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अक्षयवट की कहानी


मत्स्य पुराण में वर्णन है कि जब प्रलय आता है, युग का अंत होता है. पृथ्वी जलमग्न हो जाती है और सबकुछ डूब जाता है. उस समय भी चार वटवृक्ष नही डूबते. उनमें सबसे महत्वपूर्ण है वह वटवृक्ष, जो प्रयागराज नगरी में यमुना के तट पर अवस्थित है. मान्यता है कि ईश्वर इस वृक्ष पर बालरूप में रहते हैं और प्रलय के बाद नई सृष्टि की रचना करते हैं. अपनी इसी विशिष्टता के कारण यह वटवृक्ष अक्षयवट के नाम से जाना जाता है. ऐसा वट जिसका क्षय नही हो सकता.

बीते 10 जनवरी, 2019 को उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस वटवृक्ष को हिन्दू श्रद्धालुओं के लिये खोल दिया है. इसके साथ ही सरस्वती कूप में देवी सरस्वती की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा भी की गई. जैन मत में यह मान्यता है कि प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव जी ने इसी वटवृक्ष के नीचे तपस्या की थी. बौद्ध मत में भी इस वृक्ष को पवित्र माना गया है. वाल्मीकि रामायण और कालिदास रचित ‘रघुवंश’ में भी इस वृक्ष की चर्चा है. आशा और जीवन का संदेश देता यह वटवृक्ष भारतीय संस्कृति का एक प्रतीक है. किंतु प्रश्न है कि इतने महत्वपूर्ण वटवृक्ष से हिंदुओं को 425 वर्षों से दूर क्यों रखा गया था?

अकबर जिस कथित गंगा जमुनी तहजीब को परवान चढ़ाना चाहता था, उसके लिए प्रयागराज जैसी नगरी में उसके सत्ता की धमक होनी जरूरी थी. ऐसे में अकबर ने वहाँ एक किला बनाने का निर्णय लिया. किले के लिए वो जगह चुनी गई जो हिंदुओं के लिए सर्वाधिक पवित्र थी. अक्षयवट वृक्ष और अन्य दर्जनों मन्दिर इस किले के अंदर आ गए. लेकिन अपने जीवन के उत्तरकाल में अकबर अपने पूर्ववर्ती शासकों और आने वाले उत्तराधिकारियों की तरह क्रूर नही था. इसलिए उसने किले के क्षेत्र में आने वाले मन्दिरों को तो नष्ट किया लेकिन मूर्तियों को छोड़ दिया. ये मूर्तियाँ और अक्षयवट वृक्ष का एक तना स्थानीय पुजारियों को सौंप दिया गया जिसे वे अन्यत्र पूज सकें. इन्ही मूर्तियों और शाखाओं से पातालपुरी मन्दिर बना जहाँ पिछले 425 वर्षों से हिन्दू श्रद्धालू दर्शन करते आ रहे थे जबकि असली अक्षयवट वृक्ष किले में हिंदुओं की पहुँच से दूर कर दिया गया.

वास्तव में यह वृक्ष जिस तरह सनातनता का विचार देता है, वह अत्यंत विपरीत समयकाल में भी हिंदुओं को भविष्य के लिये आशा का प्रतीक था. अकबर इसे एक चुनौती मानता था. इसीलिए उसके आदेश पर वर्षों तक गर्म तेल इस वृक्ष के जड़ों में डाला गया लेकिन यह वृक्ष फिर भी नष्ट नही हुआ. अकबर के बेटे जहाँगीर के शासनकाल में पहले अक्षयवट वृक्ष को जलाया गया. फिर भी वृक्ष नष्ट नही हुआ. इसके बाद जहाँगीर के आदेश पर इस वृक्ष को काट दिया गया. लेकिन जड़ो से फिर से शाखायें निकल आई. जहाँगीर के बाद भी मुगल शासन में अनेकों बार इस वृक्ष को नष्ट करने का प्रयास हुआ. लेकिन यह वृक्ष हर बार पुनर्जीवित होता रहा. ऐसा प्रतीत होता है मानो यह पवित्र वह वृक्ष बारम्बार पुनर्जीवित होकर इस्लामिक आक्रांताओं को यह कठोर संदेश देता रहा कि तुम चाहे जितने प्रयास कर लो किन्तु सनातन धर्म को समाप्त नही कर सकोगे. साथ ही अपने आस्तित्व को मिली हर चुनौती से सफलतापूर्वक निबटकर यह सनातनधर्मियों में नवीन आशा का संचार करता रहा.

मुगलों के बाद यह किला अंग्रेजों के पास रहा और उन्होंने भी मुगलों द्वारा लगाए प्रतिबन्ध को जारी रखा. स्वतंत्रता के पश्चात यह किला भारतीय सेना के नियंत्रण में है. यहाँ आम श्रद्धालुओं का आना सम्भव नही था. श्रद्धालुओं और सन्तों की लगातार मांग के बाद भी किसी सरकार ने इस वृक्ष के दर्शन के लिए सुलभ बनाने में रुचि नही दिखाई. किन्तु उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रयासों से यह सम्भव हो सका है जिसके लिए वह साधुवाद के पात्र हैं।

अरुण सुक्ला

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कचौरियां

रसोई में लन्च का काम निपटाकर हेमा अपने कमरें में लौटी तो बिस्तर पर पड़े उसके मोबाइल पर तीन तीन मिस कॉल थे.
हेमा ने जल्दी से फोन उठाकर देखा तो तीनो कॉल उसके पिताजी दयानंदजी के थे.
बाबुजी के तीन तीन कॉल देख हेमा कुछ परेशान सी हो गयी थी.

उस ने जल्दी से बाबुजी का नम्बर मिलाया.

“बाबुजी सॉरी मैं फोन के पास नही थी इसलिए रिंग सुन नही पाई.”

“अरे बिटिया मोबाइल फोन से तो इंसान जितनी देर दूर रहे उतना अच्छा है…..वेसे खबर ये देनी थी कि कल मकर संक्रांति है और परसो मकर संक्रांति का सामान लेकर तेरे घर आ रहा हूँ सुबह की ट्रेन से.”
हेमा के पिताजी दयानन्द बाबू की आवाज में अपनी लाडली बिटिया से मिलने की खुशी साफ झलक रही थी.

“पर कैसा सामान लेकर आ रहे है आप बाउजी.”
“अब सामान में क्या क्या है ले तू अपनी माँ से पूछ लें .”

बोलते हुए दयानंद बाबू ने फोन पत्नी की तरफ बढ़ा दिया था.

“जुग जुग जियो बिटिया और देख इस बार सब कुछ तुम्हारी
पसन्द का बनाये है अपने हाथों से.गुड़ और चीनी के तिलकुट, बादाम की चक्की, देशी घी में बनी दाल की कचौरिया,एक हांडी ताजा दही.इसके अलावा समधन जी के लिए सुंदर सी शाल और समधीजी जी के लिए कुर्ता-बंडी लेकर आ जा रहे है तुम्हारे बाउजी.मन तो मेरा भी कर रहा था तुझसे मिलने का पर तुझे तो पता ही है कि जाड़े में घुटने का दर्द बढ़ जाता है.”

हेमा चुपचाप बस सुने जा रही थी.
“ठीक है माँ अभी कुछ काम है मुझे मैं बाद में बात करती हूं”

बाकी दिन तो माँ बाबुजी से बात करते समय उसे फोन रखने का मन नही करता था.पर बाबुजी के आने की खबर ने उसे इस कदर चिंता में डाल दिया था कि उसने फोन रख देना ही सही समझा था.

माता पिता की बेहद लाडली हेमा को आखिर क्यों उनके इस फोन ने एकदम से परेशान कर दिया था?

सरकारी बैंक से हाल ही में रिटायर हुए दयानन्द बाबू की चार पुत्रियों में हेमा सबसे छोटी और सबकी दुलारी थी.
अपनी साधारण सी क्लर्की में भी दयानन्द बाबू ने चारों बेटियों को उच्च शिक्षा देने में कोई कसर नही छोड़ी थी. पत्नी ने भी पुत्रियों को उच्चे संस्कार,जीवन मे धैर्य और जुबान में मीठेपन का ज्ञान बखूबी दिया था.अपनी हैसियत के अनुसार दयानन्द बाबू ने काफी देख परख कर पहली तीनो बेटियों का विवाह रचाया था और सभी अपने घर संसार मे बेहद खुश थी.

हेमा सबकी लाडली थी और थोड़ी चुलबुल भी इसीलिए उसके विवाह को लेकर सभी परेशान रहा करते थे.
दयानन्द जी के बैंक में अक्सर आना जाना करने वाले सीमेंट और लोहे के बड़े व्यापारी सेठ निहाल चंद जी ने किसी समारोह में हेमा को देखा था और तभी से वो उसे अपने छोटे पुत्र की वधु बनाने का सपना देखने लगे थे.
बड़ा करोबार,पांच पांच मकान,गाड़ी घोड़ा,समाज मे प्रतिष्ठा,ऊंची पहुँच.
बेहद सरल जीवन जीने के आदि दयानन्द बाबू को बेटियों के लिए मेहनती और औसत हैसियत वाले घराने ही पसन्द आते थे पर बैंक के सहकर्मियों और मित्रों के दबाव में दयानन्द बाबू सेठ निहाल चंद जी के परिवार में बेटी को व्याह देने के लिए सहमत हो गए थे.
बारात काफी अमीर परिवार की थी पर उसूलों के पक्के दयानन्द जी ने बारातियों का स्वागत – सत्कार अपनी हैसियत के अनुसार ही किया था.विवाह के बाद रिसेप्शन की पार्टी में निहाल चंद जी ने सारी कसर निकाल ली थी.शहर के सबसे महंगे होटल के लॉन में काफी शानदार पार्टी रखी थी उन्होंने.

ससुराल में हेमा को किसी चीज की कमी नही थी.न किसी प्रकार की रोक टोक थी.पर फिर भी जाने क्यों एक अजीब सी उदासी हेमा को अंदर ही अंदर दबोचे रखती थी.
उसे हैरानी होती थी कि परिवार में हर किसी ने अपनी अलग दुनिया बनाई हुई थी.सब अपने संसार मे रमे हुए थे.ससुर जी और पतिदेव के लिए सुबह से देर रात तक बस व्यापार ही व्यापार.
जेठजी सीमेंट का नया प्लांट लगा रहे थे तो वो हर समय लेपटॉप और फाइलों में लगे रहते थे.सासु मां और जेठानी जी की अपनी अपनी मित्र मंडली थी.

मायके में दो कमरों के छोटे से मकान में भी वो सब कितनी खुश रहा करती थी.दिनभर एकदूसरे संग हंसी मजाक तो कभी कभी नोक झोंक. मिलकर घर की साफ सफाई,खाना बनाना.बाबुजी के बैंक से आते ही उनके लिए बगैर दूध वाली चाय और फिर उनके सर की जोरदार मालिश.
कितना कुछ छूट गया था उसका मायके में और जो सम्पन्नता ससुराल में मिली थी उसकी उसने कभी चाह नही की थी.

हेमा इसी बात को लेकर विचलित थी कि उसका पैसे वाला ससुराल और अपने अपने कामो में उलझे परिवार के लोग क्या उसके सादगी पसन्द बाबुजी को उचित मान सम्मान और समय दे पाएंगे?

हांडी भरी दही,कचौरिया भला यहां कौन खायेगा.
क्या भौतिक सुख और दौलत के सागर में गौते लगाता उसका ससुराल मकर संक्रांति में पुत्र वधु के मायके से आने वाले तोहफे का महत्व समझ पायेगा?
उसे मां पिताजी से मिले बगैर रहना मंजूर था पर उनका अपमान कतई स्वीकार न था.

रात बड़ी बेचैनी से कटी थी उसकी.
सुबह उठी तो मन मे एक छिपी उमंग थी कि चार महीने बाद बाबुजी के कंधे पर सर रख पाएगी.दूसरी तरफ बाबुजी के मान सम्मान को लेकर एक अनजान सी घबराहट.

ससुर जी और पतिदेव आज सुबह ही कही निकल गए थे.सासु मां न जाने कहाँ जाने को सुबह से तैयार हो रही थी. हेमा चाहती भी यही थी कि बाबुजी के आने पर घर मे उन्हें कोई न मिले.
वो बार बार घड़ी देखे जा रही थी.ट्रेन तो आ गयी होगी.बाबुजी ऑटो से आधे घण्टे में अब आ ही जायेंगे.
थोड़ी देर बाद मेन गेट खुला तो हेमा दौड़ती हुई बाहर की ओर भागी पर सामने किसी ऑटो के बजाय ससुर जी की गाड़ी थी.
अगला पल और भी आचम्भित करने वाला था.गाड़ी से ससुर जी के संग बाबुजी उतर रहे थे और पतिदेव उनका सामान उठाये पीछे पीछे थे.

हेमा को कुछ समझ नही आ रहा था.
ससुर जी मुस्कुराते हुए समधीजी का हाथ थामे अंदर की ओर आ रहे थे.
“बहु हमे तो दयानन्द बाबू ने पहले ही आने की सूचना दे दी थी.इसलिए आज हमसब ने सारे कामधाम से छुट्टी लेकर पूरा दिन अपने समधी जी के साथ बिताने और उनके लाये कुर्ते बंडी पहनकर दही- तिलकुट का आनन्द लेने का प्रोग्राम बना लिया था.”

सासु माँ एकदम बढ़िया से तैयार होकर हेमा के बाबुजी का अभिनन्दन कर रही थी.जेठ जेठानी ने पूरी श्रद्धा से बाबुजी के पांव छूकर आशीर्वाद लिया था.
दयानन्द जी के आस पास पूरा परिवार इस तरह बैठ गया था मानो सभी को बिजनेस की उलझनों और तनाव से भरी दुनिया की थकावट के बाद गांव के किसी बरगद के विशाल वृक्ष की ठंडी छांव मिल गयी हो.

✍️सहरिया
संजय सहरिया
मुम्बई
(महाराष्ट्र)

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હિન્દુ પિતાના મુસ્લિમ પુત્રો
ગુજરાતનો અમરેલી જિલ્લો. સાવરકુંડલા શહેરમાં એક ભીખુ કુરેશી
રહેતા. તેમના મિત્રનું નામ ભાનુશંકર પંડ્યા હતું. બંનેની મિત્રતા
આજથી લગભગ 40 વર્ષ પહેલા થઈ હતી. જીવનની ગાડી આગળ
વધી. બંનેનો સમય સરખો નહોતો. ભીખુનો પોતાનો પરિવાર, પત્ની
અને ત્રણ પુત્રો હતા. ભાનુને પોતાનું કોઈ નહોતું.
બંનેની મિત્રતા ખૂબ ગાઢ હતી. સંપૂર્ણપણે કુટુંબ. બંને મિત્રોએ
એકબીજા સાથે રમતાં રમતાં ઉંમર કાપી નાખી.
થોડા વર્ષો પહેલા, વૃદ્ધ ભાનુનો પગ તૂટી ગયો હતો. તેનો કોઈ પરિવાર
ન હોવાથી ભીખુએ તેને પોતાના ઘરે બોલાવ્યો, નહીંતર તેની
સારસંભાળ કોણ રાખત? ભાનુશંકર હવે ભીખુના ઘરે રહેવા લાગ્યો.
અહીં આખો પરિવાર તેની સંભાળ રાખતો હતો.
ભીખુના ત્રણ પુત્રોના નામ અબુ, નસીર અને ઝુબેર કુરેશી છે. તમામ
રોજીરોટી કમાવવા વાળા મજૂર છે. પાંચ સમયની નમાઝ કરનાર અને
દૃઢ આસ્તિક જેવા સામાન્ય માણસ છે. ભીખુના ઘરમાં ભાનુ
અજાણ્યું નહોતું. તે ત્રણેય પુત્રોના કાકા હતા. તેઓ પહેલેથી જ
નજીક હતા, પરંતુ હવે તેઓ ઘરના વડીલ બની ગયા હતા. ભાનુ માટે
મિત્રોનો આ પરિવાર હવે તેની દુનિયા હતી. સ્વાભાવિક છે કે ભાનું
ઘરના વડીલ હતા અને ઘરના બાળકોના દાદા હતા. પરિવાર ઘરના
વડીલોના ચરણ સ્પર્શ કરતા અને દાદા સૌને ખીલવા માટે આશીર્વાદ
આપતા.
બંને વડીલોની ઉમર પૂરી થવા આવી હતી એટલે પછી એ જ વિધી નું
વિધાન. એક દિવસ ભીખુ મિયાંની ટિકિટ કપાઈ અને નીકળી ગયા
ભગવાન ના ઘરે. હવે ભાનુશંકર એકલા પડી ગયા. મિત્રના ગયા પછી
ભાનું ગુમસૂમ રહેવા લાગ્યો
ભીખુને મર્યા ત્રણ વર્ષ વીતી ગયા. એક દિવસ પરવરદિગરના
દરબારમાંથી પણ ભાનુશંકરનુ તેડું આવ્યું. તેમણે છેલ્લી શ્વાસ લેવાનું
શરૂ કર્યું. પરિવારે સાંભળ્યું હતું કે હિંદુઓને છેલ્લી ઘડીએ ગંગાજળ
પીવડાવવામાં આવે છે. તેઓ ભાગી ને પાડોશી પાસેથી ગંગાજળ
મંગાવ્યું અને છેલ્લી ઘડીએ તેણે ભાનુશંકરના મોંમાં ગંગાજળ રેડ્યું
જેથી કાકાને મુક્તિ મળે.
મૃત્યુ પછી જ્યારે ગામલોકો એકઠા થયા, ત્યારે ભાઈઓએ
કહ્યું
કે અમે
કાકાના અંતિમ સંસ્કાર હિંદુ કાયદા પ્રમાણે કરવા માંગીએ છીએ,
કારણ કે તેઓ હિન્દુ હતા. આ અંગે ગ્રામજનોએ જણાવ્યું કે,
ખબોઆપવા(કાંધોઆપવા)અને અગ્નિદાહ આપવા માટે જનોઈ ધારણ
કરવી જરૂરી છે. ત્રણેય ભાઈઓએ કહ્યું કે તમે જેમ કહેશો તેમ અમે
કરીશું.જેમ પુત્રો પિતા માટે કરે છે.
પાંચ વખતના નમાજી મુસ્લિમના જનેઉ સંસ્કાર ક્યાર થી ચાલુ થયા?
પણ તેઓ જનોઈ પહેરવા તૈયાર હોય તો રોકે કોણ?
ત્રણેય ભાઈઓએ જનોઈ અને ધોતી પહેરી અને હિંદુ વિધિ પ્રમાણે
તેમના બ્રાહ્મણ કાકાના અંતિમ સંસ્કાર કર્યા. નસીરના પુત્રએ
ભાનુશંકરને અગ્નિદાહ આપ્યો. આખા 13 દિવસ સુધી તમામ
પરંપરાગત વિધિઓ કરવામાં આવી ત્રણેય ભાઈઓએ માથું મુંડન
કરાવ્યું દાન આપ્યું, જે કંઈ થઈ શકે બની શકે તે કર્યું .
આમ કરવાથી ન તો ભાનુશંકર પંડ્યાનો ધર્મ ભ્રષ્ટ થયો ન તો ભીખુ
કુરેશીનો ઈસ્લામ ખતરામાં આવ્યો. હવે બાળકોને ખાતરી છે કે અબ્દુ
ને જન્નત નસીબ થયું હશે અને કાકાના આત્માને મોક્ષ મળ્યો હશે.
નફરત એ રાજકારણનો ધંધો છે. દુનિયા મોહબ્બત થી ચાલે છે.

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એક યુવક પોતાના અત્યંત ઘરડા પિતાને રેસ્ટોરાંન્ટમાં જમવા લઇ જાય છે !
બંને સામસામે બેસીને જમતા હોય છે અચાનક વૃદ્ધ વ્યક્તિથી દાળની વાડકી ઢોળાય છે,તેમનું પેન્ટ અને શર્ટ દાળવાળું થઇ જાય છે !
રેસ્ટોરાંન્ટમાં બેઠેલા અન્ય ગ્રાહકોના મોઢા વંકાય છે,પણ પિતાપુત્ર શાંતિથી તેમનું જમવાનું પૂરું કરે છે !
જમ્યા પછી પુત્ર પિતાને વોશ બેઝીન પાસે લઇ જઈને હાથ ધોવડાવી,તેમના શર્ટ પેન્ટને સાફ કરીને,માથું ઓઢી આપીને,ચશ્માં કાન પર ગોઠવી આપે છે !
ગ્રાહકો ડોક તાણીને આ ક્રિયા થતી જોઈ રહ્યા હોય છે !
પુત્ર કાઉનટર પર બીલ ચૂકતે કરી,પિતાનો હાથ પકડી બહાર જવા ડગલું ભરે છે ત્યારે પિતા જરા મોટા આવાજથી બોલે છે ” બેટા,તું ભૂલમાં અહીં કશુક મુકીને જાય છે !”
પુત્રનો હાથ તરત પેન્ટના અને શર્ટના ખિસ્સા પર જાય છે,ચાવી અને ફોન સલામત હોવાની ખાતરી કરીને જવાબ આપે છે ” પપ્પા હું કશું મુકીને જતો નથી !”
વૃદ્ધ પિતા કહે છે ” બેટા તું અહી બેઠેલા દરેક યુવાન પુત્ર માટે એક પાઠ અને ઘરડા થનાર પિતા માટે એક આશા મુકીને જાય છે ! “””””
.
આ પોસ્ટ નો હક દાર હું નથી પ્રવિણભાઈ પટેલ છે ઉમર 70 વર્ષ મેતો એમના વિચારો અને વાર્તા પ્રગટ કરી સે તમારી સામે ,,,

વિશાલ સોજીત્રા

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આવી ચોરી શુ કામ કરવી પડે?સરતચૂક કે ઊઠાંતરી? ગાંધીનગરમા વિધાનસભાની ઈમારત કેન્દ્રમાં હોવાથી ત્યાંના નાગરિક લૂંટ કે ચોરી એવી એવી બાબતોને બહુ ગંભીરતાથી લેતો નથી.. જ્યા સુધી એના ઘરમા સીધી ચોરી ન થાય ત્યાં સુધી અમે ગાંધીનગર વાસીઓ ચોરી અને લૂંટને રોજિંદી ઘટમાળનો ભાગ જ સમજીએ છીએ..

એક સમયે ગાંધીનગર સાહિત્ય સભાની હાક વાગતી હતી..ખાનગીમા કહુ તો આપણા ચાલુ વડાપ્રધાન નરેન્દ્રભાઈ મોદી પણ આ સંસ્થા સભ્ય છે.. એમાં નટવર હેડાઉ વનવિહારી પ્રમુખ પણ રહી ચુક્યા છે.. પોતાના અસાહિત્ય દિકરાને અમીત શાહની જેમ પદ આપી ગુજરાત સાહિત્ય સંગમની ગાંઘીનગર મા ફ્રેન્ચાઈઝી પણ લઈને બેઠા છે..
એમની કવિતા! મેં પહેલી વાર સાંભળી..
“કોયલડી ડોટ કોમ, મોરલા ડોટ ઓમ
ડોટ કોમ જંગલ આખ્ખું…”
બધાએ તાળીઓથી ગડગડાટથી એમનું આ મહાન! કાવ્ય વધાવી લીધું.. પણ મને તો ખબર હતી કે નીવડેલા સર્જક કૃષ્ણ દવેના વાંસલડી ડોટ કોમ કાવ્યની નબળી નકલ છે.. મને હતૂ કે તેઓ મૂળ સર્જકનું નામ લેવાની ક્ટર્સી કરશે.. પણ ના…
વાત 2005ની આસપાસની છે. એ વખતે નટવરભાઈ જંગલખાતામા કોઈ સારી પોસ્ટ ઉપર હતા..
નટવરભાઈ ઉત્તમ અને મૌલિક બે પ્રકારનું સાહિત્ય લખે છે.. પણ જેટલું ઉત્તમ હોય છે.. તેટલું પોતાનું અને મોલિક નથી હોતું.. અને મૌલિક લખે છે તે સ્વાભાવિકપણે ઉત્તમ નથી હોતું.. અકવિઓ અને નવોદિતોને ચેલી ચેલકા બનાવી સ્થાપી દેવાની સાહિત્ય અનૈતિકતા ફૂલીફાલી છે
સાહિત્ય પરિષદના મુખપત્ર પરબમા ભારતીય સાહિત્ય એવા મથાળા નીચે ડોસો કહે નામની આસામીઝ વાર્તા ફેબ્રુ-2019મા
પ્રગટ થઈ. જેના લેખિકાઅસામિઝ યુવાન મહિલા વાર્તાકાર મણિકાદેવી છે. આ અનુવાદિત(જેનું અનુવાદ હસમુખ રાવલે કર્યુ હતું) કરી મુકવામા આવી હતી એજ
વાર્તાનું “ઓછાયો” નામકરણ કરી
પરબમાં ઓક્ટોબર ૨૦૨૧ અંકમાં નટવર હેડાઉએ પોતાના નામે નફ્ફટાઈ પૂર્વક છપાવી મારી.
કેટલાક ખુબ જ વાંચતા અને સાહિત્યની ચિંતા કરતા લોકોએ આ ચોરી પકડી પાડી. અનેઆ વાર્તા આ લેખકની મૌલિક કૃતિ ના હોઇ, ઊઠાંતરી હોઇ શકે એવું તથ્ય સામે આવ્યું છે…. ચર્ચાના કેન્દ્રસ્થાને રહેલી વાર્તા “ઓછાયો” આ આસામી વાર્તાની બેઠી નકલ છે. “ઓછાયો” વાર્તા કેવળ પરબના ઓક્ટોબર ૨૦૨૧ અંકમાં જ નહીં, મમતા વાર્તામાસિકના જૂન ૨૦૨૧ અંકમાં પણ આ જ શીર્ષકથી આ જ લેખકના નટવર હેડાઉ નામે પ્રસિદ્ધ થઇ હતી. આ લેખકની અન્ય એક વાર્તા “ચિનારને કુંપળ ફૂટી રહી છે” (શબ્દસૃષ્ટિ, જૂન ૨૦૨૧) પણ શંકાના ઘેરાવામાં છે. ગાંધીનગરમાં રહેતા લેખક કાશ્મીરના એક મુસ્લિમ પરિવારની પીડા કઇ રીતે આત્મસાત કરીને આવી વાર્તા લખી શક્યા હશે? “
દરેક ચોરની મોડસ ઓપરેન્ડી હોય છે.. પન્નાલાલ કે પ્રેમચંદની વાર્તામાથી હાથ મારવા કરતા કાશ્મીર કે આસામ કે નોર્થ ઈસ્ટમા લખતા કોઈ વાર્તાકારને પકડી લેવા.. જેથી બહુ વાંઘો ન આવે.. સંપાદક હમણા નવનવા છે.. એટલે બહુ વાંધો નહિ આવે.. નટવર હેડાઉએ તો મમતાના મધુરાય જેવા વાર્તાકારને પણ આસાનીથી મુરખ બનાવ્યા..
આવી સાહિત્યક ચોરી અને લૂંટ કરનારને ખોટી પ્રસિધ્ધ એટલી ગમી જાય છે…કે સાહિત્ય વર્તુળમા કે જાહેરમાં માફી માંગવા જેટલી પણ નૈતિકતા એમની પાસે બચતી નથી..
પણ તમામ સાહિત્ય સંસ્થાઓ અને માતબર સાહિત્ય સામાયિકો નટવર હેડાઉ ને બ્લેક લિસ્ટ કરવા જોઈએ.. સાહિત્ય સંગમ અને ગાંધીનગર સાહિત્ય સભાએ નટવર હેડાઉ વિશે ગંભીરતાથી વિચારવાની જરુર છે..
આપણી હેસિયત હોય એટલું લખવું જોઈએ.. આવી ચોરી મર્યા પછી પણ પકડાતી હોય છે…
ડો. સ્વપ્નિલ કેશવલાલ મહેતા

સ્વપ્નિલ મહેતા

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐भक्तों की दरिद्रता💐💐 जगत-जननी पार्वतीजी ने एक भूखे भक्त को श्मशान में चिता के अंगारों पर रोटी सेंकते देखा तो वे दौड़ी-दौड़ी ओघड़दानी शंकरजी के पास गयीं और कहने लगीं, "भगवन् ! मुझे ऐसा लगता है कि आपका कठोर हृदय अपने अनन्य भक्तों की दुर्दशा देखकर भी नहीं पिघलता। कम-से-कम उनके लिए भोजन की उचित व्यवस्था तो कर ही देनी चाहिए। देखते नहीं वह बेचारा भर्तृहरि अपनी कई दिन की भूख मृतक को पिण्ड के दिये गये आटे की रोटियाँ बनाकर शान्त कर रहा है।" महादेव ने हँसते हुए कहा, "शुभे ! ऐसे भक्तों के लिए मेरा द्वार सदैव खुला रहता है। पर वह आना ही कहाँ चाहते हैं यदि कोई वस्तु दी भी जाये तो उसे स्वीकार नहीं करते। कष्ट उठाते रहते हैं फिर ऐसी स्थिति में तुम्हीं बताओ मैं क्या करूँ ?" माँ भवानी आश्चर्य से बोलीं, "तो क्या आपके भक्तों को उदर पूर्ति के लिए भोजन की आवश्यकता भी अनुभव नहीं होती ?" श्रीशिवजी ने कहा, "परीक्षा लेने की तो तुम्हारी पुरानी आदत है यदि विश्वास न हो तो तुम स्वयं ही जाकर क्यों न पूछ लो। परन्तु परीक्षा में सावधानी रखने की आवश्यकता है।" भगवान शंकर के आदेश की देर थी कि माँ पार्वती भिखारिन का छद्मवेश बनाकर भर्तृहरि के पास पहुँचीं और बोली, "बेटा ! मैं पिछले कई दिन से भूखी हूँ। क्या मुझे भी कुछ खाने को देगा ?" अवश्य भर्तृहरि ने केवल चार रोटियाँ सेंकी थीं उनमें से दो बुढ़िया माता के हाथ पर रख दीं। शेष दो रोटियों को खाने के लिए आसन लगाकर उपक्रम करने लगे। भिखारिन ने दीन भाव से निवेदन किया, "बेटा ! इन दो रोटियों से कैसे काम चलेगा ? मैं अपने परिवार में अकेली नहीं हूँ एक बुड्ढा पति भी है उसे भी कई दिन से खाने को नहीं मिला है।" भर्तृहरि ने वे दोनों रोटियाँ भी भिखारिन के हाथ पर रख दीं। उन्हें बड़ा सन्तोष था कि इस भोजन से मुझसे से भी अधिक भूखे प्राणियों का निर्वाह हो सकेगा। उन्होंने कमण्डल उठाकर पानी पिया। सन्तोष की साँस ली और वहाँ से उठकर जाने लगे। तभी आवाज सुनाई दी, "वत्स ! तुम कहाँ जा रहे हो ?" भर्तृहरि ने पीछे मुड़ कर देखा। माता पार्वती दर्शन देने के लिए पधारी हैं। माता बोलीं, "मैं तुम्हारी साधना से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें जो वरदान माँगना हो माँगो।" प्रणाम करते हुए भर्तृहरि ने कहा, "अभी तो अपनी और अपने पति की क्षुधा शान्त करने हेतु मुझसे रोटियाँ माँगकर ले गई थीं। जो स्वयं दूसरों के सम्मुख हाथ फैलाकर अपना पेट भरता है वह क्या दे सकेगा। ऐसे भिखारी से मैं क्या माँगू।" पार्वती जी ने अपना असली स्वरूप दिखाया और कहा, "मैं सर्वशक्तिमती हूँ। तुम्हारी परदुःख कातरता से बहुत प्रसन्न हूँ जो चाहो सो वर माँगो।" भर्तृहरि ने श्रद्धा पूर्वक जगदम्बा के चरणों में सिर झुकाया और कहा, "यदि आप प्रसन्न हैं तो यह वर दें कि जो कुछ मुझे मिले उसे दीन-दुःखियों के लिए लगाता रहूँ और अभावग्रस्त स्थिति में बिना मन को विचलित किये शान्त पूर्वक रह सकूँ।" पार्वती जी 'एवमस्तु' कहकर भगवान् शिव के पास लौट गई। त्रिकालदर्शी शम्भु यह सब देख रहे थे उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, "भद्रे ! मेरे भक्त इसलिए दरिद्र नहीं रहते कि उन्हें कुछ मिलता नहीं है। परन्तु भक्ति के साथ जुड़ी उदारता उनसे अधिकाधिक दान कराती रहती हैं और वे खाली हाथ रहकर भी विपुल सम्पत्तिवानों से अधिक सन्तुष्ट बने रहते है।

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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