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राजा भर्तृहरि-
पुराने जमाने में एक राजा हुए थे, भर्तृहरि। वे कवि भी थे। उनकी पत्नी अत्यंत रूपवती थीं ।
भर्तृहरि ने स्त्री के सौंदर्य और उसके बिना जीवन के सूनेपन पर 100 श्लोक लिखे, जो ‘श्रृंगार शतक’ के नाम से प्रसिद्ध हैं ।
उन्हीं के राज्य में एक ब्राह्मण भी रहता था, जिसने अपनी नि:स्वार्थ पूजा से देवता को प्रसन्न कर लिया!
देवता ने उसे वरदान के रूप में अमर फल देते हुए कहा कि इससे आप लंबे समय तक युवा रहेंगे।
ब्राह्मण ने सोचा कि भिक्षा मांग कर जीवन बिताता हूं, मुझे लंबे समय तक जी कर क्या करना है? हमारा राजा भर्तृहरि बहुत अच्छा है, उसे यह फल दे देता हूं । वह लंबे समय तक जियेगा तो प्रजा भी लंबे समय तक सुखी रहेगी।
वह राजा भर्तृहरि के पास गया और उनसे सारी बात बताते हुए वह फल उन्हें दे आया।
राजा भर्तृहरि फल पाकर प्रसन्न हो गया। फिर मन ही मन सोचा कि यह फल मैं अपनी पत्नी को दे देता हूं। वह ज्यादा दिन युवा रहेगी तो ज्यादा दिनों तक उसके साहचर्य का लाभ मिलेगा। अगर मैंने फल खाया तो वह मुझ से पहले ही मर जाएगी और उसके वियोग में मैं
भी नहीं जी सकूंगा। उसने वह फल अपनी पत्नी को दे दिया ।
लेकिन, रानी तो नगर के कोतवाल से प्यार करती थी। वह अत्यंत सुदर्शन, हृष्ट-पुष्ट और बातूनी था। अमर -फल उसको देते हुए रानी ने कहा कि इसे खा लेना, इससे तुम लंबी आयु प्राप्त करोगे और मुझे सदा प्रसन्न करते रहोगे। फल ले कर कोतवाल जब महल से बाहर निकला तो सोचने लगा कि रानी के साथ तो मुझे धन-दौलत के लिए झूठ-मूठ ही प्रेम का नाटक करना पड़ता है। और यह फल खाकर मैं भी क्या करूंगा। इसे मैं अपनी परम मित्र राज नर्तकी को दे देता हूं। वह कभी मेरी कोई बात नहीं टालती। मैं उससे प्रेम भी करता हूं। और यदि वह सदा युवा रहेगी, तो दूसरों को भी सुख दे पाएगी! उसने वह फल अपनी उस नर्तकी मित्र को दे दिया ।
राज नर्तकी ने कोई उत्तर नहीं दिया और चुपचाप उस अमर फल को अपने पास रख लिया।
कोतवाल के जाने के बाद उसने सोचा कि कौन मूर्ख यह पाप भरा जीवन लंबा जीना चाहेगा। हमारे देश का राजा भर्तृहरि बहुत अच्छा है, उसे ही लंबा जीवन जीना चाहिए। यह सोच कर उसने किसी प्रकार से राजा से मिलने का समय लिया और एकांत में उस फल की महिमा सुना कर उसे राजा को दे दिया और कहा कि महाराज, आप इसे खा लेना ।
राजा फल को देखते ही पहचान गया और भौंचक रह गया । पूछताछ करने से जब पूरी बात मालूम हुई, तो उसे वैराग्य हो गया और वह राज-पाट छोड़ कर जंगल में चला गया । वहीं उसने वैराग्य पर 100 श्लोक लिखे जो कि ‘वैराग्य शतक’ के नाम से प्रसिद्ध हैं । इस प्रकार राजा भर्तृहरि ने ‘श्रृंगार शतक’ तथा ‘वैराग्य शतक’ दोनों की रचना की ।
यही इस संसार की वास्तविकता है । एक व्यक्ति किसी अन्य से प्रेम करता है और चाहता है कि वह व्यक्ति भी उसे उतना ही प्रेम करे । परंतु विडंबना यह है कि वह दूसरा व्यक्ति किसी अन्य से प्रेम करता है । इसका कारण यह है कि संसार व इसके सभी प्राणी अपूर्ण हैं । सब में कुछ न कुछ कमी है । सिर्फ एक ईश्वर पूर्ण है ।
एक वही है जो हर जीव से उतना ही प्रेम करता है, जितना जीव उससे करता है।

मुनीन्द्र मिश्रा

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ऐसे श्री भगवान को बारम्बार प्रणाम है ! 🙏

राजस्थान में एक भगवान श्री कृष्ण के दयालु भक्त थे , नाम था रमेश चंद्र… उनकी दवाइयों की दुकान थी , उनकी दुकान में भगवान श्री कृष्ण की एक छोटी सी तस्वीर एक कोने में लगी थी …वे जब दुकान खोलते साफ सफाई के उपरांत हाथ धोकर नित्य भगवान की तस्वीर को साफ करते और बड़ी श्रद्धा से धूप इत्यादि दिखाते…
उनका एक पुत्र भी था, राकेश जो … अपनी पढ़ाई पूरी करके उनके ही साथ दुकान पर बैठा करता था…वो भी अपने पिता को ये सब करते हुए देखा करता और चूंकि नए ज़माने का विज्ञान का पढ़ा लिखा नया युवक था लिहाजा अपने पिता को समझाता की भगवान वगैरा कुछ नहीं होते सब मन का वहम है… शास्त्र कहते हैं कि सूर्य अपने रथ पर ब्रह्मांड का चक्कर लगाता है…जबकि विज्ञान ने सिद्ध कर दिया कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है……इत्यादि इत्यादि न जाने कौन कौन से नए नए उदाहरण देता की कुल मिलाकर ईश्वर नहीं हैं !!!!
पिता उस को स्नेह भरी दृष्टि से देखते और मुस्कुरा कर रह जाते…शायद अनावश्यक तर्क वितर्क से बचने की चेष्टा करते !
समय बीतता गया पिता बूढ़े हो गए थे… शायद वे जान गए थे कि अब उनका अंत समय निकट ही आ गया है…
अतः एक दिन अपने बेटे से कहा , ” बेटा तू ईश्वर को मान या मत मान मेरे लिए ये ही बहुत है कि तू एक मेहनती , दयालु और सच्चा मनुष्य है… परन्तु मेरे जाने के बाद एक तो तू दुकान में भगवान की तस्वीर पर कपड़ा जरूर मारा करना और यदि कभी किसी परेशानी में फंस जाए तो हाथ जोड़कर श्रीकृष्ण से अपनी समस्या कह देना … बस मेरा इतना कहना मान लेना…पुत्र ने स्वीकृति भर दी…
कुछ ही दिनों के बाद पिता का देहांत हो गया ,
समय गुजरता रहा…
एक दिन बहुत तेज बारिश पड़ रही थी राकेश दुकान में दिनभर बैठा रहा ग्राहकी भी कम हुई…ऊपर से लाईट भी बहुत परेशान कर रही थी…तभी अचानक एक लड़का भीगता हुआ तेजी से आया और बोला,” भईया ये दवाई चाहिए मेरी माँ बहुत बीमार है डॉक्टर ने कहा ये दवा तुरंत ही चार चम्मच यदि पिला दी जाये तो ही माँ बच पायेगी क्या ये आपके पास है ?…
राकेश ने पर्चा देखकर तुरंत कहा हाँ ये है… लड़का बहुत खुश हुआ…और कुछ ही समय के लेन देन के उपरांत दवा लेकर चला गया…परन्तु ये क्या !!! लड़के के जाने के थोड़ी ही देर बाद राकेश ने जैसे ही काउंटर पर निगाह मारी तो सनाका निकल गया… मारे पसीने के बुरा हाल क्योंकि अभी थोड़ी देर पहले ही एक ग्राहक चूहे मारने की दवाई की शीशी वापस करके गया था…लाईट न आने की वजह से राकेश ने शीशी काउंटर पर ही रखी रहने दी , कि लाईट आने पर वापस जगह पर रख देगा… पर जो लड़का दवाई लेने आया था वह अपनी शीशी की जगह चूहे मार दवाई की ले गया और लड़का पढ़ा लिखा भी नहीं था !!!
” हे भगवान ! ” अनायास ही राकेश के मुँह से निकला ये तो अनर्थ हो गया !!! तभी उसे अपने पिता की बात याद आई और वो तुरंत हाथ जोड़कर भगवान कृष्ण की तस्वीर के आगे दुःखी मन से प्रार्थना करने लगा कि , हे प्रभु ! पिताजी हमेशा कहते थे , कि तू है यदि तू सचमुच है तो आज ये अनहोनी होने से बचा ले एक माँ को उसके बेटे द्वारा जहर मत पीने दे प्रभु मत पीने दे !!!
” भईया ! ” तभी पीछे से आवाज आई… ” मैं फिसल गया दवा की शीशी भी फूट गई ! आप एक दूसरी शीशी दे दो…
भगवान की मनमोहक मुस्कान से भरी तस्वीर को देखकर राकेश की आँखों से झर झर आँसू बह निकले !!!
हरे कृष्ण 🙏🙏

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐व्रत कथा💐💐

किसी नगर में एक कुम्हार रहता था। एक बार जब उसने बर्तन बनाकर आंवां लगाया तो आंवां नहीं पका। परेशान होकर वह राजा के पास गया और बोला कि महाराज न जाने क्या कारण है कि आंवां पक ही नहीं रहा है।

राजा ने राजपंडित को बुलाकर कारण पूछा। राजपंडित ने कहा, ”हर बार आंवां लगाते समय एक बच्चे की बलि देने से आंवां पक जाएगा।”

राजा का आदेश हो गया। बलि आरम्भ हुई। जिस परिवार की बारी होती, वह अपने बच्चों में से एक बच्चा बलि के लिए भेज देता। इस तरह कुछ दिनों बाद एक बुढि़या के लड़के की बारी आई।

बुढि़या के एक ही बेटा था तथा उसके जीवन का सहारा था, पर राजाज्ञा कुछ नहीं देखती। दुखी बुढ़िया सोचने लगी, ”मेरा एक ही बेटा है, वह भी सकट के दिन मुझ से जुदा हो जाएगा।”

तभी उसको एक उपाय सूझा। उसने लड़के को सकट की सुपारी तथा दूब का बीड़ा देकर कहा, ”भगवान का नाम लेकर आंवां में बैठ जाना। सकट माता तेरी रक्षा करेंगी।”

सकट के दिन बालक आंवां में बिठा दिया गया और बुढि़या सकट माता के सामने बैठकर पूजा प्रार्थना करने लगी।

पहले तो आंवां पकने में कई दिन लग जाते थे, पर इस बार सकट माता की कृपा से एक ही रात में आंवां पक गया।

सवेरे कुम्हार ने देखा तो हैरान रह गया। आंवां पक गया था और बुढ़िया का बेटा जीवित व सुरक्षित था।

सकट माता की कृपा से नगर के अन्य बालक भी जी उठे। यह देख नगरवासियों ने माता सकट की महिमा स्वीकार कर ली।

तब से आज तक सकट माता की पूजा और व्रत का विधान चला आ रहा है।

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

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कंडक्टर को किराया देने के लिए मैंने जैसे ही जेब में हाथ डाला
साथ बैठे अजनबी ने मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा:-
नहीं भाई साहब, आपका किराया मैं दूंगा
मैने कहा:- आप क्यों❓ मैं अपना किराया खुद ही दूंगा
लेकिन अजनबी मेहरबान था और उसने मेरा किराया दे दिया…

अगले स्टाप पर अजनबी बस से उतरा और मैं अपनी जेब से कुछ निकालने लगा तो सर थाम कर बैठ गया क्योंकि उस ने मेरी जेब काट ली थी…. 😎

दूसरे दिन मैने उस अजनबी को बाजार में जा पकड़ा ……
वो मुझे गले लगाकर रोने लगा

और बोला:- साहब जी, मुझे माफ कर दीजिए, आपसे चोरी करने के बाद मेरी बेटी मर गई …..😭

मैने दिल बड़ा करते हुए चोर को माफ कर दिया। चोर चला गया लेकिन उसने गले मिलते समय मेरी सोने की चैन साफ कर दी 😎

कुछ दिनों बाद मै अपनी मोटरसाइकिल से कहीं जा रहा था कि रास्ते में फिर उसी चोर ने रोक लिया….

उस ने रोते हुए माफी मांगी और चोरी किए हुए सारे पैसे भी लौटा दिये। फिर वो मुझे पास के रेस्टोरेंट में ले गया, उसने मुझे चाय नाश्ता करावाया और चला गया
पर जब मै अपनी मोटरसाइकिल के पास आया तो देखा चोर इस बार मेरी मोटरसाइकिल पे ही हाथ साफ कर गया था……….😎

बिल्कुल यही हाल हमारे देश की मुफ्त में बाटने वाली राजनीतिक पार्टियों का है।

भोली भाली जनता इन पर विश्वास करती हैं और ये नेता हर बार जनता को नये नये तरीकों से लूटते हैं 😎😎

फ्री का लालच न करें
सावधान रहें – सतर्क रहें

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अक्षयवट की कहानी


मत्स्य पुराण में वर्णन है कि जब प्रलय आता है, युग का अंत होता है. पृथ्वी जलमग्न हो जाती है और सबकुछ डूब जाता है. उस समय भी चार वटवृक्ष नही डूबते. उनमें सबसे महत्वपूर्ण है वह वटवृक्ष, जो प्रयागराज नगरी में यमुना के तट पर अवस्थित है. मान्यता है कि ईश्वर इस वृक्ष पर बालरूप में रहते हैं और प्रलय के बाद नई सृष्टि की रचना करते हैं. अपनी इसी विशिष्टता के कारण यह वटवृक्ष अक्षयवट के नाम से जाना जाता है. ऐसा वट जिसका क्षय नही हो सकता.

बीते 10 जनवरी, 2019 को उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस वटवृक्ष को हिन्दू श्रद्धालुओं के लिये खोल दिया है. इसके साथ ही सरस्वती कूप में देवी सरस्वती की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा भी की गई. जैन मत में यह मान्यता है कि प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव जी ने इसी वटवृक्ष के नीचे तपस्या की थी. बौद्ध मत में भी इस वृक्ष को पवित्र माना गया है. वाल्मीकि रामायण और कालिदास रचित ‘रघुवंश’ में भी इस वृक्ष की चर्चा है. आशा और जीवन का संदेश देता यह वटवृक्ष भारतीय संस्कृति का एक प्रतीक है. किंतु प्रश्न है कि इतने महत्वपूर्ण वटवृक्ष से हिंदुओं को 425 वर्षों से दूर क्यों रखा गया था?

अकबर जिस कथित गंगा जमुनी तहजीब को परवान चढ़ाना चाहता था, उसके लिए प्रयागराज जैसी नगरी में उसके सत्ता की धमक होनी जरूरी थी. ऐसे में अकबर ने वहाँ एक किला बनाने का निर्णय लिया. किले के लिए वो जगह चुनी गई जो हिंदुओं के लिए सर्वाधिक पवित्र थी. अक्षयवट वृक्ष और अन्य दर्जनों मन्दिर इस किले के अंदर आ गए. लेकिन अपने जीवन के उत्तरकाल में अकबर अपने पूर्ववर्ती शासकों और आने वाले उत्तराधिकारियों की तरह क्रूर नही था. इसलिए उसने किले के क्षेत्र में आने वाले मन्दिरों को तो नष्ट किया लेकिन मूर्तियों को छोड़ दिया. ये मूर्तियाँ और अक्षयवट वृक्ष का एक तना स्थानीय पुजारियों को सौंप दिया गया जिसे वे अन्यत्र पूज सकें. इन्ही मूर्तियों और शाखाओं से पातालपुरी मन्दिर बना जहाँ पिछले 425 वर्षों से हिन्दू श्रद्धालू दर्शन करते आ रहे थे जबकि असली अक्षयवट वृक्ष किले में हिंदुओं की पहुँच से दूर कर दिया गया.

वास्तव में यह वृक्ष जिस तरह सनातनता का विचार देता है, वह अत्यंत विपरीत समयकाल में भी हिंदुओं को भविष्य के लिये आशा का प्रतीक था. अकबर इसे एक चुनौती मानता था. इसीलिए उसके आदेश पर वर्षों तक गर्म तेल इस वृक्ष के जड़ों में डाला गया लेकिन यह वृक्ष फिर भी नष्ट नही हुआ. अकबर के बेटे जहाँगीर के शासनकाल में पहले अक्षयवट वृक्ष को जलाया गया. फिर भी वृक्ष नष्ट नही हुआ. इसके बाद जहाँगीर के आदेश पर इस वृक्ष को काट दिया गया. लेकिन जड़ो से फिर से शाखायें निकल आई. जहाँगीर के बाद भी मुगल शासन में अनेकों बार इस वृक्ष को नष्ट करने का प्रयास हुआ. लेकिन यह वृक्ष हर बार पुनर्जीवित होता रहा. ऐसा प्रतीत होता है मानो यह पवित्र वह वृक्ष बारम्बार पुनर्जीवित होकर इस्लामिक आक्रांताओं को यह कठोर संदेश देता रहा कि तुम चाहे जितने प्रयास कर लो किन्तु सनातन धर्म को समाप्त नही कर सकोगे. साथ ही अपने आस्तित्व को मिली हर चुनौती से सफलतापूर्वक निबटकर यह सनातनधर्मियों में नवीन आशा का संचार करता रहा.

मुगलों के बाद यह किला अंग्रेजों के पास रहा और उन्होंने भी मुगलों द्वारा लगाए प्रतिबन्ध को जारी रखा. स्वतंत्रता के पश्चात यह किला भारतीय सेना के नियंत्रण में है. यहाँ आम श्रद्धालुओं का आना सम्भव नही था. श्रद्धालुओं और सन्तों की लगातार मांग के बाद भी किसी सरकार ने इस वृक्ष के दर्शन के लिए सुलभ बनाने में रुचि नही दिखाई. किन्तु उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रयासों से यह सम्भव हो सका है जिसके लिए वह साधुवाद के पात्र हैं।
Arun Shukla

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एक साधु ने एक कुत्ते से कहा कि “तू है तो बहुत वफादार परन्तु तेरे में तीन कमिया है |”
1 :- तू पेशाब हमेशा दीवार पे ही करता है |
2 :- तू भिखारी को देखकर बिना बात के ही भौंकता है |
3 :- तू रात को भौंक-भौंक के लोगों की नींद खराब करता है| इस पर कुत्ते ने बहुत ही बढ़िया जवाब दिया,,,,,,,

कुत्ता बोला ऐ साधु ! सुन !

  1. जमीन पर पेशाब इसलिए नहीं करता कि कहीं किसी ने वहॉ पूजा की हो |
  2. भिखारी पर इसलिए भौंकता हूँ कि वो भगवान को छोड़कर लोगों से क्यों मांगता है,,,,जो कि खुद भिखारी हैं | भगवान से क्यों नहीं मांगता ?
  3. और रात को इसलिए भौंकता हूँ कि है पापी मनुष्य तू इस भ्रम की नींद में क्यों सोया हुआ है | उठ अपने उस प्रभु को याद कर जिसने तुझे इतना सब कुछ दिया है !!
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♦️♦️♦️ रात्रि कहांनी ♦️♦️♦️

👉 भगवान की मदद🏵️
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एक शहर में एक सेठ रहता था, उसके पास बहुत पैसा था, वह बहुत फैक्ट्रियों का मालिक था.!

एक शाम अचानक उसे बहुत बैचेनी होने लगी, डॉक्टर को बुलाया गया सारे जाँच करवा लिये गये, पर कुछ भी नहीं निकला।
लेकिन उसकी बैचेनी बढ़ती गयी, उसके समझ में नहीं आ रहा था कि ये क्या हो रहा है। रात हुई, नींद की गोलियां भी खा ली पर न नींद आने को तैयार और ना ही बैचेनी कम होने का नाम ले ।

वो रात को उठकर तीन बजे घर के बगीचे में घूमने लगा, घुमते -घुमते उसे लगा कि बाहर थोड़ा सा सुकून है तो वह बाहर सड़क पर पैदल निकल पड़ा ।
चलते-चलते हजारों विचार मन में चल रहे थे। अब वो घर से बहुत दूर निकल आया था और थकान की वजह से वो एक चबूतरे पर बैठ गया, उसे थोड़ी शान्ति मिली तो वह आराम से बैठ गया ।
इतने में एक कुत्ता वहाँ आया और उसकी चप्पल उठाकर ले गया..
सेठ ने देखा तो वह दूसरी चप्पल उठाकर उस कुत्ते के पीछे भागा, कुत्ता पास ही बनी जुग्गी-झोपड़ीयों में घुस गया। सेठ भी उसके पीछे था, सेठ को करीब आता देखकर कुत्ते ने चप्पल वहीं छोड़ दी और चला गया। सेठ ने राहत की सांस ली और अपनी चप्पल पहनने लगा, इतने में उसे किसी के रोने की आवाज सुनाई दी ।
वह और करीब गया तो एक झोपड़ी में से आवाज आ रहीं थीं, उसने झोपड़ी के फटे हुए बोरे में झाँक कर देखा तो वहाँ एक औरत फटेहाल मैली सी चादर पर दीवार से सटकर रो रही हैं। और ये बोल रही है — हे भगवान मेरी मदद कर और रोती जा रहीं है,

सेठ के दिल में ख़्याल आया कि आखिर वो औरत क्यों रो रहीं हैं, उसको तकलीफ क्या है ?और उसने अपने दिल की सुनी और वहाँ जाकर दरवाजा खटखटाया ।
उस औरत ने दरवाजा खोला तो सेठ ने कहां कि मुझे तो बस इतना जानना है कि तुम रो क्यों रही हो.??

वह औरत के आखों में से आँसू टपकने लगें और उसने पास ही गोदड़ी में लिपटी हुई उसकी 7-8 साल की बच्ची की ओर इशारा किया और रोते -रोते कहने लगी कि मेरी बच्ची बहुत बीमार है उसके इलाज में बहुत खर्चा आएगा और मैं तो घरों में जाकर झाड़ूपोछा करके जैसे-तैसे पेट पालती हूँ, मैं कैसे इलाज कराऊ इसका ?

ये सब सुनकर सेठ का दिल पिघल गया और उसने तुरन्त फोन लगाकर एम्बुलेंस बुलवायी और उस लड़की को एडमिट करवा दिया। डॉक्टर ने डेढ़ लाख का खर्चा बताया तो सेठ ने उसकी जवाबदारी अपने ऊपर ले ली और उसका इलाज कराया और उस औरत को अपने यहाँ नौकरी देकर अपने बंगले के सर्वेन्ट क्वाटर में जगह दी और उस लड़की की पढ़ाई का जिम्मा भी ले लिया ।

वो सेठ कर्म प्रधान तो था पर नास्तिक था। अब उसके मन में सैकड़ों सवाल चल रहे थे ।क्योंकि उसकी बैचेनी तो उस वक्त ही खत्म हो गयी थी जब उसने एम्बुलेंस को बुलवाया था। वह यह सोच रहा था कि आखिर कौन सी ताकत है जो मुझे वहाँ तक खींच ले गयीं ? क्या यहीं ईश्वर हैं ? और यदि ये ईश्वर है तो सारा संसार आपस में धर्म, जात -पात के लिये क्यों लड़ रहा है। क्योंकि ना मैने उस औरत की जात पूछी और ना ही ईश्वर ने जात -पात देखी, बस ईश्वर ने तो उसका दर्द देखा और मुझे इतना घुमाकर उस तक पहुंचा दिया।
अब सेठ समझ चुका था कि कर्म के साथ सेवा भी कितनी जरूरी है, क्योंकि इतना सुकून उसे जीवन में कभी भी नहीं मिला था ।

तो दोस्तों मानव और प्राणी सेवा ही धर्म है, यह असली भक्ति हैं । यदि ईश्वर की कृपा पाना चाहते है तो इंसानियत अपना लें और समय-समय पर उन सबकी मदद करें जो लाचार या बेबस है। क्योंकि ईश्वर इन्हीं के आस-पास रहता हैं .!!!

हम भगवान को तो मानते हैं, लेकिन भगवान की नहीं मानतें, यही बड़ी समस्या है।
आईये, चिंतन करें, सहज और सरल बन जाए !!!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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