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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐 सेर को सवा सेर 💐💐

एक समय की बात है। चंदनपुर में कालू नाम का एक ठग रहा करता था। वह राहगीरों को खूब ठगा करता था। गांव वाले उसकी हरकत से परेशान थे, लेकिन ऐसी कोई तरकीब नहीं निकाल पा रहे थे कि कालू को सबक सिखाया जा सके।

एक दिन कालू खेतों की ओर जाती पगडंडी पर खड़ा था कि उसे दूसरी ओर से आता एक नौजवान नजर आया। उसके एक हाथ में घोड़े की लगाम थी और दूसरे हाथ में बकरी की रस्सी। अजनबी को पास आते देख कालू मुस्कराते हुए बोला, “राम-राम भैया। लगता है बड़ी दूर से आ रहे हो।”

“हां, मैं दूर गांव का रहने वाला हूं। श्याम नगर अपनी ससुराल जा रहा हूं। मो कछ रुपयों की आवश्यकता है, इसलिए मैं यह बकरी बेचना चाहता हूं।” अजनबी ने जवाब दिया। यह सुनते ही कालू की आंखों में चमक आ गई। उसने तरंत उस अजनबी को ठगने की योजना बना ली। वह बोला. “अच्छा या दस घोड़े के साथ जो बकरी है, वह कितने की दोगे?”

अजनबी बोला, “पांच सौ रुपये की।”

“ठीक है मुझे सौदा मंजूर है, यह लो पांच सौ रुपये। चलो अब घोड़े से उतरो, यह घोड़ा भी मेरा हुआ।” ठग ने कहा।

“क्या?” अजनबी चौंकते हुए बोला, “तुमने सिर्फ बकरी ली है, घोड़ा नहीं।”

“अरे, घोड़ा कैसे नहीं दोगे? मैंने तुमसे पहले ही पूछ लिया था कि इस घोड़े के साथ जो यह बकरी है, वह कितने की दोगे? यानी घोड़े और बकरी दोनों की कीमत पांच सौ रुपये थी, जो मैंने तुम्हें दे दी है।” कालू बोला। अब तक वहां काफी लोग जमा हो चुके थे। उन्होंने भी कालू की बात पर हामी भरी। कालू के चेहरे पर विजयी भाव थे। वह अजनबी से घोड़ा और बकरी लेकर शान से अपने घर की ओर जाने लगा। तभी अजनबी ने उसे रोका, “सुनो भैया।”

उसकी आवाज सुनकर कालू रुक गया और बोला, “क्या बात है?”

“बात दरअसल यह है कि मेरा घोड़ा और बकरी तो तुमने ले ली है। अब मैं क्या मुंह लेकर अपनी ससुराल जाऊंगा। अतः मैं अपनी यह रेशमी पगड़ी तुम्हें बेचना चाहता हूं और इस पगड़ी की कीमत मैं सिर्फ एक मुट्ठी चावल लूंगा।”

यह सुनकर कालू सोचने लगा, वाह आज का दिन तो बहुत बढ़िया है। यह तो निरा काठ का उल्लू निकला। अपनी प्रसन्नता को छुपाते हुए कालू सहजता से बोला, “ठीक है। जब तुम इतना निवेदन कर रहे हो, तो मैं ठुकरा नहीं सकता। सामने ही मेरा घर है। मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें एक मुट्ठी चावल दिलवा देता हूं।”

घर पहुंचते ही कालू ने अपनी पत्नी को आवाज लगाई, “सुनती हो भाग्यवान, जरा एक मुट्ठी चावल लाना। इस अजनबी से मैंने उसकी पगड़ी एक मुट्ठी चावल के बदले खरीदी है।”

उसकी पत्नी जैसे ही एक मुट्ठी चावल उस अजनबी को देने लगी, उसने तुरंत कालू की पत्नी का हाथ पकड़ लिया और चाकू निकालकर उसकी मुट्ठी काटने के लिए बढ़ने लगा। यह देख कालू चिल्लाया, “अरे यह क्या कर रहे हो?”

“मैं यह मुट्ठी काट रहा हूं। तुम इस एक मुट्ठी चावल के बदले पगड़ी का सौदा कर चुके हो।” अजनबी बोला।

यह सुनकर कालू के पैरों तले से जमीन खिसक गई। सभी गांव वाले उस अजनबी की चतुराई देखकर वाह-वाह ! करने लगे। क्योंकि आज सेर को सवा सेर मिल गया था। कालू गिड़गिड़ाकर उस अजनबी से कहने लगा, “मुझे माफ कर दो भैया। मैं अपनी भूल स्वीकार करता हूं, यह लो तुम्हारा घोड़ा और बकरी । यह पांच सौ रुपये भी तुम ही रखो। किंतु मेरी पत्नी को छोड़ दो।”

“हूं, ठीक है। अब आई तुम्हारी अक्ल ठिकाने।” यह कहकर अजनबी पुनः अपनी यात्रा पर चल दिया।

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

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♦️♦️♦️ रात्रि कहांनी ♦️♦️♦️

👉 ईश्वर☝🏻

एक राजा था,वह जब भी मंदिर जाता,तो वहां पर 2 भिखारी दाएं और बाएं बैठा करते,
दाई तरफ़ वाला कहता-हे ईश्वर, तूने राजा को बहुत कुछ दिया है, मुझे भी दे दे!

बायी तरफ़ वाला कहता-ऐ राजा!ईश्वर ने तुझे बहुत कुछ दिया है,मुझे भी कुछ दे दे।
दाईं तरफ़ वाला भिखारी बायी तरफ़ वाले से कहता-ईश्वर से माँग वह सबकी सुनने वाला है।
बायी तरफ़ वाला जवाब देता -चुपकर मूर्ख
एक बार राजा ने अपने मंत्री को बुलाया और कहा कि मंदिर में दाईं तरफ जो भिखारी बैठता है वह हमेशा ईश्वर से मांगता है तो अवश्य ईश्वर उसकी ज़रूर सुनेगा
लेकिन जो बायी तरफ बैठता है वह हमेशा मुझसे निवेदन करता रहता है,तो तुम ऐसा करो कि एक बड़े से बर्तन में खीर भरके उसमें स्वर्ण मुद्रा डाल दो और वह उसको दे आओ।
मंत्री ने ऐसा ही किया -अब वह भिखारी मज़े से खीर खाते-खाते दूसरे भिखारी को चिड़ाता हुआ बोला~हुह बड़ा आया ईश्वर देगा,यह देख राजा से माँगा,मिल गया ना।खाते खाते जब इसका पेट भर गया तो इसने बची हुई खीर का बर्तन उस दूसरे भिखारी को दे दिया और कहा-ले पकड़ तू भी खाले।
अगले दिन जब राजा आया तो देखा कि बायी तरफ वाला भिखारी तो आज भी वैसे ही बैठा है लेकिन दाईं तरफ वाला ग़ायब है,राजा नें चौंककर उससे पूछा-“क्या तुझे खीर से भरा बर्तन नहीं मिला?
भिखारी-जी मिला था राजाजी, क्या स्वादिष्ट खीर थी,मैंने ख़ूब पेट भरकर खायी।
राजा-फिर?
भिखारी-फ़िर जब मेरा पेट भर गया तो वह जो दूसरा भिखारी यहाँ बैठता है मैंने उसको दे दी, मूर्ख हमेशा कहता रहता है ईश्वर देगा,ईश्वर देगा!
राजा मुस्कुराकर बोला अवश्य ही,ईश्वर ने उसे दे ही दिया।
ईश्वर पर भरोसा रखें |

नित याद करो मन से शिव परमात्मा को☝🏻

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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राम जन्म भूमि


बात ज्यादा पुरानी नहीं है।

अंग्रेजो के ज़माने में एक दंगा हुआ था श्री राम जन्मभूमि को ले लेकर और फैज़ाबाद की तरफ से मुस्लिम भीड़ ने हमला किया था।

तब दंगे के बीच सबने देखा कि हनुमान गढ़ी की सीढ़ियों से ६ फुट से ज्यादा ऊंचा विशालकाय नागा साधु हाथ मे तलवार लिए उतरा और दंगाई भीड़ पे अकेले टूट पड़ा और गाजर मूली की तरहः काटता हुआ फैज़ाबाद की तरफ निकल गया।

हनुमान गढ़ी में रहने वाले अन्य महंत पुजारी नागा भी हैरान रह गए क्योंकि किसी ने उस नागा साधु को न उस दिन के पहले देखा था न उस दिन के बाद देखा लेकिन उस अकेले नागा ने ऐसी मार काट की थी कि फैज़ाबाद तक सड़क पे दंगाइयों की लाशें पड़ी थी और दंगा खत्म हो गया था।अयोध्या शहर के कोतवाल हनुमान जी है और अयोध्या की सुरक्षा का जिम्मा उनके ऊपर है और जब अयोध्या पर संकट आता है तो वो किसी न किसी साधु रूप में आते है।

६ दिसम्बर वाले दिन बाबरी ढांचे के चारो तरफ प्रशाशन ने कई स्तर की बैरिकेड लगाया हुआ था और कार सेवक अंदर नही जा पा रहे थे, तभी एक नागा साधु एक सरकारी बस स्टार्ट कर के तेज़ी से बस ले कर बैरिकेड के एक के बाद एक स्तर तोड़ता हुआ अंदर घुसता गया
उसके पीछे भीड़ घुस गई और वो नागा उस भीड़ में गायब हो गया।

ये घटना फ़ोटो और वीडियो में रिकॉर्ड हुई थी अखबारों में भी छपी लेकिन वो नागा कभी दुबारा नही दिखा लेकिन उसने ढांचा गिराने के लिए कारसेवकों के लिए रास्ता खोल दिया था ।प्रशाशन देखता रह गया और कुछ नही कर सका थाअयोध्या में हनुमान जी का किला है हनुमान गढ़ी और देश भर के सभी प्रमुख हनुमान मंदिरों का मुख्यालय भी है।।

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23 फरवरी 1881 सरदार अजीत सिंह का जन्म : अधिकाँश जीवन जेल में बीता
भारत विभाजन से दुखी, प्राण दिये
सरदार अजीत सिंह का जन्म पंजाब के जालंधर जिले के खटकड़ कड़ा गाँव में हुआ था । वे सुप्रसिद्ध राष्ट्रभक्त और क्राँतिकारी सरदार भगत सिंहके चाचा थे। उन्होने भारत में ब्रितानी शासन को चुनौती दी और जीवन का अधिकाँश हिस्सा जेल में बिताया । उन्होने अंग्रेजी शासन और उनके द्वारा किये जा रहे शोषण का खुलकर विरोध किया । सरकार ने उन्हें राजनीतिक ‘विद्रोही’ घोषित करके जेल में डाल दिया । बाद में लाला लाजपत राय जी के साथ ही साथ देश निकाले का दण्ड मिला ।
उनके बारे कभी बाल गंगाधर तिलक जी ने कहा था कि उनमें नेतृत्व की अद्भुत क्षमता है और उन्हें जो दायित्व मिलेगा उसका वे सफलता पूर्वक संचालन कर सकते हैं । यह बात 1906 की है तब सरदार अजीत सिंह की उम्र २५ वर्ष की थी । वे १९०९ में अपना घर बार छोड़ कर विदेश यात्रा पर निकल पड़े जहाँ उन्होंने भारतीय जनों को संगठित करके क्रांति की शुरुआत की । उन्होंने ईरान तुर्की, जर्मनी, ब्राजील, स्विट्जरलैंड, इटली, जापान आदि देशों की यात्रा की और उन सभी देशों के प्रमुखों से संपर्क साधा जो अंग्रेजों के विरुद्ध रहे या जो अंग्रेजों से पीड़ित रहे । । सरदार अजीत सिंह आजाद हिन्द फौज के संस्थापकों में से एक थे । उन्होंने ही नेताजी सुभाष चन्द्र बोस हिटलर, मुसोलिनी आदि उन नेताओं से भेंट कराई जो अंग्रेजों के विरुद्ध थे । उन्होंने विभिन्न भाषायें सीखी । उन्हें विश्व की ४० भाषाओं पर अधिकार प्राप्त हो गया था । रोम रेडियो को तो उन्होंने नया नाम दे दिया था, ‘आजाद हिन्द रेडियो’ तथा इसके माध्यम से क्रांति का प्रचार प्रसार किया ।
वे भारत विभाजन के विरुद्ध थे । 1947 के आरंभ में ही भारत विभाजन की रूपरेखा बन गयी थी । स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर सख्ती कम हो गयी थी । सरदार अजीत सिंह मार्च १९४७ में भारत वापस लौटे । वे छत्तीस वर्ष तक भारत से बाहर रहे । इस बीच पत्नी हरनाम कौर उनका चेहरा ही भूल गयीं थीं । उन्हें पहचानने में बड़ी कठिनाई हुई । बड़ी मुश्किल से परिवार में सम्मलित हुये और अपना नावास हिमाचल प्रदेश के चंबा जिलेमें बनाया । यह स्थान डलहौजी हिल स्टेशन क्षेत्र में पड़ता है । यहां इनकी स्मृति में स्मारक भी बन गया है । भारत लौटकर वे भारत विभाजन के विरूद्ध अभियान में लग गये । लेकिन चारों ओर हिँसा और तनाव का वातावरण था । इससे बहुत दुःखी रहने लगे । समय की अपनी गति होती है । 15 अगस्त 1947 आ गया । भारत का विभाजन हो गया । भारत के हिस्से पर पाकिस्तान नाम से नये देश का उदय हो गया । उनके बलिदान के बारे में दो अलग-अलग विवरण मिलता है एक विवरण में कहा जाता है कि भारत विभाजन के समय उन्हें हृदयाघात हुआ और उन्होंने शरीर त्याग दिया था जबकि दूसरे विवरण में कहा जाता है कि भारत विभाजन से वे इतने दुःखी हुये कि उन्होंने १५ अगस्त १९४७ के प्रातः पूरे परिवार को एकत्र किया, और जय हिन्द कह कर अपनी कनपटी पर गोली मार ली । इसके साथ ही राष्ट्र की अस्मिता पर अपना बलिदान दे दिया ।

–रमेश शर्मा

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શંકરાચાર્યએ નર્મદા કિનારે જીવન નો ઘણો ભાગ વિતાવેલો
તેમનું જીવન ટૂંકું હતું
ચોમાસામાં પૂર આવે તેમ થોડું જીવીને તે ધર્મ અને સંસ્કૃતિને છલોછલ કરી ગયા
શંકરે માતા નર્મદાના અનેક ભાવ એક તપસ્વી તરીખે જોયા હતા

એક શ્રાવણ માસમાં નર્મદા નદીએ પોતાનું ભીષણ રૂપ દેખાડવું શરુ કર્યું
ને શંકરાચાર્યના ગુરુ ગોવિંદપાદની ગુફા સુધી પાણી પહોંચ્યું
કાંઠા ઉપર રહેતા તપસ્વીઓ , માછીમારો નૌકા નાયકો
અને ખારવાઓ ઊંચાઈ વાળા વિસ્તારમાં આવી ગયા
ગાયો બકરી જેવા અબોલ જીવો પણ તેમની સાથે હતા
પાણી સામે જાણે બધા લાચાર નિસહાય

નદીના પાણીએ મહાદેવેનું તાંડવ શરુ કર્યું હોય તેમ શિલાઓ ઉપર મોજા ઉછળતા હતા
ગુફાની અંદર સુધી પહોચતા તિર જેવા પાણી ના ફોરા શંકરના દેહ સાથે અથડાવા લાગ્યા

યુવાન શંકર ગુફામાથી બહાર આવ્યા
પોતાનું કમન્ડળ નીચે મૂક્યું
મૈયા નર્મદા ના પાણી સામે જોઈ
તેમના કરુણાસભર હૃદયમાંથી એક પછીએક પ્રાથના શબ્દો નીકળવા મંડ્યા
ચમત્કાર થતો હોઈ તેમ
નર્મદા નદી થંભી ગયા
તેમના એક એક શ્લોકના રણકાર સાથે, નર્મદાના પાણી ઉતરવા લાગ્યા
શંકર બોલતા રહ્યા …પાણી ઉતરતા રહ્યા
શબ્દો હતા ….
.
सबिंदु सिन्धु सुस्खल तरंग भंग रंजितम
द्विषत्सु पाप जात जात कारि वारि संयुतम
कृतान्त दूत काल भुत भीति हारि वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ||

त्वदम्बु लीन दीन मीन दिव्य सम्प्रदायकम
कलौ मलौघ भारहारि सर्वतीर्थ नायकं
सुमस्त्य कच्छ नक्र चक्र चक्रवाक् शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ||

महागभीर नीर पुर पापधुत भूतलं
ध्वनत समस्त पातकारि दरितापदाचलम
जगल्ल्ये महाभये मृकुंडूसूनु हर्म्यदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ||

गतं तदैव में भयं त्वदम्बु वीक्षितम यदा
मृकुंडूसूनु शौनका सुरारी सेवी सर्वदा
पुनर्भवाब्धि जन्मजं भवाब्धि दुःख वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ||

अलक्षलक्ष किन्न रामरासुरादी पूजितं
सुलक्ष नीर तीर धीर पक्षीलक्ष कुजितम
वशिष्ठशिष्ट पिप्पलाद कर्दमादि शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ||

सनत्कुमार नाचिकेत कश्यपात्रि षटपदै
धृतम स्वकीय मानषेशु नारदादि षटपदै:
रविन्दु रन्ति देवदेव राजकर्म शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ||

अलक्षलक्ष लक्षपाप लक्ष सार सायुधं
ततस्तु जीवजंतु तंतु भुक्तिमुक्ति दायकं
विरन्ची विष्णु शंकरं स्वकीयधाम वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ||

अहोमृतम श्रुवन श्रुतम महेषकेश जातटे
किरात सूत वाड़वेषु पण्डिते शठे नटे
दुरंत पाप ताप हारि सर्वजंतु शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ||

કુલ આઠ શ્લોક
શંકરાચાર્ય ના મોઠામાંથી અસ્ખલિત રીતે વહ્યા
ગુરુ ગુરુપદ પણ ગુફાની બહાર આવી તેમના મહાન શિષ્યને જોઈ રહ્યા
આદિ શંકરાચાર્ય ની રચના પૂર્ણ થતાં
વધારાનું તમામ જળ
શંકરના કમંડળમાં પોરો ખાવા બેસી ગયા હોય એ રીતે
જરા તરા જળના વમળો રાખીને, ધીમે ધીમે ઓસરવા લાગ્યું

કોઈ કહે છેકે માતા નર્મદા પરચો આપવા આવેલા હતા
કોઈ કહે છે કે થોડો સમય શંકરાચાર્ય કમંડળ માં વિશ્રામ કરી
શંકરના દિવ્ય ભાવને સ્પર્શવા નર્મદા આવેલા

શંકરાચાર્ય આ રચના તે નર્મદા અષ્ટક તરીખે ઓળખાઈ છે

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સોબત

કાગડો મારો પડોશી મિત્ર હતો .તે મને ઘણીવાર પૂછતો ,
‘ દોસ્ત , શું તને ખરેખર દૂર સુધી દેખાય છે ! ‘
હું હા કહેતો . તે મારી પરીક્ષા કરવાં કહેતો , ‘ પેલાં દૂરનાં ઝાડ પાછળ શું દેખાય છે ? ‘
હું દૂર ક્ષિતિજમાં નજર નોંધી કહેતો , ત્યાં ઝાડની ડાળીએ બેઠેલો પોપટ ફળ ખાય છે .’
તેનું મોં કટાણું થઈ જતું ,તે વળી પૂછતો , ‘ ત્યાંથી દૂર !’
‘ ત્યાંથી દૂર ફૂલો પર ભમરાઓ ગુંજારવ કરી રહ્યાં છે ! ‘
‘ ત્યાંથી દૂર ?’
‘ ત્યાંથી દૂર એક ચિતો હરણાંઓનું મારણ કરવાં દોડી રહ્યો છે ! ‘
તેની આંખોમાં ચમક આવી જતી !
‘ ચાલ દોસ્ત , એ બાજું જરાં ફરી આવીએ ! ‘ તે મને બળજબરીથી ત્યાં ધસડી જતો ને જંગલી પ્રાણીઓએ મારણ કરેલાં પશુઓનાં હાડમાંસ ચૂંથતો ! મને તેની આદત ગમતી નહિ પરંતુ તે મારો એકમાત્ર સાથીદાર હતો એટલે હું તેની ગુસ્તાખી ચલાવી લેતો ! તે પોતાનાં ખોરાકનાં સ્વાદનાં વખાણ કરી મને લલચાવતો ! પરંતુ હું અચળ રહેતો ! તે માંસની જાફત ઉડાવતો જયારે હું ફળ – ફૂલ ખાઈને જીવતો !
એક વાર જંગલમાં દુઃકાળ પડ્યો ! વૃક્ષો – પાંદડા સૂકાવા લાગ્યાં ! કાગડાને હવે ખોરાક શોધવાં મારી જરૂર ન હતી .પરંતુ અમારી દોસ્તી કાયમ હતી .
હું કાયમ તેની સાથે રહેતો . ભૂખને કારણે મારે ઉપવાસ થતાં હતાં, જયારે તેને રોજ ઉજાણી હતી . તે મને તેની સાથે જોડાવા આમંત્રણ આપતો …. ધીમેધીમે હું પણ તેના જેવો જ માંસભક્ષી થઈ ગયો !
પછી તો વરસાદ વરસ્યો , વસંત આવી પરંતુ હવે મારી આદત છૂટતી નથી . હવે મને પણ મારી તિક્ષ્ણ નજરમાં મરેલાં પશુઓ જ દેખાય છે .
આકર્ષક ફૂલો , મધુરાં ફળો કે ક્ષિતિજનાં બદલાતાં જતાં રંગોનું મેઘધનુષી દ્રશ્ય ! મેં બધુ જ ગુમાવ્યું છે કાગડાની સંગતને કારણે !
~ અંકુર બાપુ
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🌹🌹आलस रूपी भैंस🌹🌹
एक बार की बात है। एक महात्मा अपने शिष्य के साथ एक गांव से गुजर रहे थे। दोनों को बहुत भूख लगी थी। पास में ही एक घर था।

दोनों घर के पास पहुंचे और दरवाजा खटखटाया। अंदर से फटे-पुराने कपड़े पहना एक आदमी निकला।
महात्मा ने उससे कहा- हमें बहुत भूख लगी है। कुछ खाने को मिल सकता है क्या?

उस आदमी ने उन दोनों को खाना खिलाया।
खाना खाने के बाद महात्मा ने कहा…

तुम्हारी जमीन बहुत उपजाऊ लग रही है, लेकिन फसलों को देखकर लगता है कि तुम खेत पर ज्यादा ध्यान ही नहीं देते। फिर तुम्हारा गुजारा कैसे होता है?

आदमी ने उत्तर दिया- हमारे पास एक भैंस है, जो काफी दूध देती है। उससे मेरा गुजारा हो जाता है।

रात होने लगी थी, इसलिए महात्मा शिष्य सहित वहीँ रुक गए।

रात को उस महात्मा ने अपने शिष्य को उठाया और कहा- चलो हमें अभी ही यहां से निकलना होगा और इसकी भैंस भी हम साथ ले चलेंगे।

शिष्य को गुरु की बात अच्छी नहीं लगी, लेकिन करता क्या! दोनों भैंस को साथ लेकर चुपचाप निकल गए।

यह बात उस शिष्य के मन में खटकती रही।

कुछ सालों बाद एक दिन शिष्य उस आदमी से मिलने का मन बनाकर उसके गांव पहुंचा।

जब शिष्य उस खेत के पास पहुंचा, तो देखा खाली पड़े खेत अब फलों के बगीचों में बदल चुके थे।

उसे यकीन नहीं आ रहा था, तभी वह आदमी सामने दिख गया।

शिष्य उसके पास जाकर बोला- सालों पहले मैं अपने गुरु के साथ आपसे मिला था।

आदमी ने शिष्य को आदर पूर्वक बिठाया और बताने लगा… उस दिन मेरी भैंस खो गई। पहले तो समझ में नहीं आया कि क्या करूं।

फिर, जंगल से लकड़ियां काटकर उन्हें बाजार में बचने लगा। उससे कुछ पैसे मिले, तो मैंने बीज खरीद कर खेतो में बो दिए।

उस साल फसल भी अच्छी हो गई। उससे जो पैसे मिले उन्हें मैंने फलों के बगीचे लगाने में इस्तेमाल किया।

अब काम बहुत ही अच्छा चल रहा है। और इस समय मैं इस इलाके में फलों का सबसे बड़ा व्यापारी हूं।

कभी-कभी सोचता हूं उस रात मेरी भैंस न खोती तो यह सब न होता।

शिष्य ने उससे पूछा, यह काम आप पहले भी तो कर सकते थे?

तब वह बोला, उस समय मेरी जिंदगी बिना मेहनत के चल रही थी। मुझे कभी लगा ही नहीं कि मैं इतना कुछ कर सकता हूं।

मित्रों, अगर आपके जीवन में भी तो कोई ऐसी आलस रूपी भैंस है, जो आपको बड़ा बनने से रोक रही है, तो उसे आज ही छोड़ दें। यह करना बहुत ही मुश्किल है, लेकिन असंभव नहीं है।
🌹🙏🏻जय श्री जिनेन्द्र🙏🏻🌹
🌹पवन जैन🌹

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐हनुमानजी की चुटकी सेवा💐💐

अयोध्या में प्रभु श्रीराम का राज्याभिषेक होने के बाद हनुमानजी वहीं रहने लगे । उन्हें तो श्रीराम की सेवा का व्यसन (नशा) था । सच्चे सेवक का लक्षण ही है कि वह आराध्य के चित्त की बात जान लिया करता है । उसे पता रहता है कि मेरे स्वामी को कब क्या चाहिए और कब क्या प्रिय लगेगा ? श्रीराम को कोई वस्तु चाहिए तो हनुमानजी पहले से लेकर उपस्थित । किसी कार्य, किसी पदार्थ के लिए के लिए संकेत तक करने की आवश्यकता नहीं होती थी।

हनुमानजी की सेवा का परिणाम यह हुआ कि भरत आदि भाइयों को श्रीराम की कोई भी सेवा प्राप्त करना कठिन हो गया। इससे घबराकर सबने मिलकर एक योजना बनाई और श्रीजानकीजी को अपनी ओर मिला लिया । प्रभु की समस्त सेवाओं की सूची बनाई गयी । कौन-सी सेवा कब कौन करेगा, यह उसमें लिखा गया । जब हनुमानजी प्रात:काल सरयू-स्नान करने गए तब अवसर का लाभ उठाकर तीनों भाइयों ने सूची श्रीराम के सामने रख दी । प्रभु ने देखा कि सूची में कहीं भी हनुमानजी का नाम नहीं है । उन्होंने मुसकराते हुए उस योजना पर अपनी स्वीकृति दे दी । हनुमानजी को कुछ पता नहीं था।

दूसरे दिन प्रात: सरयू में स्नान करके हनुमानजी जब श्रीराम के पास जाने लगे तो उन्हें द्वार पर भाई शत्रुघ्न ने रोक दिया और कहा–’आज से श्रीराम की सेवा का प्रत्येक कार्य विभाजित कर दिया गया है। जिसके लिए जब जो सेवा निश्चित की गयी है, वही वह सेवा करेगा । श्रीराम ने इस व्यवस्था को अपनी स्वीकृति दे दी है।’

हनुमानजी बोले—‘प्रभु ने स्वीकृति दे दी है तो उसमें कहना क्या है ? सेवा की व्यवस्था बता दीजिये, अपने भाग की सेवा में करता रहूंगा।’

सेवा की सूची सुना दी गयी, उसमें हनुमानजी का कहीं नाम नहीं था । उनको कोई सेवा दी ही नहीं गयी थी क्योंकि कोई सेवा बची ही नहीं थी । सूची सुनकर हनुमानजी ने कहा—‘इस सूची में जो सेवा बच गयी, वह मेरी।’

सबने तुरन्त सिर हिलाया ’हां, वह आपकी।’ हनुमानजी ने कहा—‘इस पर प्रभु की स्वीकृति भी मिलनी चाहिए ।’ श्रीराम मे भी इस बात पर अपनी स्वीकृति दे दी ।

स्वामी श्रीराम का जिस प्रकार कार्य सम्पन्न हो, हनुमानजी वही उपाय करते हैं, उन्हें अपने व्यक्तिगत मान-अपमान की जरा भी चिन्ता नहीं रहती ।

हनुमानजी बोले—‘प्रभु को जब जम्हाई आएगी, तब उनके सामने चुटकी बजाने की सेवा मेरी ।’ यह सुनकर सब चौंक गये। इस सेवा पर तो किसी का ध्यान गया ही नहीं था लेकिन अब क्या करें ? अब तो इस पर प्रभु की स्वीकृति हनुमानजी को मिल चुकी है ।

चुटकी सेवा के कारण हनुमानजी राज सभा में दिन भर श्रीराम के चरणों के पास उनके मुख की ओर टकटकी लगाए बैठे रहे क्योंकि जम्हाई आने का कोई समय तो है नहीं । रात्रि हुई, स्नान और भोजन करक श्रीराम अंत:पुर में विश्राम करने पधारे तो हनुमानजी उनके पीछे-पीछे चल दिए । द्वार पर सेविका ने रोक दिया—‘आप भीतर नहीं जा सकते ।’ हनुमानजी वहां से हट कर राजभवन के ऊपर एक कंगूरे पर जाकर बैठ गए और लगे चुटकी बजाने।

पर यह क्या हुआ ? श्रीराम का मुख तो खुला रह गया । न वे बोलते हैं, न संकेत करते हैं, केवल मुख खोले बैठे हैं । श्रीराम की यह दशा देखकर जानकीजी व्याकुल हो गईं । तुरन्त ही माताओं को, भाइयों को समाचार दिया गया । सब चकित और व्याकुल पर किसी को कुछ सूझता ही नहीं । प्रभु का मुख खुला है, वे किसी के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दे रहे हैं ।

अंत में गुरु वशिष्ठ बुलाए गये । प्रभु ने उनके चरणों में मस्तक रखा; किन्तु मुंह खुला रहा, कुछ बोले नहीं ।

वशिष्ठजी ने इधर-उधर देखकर पूछा—‘हनुमान कहां हैं, उन्हें बुलाओ तो ?’

जब हनुमानजी को ढूंढ़ा गया तो वे श्रीराम के कक्ष के कंगूरे पर बैठे चुटकी बजाए जा रहे हैं, नेत्रों से अश्रु झर रहे हैं, शरीर का रोम-रोम रोमांचित है, मुख से गद्गद् स्वर में कीर्तन निकल रहा है—‘श्रीराम जय राम जय जय राम ।’

भाई शत्रुघ्न ने हनुमानजी से कहा—‘आपको गुरुदेव बुला रहे हैं ।’ हनुमानजी चुटकी बजाते हुए ही नीचे पहुंचे।

गुरुदेव ने हनुमानजी से पूछा—‘आप यह क्या कर रहे हैं ?’

हनुमानजी ने उत्तर दिया—‘प्रभु को जम्हाई आए तो चुटकी बजाने की सेवा मेरी है । मुझे अन्तपुर में जाने से रोक दिया गया । अब जम्हाई का क्या ठिकाना, कब आ जाए, इसलिए मैं चुटकी बजा रहा हूँ, जिससे मेरी सेवा में कोई कमी न रह जाए ।’

वशिष्ठजी ने कहा—‘तुम बराबर चुटकी बजा रहे हो, इसलिए श्रीराम को तुम्हारी सेवा स्वीकार करने के लिए जृम्भण मुद्रा (उबासी की मुद्रा) में रहना पड़ रहा है । अब कृपा करके इसे बंद कर दो।’

श्रीराम के रोग का निदान सुनकर सबकी सांस में सांस आई । हनुमानजी ने चुटकी बजाना बंद कर दिया तो प्रभु ने अपना मुख बंद कर लिया।

अब हनुमानजी हंसते हुए बोले—‘तो मैं यहीं प्रभु के सामने बैठूँ ? और सदैव सभी जगह जहां-जहां वे जाएं, उनके मुख को देखता हुआ साथ बना रहूँ, क्योंकि प्रभु को कब जम्हाई आएगी, इसका तो कोई निश्चित समय नहीं है।’

प्रभु श्रीराम ने कनखियों से जानकीजी को देखकर कहा, मानो कह रहे हों—‘और करो सेवा का विभाजन ! हनुमान को मेरी सेवा से वंचित करने का फल देख लिया।’

स्थिति समझकर वशिष्ठजी ने कहा—‘यह सब रहने दो, तुम जैसे पहले सेवा करते थे, वैसे ही करते रहो ।’

अब भला, गुरुदेव की व्यवस्था में कोई क्या कह सकता था । उनका आदेश तो सर्वोपरि है ।

यही कारण है कि श्रीराम-पंचायतन में हनुमानजी छठे सदस्य के रूप में अपने प्रभु श्रीराम के चरणों में निरन्तर उनके मुख की ओर टकटकी लगाए हाथ जोड़े बैठे रहते हैं ।

हनुमानजी की सेवा के अधीन होकर प्रभु श्रीराम ने उन्हें अपने पास बुला कर कहा—
कपि-सेवा बस भये कनौड़े, कह्यौ पवनसुत आउ ।
देबेको न कछू रिनियाँ हौं, धनिक तूँ पत्र लिखाउ ।। (विनय-पत्रिका पद १००।७)

‘भैया हनुमान ! तुम्हें मेरे पास देने को तो कुछ है नहीं; मैं तेरा ऋणी हूँ तथा तू मेरा धनी (साहूकार) है । बस इसी बात की तू मुझसे सनद लिखा ले ।’

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐महात्माजी की नसीहत💐💐

उपरमालिया नाम का एक राज्य था। राजा रत्नेश का शासन चल रहा था।

वे बड़े लापरवाह और कठोर प्रकृति के थे। राज्य में निर्धनता आसमान को छू रही थी।

प्रजा रत्नेश का आदर-सम्मान करना भूल चुकी थी। राजा को प्रणाम-नमस्कार किए बिना लोग अपना मुख मोड़ लेते थे।

प्रजा के व्यवहार से रत्नेश स्वयं को अपमानित महसूस कर रहा था। प्रजा के इस व्यवहार का कारण रत्नेश समझ नहीं पा रहा था।

एक दिन रत्नेश ने मंत्री से कहा – ‘मंत्रीवर! आज हमारा मन यहाँ घुटने लगा है। जंगलों में भ्रमण करने से शायद घुटन मिट जाए।

बस वे दोनों अपने-अपने घोड़े पर सवार होकर जंगल कपड़े। दोनों एक बड़े पर्वत के पास पहुँचे।

फागुन का महीना था। धूप चढ़ने लगी थी। थोड़ी देर तक सुस्ताने के लिए दोनों एक घने पेड़ के नीचे रुके।

घोड़े से उतरते हुए रत्नेश को एक छोटी सी पर्ण कुटिया दिखाई पड़ी।

घने जंगल में कुटिया! कौन हो सकता है? उन्हें अचरज हुआ।

धीमे कदमों से रत्नेश कुटिया के पास पहुँचे, पीछे-पीछे गजेंद्र सिंह भी थे।

कुटिया में एक महात्मा थे। उनको देखकर वे दोनों भाव-विभोर हो उठे।

‘महात्मा जी! मैं उपरमालिया राज्य का राजा रत्नेश हूँ। और ये हमारे मंत्री गजेंद्र सिंह।’ महात्मा जी को राजा ने अपना व मंत्री का परिचय दिया।

‘कैसे आना हुआ? महात्मा जी ने चेहरे पर मुस्कुराहट लाकर पूछा।

हम भ्रमण कर रहे थे। इस पेड़ की शीतल छाँह में सुस्ताने यहाँ रुके तो कुटिया दिख पड़ी।

हमारा सौभाग्य है कि आपके दर्शन हो गए। मंत्री ने कहा।

हाव-भाव व मुख की आभा ही से रत्नेश समझ गए कि महात्माजी ज्ञान-दर्शन और शास्त्रों में निष्णात हैं।

राजा ने उनको अपनी व्यथा बताई –
‘महात्माजी! मेरे राज्य की प्रजा मेरा आदर-सम्मान नहीं करती।

प्रजा का तो कर्तव्य बनता है कि वह अपने राजा का आदर करे, किंतु मैं इससे वंचित हूँ।

रत्नेश के व्यवहार से महात्मा जी परिचित थे। अत: उनको माजरा समझते देर नहीं लगी।

‘राजन्! मैं समझ गया हूँ, आप चलिए मेरे साथ।’ महात्मा जी बोले और दरिया की ओर बढ़ गए।

उनके पीछे-पीछे रत्नेश और गजेंद्र सिंह चल पड़े।

हरी-भरी घास उगी थी। घोड़े घास में लीन थे। कुटिया की पूर्व दिशा में पर्वत श्रृंखलाएँ थीं।
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पर्वतों से बहने वाले झरने समतल भूमि में एक साथ मिलकर दरिया बन गए थे।
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दरिया के पास एक चट्टान खड़ी थी। चट्टान के पास पहुँचकर महात्मा रुक गए।
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राजा और मंत्री भी अचरज के साथ महात्माजी के पास खड़े थे।
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राजन्! एक पत्थर उठाइए और इस चट्टान के ऊपर प्रहार कीजिए। महात्मा ने रत्नेश से कहा।
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रत्नेश हक्के-बक्के रह गए। पर महात्मा जी का आदेश था। अतएव बिना कुछ जाने-समझे रत्नेश ने एक पत्थर उठाया और जोर से चट्टान के ऊपर प्रहार किया।
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चट्टान पर लगते ही वह नीचे गिर पड़ा।
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राजन्! अब दरिया के तट से थोड़ी गीली मिट्टी लेकर आइए।’ महात्माजी ने फिर आदेश दिया।
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राजा एक मुट्ठी गीली मिट्टी के साथ चटपट महात्माजी के पास पहुँचे।
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राजन्! अब प्रहार कीजिए।’ महात्मा ने फिर कहा।
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रत्नेश ने जोर लगाकर गीली मिट्टी चट्टान पर फेंकी। गीली मिट्टी नीचे गिरने की बजाय चट्टान पर चिपक गई।
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गीली मिट्टी को चिपकी हुई देखकर महात्मा बोले – ‘राजन्! संसार की यही नियति है। संसार कोमलता को आसानी से ग्रहण कर लेता है। कठोरता को त्याग देता है।
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इसलिए चट्टान ने गीली मिट्टी को ग्रहण कर लिया और कठोर पत्थर को त्याग दिया।
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राजन्। आपके साथ भी ऐसा ही हुआ है।
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मेरे साथ! रत्नेश ने अचरज भरे स्वर में कहा।
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हाँ राजन्! आप अहंकारी व कठोर प्रकृति के हैं। आपका यह व्यवहार राज्य की उन्नति और सुख- शांति में बाधक बना हुआ है।
यह प्रकृति राज्य की प्रजा को स्वीकार नहीं है।
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अत: प्रजा आपकी उपेक्षा कर रही है। महात्मा ने संयत स्वर में समझाया। सुनते ही राजा का सिर झुक गया।
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राजन्! अपने व्यवहार में परिवर्तन लाइए आपको आदर- सम्मान सब मिलेगा।
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महात्माजी की नसीहत सुनकर रत्नेश ने उनके चरण पकड़ लिए और बोले –
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‘महात्मा जी भूल क्षमा हो आपकी शिक्षा शिरोधार्य है।’
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विनम्रता से प्रणाम करके दोनों अपने अपने घोड़े पर सवार हो गए और राजमहल की ओर चल पड़े।

💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐पिता का आशीर्वाद 💐💐

एक व्यापारी की यह सत्य घटना है। जब मृत्यु का समय सन्निकट आया तो पिता ने अपने एकमात्र पुत्र धनपाल को बुलाकर कहा कि..
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बेटा मेरे पास धनसंपत्ति नहीं है कि मैं तुम्हें विरासत में दूं। पर मैंने जीवनभर सच्चाई और प्रामाणिकता से काम किया है।
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तो मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि, तुम जीवन में बहुत सुखी रहोगे और धूल को भी हाथ लगाओगे तो वह सोना बन जायेगी।
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बेटे ने सिर झुकाकर पिताजी के पैर छुए। पिता ने सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और संतोष से अपने प्राण त्याग कर दिए।
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अब घर का खर्च बेटे धनपाल को संभालना था। उसने एक छोटी सी ठेला गाड़ी पर अपना व्यापार शुरू किया।
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धीरे धीरे व्यापार बढ़ने लगा। एक छोटी सी दुकान ले ली। व्यापार और बढ़ा।

अब नगर के संपन्न लोगों में उसकी गिनती होने लगी। उसको विश्वास था कि यह सब मेरे पिता के आशीर्वाद का ही फल है।
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क्योंकि, उन्होंने जीवन में दु:ख उठाया, पर कभी धैर्य नहीं छोड़ा, श्रद्धा नहीं छोड़ी, प्रामाणिकता नहीं छोड़ी इसलिए उनकी वाणी में बल था।
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और उनके आशीर्वाद फलीभूत हुए। और मैं सुखी हुआ। उसके मुंह से बारबार यह बात निकलती थी।
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एक दिन एक मित्र ने पूछा: तुम्हारे पिता में इतना बल था, तो वह स्वयं संपन्न क्यों नहीं हुए? सुखी क्यों नहीं हुए?
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धर्मपाल ने कहा: मैं पिता की ताकत की बात नहीं कर रहा हूं। मैं उनके आशीर्वाद की ताकत की बात कर रहा हूं।
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इस प्रकार वह बारबार अपने पिता के आशीर्वाद की बात करता, तो लोगों ने उसका नाम ही रख दिया बाप का आशीर्वाद!
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धर्मपाल को इससे बुरा नहीं लगता, वह कहता कि मैं अपने पिता के आशीर्वाद के काबिल निकलूं, यही चाहता हूं।
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ऐसा करते हुए कई साल बीत गए। वह विदेशों में व्यापार करने लगा। जहां भी व्यापार करता, उससे बहुत लाभ होता।
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एक बार उसके मन में आया, कि मुझे लाभ ही लाभ होता है !! तो मैं एक बार नुकसान का अनुभव करूं।
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तो उसने अपने एक मित्र से पूछा, कि ऐसा व्यापार बताओ कि जिसमें मुझे नुकसान हो।
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मित्र को लगा कि इसको अपनी सफलता का और पैसों का घमंड आ गया है। इसका घमंड दूर करने के लिए इसको ऐसा धंधा बताऊं कि इसको नुकसान ही नुकसान हो।
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तो उसने उसको बताया कि तुम भारत में लौंग खरीदो और जहाज में भरकर अफ्रीका के जंजीबार में जाकर बेचो। धर्मपाल को यह बात ठीक लगी।
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जंजीबार तो लौंग का देश है। वहां से लौंग भारत में लाते हैं और यहां 10-12 गुना भाव पर बेचते हैं।
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भारत में खरीद करके जंजीबार में बेचें, तो साफ नुकसान सामने दिख रहा है।
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परंतु धर्मपाल ने तय किया कि मैं भारत में लौंग खरीद कर, जंजीबार खुद लेकर जाऊंगा। देखूं कि पिता के आशीर्वाद कितना साथ देते हैं।
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नुकसान का अनुभव लेने के लिए उसने भारत में लौंग खरीदे और जहाज में भरकर खुद उनके साथ जंजीबार द्वीप पहुंचा।
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जंजीबार में सुल्तान का राज्य था। धर्मपाल जहाज से उतरकर के और लंबे रेतीले रास्ते पर जा रहा था ! वहां के व्यापारियों से मिलने को।
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उसे सामने से सुल्तान जैसा व्यक्ति पैदल सिपाहियों के साथ आता हुआ दिखाई दिया।
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उसने किसी से पूछा कि, यह कौन है?
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उन्होंने कहा: यह सुल्तान हैं।
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सुल्तान ने उसको सामने देखकर उसका परिचय पूछा। उसने कहा: मैं भारत के गुजरात के खंभात का व्यापारी हूं। और यहां पर व्यापार करने आया हूं।
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सुल्तान ने उसको व्यापारी समझ कर उसका आदर किया और उससे बात करने ल

धर्मपाल ने देखा कि सुल्तान के साथ सैकड़ों सिपाही हैं। परंतु उनके हाथ में तलवार, बंदूक आदि कुछ भी न होकर बड़ी-बड़ी छलनियां है।
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उसको आश्चर्य हुआ। उसने विनम्रता पूर्वक सुल्तान से पूछा: आपके सैनिक इतनी छलनी लेकर के क्यों जा रहे हैं।
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सुल्तान ने हंसकर कहा: बात यह है, कि आज सवेरे मैं समुद्र तट पर घूमने आया था। तब मेरी उंगली में से एक अंगूठी यहां कहीं निकल कर गिर गई।
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अब रेत में अंगूठी कहां गिरी, पता नहीं। तो इसलिए मैं इन सैनिकों को साथ लेकर आया हूं। यह रेत छानकर मेरी अंगूठी उसमें से तलाश करेंगे।
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धर्मपाल ने कहा: अंगूठी बहुत महंगी होगी।
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सुल्तान ने कहा: नहीं! उससे बहुत अधिक कीमत वाली अनगिनत अंगूठी मेरे पास हैं। पर वह अंगूठी एक फकीर का आशीर्वाद है।
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मैं मानता हूं कि मेरी सल्तनत इतनी मजबूत और सुखी उस फकीर के आशीर्वाद से है। इसलिए मेरे मन में उस अंगूठी का मूल्य सल्तनत से भी ज्यादा है।
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इतना कह कर के सुल्तान ने फिर पूछा: बोलो सेठ, इस बार आप क्या माल ले कर आये हो।
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धर्मपाल ने कहा कि: लौंग!
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सुल्तान के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। यह तो लौंग का ही देश है सेठ। यहां लौंग बेचने आये हो? किसने आपको ऐसी सलाह दी।
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जरूर वह कोई आपका दुश्मन होगा। यहां तो एक पैसे में मुट्ठी भर लोंग मिलते हैं। यहां लोंग को कौन खरीदेगा? और तुम क्या कमाओगे?
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धर्मपाल ने कहा: मुझे यही देखना है, कि यहां भी मुनाफा होता है या नहीं।
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मेरे पिता के आशीर्वाद से आज तक मैंने जो धंधा किया, उसमें मुनाफा ही मुनाफा हुआ। तो अब मैं देखना चाहता हूं कि उनके आशीर्वाद यहां भी फलते हैं या नहीं।
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सुल्तान ने पूछा: पिता के आशीर्वाद? इसका क्या मतलब?
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धर्मपाल ने कहा: मेरे पिता सारे जीवन ईमानदारी और प्रामाणिकता से काम करते रहे। परंतु धन नहीं कमा सकें।
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उन्होंने मरते समय मुझे भगवान का नाम लेकर मेरे सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिए थे, कि तेरे हाथ में धूल भी सोना बन जाएगी।
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ऐसा बोलते-बोलते धर्मपाल नीचे झुका और जमीन की रेत से एक मुट्ठी भरी और सम्राट सुल्तान के सामने मुट्ठी खोलकर उंगलियों के बीच में से रेत नीचे गिराई तो..
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धर्मपाल और सुल्तान दोनों का आश्चर्य का पार नहीं रहा। उसके हाथ में एक हीरेजड़ित अंगूठी थी। यह वही सुल्तान की गुमी हुई अंगूठी थी।
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अंगूठी देखकर सुल्तान बहुत प्रसन्न हो गया। बोला: वाह खुदा आप की करामात का पार नहीं। आप पिता के आशीर्वाद को सच्चा करते हो।

धर्मपाल ने कहा: फकीर के आशीर्वाद को भी वही परमात्मा सच्चा करता है।

सुल्तान और खुश हुआ। धर्मपाल को गले लगाया और कहा: मांग सेठ। आज तू जो मांगेगा मैं दूंगा।

धर्मपाल ने कहा: आप 100 वर्ष तक जीवित रहो और प्रजा का अच्छी तरह से पालन करो। प्रजा सुखी रहे। इसके अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए।

सुल्तान और अधिक प्रसन्न हो गया। उसने कहा: सेठ तुम्हारा सारा माल में आज खरीदता हूं और तुम्हारी मुंह मांगी कीमत दूंगा।

इस कहानी से शिक्षा मिलती है, कि पिता के आशीर्वाद हों, तो दुनिया की कोई ताकत कहीं भी तुम्हें पराजित नहीं होने देगी।

पिता और माता की सेवा का फल निश्चित रूप से मिलता है। आशीर्वाद जैसी और कोई संपत्ति नहीं।

बालक के मन को जानने वाली मां और भविष्य को संवारने वाले पिता यही दुनिया के दो महान ज्योतिषी है।

अपने बुजुर्गों का सम्मान करें! यही भगवान की सबसे बड़ी सेवा है।

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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