Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

काशी में एक जगह पर तुलसीदास रोज रामचरित मानस का पाठ करते थे ।
उनकी कथा को बहुत सारे भक्त सुनने आते थे !
तुलसीदास जी रोज जंगल में
शौच के लिए जाते थे एवं शौच के पश्चात्
वापिस नगर की ओर लौटते हुए
शौच से बचा हुआ लोटे का पानी
एक पेड़ की जड़ में डाल दिया करते थे ,
जिससे उस पेड़ पर रहने वाले
एक पेड़ की प्यास बुझती थी।

एक दिन वह प्रेत तुलसीदास के सामने
प्रकट हो गया और बोला कि
आपने शौच के बचे हुए जल से
जो सींचन किया है मैं उससे तृप्त हुआ हूँ
और मैं आपको कुछ देना चाहता हूँ।
तुलसीदास बोले – मेरी केवल एक ही इच्छा है , प्रभु श्री राम के दर्शन।
राम जी की कथा तो मैंने लिखी भी
और गायी भी है परन्तु साक्षात् दर्शन
अभी तक नहीं हुए।
यदि दर्शन हो जाए तो बड़ी कृपा होगी!

उस प्रेत ने कहा कि महाराज!
आपको प्रभु श्री राम के दर्शन करवा सकूँ ,
ऐसी मेरी सामर्थ्य नहीं हैं और यदि मैं
दर्शन करवा सकता तो मैं अब तक
स्वयं इस प्रेत योनि से मुक्त हो चुका होता।
प्रेत की बात सुनकर तुलसीदास जी बोले – परन्तु इसके अतिरिक्त मुझे
और कुछ नहीं चाहिए।
तब उस प्रेत ने कहा – सुनिए श्रीमान !
मैं आपको दर्शन तो नहीं करवा सकता ,
लेकिन दर्शन कैसे होंगे उसका मार्ग
आपको अवश्य बता सकता हूँ।

तुलसीदास जी ने कोतुहल वश वह मार्ग पूछा।
प्रेत बोला आप जहाँ पर कथा सुनाते हो,
बहुत सारे भक्त सुनने आते हैं।
आपको तो मालूम नहीं लेकिन मैं जानता हूँ! आपकी कथा में रोज हनुमानजी भी
सुनने आते हैं।
वे आपको अवश्य ही श्री राम जी से
मिलवा सकते हैं।
तब तुलसीदास जी ने पूछा-
“पर मैं उनको कैसे पहचानूँगा ?”
तब प्रेत ने उन्हें बताया कि हनुमान जी कथा में सबसे पहले आते हैं और सबसे बाद में जाते हैं तथा वे सबसे पीछे कम्बल ओढ़कर,
एक दीन हीन एक कोढ़ी के रूप में बैठते हैं । उनके पैर पकड़ लेना वो हनुमान जी ही हैं।

तुलसीदास जी बड़े प्रसन्न हुए हैं।
आज जब कथा हुई ,
गोस्वामीजी की नजर उसी व्यक्ति पर थी और कथा के अंत में सबसे आखिर में जैसे ही वो व्यक्ति जाने लगा, तो तुलसीदास जी अपने आसन से कूद पड़े और दौड़ पड़े।
जाकर उस व्यक्ति के चरणों में गिर गए।
तुलसीदास जी बोले कि प्रभु आप सबसे छुप सकते हो मुझसे नहीं छुप सकते हो।
अब आपके चरण मैं तब तक नहीं छोडूंगा जब तक आप प्रभु राम जी से नहीं मिलवाओगे।
कृपा करके मुझे प्रभु राम जी के
दर्शन करा दीजिए ।
राम जी के साक्षात्कार के सिवा
अब और कोई जीवन की अभिलाषा
शेष नहीं बची। ।
हनुमानजी, आप तो राम जी से
मिलवा सकते हो। अगर आप नहीं मिलवाओगे तो कौन मिलवायेगा?
तुलसीदास जी का अनुनय विनय सुनकर हनुमानजी अपने दिव्य स्वरूप में
प्रकट हो गए।

हनुमानजी बोले कि आपको रामजी अवश्य मिलेंगे और मैं मिलवाऊँगा, लेकिन
उसके लिए आपको चित्रकूट जाना पड़ेगा,
वहाँ आपको श्री राम जी के
साक्षात् दर्शन होंगे।

तुलसीदास जी चित्रकूट पहुँचे ।
मन्दाकिनी जी में स्नान कर ,
कामदगिरि की परिक्रमा लगा रहे थे ,
तभी सामने से घोड़े पर सवार होकर
दो सुकुमार राजकुमार आते हुए दिखाई दिए । एक गौर वर्ण और एक श्याम वर्ण।
उनका रूप और तेज देखते ही बनता था ,
अद्भुत सौन्दर्य था उनका।
तुलसीदास जी उनकी छवि देख कर
मंत्रमुग्ध होकर उनको देखते रहे और सोचने लगे कि ये राजकुमार यहाँ क्या कर रहे हैं।
वे यह समझ ही नहीं पाए कि
वही श्री राम और लक्ष्मण हैं।

उन दिव्य राजकुमारों के जाने के बाद हनुमानजी प्रकट हुए और तुलसीदास जी पूछा कि क्या उनको श्री राम जी के दर्शन हुए।
तुलसीदास जी ने कहा – नहीं ?
तब हनुमान जी ने बताया कि अभी अभी घोड़े पर जो राजकुमार गए है ,
वे श्री राम और लक्षमण ही थे।
तुलसीदास जी बहुत दुखी हुए और उन्होंने हनुमान जी से एक बार फिर से
दर्शन कराने की प्रार्थना की
जिसे हनुमान जी ने स्वीकार कर लिया।

अगले ही दिन सुबह तुलसीदास जी मन्दाकिनी नदी में स्नान करने के पश्चात् घाट पर बैठ कर राम नाम का जप कर रहे थे और चन्दन घिस रहे थे और भगवान किस रूप में दुबारा दर्शन देंगे यह सोच रहे थे। तभी भगवान राम एक बालक के रूप में उनके समक्ष आये और कहा बाबा.. बाबा… चन्दन तो आपने बहुत प्यारा घिसा है। थोड़ा सा चन्दन हमें दे दो… लगा दो। गोस्वामीजी को लगा कि कोई बालक होगा। चन्दन घिसते देखा तो आ गया। तो तुरंत लेकर चन्दन बालक को देने लगे।
हनुमानजी समझ गए कि आज फिर तुलसीदास जी से चूक हो सकती है।
हनुमानजी तुरंत तोता बनकर आ गए
शुक रूप में और कहा कि –
हनुमानजी ने अत्यंत करुणरस में इशारा किया कि अब मत चूक जाना।
आज जो आपसे चन्दन ग्रहण कर रहे हैं ये साक्षात् रघुनाथ हैं।
तुलसीदास जी ने सिर उठाकर देखा तो
सामने दिव्य रूप में श्री राम जी खड़े थे। तुलसीदास जी उनको देखते ही रह गए।

प्रभु श्री राम ने फिर से उनसे चन्दन माँगा
पर तुलसीदास जी तो प्रभु श्रीराम जी का
रूप देखकर पूरी तरह स्थिर हो चुके थे ,
उनको तो जैसे कुछ सुनाई ही ना दिया हो।
वे तो बस प्रभु श्री राम जी को निहारते ही रहे। यह देखकर श्री राम ने स्वयं ही
चन्दन लिया और तुलसीदास जी के
माथे पर लगाकर अंतर्ध्यान हो गए…

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ચોઘડિયા નો ઉપયોગ


આપણે ત્યાં ચોઘડિયાને
અનુસરનારો ઘણો મોટો વર્ગ છે.
જે ચોઘડિયાં અનુસાર જ પોતાના
વિવિધ કામકાજોનું આયોજન કરે
છે. ચોઘડિયાં કુલ ૭ છે અને તે
પૈકી ચલ, લાભ, શુભ, અમૃત
ચોઘડિયાં શુભ કામકાજોમાં પસંદ
કરવામાં આવે છે. જ્યારે કાળ, રોગ,
ઉદ્વેગ મહત્ત્વનાં કામકાજો માટે
ટાળવામાં આવે છે. વાસ્તવમાં,
ચોઘડિયાં અનુસાર કામકાજો કરી
સફળતા હાંસલ કરવાની એક ચાવી
છે જે વિષે આપણે અહીં વિગતવાર
જોઈએ. સામાન્ય રીતે ચોઘડિયાં
વાર અનુસાર દિવસ અને રાત માટે
જુદા જુદા ક્રમ મુજબ ગણવામાં
આવે છે. ચોઘડિયાંનો તૈયાર કોઠો
મેળવી લેવા બહુ જ સરળ છે. દરેક
પંચાંગો – કેલેન્ડરોમાં આ કોઠો

આપવામાં આવે છે. દિવસના
ચોઘડિયાંની ગણતરી સૂર્યોદયથી
અને રાતના ચોઘડિયાંની ગણતરી
સૂર્યાસ્તથી કરવામાં આવે છે. દરેક
ચોઘડિયું દોઢ કલાકનું ગણવાનું હોય
છે. આમ ચોક્કસ કયા સમયે કયું
ચોઘડિયું ચાલી રહ્યું છે તે જાણી
લેવું એકદમ સરળ કામ છે. હવે
અમૃત તથા કાળ ચોઘડિયાં વખતે
પશ્ચિમમાં મુખ રાખી મહત્ત્વનો
કામકાજ કરવાનું રાખો. ચલ અને
ઉગ ચોઘડિયાં વખતે પૂર્વ દિશામાં
મુખ રાખીને મહત્ત્વનાં કામકાજો
કરવાનું રાખો. લાભ અને રોગ

ચોઘડિયાં વખતે દક્ષિણ દિશામાં
મુખ રાખી મહત્ત્વનાં કામકાજો.
કરવાનું રાખો, શુભ ચોઘડિયું ચાલી
રહ્યું હોય ત્યારે ઉત્તર તરફે મુખ
રાખી અગત્યના કામકાજો કરવાનું
રાખો. અહીં ખાસ યાદ એ જ
રાખવાનું છે કે જે ચોઘડિયાં વખતે
જે તે દિશામાં મુખ રાખવા જણાવ્યું
છે તે વખતે પીઠ કદાપિ રાખવી
નહીં કારણ કે પીઠ રાખવાથી
સફળતા કદાપિ મળતી નથી. આ
જ નિયમ યાત્રા માટે પણ
બનાવવાની અમુક ચમત્કારી
પરિણામો જોવા મળશે. એટલે કે
અમૃત — કાળ ચોઘડિયાં દરમિયાન
પશ્ચિમ દિશામાં મુસાફરી કરવી.
મુસાફરીનો આરંભ કરવો વગેરે.
ચોઘડિયાંનો ખરા અર્થ માં
ઉપયોગ કરી લાભ સિદ્ધ કરી
લેવાની આ એક મહત્ત્વની કડી છે
જે અનુભવે જ. સમજમાં આવે
તેમ છે.

ડૉ. કૌશિક કુમાર દીક્ષિત

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

!!!रोचक तथ्य!!!

स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस में झंडा फहराने में क्या है अंतर ?

पहला अंतर

15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर *झंडे को नीचे से रस्सी द्वारा खींच कर ऊपर ले जाया जाता है, फिर खोल कर फहराया जाता है, जिसे *ध्वजारोहण* कहा जाता है क्योंकि यह 15 अगस्त 1947 की ऐतिहासिक घटना को सम्मान देने हेतु किया जाता है जब प्रधानमंत्री जी ने ऐसा किया था। संविधान में इसे अंग्रेजी में Flag Hoisting (ध्वजारोहण) कहा जाता है।

जबकि

26 जनवरी गणतंत्र दिवस के अवसर पर झंडा ऊपर ही बंधा रहता है, जिसे खोल कर फहराया जाता है, संविधान में इसे Flag Unfurling (झंडा फहराना) कहा जाता है।

दूसरा अंतर

15 अगस्त के दिन प्रधानमंत्री जो कि केंद्र सरकार के प्रमुख होते हैं वो ध्वजारोहण करते हैं, क्योंकि स्वतंत्रता के दिन भारत का संविधान लागू नहीं हुआ था और राष्ट्रपति जो कि राष्ट्र के संवैधानिक प्रमुख होते है, उन्होंने पदभार ग्रहण नहीं किया था। इस दिन शाम को राष्ट्रपति अपना सन्देश राष्ट्र के नाम देते हैं।

जबकि

26 जनवरी जो कि देश में संविधान लागू होने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, इस दिन संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति झंडा फहराते हैं

तीसरा अंतर

स्वतंत्रता दिवस के दिन लाल किले से ध्वजारोहण किया जाता है।

जबकि

गणतंत्र दिवस के दिन राजपथ पर झंडा फहराया जाता है।

आपसे आग्रह अपने बच्चों को जरूर बताएं।🙏🙏

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एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन जोश जोश में अपने गधे को घर की छत पर ले गए… जब नीचे उतारने लगे तो गधा नीचे उतर ही नहीं रहा था।

बहुत कोशिश के बाद भी जब नाकाम हुए तो ख़ुद ही नीचे उतर गए और गधे के नीचे उतरने का इंतज़ार करने लगे।

कुछ देर गुज़र जाने के बाद मुल्ला नसरुद्दीन ने महसूस किया कि गधा छत को लातों से तोड़ने को कोशिश कर रहा है मुल्ला नसरुद्दीन बहुत चिंतित हुए कि छत तो नाज़ुक है, इतनी मज़बूत नहीं कि गधे की लातों को सहन कर सके…

दोबारा ऊपर भागे और गधे को नीचे लाने का प्रयास किया , लेकिन गधा अपने हठ पर अटका हुआ था और छत को तोड़ने में लगा हुआ था।

मुल्ला उसे धक्के देकर नीचे लाने का प्रयास करने लगे तो गधे ने मुल्ला को लात मारी और वह नीचे गिर गए।

गधा फिर छत को तोड़ने लगा… अंततः छत टूट गयी और गधे समेत धरती पर आ गिरी।

मुल्ला देर तक इस विषय पर मनन करते रहे और फिर स्वयं से कहा कि कभी भी गधे को ऊँचे मकाम पर नहीं ले जाना चाहिये एक तो वह ख़ुद का हानि करता है, दूसरा स्वयं उस स्थान को भी बिगाड़ता है और तीसरा ऊपर ले जाने वाले को भी हानि पहुँचाता है।

मेरा विचार है कि हमें एक बार भी गधे को ऊँचे स्थान पे ले जाने की भूल नहीं करनी चाहिए है बड़ी कठिनाई से हमारी छत सुदृढ़ हो रही है।

विशुद्ध राजनैतिक संदेश ,

समझ तो आप गए ही होंगे…???

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एक बार इजराइल देश का अपने पडोसी देश से लगातार 30 दिनों तक युद्ध चलता रहा। इजराइल के सेनापति ने अपने देश के प्रधानमन्त्री को फोन किया, “सर हमारे हजारों सैनिक शहीद हो चुके हैं । अब हमारी सेना में केवल 40,000 सैनिक बचे हैं। दुश्मन की सेना में लगभग 2 लाख सैनिक हैं यदि युद्ध दो दिन और चलता रहा तो हमारी हार निश्चित है। दुश्मन अपने देश पर कब्जा करके उसे अपना गुलाम बना सकता है।”
.
इस आपातकाल में बडे धैर्य के साथ प्रधानमन्त्री ने टीवी पर केवल देश के विद्यार्थियों को सम्बोधित किया —

“डियर स्टूडैन्टस् !

हमारे हजारों सैनिक युद्ध में शहीद हो चुके हैं। अब सेना में केवल 40,000 सैनिक बचे हैं। दुश्मन के पास लाखों सैनिक हैं। हमारी सेना पीछे हट रही है। देश गुलाम हो सकता है। अब केवल आप ही देश को बचा सकते हैं। आज आपका इजराइल देश आपसे आपकी शक्ति, आपका पराक्रम, आपका खून, आपका बलिदान मांग रहा है। आज रात 11 बजे आपके निकटतम रेलवे स्टेशन से स्पेशल रेलगाडी देश की सीमा पर जाएगी। आपसे मेरी हाथ जोड़ कर विनती है कि आप कॉपी, किताब, कलम छोड़ दीजिए। आपको जो भी अस्त्र-शस्त्र, भाला, बरछा, गंडासा, तलवार, गोली-बन्दूक मिले , उसे लेकर युद्ध भूमि पर पहुंच जाएं।”
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रात ही रात में 5,00,000 विद्यार्थी सीमा पर पहुंचकर युद्ध करने लगे। दुश्मन की सेना में खलबली और भगदड़ मच गई। उसके लाखों सैनिक मारे गए। इस प्रकार देश के विद्यार्थियों ने अपने देश को गुलाम होने से बचा लिया। सेनापति ने यह शुभ समाचार प्रधानमन्त्री को दिया। खुशी के मारे प्रधानमन्त्री की आंखों मे आंसू आ गए। परन्तु विद्यार्थियों ने इस विजय श्री का शुभ सेहरा अपने “महान प्रधानमन्त्री” के सिर पर रखा। उनका इस बात के लिए “आभार” प्रकट किया कि उनको देश के लिए कुछ करने का अवसर दिया है।

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“मेरे प्यारे विद्यार्थियों!
.
आज भ्रष्टाचार, राष्ट्रद्रोही, भ्रष्टनेता, जमाखोर, काला धन, आतंकवाद, विभाजन कारी, पाकिस्तान परस्त और चाइनीस पोपट वामपंथी आदि दुश्मन और राक्षस सब एक साथ मिलकर हमारे देश पर लगातार आक्रमण कर रहे हैं। इन सबसे लड़ने के लिए आज मै हाथ जोड़कर और सर झुकाकर आपको आह्वान कर रहा हूँ। इस संकट और आपातकाल में मै आपका ‘समर्थन और सहयोग’ चाहता हूं। आज आप देश के गद्दारों से देश के लिए खुद के लिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए अपने देश को बचा लीजिए।”
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…. आपका प्रधान सेवक
……….नरेन्द्र मोदी

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माँ का कंबल


सर्दियों के मौसम में एक बूढ़ी औरत अपने घर के कोने में ठंड से तड़प रही थी। जवानी में उसके पति का देहांत हो गया था। घर मे एक छोटा बेटा था। बेटे के उज्ज्वल भविष्य के लिये उस माँ ने घर-घर जाकर काम किया,

काम करते करते बहुत थक जाती थी लेकिन फिर भी आराम नही करती थी। हमेशा एक बात याद करके फिर काम मे लग जाती थी कि जिस दिन बेटा लायक हो जाएगा तभी आराम करेगी।

देखते देखते समय बीत गया माँ बूढ़ी हो गयी और बेटे को एक अच्छी नौकरी मिल गयी कुछ समय बाद बेटे की शादी कर दी और एक बच्चा हो गया ।

अब बूढ़ी माँ बहुत खुश थी उसके जीवन का सबसे बड़ा सपना पूरा हो गया उसका बेटा लायक हो गया अब उसका बेटा उसकी हर ख्वाहिश पूरी करेगा।

लेकिन ये क्या …

बेटे और बहू के पास माँ से बात करने तक का वक्त नही होता था।

बस इतना फर्क पड़ा था माँ के जीवन मे कि पहले वो बाहर के लोगो के जूठे बर्तन धोती थी अब अपने बेटे और बहू के।

पहले वो बाहर के लोगो के कपड़े धोती थी अब अपनी बहू और बेटे के फिर भी खुश थी

क्योंकि …

औलाद तो उसकी थी। सर्दियों का मौसम आ गया था एक टूटी चार पाई पर घर के बिल्कुल बाहर वाले कमरे में एक फ़टे कम्बल में सिमटकर माँ लेटी थी और सोच रही थी कि आज बेटा आएगा तो उससे कहूंगी कि तेरी माँ को बहुत ठंड लगती है एक नया कम्बल लाकर दे दे।

शाम को बेटा घर आया तो माँ ने बोला- बेटा ! ठंड बहुत है, मुझे बहुत ठंड लगती है और बात ठंड की नही है मैं बूढ़ी हो गयी हु इसलिए शरीर मे जान नही है इस फ़टे कम्बल में ठंड रुकती नही है बेटा कल एक कम्बल लाकर दे दे।

बेटा गुस्से से बोला इस महीने घर के राशन में और बच्चे के एडमीशन में बहुत खर्चा हो गया है, पोते को स्कूल में एडमिशन कराना है कुछ पैसे है लेकिन उससे बच्चे का स्वेटर लाना है,

तुम्हारी बहु के लिए एक शॉल लाना है तुम तो घर मे ही रहती हो सहन कर सकती हो, हमे बाहर काम करने के लिए जाना होता है सिर्फ दो महीने की सर्दी निकाल लो अगली सर्दी में देखेंगे।

बेटे की बात सुनकर माँ चुपचाप उस कम्बल में सिमटकर सो गई।

अगली सुबह देखा तो माँ अब इस दुनिया मे नही थी बेटे ने सबको खबर दी कि माँ अब इस दुनिया मे नही है सभी रिश्तेदार, दोस्त पड़ोसी इकठ्ठे हो गए बेटे ने मां की अंतिम यात्रा में कोई कमी नही छोड़ी थी।

माँ की बहुत बढ़िया अर्थी सजाई थी बहुत महंगा शाल माँ को ओढाया था।सारी दुनिया माँ का अंतिम संस्कार देखकर कह रही थी हमें भी हर जन्म में भगवान ऐसा ही बेटा दे मगर उनलोगों को क्या पता कि मरने के बाद भी एक माँ ठंड से तड़प रही थी सिर्फ एक कम्बल के लिए…

मित्रों अगर आपके माँ बाप आज आपके साथ है तो आप बहुत भाग्यशाली है आज आप जो कुछ भी हो वो उन्ही की मेहनत और आशीर्वाद से हो। जीते जी अपने माँ बाप की सेवा करना आपका पहला कर्तव्य है क्योंकि उन्होंने आपके लिए अपना पूरा जीवन दे दिया है ।
अपने माता पिता की जीते जी इज्जत करें,प्रेम करें!

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

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आदरणीय किशोर जी खंडेलवाल की एक पोस्ट
मृत्यु के लिये प्रवेश !

वाराणसी में एक गेस्ट हाउस है ,
इसे ‘ काशी लाभ मुक्ति भवन ‘ कहा जाता है।
यहाँ लोग मृत्यु के लिए प्रवेश लेते हैं।

एक हिंदू मान्यता के अनुसार यदि कोई काशी में अपनी अंतिम सांस लेता है, तो उसे काशी लाभ (काशी का फल) जो वास्तव में मोक्ष या मुक्ति है , प्राप्त होता है।

इस गेस्ट हाउस के बारे में दिलचस्प तथ्य यह है कि इसमें रहने और मरने के लिए केवल दो सप्ताह की अनुमति है। इसलिए इसमें प्रवेश से पहले किसी को अपनी मृत्यु के बारे में वास्तव में निश्चित होना चाहिए।

यदि कोई व्यक्ति दो सप्ताह के बाद भी जीवित रहता है, तो उसे ये गेस्ट हाउस छोड़ना होता है।

उत्सुकतावश, मैंने ( मूल लेखक ने ) वाराणसी जाने का फैसला किया , यह समझने के लिए कि उन लोगों ने क्या सीखा , जिन्होंने
न केवल मृत्यु को एक वास्तविकता के रूप में स्वीकार किया बल्कि एक निश्चित समय के साथ अपनी मृत्यु का अनुमान भी लगा लिया हो ?

मैंने गेस्टहाउस में दो सप्ताह बिताए और प्रवेश करने वाले लोगों का साक्षात्कार लिया ।
उनके जीवन के सबक वास्तव में विचारोत्तेजक थे।

उसी माहौल में मेरी मुलाकात श्री भैरव नाथ शुक्ला से हुई, जो पिछले 44 वर्षो से मुक्ति भवन के प्रबंधक थे । इतने सालों में उन्होंने वहाँ काम करते हुए 12,000 से ज्यादा मौते देखी थीं।

मैंने उनसे पूछा , “शुक्ला जी , आपने जीवन और मृत्यु, दोनों को इतने करीब से देखा है । मैं जानने के लिए उत्सुक हूँ कि आपके अनुभव क्या रहे ? “

शुक्ला जी ने इस संबंध में मेरे साथ जीवन के 12 सबक साझा किये ।
उनमें से एक सबक, जिससे शुक्ला जी बहुत प्रभावित थे और जो मुझे भी अंदर तक छू गया, वह जीवन का पाठ है —
” जाने से पहले सभी विवादों को मिटा दें । “

उन्होंने मुझे इसके पीछे की एक कहानी सुनाई…

उस समय के एक संस्कृत विद्वान थे, जिनका नाम राम सागर मिश्रा था । मिश्रा जी छह भाइयों में सबसे बड़े थे और एक समय था जब उनके सबसे छोटे भाई के साथ उनके सबसे करीब के संबंध थे ।

बरसों पहले एक तर्क ने मिश्रा और उनके सबसे छोटे भाई के बीच एक कटुता को जन्म दिया ।
इसके चलते उनके बीच एक दीवार बन गई , अंततः उनके घर का विभाजन हो गया।

अपने अंतिम वर्षों में , मिश्रा जी ने इस गेस्टहाउस में प्रवेश किया। उन्होंने मिश्रा जी को कमरा नं. 3 आरक्षित करने के लिए कहा क्योंकि उन्हें यकीन था कि उनके आने के 16 वें दिन ही उनकी मृत्यु हो जाएगी।

14 वें दिन मिश्रा जी ने , 40 साल के अपने बिछड़े भाई को देखने की इच्छा जताई । उन्होंने कहा ,
” यह कड़वाहट मेरे दिल को भारी कर रही है । मैं जाने से पहले हर मनमुटाव को सुलझाना चाहता हूँ ।”

16 वें दिन एक पत्र उनके भाई को भेजा गया ।
जल्द ही , उनके सबसे छोटा भाई आ गए । मिश्रा जी ने उनका हाथ पकड़ कर घर को बांटने वाली दीवार गिराने को कहा । उन्होंने अपने भाई से माफी मांगी ।

दोनों भाई रो पड़े और बीच में ही अचानक मिश्रा जी ने बोलना बंद कर दिया । उनका चेहरा शांत हो गया और वह उसी क्षण वह चल बसे ।

शुक्ला जी ने मुझे बताया कि उन्होंने वहाँ आने वाले कई लोगों के साथ इसी एक कहानी को बार-बार दोहराते हुए देखा है । उन्होंने कहा , ” मैंने देखा है कि सारे लोग जीवन भर इस तरह का अनावश्यक मानसिक बोझा ढोते हैं, वे अपनी मृत्यु के समय इसे छोड़ना चाहते हैं । “

हालाँकि , उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता है कि आपका कभी किसी से मनमुटाव ना हो बल्कि अच्छा यह है कि मनमुटाव होते ही उसे हल कर लिया जाए ।
किसी से मनमुटाव, किसी पर गुस्सा या शक-शुबा होने पर उसे ज्यादा लंबे समय तक नहीं रखना चाहिए और उन्हें हमेशा जल्द से जल्द हल करने का प्रयास करना चाहिए , क्योंकि
अच्छी खबर यह है कि हम जिंदा हैं, लेकिन बुरी खबर यह है कि हम कब तक जिंदा है, यह कोई नहीं जानता।

तो, चाहे कुछ भी हो, अपने मनमुटावों को आज ही सुलझा लें, क्योंकि
कल का वादा इस दुनिया में किसी से नहीं किया जा सकता है ।

सोचें…क्या कोई है , जिसके साथ हम समय रहते शांति स्थापित करना चाहते हैं ?

“जब हमें किसी के साथ कड़वे अनुभव होते हैं, तब हमें क्षमा भाव अपनाकर भावनात्मक बोझ दूर कर लेना चाहिए। “
🙏🏽🙏🏽🙏🏽🙏🏽