Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🙏 सुखी कौन 🙏

एक भिखारी किसी किसान के घर भीख माँगने गया,
किसान की स्त्री घर में थी उसने चने की रोटी बना रखी थी।
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किसान आया उसने अपने बच्चों का मुख चूमा, स्त्री ने उनके हाथ पैर धुलाये, वह रोटी खाने बैठ गया।
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स्त्री ने एक मुट्ठी चना भिखारी को डाल दिया, भिखारी चना लेकर चल दिया।
रास्ते में वह सोचने लगा:- “हमारा भी कोई जीवन है ? दिन भर कुत्ते की तरह माँगते फिरते हैं, फिर स्वयं बनाना पड़ता है।
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इस किसान को देखो कैसा सुन्दर घर है, घर में स्त्री हैं, बच्चे हैं। अपने आप अन्न पैदा करता है, बच्चों के साथ प्रेम से भोजन करता है वास्तव में सुखी तो यह किसान है।
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इधर वह किसान रोटी खाते-खाते अपनी स्त्री से कहने लगा:-
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“नीला बैल बहुत बुड्ढा हो गया है, अब वह किसी तरह काम नहीं देता यदि कही से कुछ रुपयों का इन्तजाम हो जाय तो इस साल काम चले।
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साधोराम महाजन के पास जाऊँगा, वह ब्याज पर दे देगा।”
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भोजन करके वह साधोराम महाजन के पास गया, बहुत देर चिरौरी बिनती करने पर 1रु. सैकड़ा सूद पर साधों ने रुपये देना स्वीकार किया।
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एक लोहे की तिजोरी में से साधोराम ने एक थैली निकाली और गिनकर रुपये किसान को दिये।
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रुपये लेकर किसान अपने घर को चला, वह रास्ते में सोचने लगा-”हम भी कोई आदमी हैं, घर में 5 रु. भी नकद नहीं। कितनी चिरौरी विनती करने पर उसने रुपये दिये,
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साधो कितना धनी है, उस पर सैकड़ों रुपये है “वास्तव में सुखी तो यह साधोराम ही है।
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साधोराम छोटी सी दुकान करता था, वह एक बड़ी दुकान से कपड़े ले आता था और उसे बेचता था।
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दूसरे दिन साधोराम कपड़े लेने गया, वहाँ सेठ पृथ्वीचन्द की दुकान से कपड़ा लिया।
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वह वहाँ बैठा ही था, कि इतनी देर में कई तार आए कोई बम्बई का था कोई कलकत्ते का, किसी में लिखा था 5 लाख मुनाफा हुआ, किसी में एक लाख का।
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साधो महाजन यह सब देखता रहा, कपड़ा लेकर वह चला।
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रास्ते में सोचने लगा “हम भी कोई आदमी हैं, सौ दो सौ जुड़ गये महाजन कहलाने लगे।
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पृथ्वीचन्द कैसे हैं, एक दिन में लाखों का फायदा “वास्तव में सुखी तो यह है।”
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उधर पृथ्वीचन्द बैठे थे कि इतने ही में तार आया कि 5 लाख का घाटा हुआ। वे बड़ी चिन्ता में थे कि नौकर ने कहा:-
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आज लाट साहब की रायबहादुर सेठ के यहाँ दावत है आपको जाना है मोटर तैयार है।” पृथ्वीचन्द मोटर पर चढ़ कर रायबहादुर की कोठी पर गया,
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वहाँ सोने चाँदी की कुर्सियाँ पड़ी थी रायबहादुर जी से कलक्टर कमिश्नर हाथ मिला रहे थे, बड़े-बड़े सेठ खड़े थे,
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वहाँ पृथ्वीचन्द सेठ को कौन पूछता वे भी एक कुर्सी पर जाकर बैठ गये।
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लाट साहब आये, रायबहादुर से हाथ मिलाया, उनके साथ चाय पी और चले गये।
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पृथ्वीचन्द अपनी मोटर में लौट रहें थे रास्ते में सोचते आते थे, हम भी कोई सेठ है 5 लाख के घाटे से ही घबड़ा गये, रायबहादुर का कैसा ठाठ है लाट साहब उनसे हाथ मिलाते हैं “वास्तव में सुखी तो ये ही है।”
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अब इधर लाट साहब के चले जाने पर रायबहदुर के सिर में दर्द हो गया, बड़े-बड़े डॉक्टर आये एक कमरे वे पड़े थे।
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कई तार घाटे के एक साथ आ गये थे, उनकी भी चिन्ता थी, कारोबार की भी बात याद आ गई, वे चिन्ता में पड़े थे,
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खिड़की से उन्होंने झाँक कर देखा एक भिखारी हाथ में एक डंडा लिये अपनी मस्ती में जा रहा था।
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रायबहदुर ने उसे देखा और बोले:- ”वास्तव में तो सुखी यही है, इसे न तो घाटे की चिन्ता न मुनाफे की फिक्र, इसे लाट साहब को पार्टी भी नहीं देनी पड़ती सुखी तो यही है।”
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इस कहानी का कहने का मतलब इतना ही है, कि हम एक दूसरे को सुखी समझते हैं। वास्तव में सुखी कौन है इसे तो वही जानता है जिसे आन्तरिक शान्ति है।

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बरसता आशीष

माँ की बरसी पर तस्वीर के आगे फूल चढ़ाते हुए मेरे आँसू जैसे सारे बाँध तोड़ कर निकल पड़े ..दोनों बच्चे और माधवी हाथ जोड़े बैठे थे। अश्रु के साथ कुछ स्मृतियां भी बह गयी।

“माँ! देखो माधवी फिर एक महीने से मायके में है आफिस से फोन किया तो आने के लिए मना कर रही है .” मैं बार बार माधवी के मायके जाने से परेशान हो कर बोला।

” मैं जानती हूँ वीरेंद्र!.. यह सब तेरे छोटे चाचा का काम है।”

“कुछ ही साल बड़े ,दोस्त जैसे चाचा नही.. नही ” मुझे विश्वास ही नही हुआ .
“माँ !तुम तो बस कुछ भी बोलती रहती हो ” मैं बोला."अरे कुछ पता भी है तेरे तीनो चाचा मेरे सौतेले देवर है, तेरे पिताजी तो दबते थे इनसे पर मैं कभी नही दबी। ..तेरे छोटे चाचा चाहते थे कि तेरी शादी उनकी साली से हो पर मैंने मना कर दिया ..चिढ़कर दोनों मियां बीबी माधवी की माँ के कान भरते है और माधवी की माँ माधवी के।"

“ओफ्फो.. मैं चाचा से फोन पर बात करता हूँ ।”मैं झुंझला कर बोला

” नही ..जब अपना सिक्का ही खोटा हो तो परखने वाले का क्या दोष.. चिंता न कर एक कागज ला और लिख कर डाक खाने में डाल दे.”
माँ बोली थी “माधवी यह घर तेरा है.. इस घर मे तेरा स्वागत है ..हम लेने नही आयेंगे अगर अब नही आयी तो वीरेंद्र तलाक़ के कागज भेजेगा “मैं अपनी छटी पास माँ को देखता रह गया फिर यही शब्द मैंने अपनी तरफ से लिख दिये।

हफ्ता भी न बीता माधवी लौट आई।दूसरे दिन माँ बोली “सुन माधवी !मैंने तुझे सोते से जगाया नही.. बैठे से उठाया नही ..अब तू इसको भी न समझे तो तेरी पढ़ाई लिखाई बेकार है”. फिर माधवी को चाचा चाची के बारे में बताया।

“अरे मैंने तो जिंदगी से पंगा ले लिया ये तो कुछ नही है ” माँ कोई भी परेशानी आने पर यही कहती थी।वाकई में माँ बहुत सशक्त थी ..पिताजी के न रहने पर सिलाई करके मुझे इंजीनियर बनाया ,घर का खर्चा चलाया और जीवन भर सौतेली सास और देवरों के सामने नही झुकी।

शायद माँ को अपनी मृत्यु का भान हो चुका था। मैं रोज रात को माँ के पास जरूर लेटता था ।एक दिन माँ बोली “वीरेंद्र !मकान की किश्ते पूरी हो गयी हो तो तू अब एक कार खरीद ले चाहे पुरानी ।”
माँ कहे और मैं ना मानू ..दो दिन बाद एक नयी कार मैंने घर के सामने खड़ी कर दी। माँ की खुशी का ठिकाना न था।पर खुशी ठहरने के लिए नही होती दो महीने बाद माँ को तीसरा हार्ट अटैक आया और इसी कार में हॉस्पिटल जाते हुए माँ के प्राण निकले।
माँ चाहे इस दुनिया मे नही है पर मेरे घर ,मस्तिष्क में आजीवन रहेगी।
मैं माँ की तस्वीर के सामने नतमस्तक हो कर मन ही मन मे बोला ” माँ अगर तुम्हारी शक्ति न होती तो मेरा क्या होता ?अपना आशीष हमेशा बरसाना मेरे ऊपर।”
ऐसा लगा माँ कह रही है “चिंता न कर।”मैं चौंक गया और उठ कर माँ के लगाए हरसिंगार के वृक्ष में माधवी और बच्चों के साथ जल अर्पण कर दिया। कुछ पुष्प झड़ पड़े उन्हें माँ का आशीर्वाद समझ कर माथे से लगा लिया।

दीप्ति सिंह (स्वरचित एवं मौलिक)

Posted in गौ माता - Gau maata

🍀 ગાય વિષે થોડી જાણકારી 🍀

૧. ગાય માતા જે જગ્યા એ ઊભી રહી ને
ખુશીથી શ્વાસ લઈ શકે ત્યા વાસુદોષ પુરો થઈ જાય છે.

૨.જે જગ્યા એ ગાય માતા ખુશીથી ભાભરે એ જગ્યા એ દેવી દેવતા ફુલો વરસાવે છે.

૩. ગાય માતા ના ગળામા ટોકરી અવસ્ય બાધવી ગાયના ગળામા બાધેલી ટોકરી વાગવાથી ગાયમાતા ની આરતી થાય છે.

૪. જે માણસ ગાય ની સેવા પુજા કરે છે
તેના ઉપર આવનારુ બધુ દુંખ ગાય માતા હરી લે છે.

૫. ગાયમાતા ની ખરી મા નાગદેવતા નો વાસ હોય છે જે જગ્યા યે ગાય માતા ફરેછે તે જગ્યા એ સાંપ અને વિંછી કયારેય આવતા નથી.

૬.ગાય માતા ના છાંણ મા લક્ષ્મીજી નો વાસ હોય છે.

૭.ગાય માતા ની એક આંખ મા સુયૅ અને બીજી આંખ મા ચન્દ્ર દેવ નો વાસ હોય છે

૮. ગાય માતા ના દુધ મા સોનેરી તત્વો મળી આવે છે જે રોગો ની ક્ષ્મતા ને નાશ કરીનાખે છે.

૯.ગાય માતા ની પુછડી મા હનુમાનજી નો વાસ હોય છે. કોઈ પણ વ્યક્તિ ને ખરાબ નજર લાગે તો ગાય માતા ની પુછડી થી ઝાડો નાખવાથી નજર ઊતરી જાય છે.

૧૦.ગાય માતા ની પીઠ ઊપર એક કુંન્ધ આવેલી હોય છે એ કુંન્ધ ઊપર સુર્યકેતુ નામ ની નાળી હોય છે રોજ સવારે અડધો કલાક ગાય માતા ની કુંન્ધ ઊપર હાથ ફેરવવાથી રોગો નો નાશ થાય છે.

૧૧.એક ગાય માતા ને ચારો ખવડાવાથી તેત્રીશ કરોડ દેવી દેવતાઓ ને ભોગ ચડે છે.

૧૨.ગાય માતા ના દુધ.ધી.માખણ.દહી.છાણ.ગૌ મુત્ર થી બનાવેલ પંચગવ્વીય હજારો રોગો ની દવા છે આના સેવન થી અસાધારણ રોગ મટીજાય છે.

૧૩.જે માણસ ની ભાગ્ય રેખા સુતી હોય એ માણસે એની હથેડી મા ગોળ રાખી ગાય માતા ની જીભ થી ચટાડે ગાય માતા નીજીભ થી હથેડી પર રાખેલ ગોળ ને ચાટવા થી એ માણસ ની ભાગ્ય રેખા ખુલી જશે.

૧૪. ગાય માતા ના ચારેય પગની વચેથી નીકળી ને પરીક્રમા કરવાથી મનુષ્ય ભય મુક્ત થઈજાય છે.

૧૫.ગાય માતા ના ગર્ભ મા થી મહાન વિદ્વાન ધમઁ રક્ષક ગૌ કણજી મહરાજ પૈદા થયાતા.

૧૬. ગાય માતા ની સેવા માટે આ પ્રુથ્વી પર દેવી દેવતાઓયે અવતાર લીધોહતો.

૧૭.જયારે ગાય માતા વાછડા ને જન્મ આપે ત્યારે પેહલુ દુધ બાઝ સ્ત્રી ને પીવળાવા થી એનુ બાઝપણુ ખત્મ થઈજાય છે.

૧૮.સ્વસ્થ ગૌ માતા નુ ગૌ મુત્ર ને રોજ બેતોલા સાફ કપડામા ગાળી ને પીવાથી
બધા રોગ મટીજાય છે.

૧૯.ગાય માતા પ્રેમ ભરી નજરથી જેને જાેવે એના ઊપર ગાય માતા ની ક્રુપા થઈજાય છે.

૨૦. કાળી ગાય ની પુુજા કરવાથી નવ ગ્રહ શાન્ત રહે છે જે ધ્યાનપુરવક ધમૅ ની સાથે ગાય ની પુજા કરે છે એમને શત્રુ દોષ થી છુટકારો મલે છે..

Posted in संस्कृत साहित्य

मृत्यु


आदमी खाली हाथ नहीं आता, मरने के बाद 3 चीजें साथ ले जाता है, जानिए रहस्य!!!!!!!!!!

सब कहते हैं कि मरने के बाद कुछ भी साथ नहीं जाता है सब यहीं का यहीं धरा रह जाता है। आदमी खाली हाथ आया था और खाली हाथ चला जाता है लेकिन यह सत्य नहीं है। दुनिया में ऐसी कई बाते हैं, लेकिन वह सत्य नहीं है। आओ जानते हैं कि आदमी जन्म लेता है तो क्या साथ लाता और जब वह मर जाता है तो क्या साथ ले जाता है।

हिन्दू धर्म कहता है कि व्यक्ति जो साथ लाया था वह तो साथ ले ही जाएगा, साथ ही वह भी साथ ले जाएगा जो उसने इस जन्म में अर्जित किया है। क्या साथ लाया था और क्या अर्जित किया है यह जानना जारू।

व्यक्ति जब जन्म लेता है तो अपने साथ तीन चीजें लाता है, 1.संचित कर्म, 2.स्मृति और 3.जागृति। हां एक चौथी चीज भी है और वह है सूक्ष्म शरीर। इसके संबंध में हम बाद में कभी बात करेंगे।

1.क्या है संचित कर्म?

हिंदू दर्शन के अनुसार, मृत्यु के बाद मात्र यह भौतिक शरीर या देह ही नष्ट होती है, जबकि सूक्ष्म शरीर जन्म-जन्मांतरों तक आत्मा के साथ संयुक्त रहता है। यह सूक्ष्म शरीर ही जन्म-जन्मांतरों के शुभ-अशुभ संस्कारों का वाहक होता है। संस्कार अर्थात हमने जो भी अच्छे और बुरे कर्म किए हैं वे सभी और हमारी आदतें।

ये संस्कार मनुष्य के पूर्वजन्मों से ही नहीं आते, अपितु माता-पिता के संस्कार भी रज और वीर्य के माध्यम से उसमें (सूक्ष्म शरीर में) प्रविष्ट होते हैं, जिससे मनुष्य का व्यक्तित्व इन दोनों से ही प्रभावित होता है। बालक के गर्भधारण की परिस्थितियां भी इन पर प्रभाव डालती हैं। ये कर्म ‘संस्कार’ ही प्रत्येक जन्म में संगृहीत (एकत्र) होते चले जाते हैं, जिससे कर्मों (अच्छे-बुरे दोनों) का एक विशाल भंडार बनता जाता है। इसे ‘संचित कर्म’ कहते हैं।

अब जब व्यक्ति मरता है तो इन्हीं संचित कर्मों में इस जन्म के कर्म भी एकत्रित करके ले जाता है। दरअसल, इन संचित कर्मों में से एक छोटा हिस्सा हमें नए जन्म में भोगने के लिए मिल जाता है। इसे प्रारब्ध कहते हैं। ये प्रारब्ध कर्म ही नए होने वाले जन्म की योनि व उसमें मिलने वाले भोग को निर्धारित करते हैं। फिर इस जन्म में किए गए कर्म, जिनको क्रियमाण कहा जाता है, वह भी संचित संस्कारों में जाकर जमा होते रहते हैं।

2.क्या है स्मृति?

एक प्रतिशत भी लोग नहीं होंगे जो अपने पिछले जन्म की स्मृति को खोलकर यह जान लेते होंगे कि मैं पिछले जन्म में क्या था। प्रत्येक व्यक्ति के पास अपने पिछले और इस जन्म की कुछ खास स्मृतियां संग्रहित रहती हैं। यह मेमोरी कभी भी समाप्त नहीं होती हैं। भगवान श्रीकृष्ण गीता में अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन तुझे अपने अगले और पिछले जन्मों की याद नहीं है। लेकिन मुझे अपने लाखों जन्मों की स्मृति हैं। लाखों वर्ष पूर्व भी तू था और मैं भी था। किस जन्म में तू क्या था यह मैं जानता हूं और अगले जन्म में तू क्या होगा यह भी मैं जानता हूं क्योंकि मैं तेरे संचित कर्मों की गति भी देख रहा हूं।

अत: यह कहना होगा कि जब व्यक्ति जन्म लेता है तो वह अपने पिछले जन्म की स्मृतियां साथ लाता है लेकिन वह धीरे धीरे उन्हें भूलता जाता है। भूलने का अर्थ यह नहीं कि वे स्मृतियां सता के लिए मिट गए। वे अभी भी आपकी हार्ड डिस्क में है लेकिन वह रेम से हट गई है। डी में कहीं सुरक्षित रखी है। इसी तरह जब व्यक्ति मरता है तो वह इस जन्म की भी स्मृतियां बटोरकर साथ ले जाता है।

3.जागृति क्या है?

यह विषय थोड़ा कठिन है। प्रत्येक मनुष्य और प्रा‍णी के भीतर जाग्रति का स्तर अलग अलग होता है। यह उसकी जीवन शैली, संवेदना और सोच पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए हम समझ सकते हैं कि एक कुत्ता मनुष्य कम जागृत है। जैसे एक शराबी व्यक्ति होता है। आपमें बेहोशी का स्तर ज्यादा है तो आप भावना और विचारों के वश में रहकर ही जीवन यापन करेंगे। अर्थात आपके जीवन में भोग, संभोग और भावना ही महत्वपूर्ण होगी।

आप इसे इस तरह समझें की आपमें और पशुओं में क्या खास फर्क है? आप कपड़े पहनते हैं और थोड़ा बहुत सोचते हैं लेकिन आपमें वहीं सारी प्रवृत्तियां हैं जो कि एक पशु में होती है। जैसे ईर्ष्या, क्रोध, काम, भूख, लालच, मद आदि सभी तरह की प्राथमिक प्रवृत्तियां। प्राणियों को प्राणी इसलिए कहते हैं कि वह प्राण के स्तर पर भी जीते और मर जाते हैं। उनमें मन ज्यादा सक्रिय नहीं रहता है। मनुष्य में मन ज्यादा सक्रिय रहता है इसलिए वे मन की भावना और विचारों में ही ज्यादा रमते हैं। वे मानसिक हैं। मन से उपर उठने से जाग्रति शुरू होती है। जाग्रति की प्रथम स्टेज बुद्धि और द्वितिय स्टेज विवेक और तृ‍तीय स्टेज आत्मावान होने में है। प्रार्थना और ध्यान से जागृति बढ़ती है।

उक्त सभी को मिलाकर कहा जाता है कि व्यक्ति अपने साथ धर्म लाता है और धर्म ही ले जाता है।

शास्त्र लिखते हैं कि –
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्टलोष्टसमं जना:।
मुहूर्तमिव रोदित्वा ततोयान्ति पराङ्मुखा:।।
तैस्तच्छरीमुत्सृष्टं धर्म एकोनुगच्छति।
तस्माद्धर्म: सहायश्च सेवितव्य: सदा नृभि:।।

इसका सरल और व्यावहारिक अर्थ यही है कि मृत्यु होने पर व्यक्ति के सगे-संबंधी भी उसकी मृत देह से कुछ समय में ही मोह या भावना छोड़ देते हैं और अंतिम संस्कार कर चले जाते हैं। किंतु इस समय भी मात्र धर्म ही ऐसा साथी होता है, जो उसके साथ जाता है।

गुरुदेव दत्त भगवान की जय हो!

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એક અનોખી અદાલતનો અદભુત કિસ્સો



શેરે
ખુદા હઝરત અલી અલૈયહિસલામ ઇલ્મના ટણ
શહેરના દરવાજા છે. આપની પાસે આવતા તકરારના
અનેક કેસોનો આપ બખૂબી ચૂકાદો આપી જે નિકાલ
લાવતા તે બંને પક્ષમાં સંતોષકારક બની રહેતા અને
આપસમાં સુમેળભર્યા સંબંધો સ્થાપવામાં સહાયરૂપ
બની રહેતા. તકરારનો આવો જ એક કિસ્સો હઝરત
અલી અલૈહિસલામની અદાલતમાં આવ્યો જેનો
ચુકાદો આજના મુશ્કિલભર્યા દોરમાં માર્ગદર્શક હોઇ

  • પેશ છે.
    બે માણસ સફર પર નીકળ્યા. એકની પાસે પાંચ
    રોટલી હતી અને બીજા પાસે ત્રણ. જમવાનો વખત
    થયો. બંને મુસાફરો રસ્તાની એક તરફ બેસી જઇ
    રોટલીઓ કાઢી એક સાથમાં ભેળવી જમવાની
    શરૂઆત કરી ત્યાં ત્રીજો એક માણસ આવી લાગ્યો.
    પેલાં બંને જણે તેને પણ પોતાની સાથે જમવા આગ્રહ
    કર્યો એટલે ત્રીજો જણ પણ તેઓની સાથે બેસી જતાં |
    ત્રણે માણસોએ જમી લીધું.
    જમ્યા પછી ત્રીજો માણસ જવા લાગ્યો અને જતાં ?
    જતાં તેણે બંને જણને આઠ દિરહામ આપી કહ્યું કે તે
    આ રકમ બંને જણ વહેંચી લેજો. પછી બંને જણ
    પૈસાનો ભાગ પાડવા લાગ્યા. પાંચ રોટલીવાળાએ
    કહ્યું કે મારી પાંચ રોટલી હતી એટલે મારા પાંચ {
    દિરહામ અને તારી ત્રણ રોટલી હતી એટલે તું ત્રણ
    દિરહામ લે. પણ ત્રણ રોટલીવાળાએ કહ્યું કે ના,
    એમ નહીં બને. બંનેને ભાગે અડધા અડધા થાય. કેમ |
    કે આપણે બંનેએ સાથે ખાધું છે એટલે બંનેનો ભાગ
    બરાબર હોવો જોઇએ.
    તકરાર વધી ગઇ. લડાઇ-ઝઘડાની પતાવટ માટે
    બંને જણે હઝરત અલી અલયહિસલામની
    અદાલતમાં ગયા. આપે પૂરી વિગત જાણ્યા પછી
    ત્રણ રોટલીવાળાને કહ્યું કે તને ત્રણ દિરહામ
    મળે છે તે રાખી લે. તને એમાં જ ફાયદો છે. જો
    હિસાબમાં ઊંડો ઉતરવા જઇશ તો ફક્ત એક જ
    દિરહામ મળશે.
    આ સાંભળી પેલો વિમાસણમાં
    પડી ગયો અને કહ્યું કે અગર
    આપ મને સાચા હિસાબની સમજ
    મુમ્બિરે ઈસ્લામ
    પાડશો તો હું એક જ દિરહામ લઇ
    લઇશ.
    આથી આપે ફરમાવ્યું – તારી ત્રણ
    રોટલી હતી અને તારા સાથીની પાંચ.
    જ્યારે તમે જમવાવાળા હતા ત્રણ
    જણ. હવે બધી મળીને આઠ અનવર વાલિયાણી
    | રોટલીના દરેકના ત્રણ ત્રણ ટુકડા
    થાય. તો બધા મળીને ચોવીસ થયા અને ત્રણ
    | જમનારાઓના સરખે ભાગે ગણવામાં આવે તો દરેકને
    આઠ આઠ ટુકડા આવ્યા.
    પછી આપે ચુકાદો આપતા ફરમાવ્યું કે તારી જો
    ત્રણ રોટલી હતી તો એ ત્રણના થયા નવ ટુકડા, જ્યારે તારા સાથીની પાંચ રોટલીના પંદર ટુકડા થાય. તું
    તારા નવ ટુકડામાંથી આઠ તો ખાઇ ગયો હવે તારી
    રોટલીઓમાંથી બાકી રહ્યો એક ટુકડો. જ્યારે પેલાના
    પંદર ટુકડામાંથી તેણે આઠ ખાધા અને સાત ટુકડા
    | મહેમાનને આપ્યા. આ હિસાબે તારા એક ટુકડાનો
    | તને એક દિરહામ અને તારા સાથીને તેના સાત ટુકડાના
    સાત દિરહામ બરાબર મળવા જોઇએ.
    આ ચુકાદો સાંભળી ત્રણ રોટલીવાળાનું તો દિમાગ
    જ તંગ થઇ ગયું અને તેણે દાંતમાં આંગળા નાખી
    દીધા. પછી ચૂપચાપ એક દિરહમ લઇ લીધો અને
    મનોમન કહેવા લાગ્યો કે ત્રણ દિરહામ જ લઇ લીધા

કિસ્સા
હોત તો કેવું સારું થાત?
ખરેખર હઝરત અલી અલયહિસલામ ઇલ્મના
શહેરના દરવાજા છે. આપની સામે આવતા આવા
સવાલોને તો આપ સામાન્ય સમજતા પરંતુ લોકોના
અનેક જટીલ પ્રશ્નો, ગુંચવાયેલા
ઈસ્લામ
કોયડા અને ગંભીર મુશ્કેલીઓ તથા
ભયાનક ભૂંઝવણોને આપે આપની
અનોખી અદાલતમાં એવી
આસાનીથી દૂર કરેલ છે કે લોકો
આપને મુશ્કિલકુશા કહી આજે પણ
આફતના સમયે યાદ કરે છે.
શાયરે સાચું જ કહ્યું છે કે:વાલિયાણી
મુશ્કિલ પડી તો ક્યા હૂવા
મુશ્કિલકુશા તો હય,
આફતગીરી તો ક્યા હૂઆ
સર પે
ખૂદા
હઝરતઅલી સાહેબ ઇલ્મો જ્ઞાનનાં ભંડાર હતા.
આપના કથનો પર વિચારપૂર્વક અમલ કરવામાં આવે
તો અનેક જટીલ સમસ્યામાંથી બહાર નીકળી શકાય.
આપ ફરમાવો છો કે અજ્ઞાનતા એક મુસીબત છે,
જ્યારે વિદ્વાનો મરણ પછી પણ જીવતા રહે છે અને
અજ્ઞાનીઓ જીવે છે છતાં મરી ગયેલા છે. અજ્ઞાનતા
એવી બલા છે કે જે જીવતાઓને મુડદા બનાવી દે છે
અને હંમેશાં કમનસીબીમાં ફસાયેલા રાખે છે.
આપ ફરમાવો છો કે આપણી ફરિયાદ સાંભળીને
હમદર્દી જાહેર ન કરે તેવા માણસ પાસે ફરિયાદ
કરવામાં કશો જ સાર નથી, પરંતુ માણસની ધીરજ
ખૂટી જાય છે ત્યારે તેને ફરિયાદ કર્યા વિના ચાલતું
પણ નથી.

  • કબીર સી. લાલાણી પણ
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તમે કોણ છો ?
એક
સાધુ ફરતા ફરતા જંગલમાં જઈ ચઢ્યા. ત્યાં તેમને
૨સ્તામાં ચાર સ્ત્રીઓ સામેથી મળી. સાધુમહારાજે માત્ર
પરિચય ખાતર પૂછ્યું.
સંતઃ ‘તમારું નામ શું ? અને તમે કયા રહો છો ?’
પહેલી સ્ત્રી બોલી : ‘મારું નામ ‘શાંતિ’ અને હું
માણસના પેટમાં રહું છું.’
બીજી સ્ત્રી બોલી : ‘મારું નામ ‘હિંમત’ છે અને હું
માણસની છાતીમાં રહું છું.’
ત્રીજી સ્ત્રી બોલી : ‘‘મારું નામ ‘શરમ’ છે. હું માણસની
આંખમાં રહ્યું છું.”
ચોથી સ્ત્રી બોલી : ‘મારું નામ ‘બુદ્ધિ’ છે. માણસના
મગજમાં રહ્યું છું.’
અને સાધુમહારાજ ચારેય સ્ત્રીની વાતચીત પર વિચારતા
આગળ વધ્યા. તેવામાં થોડે દૂરથી ચાર પુરુષો મળ્યા.
સાધુમહારાજે તેમને પણ પરિચય પૂછ્યો.
પહેલો પુરુષ બોલ્યો : ‘‘મારું નામ ‘રોગ’ છે. હું
માણસના પેટમાં રહું છું.”
સાધુ બોલ્યા : ‘ભાઈ ! પેટમાં તો ‘શાંતિ’ રહે છે ને ?”
પુરુષે જવાબ આપ્યો : ‘‘સાધુજી જ્યારે ‘રોગ’ આવે
પીડા થાય, તો ‘શાંતિ’ કહ્યાંથી રહે ?”
બીજા પુરુષે પોતાનો પરિચય આપ્યો : ‘મારું નામ
‘ભય’ છે. હું માણસની છાતીમાં રહું છું.”
સાધુ મહારાજ નવાઈ પામતાં બોલ્યાઃ ‘‘અરે ! પણ
છાતીમાં. તો ‘હિંમત’ રહે છે ને ?”
બીજો પુરુષ બોલ્યો : ‘પણ મહારાજ ‘ભય’ હોય તો
‘હિંમત’ હારી જાય અને ડરીને નાસી જાય.”
ત્રીજા પુરુષે જણાવ્યું ઃ‘મારું નામ ‘લોભ’ છે. હું
માણસની આખમાં રહું છું.’
સાધુમહારાજ બોલ્યા : ‘‘અરે ! ભાઈ આંખમાં તો
‘શરમ’ રહે છે. કેમ બરાબર છે ને ?”
ત્રીજો પુરુષ : ‘‘મહારાજ ! ‘લોભ’ આવે ત્યારે ‘શરમ’
તો શરમાઈને દૂર જતી રહે છે.”
અને છેલ્લો પુરુષ બોલ્યો : ‘મારુ નામ ‘ક્રોધ’ અને હું
મગજમાં રહું છું.’
સાધુએ જવાબ આપ્યો : ‘પણ ભાઈ ! મગજમાં તો
‘બુદ્ધિ’ રહે છે.”
પેલા પુરુષે જવાબ આપ્યો : ‘મહારાજ ! તમારી વાત
સાચી છે, પણ જ્યારે ગુસ્સો આવે અને ક્રોધિત થઈ જાય
ત્યારે ‘બુદ્ધિ’ તો ભાગી જાય છે.’
સાધુમહારાજ વિચારતા વિચારતા ચાલવા લાગ્યા અને
મનોમનું પ્રાર્થના કરી કે ‘હે ભગવાન ! માનવીમાં આ ચાર
વિકાર પ્રવેશ ન કરે તો દુનિયા સ્વર્ગ બની જાય…!!’
પણ કળયુગમાં આ શકય છે ?

  • ભરત એસ. ભૂપતાણી
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ક્લબ ૯૯


એક રાજા એના મંત્રી જોડે નગરમાં ફરવા નીકળ્યા. રસ્તામાં એણે લીલુંછમ ખેતર જોયું, એ ખેતરના બીજા છેડે એક પરિવાર રહેતો હતો.

પતિ-પત્ની અને એમના બે સંતાનો. અતિશય આનંદમાં તેઓ ગીતો ગાતા હતા. આમ-તેમ ફરતાં હતા અને એમના ચહેરાઓ ઉપર સૂર્ય સમું તેજ હતું. સુખ શું હોઈ શકે એ આ પરિવારને જોતા જ સમજાઇ જાય એમ હતું.

રાજા ને અતિશય આશ્ચર્ય થયું. એણે મંત્રી ને સવાલ કર્યો, “હું આખા પ્રદેશનો રાજા છું! દોમ દોમ સાહ્યબી છે તેમ છતાં, હૂં આ લોકો જેટલો ખુશ કેમ નથી?”

મંત્રી એ હસીને જવાબ આપ્યો : “એ લોકો ક્લબ ૯૯ નાં સભ્યો નથી અને તમે છો ને એટલે !!”

“ક્લબ ૯૯? એ શું છે??” રાજા ને આશ્ચર્ય થયું.

મંત્રી એ કહ્યું, “મને ૯૯ સોના મહોર આપો અને આ પ્રશ્ન નો જવાબ હું એક મહિના પછી બસ આ જ જગ્યાએ આપીશ.”

રાજા આ મુત્સદિ જવાબથી ચિડાયો, પણ જવાબ જાણવાની ઉત્સુકતાએ એણે મંત્રીને ૯૯ સોનામહોર આપી.

મંત્રી એ એ જ રાત્રે જઈને એ ૯૯ સોનામહોર ભરેલી થેલી પેલા સુખી પરિવારની ઝુંપડી આગળ મૂકી દીધી!

બીજે દિવસે સવારે જ્યારે પતિએ જાગીને દરવાજા પાસે જોયું તો એને પેલા મંત્રીએ મુકેલી થેલી મળી. એણે અંદર જઈને જોયું તો અંદર સોનામહોર દેખાઈ!

એના આનંદનો પાર ન રહ્યો. એ બધી જ સોનામહોર બહાર કાઢીને ગણવા લાગ્યો. એક, બે, ત્રણ, ચાર… નવ્વાણું!

કંઈક ભૂલ થઈ લાગતી હોય એમ એણે ફરીવાર ગણવાનું શરૂ કર્યું.

ફરીથી આંકડો ૯૯ નો જ આવ્યો. એણે એની પત્નીને બોલાવી અને કહ્યું, “તું આ સોનામહોર ગણ. એને ય આંકડો ૯૯ નો જ આવ્યો.”

સહેજ હતાશ થઈને પતિએ મનોમન વિચાર કર્યો, “જો એક સોનામહોર હું મહેનત કરીને કમાઈ લઈશ તો અમારી પાસે પૂરી ૧૦૦ સોનામહોર થઈ જશે.”

એ દિવસ રાત મહેનત કરવા લાગ્યો. ખેતરમાંથી પાક વધુ અને સારો થાય એને માટે અથાક પરિશ્રમ કરવા લાગ્યો.

એવામાં એક દિવસ સાંજે ઘરે આવીને એણે સોનામહોર ગણી, તો આંકડો ૯૭ નો જ આવ્યો!

“આમાંથી બે સોનામહોર ઓછી કેવી રીતે થઈ ગઇ?” એણે અતિશય ગુસ્સામાં કહ્યું.

એની પત્ની એ અંદરથી જવાબ આપ્યો : “બે સોનામહોર માંથી હું ખરીદી કરી આવી! જુઓ આ સાડી કેવી લાગે છે?”

પતિનો પિત્તો ગયો : “તને બે સોનામહોર વાપરવાનું કોણે કહ્યું હતું? હું અહીં આટલી મહેનત કરીને એક સોનામહોર કમાવાની કોશિશ કરું છું અને તું બે વાપરી આવી?”

“તમે તો સ્વભાવે જ કંજૂસ છો. ક્યારેય વાપરવાના તો હતા નહીં એટલે મેં જ એનો ઉપયોગ કર્યો”, પત્નીએ છણકો કર્યો.

એવામાં બીજે દિવસે એનો છોકરો એક સોનામહોર વેચીને નવી ઘડિયાળ લઈ આવ્યો. પેલો માણસ ફરી એની ઉપર ચિડાયો.

“સોનામહોર ઘટતી ગઈ અને કંકાસ વધતો ગયો!”

બરાબર એક મહિને રાજા અને મંત્રી ફરી એ જ જગ્યા એ ઊભા રહીને જુએ છે તો પરિવારમાંથી સુખનું નામો નિશાન નહોતું. ચહેરા ઉપરની રોનક ઉડી ગઈ હતી. અતિશય ગંભીરતા ભર્યું વાતાવરણ હતું. એમ લાગતું હતું કે ગમે ત્યારે ઝઘડો ફાટી નીકળશે!

રાજાને અતિશય નવાઈ લાગી. મંત્રી ને મંદ મંદ હસતા જોઈ એણે પૂછ્યું, “શું થયું આ લોકોને? સુખ ક્યાં ગયું?”

મંત્રીએ હસીને જવાબ આપ્યો : “રાજન! હવે આ લોકો પણ ક્લબ ૯૯ ના સભ્યો છે. તમે આપેલી ૯૯ સોનામહોર મેં એમના ઘરને દરવાજે મૂકી દીધી. અને એ ૯૯ સોનામહોર ને ૧૦૦ કેમ કરવી એની પળોજણમાં આ પરિવારનું સુખ હણાઈ ગયું!”

આપણામાંથી પણ એવા ઘણા છે જેની પાસે ૯૯ સોનામહોર પડેલી જ છે. પણ બીજી એક સોનામહોર કમાવાની માથાકૂટમાં ને માથાકૂટમાં એ ૯૯ સોનામહોર ખોટી જગ્યા એ વેડફાઈ જાય છે અથવા તો સોનામહોરો એમને એમ મૂકીને પોતે જ ગુજરી જાય છે!

જે નથી મળ્યું એની પાછળ દોડવા કરતા જે મળ્યું છે એનો આનંદ માણતા જો આવડી જાય ને તો ૯૯ ટકા મુશ્કેલીઓ સમાપ્ત થઈ જશે અને ૯૯ સોનામહોર નો ભાર પણ માથે નહીં રહે!

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गलती

शीला जी अपनी बहु को समझा रही थी, बहु तुम्हारी ननंद आनेवाली है उसके सामने सही से रहना वो जो बोले वही करना, वो जो कहती है वही सही होता है! “जी मम्मी जी ” बहु ने बात समझते हुए कहा। दूसरे दिन ननंदरानी आ गयी अपने परिवार के साथ, वो हर चीज पे टोकती भाभी को. ये ऐसे क्यों किया?वो ऐसे क्यों।
सासु मां हर चीज में बेटी की हाँ मे हाँ मिलाती। रात का खाना बना वो अपने कमरे मे आ गयी बच्चे को गरम कपड़े पहनाने लगी कार्तिक महीने में शाम से थोड़ी ठंड हो जाती है। तभी उसने बाहर कुछ तेज आवाज़ सुनी ननंद की किशोरवय बेटी जो काफी छोटे कपड़े में थी,उसके लिए उसकी नानी ने उसे टोका की ये गाव है यहाँ ये कपड़े मत पहनो, तो वो नानी पे भड़कते हुए बोली-” नानी तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे ये कहने की,मैं क्या पहनूँगी ये आप तय नहीं करेंगी समझी। फिर पैर पटकती हुई वो वहाँ से चली गयी। (बहु का मन किया एक जोरदार तमाचा भगिनी को दे लेकिन कुछ सोच शांत रह गयी।) तभी ननंद आई बेटी को साथ लेके,उसे लगा ननंद अपनी बेटी को बोलेंगी की नानी से माफी मांगो, लेकिन ये क्या वो उल्टा अपनी माँ को झिड़कते हुए बोली -“क्या माँ तुम्हे बात करने तरीका नहीं आता। दिन में मुझे टोका की मैंने बिना बाजू की ब्लाउज क्यों पहनी हैं, मैंने बर्दास्त कर लिया कुछ नहीं बोली तो तुम्हारा मन बढ़ गया? मेरी बेटी से भी वही बात की। तमीज नहीं हैै बात करने की? कपड़े तुम्हारी मर्जी से पहनेंगे?गवार ही रहोगी। फ़ैशन नहीं समझती हो। फिर अपने भाभी की तरफ देखते हुए बोली – क्या गलत बोल रही हुँ?बहु ने एक नजर सास की तरफ देखा फिर बोली-” नहीं दीदी, आप जो कहती है वही सही होता है।
दूसरे दिन सासू माँ कह रही थी बहु से- खबरदार जो रात वाली बात का कही जिक्र किया तो, मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।
वैसे भी वो मेरी ही गलती थी मुझे ऐसे नहीं बोलना चाहिए था , बच्चे की अपनी पसंद होती है, आजकल जमाना बदल गया है।
बहु ने कहा-” जी मम्मी जी”
बहु सोचने लगी बेटी और नतिनि की बदतमीज़ी पे पर्दा डाल के आप एक और गलती कर रही है। इसी वजह से तो मैं खामोश रह गयी कुछ बोली नहीं क्योंकि आपकी नियत मै जानती थी।

सोनी शांडिल्य

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कोख़ को गाली


“भैया ! आप जरा नीचे आ जाइए कुछ जरुरी बात करनी है .”

“ऐसी क्या बात है जो तुम यहाँ नहीं कर सकते ! यहाँ कोई और भी तो नहीं …सिर्फ तुम्हारी भाभीही है और मैं .”

“वो बात ये है कि बात मैं रीता के सामने करना चाहता हूँ .”

दिनेश बोलकर चला गया . पत्नी ने भी आशंका जताई कि कोई ख़ास बात ही होगी , चले जाओ ! छोटा है क्या पता किसी परेशानी में हो . हो सकता है मेरे सामने नहीं कहना चाहता हो !

“नहीं मुझे लगता है कि कोई और ही बात है . रीता अभी मायके से लौटी है. जरुर कोई अनहोनी की बात ही होगी .”

“आप भी न जाने अब कैसी सठियाई सी बातें करते हैं . हमारे लिए तो बच्चे जैसा है . मालिक ने हमें बच्चा नहीं दिया तो क्या हुआ . हमारे बाद भी तो सब इनका ही है .” पत्नी ने कहा .

“बात वो नहीं है . तुम कभी मुँह से नहीं कहती हो पर मैं तो जानता हूँ कि रीता ने तुम्हें क्या-क्या नहीं कहा था बच्चों को लेकर . अब भगवन ही बैरी हो गया है तो मैं क्या कर सकता हूँ . बे-औलाद ही मरना लिखा है तो यही मर्जी सही उसकी .”

“तुम भी अजीब इंसान हो . अगर भगवान् की इच्छा है तो फिर दुखी क्यों होते हो ?”

“दुखी इसलिए होता हूँ कि कल को मुझे कुछ हो गया तो ये किस हद तक जा सकता है इस बात का तुम्हें अंदाज़ा नहीं है .”

“अरे! तुम भी बिना सुने न जाने क्या-क्या बकने लगते हो . कुछ नहीं होगा तुम्हें और मेरी चिंता मत किया करो ज्यादा .”

वह नीचे चला गया . और कुछ देर बाद भन्नाता हुआ लौट आया .

“क्या हुआ नीचे ?” पत्नी ने पूछा .

“वही हुआ …जिस बात का अंदेशा था .”

“बताओ तो सही…आखिर ऐसी क्या बात हो गयी ?”

“कहता है कि हमारी कोई औलाद नहीं है और आगे भी ये घर उसका ही होना है . एक क्लाज डलवाकर मकान उसके नाम कर दूं ताकि उसे बैंक से ज्यादा लोंन मिल सके . अपने साले के साथ पार्टनरशिप करना चाहता है . बेबकूफ है …पापा की दुकान पहले ही हड़प चुके हैं अब मकान भी दे दूं इनको और मैं तुम्हारे साथ भीख मांगूं !”

“बस इतनी सी बात है और आप इतना गुस्सा कर रहे हैं . पानी पी लीजिये …अपना ही तो खून है अगर आगे बढेगा तो उसके बच्चे अच्छे से जी सकेंगे . अब तुम भी रिटायर हो चुके हो और मुझे भी शुगर है . हमें क्या ये मकान छाती पे लेकर मरना है .” पत्नी ने कहा .

“नहीं , उसने सिर्फ इतना ही कहा होता तो बात को मैं सह जाता . उसकी बीबी ने कहा है कि उनकी ताई वृद्धश्रम में रहती है वहां हम शिफ्ट हो जाएँ और वो हर महीने पैसे भेजते रहेंगे ….अब तुम्हें माँ बनना ही होगा .”

“पगला गए हो क्या तुम !”

“हाँ , अब तुम्हें माँ बनना ही होगा . मैं अनाथालय में एक बच्ची देख आया हूँ . इस सूअर को घर देने से अच्छा है किसी बच्ची को ज़िन्दगी दूं …फिर मैं रहूँ या नहीं ….तुम्हारी कोख़ को दी गाली मेरे सीने में चुभती है .”

भरी आँखों से उसने पति को सीने से लगा लिया .

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मानव चरित्र


एक बार एक जिज्ञासु व्यक्ति ने एक संत से प्रश्न किया, “महाराज, रंग रूप, बनावट प्रकृति में एक जैसे होते हुए भी कुछ लोग अत्यधिक उन्नति करते हैं। जबकि कुछ लोग पतन के गर्त में डूब जाते हैं।

संत ने उत्तर दिया, “तुम कल सुबह मुझे तालाब के किनारे मिलना।

तब मैं तुम्हे इस प्रश्न का उत्तर दूंगा। अगले दिन वह व्यक्ति सुबह तालाब के किनारे पहुंचा।

उसने देखा कि संत दोनों हाथ में एक एक कमंडल लिए खड़े हैं।

जब उसने ध्यान से देखा तो पाया कि एक कमंडल तो सही है।

लेकिन दूसरे की पेंदी में एक छेद है। उसके सामने ही संत ने दोनों कमंडल तालाब के जल में फेंक दिए।

सही वाला कमंडल तो तालाब में तैरता रहा।

लेकिन छेद वाला कमंडल थोड़ी देर तैरा, लेकिन जैसे जैसे उसके छेद से पानी अंदर आता गया।

वह डूबने लगा और अंत में पूरी तरह डूब गया।

संत ने जिज्ञासु व्यक्ति से कहा- “जिस प्रकार दोनों कमंडल रंग-रूप और प्रकृति में एक समान थे।

किंतु दूसरे कमंडल में एक छेद था। जिसके कारण वह डूब गया। उसी प्रकार मनुष्य का चरित्र ही इस संसार सागर में उसे तैराता है।

जिसके चरित्र में छेद (दोष) होता है। वह पतन के गर्त में चला जाता है। लेकिन एक सच्चरित्र व्यक्ति इस संसार में उन्नति करता है। जिज्ञासु को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया।

शिक्षा:-
जीवन में चरित्र का महत्व सर्वाधिक है। इसलिए हमें चरित्रवान बनना चाहिए

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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