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न का पुत्र अनिरुद्ध था। बाणासुर को जब यह पता चला तो उसने अनिरुद्ध और उषा दोनों को कारागार में डाल दिया। नारद ने श्रीकृष्ण से जाकर कहा- ‘आपके पौत्र अनिरुद्ध को बाणासुर ने कारागार में डाल दिया है।’ श्रीकृष्ण ने बलराम तथा प्रद्युम्न के साथ बाणासुर पर आक्रमण कर दिया। अंत में सबको परास्त कर श्रीकृष्ण, उषा और अनिरुद्ध को लेकर द्वारका पहुंच गए।

नरकासुर से युद्ध : नरकासुर को भौमासुर भी कहा जाता है। कृष्ण अपनी आठों पत्नियों के साथ सुखपूर्वक द्वारिका में रह रहे थे। एक दिन स्वर्गलोक के राजा देवराज इंद्र ने आकर उनसे प्रार्थना की, ‘हे कृष्ण! प्रागज्योतिषपुर के दैत्यराज भौमासुर के अत्याचार से देवतागण त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। क्रूर भौमासुर ने वरुण का छत्र, अदिति के कुंडल और देवताओं की मणि छीन ली है और वह त्रिलोक विजयी हो गया है।’

इंद्र ने कहा, ‘भौमासुर ने पृथ्वी के कई राजाओं और आमजनों की अति सुन्दर कन्याओं का हरण कर उन्हें अपने यहां बंदीगृह में डाल रखा है। कृपया आप हमें बचाइए प्रभु।’

इंद्र की प्रार्थना स्वीकार कर के श्रीकृष्ण अपनी प्रिय पत्नी सत्यभामा को साथ लेकर गरूड़ पर सवार हो प्रागज्योतिषपुर पहुंचे। वहां पहुंचकर भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से सबसे पहले मुर दैत्य सहित मुर के 6 पुत्रों- ताम्र, अंतरिक्ष, श्रवण, विभावसु, नभश्वान और अरुण का संहार किया।

मुर दैत्य का वध हो जाने का समाचार सुन भौमासुर अपने अनेक सेनापतियों और दैत्यों की सेना को साथ लेकर युद्ध के लिए निकला। भौमासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया और घोर युद्ध के बाद अंत में कृष्ण ने सत्यभामा की सहायता से उसका वध कर डाला।

इस प्रकार भौमासुर को मारकर श्रीकृष्ण ने उसके पुत्र भगदत्त को अभयदान देकर उसे प्रागज्योतिष का राजा बनाया। भौमासुर द्वारा हरण कर लाई गईं 16,100 कन्याओं को श्रीकृष्ण ने मुक्त कर दिया।

ये सभी अपहृत नारियां थीं या फिर भय के कारण उपहार में दी गई थीं और किसी और माध्यम से उस कारागार में लाई गई थीं। वे सभी भौमासुर द्वारा पीड़ित थीं, दुखी थीं, अपमानित, लांछित और कलंकित थीं।

सामाजिक मान्यताओं के चलते भौमासुर द्वारा बंधक बनाकर रखी गईं इन नारियों को कोई भी अपनाने को तैयार नहीं था, तब अंत में श्रीकृष्ण ने सभी को आश्रय दिया और उन सभी कन्याओं ने श्रीकृष्ण को पति रूप में स्वीकार किया। उन सभी को श्रीकृष्ण अपने साथ द्वारिकापुरी ले आए। वहां वे सभी कन्याएं स्वतंत्रतापूर्वक अपनी इच्छानुसार सम्मानपूर्वक रहती थीं।

श्रीकृष्ण ने कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर किया था। इसी दिन की याद में दीपावली के ठीक एक दिन पूर्व नरक चतुर्दशी मनाई जाने लगी। मान्यता है कि नरकासुर की मृत्यु होने से उस दिन शुभ आत्माओं को मुक्ति मिली थी।

महाभारत युद्ध : महाभारत का युद्ध 22 नवंबर 3067 ईसा पूर्व हुआ था। तब श्रीकृष्ण 55 या 56 वर्ष के थे। हालांकि कुछ विद्वान मानते हैं कि उनकी उम्र 83 वर्ष की थी। महाभारत युद्ध के 36 वर्ष बाद उन्होंने देह त्याग दी थी। इसका मतलब 119 वर्ष की आयु में उन्होंने देहत्याग किया था। आर्यभट्‍ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ईपू में हुआ। श्रीकृष्ण ने यह युद्ध नहीं लड़ा था लेकिन उन्होंने इस युद्ध का संचालन जरूर किया था।

माना जाता है कि महाभारत युद्ध में एकमात्र जीवित बचा कौरव युयुत्सु था और 24,165 कौरव सैनिक लापता हो गए थे। लव और कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए, ‍जो महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे। कलियुग के आरंभ होने से 6 माह पूर्व मार्गशीर्ष शुक्ल 14 को महाभारत का युद्ध का आरंभ हुआ था, जो 18 दिनों तक चला था। इस युद्ध में ही श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था।

चाणूर और मुष्टिक से युद्ध : श्रीकृष्‍ण ने 16 वर्ष की उम्र में चाणूर और मुष्टिक जैसे मल्लों का वध किया था। मथुरा में दुष्ट रजक के सिर को हथेली के प्रहार से काट दिया था। कहते हैं कि यह मार्शल आर्ट की विद्या थी। पूर्व में इस विद्या का नाम कलारिपट्टू था।

जनश्रुतियों के अनुसार श्रीकृष्ण ने मार्शल आर्ट का विकास ब्रज क्षेत्र के वनों में किया था। डांडिया रास उसी का एक नृत्य रूप है। कलारिपट्टू विद्या के प्रथम आचार्य श्रीकृष्ण को ही माना जाता है। इसी कारण ‘नारायणी सेना’ भारत की सबसे भयंकर प्रहारक सेना बन गई थी।

श्रीकृष्ण ने ही कलारिपट्टू की नींव रखी, जो बाद में बोधिधर्मन से होते हुए आधुनिक मार्शल आर्ट में विकसित हुई। बोधिधर्मन के कारण ही यह विद्या चीन, जापान आदि बौद्ध राष्ट्रों में खूब फली-फूली।

कृष्ण-जाम्बवंत युद्ध : भगवान श्रीकृष्ण का जाम्बवंत से द्वंद्व युद्ध हुआ था। जाम्बवंत रामायण काल में थे और उनको अजर-अमर माना जाता है। उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम जाम्बवती था। जाम्बवंतजी से भगवान श्रीकृष्ण को स्यमंतक मणि के लिए युद्ध करना पड़ा था। उन्होंने मणि के लिए नहीं, बल्कि खुद पर लगे मणि चोरी के आरोप को असिद्ध करने के लिए जाम्बवंत से युद्ध करना पड़ा था। दरअसल, यह मणि भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा के पिता सत्राजित के पास थी और उन्हें यह मणि भगवान सूर्य ने दी थी।

सत्राजित ने यह मणि अपने देवघर में रखी थी। वहां से वह मणि पहनकर उनका भाई प्रसेनजित आखेट के लिए चला गया। जंगल में उसे और उसके घोड़े को एक सिंह ने मार दिया और मणि अपने पास रख ली। सिंह के पास मणि देखकर जाम्बवंत ने सिंह को मारकर मणि उससे ले ली और उस मणि को लेकर वे अपनी गुफा में चले गए, जहां उन्होंने इसको खिलौने के रूप में अपने पुत्र को दे दी। इधर सत्राजित ने श्रीकृष्ण पर आरोप लगा दिया कि यह मणि उन्होंने चुराई है।

तब श्रीकृष्ण को यह मणि हासिल करने के लिए जाम्बवंत से युद्ध करना पड़ा। बाद में जाम्बवंत जब युद्ध में हारने लगे तब उन्होंने अपने प्रभु श्रीराम को पुकारा और उनकी पुकार सुनकर श्रीकृष्ण को अपने राम स्वरूप में आना पड़ा। तब जाम्बवंत ने समर्पण कर अपनी भूल स्वीकारी और उन्होंने मणि भी दी और श्रीकृष्ण से निवेदन किया कि आप मेरी पुत्री जाम्बवती से विवाह करें।

जाम्बवती-कृष्ण के संयोग से महाप्रतापी पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम साम्ब रखा गया। इस साम्ब के कारण ही कृष्ण कुल का नाश हो गया था। श्रीकृष्ण ने कहा कि कोई ब्रह्मचारी और संयमी व्यक्ति ही इस मणि को धरोहर के रूप में रखने का अधिकारी है अत: श्रीकृष्ण ने वह मणि अक्रूरजी को दे दी। उन्होंने कहा कि अक्रूर, इसे तुम ही अपने पास रखो। तुम जैसे पूर्ण संयमी के पास रहने में ही इस दिव्य मणि की शोभा है। श्रीकृष्ण की विनम्रता देखकर अक्रूर नतमस्तक हो उठे।

पौंड्रक-कृष्ण युद्ध : चुनार देश का प्राचीन नाम करुपदेश था। वहां के राजा का नाम पौंड्रक था। कुछ मानते हैं कि पुंड्र देश का राजा होने से इसे पौंड्रक कहते थे। कुछ मानते हैं कि वह काशी नरेश ही था। चेदि देश में यह ‘पुरुषोत्तम’ नाम से सुविख्यात था। इसके पिता का नाम वसुदेव था। इसलिए वह खुद को वासुदेव कहता था। यह द्रौपदी स्वयंवर में उपस्थित था। कौशिकी नदी के तट पर किरात, वंग एवं पुंड्र देशों पर इसका स्वामित्व था। यह मूर्ख एवं अविचारी था।

पौंड्रक को उसके मूर्ख और चापलूस मित्रों ने यह बताया कि असल में वही परमात्मा वासुदेव और वही विष्णु का अवतार है, मथुरा का राजा कृष्ण नहीं। कृष्ण तो ग्वाला है। पुराणों में उसके नकली कृष्ण का रूप धारण करने की कथा आती है।

राजा पौंड्रक नकली चक्र, शंख, तलवार, मोर मुकुट, कौस्तुभ मणि, पीले वस्त्र पहनकर खुद को कृष्ण कहता था। एक दिन उसने भगवान कृष्ण को यह संदेश भी भेजा था कि ‘पृथ्वी के समस्त लोगों पर अनुग्रह कर उनका उद्धार करने के लिए मैंने वासुदेव नाम से अवतार लिया है। भगवान वासुदेव का नाम एवं वेषधारण करने का अधिकार केवल मेरा है। इन चिह्रों पर तेरा कोई भी अधिकार नहीं है। तुम इन चिह्रों एवं नाम को तुरंत ही छोड़ दो, वरना युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।’

बहुत समय तक श्रीकृष्ण उसकी बातों और हरकतों को नजरअंदाज करते रहे, बाद में उसकी ये सब बातें अधिक सहन नहीं हुईं। उन्होंने प्रत्युत्तर भेजा, ‘तेरा संपूर्ण विनाश करके, मैं तेरे सारे गर्व का परिहार शीघ्र ही करूंगा।’

यह सुनकर पौंड्रक कृष्ण के विरुद्ध युद्ध की तैयारी शुरू करने लगा। अपने मित्र काशीराज की सहायता प्राप्त करने के लिए वह काशीनगर गया। यह सुनते ही कृष्ण ने ससैन्य काशीदेश पर आक्रमण किया।

कृष्ण आक्रमण कर रहे हैं- यह देखकर पौंड्रक और काशीराज अपनी-अपनी सेना लेकर नगर की सीमा पर आए। युद्ध के समय पौंड्रक ने शंख, चक्र, गदा, धनुष, वनमाला, रेशमी पीतांबर, उत्तरीय वस्त्र, मूल्यवान आभूषण आदि धारण किया था एवं वह गरूड़ पर आरूढ़ था।

नाटकीय ढंग से युद्धभूमि में प्रविष्ट हुए इस ‘नकली कृष्ण’ को देखकर भगवान कृष्ण को अत्यंत हंसी आई। इसके बाद युद्ध हुआ और पौंड्रक का वध कर श्रीकृष्ण पुन: द्वारिका चले गए।

बाद में बदले की भावना से पौंड्रक के पुत्र सुदक्षण ने कृष्ण का वध करने के लिए मारण-पुरश्चरण किया, लेकिन द्वारिका की ओर गई वह आग की लपट रूप कृत्या ही पुन: काशी में आकर सुदक्षणा की मौत का कारण बन गई। उसने काशी नरेश पुत्र सुदक्षण को ही भस्म कर दिया।
जय श्री राधे राधे….

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व्रज रज की गाथा


भगवान विष्णुजी के व्रज में कृष्ण रूप में अवतार लेने की बात जब देवताओं को पता लगी तो सभी बाल कृष्ण की लीला के साक्षी बनने को लालायित हो गये । देवताओं ने व्रज में कोई ग्वाला, कोई गोपी, कोई गाय, कोई मोर तो कोई तोते के रूप में जन्म ले लिया। कुछ देवता और ऋषि रह गए। वे सभी ब्रह्माजी के पास आये और कहने लगे कि ब्रह्मदेव आप ने हमें व्रज में क्यों नहीं भेजा ? आप कुछ भी करिये , किसी भी रूप में भेजिये । ब्रह्माजी बोले व्रज में जितने लोगों को भेजना संभव था उतने लोगों को भेज दिया है । अब व्रज में कोई भी जगह खाली नहीं बची है।

देवताओं ने अनुरोध किया प्रभु आप हमें ग्वाले ही बना दें । ब्रह्माजी बोले जितने लोगों को बनाना था उतनों को बना दिया और ग्वाले नहीं बना सकते । देवता बोले प्रभु ग्वाले नहीं बना सकते तो हमे बरसाने को गोपियां ही बना दें । ब्रह्माजी बोले अब गोपियों की भी जगह खाली नही है। देवता बोले गोपी नहीं बना सकते, ग्वाला नहीं बना सकते तो आप हमें गायें ही बना दें – ब्रह्माजी बोले गायें भी खूब बना दी हैं । अकेले नन्द बाबा के पास नौ लाख गायें हैं और अब गायें भी नहीं बना सकते ।देवता बोले प्रभु चलो मोर ही बना दें , नाच-नाच कर कान्हा को रिझाया करेंगे । ब्रह्माजी बोले मोर भी खूब बना दिये – इतने मोर बना दिये कि व्रज में समा नहीं पा रहे । उनके लिए अलग से मोर कुटी बनानी पड़ी । देवता बोले तो कोई तोता, मैना, चिड़िया, कबूतर, बंदर कुछ भी बना दीजिये । ब्रह्माजी बोले वो भी खूब बना दिये और पुरे पेड़ भरे हुए हैं पक्षियों से ।देवता बोले तो कोई पेड़-पौधा, लता-पता ही बना दें । ब्रह्मा जी बोले पेड़-पौधे, लता-पता भी मैंने इतने बना दिये कि सूर्यदेव मुझसे रुष्ट हैं – उनकी किरनें भी बड़ी कठिनाई से व्रज की धरती को स्पर्श करती हैं।

देवता बोले प्रभु कोई तो जगह दें। हमें भी व्रज में भेजिये तब ब्रह्मा जी बोले- कोई जगह खाली नहीं है। देवताओं ने हाथ जोड़ कर ब्रह्माजी से कहा , प्रभु ! अगर हम कोई जगह अपने लिए ढूंढ़ के ले आयें तो आप हम को व्रज में भेज देंगे ? ब्रह्माजी बोले – हाँ तुम अपने लिए कोई जगह ढूंढ़ के ले आओगे तो मैं तुम्हें व्रज में भेज दूंगा । देवताओं ने कहा- धुल और रेत कणों की तो कोई सीमा नहीं हो सकती और कुछ नहीं तो बालकृष्ण लल्ला के चरण पड़ने से ही हमारा कल्याण हो जाएगा – हम को व्रज में धूल रेत ही बना दें ।ब्रह्मा जी ने उनकी बात मान ली।

प्रसंग का मर्म

इसलिये जब भी व्रज जायें तो धूल और रेत से क्षमा मांग कर अपना पैर धरती पर रखें क्योंकि व्रज की रेत भी सामान्य नहीं है । वो रज तो देवी- देवता, ऋषि-मुनि ही हैं और विशेषतया “कान्हाजी के चरणारविन्दों के स्पर्श से” यह परम पावन हो गई है।
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कई बार अति सामान्य लगने वाले लोग भीतर से बहुत गहरे होते हैं…!!

एक राजमहल के द्वार पर एक वृद्ध भिखारी आया। द्वारपाल से उसने कहा, ‘भीतर जाकर राजा से कहो कि तुम्हारा भाई मिलने आया है।’ द्वारपाल ने समझा कि शायद कोई दूर के रिश्ते में राजा का भाई हो। सूचना मिलने पर राजा ने भिखारी को भीतर बुलाकर अपने पास बैठा लिया। उसने राजा से पूछा, ‘कहिए बड़े भाई! आपके क्या हालचाल हैं?’ राजा ने मुस्कराकर कहा, ‘मैं तो आनंद में हूं। आप कैसे हैं?’

भिखारी बोला, ‘मैं जरा संकट में हूं। जिस महल में रहता हूं, वह पुराना और जर्जर हो गया है। कभी भी टूटकर गिर सकता है। मेरे बत्तीस नौकर थे, वे भी एक एक कर चले गए। पांचों रानियां भी वृद्ध हो गईं। यह सुनकर राजा ने भिखारी को सौ रुपए देने का आदेश दिया। भिखारी ने सौ रुपए कम बताए, तो राजा ने कहा, ‘इस बार राज्य में सूखा पड़ा है।’

तब भिखारी बोला, ‘मेरे साथ सात समंदर पार चलिए। वहां सोने की खदानें हैं। मेरे पैर पड़ते ही समुद्र सूख जाएगा। मेरे पैरों की शक्ति तो आप देख ही चुके हैं।’ अब राजा ने भिखारी को एक हजार रुपए देने का आदेश दिया। भिखारी के जाने के बाद राजा बोला, ‘भिखारी बुद्धिमान था। भाग्य के दो पहलू होते हैं राजा व रंक। इस नाते उसने मुझे भाई कहा।

जर्जर महल से आशय उसके वृद्ध शरीर से था, बत्तीस नौकर दांत और पांच रानियां पंचेंद्रीय हैं। समुद्र के बहाने उसने मुझे उलाहना दिया कि राजमहल में उसके पैर रखते ही मेरा खजाना सूख गया, इसलिए मैं उसे सौ रुपए दे रहा हूं। उसकी बुद्धिमानी देखकर मैंने उसे हजार रुपए दिए और कल मैं उसे अपना सलाहकार नियुक्त करूंगा।’

कई बार अति सामान्य लगने वाले लोग भीतर से बहुत गहरे होते हैं, इसलिए व्यक्ति की परख उसके बाह्य रहन-सहन से नहीं बल्कि आचरण से करनी चाहिए।

जय श्री राम
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लता मगेशकरजी


लता जी का शरीर पूरा हो गया। कल सरस्वती पूजा थी, आज माँ विदा हो रही हैं। लगता है जैसे माँ सरस्वती इस बार अपनी सबसे प्रिय पुत्री को ले जाने ही स्वयं आयी थीं।
मृत्यु सदैव शोक का विषय नहीं होती। मृत्यु जीवन की पूर्णता है। लता जी का जीवन जितना सुन्दर रहा है, उनकी मृत्यु भी उतनी ही सुन्दर हुई है।
93 वर्ष का इतना सुन्दर और धार्मिक जीवन विरलों को ही प्राप्त होता है। लगभग पाँच पीढ़ियों ने उन्हें मंत्रमुग्ध हो कर सुना है, और हृदय से सम्मान दिया है।
उनके पिता ने जब अपने अंतिम समय में घर की बागडोर उनके हाथों में थमाई थी, तब उस तेरह वर्ष की नन्ही जान के कंधे पर छोटे छोटे चार बहन-भाइयों के पालन की जिम्मेवारी थी। लता जी ने अपना समस्त जीवन उन चारों को ही समर्पित कर दिया। और आज जब वे गयी हैं तो उनका परिवार भारत के सबसे सम्मानित प्रतिष्ठित परिवारों में से एक है। किसी भी व्यक्ति का जीवन इससे अधिक सफल क्या होगा?
भारत पिछले अस्सी वर्षों से लता जी के गीतों के साथ जी रहा है। हर्ष में, विषाद में,ईश्वर भक्ति में, राष्ट्र भक्ति में, प्रेम में, परिहास में… हर भाव में लता जी का स्वर हमारा स्वर बना है।
लता जी गाना गाते समय चप्पल नहीं पहनती थीं। गाना उनके लिए ईश्वर की पूजा करने जैसा ही था। कोई उनके घर जाता तो उसे अपने माता-पिता की तस्वीर और घर में बना अपने आराध्य का मन्दिर दिखातीं थीं। बस इन्ही तीन चीजों को विश्व को दिखाने लायक समझा था उन्होंने। सोच कर देखिये, कैसा दार्शनिक भाव है यह… इन तीन के अतिरिक्त सचमुच और कुछ महत्वपूर्ण नहीं होता संसार में। सब आते-जाते रहने वाली चीजें हैं।
कितना अद्भुत संयोग है कि अपने लगभग सत्तर वर्ष के गायन कैरियर में लगभग 36भाषाओं में हर रस/भाव के 50 हजार से भीअधिक गीत गाने वाली लता जी ने अपना पहले और अंतिम हिन्दी फिल्मी गीत के रूप में भगवान भजन ही गाया है। ‘ज्योति कलश छलके’ से ‘दाता सुन ले’ तक कि यात्रा का सौंदर्य यही है कि लताजी न कभी अपने कर्तव्य से डिगीं न अपने धर्म से! इस महान यात्रा के पूर्ण होने पर हमारा रोम रोम आपको प्रणाम करता है लता जी।

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संत नामदेव


नामदेवजी की अद्भुत परीक्षा!!!!!!!!!

पारस पत्थर की तरह गुरु का स्वभाव लोहे का सोना बनाना है । केवल भक्ति से नहीं बल्कि गुरु या संत की शरण में जाने से ही मनुष्य को सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है। संत विसोबा ने नामदेवजी को कैसे बनाया पारस—भक्ति कथा।

भारतीय परम्परा में गुरु सेवा से ही भक्ति की सिद्धि होती है । माता-पिता जन्म देने के कारण पूजनीय हैं किन्तु गुरु धर्म और अधर्म का ज्ञान कराने से अधिक पूजनीय है । गुरु के मार्गदर्शन से जीवन जीने की कला के साथ परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग भी दिखाई पड़ जाता है । मनुष्य चाहे जितनी साधना करे, वैराग्य भी धारण कर ले किन्तु जबतक किसी संत या गुरु की कृपा नहीं होती, तब तक मन और दृष्टिकोण शुद्ध नहीं हो पाता और भगवान की प्राप्ति भी नहीं हो पाती है । इसलिए समस्त भवरोगों की औषधि गुरु है ।

महाराष्ट्र के संतों में श्रीज्ञानेश्वरजी, नामदेव, मुक्ताबाई, गोरा कुम्हार, नरहरि सुनार, सांवता माली और विसोबा खेचर बहुत ऊंचे दर्जे के संत हुए हैं ।

नामदेवजी बचपन से ही श्रीविट्ठल (पण्ढरपुर के भगवान विट्ठल, इन्हें पाण्डुरंग व पण्ढरीनाथ भी कहते हैं, ये श्रीकृष्ण का ही स्वरूप हैं) के विग्रह की पूजा, श्रीविट्ठल के गुणगान और ‘विट्ठल’ नाम का जप किया करते थे ।
एक बार श्रीज्ञानेश्वरजी नामदेवजी को अपने साथ तीर्थयात्रा पर ले जाना चाहते थे ।

नामदेवजी ने कहा-‘आप पाण्डुरंग से आज्ञा दिला दें तो मैं चलूंगा ।’

श्रीज्ञानेश्वरजी ने जब भगवान विट्ठल से नामदेवजी को ले जाने की आज्ञा मांगी तो भगवान विट्ठल ने श्रीज्ञानेश्वरजी से कहा-‘नामदेव मेरा बड़ा लाड़ला है । मैं उसे अपने से क्षण भर के लिए भी दूर नहीं करना चाहता । तुम इसे ले जा सकते हो पर इसकी संभाल रखना ।’ऐसा कहकर स्वयं भगवान पाण्डुरंग ने नामदेवजी का हाथ श्रीज्ञानेश्वरजी को पकड़ा दिया ।

तीर्थयात्रा से लौटते समय श्रीज्ञानेश्वरजी, मुक्ताबाई व नामदेवजी आदि संत गोरा कुम्हार के घर ठहर गये । सभी भक्त मण्डली बैठी हुई थी । पास ही कुम्हार की एक थापी (डंडा) पड़ी हुई थी । मुक्ताबाई की दृष्टि उस थापी पर पड़ी।

संतों की परीक्षा करने के लिए मुक्ताबाई ने संत गोराजी से पूछा-‘चाचाजी (गोरा कुम्हार को सब चाचाजी कहते थे) ! यह क्या चीज है ?’

गोराजी ने उत्तर दिया-‘यह थापी है, इससे मिट्टी के घड़े ठोक कर यह देखा जाता है कि कौन-सा घड़ा कच्चा है और कौन सा पक्का ।’

मुक्ताबाई ने कहा-‘हम मनुष्य भी तो घड़े ही हैं, क्या इससे हम लोगों की भी कच्चाई-पक्काई मालूम हो सकती है ?’

गोराजी ने कहा-‘हां, हां, क्यों नहीं ।’

यह कह कर उन्होंने थापी उठाई और एक-एक संत के सिर पर थप कर देखने लगे ।

गोराजी थपते-थपते जब नामदेवजी के पास आये और उनके सिर पर थापी थपी तो उन्हें बहुत बुरा लगा । दूसरे भक्त तो यह कौतुक देखते रहे, पर नामदेवजी बिगड़ने लगे । ऊपर से नामदेवजी ने कुछ कहा नहीं पर उनका मुंह फूल गया ।

नामदेवजी को अभिमान था कि वे भगवान विट्ठल के प्यारे हैं और भगवान उनसे बातें भी करते हैं । उन्हें थापी से इस तरह संतों की परीक्षा करना अपना और भक्तों का अपमान लगा । उन्होंने अभिमानवश सोचा कि कहीं मिट्टी के बर्तन की भांति मेरी परीक्षा हो सकती है क्या ?

गोराजी ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा-‘भक्तों में सभी के भांडे (मस्तक) पक्के हैं पर नामदेव का घड़ा अभी कच्चा है ।’

यह सुनकर नामदेवजी बोले-‘तुम्हारा सिर ही कच्चा है । तुम्हें शिक्षा की आवश्यकता है ।’

गोराजी ने कहा-‘नामदेव ! तुम भक्त हो, पर अभी तुम्हारा अहंकार नहीं गया है । जब तक गुरु की शरण में नहीं जाओगे, तब तक ऐसे ही कच्चे रहोगे ।’

नामदेवजी का बड़ा दु:ख हुआ । वे जब पण्ढरपुर लौटकर आये, तब उन्होंने भगवान विट्ठल से अपना दु:ख निवेदन किया ।

नामदेवजी को भगवान ने स्वप्न में आदेश किया-‘नामदेव ! यदि मुक्ताबाई और गोराजी कहते हैं कि तेरा सिर कच्चा है, तो अवश्य तू कच्चा ही होगा । तुझे अभी तक सर्वव्यापक ब्रह्म के स्वरूप का अनुभव ही नहीं हुआ है । गोराजी का यह कहना तो सच है कि गुरु की शरण में जब तक नहीं जाओगे, तब तक कच्चे ही रहोगे । हम तो सदा तुम्हारे साथ हैं; पर तुम्हें किसी मनुष्य देहधारी महापुरुष को गुरु मानकर उसके सामने नत-मस्तक होना होगा, उसके चरणों में अपना अहंकार लीन करना होगा । तू मंगलवेढ़ा में रहने वाले मेरे भक्त विसोबा खेचर के पास जा, वह तुझे ज्ञान देगा।’

श्रीज्ञानेश्वरजी की संत मण्डली में विसोबा खेचर पीछे सम्मिलित हुए किन्तु योग का अभ्यास करने से वे सिद्ध महात्मा माने जाने लगे थे ।

भगवान की आज्ञा मान कर नामदेवजी विसोबा के पास आये । विसोबा पहले से ही जान गये थे कि नामदेव आ रहे हैं, अत: वे उन्हें शिक्षा देने के लिए एक मन्दिर में शिवलिंग पर पांव पसार कर सोये हुए थे ।

नामदेव को इससे बड़ा आश्चर्य हुआ । वे सोचने लगे कि जो व्यक्ति भगवान का अपमान कर रहा है, वह मुझे कौन-सी शिक्षा दे सकेगा ? नामदेवजी ने विसोबा से कहा कि वे शिवलिंग पर से पांव हटा लें ।

विसोबा ने कहा-‘नमिया ! मैं बूढ़ा हो गया हूँ । मुझसे पैर उठते नहीं । तू मेरे पांव उठाकर किसी ऐसे स्थान पर या ऐसी दिशा में रख दे, जहां शंकर का अस्तित्व ही न हो ।’

नामदेवजी विसोबा के पांव इधर-उधर करने लगे किन्तु वे जहां भी विसोबा का पांव रखते थे वहीं पर शिवलिंग प्रकट हो जाता था और इस प्रकार सारा मन्दिर शिवलिंग से भर गया । नामदेवजी यह देखकर आश्चर्य में पड़ गये और गुरु के चरणों में गिर पड़े ।

(सप्तकोटेश्वर मन्दिर में ये वही शिवलिंग है जिनके दर्शन संत विसोवा ने नामदेवजी को सब जगह भगवान की उपस्थिति दिखाने को कराये थे)

विसोबा ने उनसे कहा-‘तू वास्तव में अभी कच्चा ही है । सभी स्थानों में तू अब भी ईश्वर का दर्शन नहीं कर रहा है । संसार में भगवान सूक्ष्म रूप से हर जगह व्याप्त है । तू सभी जड़-चेतन में ईश्वर को निहार ।’

संत विसोबा खेचर ने जैसे ही अपना हाथ नामदेवजी के सिर पर रखा उन्हें सभी जगह भगवान पाण्डुरंग के दर्शन होने लगे।

इस प्रकार जब भक्ति और ज्ञान का साथ मिल गया तो नामदेव सभी में और सब जगह भगवान के दर्शन करने लगे । भगवान को केवल चन्दन पुष्प नैवेद्य अर्पण करना ही भक्ति नहीं है बल्कि सभी में भगवद्भाव रखना ही सच्ची भक्ति है । लोग एक-दूसरे से मिलने पर ‘राम-राम’ कहते हैं । इसका अर्थ यही है कि मुझमें और तुझमें सब में राम ही निहित हैं । यदि हम यह मानने लगें कि ईश्वर सर्वव्यापी (सब जगह और सभी में समाये हैं) है तो पाप करने के लिए न तो कोई स्थान ही मिलेगा और न ही कोई समय । घर भी वैकुण्ठ बन जायेगा।

संत नामदेव जी की जय।

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દિવાળીની શુમ્ભકામના



શુભ હોજો દિવાળી, સોની શુભ હોજો દિવાળી,
અમાસની અંધારી રાત્રિ, બની જજો અજવાળી ;
શુભ હોજો દિવાળી, સોની શુભ હોજો દિવાળી.
ગગન ગોખમાં ચંદ્ર નથી પણ ચમકી
રહ્યા
છે.
તારી,
ટમ ટમ ટમ ટમ ટમકતા તારા લાગે પ્યારા પ્યારા
નાનકડા દીવડા પણ દેતા અંધારાને ટાળી;
શુભ હોજો દિવાળી, સોની શુભ હોજો દિવાળી.
હિંદુ વરસના છેલ્લા દિનને ઊજવે છે સૌ હર્ષે,
શુભકામના એકબીજાને આપે નૂતન વર્ષે.
સૌ ઈચ્છે છે: સોનું જીવન બનજો વૈભવશાળી;
શુભ હોજો દિવાળી, સૌની
શુભ
હોજો દિવાળી.
હળીમળી સાથે રહેવાની પ્રતિજ્ઞા સૌ લેજો,
માનવ માત્રને શાંતિ કેરો શુભ સંદેશો દેજો.
સુખી થવાની છે ગુરુચાવી; અહમૂને દો ઓગાળી;
શુભ હોજો દિવાળી, સૌની શુભ હોજો દિવાળી.
અરવિંદ કરસનદાસ રૂખાણાં

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ગુજરાતી સાહિત્યની રચનાઓ . . . વાંચવી ગમશે . . .
બે કે ત્રણ લીટી ઘણું કહી જાય છે . . .

૧. સ્વપ્ન એટલે . . .
તારા વગર , , ,
તને મળવું . . . !!

૨. ” એક નફરત છે ” , , ,
જે લોકો
” એક પળમાં સમજી ” જાય છે , , ,
અને
” એક પ્રેમ છે ” , , ,
જેને ” સમજવામાં વર્ષો “
નીકળી જાય છે . . . !!

૩. ક્યાંક તડકો દેખાય તો કહેજોને . . .
રૂ જેવી હલકી અને ભીંજાઇ ગયેલી
ગેરસમજોને સૂકવવી છે . . . !!

૪. સંબંધોની ક્યારેય પરીક્ષા ન લેશો , , ,
સામેવાળા નાપાસ થશે તો તમે જ દુઃખી થશો . . . !!

૫. શિયાળો એટલે
સતત કોઇની “હુંફ ” ઇચ્છતી
એક પાગલ ઋતુ . . . !!

૬. મળીએ ત્યારે , , ,
આંખમાં હરખ . . .
અને
અલગ પડતી વેળાએ
આંખમાં થોડી ઝાકળ . . . !!

૭. અમુક રાતે
તમને ઊંઘ નથી આવતી , , ,
અને
અમુક રાતે
તમે સુવા નથી માંગતા . . . !!

૮. વેદના અને આનંદ વચ્ચે
આ ફેર છે , , ,

ક્યાંક અઢળક પણ ઓછું પડે , , ,
અને
ક્યાંક એક સ્મિત અઢળક થઈ પડે . . . !!

૯. સાંભળ્યું છે કે પ્લે સ્ટોરમાં બધું જ મળે છે , , ,

ચાલો, વિખરાયેલા સંબંધો સર્ચ કરીએ . . . !!

૧૦. પ્રેમ અને મોતની પસંદગી તો જુઓ , , ,

એકને હૃદય જોઈએ , , ,
તો
બીજાને ધબકારા . . . !!

૧૧. મેડીક્લેઈમ તો આખા શરીરનો હતો , , ,
પણ
ખાલી દિલ તુટ્યું હતું , , ,
એટલે
ક્લેઈમ પાસ ન થયો . . . !!

૧૨. ગરમ ચા જેવા મગજને ઠંડું કરવાનો ઉપાય . . .?

પ્રેમની પહોળી રકાબીમાં એને રેડી દેવો . . . !!

🌷🌹 🌷🌹🌷 🌹🌷

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भगवान का मंगल विधान


पुरानी बात है – कलकत्ते में सर कैलासचन्द्र वसु प्रसिद्ध डॉक्टर हो गये हैं। उनकी माता बीमार थीं।

एक दिन श्रीवसु महोदय ने देखा—माता की बीमारी बढ़ गयी है, कब प्राण चले जायँ, कुछ पता नहीं।

रात्रि का समय था। कैलास बाबू ने बड़ी नम्रता के साथ माताजी से पूछा- ‘माँ, तुम्हारे मन में किसी चीज की इच्छा हो तो बताओ, मैं उसे पूरी कर दूँ।’

माता कुछ देर चुप रहकर बोलीं- ‘बेटा! उस दिन मैंने बम्बई के अंजीर खाये थे। मेरी इच्छा है अंजीर मिल जायँ तो मैं खा लूँ।’

उन दिनों कलकत्ते के बाजार में हरे अंजीर नहीं मिलते थे। बम्बई से मँगाने में समय चाहिए था । हवाई जहाज थे नहीं। रेल के मार्ग से भी आजकल की अपेक्षा अधिक लगता था।

कैलास बाबू बड़े दुखी हो गये – माँ ने अन्तिम समय में एक चीज माँगी और मैं माँ की उस माँग को पूरी नहीं कर सका, इससे बढ़कर मेरे लिये दु:ख की बात और क्या होगी ? पर कुछ भी उपाय नहीं सूझा । रुपयों से मिलने वाली चीज होती तो कोई बात नहीं थी ।

कलकत्ते या बंगाल में कहीं अंजीर होते नहीं, बाजार में मिलते नहीं। बम्बई से आने में तीन दिन लगते हैं। टेलीफोन भी नहीं, जो सूचना दे दें। तब तक पता नहीं – माता जी जीवित रहें या नहीं, अथवा जीवित भी रहें तो खा सकें या नहीं। कैलास बाबू निराश होकर पड़ गये और मन-ही-मन रोते हुए कहने लगे—’हे भगवन्! क्या मैं इतना अभागा हूँ कि माँ की अन्तिम चाह को पूरी होते नहीं देखूँगा।’

रात के लगभग ग्यारह बजे किसी ने दरवाजा खोलने के लिये बाहर से आवाज दी।

डॉक्टर वसु ने समझा, किसी रोगी के यहाँ से बुलावा आया होगा। उनका चित्त बहुत खिन्न था।

उन्होंने कह दिया-‘इस समय मैं नहीं जा सकूँगा।

बाहर खड़े आदमी ने कहा- ‘मैं बुलाने नहीं आया हूँ, एक चीज लेकर आया हूँ-दरवाजा खोलिये।’

दरवाजा खोला गया। सुन्दर टोकरी हाथ में लिये एक दरबान ने भीतर आकर कहा-‘डॉक्टर साहब! हमारे बाबूजी अभी बम्बई से आये हैं, वे सबेरे ही रंगून चले जायँगे, उन्होंने यह अंजीर की टोकरी भेजी है, वे बम्बई से लाये हैं। मुझसे कहा है कि मैं सबेरे चला जाऊँगा अभी अंजीर दे आओ । इसीलिये मैं अभी लेकर आ गया। कष्ट के लिये क्षमा कीजियेगा ।’

कैलास बाबू अंजीर का नाम सुनते ही उछल पड़े। उन्हें उस समय कितना और कैसा अभूतपूर्व आनन्द हुआ, इसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता।

उनकी आँखों में हर्ष के आँसू आ गये, शरीर में आनन्द से रोमांच हो आया। अंजीर की टोकरी को लेकर वे माताजी के पास पहुँचे और बोले—‘माँ! लो – भगवान् ने अंजीर तुम्हारे लिये भेजे हैं।’

उस समय माता का प्रसन्न मुख देखकर कैलास बाबू इतने प्रसन्न हुए, मानो उन्हें जीवन का परम दुर्लभ महान् फल प्राप्त हो गया हो ।

बात यह थी, एक गुजराती सज्जन, जिनका फार्म कलकत्ते और रंगून में भी था, डॉक्टर कैलास बाबू के बड़े प्रेमी थे। वे जब-जब बम्बई से आते, तब अंजीर लाया करते थे। भगवान्‌ के मंगल विधान का आश्चर्य देखिये, कैलास बाबू की मरणासन्न माता आज रात को अंजीर चाहती है और उसकी चाह को पूर्ण करने की व्यवस्था बम्बई में चार दिन पहले ही हो जाती है और ठीक समय पर में अंजीर कलकत्ते उनके पास आ पहुँचते हैं! एक दिन पीछे भी नहीं, पहले भी नहीं..यही है भगवान्‌ का मंगल विधान!!

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

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कुब्जा


कुब्जा प्रसंग द्वारा श्रीकृष्ण का संसार को संदेश!!!!!!!!

मथुरा के राजा कंस ने धनुष-यज्ञ के बहाने छलपूर्वक श्रीकृष्ण-बलराम को मथुरा बुलाया। कंस का निमंत्रण पाकर श्रीकृष्ण-बलराम गोपबालकों के दल के साथ वृन्दावन से मथुरा की ओर चल पड़े । श्रीकृष्ण ने जब मथुरा में प्रवेश किया तो उन्होंने मन में सोचा अब कोई ऐसा खेल करना चाहिए जिससे मथुरावासियों को विश्वास हो जाए कि हम कोई मामूली आदमी नहीं हैं ।

श्रीकृष्ण का दल रथ से उतर कर जब मथुरा के राजमार्ग पर पैदल चला जा रहा था तो उन्होंने देखा कि एक युवती स्वर्ण-पात्र में चंदन-कुंकुमादि अंगराग की सामग्रियों को लिए गर्व भरी चाल से आगे-आगे चली जा रही है ।

वह कंस की दासी कुब्जा (सैरन्ध्री) थी । वैसे तो वह बड़ी सुन्दर युवती थी परन्तु कुबड़ी थी; इसलिए उसका नाम ‘कुब्जा’ हुआ ।

उसका शरीर तीन जगहों से टेढ़ा था; इसलिए उसे ‘त्रिवक्रा’ भी कहते हैं ।

भगवान श्रीकृष्ण को उसे देखकर बड़ा कौतूहल हुआ । उन्होंने मन में कहा-‘सुन्दरता से तो सब प्रेम करते हैं, पर अब जरा इस कुबड़ी से भी प्रेम करके देखना चाहिए ।’

उन्होंने कुब्जा से कहा-‘सुन्दरी ! तुम कौन हो और कहां जा रही हो ? तुम्हारे हाथ में जो अंगराग (चंदन) है वह बहुत ही उत्तम है, उसे हमें दे दो । इस दान से तुम्हारा शीघ्र ही परम कल्याण होगा ।’

भगवान ने ऐसा कह कर कुब्जा से चंदन मांगा।

कुब्जा गर्विणी थी; किन्तु श्रीकृष्ण के मनोरम आह्वान को सुनकर पीछे मुड़कर देखे बिना न रह सकी । बालक के रूप में सौंदर्य के सागर भगवान ही उसके सामने खड़े थे । श्रीकृष्ण के विकसित नीलकमल के समान सुन्दर बदन को देखकर वह विमोहित हो गयी । ऐसी रूप-माधुरी कुब्जा ने अपने जीवन में कभी देखी नहीं थी । इस त्रिभुवन कमनीय रूप को देखकर कुब्जा की आंखें खुल गयीं।

श्रीकृष्ण के सौंदर्य, माधुर्य, सुकुमारता, मंद हास्य युक्त मधुर चितवन और मीठी बोली को सुनकर कुब्जा का मन हाथ से निकल गया । श्रीकृष्ण-रूप को देखने के बाद ऐसा संभव ही नहीं कि अब वह किसी अन्य की (कंस) दासी बने । अब तो वह अपने मन-प्राण, सर्वस्व ही श्रीकृष्ण को समर्पित करना चाहती थी ।

कुब्जा ने कहा-‘मैं कंस की प्रिय दासी हूँ और उसे ये मेरा चंदन बहुत प्रिय है; लेकिन प्यारे कृष्ण ! त्रिभुवन में मुझे सबसे अधिक प्रिय तुम्हीं हो । जगत् में इसके लिए आपसे बढ़कर और कोई दूसरा पात्र हो ही नहीं सकता है । तुम्हीं मेरे उपास्य हो, तुम ही मेरे अभिलाषित हो।’

श्रीकृष्ण के नेत्रों के सामने तो कुछ भी छिपा नहीं रह सकता । वे जीव के भीतर-बाहर के अधीश्वर हैं, सर्वदर्शी हैं । कुब्जा के मन में क्या है ? वे इसे भी जानते हैं ।

कुब्जा ने वह चंदन जो कंस के लिए था, श्रीकृष्ण और बलराम दोनों भाइयों को दे दिया। श्रीकृष्ण और बलरामजी ने वह चंदन अपने स्याम-गौर शरीर पर लगा लिया जिससे वह अप्रतिम सुन्दर लगने लगे ।

संसार में स्त्रियां कुंकुम-चंदनादि अंगराग लगाकर स्वयं को सज्जित करती हैं; किन्तु हजारों में कोई एक ही होती है जो भगवान को अंगराग लगाने की सोचती होगी और वह मनोभिलाषित अंगराग लगाने की सेवा भगवान तक पहुंच भी जाती है; क्योंकि उसमें भक्ति-युक्त मन समाहित था । कुब्जा की सेवा ग्रहण करके भगवान प्रसन्न हुए और उस पर कृपा की । अब कुब्जा मन, वाणी और शरीर से निरन्तर श्रीकृष्ण का ही चिंतन करने लगी । उसे सब कुछ श्रीकृष्णमय दिखाई देने लगा ।

भगवान श्रीकृष्ण कुब्जा के घर आए और कहा-‘तुमने रामावतार में मेरे लिए तप किया था, अब मुझसे मिलकर तुम मेरे धाम गोलोक जाओ । उसी समय एक दिव्य रथ आया, कुब्जा दिव्य देह धारण कर गोलोक चली गई और वहां ‘चन्द्रमुखी’ नामक गोपी हो गयी ।

श्रीकृष्ण का कुब्जा को प्रेमरस का दान!!!!!

भगवान संसार को यह संदेंश देना चाहते थे कि जो मेरी सेवा व दर्शन करेगा, उसको क्या फल मिलेगा, यह जान लो । चंदन हृदय को शीतल करता है । भगवान श्रीकृष्ण ने विचार किया कि इसने चंदन देकर मेरी शोभा बढ़ा दी है, इसको मैं सुन्दर रूप दे दूँगा ।

इसके बाद श्रीकृष्ण ने कुब्जा के दोनों पांवों के पंजे को अपने पांवों से दबा दिया और उसकी ठुड्डी को दो अंगुलियों से पकड़ कर ऐसा झटका दिया कि उसके तीनों अंग सीधे हो गए। कुब्जा का कूबड़ दूर हो गया और वह प्रेम और मुक्ति के दाता मुकुन्द के स्पर्श से रूप-गुण व उदारता से सम्पन्न हो अत्यंत सुन्दर व सरल हो गई ।

कुब्जा ने बलरामजी और समस्त ग्वाल-बालों के सामने ही श्रीकृष्ण का पीताम्बर पकड़ लिया और बोली-‘अब मैं आपको नहीं छोड़ूंगी। कंस को छोड़ो,उसको मारने या जिलाने की कोई जरुरत नहीं है ।’

श्रीकृष्ण ने हंसते हुए कहा-‘हम तुम्हारे घर आएंगे ।’

भगवान से मिलन की आशा लेकर कुब्जा अपने घर चली गई ।

कुब्जा पूर्व जन्म में कौन थी ?

पूर्व जन्म में कुब्जा शूर्पणखा नाम की राक्षसी थी । वनवासकाल में जब श्रीराम पंचवटी में निवास कर रहे थे, तब शूर्पणखा उन पर मोहित हो गई । श्रीराम द्वारा एकपत्नी-व्रत की बात कहने पर वह सीताजी को खा जाने के लिए दौड़ी । तब लक्ष्मणजी ने उसके नाक-कान काट दिए । इससे खिन्न होकर उसने पुष्कर-तीर्थ में जाकर हजारों साल तक भगवान शंकर का ध्यान और तप किया । इससे प्रसन्न होकर शंकरजी ने उसे वर दिया-‘द्वापर के अंत में मथुरापुरी में तुम्हारी कामना पूरी होगी ।’

वही शूर्पणखा मथुरापुरी में ‘कुब्जा’ नाम से कंस की दासी बनी और शंकरजी के वरदान से श्रीकृष्ण की प्रिया हुई ।

कुब्जा प्रसंग का भाव!!!!!

श्रीमद्भागवत एक आध्यात्मिक ग्रन्थ है । दशम् स्कन्ध में वर्णित श्रीकृष्ण की प्रत्येक लीला एक शिक्षा व संदेश देती है । कुब्जा प्रसंग में भगवान मनुष्य को कई संदेश देते हैं-

-कुब्जा भगवान की नित्यकाल की संगिनी है । उसे देखकर भगवान हंस पड़े। भगवान हंसे इसलिए कि कुब्जा ही अकेली त्रिवक्रा या कुबड़ी नहीं है; वरन् सम्पूर्ण नारी जीवन ही त्रिवक्रा है । नारी जीवन तीन वक्रों-सौंदर्य, पतिसुख और घर और बच्चों की चाह में ही बीतता है; इसलिए वह रजो और तमोगुण प्रधान है।

इन तीन वासनाओं में सिमटकर नारी जीवन कुब्जा (विकलांग) हो गया है । जिस दिन नारी पति और गृह-सुख से ऊपर उठकर श्यामसुन्दर के भक्ति-रस में रंगेगी; उसी दिन वह श्रीकृष्ण कृपा से त्रिवक्रा से सर्वांग-सुन्दरी बन जाएगी ।

-कुब्जा प्रसंग से दूसरी शिक्षा यह है कि संसार की समस्त उत्तम वस्तुएं भगवान को अर्पण करनी चाहिए । कुब्जा की तरह मनुष्य को अपनी सबसे प्यारी वस्तु-अपने जीवन को ही इतना सुगन्धित (भक्ति से ओतप्रोत) करना होगा; जिससे कुब्जा के चंदन की तरह भगवान स्वयं हमें अपनी सेवा में लगाने को तैयार हो जाएं । यही भगवत्कृपा प्राप्त करने का सबसे सरल उपाय है ।

-पूज्य श्रीडोंगरेजी महाराज ने कुब्जा प्रसंग की बहुत सुन्दर व्यााख्या की है-मनुष्य की बुद्धि तीन जगहों पर टेढ़ी होती है अर्थात् बुद्धि के तीन दोष हैं-काम, क्रोध और लोभ । जिसकी बुद्धि टेढ़ी होती है उसका मन टेढ़ा होता है (मन में लोभ रहता है), उसकी आंख टेढ़ी होती है (अर्थात् आंख में काम रहता है) और जीवन टेढ़ा होता (अर्थात् विषयी व विलासी होता) है।

कंस की सेवा करने से बुद्धि टेढ़ी होती है; किन्तु भगवान की सेवा करने से सीधी व सरल हो जाती है । भगवान बुद्धि के पति हैं और सद्गुरु बुद्धि के पिता हैं । सद्गुरु ही शिष्य की बुद्धि को भगवान के साथ विवाहित कराते हैं; इसलिए मनुष्य को अपनी बुद्धि को परमात्मा के साथ विवाहित होने तक सद्गुरु संत की शरण में रखना चाहिए । बुद्धि को स्वतंत्र रखने से उसमें दोष उत्पन्न हो जाते हैं ।

मानस अमृत

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शानिमहाराज ओर राजा विक्रमादित्य की कथा


जो भी नर – नारी इस शनि देव की कथा को स्वयं पढ़ता है या किसी के द्वारा श्रवण करता है उसके सभी संकट दूर हो कर संसार के सभी सुखों को प्राप्त करता है।

प्राचीन समय की बात है सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु अर्थात् यह नवग्रह एक स्थान पर एकत्रित हुये, परस्पर वाद-विवाद होने लगा कि हम लोगों में सबसे बड़ा और श्रेष्ठ कौन ग्रह हैं। सभी अपने आपको बड़ा मान रहे थे। कोई भी अपने आपको छोटा कहा जाना पसन्द नहीं कर रहा था।

बहुत तर्क-वितर्क के पश्चात भी जब कोई निर्णय नहीं हुआ तो, सभी ग्रह आपस में उलझते हुए अपने विषय के प्रति गंभीर हुए देवराज इंद्र के पास जा पंहुचे और बोले – “हे इन्द्र” ! आप सब देवों के देव हैं । हम सभी ग्रहों में मतभेद यह हुआ है कि हममें से बड़ा कौन हैं और कौन छोटा ? आप इस बात का फैसला कीजिए।

राजा इन्द्र सारी बातें सुनकर तुरंत समझ गये । किन्तु उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया । फिर वे बात टालने की कोशिश करते हुये बोले – “मुझमें इतना सामर्थ्य तो नहीं हैं , जो आपके छोटे और बड़े का निर्णय करुं । मैं अपने मुँह से कुछ नहीं कह सकता । हां, एक उपाय हैं।”

इस समय भू-लोक में उज्जैन नगरी के राजा विक्रमादित्य सबसे अच्छा और न्याय करने वाला है, अतः आप सभी उनके पास जाओ, मैं आपका न्याय करने में असमर्थ हूँ । मगर राजा विक्रमादित्य अवश्य न्याय करेंगे ।”

देवराज इन्द्र के इन वचनों को सुनकर सभी ग्रह पृथ्वी लोक पर राजा विक्रमादित्य के दरबार में जा पंहुचे और अपनी समस्या से उन्हें अवगत करा दिया । राजा विक्रमादित्य उनकी बात सुनकर अत्यंत चिन्तित हो गये । तुरंत ही उन्हें कोई जवाब ही नहीं सूझा । वह शान्त रहे । वे मन ही मन सोच रहे थे कि ये सभी ग्रह हैं किसे छोटा कहूँ और किसे बड़ा कहूँ । जिसे छोटा कहूंगा वही मुझसे कुपित हो जायेगा।

न्याय के लिए जब ये मेरे पास आये है तो मुझे न्याय तो करना ही है -किस प्रकार न्याय करुं ।” शान्त चित्त से विचार करने के पश्चात एक उपाय मानस पटल पर आ ही गया। फलस्वरूप – उन्होंने स्वर्ण, चांदी, कांसी, पीतल, शीशा, रांगा, जस्ता, अभ्रक और लोहा नौ धातुओं के नौ सिंहासन बनवाये और उन सभी आसनों को अपनी राजसभा में क्रम से विधिपूर्वक जैसे- सोने का सिंहासन सबसे आगे तथा लोहे का सबसे पीछे रखवा दिया।

इसके पश्चात नरेश ने राज ज्योतिषी को बुलवाकर आदेश दिया कि ज्योतिष ग्रन्थों में जिस क्रम में ग्रहों का स्थान है, उसी क्रम से ग्रहों के आसन ग्रहण करने की प्रार्थना की जाए । इस प्रकार सबसे उत्तम तथा सबसे आगे रखा हुआ स्वर्ण का बना सिंहासन सूर्य को मिला, चांदी का सिंहासन चन्द्रमा को तथा शेष धातुओं के सिंहासन अन्य ग्रहों को मिले । सबसे पीछे रखा हुआ और लोहे का बना सिंहासन शनिदेव को मिला ।

राजा विक्रमादित्य की इस बात को अपना अपमान समझते हुये शनि देव क्रोध से लाल हो गये । उनकी भ्रकुटियां तन गई । जबड़े भिंच गये, मुट्ठीयां भिंच गई । फिर वे आग-बबूला हो क्रोध में बोले – “हे मूर्ख राजा ! तू मेरे पराक्रम और मेरी शक्ति को नहीं जानता । सूर्य एक राशि पर एक महीना, चन्द्रमा सवा दो दिन, मंगल डेढ़ महीना, बृहस्पति तेरह महीने, बुध और शुक्र एक-एक महीने, राहु और केतु उल्टे चलते हुए केवल अठारह महीने ही एक राशि पर रहते हैं । परन्तु मैं एक राशि पर ढाई अथवा साढ़े सात साल तक रहता हूँ ।

बड़े-बड़े देवताओं को मैंने कठोर दु:ख और कष्ट दिये हैं । राजन, ध्यानपूर्वक मेरी बात सुनो – मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामचंद्र पर जब मैं साढ़े साती आई तो उन्हें राज त्यागकर बनवास को जाना पड़ा । रावण पर साढ़े साती आई तो राम और लक्ष्मण ने लंका पर आक्रमण कर दिया । उसकी सोने की लंका जल गई और रावण ने अपने कुल का नाश कर लिया । हे राजन ! अब तुम भी सावधान रहना ।”

विक्रमादित्य ने कुछ सोचकर कहा – “हे शनिदेव मैंने अपनी बुद्धि और विवेक के अनुसार जो उचित न्याय सूझा वह मैंने किया अब जो होगा वह भी देखा जाएगा ।” मैं आपकी धमकी से नहीं डरता । जैसा मेरे भाग्य में होगा वह तो भोगना ही पड़ेगा । चाहे अच्छा हो अथवा बुरा हो । राजा का न्याय सुनकर सभी ग्रह तो वहां से खुशी – खुशी चले गये । मगर शनिदेव क्रोध में भरे हुए नाराज हो कर वहां से गये ।

कुछ समय तो ऐसे ही बीत गया मगर कुछ समय बाद राजा विक्रमादित्य पर शनि ग्रह की साढ़े साती का प्रवेश हुआ तो शनिदेव ने अपना प्रभाव दिखाना शुरु कर दिया । शनिदेव घोड़ों के व्यापारी का रूप धारण कर अनेक सुंदर घोड़े साथ ले राजा विक्रमादित्य की राजधानी उज्जैन में आ पहुंचे । जब राजा ने घोड़े के सौदागर के आने की बाबत सुना तो उन्होंने अपने अश्वपाल को सुन्दर और शक्ति शाली घोड़े खरीदकर ले आने को कहा ।

घोड़े बेहद सुन्दर और शक्ति शाली थे । अश्वपाल उनके दाम सुनकर चौंक पड़ा, उसे गहरा आश्चर्य हुआ । उसने तुरंत राजा को खबर दी । अश्वपाल के कहने पर राजा ने घोड़ों को देखा और एक अच्छा घोड़ा देखकर उस पर से सवारी को चढ़ गया । राजा के घोड़े पर चढ़ते ही घोड़ा तीव्र गति से दौड़ पडा़ ।

फिर घोड़ा राजा को लेकर एक घने जंगल में पहुंच गया तथा वहीं राजा विक्रमादित्य को अपनी पीठ से पृथ्वी पर गिराकर अदृश्य हो गया । उसके बाद राजा बियावान जंगल में भूखा – प्यासा इधर-उधर भटकने लगा । राजा के हाल-बेहाल हो गये ।

भटकते-भटकते बहुत देर बाद राजा ने एक ग्वाले को देखा । ग्वाले से निवेदन करने पर ग्वाले ने प्यास से व्याकुल राजा को पानी पिलाया और एक नगर का रास्ता भी दिखाया । जो उस स्थान के समीप ही था । उस वक्त राजा की अंगुली में एक अंगुठी थी ।

राजा ने खुश होकर ग्वाले को वह अंगुठी दे दी और फिर शहर की ओर चल पड़ा । राजा नगर पहुंच एक सेठ ( साहूकार ) की दुकान में जाकर बैठ गया । राजा ने खुद को उज्जैन का निवासी और बीका नाम बताया । साहूकार ने राजा को उच्च घराने का समझकर पानी पिलाया ।

भाग्यवश उस दिन साहूकार की बिक्री पूर्व दिनों की अपेक्षा अधिक हुई । तब सेठ ने राजा को भाग्यवान मानकर उसे अपने साथ अपने घर ले गया और भोजन कराया । भोजन करते वक्त राजा विक्रमादित्य ने एक अद्भुत बात देखी कि एक हार खूंटी पर लटक रहा था और खूंटी उस हार को निगल रही थी । इस अद्भुत दृश्य को देखकर उनके पैरों के नीचे की जमीन खिसकने लगी ।

लेकिन वे मूक रहे । सहसा भोजन के बाद जब साहूकार खूंटी पर से हार उतारने के लिए गये तो खूंटी पर वह हार नहीं मिला तब उसने सोचा कि बीका के अलावा कोई और व्यक्ति उस कमरे में नहीं आया , अतः हार की चोरी इसी व्यक्ति ने की है । सेठ जी ने बीका पर चोरी का आरोप लगाते हुये हार लौटाने को कहा पर राजा ने अपनी सफाई देते हुए कहा कि – “हे सेठ जी मैंने आपका हार नहीं चुराया । मैंने तो हार को खूंटी को निगलते हुए भर देखा है । आपका हार खूंटी निगल गई ।

“खूंटी हार नहीं निगल सकती, भला बेजान चीजें भी किसी चीज को निगलती हैं कभी ?” इस पर विवाद बढ़ता गया और सेठ बीका को उस नगर के राजा के पास ले गया । और सारी बात कह सुनाई । राजा ने आज्ञा दी कि – “हार का चोर यही व्यक्ति हैं । इसके हाथ-पैर काट कर “चौरांग्या” कर दो ।” राजा की आज्ञा पाकर उसके सैनिकों ने विक्रमादित्य के हाथ-पैर काट कर जंगल में फैंक दिया । फलस्वरूप, राजा विक्रमादित्य अपाहिज होकर इधर-उधर भटकने लगा ।

अब बेचारे राजा की हालत ऐसी हो गई कि किसी ने रोटी का टुकड़ा मुंह में डाल दिया तो खा लिया अन्यथा यों ही भूखा-प्यासा पड़ा रहा । रास्ते जाते एक तेली की नजर उस पर पड़ी और वह उस पर तरस खाकर उसे थोड़ा सा तेल उसके घावों पर लगाने को दे दिया, जिसके फलस्वरूप तेली का व्यापार उसी दिन से प्रगति करने लगा ।

2-4 दिन यह क्रम चलता रहा तो तेली ने व्यापार वृद्धि से प्रसन्न हो विक्रमादित्य को अपने घर ले गया और कोल्हू पर बिठा दिया । विक्रमादित्य कोल्हू पर बैठा अपनी आवाज से बैलों को हांकता रहता । कुछ वर्षों में शनि की दशा समाप्त हो गई ।

बीका अपनी उदासी काटने के लिए कभी-कभी मल्हार राग गाया करता था । एक रात वह वर्षा को देखकर राग-मल्हार गाने लगा । उसका गीत सुनकर उस शहर के राजा की कन्या उस पर मोहित हो गई । और दासी से खबर लाने के लिये कहा कि – “देख तो जरा इस राग को कौन गा रहा हैं ?” दासी ने देखा कि एक अपाहिज व्यक्ति तेली के कोल्हू पर बैठा मल्हार गा रहा हैं । दासी ने महल में आकर सारा वृतान्त कह सुनाया ।

उसी समय राजकुमारी ने निर्णय ले लिया कि वह उसी व्यक्ति से शादी करेगी जो मल्हार गा रहा था । प्रातः काल दासी जब राजकुमारी को जगाने गई तो राजकुमारी ने खाना पीना भी त्याग कर बिस्तर पर पड़ी-पड़ी रो रही थी । दासी राजकुमारी का यह हाल देखकर घबरा उठी । वह तुरंत राजा-रानी के पास जा पहुंची और उनसे सारी बातें कह सुनाई ।

राजा-रानी तुरंत राजकुमारी के पास आये और उससे उसके दु:ख का कारण पूछा – “बेटी तुम क्यों अनशन लिये पड़ी हो ? तुम्हें किस बात का दु:ख हैं ? जो भी पीड़ा हमसे कहो, हम तुम्हारा दु:ख दूर करने का प्रत्यन करेगें ।” राजकुमारी ने अपने मन की मंशा राजा-रानी को बता दी ।” बेटी ! वह अपाहिज ( चौरांग्या ) हैं । तेली के कोल्हू के बैल हांकता है । वह भला तुम्हें क्या सुख देगा, तुम्हारा विवाह तो किसी राजकुमार से होगा । मेरा कहा मानो और अपनी यह जिद छोड़ दो ।

“मगर राजकुमारी अपनी जिद पर अड़ गई । राजा – रानी के अतिरिक्त परिजनों ने भी राजकुमारी को काफी समझाया । मगर राजकुमारी नहीं मानी । वह अपनी जिद पर अड़ी रही । उसने कहा -“यदि मेरा विवाह उस व्यक्ति के साथ नहीं हुआ तो मैं अपने प्राण त्याग दूंगी ।” बेटी की जिद देख राजा क्रोधित हो उठा । बोला – “तेरी ऐसी ही जिद है जो तुझे अच्छा लगे वैसा ही कर ।

“फिर राजा ने तेली को बुलवाया । उसे सारा हाल कह सुनाया । और तेली को अपाहिज व्यक्ति से अपनी बेटी के विवाह की तैयारी करने का आदेश दिया । तब फिर राजकुमारी का विवाह अपाहिज विक्रमादित्य ( बीका ) के साथ हो गया ।

रात्रि को जब राजा विक्रमादित्य और राजकुमारी महल में सोये हुए थे तब आधी रात को शनिदेव ने विक्रमादित्य को स्वप्न में दर्शन दिये और कहा – हे राजा ! मुझे छोटा बताकर तूने कितने कष्ट और दु:ख सहे हैं, इसकी कल्पना कर विक्रमादित्य ने स्वप्न में ही शनिदेव से क्षमा याचना की, जिसके परिणाम स्वरूप शनि ने प्रसन्न होकर राजा को पुन: हाथ – पैर प्रदान कर दिये । राजा गद् गद् हो ।

शनि महाराज के गुणगान करने लगा तत्पश्चात विनय करते हुये राजा विक्रमादित्य ने कहा – ” हे शनिदेव ! आपने जैसा दु:ख मुझे दिया , ऐसा आप दु:ख किसी को न दें ।” शनिदेव ने राजा की प्रार्थना स्वीकार कर बोले – “जो व्यक्ति मेरी कथा सुनेगा, कहेगा तो उसे कोई दु:ख नहीं होगा और जो व्यक्ति नित्य मेरा ध्यान करेगा शनिवार को मुझे तेल अर्पण करेगा या चीटियों को आटा खिलायेगा । उसके सम्पूर्ण मनोरथ पूर्व होंगे ।” इतना कहकर शनिदेव अन्तरध्यान हो गये ।

जब राजकुमारी की आँख खुली और उसने राजा के हाथ – पाँव देखे तो चकित रह गयी । विक्रमादित्य ने सब हाल कह सुनाया तो राजकुमारी बहुत प्रसन्न हुई । यह समाचार राजदरबार से लेकर पूरे शहर में तुरंत फैल गया और सब राजकुमारी को भाग्यशाली कहने लगे ।

जब सेठ ( साहूकार ) ने यह बात सुनी और यह जाना कि वह व्यक्ति कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि राजा विक्रमादित्य हैं तो वह उसके कदमों में आ गिरा और अपने किये की माफी मांगने लगा । राजा विक्रमादित्य ने कहा – “इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं हैं मुझ पर शनिदेव का प्रकोप था ।” सेठ बोला – “राजन ! अब मुझे तभी आत्मीय शान्ति मिलेगी, जब आप मेरे आवास चलकर भोजन ग्रहण करेंगे ।” “ठीक है मैं आऊंगा ।” और फिर राजा विक्रमादित्य सेठ ( साहूकार ) के घर भोजन करने पहुंच गये । जिस समय वह भोजन कर रहे थे । एक आश्चर्य जनक बात हुई । जो खूंटी पहले हार निगल रही थी वही अब हार उगल रही थी । भोजन ग्रहण के पश्चात साहूकार ने कहा – “राजन ! मेरी श्रीकंवरी नाम की एक कन्या है । उसका पाणिग्रहण आप करें ।”

“इसके बाद सेठ ने अपनी रुप – यौवन से सम्पन्न कन्या का विवाह बडी़ धूमधाम से राजा विक्रमादित्य के साथ कर दिया । राजा विक्रमादित्य कुछ दिन वहाँ रहने के पश्चात सेठ से विदा लेकर राजकुमारी मनभावती, सेठ की पुत्री श्रीकंवरी तथा दोनों स्थानों से प्राप्त रत्न – आभूषण और अनेक दास – दासियों के साथ अपनी राजधानी उज्जैन में लोट आए । आवागमन पर सारे राज्य में खुशियाँ मनाई गई ।

राजा ने अपने राज्य में ढ़ंढोरा पिटावा दिया कि “सम्पूर्ण ग्रहों में शनिदेव श्रेष्ठ और बड़े हैं । मैंने उन्हें छोटा कहा इसलिये मुझे इतने दिन कष्ट उठाने पडे़ ।” तभी से उनके राज्य में शनिदेव की पूजा होने लगी । सभी घरों में शनि की कथा का पाठ होने लगा। जिसके कारण उस उज्जैन नगरी के निवासी समस्त सुखों को प्राप्त करते रहे ।

बुद्धिर्बलं यशो धैर्यं निर्भयत्वमरोगता।
अजाड्यं वाक्पटुत्वं च हनुमत्स्मरणाद्भवेत्॥

नरेश सिंह