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परम हितैषी



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एक साधु भिक्षा लेने एक घर में गये । उस घर में माई भोजन बना रही थी और पास में बैठी उसकी लगभग 8 वर्ष की पुत्री बिलख-बिलखकर रो रही थी ।
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साधु का हृदय करुणा से भर गया, वे बोले : ‘‘माता ! यह बच्ची क्यों रो रही है ?’’
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माँ भी रोने लगी, बोली : ‘‘महाराजजी ! आज रक्षाबंधन है । मुझे कोई पुत्र नहीं है । मेरी बिटिया मुझसे पूछ रही है कि ‘मैं किसके हाथ पर राखी बाँधूँ ?’
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समझ में नहीं आता कि मैं क्या उत्तर दूँ, इसके पिताजी भी नहीं हैं ।’’
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साधु ऊँची स्थिति के धनी थे, बोले : ‘‘हे भगवान ! मैं साधु बन गया तो क्या मैं किसी का भाई नहीं बन सकता !
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बालिका की तरफ हाथ बढ़ाया और बोले : ‘‘बहन ! मैं तुम्हारा भाई हूँ, मेरे हाथ पर राखी बाँधो।
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साधु ने राखी बँधवायी और लीला नामक उस बालिका के भाई बन गये । लीला बड़ी हुई, उसका विवाह हो गया ।
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कुछ वर्षों बाद उसके पेट में कैंसर हो गया । अस्पताल में लीला अंतिम श्वास गिन रही थी । घरवालों ने उसकी अंतिम इच्छा पूछी ।
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लीला ने कहा : ‘‘मेरे भाईसाहब को बुलवा दीजिये ।’’
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साधु महाराज ने अस्पताल में ज्यों ही लीला के कमरे में प्रवेश किया, त्यों ही लीला जोर-जोर से बोलने लगी : ‘‘भाईसाहब !
कहाँ है भगवान ?
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कह दो उसे कि या तो लीला की पीड़ा हर ले या प्राण हर ले, अब मुझसे कैंसर की पीड़ा सही नहीं जाती ।’’
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लीला लगातार अपनी प्रार्थना दोहराये जा रही थी । साधु महाराज लीला के पास पहुँचे और उन्होंने शांत भाव से कुछ क्षणों के लिए आँखें बंद कीं,
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फिर अपने कंधे पर रखा वस्त्र लीला की तरफ फेंका और बोले : ‘‘जाओ बहन ! या तो प्रभु तुम्हारी पीड़ा हर लेंगे या प्राण ले लेंगे ।’’
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उनका बोलना, वस्त्र का गिरना और लीला का उठकर खड़े हो जाना – सब एक साथ हो गया लीला बोल उठी : ‘‘कहाँ है कैंसर ! मैं एकदम ठीक हूँ, घर चलो ।’’
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लीला की जाँच की गयी, कैंसर का नामोनिशान नहीं मिला । घर आकर साधु ने हँसकर पूछा : ‘‘लीला ! अभी मर जाती तो ?’’
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लीला बोली : ‘‘मुझे अपने दोनों छोटे बच्चों की याद आ रही थी, उनकी चिंता हो रही थी ।’’
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‘‘इसलिए प्रभु ने तुम्हें प्राणशक्ति दी है, बच्चों की सेवा करो, बंधन तोड़ दो, मरने के लिए तैयार हो जाओ ।’’
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ऐसा कहकर साधु चले गये ।
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लीला सेवा करने लगी, बच्चे अब चाचा-चाची के पास अधिक रहने लगे । ठीक एक वर्ष बाद पुनः लीला के पेट में पहले से जबरदस्त कैंसर हुआ, वही अस्पताल, वही वार्ड, संयोग से वही पलंग !
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लीला ने अंतिम इच्छा बतायी : ‘‘मेरे भाई साहब को बुलाइये ।’’
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साधु बहन के पास पहुँचे, पूछा : ‘‘क्या हाल है ?’’
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लीला एकदम शांत थी, उसने अपने भाई का हाथ अपने सिर पर रखा, वंदना की और बोली :
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‘‘भाईसाहब ! मैं शरीर नहीं हूँ, मैं अमर आत्मा हूँ, मैं प्रभु की हूँ, मैं मुक्त हूँ…’’ कहते-कहते ॐकार का उच्चारण करके लीला ने शरीर त्याग दिया ।
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लीला के पति दुःखी होकर रोने लगे । साधु महाराज उन्हें समझाते हुए बोले : ‘‘भैया ! क्यों रोते हो ?
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अब लीला का जन्म नहीं होगा, लीला मुक्त हो गयी ।’’ फिर वे हँसे और दुबारा बोले : ‘‘हम जिसका हाथ पकड़ लेते हैं, उसे मुक्त करके ही छोड़ते हैं ।’’
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पति का दुःख कम हुआ । उन्होंने पूछा : ‘‘महाराज ! गत वर्ष लीला तत्काल ठीक कैसे हो गयी थी, आपने क्या किया था ?’’
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‘‘गत वर्ष लीला ने बार-बार मुझसे पीड़ा या प्राण हर लेने के लिए प्रभु से प्रार्थना करने को कहा ।
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मैंने प्रभु से कहा : ‘हे भगवान् ! अब तक लीला मेरी बहन थी, इस क्षण के बाद वह आपकी बहन है, अब आप ही सँभालिये ।’
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प्रभु पर छोड़ते ही प्रभु ने अपनी बहन को ठीक कर दिया । यह है प्रभु पर छोड़ने की महिमा !’’
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इंसान के दृढ़ निश्चय से
जब दूर किनारा होता है ।
तूफान में टूटी किश्ती का
एक भगवान् ही सहारा होता है ।।
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ऐसे ही जब आपके जीवन में कोई ऐसी समस्या, दुःख, मुसीबत आये जिसका आपके पास हल न हो तो आप भी घबराना नहीं
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बल्कि किसी एकांत कमरे में चले जाना और भगवान, सद्गुरु के चरणों में प्रार्थना करके सब कुछ उनको सौंप देना और शांत-निर्भार हो जाना ।
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फिर जिसमें आपका परम मंगल होगा, परम हितैषी परमात्मा वही करेंगे ।
तेरे पास बैठना भी पूजा है
तुझे दूर से देखना भी पूजा है ।
ना माला, ना मंत्र, ना पूजा
तुझे हर घड़ी याद करना भी पूजा है ।।

विनोद कुमार सिन्हा

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आज का सुविचार✍🏻🙏🏻

🌺 अनजाने में किये हुये पाप का प्रायश्चित कैसे होता है??? 🌺

बहुत सुन्दर प्रश्न है ,यदि हमसे अनजाने में कोई पाप हो जाए तो क्या उस पाप से मुक्ती का कोई उपाय है।

श्रीमद्भागवत जी के षष्ठम स्कन्ध में , महाराज राजा परीक्षित जी ,श्री शुकदेव जी से ऐसा प्रश्न किया था ।

बोले भगवन आपने पञ्चम स्कन्ध में जो नरको का वर्णन किया ,उसको सुनकर तो गुरुवर रोंगटे खड़े जाते हैं।

प्रभूवर मैं आपसे ये पूछ रहा हूँ की यदि कुछ पाप हमसे अनजाने में हो जाते हैं , जैसे चींटी मर गयी, हम लोग स्वास लेते हैं तो कितने जीव श्वासों के माध्यम से मर जाते हैं। भोजन बनाते समय लकड़ी जलाते हैं ,उस लकड़ी में भी कितने जीव मर जाते हैं । और ऐसे कई पाप हैं जो अनजाने हो जाते हैं ।

तो उस पाप से मुक्ती का क्या उपाय है भगवन ।

आचार्य शुकदेव जी ने कहा -राजन ऐसे पाप से मुक्ती के लिए रोज प्रतिदिन पाँच प्रकार के यज्ञ करने चाहिए ।

महाराज परीक्षित जी ने कहा, भगवन एक यज्ञ यदि कभी करना पड़ता है तो सोंचना पड़ता है ।आप पाँच यज्ञ रोज कह रहे हैं ।

यहां पर आचार्य शुकदेव जी हम सभी मानव के कल्याणार्थ कितनी सुन्दर बात बता रहे हैं ।

बोले राजन….
पहला यज्ञ है -जब घर में रोटी बने तो पहली रोटी गऊ ग्रास के लिए निकाल देना चाहिए ।

दूसरा यज्ञ है राजन -चींटी को दस पाँच ग्राम आटा रोज वृक्षों की जड़ों के पास डालना चाहिए।

तीसरा यज्ञ है राजन्-पक्षियों को अन्न रोज डालना चाहिए ।

चौथा यज्ञ है राजन् -आटे की गोली बनाकर रोज जलाशय में मछलियो को डालना चाहिए ।

पांचवां यज्ञ है राजन् भोजन बनाकर अग्नि भोजन , रोटी बनाकर उसके टुकड़े करके उसमे घी शक्कर मिलाकर अग्नि को भोग लगाओ। राजन् अतिथि सत्कार खूब करें, कोई भिखारी आवे तो उसे जूठा अन्न कभी भी भिक्षा में न दे ।

राजन् ऐसा करने से अनजाने में किये हुए पाप से मुक्ती मिल जाती है । हमे उसका दोष नहीं लगता । उन पापो का फल हमे नहीं भोगना पड़ता।

राजा ने पुनः पूछ लिया ,भगवन यदि गृहस्थ में रहकर ऐसे यज्ञ न हो पावे तो और कोई उपाय हो सकता है क्या। तब यहां पर श्री शुकदेव जी कहते हैं….

राजन्….

कर्मणा कर्मनिर्हांरो न ह्यत्यन्तिक इष्यते।
अविद्वदधिकारित्वात् प्रायश्चितं विमर्शनम् ।।

नरक से मुक्ती पाने के लिए हम प्रायश्चित करें। कोई ब्यक्ति तपस्या के द्वारा प्रायश्चित करता है।कोई ब्रह्मचर्य पालन करके प्रायश्चित करता है।कोई ब्यक्ति यम,नियम,आसन के द्वारा प्रायश्चित करता है।लेकिन मैं तो ऐसा मानता हूँ राजन्!

केचित् केवलया भक्त्या वासुदेव परायणः।

राजन् केवल हरी नाम संकीर्तन से ही जाने और अनजाने में किये हुए को नष्ट करने की सामर्थ्य है ।

इस लिए हे राजन् !—– सुनिए

🌺स्वास स्वास पर कृष्ण भजि बृथा स्वास जनि खोय।
🌺न जाने या स्वास की आवन होय न होय।। 🌺

राजन् किसी को पता नही की जो स्वास अंदर जा रही है वो लौट कर वापस आएगी की नही ।

इस लिए सदैव हरी का नाम जपते रहो।

आप सभी का दिन शुभ रहे। 🙏🏻🙏🏻

विनोद कुमार सिन्हा

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एक मूर्तिकार एक रास्ते से गुजरा और उसने संगमरमर के पत्थर की दुकान के पास एक बड़ा संगमरमर का पत्थर पड़ा देखा अनगढ़ राह के किनारे। उसने दुकानदार से पूछा कि और सब पत्थर सम्भाल के भीतर रखे गए हैं।
ये पत्थर बाहर क्यों डाला है ??
उसने कहा ये पत्थर बेकार है। इसे कोई मूर्तिकार खरीदने को राजी नहीं है।
आपकी इसमें उत्सुकता है ??
मूर्तिकार ने कहा मेरी उत्सुकता है। उसने कहा। आप इसको मुफ्त ले जाएँ। ये टले यहाँ से तो जगह खाली हो बस इतना ही काफी है कि ये टल जाए यहाँ से। ये आज दस वर्ष से यहाँ पड़ा है। कोई खरीददार नहीं मिलता। आप ले जाओ कुछ पैसे देने की जरूरत नहीं है। अगर आप कहो तो आपके घर तक पहुँचवाने का काम भी मैं कर देता हूँ।
दो वर्ष बाद मूर्तिकार ने उस पत्थर के दुकानदार को अपने घर आमंत्रित किया कि मैंने एक मूर्ति बनाई है। तुम्हें दिखाना चाहूँगा। वो तो उस पत्थर की बात भूल ही गया था। मूर्ति देखके तो दंग रह गया ऐसी मूर्ति शायद कभी बनाई नहीं गई थी।
भगवान श्री कृष्ण का बाल रूप उस मूर्तिकार ने तराशा। मईया यशोदा श्री कृष्ण को गोद में खिला रही हैं। इतनी जीवंत कि उसे भरोसा नहीं आया।
उसने कहा ये पत्थर तुम कहाँ से लाए ??
इतना अद्भुत पत्थर तुम्हें कहाँ मिला ??
मूर्तिकार हँसने लगा उसने कहा। ये वही पत्थर है। जो तुमने व्यर्थ समझके दुकान के बाहर फेंक दिया था और मुझे मुफ्त में दे दिया था। इतना ही नहीं। मेरे घर तक पहुँचवा दिया था।
“वही पत्थर है” उस दुकानदार को तो भरोसा ही नहीं आया। उसने कहा तुम मजाक करते हो। उसको तो कोई लेने को भी तैयार नहीं था। दो पैसा देने को कोई तैयार नहीं था। तुमने उस पत्थर को इतना महिमा रूप, इतना लावण्य दे दिया।
तुम्हें पता कैसे चला कि ये पत्थर इतनी सुन्दर प्रतिमा बन सकता है ??
मूर्तिकार ने कहा आँखें चाहिए पत्थरों के भीतर देखने वाली आँख चाहिए।
अधिकतर लोगों के जीवन अनगढ़ रह जाते हैं। दो कौड़ी उनका मूल्य होता है। मगर वो तुम्हारे ही कारण। तुमने कभी तराशा नहीं। तुमने कभी छैनी नहीं उठाई। तुमने कभी अपने को गढ़ा नहीं। तुमने कभी इसकी फिकर न की कि ये मेरा जीवन जो अभी अनगढ़ पत्थर है एक सुन्दर मूर्ति बन सकती है। इसके भीतर छिपा हुआ भगवान प्रगट हो सकता है। इसके भीतर छिपा हुआ ईशवर प्रगट हो सकता है।
वस्तुत: मूर्तिकार के जो शब्द थे। वो ये थे कि मैंने कुछ किया नहीं है। मैं जब रास्ते से निकला था। इस पत्थर के भीतर पड़े हुए भगवान ने मुझे पुकारा कि मूर्तिकार मुझे मुक्‍त करो। उनकी आवाज़ सुनके ही मैं इस पत्थर को ले आया। मैंने कुछ किया नहीं है, सिर्फ भगवान के आस-पास जो व्यर्थ के पत्थर थे। वो छाँट दिए हैं। भगवान प्रगट हो गए हैं।
प्रत्येक व्यक्‍ति परमात्मा को अपने भीतर लिए बैठा है। थोड़े से पत्थर छाँटने हैं। थोड़ी छैनी उठानी है। उस छैनी उठाने का नाम ही भक्ति है
राधे राधे❤️🙏
❉🌹Զเधे Զเधे🌹❉

विनोद कुमार सिन्हा

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એક દંપતી હતું…
એમનાં લગ્નને લગભગ ત્રીસ વર્ષ થયાં હતાં…
એ લોકો સવારમાં નાસ્તો કરવા બેસે અને રાત્રે જમવા બેસે ત્યારે પતિ હંમેશાં એક વાતની નોંધ કરે…
બ્રેડના પૅકેટ માં ઉપર-નીચે જે જાડી અને થોડી ચવ્વડ બ્રેડ આવે છે એને શેકી, એના પર માખણ લગાવીને એની પત્ની એ જ બ્રેડ એને કાયમ આપતી…
છેલ્લાં ત્રીસ વર્ષથી આ ક્રમ અતૂટ રહ્યો હતો…
એક દિવસ પતિથી ન રહેવાયું…
ઘણા વખત થી એના મનમાં ઘુમરાયા કરતી વાત એણે કહી જ નાખી..
તું કાયમ મને છેડાની ચવ્વડ અને જાડી બ્રેડ જ આટલાં વરસથી આપે છે. આટલાં વર્ષ તો કાંઇ નથી બોલ્યો, પણ હવે હું કંટાળી ગયો છું અને આજે તને કહી જ દઉં છું કે હવે પછી હું એ બ્રેડ ક્યારેય ખાવાનો નથી, પણ હુ તને એક વાત પૂછવા માગું છું કે તું આટલાં વરસથી મને એવી ચવ્વડ બ્રેડ શું કામ આપતી હતી ???
પત્નીએ પતિની સામે જોયું. આંખમાં ધસી આવેલાં આંસુને માંડ રોકતાં એ બોલી, કારણ કે મને એ ખૂબ જ પ્રિય છે અને મને અત્યંત ગમતી વસ્તુ તમને ખવડાવવાનો આનંદ જ ઑર હોય છે !!!
તમને જો આટલાં વરસ એ ન ગમ્યું હોય તો મને માફ કરી દેજો !
એ આગળ ન બોલી શકી, પતિ પણ સજળ નયને એને જોઇ રહ્યો…
પ્રેમશુંછે ? ?
મોંઘાદાટ અને ઓછા કપડાંની તારીફ કરનાર આશિક અઢળક મળી રહેશે,
પરંતુ તમારા પૂરા ઢંકાયેલ શરીરની સુંદરતાનો સહવાસ કોઈ માણે -તે પ્રેમ છે.
વધેલા સુંદર રંગ રોગાન કરેલા તમારા નખના આશિક અઢળક મળી રહેશે,
પરંતુ જડ મૂળ થી નીકળી ગયેલ તમારા નખ પર મરહમ કોઈ લગાવે -તે પ્રેમ છે.
ભરાવદાર પ્રેસ કરેલા તમારા વાળને વ્હાલ કરનાર આશિક અઢળક મળી રહેશે,
પરંતુ તમારા ઉદ્રીથી ખરી ગયેલ વાળની સાચી માવજત કોઈ કરે -તે પ્રેમ છે.
બ્યુટીપાર્લર માં જઈને પોલીસ કરેલી ચામડીને સરાહનાર આશિક અઢળક મળી રહેશે,
પરંતુ તમારા કરમાયેલા ગાલ ને નિઃસ્વાર્થ ભાવ થી કોઈ પંપાળે -તે પ્રેમ છે.
તમારી ઉભરાતી યુવાની ની મઝા માણનારા આશિક અઢળક મળી રહેશે,
પરંતુ તમારા ઢળતા દિવસોમાં શરૂઆત થી અંત સુધીનો કોઈ સહારો બની રહે – તે પ્રેમ છે.
साथी हो अगर तुम सा, मंजिल की तमन्ना क्या…
हम को सफ़र प्यारा है, मंजिल को खुदा हाफ़िज़…
GOOD NiGHT…
RADHE KRiSHNA…

રઘુવંશી હિત રાયચુરા

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શબ્દની કિંમત …
ગીર નજીક આવેલા એક નાનકડા ગામનો એક વ્યક્તિ પોતાના ઘોડા પર સવાર થઈને જંગલના રસ્તે પોતાના ગામ તરફ આવી રહ્યો હતો, ઘટાદાર વૃક્ષોથી છવાઈ ગયેલા જંગલના રસ્તા પર તે વ્યક્તિ થોડો આગળ પહોંચતા તેને સાવજના કણસવાનો અવાજ આવે છે, ઘોડેસવાર પોતાના ઘોડા પરથી નીચે ઉતરી જ્યાંથી અવાજ આવતો હતો તે તરફ જુએ છે તો એક ઘાયલ સાવજ દેખાય છે, સાવજને પગમા કાંટો લાગ્યો જોઈ ઘોડેસવાર સાવજના પગ માથી કાંટો કાઢે છે, કાંટો નિકળતા સાવજ ને શાંતિ થાય છે, સાવજ ઉભો થઈ ધોડેસવાર સાથે તે પણ ચાલતો થઈ જાય છે, સાવજ ઘોડેસવાર સવારની પાછળ પાછળ તેમના ગામ સુધી જાય છે, ઘોડેસવાર ઘરે આવે છે સાવજ પણ તેમની પાછળ પાછળ ઘરની બહાર ઉભો રહે છે, જેમ જેમ દિવસો પસાર થતા ગયા તેમ સાવજ હર રોજ ઘરધણી (ઘોડેસવાર) ના ઘરે આવે…
સમય જતા બંને વચ્ચે મિત્રતા થઈ ગઈ,
સાવજ ઘરધણી સાથે જ રહેવા લાગ્યો.
એક દિવસ બન્યુ એવું ઘરધણીને ત્યા મહેમાન આવે છે,
મહેમાન દરવાજો ખોલતાં જોવે છે કે એક સાવજ બેઠો છે અને ઘરધણી સાવજના માથા પર હાથ ફેરવી રહ્યા છે…
સાવજને ઘરમા બેઠેલો જોઈ મહેમાન ગભરાઈ જાય છે, તે બહાર દરવાજે ઉભો રહી જાય છે, મહેમાનને બહાર ઉભેલા જોય ઘરધણી તેમને અંદર આવવાનુ કહે છે…
સાવજ થી ગભરાયેલા મહેમાન બોલી શકતા નથી પણ સાવજ તરફ પોતાનો હાથ કરે છે, સાવજ થી ગભરાયેલા મહેમાનને ઘરધણી કહે છે ગભરાવાની જરૂર નથી અંદર આવો,
આ સાવજ તો આપણા પાડેલા કુતરા જેવો છે, ઘરધણીને સાવજને પાડેલા કુંતરા જેવો કહેતા સાવજ પગથી માથા સુધી ક્રોધિત થઈ જાય છે પણ મહેમાન આવેલા જોઈને કશુ બોલતો નથી, મહેમાને ઘરધણીને ત્યા ચા પાણી પીધા અને થોડી વાર બેસી વિદાય લીધી…
મહેમાને વિદાય લીધી ત્યારે સાવજ ઘરધણીને કહે છે,
ભાઈ…. તે મારા પગ માથી કાંટો કાઢ્યો તે મારા પર ઉપકાર કર્યો હતો અટલે હુ તારી પાસે આવું છુ…
ભાઈ….. તારી સાથે મને પ્રેમ બંધાયો આથી તારી સાથે મને મજા આવે છે અટલે હુ તારા પાસે આવું છુ, પણ ભાઈ તે આજે મારી મિત્રતાની કિંમત એક પાડેલા કુતરા જેવી કરી? ભાઈ… તારા મહેમાન આવ્યાને તારી આબરૂ ના જાય એટલા માટે હુ બોલ્યો નહી, પણ તુ મહેમાન આવ્યા ત્યારે જે બોલ્યો તે હવે બોલ અટલે તને ખબર પાડું કે સાવજ કોને કહેવાય ? અને કુતરો કોને કહેવાય ?
સાવજ આટલું બોલ્યો ત્યા ઘરધણી થરથર ધ્રુજવા લાગ્યો થરથર ધ્રુજતા ઘરધણીને સાવજે કહ્યુ, હવે ધ્રુજવાનુ બંધ કર અને સામે પડેલો કુહાડો ઉપાડ અને મારા માથા પર માર,
સાવજે કુહાડો મારવાનું કહેતા ઘરધણી સાવજને કુહાડો મારવાની ના કહે છે કે હુ કેવી રીતે મારૂ ???
ઘરધણી કુહાડો મારવાની ના કહેતા સાવજ ઘરધણીને બોલે છે કે…મને કુહાડો માર નહિતર એક પંજો મારી તારા કટકા કરી નાખું,
આટલું કહેતા ઘરધણી કુહાડો ઉપાડી સાવજના માથા પર મારે છે…
કુહાડો મારતા સાવજના માથા પરથી લોહી વહેવા લાગે છે અને સાવજ ત્યાંથી ચાલ્યો જાય છે, બે વર્ષ પછી એક દિવસ સાવજ તે ઘરધણી પાસે આવે છે…
ઘરધણીને સાવજ કહે છે,
જો ભાઈ, ……..
માથા પર મારેલો કુહાડાનો ઘા તો રૂઝાઈ ગયો,
પણ…
હૈયા પર લાગેલો શબ્દનો ઘા હજુ પણ એમનો એમ છે,
અટલે જ તો કહ્યુ છે…..
” शब्द संभाल कर बोलिये, ”शब्दके ना हाथ और पांव,
”एक शब्द है औषधि, और ”एक शब्द है घाव…….!!!
GOOD MORNiNG…
RADHE KRiSHNA…

આઘુવંશી હિત રાયચુરા

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कुंभ स्नान


कुंभ स्नान चल रहा था। राम घाट पर भारी भीड़ लग रही थी।
शिव पार्वती आकाश से गुजरे। पार्वती ने इतनी भीड़ का कारण पूछा – आशुतोष ने कहा – कुम्भ पर्व पर स्नान करने वाले स्वर्ग जाते है। उसी लाभ के लिए यह स्नानार्थियों की भीड़ जमा है।
पार्वती का कौतूहल तो शान्त हो गया पर नया संदेह उपज पड़ा, इतने लोग स्वर्ग कहां पहुंच पाते हैं ?

भगवती ने अपना नया सन्देह प्रकट किया और समाधान चाहा।
भगवान शिव बोले – शरीर को गीला करना एक बात है और मन की मलीनता धोने वाला स्नान जरूरी है। मन को धोने वाले ही स्वर्ग जाते हैं। वैसे लोग जो होंगे उन्हीं को स्वर्ग मिलेगा।

सन्देह घटा नहीं, बढ़ गया।
पार्वती बोलीं – यह कैसे पता चले कि किसने शरीर धोया किसने मन संजोया।
यह कार्य से जाना जाता है। शिवजी ने इस उत्तर से भी समाधान न होते देखकर प्रत्यक्ष उदाहरण से लक्ष्य समझाने का प्रयत्न किया।
मार्ग में शिव कुरूप कोढ़ी बनकर पढ़ रहे। पार्वती को और भी सुन्दर सजा दिया। दोनों बैठे थे। स्नानार्थियों की भीड़ उन्हें देखने के लिए रुकती। अनमेल स्थिति के बारे में पूछताछ करती।

पार्वती जी रटाया हुआ विवरण सुनाती रहतीं। यह कोढ़ी मेरा पति है। गंगा स्नान की इच्छा से आए हैं। गरीबी के कारण इन्हें कंधे पर रखकर लाई हूँ। बहुत थक जाने के कारण थोड़े विराम के लिए हम लोग यहाँ बैठे हैं।
अधिकाँश दर्शकों की नीयत डिगती दिखती। वे सुन्दरी को प्रलोभन देते और पति को छोड़कर अपने साथ चलने की बात कहते।
पार्वती लज्जा से गढ़ गई। भला ऐसे भी लोग स्नान को आते हैं क्या? निराशा देखते ही बनती थी।

संध्या हो चली। एक उदारचेता आए। विवरण सुना तो आँखों में आँसू भर लाए। सहायता का प्रस्ताव किया और कोढ़ी को कंधे पर लादकर तट तक पहुँचाया। जो सत्तू साथ में था उसमें से उन दोनों को भी खिलाया।
साथ ही सुन्दरी को बार-बार नमन करते हुए कहा – आप जैसी देवियां ही इस धरती की स्तम्भ हैं। धन्य हैं आप जो इस प्रकार अपना धर्म निभा रही हैं।
प्रयोजन पूरा हुआ। शिव पार्वती उठे और कैलाश की ओर चले गए। रास्ते में कहा – पार्वती इतनों में एक ही व्यक्ति ऐसा था, जिसने मन धोया और स्वर्ग का रास्ता बनाया। स्नान का महात्म्य तो सही है पर उसके साथ मन भी धोने की शर्त लगी है।

पार्वती तो समझ गई कि स्नान महात्म्य सही होते हुए भी… क्यों लोग उसके पुण्य फल से वंचित रहते हैं?

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ईदू मिश्मी – अरुणाचल


अरुणाचल प्रदेश के ईदू मिश्मी समुदाय के प्रमुख पर्व रेह की अनंत शुभकामनाएँ

ईदू मिश्मी समुदाय रेह पर्व अत्यंत उत्साह से मनाते है इस पर्व में इदू लोग परिवार को विशेष महत्व देते हैं उनका मानना है कि प्रत्येक ईदू परिवार को रेह पर्व मनाना चाहिए। जो यह परिवार मनाता है उसे मृत्यु के उपरांत उच्च स्थान मिलता है। सामूहिक उत्सव के रूप में रेह पर्व दो दिनों तक मनाया जाता है जबकि पारंपरिक रूप से यह पाँच दिवसीय उत्सव है। पहले दिन को एंड्रोपू कहा जाता है इस दिन मेजबान के घर मेंगा के घर लोग उपहार लेकर पहुँचते हैं। इस दिन मेंगा से लिये गये उधार वापस किया जाता है और ईगू (पुजारी) पूजा आरंभ करता है।सभी मिलकर नृत्य और गान करते हैं। दूसरे दिन को एयांग्ली कहा जाता है इसमें एक मिथुन अरु-हा के लिए छोड़ दिया जाता है बाकी सबकी बलि दी जाती है। तीसरे दिन को इयीली कहा जाता है इस दिन मेंगा उपहार लाने वालों को सूखी मछली और अन्य मांस के पैकेट प्रदान करता है। चौथे दिन को इली रू मुनि या अरु-गो कहा जाता है इस दिन अरु-हा ( केवल गाँव के लोगों का भोज) के लिए रखे मिथुन की बलि दी जाती है और भोज किया जाता है ईगू द्वारा विशेष नृत्य किया जाता है। पाँचवे व अंतिम दिन को एतो नू चे कहा जाता है। इस दिन चिड़ियों की बलि दी जाती है तथा ईगू को उपहार देकर विदा किया जाता है। 1968 से यह पर्व सामुदायिक रूप से मनाया जाने लगा है। मिश्मी पर्वत की अन्य जनजातियों द्वारा तामलादू पर्व जमीन की सुरक्षा, फसल की कामना, स्वास्थ्य व सुख समृद्धि की आकांक्षा के साथ मनाया जाता है। बांस के देवता का निर्माण किया जाता है। छोटे स्तर पर मुर्गों की बलि दी जाती है बड़े सामुदायिक पर्व में मिथुन या भैंसे के बलि दी जाती है। चावल में तिल एवं मांस के टुकड़े मिलाकर बाँटा जाता है। कम्ब्रिन(पुजारी) मुर्गों के रक्त की शुद्धता देखकर ईश्वर की प्रसन्नता की जाँच करते हैं। नृत्य गान एवं सहभोज का आयोजन किया जाता है। त्यौहार के अगले दिन गेना मनाया जाता है। इस दिन पूरी शांति रखी जाती है। सभी आराम करते हैं। किसी प्रकार जीव या हरी वनस्पतियों को नहीं काटा जाता।

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दिखावटी रिश्ते


शुभदा और राकेश जी चुपचाप ड्राइंग रुम में बैठकर अखबार पढ़ रहे थे । दोनों कुछ दिन के लिये अपने छोटे से शहर से इस महानगर में बेटे परख के पास आगये थे पर दिल से उदास थे । यहां तो घर में ही बेटा बहू और दोनों बच्चे अपने में व्यस्त रहते थे । बस कभी कभी बच्चे दो पल बात कर लेते थे नहीं तो सब अपने कमरों में या अपने दोस्तों में मस्त । शुभदा के दो बेटियां और एक बेटा था । बेटियां अपनी गृहस्थी में मस्त थी। बेटा चाहता कि मां पापा अपना घर बेच कर उसके पास आजाये । शुभदा राकेश जी से बोली सुनो परख के पापा समय कितनी तेजी से बदलता है। राकेश जी उसे देखते रहे शुभदा अपनी धुन में बोल रही थी । जब एक बाड़े में हमारा परिवार रहता था । तुम पांच भाई और तीन चचेरे भाई सबके मकान अलग अलग पर बीच में आंगन एक था । सारे बच्चे एक साथ धमा चौकड़ी मचाते लड़ते झगड़ते पर मजाल है हम बहुओं में आपस में कभी झगड़ा हुआ हो । केवल बड़ी भाभी के घर में टीवी था और सारे बच्चे भाभी के घर में घुसे रहते भाभी भी सबका कितना ख्याल रखती थी । रजाई में घुसे बच्चे चिल्लाते बड़ी काकी खाना चाहिए किसी को मूंगफली चाहिये । सब वहीं रजाईयों में इकठ्ठे सो जाते थे । बार बार एन्टीना को संभालने कोई बड़ा बच्चा जाता तो सब हल्ला मचाते #आगया अगया_# थोड़ी देर बाद कहते अरे फिर गया । कितना अच्छा लगता था । यहाँ किसी को फुर्सत नहीं । राकेश जी ने कहा शुभदा समय बदल गया । अब देखो अपने उस छोटे से शहर में भी बस हम सब बुजुर्ग रह गये हैं। सब बच्चे बाहर नौकरियों पर चले गये । बेटियां शादी होकर अपने घर चली गयी । अचानक शुभदा बोली नहीं परख के पापा हम वहीं रहेगे वहाँ मेरी सब देवरानी जिठानी तो हैं । मै अपना घर नहीं छोडूंगी । ये मकान है पर वहाँ हमारा घर है। मकान ईंटो का होता है पर घर रिश्तों से बनता है। यहाँ दिखावटी रिश्ते हैं ।

स्व रचित
डा.मधु आंधीवाल

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चाय

“सारा दिन बस चाय-चाय ही करते रहती हैं माताजी। रसोईं में जाओ नहीं कि चाय का फ़रमान शुरू हो जाता है, अरी बहुरिया! तनिक दो घूँट चाय तो बना दे। अब कौन समझाए कि दो घूँट चाय के लिए भी तामझाम तो सारा ही करना पड़ता है। लगता है कि मेरी शादी किसी इंजीनियर से नहीं बल्कि चाय की थड़ी वालों के यहाँ हुई है और माताजी उस थड़ी की मालकिन।” हर रोज़ ही वो ये बातें अदरक कूटते-कूटते खुद से बोलते रहती।
पर आज घर में मनहूसियत छाई हुई है। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है। बस माताजी का अंतिम समय नज़दीक ही है। वो जल्दी-जल्दी खाने की तैयारी कर रही है ये सोचकर कि घरवालों के पेट में कुछ तो चला जाए नहीं तो एक बार माताजी की देह शांत हो गई तो खाने पीने का कहाँ होश रहेगा किसी को भी। जो भी रसोईं में दिखा, जल्दी से चढ़ा ही रही थी कि रानू आकर बोली, “चाची! माताजी बुला रहीं हैं आपको।”
“पास जाकर सुन, जाने माताजी क्या कहना चाह रही है तुझे।” पापाजी ने कहा।
“क्या कर रही थी बेटा?” टूटी-फूटी आवाज़ में माताजी बोली।
“वो .. मैं.. बस कुछ“…. अब वो कैसे बताए कि अगर आप चली गईं तो कोई भी कुछ खा नहीं पाएगा तो जल्दी से कुछ बना रही थी।
“खाना बना रही थी क्या?” माताजी ने फिर पूछा।
“माताजी, वो पापाजी को शुगर है तो वो अगर भूखे रहेंगे तो बीमार हो जाएँगें, मम्मीजी को भी बीपी की दवा लेनी पड़ती है और फिर बच्चे भी हैं तो मैंने सोचा कि…..”
“हद्द है निशा, यहाँ माताजी की ये हालत और तुम्हें खाना सूझ रहा है।” साइड में से निशा की सास ने कहा।
“तू चुप कर रमा। माताजी ने हाथ को बेड पर पटकते हुए कहा। “क्या बनाया है तूने?”
“दाल रोटी .. आप खाओगी माताजी?”
“पहले तू एक बात बता। रात में चौका साफ़ करके गैस पर चायदानी और चाय चीनी के डिब्बे तू ही रखती थी ना?” उखड़ती साँसों को समेटकर माताजी ने पूछा।
हाँ में सिर हिला दिया उसने।
“मुझे पता है माताजी कि आपको रात में भी चाय की तलब लगती है। बर्तनों की खड़खड़ और डिब्बों की आवाज़ से सबकी नींद ख़राब हो जाएगी, इस डर से आप अपनी तलब को दबाकर रखती थी। मैंने उस दिन आपकी सारी बातें सुन ली थी, जब आप ठाकुरजी से अपनी चाय की आदत को छुड़वाने की गुहार लगा रही थी। उसी दिन से मैंने रात में चाय का सामान बाहर रखना शुरू कर दिया। कोई गलती हो गई क्या मुझसे?”
माताजी के निस्तेज चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई।
“नहीं री , तू तो असली अन्नपूर्णा है मेरे घर की। बिटिया, दो घूँट चाय बना दें अदरक डाल के। क्या पता, प्राण उसी में ही अटके हों।”
आज अदरक कूटते समय निशा चुप थी।

मीनाक्षी सौरभ
घाना

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐भाव के भूखे हैं भगवान💐💐

उस समय कथावाचक व्यास डोगरे जी का जमाना था बनारस में। वहां का समाज उनका बहुत सम्मान करता था। वो चलते थे तो एक काफिला साथ-साथ चलता था ।

एक दिन वे दुर्गा मंदिर से दर्शन करके निकले तो एक कोने में बैठे ब्राह्मण पर दृष्टि पड़ी जो दुर्गा स्तुति पढ रहा था।

वे उस ब्राह्मण के पास पहुंचे जो कि पहनावे से ही निर्धन लग रहा था । डोगरे जी ने उसको इक्कीस रुपये दिये और बताया कि वह अशुद्ध पाठ कर रहा है। ब्राह्मण ने उनका धन्यवाद किया और सावधानी से पाठ करने की कोशिश में लग गया।

रात में डोगरे जी को जबर बुखार ने धर दबोचा। बनारस के टाप के डाक्टर वहां पहुंच गए । भोर में सवा चार बजे उठ कर डोगरे जी बैठ गये और तुरंत दुर्गा माता मंदिर जाने की इच्छा प्रकट की ।

एक छोटी मोटी भीड़ साथ लिये डोगरे जी मंदिर पहुंचे , वही ब्राह्मण अपने ठीहे पर बैठा पाठ कर रहा था । डोगरे जी को उसने प्रणाम किया और बताया कि वह अब उनके बताये मुताबिक पाठ कर रहा है ।

वृद्ध कथावाचक ने सर इनकार में हिलाया, ” पंडित जी, आपको विधि बताना हमारी भूल थी। घर जाते ही तेज बुखार ने धर दबोचा । फिर भगवती दुर्गा ने स्वप्न में दर्शन दिये। वे क्रुद्ध थीं, बोलीं कि तू अपने काम से काम रखा कर। मंदिर पर हमारा वो भक्त कितने प्रेम से पाठ करता था। तू उसके दिमाग में शुद्ध पाठ का झंझट डाल आया । अब उसका भाव लुप्त हो गया। वो रुक रुक कर सावधानीपूर्वक पढ रहा है। जा और कह कि जैसे पढता था, बस वैसे ही पढे।”

इतना कहते-कहते डोगरे जी के आँसू बह निकले। रुंधे हुए गले से वे बोले, ” महाराज, उमर बीत गयी, पाठ करते, माँ की झलक न दिखी। कोई पुराना पुण्य जागा था कि जिससे आपके दर्शन हुये और जिसके लिये जगत जननी को आना पड़ा।

आपको कुछ सिखाने की हमारी हैसियत नहीं है । आप जैसे पाठ करते हो, करो। जब सामने पड़ें, आशीर्वाद का हाथ इस मदांध मूढ के सर पर रख देना।”

भक्त का भाव ही प्रभु को प्रिय है!

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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