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थिम्मन


भगवान को अपनी आंख अर्पित करने वाला एक सच्चा भक्त
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एक मशहूर धनुर्धर थिम्मन एक दिन शिकार के लिए गए। जंगल में उन्हें एक मंदिर मिला, जिसमें एक शिवलिंग था। थिम्मन के मन में शिव के लिए एक गहरा प्रेम भर गया और उन्होंने वहां कुछ अर्पण करना चाहा। लेकिन उन्हें समझ नहीं आया कि कैसे और किस विधि ये काम करें। उन्होंने भोलेपन में अपने पास मौजूद मांस शिवलिंग पर अर्पित कर दिया और खुश होकर चले गए कि शिव ने उनका चढ़ावा स्वीकार कर लिया।

उस मंदिर की देखभाल एक ब्राह्मण करता था जो उस मंदिर से कहीं दूर रहता था। हालांकि वह शिव का भक्‍त था लेकिन वह रोजाना इतनी दूर मंदिर तक नहीं आ सकता था इसलिए वह सिर्फ पंद्रह दिनों में एक बार आता था। अगले दिन जब ब्राह्मण वहां पहुंचा, तो शिव लिंग के बगल में मांस पड़ा देखकर वह भौंचक्‍का रह गया। यह सोचते हुए कि यह किसी जानवर का काम होगा, उसने मंदिर की सफाई कर दी, अपनी पूजा की और चला गया। अगले दिन, थिम्मन और मांस अर्पण करने के लिए लाए। उन्हें किसी पूजा पाठ की जानकारी नहीं थी, इसलिए वह बैठकर शिव से अपने दिल की बात करने लगे। वह मांस चढ़ाने के लिए रोज आने लगे। एक दिन उन्हें लगा कि शिवलिंग की सफाई जरूरी है लेकिन उनके पास पानी लाने के लिए कोई बरतन नहीं था। इसलिए वह झरने तक गए और अपने मुंह में पानी भर कर लाए और वही पानी शिवलिंग पर डाल दिया।

जब ब्राह्मण वापस मंदिर आया तो मंदिर में मांस और शिवलिंग पर थूक देखकर घृणा से भर गया। वह जानता था कि ऐसा कोई जानवर नहीं कर सकता। यह कोई इंसान ही कर सकता था। उसने मंदिर साफ किया, शिवलिंग को शुद्ध करने के लिए मंत्र पढ़े। फिर पूजा पाठ करके चला गया। लेकिन हर बार आने पर उसे शिवलिंग उसी अशुद्ध अवस्था में मिलता। एक दिन उसने आंसुओं से भरकर शिव से पूछा, “हे देवों के देव, आप अपना इतना अपमान कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं।” शिव ने जवाब दिया, “जिसे तुम अपमान मानते हो, वह एक दूसरे भक्त का अर्पण है। मैं उसकी भक्ति से बंधा हुआ हूं और वह जो भी अर्पित करता है, उसे स्वीकार करता हूं। अगर तुम उसकी भक्ति की गहराई देखना चाहते हो, तो पास में कहीं जा कर छिप जाओ और देखो। वह आने ही वाला है।

ब्राह्मण एक झाड़ी के पीछे छिप गया। थिम्मन मांस और पानी के साथ आया। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि शिव हमेशा की तरह उसका चढ़ावा स्वीकार नहीं कर रहे। वह सोचने लगा कि उसने कौन सा पाप कर दिया है। उसने लिंग को करीब से देखा तो पाया कि लिंग की दाहिनी आंख से कुछ रिस रहा है। उसने उस आंख में जड़ी-बूटी लगाई ताकि वह ठीक हो सके लेकिन उससे और रक्‍त आने लगा। आखिरकार, उसने अपनी आंख देने का फैसला किया। उसने अपना एक चाकू निकाला, अपनी दाहिनी आंख निकाली और उसे लिंग पर रख दिया। रक्‍त टपकना बंद हो गया और थिम्मन ने राहत की सांस ली।

लेकिन तभी उसका ध्यान गया कि लिंग की बाईं आंख से भी रक्‍त निकल रहा है। उसने तत्काल अपनी दूसरी आंख निकालने के लिए चाकू निकाल लिया, लेकिन फिर उसे लगा कि वह देख नहीं पाएगा कि उस आंख को कहां रखना है। तो उसने लिंग पर अपना पैर रखा और अपनी आंख निकाल ली। उसकी अपार भक्ति को देखते हुए, शिव ने थिम्मन को दर्शन दिए। उसकी आंखों की रोशनी वापस आ गई और वह शिव के आगे दंडवत हो गया। उसे कन्नप्पा नयनार के नाम से जाना गया। कन्ना यानी आंखें अर्पित करने वाला नयनार यानी शिव भक्त।
🙏🌺हर हर महादेव 🌺🙏

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भाजपा सत्ता में आई, उसमें गुजरात का बहुत बड़ा योगदान है!

गुजरात को मीडिया के लोग “हिंदुत्व की प्रयोगशाला” कहते थे!

गुजरात पहला राज्य है, जहां भाजपा सत्ता में आई, और जिस जमाने में भाजपा के केवल दो संसद सदस्य थे! उसमें से एक मेहसाना से थे!

आपको जानकर बड़ा आश्चर्य होगा, कि गुजरात में भाजपा सत्ता में कैसी आई?

मित्रों, गुजरात में भाजपा को सत्ता में लाने में कुख्यात “माफिया डॉन अब्दुल लतीफ” का बहुत बड़ा योगदान है

अगर अब्दुल लतीफ नहीं होता, तो संभव है भाजपा सत्ता में नहीं आती!

अब्दुल लतीफ इतना कुख्यात डॉन था, कि उसने सबसे पहले एके-५६ का उपयोग किया था! और १२ पुलिस कर्मियों सहित, १५० से अधिक नागरिकों का वध किया था, जिसमें “राधिका जिमखाना” वध बहुत प्रसिद्ध हुआ था!

जब “राधिका जिमखाना” क्लब में लतीफ ने अंधाधुंध गोलीबारी करके, एक साथ ३५ नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया था!

लतीफ के ऊपर कांग्रेस और जनता दल दोनों के नेताओं का वरदहस्त था!

लतीफ की इतनी पहुंच थी, कि वह मुख्य मंत्री चिमन भाई पटेल के चेंबर में, बगैर अपॉइंटमेंट के, चला जाता था, और तस्करी, सोने चांदी की स्मगलिंग, ड्रग्स की स्मगलिंग, इत्यादि में अरबों रुपए कमाये, और उसमें नेताओं को हिस्सा जाता था!

यदि लतीफ या लतीफ के गैंग के किसी गुर्गे को कोई हिंदू लड़की पसंद आ जाती थी, तो वो रातों-रात उठा ली जाती थी!

लतीफ, जब चाहे तब, किसी हिंदू का बंगला, दुकान खाली करवा लेता था! उस समय भाजपा गुजरात में संघर्ष के दौर में थी

नरेंद्र मोदी, शंकर सिंह वाघेला, केशुभाई पटेल साइकिल स्कूटर पर, चप्पल पहन कर घूमते थे!

एक दिन, गोमतीपुर में भाजपा की एक सभा थी! भाषण देते देते, केशुभाई पटेल ने जोश में बोल दिया, कि जब भाजपा की सरकार आएगी, तब अब्दुल लतीफ का एनकाउंटर करवा दिया जाएगा! बोलने के बाद, वह डर गए! उनकी सुरक्षा बढ़ा दी गई! लेकिन गुजरात की जनता के अंदर एक संदेश चला गया, कि आखिर यह कौन से पार्टी के नेता हैं, जो अब्दुल लतीफ के गढ़ में, उसका इनकाउंटर करने की बात कर रहे हैं?

केशुभाई पटेल के इस भाषण के बाद, जब चुनाव हुए, तब गुजरात में भाजपा की ३५ सीटे आई, जो अपने आप में बहुत बड़ी विजय थी!

उसके बाद, भाजपा ने अब्दुल लतीफ और उसके गुर्गों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया, और अगले चुनावों में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बन गई! और अपने वायदे के अनुसार, शंकर सिंह वाघेला ने अब्दुल लतीफ का एनकाउंटर करवा दिया!

अब्दुल लतीफ का एनकाउंटर भी बड़े जोरदार तरीके से हुआ था! शंकर सिंह वाघेला के सामने डीएसपी जाडेजा आए, और बोले सर लतीफ का एनकाउंटर करना चाहता हूं, क्योंकि इसने मेरे इंस्पेक्टर झाला का मर्डर किया था, जब वह अपनी गर्भवती पत्नी को देखने छुट्टी पर जा रहा था!

अब्दुल लतीफ को गिरफ्तार किया गया! और नवरंगपुरा स्थित पुराने उच्च न्यायालय में उसकी पेशी होनी थी! पेशी के पहले, डीएसपी जडेजा ने कहा, “दाबेली खाओगे?” लतीफ ने हां बोला, तो उसकी हथकड़ी खोल दी गई! और फिर उसे ८ गोलियां मार दी गई! और मीडिया में कह दिया गया, लतीफ ने नाश्ता करने के लिए हथकड़ी खुलवाई, और भागने का प्रयास किया! जिसके फलस्वरूप वह मारा गया!

उसके बाद, शंकरसिंह वाघेला ने एक और बहुत अच्छा काम किया, कि उन्होंने “अशांत धारा एक्ट” लागू कर दिया, यानी गुजरात के विभिन्न शहरों में बहुत से विस्तार चिन्हित कर दिए गए! और इन विसतारों में किसी हिंदू की संपत्ति, कोई मुस्लिम नहीं खरीद सकता!

और उसके बाद भाजपा गुजरात से होती हुई मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, बंगाल, इत्यादि अन्य कई जगह बढ़ती चली गई! और आज केंद्र में ३०३ बैठकों के साथ सत्ता में है!

जब एक हिन्दू जागता है, और दूसरे सोये हुए हिन्दुओं को जगाता है, तब ये गुजरात वाला वातावरण बनता है!

जब केशूभाई ने लतीफ का एनकाउंटर करने की घोषणा की थी, गुजरातियों ने बिना किसी प्रश्न-उत्तर के भाजपा को अपना भरपूर समर्थन किया था!

अगर पूरे देश में गुजरात वाला परिणाम हिन्दुओं को चाहिए, तो सभी को वही करना होगा, जो तब गुजरातियों ने किया था!

इसीलिए भाजपा और मोदी को, बिना प्रश्न किये, साथ दें! तभी पूरे देश में से लतीफों का सफाया मोदीजी और भाजपा कर पाएंगे!

गुजराती नागरिक सदैव दूर की सोचते हैं, और ये एक पाठ देशवासियों को, और विशेष कर हिन्दुओं को, उनसे सीखना होगा!

छोटी-छोटी बातों में मोदीजी और भाजपा का विरोध न करें! बल्कि उन्हें अपना पूरा समर्थन दें! ताकि वे अपना काम पूरी प्रामाणिकता से कर सकें!
🤔 🤔 🤔

ll जय श्री राम ll

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ऐसा चमत्कार हिंदी में ही हो सकता है … आप भी इसका मजा लें

चार मिले चौंसठ खिले
बीस रहे कर जोड़!
प्रेमी सज्जन दो मिले
खिल गए सात करोड़!!

मुझसे एक सज्जन ने इस कहावत का अर्थ पूछा….
काफी सोच-विचार के बाद भी जब मैं बता नहीं पाया,
तो मैंने कहा –
“बाबा आप ही बताइए,
मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा !”

तब एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ बाबा समझाने लगे –
“देखो बेटे, यह बड़े रहस्य की बात है…
चार मिले – मतलब जब भी कोई मिलता है,
तो सबसे पहले आपस में दोनों की आंखें मिलती हैं,
इसलिए कहा, चार मिले..
फिर कहा, चौसठ खिले – यानि दोनों के बत्तीस-बत्तीस दांत – कुल मिलाकर चौंसठ हो गए,
इस तरह “चार मिले, चौंसठ खिले”
हुआ!”

“बीस रहे कर जोड़” – दोनों हाथों की दस उंगलियां – दोनों व्यक्तियों की 20 हुईं – बीसों मिलकर ही एक-दूसरे को प्रणाम की मुद्रा में हाथ बरबस उठ ही जाते हैं!”

“प्रेमी सज्जन दो मिले” – जब दो आत्मीय जन मिलें – यह बड़े रहस्य की बात है – क्योंकि मिलने वालों में आत्मीयता नहीं हुई तो
“न बीस रहे कर जोड़” होगा और न “चौंसठ खिलेंगे”

उन्होंने आगे कहा,
“वैसे तो शरीर में रोम की गिनती करना असम्भव है,
लेकिन मोटा-मोटा साढ़े तीन करोड़ बताते हैं, बताने वाले !
तो कवि के अंतिम रहस्य – “प्रेमी सज्जन दो मिले – खिल गए सात करोड़!”
का अर्थ हुआ कि जब कोई आत्मीय हमसे मिलता है,
तो रोम-रोम खिलना स्वाभाविक ही है भाई – जैसे ही कोई ऐसा मिलता है,
तो कवि ने अंतिम पंक्ति में पूरा रस निचोड़ दिया – “खिल गए सात करोड़” यानि हमारा रोम-रोम खिल जाता है!”

हमारी कहावतों में कितना सार छुपा है।
एक-एक शब्द चासनी में डूबा हुआ,
हृदय को भावविभोर करता हुआ!
इन्हीं कहावतों के जरिए हमारे बुजुर्ग, जिनको हम कम पढ़ा-लिखा समझते थे, हमारे अंदर गाहे-बगाहे संस्कार का बीज बोते रहते थे।

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐अपना काम खुद करें💐💐

दिल्ली से गोवा की उड़ान में एक सज्जन मिले, साथ में उनकी पत्नी भी थी, सज्जन की उम्र लगभग 80 की रही होगी,मैंने पूछा नहीं लेकिन उनकी पत्नी भी 75 के पार ही होंगी, पत्नी खिड़की की ओर बैठी थी, सज्जन बीच में और मैं सबसे किनारे वाली सीट पर था, प्लेन के उड़ान भरने के साथ ही पत्नी ने खाने का कुछ सामान निकाला और पति की ओर किया, पति कांपते हाथों से धीरे धीरे खाने लगे…

फिर फ्लाइट में जब भोजन सर्व हुआ तो उन लोगों ने राजमा चावल का आर्डर किया, दोनों आराम से राजमा चावल खा रहे थे, कोल्ड ड्रिंक में उन सज्जन ने कोई जूस लिया था…

खाना खाने के बाद जब उन्होंने जूस की बोतल का ढक्कन खोलना शुरु किया तो ढक्कन उनसे खुला ही नहीं, सज्जन कांपते हाथों से उसे खोलने की कोशिश कर रहे थे और मैं लगातार उन्हें देखे जा रहा था, मुझे लगा कि ढक्कन खोलने में उन्हें दिक्कत हो रही थी तो शिष्टाचार वश मैंने कहा :- लाइए, मैं खोल देता हूं !

सज्जन ने मुस्कराते हुए मेरी ओर देखा और बोले :- बेटा जी, ढक्कन तो मुझे ही खोलना होगा ! मैंने कुछ कहा नहीं लेकिन प्रश्नभरी निगाहों से उन्हें देखता रहा…

ये सज्जन ने कहा :- बेटा जी, आज तो आप खोल देंगे लेकिन अगली बार कौन खोलेगा, इसलिए मुझे खुद खोलना आना चाहिए, पत्नी भी पति की ओर देख रही थी, जूस की बोतल का ढक्कन उनसे अभी भी नहीं खुला था, लेकिन सज्जन उसे खोलने की कोशिश में लगे रहे और बहुत कोशिशों के बाद अंततः उन्होंने ढक्कन खोल ही दिया, दोनों आराम से जूस पी रहे थे…

मुझे दिल्ली से गोवा की इस उड़ान में जिंदगी का एक सबक मिला, सज्जन ने मुझे बताया :- हमने एक नियम बना रखा है अपना हर काम खुद ही करना है…, घर में बच्चे हैं, हंसता खेलता परिवार है, सब साथ ही रहते हैं लेकिन अपनी रोज की जरूरतों के लिए केवल पत्नी की ही मदद लेते हैं, बाकी किसी की नहीं, दोनों एक दूसरे की जरूरतों को समझते हैं…

सज्जन ने मुझसे कहा :- जितना संभव हो, अपना काम खुद करना चाहिए, एक बार अगर काम करना छोड़ दूंगा, दूसरों पर निर्भर हुआ तो बेटा, समझो बिस्तर पर ही पड़ जाउंगा, फिर मन हमेशा यही कहेगा कि ये काम इससे करा लूं वो काम उससे, फिर तो चलने के लिए भी दूसरों का सहारा लेना पड़ेगा, अभी चलने में पांव कांपते हैं,खाने में भी हाथ कांपते हैं लेकिन जब तक आत्मनिर्भर रह सको, रहना चाहिए…

हम गोवा जा रहे हैं, दो दिन वहीं रहेंगे, हम महीने में एक दो बार ऐसे ही घूमने निकल जाते हैं,बेटे बहू कहते हैं कि अकेले आपको दिक्कत होगी लेकिन उन्हें कौन समझाए कि मुश्किल तो तब होगी जब हम घूमना फिरना बंद करके खुद को घर में बंद कर लेंगे, सारी जिंदगी खूब काम किया, अब सब कुछ बेटों को देकर अपने लिए महीने के पैसे तय कर रखे हैं और हम दोनों उसी से आराम से घूमते हैं, जहां जाना होता है, एजेंट टिकट बुक करा देता है, टैक्सी घर पर आ जाती है,वापसी में एयरपोर्ट पर ही टैक्सी आ जाती है ! होटल में कोई तकलीफ होनी नहीं है, स्वास्थ्य व उम्र के अनुसार सब एकदम ठीक है, बस, कभी कभी जूस की बोतल ही नहीं खुलती लेकिन थोड़ा दम लगाओ तो वो भी खुल जाती है…

मेरी तो आंखें ही खुली रह गई, मैंने तय किया था कि इस बार की उड़ान में लैपटॉप पर एक पूरी फिल्म देख लूंगा लेकिन यहां तो कुछ ही पलों में मैंने पूरे जीवन की ही फिल्म देख ली ! एक ऐसी फिल्म जिसमें जीवन जीने का संदेश छिपा था…

दोस्तो, जब तक हो सके “आत्मनिर्भर” रहो, जहां तक संभव हो, अपना काम स्वयं ही करें…

🙏🙏

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐दान का फल💐💐

एक बार ऐसे ही नारद मुनि के मन मे धर्म कर्म से मिलने वाले परिणामो को लेकर मन मे अलग अलग प्रकार विचार आने लगे |

तब वह अपने यह विचार लेकर ब्रम्हा जी के पास जाते है | नारद जी ब्रम्हा जी के सामने अपने विचार प्रकट करते हुए बोलते है – हे परम् पिता ब्रम्हा जी, इंसान के द्वारा किए गए दान का फल उसे धरती पर और मरने के बाद किस रूप मे मिलता है ?

तब ब्रम्हा जी , नारद जी के इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए बोलते है की।

नारद ! जब इंसान बिना किसी लालच भाव से हमेशा के लिए किसी को कुछ देकर उसकी सहायता करता है तो इसे दान कहा जाता है यह दान कई प्रकार के होते है कई रूप मे होते है |

दिल से और बिना किसी लोभ के किया गया छोटे से छोटा दान भी उतना ही पुण्य माना जाता है जितना बड़ी से बड़ी वस्तु का दान |

रही बात इन दान के फल की तो उसका फल उसे मरने से पहले और मरने के बाद दोनों अवस्थाओ मे मिलता है |

सबसे पहले यह जान लो की मरने के बाद कैसे दान का फल मिलता है ?

मरने के बाद इंसान की आत्मा को यमलोक के दूत जिस रास्ते से यमलोक ले जाते है , वह रास्ते दो प्रकार के होते है. एक बेहद सुकून भरा आराम दायक जो कि अच्छी और महान आत्माओ के लिए होता है.

दूसरा रास्ता बेहद कठिन होता है उस रास्ते पर आत्मा को ठिठुरा देने वाली सर्द हवाए चलती है।

अब इस मौके पर यदि उस इंसान ने किसी को कोई गरम कपड़े दान दिये होंगे तो उसे भी यहाँ उसे इन ठंड हवाओ को झेलने के लिए वेसि ही मदद मिलेगी |

ठीक इसी प्रकार यदि इस इंसान ने किसी भूखे को खाना खिला कर या फिर किसी फकीर को अन्न दान किया होगा तो इसे यहाँ भी भोजन मिल जाएगा |

इस प्रकार इंसदन का दान उसे मरने के बाद भी मदद के रूप मे रास्ते मे मिलता है |

श्रीमद् भागवत गीता मे लिखा है इसी प्रकार दूसरों की निःस्वार्थ भाव से की गई सेवा सदैव आपके जीवन मे फलदायी सिद्ध होती है .

इसी सच्ची सेवा भावना के बदले मे दूसरों के मुंह से निकली हुई प्रार्थना आशीर्वाद आपके जीवन के दुःख दूर कर देती है बल्कि आपके लिए स्वर्ग के दरवाजे तक खोल देती है |

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

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આજની સામાજિક પરિસ્થિતિ એટલે છુટાછેડાને અનુસંધાનમાં વિચારવા યોગ્ય બાબત.

પરણિત યુવતી , તેના પતિને : ” ડાર્લિગ , હવે મને અહી સાસરી પક્ષમાં નથી ફાવતું,”

યુવક : ” કેમ શું થયું? “

યુવતી : “જો મને રસોઈ કરતા નથી આવડતી અને રોજ રોજ કિચનમાં જવાનો કંટાળો આવે છે , લગ્ન પહેલા જ મેં કીધું હતું , મને ચા પણ બનાવતા નથી આવડતી. “

યુવક : ” વાત તો તારી ઠીક છે પણ મીટીંગમાં તે કીધું હતું કે હું શીખી લઈશ. “

યુવક :” આ એક જ કારણ છે તને અહી ન ફાવવાનું !!!
મારી મમ્મી પણ તને શીખવાડવાનો પૂરો પ્રયાસ કરે છે. મમ્મી રોજ સવારે આપણા બન્ને ના ટીફીન રેડી કરે છે અને
આપણે ઓફીસ જતા રહીએ છીએ. સાંજે આવતા આપણને રસોઈ રેડી મળે છે. તારે તો મમ્મીને ફક્ત મદદ જ કરવાની હોય છે તે પણ તને નથી ફાવતું ? “

યુવતી: ” પણ મારાથી સવારે વહેલા ઉઠાતું જ નથી . “

યુવક : ” હું તો રોજ જોઉં છુ રાતના બાર વાગ્યા પછી પણ તું ઓનલાઈન હોય છે. ફેસબુક કે વોટ્સએપ
બનાવવી કે ઘરના કામકાજમાં મદદ કરવી એ આપણા છુટાછેડાનું કારણ હોય તો મારી પાસે એનો ઉપાય છે. “

યુવતી : ” શું ઉપાય છે ? “

યુવક : ” તું બેગ પેક ન કર હું જ બેગ પેક કરું છુ, હું તારી સાથે તારી મમ્મીના ઘરે એટલે મારી સાસરી પક્ષમાં રહેવા આવું છુ. પછી તો તને કોઈ વાંધો નહી આવે , કરવા કરતાં , થોડી વહેલી સુઈ જા , તો સવારે ઉઠવામાં તકલીફ નહી પડે.”

યુવતી , થોડી વાર ચુપ થઈ ગઈ અને અચાનક ઉભી થઈ , ” હું જાઉં છુ મારી મમ્મીના ઘરે મને અહી નહી ફાવે. આપણે અલગ થઈ જઈએ. “

યુવક વિચારમાં પડી ગયો. થોડીવારમાં બોલ્યો , ” મારી પાસે તારી સમસ્યાનો ઈલાજ છે. જો રસોઈ ફાવતું નથી એવું પણ નહી બને , કારણકે તું ત્યાં જ નાની મોટી થઈ છે એટલે કોઈ સમસ્યા નહી થાય. રસોઈ કે ઘરના કામકાજ પણ નહી કરવા પડે… તારી મમ્મીજ તને ટીફીન બનાવી આપશે.
તો ચાલ આપણે સાથે જઈએ. “

યુવતી રાજીની રેડ થઈ ગઇ …

( હવે યુવતીના માતા ના ઘરે )

પોતાની દીકરી સાથે જમાઈને
જોતા મમ્મીને અચાનક સ્વગઁ મા આવી મારી દિકરી તેવો હાશકારો અનુભવાયો. ‘ સારું થયું રોજ રોજ મારી દીકરી ને સાસરી પક્ષમાં ફાવતું ન હતું , અહીં પાછી આવી ગઈ તે જ સારું થયું. ‘

હવે રોજ દીકરીની મમ્મી સવારે વહેલી ઉઠે છે અને પોતાની દીકરી-જમાઈ માટે ટીફીન બનાવે,ઘરના કામકાજ પતાવે.
પાછા દીકરી જમાઈ સાંજે આવે તો રસોઈ રેડી રાખે.
દીકરી-જમાઈ રોજ મોડા ઉઠે અને સીધા પોતાની જોબ માટે રેડી થઈ જતા રહે.

થોડો સમય વીતી ગયો હવે દીકરીની મમ્મીની અકળામણ શરુ થઈ…..

આ તો રોજનું થયું , હવે મારી પણ ઉમર થઈ કેટલા વર્ષ સુધી મારે જ બધાના સમય સાચવવાના, ટીફીન બનાવવાના ?
દીકરી સાંજે ઘરે આવી મમ્મી એ કીધું , ” જો હવેથી મારાથી વહેલા નહી ઉઠાય. તારી સાસુ અને સાસરી પક્ષવાળા સાચા છે. જે બાબતની અગવડ મને થાય છે , સ્વાભાવિક છે તારી સાસુને પણ થાય. વહેલી તકે તું તારા સાસરે જા હવે મને તું અહી રહે તે નહી ફાવે,તારે રસોઈ અને ઘરના કામકાજમાં પાવરધા થવું પડશે. હું તને આ કારણસર અહી નહી રાખું. “

યુવતી અવાચક થઈ ગઈ.

અને

સમજી પણ ગઈ , કે તેને શું કરવાનું છે કે શું કરવું જોઈએ.

હવે એક બાબત ખાસ નોંધવા જેવી છે.

ખાસ કરીને યુવતીના વડીલોએ , ( મુખ્યત્વે માતાએ ) , કે આપણે આપણી દીકરીને ભણાવી તેને પગભર કરી સારી બાબત છે.
પણ તેને ઘરના બેઝિક કામકાજ અને બેઝિક સામાન્ય રસોઈ બનાવતા શીખવાડવું જોઈએ , જેથી આગળ જતા તેને પોતાને અને અન્ય કોઈને તકલીફ ન થાય.
આપણી દીકરીને રસોઈ નથી આવડતી , એ છુટાછેડાનું કારણ કદાપી ન હોવું જોઈએ.

હા , તમારી દીકરી ખરેખર તકલીફમાં હોય તો તેને અવશ્ય સાથ આપો …

પણ ખોટી રીતે તેનો પક્ષ ન લો.

દીકરીને રસોઈ ન આવડે એ ગોરવ લેવા જેવી બાબત નથી પણ શરમજનક બાબત છે.

ઘણીવાર એવું કારણ અપાય છે કે દીકરીનો મુખ્ય સમય ભણવામાં ગયો છે.

તો એક વાત ખાસ જણાવું કે દસમા ધોરણ બાદ માર્ચ મહિના થી જુલાઈ સુધી વેકેશન હોય છે. તેમજ કોલેજમાં પણ રજા અને વેકેશન મળતા હોય છે..
તેવા સમયે જો દીકરીની માતા દીકરીને રસોઈના કે ઘરના કામકાજ શીખવાડે તો અવશ્ય એ શક્ય છે.
આપની દીકરીને ૧૫ વર્ષથી ૨૩ વર્ષ સુધીમાં દરેક કાર્યમાં પારંગત બનાવી શકાશે અને દીકરીને પોતાની માતાનો ઠપકો ખરાબ નહી લાગે પણ સાસુનો ઠપકો કે શીખ અવશ્ય ખરાબ લાગશે

મોહિત