Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

कचौरियां

रसोई में लन्च का काम निपटाकर हेमा अपने कमरें में लौटी तो बिस्तर पर पड़े उसके मोबाइल पर तीन तीन मिस कॉल थे.
हेमा ने जल्दी से फोन उठाकर देखा तो तीनो कॉल उसके पिताजी दयानंदजी के थे.
बाबुजी के तीन तीन कॉल देख हेमा कुछ परेशान सी हो गयी थी.

उस ने जल्दी से बाबुजी का नम्बर मिलाया.

“बाबुजी सॉरी मैं फोन के पास नही थी इसलिए रिंग सुन नही पाई.”

“अरे बिटिया मोबाइल फोन से तो इंसान जितनी देर दूर रहे उतना अच्छा है…..वेसे खबर ये देनी थी कि कल मकर संक्रांति है और परसो मकर संक्रांति का सामान लेकर तेरे घर आ रहा हूँ सुबह की ट्रेन से.”
हेमा के पिताजी दयानन्द बाबू की आवाज में अपनी लाडली बिटिया से मिलने की खुशी साफ झलक रही थी.

“पर कैसा सामान लेकर आ रहे है आप बाउजी.”
“अब सामान में क्या क्या है ले तू अपनी माँ से पूछ लें .”

बोलते हुए दयानंद बाबू ने फोन पत्नी की तरफ बढ़ा दिया था.

“जुग जुग जियो बिटिया और देख इस बार सब कुछ तुम्हारी
पसन्द का बनाये है अपने हाथों से.गुड़ और चीनी के तिलकुट, बादाम की चक्की, देशी घी में बनी दाल की कचौरिया,एक हांडी ताजा दही.इसके अलावा समधन जी के लिए सुंदर सी शाल और समधीजी जी के लिए कुर्ता-बंडी लेकर आ जा रहे है तुम्हारे बाउजी.मन तो मेरा भी कर रहा था तुझसे मिलने का पर तुझे तो पता ही है कि जाड़े में घुटने का दर्द बढ़ जाता है.”

हेमा चुपचाप बस सुने जा रही थी.
“ठीक है माँ अभी कुछ काम है मुझे मैं बाद में बात करती हूं”

बाकी दिन तो माँ बाबुजी से बात करते समय उसे फोन रखने का मन नही करता था.पर बाबुजी के आने की खबर ने उसे इस कदर चिंता में डाल दिया था कि उसने फोन रख देना ही सही समझा था.

माता पिता की बेहद लाडली हेमा को आखिर क्यों उनके इस फोन ने एकदम से परेशान कर दिया था?

सरकारी बैंक से हाल ही में रिटायर हुए दयानन्द बाबू की चार पुत्रियों में हेमा सबसे छोटी और सबकी दुलारी थी.
अपनी साधारण सी क्लर्की में भी दयानन्द बाबू ने चारों बेटियों को उच्च शिक्षा देने में कोई कसर नही छोड़ी थी. पत्नी ने भी पुत्रियों को उच्चे संस्कार,जीवन मे धैर्य और जुबान में मीठेपन का ज्ञान बखूबी दिया था.अपनी हैसियत के अनुसार दयानन्द बाबू ने काफी देख परख कर पहली तीनो बेटियों का विवाह रचाया था और सभी अपने घर संसार मे बेहद खुश थी.

हेमा सबकी लाडली थी और थोड़ी चुलबुल भी इसीलिए उसके विवाह को लेकर सभी परेशान रहा करते थे.
दयानन्द जी के बैंक में अक्सर आना जाना करने वाले सीमेंट और लोहे के बड़े व्यापारी सेठ निहाल चंद जी ने किसी समारोह में हेमा को देखा था और तभी से वो उसे अपने छोटे पुत्र की वधु बनाने का सपना देखने लगे थे.
बड़ा करोबार,पांच पांच मकान,गाड़ी घोड़ा,समाज मे प्रतिष्ठा,ऊंची पहुँच.
बेहद सरल जीवन जीने के आदि दयानन्द बाबू को बेटियों के लिए मेहनती और औसत हैसियत वाले घराने ही पसन्द आते थे पर बैंक के सहकर्मियों और मित्रों के दबाव में दयानन्द बाबू सेठ निहाल चंद जी के परिवार में बेटी को व्याह देने के लिए सहमत हो गए थे.
बारात काफी अमीर परिवार की थी पर उसूलों के पक्के दयानन्द जी ने बारातियों का स्वागत – सत्कार अपनी हैसियत के अनुसार ही किया था.विवाह के बाद रिसेप्शन की पार्टी में निहाल चंद जी ने सारी कसर निकाल ली थी.शहर के सबसे महंगे होटल के लॉन में काफी शानदार पार्टी रखी थी उन्होंने.

ससुराल में हेमा को किसी चीज की कमी नही थी.न किसी प्रकार की रोक टोक थी.पर फिर भी जाने क्यों एक अजीब सी उदासी हेमा को अंदर ही अंदर दबोचे रखती थी.
उसे हैरानी होती थी कि परिवार में हर किसी ने अपनी अलग दुनिया बनाई हुई थी.सब अपने संसार मे रमे हुए थे.ससुर जी और पतिदेव के लिए सुबह से देर रात तक बस व्यापार ही व्यापार.
जेठजी सीमेंट का नया प्लांट लगा रहे थे तो वो हर समय लेपटॉप और फाइलों में लगे रहते थे.सासु मां और जेठानी जी की अपनी अपनी मित्र मंडली थी.

मायके में दो कमरों के छोटे से मकान में भी वो सब कितनी खुश रहा करती थी.दिनभर एकदूसरे संग हंसी मजाक तो कभी कभी नोक झोंक. मिलकर घर की साफ सफाई,खाना बनाना.बाबुजी के बैंक से आते ही उनके लिए बगैर दूध वाली चाय और फिर उनके सर की जोरदार मालिश.
कितना कुछ छूट गया था उसका मायके में और जो सम्पन्नता ससुराल में मिली थी उसकी उसने कभी चाह नही की थी.

हेमा इसी बात को लेकर विचलित थी कि उसका पैसे वाला ससुराल और अपने अपने कामो में उलझे परिवार के लोग क्या उसके सादगी पसन्द बाबुजी को उचित मान सम्मान और समय दे पाएंगे?

हांडी भरी दही,कचौरिया भला यहां कौन खायेगा.
क्या भौतिक सुख और दौलत के सागर में गौते लगाता उसका ससुराल मकर संक्रांति में पुत्र वधु के मायके से आने वाले तोहफे का महत्व समझ पायेगा?
उसे मां पिताजी से मिले बगैर रहना मंजूर था पर उनका अपमान कतई स्वीकार न था.

रात बड़ी बेचैनी से कटी थी उसकी.
सुबह उठी तो मन मे एक छिपी उमंग थी कि चार महीने बाद बाबुजी के कंधे पर सर रख पाएगी.दूसरी तरफ बाबुजी के मान सम्मान को लेकर एक अनजान सी घबराहट.

ससुर जी और पतिदेव आज सुबह ही कही निकल गए थे.सासु मां न जाने कहाँ जाने को सुबह से तैयार हो रही थी. हेमा चाहती भी यही थी कि बाबुजी के आने पर घर मे उन्हें कोई न मिले.
वो बार बार घड़ी देखे जा रही थी.ट्रेन तो आ गयी होगी.बाबुजी ऑटो से आधे घण्टे में अब आ ही जायेंगे.
थोड़ी देर बाद मेन गेट खुला तो हेमा दौड़ती हुई बाहर की ओर भागी पर सामने किसी ऑटो के बजाय ससुर जी की गाड़ी थी.
अगला पल और भी आचम्भित करने वाला था.गाड़ी से ससुर जी के संग बाबुजी उतर रहे थे और पतिदेव उनका सामान उठाये पीछे पीछे थे.

हेमा को कुछ समझ नही आ रहा था.
ससुर जी मुस्कुराते हुए समधीजी का हाथ थामे अंदर की ओर आ रहे थे.
“बहु हमे तो दयानन्द बाबू ने पहले ही आने की सूचना दे दी थी.इसलिए आज हमसब ने सारे कामधाम से छुट्टी लेकर पूरा दिन अपने समधी जी के साथ बिताने और उनके लाये कुर्ते बंडी पहनकर दही- तिलकुट का आनन्द लेने का प्रोग्राम बना लिया था.”

सासु माँ एकदम बढ़िया से तैयार होकर हेमा के बाबुजी का अभिनन्दन कर रही थी.जेठ जेठानी ने पूरी श्रद्धा से बाबुजी के पांव छूकर आशीर्वाद लिया था.
दयानन्द जी के आस पास पूरा परिवार इस तरह बैठ गया था मानो सभी को बिजनेस की उलझनों और तनाव से भरी दुनिया की थकावट के बाद गांव के किसी बरगद के विशाल वृक्ष की ठंडी छांव मिल गयी हो.

✍️सहरिया
संजय सहरिया
मुम्बई
(महाराष्ट्र)

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