Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

नटवर सिंह १९७५ में जब ब्रिटेन में भारत के उप उच्चायुक्त थे तो एक बार चंद्रास्वामी उन्हें मिलने इंडिया हाउस पहुंचे थे.

उस वक्त चंद्रास्वामी २५-३० साल के थे. साधुओं के कपड़ों में पहुंचे चंद्रास्वामी अंग्रेजी का एक शब्द भी नहीं बोलना जानते थे.

उन्हें आश्चर्य हुआ कि कुछ ही समय बाद चंद्रास्वामी ने थैचर से मुलाकात करवाने की गुहार लगवाई.

थैचर छह महीने पहले ही कंजर्वेटिव पार्टी की नेता चुनी जा चुकी थीं.

चंद्रास्वामी को थैचर से मिलाने को लेकर नटवर सिंह संशय में थे ,,,,इन्होने सोचा अगर चंद्रास्वामी ने खुद को उनके सामने मूर्ख साबित किया तो वो और भी बड़े मूर्ख नज़र आते.

लेकिन उन्होंने थैचर से मुलाकात का समय मांगा.

हाउस ऑफ़ कॉमन्स के अपने छोटे से कमरे में विपक्ष की नेता ने नटवर सिंह की बात सुनी और कहा, “उप उच्चायुक्त जी अगर आपको लगता है कि मुझे मिलना चाहिए तो मैं मिलूंगी. लेकिन वह मुझसे मिलना क्यों चाहते हैं”

नटवर ने कहा कि वह चंद्रास्वामी खुद उन्हें बताएंगे .
…..तो उन्होंने अगले हफ़्ते, ‘सिर्फ़ दस मिनट’, मिलने का वक्त दिया.

यह ख़बर सुनकर चंद्रास्वामी की खुशी का ठिकाना न रहा. नटवर सिंह ने उन्हें चेताया कि कुछ मूर्खतापूर्ण न करें.

चंद्रास्वामी ने मुस्कराते हुए कहा – “चिंता मत करिए.”

थैचर से मिलने जाते हुए चंद्रास्वामी पूरे साधु भेस में थे. सर पर बड़ा तिलक, गले में रुद्राक्ष की कई मालाएं और हाथ में लाठी.

परिचय के बाद थैचर ने पूछा, “आप मुझसे क्यों मिलना चाहते थे?”

चंद्रास्वामी ने हिंदी में जवाब दिया, जिसका नटवर सिंह ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया, “इन्हें कहिए कि जल्द ही पता चल जाएगा.”

चंद्रास्वामी बिल्कुल भी जल्दी में नहीं लग रहे थे.

उन्होंने एक कागज़ मंगवाया, उस पर ऊपर से नीचे तक और दाएं से बाएं तक लकीरें खींच दीं.

इसके बाद चंद्रास्वामी ने थैचर को कागज़ के पांच टुकड़े दिए और सभी पर सवाल लिखकर, अच्छी तरह मोड़कर काग़ज़ पर बने खांचों में रखने को कहा.

चंद्रास्वामी ने ध्यान लगाया और थैचर से कोई एक सवाल खोलकर मन ही मन पढ़ने को कहा.

फिर चंद्रास्वामी ने बताया कि सवाल क्या था. नटवर सिंह ने अंग्रेजी में अनुवाद करके थैचर को समझाया.

सवाल बिल्कुल सही था.

नटवर ने मार्गरेट थैचर को देखा तो चिढ़ की जगह अब उत्सुकता ले रही थी.”

दूसरा सवाल…. बिल्कुल सही.

चौथे सवाल तक आते-आते भविष्य की लौह महिला का व्यवहार बदल गया था. वह चंद्रास्वामी को एक आम व्यक्ति के बजाय एक सिद्ध पुरुष की तरह देखने लगी थीं.

पांचवा सवाल भी सही निकला.

थैचर और जानना चाहती थीं.

एक पहुंचे हुए गुरू की तरह चंद्रास्वामी ने अपनी चप्पलें उतार दीं और सोफ़े पर पद्मासन लगाकर बैठ गए.

नटवर यह देखकर तो घबरा गए थे लेकिन थैचर ने मौन अनुमति दे दी.

इसके बाद उन्होंने चंद्रास्वामी से और सवाल पूछे. नटवर सिंह दुभाषिये का काम करते रहे.

हर जवाब से ब्रिटेन की भविष्य की प्रधानमंत्री और ख़ुश नज़र आईं.

थैचर कुछ और सवाल पूछना चाहती थीं लेकिन चंद्रास्वामी ने घोषणा कर दी कि सूर्य अस्त हो गया है इसलिए और सवाल नहीं पूछे जा सकते.

थैचर ने पूछा कि वह उनसे फिर कब मिल सकती हैं?

बहुत शांति से चंद्रास्वामी ने कहा, “मंगलवार को दोपहर के २.३० बजे श्री नटवर सिंह के घर पर.”

नटवर सिंह ने चंद्रास्वामी को कहा कि वह अपनी सीमा लांघ रहे हैं. विपक्ष की नेता की सुविधा पूछे बिना उन्हें समय और स्थान नहीं तय करना चाहिए.

नटवर सिंह ने कहा, “यह भारत नहीं है.”

लेकिन चंद्रास्वामी पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा. उन्होंने कहा, “कुंवर साहब अनुवाद कर दीजिए और फिर देखिए.”

नटवर सिंह सन्न रह गए जब मार्गरेट थैचर ने पूछा, “उप उच्चायुक्त जी, आपका घर कहां है.”

सिर्फ़ इतना ही नहीं, चंद्रास्वामी ने एक ताबीज़ निकाला और कहा कि मार्गरेट थैचर मंगलवार को नटवर सिंह के घर आएं तो इसे अपने बाएं हाथ में पहन कर आएं.

नटवर सिंह को लगा कि थैचर का गुस्सा किसी भी पल फूट सकता था.

लेकिन थैचर ने ताबीज़ ले लिया.

मंगलवार की दोपहर २.३० बजे, कंजर्वेटिव पार्टी की नेता, मार्गेट थैचर सन हाउस, फ्रोग्नल वे, हैंपस्टड में पहुंच गईं.

वह चटख लाल पोशाक पहने हुई थीं. ताबीज भी सही जगह पर बांध रखा था.

उन्होंने कई सवाल पूछे लेकिन सबसे महत्वपूर्ण उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावनाओं को लेकर था.

चंद्रास्वामी ने भी उन्हें निराश नहीं किया और भविष्यवाणी की कि वह नौ, ग्यारह या तेरह साल के लिए प्रधानमंत्री बनेंगी.

थैचर ने आखिरी सवाल किया कि वह प्रधानमंत्री कब बनेंगी?

चंद्रास्वामी ने घोषणा की, “तीन या चार साल में.”

वह सही साबित हुए. थैचर ग्यारह साल तक प्रधानमंत्री रहीं.

वैसे चंद्रास्वामी पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंहा राव के बेहद करीबी थे। चंद्रास्वामी के रसूख का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राव जब प्रधानमंत्री थे, तब चंद्रास्वामी उनसे बिना समय लिए ही मिलते थे,,,,,यही नहीं, चंद्रास्वामी के रिश्ते सऊदी अरब के कुख्यात हथियार माफिया अदनान खशोगी, पूर्व विदेश मंत्री के. नटवर सिंह, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन की पत्नी नैंसी रीगन, हॉलीवुड स्टार एलिजाबेथ टेलर, ब्रूनेई के सुल्तान से भी रही हैं।

स्त्रोत : बीबीसी एवं गूगल लिंक्स

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नंदी


नंदी के कान में सभी लोग क्या बोलते हैं और इससे क्या होता है? नंदी जी का परिचय…..

शिलाद ऋषि के पितरों ने उनसे वंश बढ़ाने के लिए कहा, शिलाद ऋषि ने भगवान शिव की घोर तपस्या कर के एक अयोनिज और मृत्युहीन पुत्र का वर मांगा।

एक दिन जब शिलाद ऋषि भूमि जोत रहे थे तो उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई उसका नाम उन्होंने नंदी रखा एक दिन ऋषि के आश्रम में मित्रा और वरुण नामक मुनि आये उन्होने कहा ये पुत्र तो अल्पायु है।

ऋषि बहुत दुखी हुए उन्होने नंदी से शिव की आराधना करने को कहा तो शिवजी ने उत्तर दिया तुम मेरे वरदान से उत्पन्न हुए हो तो तुम्हे मृत्यु से कोई भय नही अब तुम मेरे प्रिय वाहन होंगे और गणाधीश भी होंगे।

नंदी के कान में कहने का मुख्य कारण!!!!!!!!!

भगवान शिव समाधिस्थ रहते है,और बंद आंखों से सम्पूर्ण जगत का संचालन करने का मुख्य कार्य करते है तो नन्दी उनके लिए चैतन्य रूप का कार्य करते है वो उनकी समाधि के बाहर बैठे रहते है,जिससे उनकी समाधि में विघ्न न हो तो भक्त अपनी मनोकामना या समस्या नंदी जी के कान में कह देते है , माना जाता है उनके कान में कही गयी बात शिवजी को अक्षरशः चली जाती है और उस भक्त की समस्या का समाधान या मनोकामना पूर्ति शीघ्रातिशीघ्र हो जाती है।

नंदी के कान में कहने के भी हैं कुछ नियम!!!!!!!!

नंदी के कान में अपनी मनोकामना करते समय इस बात का ध्यान रखें कि आपकी कही हुई बात कोई औऱ न सुनें। अपनी बात इतनी धीमें कहें कि आपके पास खड़े व्यक्ति को भी उस बात का पता ना लगे।

नंदी के कान में अपनी बात कहते समय अपने होंठों को अपने दोनों हाथों से ढंक लें ताकि कोई अन्य व्यक्ति उस बात को कहते हुए आपको ना देखें।

नंदी के कान में कभी भी किसी दूसरे की बुराई, दूसरे व्यक्ति का बुरा करने की बात ना कहें, वरना शिवजी के क्रोध का भागी बनना पड़ेगा।

नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहने से पूर्व नंदी का पूजन करें और मनोकामना कहने के बाद नंदी के समीप कुछ भेंट अवश्य रखें। यह भेंट धन या फलों के रूप में हो सकती है।

अपनी बात नंदी के किसी भी कान में कही जा सकती है लेकिन बाएं कान में कहने को अधिक महत्व है।

ॐ नमः शिवाय🙏🙏

ओली अमित

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प्रतिकुलता


महाराजा दशरथ को जब संतान प्राप्ति नहीं हो रही थी तब वो बड़े दुःखी रहते थे…पर ऐसे समय में उनको एक ही बात से हौंसला मिलता था जो कभी उन्हें आशाहीन नहीं होने देता था…

और वह था श्रवण के पिता का श्राप….!!

दशरथ जब-जब दुःखी होते थे तो उन्हें श्रवण के पिता का दिया श्राप याद आ जाता था… (कालिदास ने रघुवंशम में इसका वर्णन किया है)

श्रवण के पिता ने ये श्राप दिया था कि ”जैसे मैं पुत्र वियोग में तड़प-तड़प के मर रहा हूँ वैसे ही तू भी तड़प-तड़प कर मरेगा…..”

दशरथ को पता था कि ये श्राप अवश्य फलीभूत होगा और इसका मतलब है कि मुझे इस जन्म में तो जरूर पुत्र प्राप्त होगा…. (तभी तो उसके शोक में मैं तड़प के मरूँगा)

यानि यह श्राप दशरथ के लिए संतान प्राप्ति का सौभाग्य लेकर आया…!!

ऐसी ही एक घटना सुग्रीव के साथ भी हुई….

वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि सुग्रीव जब माता सीता की खोज में वानर वीरों को पृथ्वी की अलग – अलग दिशाओं में भेज रहे थे…. तो उसके साथ-साथ उन्हें ये भी बता रहे थे कि किस दिशा में तुम्हें कौन सा स्थान या देश मिलेगा और किस दिशा में तुम्हें जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिये….

प्रभु श्रीराम सुग्रीव का ये भगौलिक ज्ञान देखकर हतप्रभ थे…

उन्होंने सुग्रीव से पूछा कि सुग्रीव तुमको ये सब कैसे पता…?

तो सुग्रीव ने उनसे कहा कि… ”मैं बाली के भय से जब मारा-मारा फिर रहा था तब पूरी पृथ्वी पर कहीं शरण न मिली… और इस चक्कर में मैंने पूरी पृथ्वी छान मारी और इसी दौरान मुझे सारे भूगोल का ज्ञान हो गया….”

अब अगर सुग्रीव पर ये संकट न आया होता तो उन्हें भूगोल का ज्ञान नहीं होता और माता जानकी को खोजना कितना कठिन हो जाता…

इसीलिए किसी ने बड़ा सुंदर कहा है :-

“अनुकूलता भोजन है, प्रतिकूलता विटामिन है और चुनौतियाँ वरदान है और जो उनके अनुसार व्यवहार करें….वही पुरुषार्थी है….”

ईश्वर की तरफ से मिलने वाला हर एक पुष्प अगर वरदान है…….तो हर मिलने वाला काँटा भी वरदान ही समझें….

मतलब…..अगर आज मिले सुख से आप खुश हो…तो कभी अगर कोई दुःख विपदा, अड़चन आ जाए…तो घबरायें नहीं…. क्या पता वो अगले किसी सुख की तैयारी हो !

आपकी विपत्ति आगामी भविष्य हेतु सुखद तैयारी हो सकती है। यह सदैव स्मरण रखें।

ओली अमित

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एक किसान था, उसके पास 500 बीघा जमीन थी, घर में किसी प्रकार की कमी नही थी। खुशहाली का माहौल था ।

किसान के चार पुत्र थे,

सभी सामिल में रहते थे।चारों पुत्रों की शादियां हो चुकी थी व सबके बच्चे भी थे ।

भरा पूरा संयुक्त परिवार था। घर का हिसाब व आर्थिक व्यवस्था का संचालन उसका बङा पुत्र करता था ।

बङे पुत्र के परिवार संचालन से सब खुश थे, क्योकिं किसी को भी काम नही करना पङता था, सब सदस्यों को हाथखर्च हेतू खूब रूपये मिल जाते थे।

बङा पुत्र भी ऐशोआराम की जिंदगी जी रहा था, कभी विदेश घूमने जाता तो कभी होटलों में अय्यासी व मौजमस्ती करता, घर का कोई सदस्य उसका विरोध भी नही करता क्योकिं सबको बिना काम किए ही रुपये पैसे मिल जाते और सब मौज मस्ती करते। रोज घर में मिठाइयां बनती, सबकी पसंद के कपङे,गहने आदि मिल जाते।

एक बार बङे पुत्र को किसी काम से एक दो साल के लिए घर से बाहर जाना पङा एवं घर संचालन की जिम्मेदारी दूसरे नम्बर के पुत्र को दी गयी।

दूसरे नम्बर के पुत्र ने परिवार की बागडौर संभाली तो उसके होश उङ गये, क्योकिं लगभग आधी जमीन एक साहूकार के गिरवी रखी पङी थी, उसने परिवार के किसी सदस्य को कुछ नहीं बताया और अपने काम में लग गया।

परिवार के प्रत्येक सदस्य को काम बता दिया गया स्वयं भी दिनरात मेहनत करता व परिवार के सभी सदस्यों को भी प्रेरित करता। किसी को फ़ालतू रुपये पैसे नही मिलते एवं सबको काम करना पङता था।

उसने धीरे धीरे साहूकार का सारा ऋण चुकता कर दिया एवं अपनी सारी जमीन वापस छुङवा ली। अब परिवार के सब सदस्य उससे नाखुश रहने लगे क्योंकि अब सबको मेहनत करनी पङ रही थी एवं फ़ालतू के शौक फैशन हेतु रुपये पैसे नही मिल रहे थे।

सबने माँग करना शुरू कर दिया कि वापस परिवार की बागडौर बङे पुत्र को ही दी जाए।

ठीक ऐसा ही हाल हमारे देश का है। बङा पुत्र कांग्रेस है एवं छोटा पुत्र मोदी जी।

कांग्रेस के आलाकमान ने देश का गहना गिरवी रखकर एवं विश्व बैंक से ऋण लेकर स्वयं भी ख़ूब मौज मस्ती की एवं देशवासियों को मुफ़्त में खाने की आदत डाल दी।

1947 से लेकर आजतक केवल पिछले सात सालों में भारत ने विश्व बैंक से कोई ऋण नही लिया है बल्कि पहले का कर्जा चुकाया है।

भारत पहले 9 वें नम्बर पर था आज विश्व की 5वें नम्बर की आर्थिक शक्ति बन चुका है ।

राहुल गांधी ने ऋण माफी की घोषणा क्या की, जनता ने कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत दे दिया। सबको हराम की कमाई चाहिए, देश जाए भाङ में।

यही हाल रहा तो वो दिन दूर नही जब पुनः अरबों खरबों के घोटालें होने शुरू हो जायेंगे।

अकेले मोदी क्या करेंगे।

कोई सदस्य मेरी बात को पर्सनल न लें, ये मेरे मन के उद्गार हैं जो व्यक्त किए हैं। 🙏🙏🕉

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पौराणिक काल की दस दैवीय वस्तुओ का रहस्य जानिए!!!!!!!

भारत देश को योग, ध्यान, अध्यात्म, रहस्य और चमत्कारों का देश माना जाता है। वेद, पुराण, रामायण और महाभारत में ऐसी हजारों घटनाक्रम और वस्तुओं के बारे में वर्णन मिलता है जिन पर आधुनिक युग में शोध जारी है। चमत्कार और विज्ञान की ऐसी-ऐसी अजीब बातें हैं जिनमें से कुछ की वैज्ञानिक पुष्‍टि होने के बाद उन पर अब सहज ही विश्वास किया जाने लगा है।

प्राचीनकाल में ऐसी वस्तुएं थीं जिनके बल पर देवता या मनुष्य असीम शक्ति और चमत्कारों से परिपूर्ण हो जाते थे। उन वस्तुओं के बगैर व्यक्ति खुद को असहाय मानता था। कहते हैं कि ऐसी वस्तुएं आज भी किसी स्थान विशेष पर सुरक्षित रखी हुई हैं।

आओ जानते हैं उन्हीं में से 10 चमत्कारिक वस्तुओं के बारे में।हो सकता है,कि आप ढूंढें या तपस्या करें तो आपको भी ये वस्तुएं मिल जाएं।

कल्पवृक्ष : – वेद और पुराणों में कल्पवृक्ष का उल्लेख मिलता है। कल्पवृक्ष स्वर्ग का एक विशेष वृक्ष है। पौराणिक धर्मग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि इस वृक्ष के नीचे बैठकर व्यक्ति जो भी इच्छा करता है, वह पूर्ण हो जाती है।

पुराणों में इस वृक्ष के संबंध में कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं। इसके अलावा कुछ विद्वान मानते हैं कि पारिजात के वृक्ष को ही कल्पवृक्ष कहा जाता है। पद्मपुराण के अनुसार पारिजात ही कल्पतरु है, जबकि कुछ का मानना है यह सही नहीं है। पुराण तो बहुत बाद में लिखे गए।

दरअसल, कल्पवृक्ष को कल्पवृक्ष इसलिए कहा जाता है कि इसकी उम्र एक कल्प बताई गई है। एक कल्प 14 मन्वंतर का होता है और एक मन्वंतर लगभग 30,84,48,000 वर्ष का होता है। इसका मतलब कल्प वृक्ष प्रलयकाल में भी जिंदा रहता है।

पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन के 14 रत्नों में से एक कल्पवृ‍क्ष की भी उत्पत्ति हुई थी। समुद्र मंथन से प्राप्त यह वृक्ष देवराज इन्द्र को दे दिया गया था और इन्द्र ने इसकी स्थापना ‘सुरकानन वन’ (हिमालय के उत्तर में) में कर दी थी। माना जाता है कि धरती के किसी न किसी कोने में आज भी कल्पवृक्ष कहीं न कहीं जरूर होगा। हो सकता है कि यह हिमालय के किसी दुर्गभ स्थान पर मिले।

अक्षय पात्र : – अक्सर यह चमत्कारिक अक्षय पात्र प्राचीन ऋषि-मुनियों के पास हुआ करता था। अक्षय का अर्थ जिसका कभी क्षय या नाश न हो। दरअसल, एक ऐसा पात्र जिसमें से कभी भी अन्न और जल समाप्त नहीं होता। जब भी उसमें हाथ डालो तो खाने की मनचाही वस्तु निकाली जा सकती है।

महाभारत में अक्षय पात्र संबंधित एक कथा है। जब पांचों पांडव द्रौपदी के साथ 12 वर्षों के लिए जंगल में रहने चले गए थे, तब उनकी मुलाकात कई तरह के साधु-संतों से होती है।

कुटिया बनाकर रहने के बाद उनके यहां भ्रमणशील साधु-संतों के जत्थे के जत्थे उनसे मिलने के लिए या कुटिया में प्रवास करने के लिए आते थे। अब पांचों पांडवों सहित द्रौपदी के समक्ष यही प्रश्न होता था कि वे 6 प्राणी अकेले भोजन कैसे करें और उन सैकड़ों-हजारों के लिए भोजन कहां से आए?

तब पुरोहित धौम्य उन्हें सूर्य की 108 नामों के साथ आराधना करने के लिए कहते हैं। युधिष्ठिर इन नामों का बड़ी आस्था के साथ जाप करते हैं। अंत में भगवान सूर्य प्रसन्न होकर युधिष्ठिर के पास प्रकट होकर पूछते हैं कि इस पूजा-अर्चना का आशय क्या है युधिष्ठिर कहते हैं कि हे प्रभु! मैं हजारों लोगों को भोजन कराने में असमर्थ हूं। मैं आपसे अन्न की अपेक्षा रखता हूं। किस युक्ति से हजारों लोगों को खिलाया जाए, ऐसा कोई साधन मांगता हूं।

तब सूर्यदेव एक ताम्बे का पात्र देकर उन्हें कहते हैं- ‘युधिष्ठिर! तुम्हारी कामना पूर्ण हो। मैं 12 वर्ष तक तुम्हें अन्नदान करूंगा। यह ताम्बे का बर्तन मैं तुम्हें देता हूं। तुम्हारे पास फल, फूल, शाक आदि 4 प्रकार की भोजन सामग्रियां तब तक अक्षय रहेंगी, जब तक कि द्रौपदी परोसती रहेगी।’ ताम्बे का वह अक्षय पात्र लेकर युधिष्ठिर प्रसन्न हो जाते हैं।

कथा के अनुसार द्रौपदी हजारों लोगों को परोसकर ही भोजन ग्रहण करती थी, जब तक वह भोजन ग्रहण नहीं करती, पात्र से भोजन समाप्त नहीं होता था। जनश्रुति के अनुसार इसी तरह का अक्षय पात्र आज भी हिमालय के साधुओं के पास है। यह पात्र सूर्य की साधना से ही प्राप्त होता है।

कर्ण के कवच-कुंडल : – भगवान कृष्ण यह भली-भांति जानते थे कि जब तक सूर्य से प्राप्त कर्ण के पास उसका कवच और कुंडल है, तब तक उसे कोई नहीं मार सकता। ऐसे में अर्जुन की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं। उधर देवराज इन्द्र भी चिंतित थे, क्योंकि अर्जुन उनका पुत्र था।

तब कृष्ण ने देवराज इन्द्र को एक उपाय बताया और फिर देवराज इन्द्र एक ब्राह्मण के वेश में पहुंच गए कर्ण के द्वार। देवराज भी सभी के साथ लाइन में खड़े हो गए। कर्ण सभी को कुछ न कुछ दान देते जा रहे थे। बाद में जब देवराज का नंबर आया तो दानी कर्ण ने पूछा- विप्रवर, आज्ञा कीजिए! किस वस्तु की अभिलाषा लेकर आए हैं?

विप्र बने इन्द्र ने कहा, हे महाराज! मैं बहुत दूर से आपकी प्रसिद्धि सुनकर आया हूं। कहते हैं कि आप जैसा दानी तो इस धरा पर दूसरा कोई नहीं है। तो मुझे आशा ही नहीं विश्‍वास है कि मेरी इच्छित वस्तु तो मुझे अवश्य आप देंगे ही।‍

फिर भी मन में कोई शंका न रहे इसलिए आप संकल्प कर लें तब ही मैं आपसे मांगूंगा अन्यथा आप कहें तो मैं खाली हाथ ही चला जाता हूं?
कर्ण ने तैश में आकर जल हाथ में लेकर कहा- हम प्रण करते हैं विप्रवर! अब तुरंत मांगिए।

तब क्षद्म इन्द्र ने कहा- राजन! आपके शरीर के कवच और कुंडल हमें दानस्वरूप चाहिए। एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। कर्ण ने इन्द्र की आंखों में झांका और फिर दानवीर कर्ण ने बिना एक क्षण भी गंवाए अपने कवच और कुंडल अपने शरीर से खंजर की सहायता से अलग किए और ब्राह्मण को सौंप दिए।

इन्द्र ने तुंरत वहां से दौड़ ही लगा दी और दूर खड़े रथ पर सवार होकर भाग गए। तभी आकाशवाणी हुई, ‘देवराज इन्द्र, तुमने बड़ा पाप किया है। अपने पुत्र अर्जुन की जान बचाने के लिए तूने छलपूर्वक कर्ण की जान खतरे में डाल दी है। अब यह रथ यहीं धंसा रहेगा और तू भी यहीं धंस जाएगा।’

बाद में इन्द्र से इससे बचने के लिए कर्ण को वज्ररूपी शक्ति दे दी और कहा कि तुम इस अमोघ वज्र को जिसके ऊपर भी चला दोगे, वो बच नहीं पाएगा। भले ही साक्षात काल के ऊपर ही चला देना, लेकिन इसका प्रयोग सिर्फ एक बार ही कर पाओगे।

कहते हैं कि वे कवच-कुंडल इन्द्र ने स्वर्ग में ले जाकर कहीं सुरक्षित रख दिए थे, जो आज भी कहीं पर रखे हुए हैं।

दिव्य धनुष और तरकश : – दधीचि ऋषि ने देश के हित में अपनी हड्डियों का दान कर दिया था। उनकी हड्डियों से 3 धनुष बने- 1. गांडीव, 2. पिनाक और 3. सारंग। इसके अलावा उनकी छाती की हड्डियों से इंद्र का वज्र बनाया गया। इन्द्र ने यह वज्र कर्ण को दे दिया था।

पिनाक शिव के पास था जिसे रावण ने ले लिया था। रावण से यह परशुराम के पास चला गया। परशुराम ने इसे राजा जनक को दे दिया था। राजा जनक की सभा में श्रीराम ने इसे तोड़ दिया था। सारंग विष्णु के पास था। विष्णु से यह राम के पास गया और बाद में श्रीकृष्ण के पास आ गया था। गांडीव अग्निदेव के पास था जिसे अर्जुन ने ले लिया था।

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक ऐसा धनुष, तीर और तरकश है जिसका कभी नाश नहीं हो सकता। यह तीर चलाने के बाद पुन: व्यक्ति के पास लौट आता है और तरकश में कभी तीर या बाण समाप्त नहीं होते। सबसे पहले ऐसा ही एक तीर राजा बलि के पास था।

भृगुवंशियों ने राजा बलि से विश्‍वजीत के लिए एक यज्ञ करवाया। उस यज्ञ से अग्निदेव प्रकट हुए और उन्होंने राजा बलि को सोने का दिव्य रक्ष, घोड़े एवं दिव्य धनुष तथा दो अक्षय तीर दिए। प्रहलाद ने कभी न मुरझाने वाली दिव्य माला दी और शुक्राचार्य ने दिव्य शंख दिया। इस प्रकार दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर राजा बलि ने इंद्र को पराजित कर दिया था। राजा बलि इन दिव्य धनुष और बाण की बदौलत तीनों लोकों पर राज करने लगा था।

उसी तरह की एक कथा है कि श्वैतकि के यज्ञ में निरंतर 12 वर्षों तक घृतपान करने के बाद अग्निदेव को तृप्ति के साथ-साथ अपच भी हो गया। तब वे ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा ने कहा की यदि वे खांडव वन को जला देंगे तो वहां रहने वाले विभिन्न जंतुओं से तृप्त होने पर उनकी अरुचि भी समाप्त हो जाएगी।

अग्निदेव ने कई बार प्रयत्न किया किंतु इन्द्र ने तक्षक नाग तथा जानवरों की रक्षा हेतु खांडव वन नहीं जलाने दिया। अग्नि पुनः ब्रह्मा के पास पहुंचे। ब्रह्मा से कहा कि अर्जुन तथा कृष्ण खांडव वन के निकट बैठे हैं, उनसे प्रार्थना करें।
तब अग्निदेव ने दोनों से भोजन के रूप में खांडव वन की याचना की।

अर्जुन के यह कहने पर भी कि उसके पास वेग वहन करने वाला कोई धनुष, अमित बाणों से युक्त तरकश तथा वेगवान रथ नहीं है। अग्निदेव ने वरुणदेव का आवाहन करके गांडीव धनुष, अक्षय तरकश, दिव्य घोड़ों से जुता हुआ एक रथ (जिस पर कपि ध्वज लगी थी) लेकर अर्जुन को समर्पित किया। बाद में अग्निदेव ने कृष्ण को एक चक्र समर्पित किया।

तदनंतर अग्निदेव ने खांडव वन को सब ओर से प्रज्वलित कर दिया। इन्द्र सहित सभी देवता खांडव वन को बचाने के लिए आए लेकिन उनका सामना कृष्ण और अर्जुन से हुआ।

अंततोगत्वा सभी हार गए। खांडव वनदाह से तक्षक नाग, अश्वसेन, मायासुर तथा चार शांगर्क नामक पक्षी बच गए थे। इस वनदाह से अग्निदेव तृप्त हो गए तथा उनका रोग भी नष्ट हो गया।

इसके अतिरिक्त गांडीव धनुष और अक्षय तरकश भी दिव्य अस्त्रों में शामिल है! कहते हैं कि गांडीव धनुष अलौकिक था। यह धनुष वरुण के पास था। वरुण ने इसे अग्निदेव को दे दिया था और अग्निदेव से अर्जुन को प्राप्त हुआ था। यह धनुष देव, दानव तथा गंधर्वों से अनंत वर्षों तक पूजित रहा था। वह किसी शस्त्र से नष्ट नहीं हो सकता था तथा अन्य लाख धनुषों की समता कर सकता था। जो भी इसे धारण करता था उसमें शक्ति का संचार हो जाता था।

अर्जुन के अक्षय तरकश के बाण कभी समाप्त नहीं होते थे। गति को तीव्रता प्रदान करने के लिए जो रथ अर्जुन को मिला, उसमें अलौकिक घोड़े जुते हुए थे जिसके शिखर के अग्र भाग पर हनुमानजी बैठे थे और शिखर पर कपि ध्वज लहराता था। इसी के साथ उस रक्ष में अन्य जानवर विद्यमान थे, जो भयानक गर्जना करते थे।

पारसमणि : – पारसमणि का जिक्र पौराणिक और लोककथाओं में खूब मिलता है। इसके हजारों किस्से और कहानियां समाज में प्रचलित हैं। कई लोग यह दावा भी करते हैं कि हमने पारसमणि देखी है। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में जहां हीरे की खदान है, वहां से 70 किलोमीटर दूर दनवारा गांव के एक कुएं में रात को रोशनी दिखाई देती है। लोगों का मानना है कि कुएं में पारसमणि है।

पारसमणि की प्रसिद्धि और लोगों में इसके होने को लेकर इतना विश्‍वास है कि भारत में कई ऐसे स्थान हैं, जो पारस के नाम से जाने जाते हैं। कुछ लोगों के आज भी पारस नाम होते हैं।

पारसमणि की विशेषता : – पारसमणि से लोहे की किसी भी चीज को छुआ देने से वह सोने की बन जाती थी। इससे लोहा काटा भी जा सकता है। कहते हैं कि कौवों को इसकी पहचान होती है और यह हिमालय के आस-पास ही पाई जाती है। हिमालय के साधु-संत ही जानते हैं कि पारसमणि को कैसे ढूंढा जाए, क्योंकि वे यह जानते हैं कि कैसे कौवे को ढूंढने के लिए मजबूर किया जाए।

अश्वत्थामा की मणि : – मणि एक प्रकार का चमकता हुआ पत्थर होता है। मणि को हीरे की श्रेणी में रखा जा सकता है। इन्हीं में से कुछ मणियां चमत्कारिक थीं। जिसके भी पास मणि होती थी वह कुछ भी कर सकता था। रावण ने कुबेर से चंद्रकांत नाम की मणि छीन ली थी। वहीं मणि आजकल बैद्यनाथ मंदिर में विद्यमान है।

द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा के पास एक चमत्कारिक मणि थी जिसके बल पर वह शक्तिशाली और अमर हो गया था। अश्वत्थामा द्रोणाचार्य के पुत्र थे। द्रोणाचार्य ने शिव को अपनी तपस्या से प्रसन्न करके उन्हीं के अंश से अश्वत्थामा नामक पुत्र को प्राप्त किया।

अश्‍वत्थामा के पास शिवजी द्वारा दी गई कई शक्तियां थीं। वे स्वयं शिव का अंश थे।
जन्म से ही अश्वत्थामा के मस्तक में एक अमूल्य मणि विद्यमान थी, जो कि उसे दैत्य, दानव, शस्त्र, व्याधि, देवता, नाग आदि से निर्भय रखती थी। इस मणि के कारण ही उस पर किसी भी अस्त्र-शस्त्र का असर नहीं हो पाता था।

द्रौपदी ने अश्‍वत्थामा को जीवनदान देते हुए अर्जुन से उसकी मणि उतार लेने का सुझाव दिया अत: अर्जुन ने इनकी मुकुट मणि लेकर प्राणदान दे दिया। अर्जुन ने यह मणि द्रौपदी को दे दी जिसे द्रौपदी ने युधिष्ठिर के अधिकार में दे दी। युधिष्ठिर के पास से यह मणि किसके पास चली गई? इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता है।शिव महापुराण (शतरुद्रसंहिता-37) के अनुसार अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं और वे गंगा के किनारे निवास करते हैं किंतु उनका निवास कहां है? यह नहीं बताया गया है।

स्यमंतक मणि : – कुछ लोग कोहिनूर को ही स्यमंतक मणि मानते हैं। हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है यह हम नहीं जानते। सबसे पहले यह मणि इन्द्रदेव के पास थी। वे इसे धारण करते थे। इन्द्रदेव ने यह मणि सूर्यदेव को दे दी थी। बहुत काल के बाद यह मणि राजा सत्राजित के पास पाई गई। सत्राजित ने यह मणि अपने देवघर में रखी थी।

वहां से वह मणि पहनकर उनका भाई प्रसेनजित आखेट के लिए चला गया। जंगल में उसे और उसके घोड़े को एक सिंह ने मार दिया और मणि अपने पास रख ली। सिंह के पास मणि देखकर जाम्बवंतजी ने सिंह को मारकर मणि उससे ले ली और उस मणि को लेकर वे अपनी गुफा में चले गए, जहां उन्होंने इसको खिलौने के रूप में अपने पुत्र को दे दी।

जब प्रसेनजित कई दिनों तक शिकार से न लौटा तो सत्राजित को बड़ा दुख हुआ। उसने सोचा कि श्रीकृष्ण ने ही मणि प्राप्त करने के लिए उसका वध कर दिया होगा अतः बिना किसी प्रकार की जानकारी जुटाए उसने प्रचार कर दिया कि श्रीकृष्ण ने प्रसेनजित को मारकर स्यमंतक मणि छीन ली है, तब श्रीकृष्ण ने अपने ऊपर लगे लांछन को मिटाने के लिए मणि की खोज की।

इस लोक-निंदा के निवारण के लिए श्रीकृष्ण बहुत से लोगों के साथ प्रसेनजित को ढूंढने वन में गए। वहां पर प्रसेनजित को शेर द्वारा मार डालने और शेर को रीछ द्वारा मारने के चिह्न उन्हें मिल गए। रीछ के पैरों की खोज करते-करते वे जाम्बवंत की गुफा पर पहुंचे और गुफा के भीतर चले गए। वहां उन्होंने देखा कि जाम्बवंत की पुत्री उस मणि से खेल रही है। श्रीकृष्ण को देखते ही जाम्बवंत युद्ध के लिए तैयार हो गया।

युद्ध छिड़ गया। गुफा के बाहर श्रीकृष्ण के साथियों ने उनकी 7 दिन तक प्रतीक्षा की, फिर वे लोग उन्हें मरा जानकर पश्चाताप करते हुए द्वारिकापुरी लौट गए। इधर 21 दिनों तक लगातार युद्ध करने पर भी जाम्बवंत श्रीकृष्ण को पराजित न कर सका।

तब उसने सोचा, कहीं यह वह अवतार तो नहीं जिसके लिए मुझे रामचंद्रजी का वरदान मिला था। यह पुष्टि होने पर उसने अपनी कन्या का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया और मणि दहेज में दे दी। उल्लेखनीय है कि जाम्बवंती-कृष्ण के संयोग से महाप्रतापी पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम साम्ब रखा गया। इस साम्ब के कारण ही कृष्ण कुल का नाश हो गया था।

श्रीकृष्ण जब मणि लेकर वापस आए तो सत्राजित अपने किए पर बहुत लज्जित हुआ। इस लज्जा से मुक्त होने के लिए उसने भी अपनी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया। उन्होंने कहा कि अब आप ही इस मणि को रखिए, तब श्रीकृष्ण ने कहा कि कोई ब्रह्मचारी और संयमी व्यक्ति ही इस मणि को धरोहर के रूप में रखने का अधिकारी है।

श्रीकृष्ण जानते थे कि इस मणि को रखने का अर्थ क्या है अत: उन्होंने वह मणि सत्राजित को दे दी। कुछ कथाओं के अनुसार यह मणि श्रीकृष्ण ने अक्रूरजी को दे दी थी। उनके पास से यह कहां चली गई, यह कोई नहीं जानता। हालांकि कहते हैं कि यह मणि जिसके भी पास रही वह महान शासक तो बना लेकिन अंत में उसका बहुत बुरा पतन हो गया।

पाञ्चजन्य शंख : – महाभारत में कृष्ण के पास पाञ्चजन्य, अर्जुन के पास देवदत्त, युधिष्ठिर के पास अनंतविजय, भीष्म के पास पोंड्रिक, नकुल के पास सुघोष, सहदेव के पास मणिपुष्पक था। सभी के शंखों का महत्व और शक्ति अलग-अलग थी। शंखों की शक्ति और चमत्कारों का वर्णन महाभारत और पुराणों में मिलता है। समुद्र मंथन के दौरान इस पाञ्चजन्य शंख की उत्पत्ति हुई थी। शंख को ‍विजय, समृद्धि, सुख, शांति, यश, कीर्ति और लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि शंख नाद का प्रतीक है। शंख ध्वनि शुभ मानी गई है।हालांकि प्राकृतिक रूप से शंख कई प्रकार के होते हैं। इनके 3 प्रमुख प्रकार हैं- दक्षिणावृत्ति शंख, मध्यावृत्ति शंख तथा वामावृत्ति शंख। इन शंखों के कई उप प्रकार होते हैं।

प्रमुख शंख : – लक्ष्मी शंख, गोमुखी शंख, कामधेनु शंख, विष्णु शंख, देव शंख, चक्र शंख, पौंड्र शंख, सुघोष शंख, गरूड़ शंख, मणिपुष्पक शंख, राक्षस शंख, शनि शंख, राहु शंख, केतु शंख, शेषनाग शंख, कच्छप शंख आदि प्रकार के होते हैं, लेकिन पाञ्चजन्य शंख इन सभी से अलग था।

भगवान श्रीकृष्ण के पास पाञ्चजन्य शंख था। कहते हैं कि यह शंख आज भी कहीं मौजूद है। इस शंख के हरियाणा के करनाल में होने के बारे में कहा जाता रहा है।

माना जाता है कि यह करनाल से 15 किलोमीटर दूर पश्चिम में काछवा व बहलोलपुर गांव के समीप स्थित पराशर ऋषि के आश्रम में रखा था, जहां से यह चोरी हो गया। यहां हिन्दू धर्म से जुड़ी कई बेशकीमती वस्तुएं थीं। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के बाद अपना पाञ्चजन्य शंख पराशर ऋषि तीर्थ में रखा था।

हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि श्रीकृष्ण का यह शंख आदि बद्री में सुरक्षित रखा है।
महाभारत युद्ध में श्रीकृष्ण अपने पाञ्चजन्य शंख से पांडव सेना में उत्साह का संचार ही नहीं करते थे बल्कि इससे कौरवों की सेना में भय व्याप्त हो जाता था।

इसकी ध्वनि सिंह गर्जना से भी कहीं ज्यादा भयानक थी। इस शंख को विजय व यश का प्रतीक माना जाता है। इसमें 5 अंगुलियों की आकृति होती है। हालांकि पाञ्चजन्य शंख अब भी मिलते हैं लेकिन वे सभी चमत्कारिक नहीं हैं। इन्हें घर को वास्तुदोषों से मुक्त रखने के लिए स्थापित किया जाता है। यह राहु और केतु के दुष्प्रभावों को भी कम करता है।

कौस्तुभ मणि : – मंथन के दौरान 5वां रत्न था कौस्तुभ मणि। कौस्तुभ मणि को भगवान विष्णु धारण करते हैं। महाभारत में उल्लेख है कि कालिय नाग को श्रीकृष्ण ने गरूड़ के त्रास से मुक्त किया था। उस समय कालिय नाग ने अपने मस्तक से उतारकर श्रीकृष्ण को कौस्तुभ मणि दे दी थी।

यह एक चमत्कारिक मणि है। माना जाता है कि इच्छाधारी नागों के पास ही अब यह मणि बची है या फिर समुद्र की किसी अतल गहराइयों में कहीं दबी पड़ी होगी। हो सकता है कि धरती की किसी गुफा में दफन हो यह मणि।

संजीवनी बूटी : – यह एक ऐसी जड़ी है जिसको खाने से जब तक उसका असर रहता है, तब तक व्यक्ति गायब रहता है। यह एक ऐसी बूटी है जिसका सेवन करने से व्यक्ति को भूत-भविष्‍य का ज्ञान हो जाता है। क्या सचमुच ऐसा है? क्या संजीवनी बूटी होती है? आजकल वैज्ञानिक पारे,
गंधक और आयुर्वेद में उल्लेखित कई प्रकार की जड़ी-बूटियों पर शोध कर रहे हैं और इसके चमत्कारिक परिणाम भी निकले।🙏🏼🅰🙏🏼
।। साभार ।।