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‘लिस्ट’

“देवरजी आप ने लेनदेन की सारी बातें साफ साफ कर ली हैं न लड़के वालों से?”
राजेश्वरी देवी ने चाय का प्याला और ढोकले की प्लेट देवर सुरेश के सामने सेन्टर टेबल पर रखते हुए पूछा.

राजेश्वरी दो- दो बेटियों निरुपमा और नीहु की विधवा माँ थी.
सरकारी कार्यालय में लेखपाल का काम करने वाले पति चंद्रशेखर बाबू की पचास साल की उम्र में अचानक ह्रदयाघात से मृत्यु हो गयी थी.
मुआवज़े के बदले मिली नौकरी और बच्चों को संभालने की पूरी जिम्मेदारी तब से राजेश्वरी सफलता पूर्वक उठाती आयी थी. देवर और देवरानी भाभी की एक आवाज़ में आज भी हाज़िर हो जाते थे.

बड़ी बेटी निरुपमा के रिश्तें की बात पास के जिले के एक खाते- पीते परिवार में चली थी.
राजेश्वरी देवी लेनदेन को लेकर एकदम स्पष्ट हो जाना चाहती थीं ताकि बाद में बिटिया को ससुराल में कड़वे बोल सुनने को न मिले.

देवर सुरेश के जिम्मे था सारा दौड़भाग वाला काम.सुरेश अभी-अभी निरुपमा के विवाह की तैयारियों के बारे में बातचीत कर लड़के वालों के घर से लौटा था.

“भाभी आप बिल्कुल चिंता मत कीजिये….काफी सभ्य और संस्कारी परिवार है.उन्होनें बार बार कहा है कि उन्हें दहेज नही चाहिए.उनकी बस इतनी सी मांग है कि बारात में आने वाले मेहमानों की बेहतर से बेहतर खातिर हो .”

“फिर भी देवर जी एकबार सारी बातें साफ साफ हो जाये तो बेहतर होगा.आजकल लोग दहेज के लिए ना बोलकर भी लड़की वालों से बहुत सारी उम्मीदें मन मे पाले रखते हैं.”

“ये बात तो आपने सौ टके सही कही हैं भाभी.शुरुआत में साफ़- साफ़ नही बताते हैं और बाद में बहू को ताने मारते हैं.”

राजेश्वरी देवी का मन नही मान रहा था.उन्होंने तय किया कि वो ख़ुद एक बार लड़के के माता-पिता से मिलकर सारी बातें साफ़ करेंगी तभी उन्हें इत्मीनान होगा.अगले दिन देवर को लेकर वे बेटी के होने वाली ससुराल पहुँच गयी थीं.

राजेश्वरी देवी ने अवसर पाते ही समधी और समधन जी के सामने लेनदेन वाली बात छेड़ दी.

“भाई साहब बेटी की माँ हूँ.निरुपमा के पापा होते तो मुझे किसी बात की कोई चिंता नही रहती.पर अभी तो दोहरी जिम्मेदारी हैं मुझपर.”
राजेश्वरी देवी हाथ जोड़े आग्रह भरे अंदाज़ में अपने मन को खोल रही थी.

“राजेश्वरी जी हमें आपकी चिंताओं का अहसास है ….आप अपने मन में उभर रही सारी आशंकाएं हमें बता सकती हैं.”
समधी कमलनाथ ने माहौल को बेहद सहज बनाते हुए कहा.

“दरअसल निरुपमा के पापा हमेशा बोलते थे कि रिश्ता जोड़ते समय सारी बाते साफ़ साफ़ कर लेनी चाहिए ताकि बाद में किसी तरह का मनभेद न हो.”

“कितना सही कहते थे स्वर्गीय चंद्रशेखर बाबू ……..आप खुलकर बताइए हमें कि लेनदेन को लेकर कैसी दुविधा है आप के मन में?”

“जी बिल्कुल ….अकेली होने के बावजूद मैंने दोनों बच्चों के लालन- पालन और पढ़ाई- लिखाई में कोई कमी नही होने दी.इनकी शिक्षा में अपनी हैसियत से ज़्यादा ख़र्च किया है हमेशा.”

“आपकी दी हुई परवरिश और संस्कार तो आपकी दोनों बच्चियों में साफ़- साफ़ नज़र आते हैं.”

“ये लिस्ट लेकर आयी हूँ…. विवाह में आरम्भ से लेकर अंत तक मैं क्या- क्या दे पाऊंगी सब इसमें लिख दिया है मैंने.सोचा बात आगे बढ़े इससे पहले आप इसे देख लें.छोटी- से- छोटी चीज़ लिखी हुई है .इसके अलावा मैं और कुछ नही दे पाऊंगी.”

राजेश्वरी देवी ने अपने पर्स में बेहद सम्भाल कर रखी वो लिस्ट निकाल कर आगे बढ़ा दी थी.

कमलनाथ जी और उनकी पत्नी ने एक सरसरी निगाह लिस्ट पर डाली.पर लिस्ट समाप्त होने के बाद दोनों के चेहरों के भाव कुछ बदल से गये थे.दोनों बार- बार एक- दूसरे का चेहरा देख रहे थे.

“बहन आप बुरा न मानें तो हम पति पत्नी अंदर जाकर कुछ देर आपस में सलाह मशविरा करना चाहते हैं.”
बेहद गम्भीर अंदाज में कहते हुए कमलनाथ जी अपनी पत्नी संग अंदर चले गए थे.

बाहर हॉल में भाभी के साथ बैठे सुरेश के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई थीं.
बार- बार उसे लग रहा था कि शादी ब्याह के नाज़ुक मामलों में भाभी का इस तरह खुल कर बातें करना और लिस्ट बनाकर ले आना उचित नही था. ऐसा न हो कि ज़रूरत से ज्यादा स्पष्टवादिता भारी पड़ जाए और इतना बेहतरीन रिश्ता हाथ से निकल जाए.

पर राजेश्वरी देवी पूरे आत्मविश्वास के साथ कमलनाथ जी के बाहर आने का इन्तज़ार कर रही थीं.वे परिणाम की आशंका की बजाय इस बात से खुश थीं उन्होंने सब कुछ स्पष्ट रूप से बोल दिया है.

थोड़ी देर में कमलनाथ जी पत्नी संग बाहर आये.कुछ देर एकदम चुप्पी छाई रही.

“राजेश्वरी जी ज़रूरी नही कि आप जो सूची बनाकर ले आई हैं वो ही हम स्वीकार कर लें.आखिर हमारी भी अपनी भावनाएं और उम्मीदें है.”

“जी ज़रूर….आप बताएं मुझे .मेरी हैसियत में होगा तो पीछे नही हटूंगी.”

“बहन, आपने जिस बारीकी से ये सूची बनाई है और जिस साफगोई से अपनी बातें कही हैं, उतनी ही बारीकी और साफगोई से आपने बच्चों को जीवन पथ का पाठ सिखाया होगा.”
कमलनाथ जी कुछ भावुक से हो चले थे.

” इस लिस्ट में बस एक और नाम जोड़ दीजिये ….छोटी बिटिया नीहु का. मेरे दोनों बेटों अनमोल और अंश को आप अपनी दोनो गुड़ियां निरूपमा और नीहु दे दीजिये.”
होने वाली समधन ने राजेश्वरी जी के पास बैठते हुए कहा तो सुरेश और राजेश्वरी देवी एक दम से भौंचक रह गए थे.

“हमारे घर में किसी बात की कमी नही है …बस आप की पुत्रियों जैसी स्पष्टता के साथ बात करने वाली बहुएं मिल जायें तो हमारा परिवार मालामाल हो जाये.”

राजेश्वरी जी को पता था कि छोटा बेटा अंश तो अनमोल से भी ज्यादा स्मार्ट और तेज़ तर्रार है.

वो कृतज्ञता के साथ हाथ जोड़े गीली आंखें लिए खड़ी हो गयीं तो समधन ने बढ़कर उन्हें गले लगा लिया.

“लिस्ट में एक बात और जोड़नी तो बाकी ही रह गयी कि आप किसी प्रकार का तनाव नही लेंगी, न भागदौड़ करेंगी.मेरे दोनों बच्चे अनमोल और अंश दोनों तरफ की विवाह सम्बन्धी सारी जिम्मेदारियों को उठाएंगे.”

बस फिर क्या था तनाव और आशंकाओं से भरा माहौल हंसी ठहाकों से गूंज उठा था.
अक्सर कुंडलियों से रिश्तें मिलाए जाते हैं आज शायद पहली बार एक लिस्ट ने विवाह के रिश्तों को अटूट कर दिया था.

(पूर्णतः मौलिक)
✍️सहरिया
संजय सहरिया
मुम्बई
(महाराष्ट्र)

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शुभ शुक्रवार

एक निर्धन व्यक्ति था। वह नित्य भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी की पूजा करता था एक बार दीपावली के दिन भगवती लक्ष्मी की श्रद्धा-भक्ति से पूजा-अर्चना की। कहते हैं उसकी आराधना से लक्ष्मी प्रसन्न हुईं। वह उसके सामने प्रकट हुईं और उसे एक अंगूठी भेंट देकर अदृश्य हो गईं। अंगूठी सामान्य नहीं थी। उसे पहनकर जैसे ही अगले दिन उसने धन पाने की कामना की, उसके सामने धन का ढेर लग गया।

इसी बीच उसे भूख लगी, तो मन में अच्छे पकवान खाने की इच्छा हुई। कुछ ही पल में उसके सामने पकवान आ गए।
अंगूठी का चमत्कार मालूम पड़ते ही उसने अपने लिए आलीशान बंगला, नौकर-चाकर आदि तमाम सुविधाएं प्राप्त कर लीं।
वह भगवती लक्ष्मी की कृपा से प्राप्त उस अंगूठी के कारण सुख से रहने लगा। अब उसे किसी प्रकार का कोई दु:ख, कष्ट या चिंता नहीं थी। नगर में उसका बहुत नाम हो गया।

एक दिन उस नगर में जोरदार तूफ़ान के साथ बारिश होने लगी। कई निर्धन लोगों के मकानों के छप्पर उड़ गए।
लोग इधर-उधर भागने लगे। एक बृद्ध स्त्री उसके बंगले में आ गई।
उसे देख वह व्यक्ति गरजकर बोला- कहां चली आ रही है
बृद्ध स्त्री ने कहा, ‘कुछ देर के लिए तुम्हारे यहां रहना चाहती हूं।’ लेकिन उसने उसे बुरी तरह डांट-डपट दिया।

उस बृद्ध स्त्री ने कहा, ‘मेरा कोई आसरा नहीं है। इतनी तेज बारिश में कहां जाऊंगी? थोड़ी देर की ही तो बात है।’
लेकिन उसकी किसी भी बात का असर उस व्यक्ति पर नहीं पड़ा।
जैसे ही सेवकों ने उसे द्वार से बाहर किया, वैसे ही जोरदार बिजली कौंधी। देखते ही देखते उस व्यक्ति का मकान जलकर खाक़ हो गया।
उसके हाथों की अंगूठी भी गायब हो गई। सारा वैभव पलभर में राख के ढेर में बदल गया।

उसने आंख खोलकर जब देखा, तो सामने लक्ष्मीजी थीं, जो बृद्ध स्त्री कुछ देर पहले उसके सामने दीन-हीन होकर गिड़गिड़ा रही थीं, वही अब लक्ष्मीजी के रूप में उसके सामने मंद-मंद मुस्कुरा रही थीं।
वह समझ गया उसने बृद्ध स्त्री को नहीं, साक्षात लक्ष्मीजी को घर से निकाल दिया था। वह भगवती के चरणों में गिर पड़ा।
देवी बोलीं, ‘तुम इस योग्य नहीं हो। जहां निर्धनों का सम्मान नहीं होता, मैं वहां निवास नहीं कर सकती।
यह कहकर लक्ष्मीजी उसकी आंखों से ओझल हो गईं। 🙏Jai Maa Luxmi 🙏

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. (((( जिंदगी बहुत ख़ूबसूरत है ))))

एक व्यक्ति ऑटो से रेलवे स्टेशन जा रहा था। ऑटो वाला बड़े आराम से ऑटो चला रहा था। एक कार अचानक ही पार्किंग से निकलकर रोड पर आ गई। ऑटो ड्राइवर ने तेजी से ब्रेक लगाया और कार, ऑटो से टकराते-टकराते बची।
कार चला रहा आदमी गुस्से में ऑटोवाले को ही भला-बुरा कहने लगा जबकि गलती उसकी थी।
ऑटो चालक एक सत्संगी (सकारात्मक विचार सुनने-सुनाने वाला) था। उसने कार वाले की बातों पर गुस्सा नहीं किया और क्षमा माँगते हुए आगे बढ़ गया।
ऑटो में बैठे व्यक्ति को कार वाले की हरकत पर गुस्सा आ रहा था और उसने ऑटो वाले से पूछा तुमने उस कार वाले को बिना कुछ कहे ऐसे ही क्यों जाने दिया। उसने तुम्हें भला-बुरा कहा जबकि गलती तो उसकी थी। हमारी किस्मत अच्छी है, नहीं तो उसकी वजह से हम अभी अस्पताल में होते।
ऑटो वाले ने कहा साहब बहुत से लोग गार्बेज ट्रक (कूड़े का ट्रक) की तरह होते हैं। वे बहुत सारा कूड़ा अपने दिमाग में भरे हुए चलते हैं। जिन चीजों की जीवन में कोई ज़रूरत नहीं होती उनको मेहनत करके जोड़ते रहते हैं जैसे क्रोध, घृणा, चिंता, निराशा आदि। जब उनके दिमाग में इनका कूड़ा बहुत अधिक हो जाता है तो वे अपना बोझ हल्का करने के लिए इसे दूसरों पर फेंकने का मौका ढूँढ़ने लगते हैं।
इसलिए मैं ऐसे लोगों से दूरी बनाए रखता हूँ और उन्हें दूर से ही मुस्कराकर अलविदा कह देता हूँ। क्योंकि अगर उन जैसे लोगों द्वारा गिराया हुआ कूड़ा मैंने स्वीकार कर लिया तो मैं भी कूड़े का ट्रक बन जाऊँगा और अपने साथ-साथ आसपास के लोगों पर भी वह कूड़ा गिराता रहूँगा।
मैं सोचता हूँ जिंदगी बहुत ख़ूबसूरत है इसलिए जो हमसे अच्छा व्यवहार करते हैं उन्हें धन्यवाद कहो और जो हमसे अच्छा व्यवहार नहीं करते उन्हें मुस्कुराकर माफ़ कर दो। हमें यह याद रखना चाहिए कि सभी मानसिक रोगी केवल अस्पताल में ही नहीं रहते हैं। कुछ हमारे आसपास खुले में भी घूमते रहते हैं।
प्रकृति के नियम: यदि खेत में बीज न डाले जाएँ तो कुदरत उसे घास-फूस से भर देती है। उसी तरह से यदि दिमाग में सकारात्मक विचार न भरें जाएँ तो नकारात्मक विचार अपनी जगह बना ही लेते हैं। दूसरा नियम है कि जिसके पास जो होता है वह वही बाँटता है। “सुखी” सुख बाँटता है, “दुखी” दुख बाँटता है, “ज्ञानी” ज्ञान बाँटता है, भ्रमित भ्रम बाँटता है और “भयभीत” भय बाँटता है। जो खुद डरा हुआ है वह औरों को डराता है, दबा हुआ दबाता है, चमका हुआ चमकाता है।

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संन्यासी बड़ा या गृहस्थ

किसी नगर में एक राजा रहता था, उस नगर में जब कोई संन्यासी आता तो राजा उसे बुलाकर पूछता कि-”भगवान! गृहस्थ बड़ा है या संन्यास?”

अनेक साधु अनेक प्रकार से इसको उत्तर देते थे। कई संन्यासी को बड़ा तो बताते पर यदि वे अपना कथन सिद्ध न कर पाते तो राजा उन्हें गृहस्थ बनने की आज्ञा देता। जो गृहस्थ को उत्तम बताते उन्हें भी यही आज्ञा मिलती।

इस प्रकार होते-होते एक दिन एक संन्यासी उस नगर में आ निकला और राजा ने बुलाकर वही अपना पुराना प्रश्न पूछा।

संन्यासी ने उत्तर दिया- “राजन। सच पूछें तो कोई आश्रम बड़ा नहीं है, किन्तु जो अपने नियत आश्रम को कठोर कर्तव्य धर्म की तरह पालता है वही बड़ा है।”

राजा ने कहा- “तो आप अपने कथन की सत्यता प्रमाणित कीजिये।“

संन्यासी ने राजा की यह बात स्वीकार कर ली और उसे साथ लेकर दूर देश की यात्रा को चल दिया।

घूमते-घूमते वे दोनों एक दूसरे बड़े राजा के नगर में पहुँचे, उस दिन वहाँ की राज कन्या का स्वयंवर था, उत्सव की बड़ी भारी धूम थी। कौतुक देखने के लिये वेष बदले हुए राजा और संन्यासी भी वहीं खड़े हो गये। जिस राजकन्या का स्वयंवर था, वह अत्यन्त रूपवती थी और उसके पिता के कोई अन्य सन्तान न होने के कारण उस राजा के बाद सम्पूर्ण राज्य भी उसके दामाद को ही मिलने वाला था।
राजकन्या सौंदर्य को चाहने वाली थी, इसलिये उसकी इच्छा थी कि मेरा पति, अतुल सौंदर्यवान हो, हजारों प्रतिष्ठित व्यक्ति और देश-देश के राजकुमार इस स्वयंवर में जमा हुए थे। राज-कन्या उस सभा मण्डली में अपनी सखी के साथ घूमने लगी। अनेक राजा-पुत्रों तथा अन्य लोगों को उसने देखा पर उसे कोई पसन्द न आया। वे राजकुमार जो बड़ी आशा से एकत्रित हुए थे, बिल्कुल हताश हो गये। अन्त में ऐसा जान पड़ने लगा कि मानो अब यह स्वयंवर बिना किसी निर्णय के अधूरा ही समाप्त हो जायगा।

इसी समय एक संन्यासी वहाँ आया, सूर्य के समान उज्ज्वल काँति उसके मुख पर दमक रही थी। उसे देखते ही राजकन्या ने उसके गले में माला डाल दी।

परन्तु संन्यासी ने तत्क्षण ही वह माला गले से निकाल कर फेंक दी और कहा-”राजकन्ये। क्या तू नहीं देखती कि मैं संन्यासी हूँ? मुझे विवाह करके क्या करना है?”

यह सुन कर राजकन्या के पिता ने समझा कि यह संन्यासी कदाचित भिखारी होने के कारण, विवाह करने से डरता होगा, इसलिये उसने संन्यासी से कहा-”मेरी कन्या के साथ ही आधे राज्य के स्वामी तो आप अभी हो जायेंगे और पश्चात् सम्पूर्ण राज्य आपको ही मिलेगा।“

राजा के इस प्रकार कहते ही राजकन्या ने फिर वह माला उस साधु के गले में डाल दी, किन्तु संन्यासी ने फिर उसे निकाल पर फेंक दिया और बोला-”राजन्! विवाह करना मेरा धर्म नहीं है।“

ऐसा कह कर वह तत्काल वहाँ से चला गया, परन्तु उसे देखकर राजकन्या अत्यन्त मोहित हो गई थी, अतएव वह बोली-”विवाह करूंगी तो उसी से करूंगी, नहीं तो मर जाऊँगी।” ऐसा कह कर वह उसके पीछे चलने लगी।

हमारे राजा साहब और संन्यासी यह सब हाल वहाँ खड़े हुए देख रहे थे। संन्यासी ने राजा से कहा-”राजन्! आओ, हम दोनों भी इनके पीछे चल कर देखें कि क्या परिणाम होता है।”

राजा तैयार हो गया और वे उन दोनों के पीछे थोड़े अन्तर पर चलने लगे। चलते-चलते वह संन्यासी बहुत दूर एक घोर जंगल में पहुँचा, उसके पीछे राजकन्या भी उसी जंगल में पहुँची, आगे चलकर वह संन्यासी बिल्कुल अदृश्य हो गया। बेचारी राजकन्या बड़ी दुखी हुई और घोर अरण्य में भयभीत होकर रोने लगी।

इतने में राजा और संन्यासी दोनों उसके पास पहुँच गये और उससे बोले-”राजकन्ये! डरो मत, इस जंगल में तेरी रक्षा करके हम तेरे पिता के पास तुझे कुशल पूर्वक पहुँचा देंगे। परन्तु अब अँधेरा होने लगा है, इसलिये पीछे लौटना भी ठीक नहीं, यह पास ही एक बड़ा वृक्ष है, इसके नीचे रात काट कर प्रातःकाल ही हम लोग चलेंगे।”

राजकन्या को उनका कथन उचित जान पड़ा और तीनों वृक्ष के नीचे रात बिताने लगे।
उस वृक्ष के कोटर में पक्षियों का एक छोटा सा घोंसला था, उसमें वह पक्षी, उसकी मादी और तीन बच्चे थे, एक छोटा सा कुटुम्ब था। नर ने स्वाभाविक ही घोंसले से जरा बाहर सिर निकाल कर देखा तो उसे यह तीन अतिथि दिखाई दिये।

इसलिये वह गृहस्थाश्रमी पक्षी अपनी पत्नी से बोला- “प्रिये! देखो हमारे यहाँ तीन अतिथि आये हुए हैं, जाड़ा बहुत है और घर में आग भी नहीं है।”

इतना कह कर वह पक्षी उड़ गया और एक जलती हुई लकड़ी का टुकड़ा कहीं से अपनी चोंच में उठा लाया और उन तीनों के आगे डाल दिया। उसे लेकर उन तीनों ने आग जलाई।

परन्तु उस पक्षी को इतने से ही सन्तोष न हुआ, वह फिर बोला-”ये तो बेचारे दिनभर के भूखे जान पड़ते हैं, इनको खाने के लिये देने को हमारे घर में कुछ भी नहीं है। प्रिय, हम गृहस्थाश्रमी हैं और भूखे अतिथि को विमुख करना हमारा धर्म नहीं है, हमारे पास जो कुछ भी हो इन्हें देना चाहिये, मेरे पास तो सिर्फ मेरा देह है, यही मैं इन्हें अर्पण करता हूँ।”

इतना कह कर वह पक्षी जलती हुई आग में कूद पड़ा। यह देखकर उसकी स्त्री विचार करने लगी कि ‘इस छोटे से पक्षी को खाकर इन तीनों की तृप्ति कैसे होगी? अपने पति का अनुकरण करके इनकी तृप्ति करना मेरा कर्तव्य है।’ यह सोच कर वह भी आग में कूद पड़ी।
यह सब कार्य उस पक्षी के तीनों बच्चे देख रहे थे, वे भी अपने मन में विचार करने लगे कि-”कदाचित अब भी हमारे इन अतिथियों की तृप्ति न हुई होगी, इसलिये अपने माँ बाप के पीछे इनका सत्कार हमको ही करना चाहिये।” यह कह कर वे तीनों भी आग में कूद पड़े।

यह सब हाल देख कर वे तीनों बड़े चकित हुए। सुबह होने पर वे सब जंगल से चल दिये। राजा और संन्यासी ने राजकन्या को उसके पिता के पास पहुँचाया।

इसके बाद संन्यासी राजा से बोला- ”राजन्!! अपने कर्तव्य का पालन करने वाला चाहे जिस परिस्थिति में हो श्रेष्ठ ही समझना चाहिये। यदि गृहस्थाश्रम स्वीकार करने की तेरी इच्छा हो, तो उस पक्षी की तरह परोपकार के लिये तुझे तैयार रहना चाहिये और यदि संन्यासी होना चाहता हो, तो उस उस यति की तरह राज लक्ष्मी और रति को भी लज्जित करने वाली सुन्दरी तक की उपेक्षा करने के लिये तुझे तैयार होना चाहिये। कठोर कर्तव्य धर्म को पालन करते हुए दोनों ही बड़े हैं।“

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ध्यान से पढ़ना मजा आ जाएगा

इसे कहते हैं, दही में लपेटकर मारना…😜😜😂😂😂👏🏼👏🏼

बड़ा रोचक क़िस्सा है । कृपया अंत तक पढ़ें

राजा के दरबार मे…
एक आदमी नौकरी मांगने के लिए आया,,,,,
उससे उसकी क़ाबलियत पूछी गई,
तो वो बोला,
“मैं आदमी हो चाहे जानवर, उसकी शक्ल देख कर उसके बारे में बता सकता हूँ,,😇
राजा ने उसे अपने खास “घोड़ों के अस्तबल का इंचार्ज” बना दिया,,,,,😎
कुछ ही दिन बाद राजा ने उससे अपने सब से महंगे और मनपसन्द घोड़े के बारे में पूछा,
तो उसने कहा….
नस्ली नही है….😏
राजा को हैरानी हुई, 😳
उसने जंगल से घोड़े वाले को बुला कर पूछा,,,,,
उसने बताया घोड़ा नस्ली तो हैं,
पर इसके पैदा होते ही इसकी मां मर गई थी,
इसलिए ये एक गाय का दूध पी कर उसके साथ पला बढ़ा है,,,,,
राजा ने अपने नौकर को बुलाया और पूछा तुम को कैसे पता चला के घोड़ा नस्ली नहीं हैं??🧐
“उसने कहा
“जब ये घास खाता है तो गायों की तरह सर नीचे करके,
जबकि नस्ली घोड़ा घास मुह में लेकर सर उठा लेता है,,😎
राजा उसकी काबलियत से बहुत खुश हुआ,😊
उसने नौकर के घर अनाज ,घी, मुर्गे, और ढेर सारी बकरियां बतौर इनाम भिजवा दिए ,🥰
और अब उसे रानी के महल में तैनात कर दिया,,,😎
कुछ दिनो बाद राजा ने उससे रानी के बारे में राय मांगी,🧐
उसने कहा,
“तौर तरीके तो रानी जैसे हैं,
लेकिन पैदाइशी नहीं हैं,😏
राजा के पैरों तले जमीन निकल गई, 😨
उसने अपनी सास को बुलाया,🤨
सास ने कहा
“हक़ीक़त ये है कि आपके पिताजी ने मेरे पति से हमारी बेटी की पैदाइश पर ही रिश्ता मांग लिया था,
लेकिन हमारी बेटी 6 महीने में ही मर गई थी,
लिहाज़ा हम ने आपके रजवाड़े से करीबी रखने के लिए किसी और की बच्ची को अपनी बेटी बना लिया,,🥰
राजा ने फिर अपने नौकर से पूछा,
“तुम को कैसे पता चला??🧐
“”उसने कहा,
” रानी साहिबा का नौकरो के साथ सुलूक गंवारों से भी बुरा है,
एक खानदानी इंसान का दूसरों से व्यवहार करने का एक तरीका होता है,
जो रानी साहिबा में बिल्कुल नही,😏
राजा फिर उसकी पारखी नज़रों से खुश हुआ,😇
और फिर से बहुत सारा अनाज भेड़ बकरियां बतौर इनाम दी,🥰
साथ ही उसे अपने दरबार मे तैनात कर लिया,,😎
कुछ वक्त गुज़रा,
राजा ने फिर नौकर को बुलाया,
और अपने बारे में पूछा,😇
नौकर ने कहा
“जान की सलामती हो तो कहूँ”🙏🏻
राजा ने वादा किया तो उसने कहा,
“न तो आप राजा के बेटे हो,
और न ही आपका चलन राजाओं वाला है”😐
राजा को बहुत गुस्सा आया, 😡
मगर जान की सलामती का वचन दे चुका था,😏
राजा सीधा अपनी मां के महल पहुंचा…
मां ने कहा,
ये सच है,
तुम एक चरवाहे के बेटे हो,
हमारी औलाद नहीं थी,
तो तुम्हे गोद लेकर हम ने पाला,,,,,😊
राजा ने नौकर को बुलाया और पूछा ,
बता, “भोई वाले तुझे कैसे पता चला????🧐🤨
उसने कहा
” जब राजा किसी को “इनाम दिया करते हैं,
तो हीरे मोती और जवाहरात की शक्ल में देते हैं,
लेकिन आप भेड़, बकरियां, खाने पीने की चीजें दिया करते हैं…😏
ये रवैया किसी राजा का नही,
किसी चरवाहे के बेटे का ही हो सकता है,,🤨
किसी इंसान के पास कितनी धन दौलत, सुख समृद्धि, रुतबा, इल्म, बाहुबल हैं ये सब बाहरी दिखावा हैं । 😏
इंसान की असलियत की पहचान,
उसके व्यवहार और उसकी नियत से होती है,
इसीलिए…
“आँख मारना”
“आलु से सोना”,
” कभी 72000 प्रतिमाह”,
“कभी 72000 करोड़ प्रतिवर्ष”
“भरी संसद में आंख मारना”
क्या दर्शाता है ये..?
कि वह बार डांसर का बेटा है, इसलिए कम अक्ल भी है,,,,,,
हैसियत कुछ भी हो,
पर सोच नही बदलती,,,
वोट बर्बाद न करें…😏
क्योंकि…
आएगा तो मोदी ही😡
🤣🤣🤣🤣🤣🤣
दिल खुश हो गया

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आज का प्रेरक प्रसंग
📔📔🏆🏆🏆🏆🏆🏆📔📔 *ईश्वर दर्शन*

एक राज्य के राजा जिद पकड़ ली की उसे ईश्वर के दर्शन करने हैं, और राजा ने इसके बारे में दरबारियों से उपाय माँगा, की किस प्रकार ईश्वर का दर्शन किया जाए। दरबारियों ने जवाब दिया की महाराज यह कार्य तो मंत्री जी ही कर सकते हैं।

तो फिर क्या था, राजा ने यह कार्य मंत्री जी को सौप दिया, और मंत्री से कहां की हमें ईश्वर के दर्शन कराया जाये, नहीं तो मंत्री जी को कड़ी से कड़ी सजा दी जाएगी। मंत्री बेचारे घबरा गए, उन्होंने राजा से एक माह की मोहलत मांगी।

फिर दिन पे दिन बीतते गए परन्तु बेचारे मंत्री को कुछ उपाय ही नहीं सूझ रहा था, चिंता में अपना खाना-पीना भी कम कर दिए थे, इस वजह से वे दुबले पतले होने लगे,

मंत्री जी की पत्नी ने अपने पति की इस हालत को देखते हुए उन्हें ये सलाह दिया की आप किसी संत बाबा के पास चले जाएँ, सायद समस्या का कोई हल मिल जाये।

फिर क्या था बेचारे मंत्री जी किसी अच्छे संत की तलाश में निकल गए, तलाश करते-करते कई दिन गुजर गए पर ऐसा कोई नहीं मिला जो मंत्री जी की समस्या का हल कर पाता।

एक दिन वह जंगल के पास से गुजर रहे थे, गर्मी और धुप इतनी थी की वे थके हारे और पूरी तरह चिंता में डूबे, सुस्ताने के लिए एक पेड़ के छाव के निचे बैठ गए और उसकी आँख लग गयी।

कुछ देर बाद किसी ने मंत्री को जगाया, मंत्री ने आँख खोल कर देखा की सामने एक सन्यासी खड़ा हुआ है। सन्यासी को पानी चाहिए था सो मंत्री ने पानी दिया। सन्यासी से मंत्री के चिंतित चेहरे को देखते हुए पूछा की क्या बात है तुम बहुत उदास दिखाई दे रहे हो।

इस पर मंत्री महोदय ने सन्यासी को सारी बात बता दी। मंत्री की बात सुनकर सन्यासी ने कहा की आप चिंता ना करें, मुझे अपने साथ ले चलें, मैं आपके राजा को ईश्वर के दर्शन करा दूंगा।

मंत्री की तो मानों सारी चिंताए समाप्त हो गयी। उसने सन्यासी से पूछना चाहा की आप राजा को ईश्वर के दर्शन किस प्रकार कराओगे, परन्तु सन्यासी ने कहां की वे स्वयं दरबार में चलकर राजा को उत्तर देंगे।

फिर मंत्री सन्यासी को लेकर राजा के दरबार में पंहुचा और राजा से निवेदन किया की महाराज यह महात्मा आपको ईश्वर के दर्शन करा देंगे। राजा ने प्रसन्ता से उस महात्मा का स्वागत किया। फिर महात्मा ने राजा से एक बड़ा सा पात्र मंगवाया जिसमे कच्चा दूध भरा हुआ था।

महात्मा ने कहा की राजन अभी आपको ईश्वर के दर्शन करा देता हूँ। और ऐसा बोलकर उस पात्र के दूध को चम्मच से हिलाने लगे। उस चम्मच को हिलाते-हिलाते कुछ समय बीत गया, परन्तु राजा को कोई ईश्वर का दर्शन नहीं हुआ। तो राजा ने महात्मा से पूछा की आप क्या कर रहें है।

महात्मा बोले दूध से मक्खन निकालने की कोसिस कर रहा हूँ। यह बात सुनकर राजा अचरज में पड़ गए, और महात्मा से बोला की मक्खन ऐसे थोड़ी निकलता है, पहले दूध को गर्म करना पड़ता है, फिर दही जमानी पड़ती है और फिर उसे बिलोकर उसमे से मक्खन निकालना पड़ता है।

राजा की इस बात पर महात्मा बोले की राजन जिस प्रकार दूध से सीधा मक्खन नहीं निकाला जा सकता ठीक उसी प्रकार ईश्वर के सीधे-सीधे दर्शन नहीं हो सकते।

इसके लिए योग, भक्ति, शरीर और मन विचार को सुद्ध करना पड़ता है, और फिर जप तप और साधना से तपाना पड़ता है। फिर प्रेम व भक्ति के माध्यम से ईश्वर का दर्शन संभव है।

दोस्तों यह सिख अनेक चीजों पे लागु होती है, हम अनेक सफल लोगों को देखते है और उनके जैसा बनना चाहते है। परन्तु हम यह नहीं देखते की वो आज सफलता के जिस मुकाम पे है, वहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने कितनी मेहनत की, कितनी असफलता देखी और कितनी रातें जगी, तब जाके यह मुकाम पाया है।

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94 साल के एक बूढ़े व्यक्ति को मकान मालिक ने किराया न दे पाने पर किराए के मकान से निकाल दिया। बूढ़े के पास एक पुराना बिस्तर, कुछ एल्युमीनियम के बर्तन, एक प्लास्टिक की बाल्टी और एक मग आदि के अलावा शायद ही कोई सामान था। बूढ़े ने मालिक से किराया देने के लिए कुछ समय देने का अनुरोध किया। पड़ोसियों को भी बूढ़े आदमी पर दया आयी, और उन्होंने मकान मालिक को किराए का भुगतान करने के लिए कुछ समय देने के लिए मना लिया। मकान मालिक ने अनिच्छा से ही उसे किराया देने के लिए कुछ समय दिया।

बूढ़ा अपना सामान अंदर ले गया।

रास्ते से गुजर रहे एक पत्रकार ने रुक कर यह सारा नजारा देखा। उसने सोचा कि यह मामला उसके समाचार पत्र में प्रकाशित करने के लिए उपयोगी होगा। उसने एक शीर्षक भी सोच लिया, ”क्रूर मकान मालिक, बूढ़े को पैसे के लिए किराए के घर से बाहर निकाल देता है।” फिर उसने किराएदार बूढ़े की और किराए के घर की कुछ तस्वीरें भी ले लीं।

पत्रकार ने जाकर अपने प्रेस मालिक को इस घटना के बारे में बताया। प्रेस के मालिक ने तस्वीरों को देखा और हैरान रह गए। उन्होंने पत्रकार से पूछा, कि क्या वह उस बूढ़े आदमी को जानता है? पत्रकार ने कहा, नहीं।

अगले दिन अखबार के पहले पन्ने पर बड़ी खबर छपी। शीर्षक था, ”भारत के पूर्व प्रधान मंत्री गुलजारीलाल नंदा एक दयनीय जीवन जी रहे हैं”। खबर में आगे लिखा था कि कैसे पूर्व प्रधान मंत्री किराया नहीं दे पा रहे थे और कैसे उन्हें घर से बाहर निकाल दिया गया था। टिप्पणी की थी के आजकल फ्रेशर भी खूब पैसा कमा लेते हैं। जबकि एक व्यक्ति जो दो बार पूर्व प्रधान मंत्री रह चुका है और लंबे समय तक केंद्रीय मंत्री भी रहा है, उसके पास अपना ख़ुद का घर भी नहीं।

दरअसल गुलजारीलाल नंदा को वह स्वतंत्रता सेनानी होने के कारण रु. 500/- प्रति माह भत्ता मिलता था। लेकिन उन्होंने यह कहते हुए इस पैसे को अस्वीकार किया था, कि उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों के भत्ते के लिए लड़ाई नहीं लड़ी। बाद में दोस्तों ने उसे यह स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया यह कहते हुए कि उनके पास उत्पन्न का अन्य कोई स्रोत नहीं है। इसी पैसों से वह अपना किराया देकर गुजारा करते थे।

अगले दिन वर्तमान प्रधान मंत्री ने मंत्रियों और अधिकारियों को वाहनों के बेड़े के साथ उनके घर भेजा। इतने वीआइपी वाहनों के बेड़े को देखकर मकान मालिक दंग रह गया। तब जाकर उसे पता चला कि उसका किराएदार, श्री. गुलजारीलाल नंदा भारत के पूर्व प्रधान मंत्री थे। मकान मालिक अपने दुर्व्यवहार के लिए तुरंत गुलजारीलाल नंदा के चरणों पर झुक गया।

अधिकारियों और वीआईपीयोंने गुलजारीलाल नंदा से सरकारी आवास और अन्य सुविधाएं को स्वीकार करने का अनुरोध किया। श्री. गुलजारीलाल नंदा ने इस बुढ़ापे में ऐसी सुविधाओं का क्या काम, यह कह कर उनके प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। अंतिम श्वास तक वे एक सामान्य नागरिक की तरह, एक सच्चे गांधीवादी बन कर ही रहते थे। 1997 में सरकार ने उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया।
(देहावसान की 23वीं वर्षगांठ पर, साभार)🙏

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एक प्रेरक प्रसंग :- प्रतिवर्ष माता पिता अपने पुत्र को गर्मी की छुट्टियों में उसके दादा दादी के घर ले जाते । 10-20 दिन सब वहीं रहते और फिर लौट आते। ऐसा प्रतिवर्ष चलता रहा। बालक थोड़ा बड़ा हो गया । एक दिन उसने अपने माता पिता से कहा कि अब मैं अकेला भी दादी के घर जा सकता हूं ।तो आप मुझे अकेले को दादी के घर जाने दो । माता पिता पहले तो राजी नहीं हुए। परंतु बालक ने जब जोर दिया तो उसको सारी सावधानी समझाते हुए अनुमति दे दी । जाने का दिन आया । बालक को छोड़ने स्टेशन पर गए।

ट्रेन में उसको उसकी सीट पर बिठाया । फिर बाहर आकर खिड़की में से उससे बात की ।उसको सारी सावधानियां फिर से समझाई।
बालक ने कहा कि मुझे सब याद है। आप चिंता मत करो ।
ट्रेन को सिग्नल मिला। व्हीसिल लगी। तब पिता ने एक लिफाफा पुत्र को दिया कि बेटा अगर रास्ते में तुझे डर लगे तो यह लिफाफा खोल कर इसमें जो लिखा उसको पढ़ना
बालक ने पत्र जेब में रख लिया ।
माता पिता ने हाथ हिलाकर विदा किया। ट्रैन चलती रही। हर स्टेशन पर लोग आते रहे पुराने उतरते रहे ।
सबके साथ कोई न कोई था ।
अब बालक को अकेलापन लगा।
ट्रेन में अगले स्टेशन पर ऐसी शख्सियत आई जिसका चेहरा भयानक था।
पहली बार बिना माता-पिता के, बिना किसी सहयोगी के ,यात्रा कर रहा था।
उसने अपनी आंखें बंद कर सोने का प्रयास किया परंतु बार-बार वह चेहरा उसकी आंखों के सामने घूमने लगा। बालक भयभीत हो गया ।रुंआसा हो गया ।
तब उसको पिता की चिट्ठी। याद आई।
उसने जेब में हाथ डाला। हाथ कांपरहा था। पत्र निकाला । लिफाफा खोला ।
पढा
पिता ने लिखा था तू डर मत

मैं पास वाले कंपार्टमेंट में ही इसी गाड़ी में बैठा हूं ।
बालक का चेहरा खिल उठा। सब डर काफूर हो गया।

मित्रों
जीवन भी ऐसा ही है ।
जब भगवान ने हमको इस दुनिया में भेजा उस समय उन्होंने हमको भी एक पत्र दिया है ,जिसमें लिखा है , “उदास मत होना ,मैं हर पल, हर क्षण ,हर जगह तुम्हारे साथ हूं । पूरी यात्रा तुम्हारे साथ करता हूं । केवल तुम मुझे स्मरण रखते रहो। सच्चे मन से याद करना, मैं एक पल में आ जाऊंगा।

मित्रों
इसलिए चिंता नहीं करना।
घबराना नहीं । हताश नहीं होना ।
महाप्रभु जी ने लिखा है *" चिंता कोपि न कार्या "* चिंता करने से मानसिक और शारीरिक दोनों स्वास्थ्य प्रभावित होते हैं । परमात्मा पर ,प्रभु पर, अपने इष्ट पर, हर क्षण विश्वास रखें ।

वह हमेशा हमारे साथ हैं । हमारी पूरी यात्रा के दौरान..
अन्तिम श्वास तक

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