Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

स्वयं को पहचानें –
एक बार अकबर एक ब्राह्मण को दयनीय हालत में जब भिक्षाटन करते देखा तो बीरबल की ओर व्यंग्य कसकर बोला – ‘बीरबल! ये हैं तुम्हारे ब्राह्मण! जिन्हें ब्रह्म देवता के रुप में जाना जाता है। ये तो भिखारी है’।
बीरबल ने उस समय तो कुछ नहीं कहा। लेकिन जब अकबर महल में चला गया तो बीरबल वापिस आये और ब्राह्मण से पूछा कि वह भिक्षाटन क्यों करता है’ ?
ब्राह्मण ने कहा – ‘मेरे पास धन, आभूषण, भूमि कुछ नहीं है और मैं ज्यादा शिक्षित भी नहीं हूँ। इसलिए परिवार के पोषण हेतू भिक्षाटन मेरी मजबूरी है’।
बीरबल ने पूछा – ‘भिक्षाटन से दिन में कितना प्राप्त हो जाता है’?
ब्राह्मण ने जवाब दिया – ‘छह से आठ अशर्फियाँ।’
बीरबल ने कहा – ‘आपको यदि कुछ काम मिले तो क्या आप भिक्षा मांगना छोड़ देंगे ?’
ब्राह्मण ने पूछा – ‘मुझे क्या करना होगा ?’
बीरबल ने कहा – ‘आपको ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करके प्रतिदिन 101 माला गायत्री मन्त्र का जाप करना होगा और इसके लिए आपको प्रतिदिन भेंटस्वरुप 10 अशर्फियाँ प्राप्त होंगी।’
बीरबल का प्रस्ताव ब्राह्मण ने स्वीकार कर लिया। अगले दिन से ब्राह्मण ने भिक्षाटन करना बन्द कर दिया और बड़ी श्रद्धा भाव से गायत्री मन्त्र जाप करना प्रारम्भ कर दिया और शाम को 10 अशर्फियाँ भेंटस्वरुप लेकर अपने घर लौट आता। ब्राह्मण की सच्ची श्रद्धा व लग्न देखकर कुछ दिनों बाद बीरबल ने गायत्री मन्त्र जाप की संख्या और अशर्फियों की संख्या दोनों ही बढ़ा दी। गायत्री मन्त्र की शक्ति के प्रभाव से ब्राह्मण को भूख, प्यास व शारीरिक व्याधि की तनिक भी चिन्ता नहीं रही। गायत्री मन्त्र जाप के कारण उसके चेहरे पर तेज झलकने लगा। लोगों का ध्यान ब्राह्मण की ओर आकर्षित होने लगा। दर्शनाभिलाषी उनके दर्शन कर मिठाई, फल, पैसे, कपड़े चढाने लगे। अब उसे बीरबल से प्राप्त होने वाली अशर्फियों की भी आवश्यकता नहीं रही। यहाँ तक कि अब तो ब्राह्मण को श्रद्धा पूर्वक चढ़ाई गई वस्तुओं का भी कोई आकर्षण नहीं रहा। बस वह सदैव मन से गायत्री जाप में लीन रहने लगा।
ब्राह्मण सन्त के नित्य गायत्री जप की खबर चारों ओर फैलने लगी। दूरदराज से श्रद्धालु दर्शन करने आने लगे। भक्तों ने ब्राह्मण की तपस्थली में मन्दिर व आश्रम का निर्माण करा दिया। ब्राह्मण के तप की प्रसिद्धि की खबर अकबर को भी मिली। बादशाह ने भी दर्शन हेतू जाने का फैंसला लिया और वह शाही तोहफे लेकर राजसी ठाठबाट में बीरबल के साथ सन्त से मिलने चल पड़ा। वहाँ पहुँचकर शाही भेंटे अर्पण कर ब्राह्मण को प्रणाम किया। ऐसे तेजोमय सन्त के दर्शनों से हर्षित हृदय सहित बादशाह बीरबल के साथ बाहर आ गए।
तब बीरबल ने पूछा – ‘क्या आप इस सन्त को जानतें हैं ?’
अकबर ने कहा – ‘नहीं, बीरबल मैं तो इससे आज पहली बार मिला हूँ।’
फिर बीरबल ने कहा – ‘महाराज ! आप इसे अच्छी तरह से जानते हो। यह वही भिखारी ब्राह्मण है, जिस पर आपने व्यंग्य कसकर एक दिन कहा था – ‘ये हैं तुम्हारे ब्राह्मण ! जिन्हें ब्रह्म देवता कहा जाता है ?’
आज आप स्वयं उसी ब्राह्मण के पैरों में शीश नवा कर आए हैं। अकबर के आश्चर्य की सीमा नहीं रही। बीरबल से पूछा – ‘लेकिन यह इतना बड़ा बदलाव कैसे हुआ ?’
बीरबल ने कहा – ‘महाराज ! वह मूल रुप में ब्राह्मण ही है। परिस्थितिवश वह अपने धर्म की सच्चाई व शक्तियों से दूर था। धर्म के एक गायत्री मन्त्र ने ब्राह्मण को साक्षात् ‘ब्रह्म’ बना दिया और वह कैसे बादशाह को चरणों में गिरने के लिए विवश कर दिया। यही ब्राह्मण आधीन मन्त्रों का प्रभाव है। यह नियम सभी ब्राह्मणों पर सामान रुप से लागू होता है। क्योंकि ब्राह्मण आसन और तप से दूर रहकर जी रहे हैं, इसीलिए पीड़ित हैं।’
वर्तमान में आवश्यकता है कि सभी ब्राह्मण पुनः अपने कर्म से जुड़ें, अपने संस्कारों को जानें और मानें। मूल ब्रह्मरुप में जो विलीन होने की क्षमता रखता है वही ब्राह्मण है। यदि ब्राह्मण अपने कर्मपथ पर दृढ़ता से चले तो देव शक्तियाँ उसके साथ चल पड़ती हैं। इसलिए अपनी पहचान के साथ सदैव प्रसन्न रहिये। साभार/संशोधित
जो प्राप्त है, वह पर्याप्त है और जिसका मन मस्त है उसके पास समस्त है।
जय श्री परशुराम🙏🚩
जय महाकाल💐

Posted in संस्कृत साहित्य

मृत्यु


मृत्यु का भय मैंने सुना है, इजिप्त में एक आश्रम था। और उस आश्रम में आश्रम के नीचे ही मरघट था। जमीन को खोद कर नीचे मरघट बनाया था। हजारों वर्ष पुराना आश्रम था। मीलों तक नीचे जमीन खोद कर उन्होंने कब्रगाह बनाई हुई थी। जब कोई भिक्षु मर जाता, तो पत्थर उखाड? कर, उस नीचे के मरघट में डाल कर चट्टान बंद कर देते थे।

एक बार एक भिक्षु मरा। लेकिन कुछ भूल हो गई। वह मरा नहीं था, सिर्फ बेहोश हुआ था। उसे मरघट में नीचे डाल दिया। चट्टान बंद हो गई। पांच-छह घंटे बाद उस मौत की दुनिया में उसकी आंखें खुलीं, वह होश में आ गया। उसकी मुसीबत हम सोच सकते हैं! सोच लें कि हम उसकी जगह हैं। वहां लाशें ही लाशें हैं सड़ती हुई, दुर्गंध, हड्डियां, कीड़े-मकोड़े, अंधकार, और उस भिक्षु को पता है कि जब तक अब और कोई ऊपर न मरे, तब तक चट्टान का द्वार न खुलेगा। और उसे यह भी पता है कि अब वह कितना ही चिल्लाए…चिल्लाया, जानते हुए भी चिल्लाया कि आवाज ऊपर तक नहीं पहुंचेगी…क्योंकि आश्रम मील भर दूर है।

और मरघट पर तभी आते हैं आश्रम के लोग जब कोई मरता है। और बड़ी चट्टान से द्वार बंद है। फिर भी, जानते हुए… हम भी बहुत बार जानते हुए चिल्लाते हैं, जानते हुए कि आवाज नहीं पहुंचेगी।

मंदिरों में लोग चिल्ला रहे हैं, जानते हुए कि आवाज कहीं भी नहीं पहुंचेगी। हम सब चिल्ला रहे हैं जानते हुए कि आवाज नहीं पहुंचेगी। आदमी जानते हुए भी चिल्लाए चला जाता है, जहां आशा नहीं है वहां भी आशा किए चला जाता है। वह आदमी बहुत चिल्लाया, चिल्लाया, उसका गला लग गया, आवाज निकलनी बंद हो गई।

शायद हम सोचेंगे कि उस आदमी ने आत्महत्या कर ली होगी। लेकिन नहीं, उस आदमी ने आत्महत्या नहीं की। वह आदमी थोड़े-बहुत दिन नहीं, सात साल उस कब्र के भीतर जिंदा रहा। वह कैसे जिंदा रहा? उसने सड़ी हुई लाशों को खाना शुरू कर दिया। उसने कीड़े-मकोड़े, जो लाशों में पलते थे, उनको खाना शुरू कर दिया। मरघट की दीवालों से नालियों का जो पानी चूता था, वह चाट कर पीने लगा। इस प्रतीक्षा में कि कभी न कभी तो कोई मरेगा ही। द्वार तो खुलेगा ही। आज नहीं कल, कल नहीं परसों।

कब सूरज उगता, उसे पता न चलता; कब रात आती, उसे पता न चलता। सात साल बाद कोई मरा, चट्टान उठाई गई, तो वह आदमी बाहर निकला। और वह खाली बाहर नहीं निकला। इजिप्त में रिवाज है कि मरने वाले आदमियों को नये कपड़े पहना दिए जाते और उनके साथ दो-चार कपड़े कीमती रख दिए जाते, कुछ पैसे-रुपये भी रख दिए जाते। तो उसने सब मुर्दों के कपड़े और पैसे इकट्ठे कर लिए थे, जब निकलेगा तो लेता चला जाएगा। तो वह एक बड़ी पोटली बांध कर कपड़े और एक बड़ी थैली में सब रुपये भर कर बाहर आया। उसे तो कोई पहचान ही नहीं सका, मरघट पर जो लोग आए थे वे तो घबड़ा कर भागने लगे कि वह कौन है! उसके बाल जमीन छूने लगे थे, उसकी आंखों की पलकें इतनी बड़ी हो गई थीं कि आंख नहीं खुलती थी।

उसने कहा, भागते हो? पहचाने नहीं? मैं वही हूं जिसे तुम सात साल पहले नीचे डाल गए थे। उन्होंने कहा, लेकिन तुम जिंदा कैसे रहे? अगर छह घंटे बाद होश में भी आ गए थे तो बचे कैसे? तुमने आत्महत्या न कर ली! सात साल तुम इस मरघट में रहे कैसे? उस आदमी ने कहा, मरना इतना आसान तो नहीं है! मैं भी सोचता था। मैं भी यही सोचता, अगर कोई और उस मरघट में गिरा होता, तो मैं भी यही सोचता कि पागल, जीने की बजाय मर जाते! लेकिन अब मैं कह सकता हूं: मरना इतना आसान नहीं है। मैंने जीने की पूरी कोशिश की। और जीने के लिए मैंने जो भी किया है वह भी घबड़ाने वाला है। आज अगर फिर से सोचूं तो शायद न कर पाऊं।

हम भी सोचेंगे कि वह आदमी कैसा आदमी रहा होगा! लेकिन वह आदमी ठीक हमारे जैसा आदमी था। हम भी उसकी जगह होते तो यही करते। और जिसे हम जिंदगी कह रहे हैं, क्या वह जिंदगी उस मरघट से बहुत भिन्न है? और जिसे हम भोजन कह रहे हैं, क्या वह उस मरघट में किए गए भोजन से बहुत भिन्न है? और जिसे हम कपड़े और रुपये का इकट्ठा करना कह रहे हैं, वह भी क्या मुर्दों से छीने गए रुपये और कपड़े नहीं हैं?

बाप बूढ़ा हो गया हो, तो चाहे बच्चे कहें या न कहें, सोचते हैं कि विदा हो जाए। वे मुर्दे के कपड़े और पैसे छीनने के लिए उत्सुक हैं। राष्ट्रपति को शुभकामनाएं भी देते हैं लोग। उपराष्ट्रपति जन्मदिन पर जाकर फूलमालाएं भी चढ़ाते हैं और मन में भगवान से जाने-अनजाने प्रार्थना भी करते हैं: कब तक टिके रहिएगा? क्योंकि वे विदा हों तो उनकी मरी हुई कुर्सी किसी को, कोई उस पर सवार हो जाए।

इसलिए दिल्ली में कोई मरता है, तो जो लोग चेहरे आंसू लिए हुए मरघट की तरफ ले जाते मालूम पड़ते हैं, वे ही तैयारी भी कर रहे होते हैं उसी वक्त कि कौन उसकी मरी हुई कुर्सी पर बैठ जाए। कहीं ऐसा न हो कि दूसरा बैठ जाए। बल्कि मरघट पर ले जाते वक्त भी इस बात की होड़ रहती है कि मुर्दे को सबसे पहले कौन हाथ दे रहा है, क्योंकि उसका कुर्सी पर कब्जा हो सकता है।

मैंने सुना है कि गांधी मरे तो जिस टैंक पर चढ़ा कर उनको ले जाया गया था उस पर भी खड़े होने की प्रतियोगिता थी कि कौन-कौन नेता उस पर खड़े हो जाएं। क्योंकि दुनिया उनको देख ले कि वसीयतदार कौन है! यह जिसको हम जिंदगी कहते हैं, यह भी एक बड़ा मरघट है, जिसमें क्यू है मरने वालों का। कोई अभी मरेगा, कोई थोड़ी देर बाद, कोई फिर थोड़ी देर बाद, कोई कल, कोई परसों, लेकिन सब मरेंगे। और इसमें जो मकान हैं हमारे पास, वे मुर्दों से छीने गए हैं, और जो कपड़े हैं वे भी, और जो धन है वह भी।

और यहां भी हम जी रहे हैं बिना किसी आनंद को जाने, बिना किसी शांति को पाए, लेकिन सिर्फ एक आशा में कि शायद कल शांति मिले, कल आनंद मिले, कल कुछ मिल जाए। तो कल तक तो जीने की कोशिश करो। किसी भी भांति कल तक जी लो। कल शायद कुछ मिल जाए।

लेकिन मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि जो मरने के लिए तैयार नहीं है, उसे कभी कुछ न मिल सकेगा। और हम बहुत बार मरे हैं। लेकिन हम मरने से इतने भयभीत हैं कि मरने के बहुत पहले बेहोश हो जाते हैं। इसलिए हमें मृत्यु की कोई याद नहीं रह जाती।

हम बहुत बार मरे हैं और बहुत बार जन्मे हैं, लेकिन हर बार मरने और जन्मने की क्रिया इतनी ज्यादा हमें डरा देती है कि हम बेहोशी में ही पैदा होते हैं और बेहोशी में ही मरते हैं। इसलिए उसकी मेमोरी, उसकी स्मृति नहीं बन पाती और गैप पड़ जाता है। इसलिए पिछले जन्म की भी स्मृति हमें नहीं रह जाती। पिछले जन्म की स्मृति न रह जाने का और कोई कारण नहीं है, पिछले जन्म की स्मृति न रह जाने का एक ही कारण है कि बीच में आई मृत्यु, और मृत्यु में हम इतने भयभीत हो गए कि बेहोश हो गए। और उस बेहोशी का जो अंतराल है, उसने स्मृति को दो हिस्सों में तोड़ दिया। पिछली स्मृति अलग टूट गई, यह स्मृति अलग टूट गई। इतना बड़ा बीच में गैप, अंतराल पड़ गया कि दोनों को जोड़ना मुश्किल है!!
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ओशो
समाधि के द्वार

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अध्यात्म और मांसाहार


प्रश्न : गीता में साधकों के लिए सात्विक भोजन पर बल अवश्य दिया गया है लेकिन उसमें कहीं मांसाहार का स्पष्ट निषेध नहीं है,। और आपने मांसाहार को सुपच बताया और यही डाक्टरों का मत भी है। फिर मांसाहार से क्या बाधा आती है? धर्म—साधना के लिए आपने निरामिष भोजन की उपादेयता पर बहुत बल दिया। लेकिन पुस्तकों से पता चलता है कि प्राय: ही सूफी, झेन और तंत्र मार्ग से सिद्ध हुए संतों का भोजन निरामिष नहीं रहा। और अपने ही देश में परमहंस रामकृष्ण सदा आमिष भोजन लेते रहे। इस विरोध का क्या कारण है?

पहली बात, मांसाहार में अपने आप में कोई भी बुराई नहीं है। ध्यान रखना, कह रहा हूं अपने आप में। मेरा मतलब है, अगर वैज्ञानिक सिंथेटिक मांस बना सकें—जो कि जल्दी ही बन सकेगा—कृत्रिम मांस बना सकें, तो वह शाकाहार से भी ज्यादा शाकाहारी होगा। क्योंकि जब तुम फल को वृक्ष से तोड़ते हो, तब भी चोट पहुंचती है। तुम सब्जी काटते हो, तब भी चोट पहुंचती है। कम पहुंचती है।
वृक्षों, सब्जियों के पास उतना ज्यादा विकसित स्नायु—संस्थान नहीं है, जितना पशुओं के पास है। पशुओं के पास उतना विकसित संस्थान नहीं है, जितना मनुष्यों के पास है। इसलिए जो व्यक्ति नर—मांस का आहार करे, उसको तो दुनिया में कोई भी धार्मिक व्यक्ति स्वीकार करने को राजी न होगा, कि यह आदमी का मांस खा रहा है। क्योंकि मनुष्य को मारना बहुत पीड़ादायी है।
जितनी पीड़ा मनुष्य अनुभव करता है मृत्यु में, उतनी पशु नहीं अनुभव करते। क्योंकि मनुष्य के पास सोच—विचार है, मृत्यु का बोध है; मर रहा हूं इसकी समझ है; मारा जा रहा हूं? इसकी समझ है। और चेतना बहुत प्रगाढ़ है। इसलिए मनुष्य को तो कोई धर्म राजी नहीं होगा।
ऐसा लगता है कि हिंदू अतीत में यज्ञ में मनुष्य की बलि चढ़ाते रहे; नरमेध यज्ञ होते रहे। लेकिन धीरे— धीरे उन यज्ञों को करने वालों को भी पता चला कि यह तो अतिशय है। और इस तरह का धर्म तो ज्यादा दिन तक धर्म नहीं समझा जा सकता। इसलिए उन्होंने भी व्याख्या बदल दी। तो उन्होंने भी कहा कि नरमेध सिर्फ नाम के लिए है। मनुष्य का पुतला बना लिया, उसका वध कर दिया।
नरमेध के लिए तो कोई राजी नहीं है। क्यों? क्योंकि मनुष्य से स्वादिष्ट मांस तो और कहीं मिल नहीं सकता। अगर स्वाद ही सवाल है, तो छोटे बच्चों का जैसा मांस स्वादिष्ट होता है, वैसा किसी का भी नहीं होता। और जितना सुपाच्य होता है, वैसा दूसरा मांस नहीं हो सकता। क्योंकि मनुष्य से तालमेल है। तुम्हारे जैसा ही है; जल्दी पच जाता है; समान— धर्मा है।
आदमी वह भी करता है, बच्चे चुराए जाते हैं; होटलों में काटे भी जाते हैं। सारी दुनिया में पता है कि बच्चों का मांस बड़ी होटलों में बिकता है; और लोग बड़े स्वाद से उसका भोजन लेते हैं।
लेकिन इसके लिए तो कोई भी राजी न होगा। क्यों राजी नहीं होते? क्योंकि मनुष्य बहुत ज्यादा संवेदनशील है। उसको मारने में सवाल है। मारना भयंकर हिंसा है। और उस हिंसा को करने को जो राजी है, वह व्यक्ति बहुत तामसी है। भोजन के लिए दूसरे का जीवन छीनने को जो राजी है, उसके तमस का क्या कहना!
नहीं, वह तो कोई नहीं करता। या कभी लोग करते थे, तो बंद हो चुका है। पशुओं का मास चलता है।
लेकिन वे भी काफी संवेदनशील हैं। इसलिए जिनकी धार्मिक संवेदना और भी गहरी है, बुद्ध, महावीर, उन्होंने सिर्फ शाकाहार के लिए कहा। उन्होंने कहा, पशुओं को भी छोड़ दो। क्योंकि तुम मारते’ हो, काटते हो। भला तुम न काटो, कोई और तुम्हारे लिए काटे और मारे; लेकिन किया तो तुम्हारे लिए जा रहा है। तुम जानते तो हो कि भोजन के साधारण से स्वाद के लिए तुम जीवन की इतनी हिंसा कर रहे हो, तो तुम्हारे भीतर तमस बहुत गहरा है, तुम अंधे हो। तुम्हारी संवेदना समुचित नहीं है। तुम मनुष्य होने के योग्य नहीं हो।
इसलिए महावीर ने तो बिलकुल वर्जित किया। बुद्ध ने थोड़ी—सी शर्त रखी। वह शर्त भी बहुत कीमती है। बुद्ध ने कहा कि मरे हुए जानवर का मांस खा लेने में कोई हर्ज नहीं है।
बात तर्कयुक्त है। क्योंकि अगर मारने के कारण ही आदमी तामसी हो जाता है, तो मरे—मराए जानवर का मांस खाने में तो कोई हर्ज नहीं है। इसलिए बौद्ध मरे हुए जानवर का मांस खाने में मांसाहार नहीं मानते। गाय मर ही गई अपने से, हमने मारी ही नहीं, तब इसके मांस को खा लेने में क्या हर्ज है!
लेकिन कृष्ण इससे राजी नहीं हैं। यह मांसाहार बासा है। और बासा भोजन तामसी का है। और मरे हुए जानवर से ज्यादा बासी चीज तो तुम पा ही नहीं सकते दुनिया में। और बासी चीज क्या हो सकती है? जैसे ही जानवर मरता है, उसके सारे मांस और खून का गुणधर्म बदल जाता है। खून तो विलीन ही हो जाता है तत्‍क्षण। और मांस में सड़ने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। क्योंकि मांस तभी तक जीवित था, जब तक प्राण थे। प्राण के हटते ही मास सड़ने लगा; उसमें से दुर्गंध अभी आएगी जल्दी ही। तो वह तो बिलकुल ही बासा भोजन है।
इसलिए सिर्फ शूद्रों ने उसे स्वीकार कर लिया, भारत में चमार ही खाते हैं मरे हुए जानवर का। इसी वजह से जब डाक्टर अंबेदकर ने शूद्रों को आह्वान दिया बौद्ध होने का, तो उन्होंने इसको भी एक दलील बना लिया, कि चमार बौद्ध होने ही चाहिए। क्योंकि बुद्ध भगवान ने आज्ञा दी है मरे हुए जानवर का मांस खाने की और सिर्फ चमार खाते हैं। इससे सिद्ध होता है कि हो न हो, चमार प्राचीन समय में बौद्ध रहे होंगे। वे भूल गए हैं अपना बौद्ध होना।
तर्क बहुत दूर का मालूम पड़ता है। लेकिन सार उसमें हो सकता है। इसकी संभावना हो सकती है कि मांसाहार मरे हुए जानवर का करने के कारण हिंदुओं ने उस पूरे वर्ग को, जिसने ऐसा मांसाहार किया, शूद्र मान लिया हो। क्योंकि शूद्र की और तमस की कृष्ण की व्याख्या यही है।
बुद्ध ने एक कारण से आज्ञा दी, दूसरे कारण का उन्हें खयाल नहीं है। एक कारण से आज्ञा दी कि मरे हुए को मारा नहीं जाता, इसलिए कोई हिंसा नहीं है। लेकिन मरे हुए जानवर का मांस अति बासा हो गया, मुरदा हो गया, उसको खाने से गहन तमस पैदा होगा। उस तरफ बुद्ध की नजर चूक गई।
इसलिए मैं कहता हूं कि मांसाहार खुद में तो कोई पाप नहीं है, न बुरा है, न तमस है। सुपाच्य है; क्योंकि पचा—पचाया भोजन है। इसलिए तो सिंह एक बार भोजन करता है और फिर चौबीस घंटे की चिंता छोड़ देता है; उतना काफी है। काफी कनसनट्रेटेड भोजन है। थोड़ा—सा कर लिया, बहुत है।
किसी दिन अगर वैज्ञानिक सिंथेटिक मांस बना लेंगे—जों कि उन्हें बना लेना चाहिए जल्दी से जल्दी, जैसे शाकाहारी अंडा उपलब्ध है, ऐसे शाकाहारी मांस जल्दी ही उपलब्ध हो जाएगा—तब मांसाहार, मैं तुमसे कहता हूं शाकाहार से भी ज्यादा शाकाहारी होगा। क्योंकि न तो उसमें हिंसा होगी, न वह बासा होगा। इतनी भी हिंसा न होगी, जितनी फल को तोड्ने से होती है। महावीर ने तो अपने लिए यही नियम बना रखा था कि जो फल पककर गिर जाए, वही खाना है। या जो गेहूं पककर गिर जाए बाल से, वही खाना है।
एक बहुत बड़ा प्राचीन ऋषि हुआ, कणाद। उसका नाम ही कणाद इसलिए पड़ गया कि वह खेतों में जो कण अपने आप गिर जाएं पककर, और वह भी जब खेत की फसल काट ली जाए और किसान सब चीजें हटा ले, तो जो कण पीछे पड़े रह जाएं थोड़े—से गेहूं के, उन्हीं को बीनकर खाता था।
परम अहिंसक रहा होगा कणाद। पका हुआ गेहूं, जो अपने से गिर गया। और वह भी किसान से मांगकर नहीं; क्योंकि किसान पर भी क्यों बोझ बनना! जब पक्षी दाने बीनकर जी लेते हैं, तो आदमी भी ऐसे ही जी ले। तो कणाद का असली नाम क्या था, यही लोग भूल गए हैं। उसका नाम ही कणाद हो गया, कण बीनकर जीने वाला।
अगर कृत्रिम मांस बने, तो वह शाकाहार से भी शुद्ध शाकाहार होगा। लेकिन अभी जैसी स्थिति है, ये दो ही उपाय हैं। या तो जिंदा जानवर को मारकर खाया जाए; उस हालत में कृष्ण के साथ वह आहार राजसी होगा। कम से कम ताजा होगा। बुद्ध और महावीर के अनुसार हिंसात्मक होगा और तमस में ले जाएगा। और दोनों ठीक हैं। आधे—आधे ठीक हैं। दोनों एक—एक पहलू से ठीक हैं।
अगर मरे हुए जानवर को खाया जाए, तो कृष्ण के हिसाब से तामसी होगा, क्योंकि बासा और मुरदा हो गया। तंद्रा बढ़ाएगा, निद्रा लाएगा, मूर्च्छा बढ़ाएगा, शद्रता पैदा करेगा जीवन में। ब्राह्मणत्व का सत्व पैदा नहीं हो सकेगा। लेकिन बुद्ध के हिसाब से, कम से कम हिंसा नहीं होगी। तुम किसी को मारोगे नहीं, इतनी सदवृत्ति रहेगी। इतना तो कम से कम सत की तरफ आगमन होगा, सत्य की तरफ ऊर्ध्वगमन होगा।
मेरे हिसाब से, मांसाहार चाहे मुरदे का हो, चाहे मारे गए जानवर का हो, तमस में गिराएगा नब्बे प्रतिशत मौकों पर। दस प्रतिशत या नौ प्रतिशत मौकों पर रजस में दौड़ाएगा। एक ही प्रतिशत मौका है कि उससे कोई सत्व में उठ सके।
इसे थोड़ा समझना होगा। यह साफ है कि रामकृष्ण मांसाहारी थे; विवेकानंद भी। और फिर भी रामकृष्ण परम ज्ञान को उपलब्ध हुए। जैनों के लिए या सभी सांप्रदायिक लोगों के लिए तो बड़ी सुविधा है इन चीजों का उत्तर देने में। असुविधा मुझे है। जैन कह देंगे कि यह हो ही नहीं सकता कि वे ज्ञान को उपलब्ध हुए, बात खत्म हो गई। रामकृष्ण ज्ञान को उपलब्ध हो ही नहीं सकते। क्योंकि मछली खा रहे हैं; मांस खा रहे हैं; और ज्ञान को उपलब्ध हो जाएं?
यह बात ही खत्म हो गई। इसलिए जैनों के लिए कोई उत्तर देने का सवाल नहीं है। इसलिए जहां—जहां मांसाहार है, वहां—वहा ज्ञान की संभावना समाप्त हो गई।
हिंदुओं को भी कोई कष्ट नहीं है। क्योंकि वे कहते हैं, आत्मा मरती थोड़े ही है, काटने से भी थोड़े ही मरती है। तुमने मछली को मार दिया, सिर्फ आत्मा को देह से मुक्त कर दिया। दूसरा शरीर धारण कर लेगी। इसलिए कोई अड़चन नहीं है। रामकृष्ण ज्ञान को उपलब्ध हो सकते हैं।
अड़चन मुझे है, क्योंकि मैं मानता हूं कि रामकृष्ण ज्ञान को उपलब्ध हुए और वे मांसाहारी हैं। होना नहीं चाहिए वह हुआ। साधारण नियम के हिसाब से जो नहीं होना था, वह हुआ है। वे मांसाहार करते हुए परम ज्ञान को उपलब्ध हुए। इसलिए अड़चन मेरी है, तुम्हें समझ में नहीं आएगी।
मेरी अड़चनें बहुत गहरी हैं। सीधे उत्तर मेरे पास नहीं हैं, क्योंकि उत्तर मैं किसी सिद्धात को देखकर नहीं चलता। मैं स्थिति को देखता हूं। देखता हूं रामकृष्ण ज्ञान को उपलब्ध हुए और यह होना तो नहीं चाहिए; लेकिन हुआ है। इसलिए जाल थोड़ा जटिल है।
तब मुझे मेरी जो दृष्टि है, वह यह है कि रामकृष्ण अत्यंत शुद्ध पुरुष हैं। इसलिए इतनी थोड़ी—सी अशुद्धि उन्हें बाधा न डाल पाई। यह तुम्हारे खयाल में न आ सकेगा। अत्यंत शुद्ध पुरुष हैं। अगर तुम मुझे आज्ञा दो, तो मैं कहना चाहूंगा, महावीर से ज्यादा शुद्ध पुरुष हैं। महावीर अगर मांसाहार करते या मछली खाते, परम ज्ञान को उपलब्ध नहीं हो सकते थे। लेकिन रामकृष्ण हुए हैं।
इसका अर्थ केवल इतना ही है कि यह व्यक्ति इतना शुद्ध है कि इतनी—सी अशुद्धि इस पर कुछ बाधा नहीं डाल पाई। यह उस अशुद्धि के बावजूद भी पार हो गया।
ऐसा ही समझो कि पहाड़ पर तुम चढ़ते हो। तो पहाड़ पर चढ़ने का नियम तो यही है कि जितना कम बोझ हो, उतना ठीक। और अगर तुम मनों बोझ सिर पर लेकर चढ़ रहे हो, तो चढ़ना मुश्किल हो जाएगा। शायद तुम चढ़ने का खयाल ही छोड़ दोगे, या बीच के किसी पड़ाव पर रुक जाओगे।
लेकिन फिर एक बहुत शक्तिशाली मनुष्य, कोई हरक्यूलिस भारी वजन लेकर पहाड़ पर चढ़ रहा है और चढ़ जाता है। यह नियम नहीं है यह आदमी। यह हरक्यूलिस नियम नहीं है। यह इतना ही बता रहा है कि यह इतना शक्तिशाली पुरुष है कि उतना—सा वजन इसे चढ़ने में बाधा नहीं डालता। यह उस वजन के साथ चढ़ जाता है। तुम कमजोर हो, तुम उस वजन के साथ न चढ़ सकोगे। रामकृष्ण अपवाद हैं, नियम मत बनाना। निन्यानबे आदमियों को मांसाहार छोड्कर ही जाना पड़ेगा। महावीर, बुद्ध को जाना पड़ा है मांसाहार छोड्कर, तो तुम अपनी तो फिक्र ही छोड़ देना। तुम अपना तो हिसाब ही मत लगाना। अपनी तो गणना ही मत करना। तुम महावीर और बुद्ध से ज्यादा पवित्र आदमियों की कल्पना भी कैसे कर सकते हो! उनको भी छोड़ देना पडा। उनको भी लगा कि यह बोझ है। और यह बोझ अटकाएगा, यात्रा पूरी न होने देगा। यह गौरीशंकर तक नहीं पहुंचने देगा, बीच में कहीं पड़ाव बनाना पड़ेगा; थककर बैठ जाना पड़ेगा।
गौरीशंकर तक चढ़ते—चढ़ते तो सभी बोझ छोड़ देना होता है। सत्य की आखिरी ऊंचाई पर तो सब चला जाना चाहिए। यह नियम है। लेकिन कभी कोई जीसस, कभी कोई मोहम्मद और कभी कोई रामकृष्ण मांसाहार करते हुए भी वहा पहुंचे हैं। वे हरक्यूलिस हैं। उनका तुम ज्यादा विचार मत करो। उनसे तुम्हें कोई लाभ न होगा। तुम उनको अपवाद समझो।
और अपवाद सिर्फ नियम को सिद्ध करते हैं। अपवाद से अपवाद सिद्ध नहीं होता, सिर्फ नियम सिद्ध होता है। उससे केवल इतना ही पता चलता है कि यह भी संभव है अपवाद क्षणों में, कि कोई व्यक्ति इतना परम शुद्ध हो जाए कि मांसाहार कोई अशुद्धि पैदा न करता हो।
ऐसे शुद्ध पुरुष हुए हैं। जैसे कृष्ण हैं, कृष्ण ने ब्रह्मचर्य साधा, इसकी कोई खबर नहीं है। नहीं साधा, ऐसा लगता है। हजारों स्त्रियों के साथ राग—रंग चलता रहा। और कृष्ण फिर भी खंडित न हुए, नीचे न गिरे। उनके ऊर्ध्वगमन में कोई बाधा न आई। वे गौरीशंकर के शिखर पर पहुंच गए।
लेकिन इससे तुम मत सोचना कि यह नियम है। यह अपवाद है। तुम्हारे लिए तो ब्रह्मचर्य उपयोगी होगा। तुम्हारे पास तो शक्ति इतनी कम है कि तुम उसे ब्रह्मचर्य में न बचाओगे, तो तुम्हारे पास ऊर्ध्वगमन के लिए ऊर्जा न बचेगी।
कृष्ण के पास रही होगी बहुत ऊर्जा। कोई अड़चन न आई। सोलह हजार रानियों के साथ नाचते रहे। हजार—हजार प्रेम चलते रहे, कोई अड़चन न आई। यह सिर्फ अपवाद है।
और मेरी अड़चन तुम खयाल में रखो। क्योंकि मैं इन सब विपरीत लोगों में देखता हूं कि ये सब पहुंच गए। इसलिए मैं कहता हूं सिद्धात आदमियों से बड़ा नहीं है। और सिद्धात से आदमियों को कभी मत कसना। पहले आदमी को सीधा—सीधा देखना और फिर सिद्धात को उस पर कसना।
महावीर जो कहते हैं, वह निन्यानबे के लिए सही है। और निन्यानबे प्रतिशत लोग ही असली लोग हैं। रामकृष्ण अनुकरणीय नहीं हैं। उनका अनुकरण करोगे, तो तुम भटकोगे। अनुकरणीय तो बुद्ध और महावीर हैं। वे तुम्हें ज्यादा निकट तक गौरीशंकर के पहुंचा देंगे।
रामकृष्ण को मानकर तुम चलोगे, तो तुम मछली तो खाते रहोगे, मांसाहार तो करते रहोगे, रामकृष्ण कभी न हो पाओगे। और रामकृष्ण के मानने वाले वहीं भटक रहे हैं। रामकृष्ण के बाद एक भी रामकृष्ण की स्थिति में उपलब्ध नहीं हुआ, विवेकानंद भी नहीं। और सैकड़ों संन्यासी हैं रामकृष्ण के—कचरा, कूड़ा—कर्कट। क्योंकि वह रामकृष्ण अपवाद हैं। वह झंझट की बात है।
रामकृष्ण जैसे लोगों का धर्म नहीं बन सकता, बनना नहीं चाहिए। ये धर्म के बाहर हैं। ये सीमा के बाहर हैं। ये ट्रेसपासर्स हैं। ये ऐसे लोग हैं, जो पीछे के दरवाजे से बागुड़ तोड़कर न मालूम कहां—कहां से घुसते हैं, सीधे दरवाजे से नहीं। तुम्हें तो सीधे दरवाजे से ही जाना पड़ेगा।
इसलिए रामकृष्ण जैसे लोगों का कोई धर्म नहीं बनना चाहिए, कोई संघ नहीं बनना चाहिए। इनके पीछे रामकृष्ण मिशन जैसा कोई प्रचार नहीं होना चाहिए। क्योंकि ये आदमी अपवाद हैं, इनको अनूठा रहने दो। ये कोहिनूर हीरे जैसे हैं। इनकी भीड़ मत लगाओ। धर्म तो बनना चाहिए बुद्ध और महावीर जैसे लोगों का। उनका !, महासंघ होना चाहिए। करोड़—करोड़ उनके अनुयायी हों। जितने हों, उतने कम। क्योंकि उनसे निन्यानबे प्रतिशत को मार्ग मिलेगा। जीसस से लाभ नहीं हुआ ईसाइयों को। हो नहीं सकता। क्योंकि जीसस सभी कुछ स्वीकार करके जीते हैं। शराब भी पीते हैं; न केवल पीते हैं, बल्कि उसे उत्सव मानते हैं, धार्मिक उत्सव मानते हैं। जीसस जिस घर में मेहमान होते हैं, वहा बोतलें खुलती हैं, खाना—पीना चलता है। क्योंकि यह महोत्सव है जीवन का।
तो जीसस ने रास्ता खोल दिया जैसे सबको शराब पीने का। तो पश्चिम में किसी को समझाओ कि शराब गलत है, लोग हसेंगे कि पागल हो गए हैं! जीसस को गलत नहीं, तो हमें कैसे गलत? और कुछ न मानें जीसस में, कम से कम इतना तो मानते ही हैं। और बातें कठिन हों, मगर यह तो सरल है। इसका तो हम अनुगमन कर लेते हैं।
जीसस जैसे लोगों के पीछे धर्म नहीं होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य कि जीसस के पीछे दुनिया का सबसे बड़ा धर्म है। दुनिया में सबसे ज्यादा संख्या ईसाइयों की है। और सबसे कम संख्या जैनियों की है, महावीर के पीछे। कारण है इसमें भी। क्योंकि महावीर तुम्हारी कमजोरियों को जरा भी मौका नहीं देते। उनके साथ तुम्हें यात्रा ऊपर की करनी ही पड़ेगी। करनी हो, तो ही साथ चल सकते हो; न करनी हो, तो बहाना नहीं खोज सकते महावीर में। लेकिन जीसस के साथ न भी यात्रा करनी हो, तो भी तुम ईसाई रह सकते हो। मांसाहार करो, शराब पीओ, सब कर सकते हो और ईसाई भी हो सकते हो। सुविधा है। इसलिए ईसाइयत फैलकर बड़ा वृक्ष बन गई। महावीर तो खजूर के वृक्ष हैं; उनके नीचे छाया भी, छाया भी मुश्किल है।
मेरी कठिनाई यह है कि मैं पाता हूं इन सभी लोगों ने पा लिया। इसलिए तुम बड़ा सोच—समझकर चलना। तुम अपने पर ध्यान रखना। इसकी फिक्र छोड़ देना कि रामकृष्ण ने मछली खाकर पा लिया, तो हम भी पा लेंगे, मछली क्यों त्यागें? मछली और मोक्ष अगर साथ—साथ सधता हो, तो साथ ही साथ साध लें।
मछली ही सधेगी, मोक्ष न सधेगा। कभी—कभी अपवाद घटित होते हैं। वे इसलिए घटित होते हैं कि व्यक्ति की क्षमता पर निर्भर होता है, कैसी उसकी क्षमता है। कोई वेश्याघर में रहकर भी परम ज्ञान को उपलब्ध हो सकता है। तुम्हें तो मंदिर में रहकर भी उपलब्ध होगा, यह भी संदिग्ध है।
तुम अपना ही सोचना और अपने को ही देखकर विचार करना। और ध्यान रखना; क्योंकि मन बहुत चालाक है। वह रास्ते खोजता है गलत को करने के, और सही को करने से बचने के उपाय, तर्क खोजता है। उसी मन के कारण तो तुम भटक रहे हो जन्मों—जन्मों से। खूब भटक लिए; अब वक्त है और जाग जाना चाहिए।
ओशो
गीता दर्शन, भाग – 8

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ચશ્મા સાફ કરતાં ….
વૃદ્ધે પત્નીને કહ્યું :

હા પણ, બરાબર પાંચ ને પંચાવને હું દરવાજે …

આપણા સમયે મૉબાઇલ ન હતા…!!

પાણીનો ગ્લાસ ભરીને આવું ને

તમે આવતા…

હા, મેં ત્રીસ વરસ નોકરી કરી, પણ એ નથી સમજી શક્યો કે..

હું આવતો એટલે તું પાણી લઈને આવતી
કે
તું પાણી લઈને આવતી એટલે હું આવતો…??

હા યાદ છે, તમે રિટાયર થયા તે
પહેલાં ડાયાબિટીસ ન હતો
ત્યારે, હું જ્યારે તમને ભાવતી ખીર બનાવતી
ત્યારે તમે કહેતા કે….
આજે બપોરે જ ઑફીસમાં વિચાર આવેલો કે આજે ખીર ખાવી છે….

હા ખરેખર, મને ઑફીસથી આવતાં જે વિચાર આવતો એ ઘરે આવીને જોઉ તો અમલમાં જ હોય….

અને યાદ છે, તમને હું પ્રથમ પ્રસુતીએ મારા પિયર હતી, અને દુઃખાવો ઉપડ્યો, મને થયું તમે અત્યારે હોત તો કેટલું સારું…. અને કલાકમાં તો જાણે હું સ્વપ્ન જોતી હોઉં એમ તમે આવી ગયા….

હા, એ દિવસે મને એમ જ થયું લાવ જસ્ટ આંટો મારી આવું…

ખ્યાલ છે..??
તમે મારી આંખોમાં જોઇ કવિતાની બે લીટી બોલતા…!!

હા, અને તું શરમાઇને આંખો ઢાળી દેતી, એને હું કવિતાની લાઇક સમજતો…!!

અને હા, હું બપોરે ચા બનાવતાં સહેજ દાઝેલી,

તમે સાંજે આવ્યા અને ખીસ્સામાંથી બર્નૉલ ટ્યુબ કાઢીને મને કહેલું કે લે આને કબાટમાં મુક…

હા, આગલા દિવસે જ ફસ્ટઍઈડ ના બૉક્સમાં ખાલી થયેલી ટ્યુબ જોઇ એટલે ક્યારેક કામ લાગે એમ વિચારીને લાવેલો…

તમે કહો કે આજે છુટવાના સમયે ઑફીસ આવજે આપણે મુવી જોઇ બહાર જમીને આવીશું પાછા…

હા, અને તું આવતી ત્યારે બપોરે ઑફીસની રીસૅસમાં આંખો બંધ કરી મેં વિચાર્યું હોય એજ સાડી પહેરીને તું આવતી…

( પાસે જઈ હાથ પકડીને )
હા .. આપણાં સમયમાં મૉબાઇલ ન હતા…!!

સાચી વાત છે…
પણ..
આપણે બે હતા…!!

હા, આજે દીકરો અને એની વહુ એક મેકની જોડે હોય છે…

પણ ….

એમને ….

વાત નહિ, વૉટ્સએપ થાય છૅ,
એમને હુંફ નહિ, ટૅગથાય છૅ,
સંવાદ નહિ, કૉમૅન્ટ થાય છૅ,
લવ નહિ, લાઇક થાય છૅ,
મીઠો કજીયો નહિ, અનફ્રૅન્ડ થાય છે,
એમને બાળકો નહિ,
પણ કૅન્ડીક્રશ, સાગા, ટૅમ્પલ રન અને સબવૅ થાય છે ..

…….. છોડ બધી માથાકુટ…

હવે આપણે વાઇબ્રંન્ટ મોડ પર છીએ,,,

અને

આપણી બેટરી પણ એક કાપો રહી છૅ…….

ક્યાં ચાલી….?
ચા બનાવવા…

અરે, હું તને કહેવા જ જતો હતો કે ચા બનાવ…

હા …

હજું હું કવરૅજમાં જ છું,
અને મેસૅજ પણ આવે છે…!!

( બન્ને હસી ને…) હા પણ, આપણાં સમયમાં મૉબાઇલ નહોતા. . .!!!

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

▪️विश्व विजयी
भारतीय संस्कृति🚩


🔰सिन्धु घाटी की लिपि : क्यों अंग्रेज़ और कम्युनिस्ट इतिहासकार नहीं चाहते थे कि इसे पढ़ाया जाए! 🔰
▪️इतिहासकार अर्नाल्ड जे टायनबी ने कहा था – विश्व के इतिहास में अगर किसी देश के इतिहास के साथ सर्वाधिक छेड़ छाड़ की गयी है, तो वह भारत का इतिहास ही है।
भारतीय इतिहास का प्रारम्भ सिन्धु घाटी की सभ्यता से होता है, इसे हड़प्पा कालीन सभ्यता या सारस्वत सभ्यता भी कहा जाता है। बताया जाता है, कि वर्तमान सिन्धु नदी के तटों पर 3500 BC (ईसा पूर्व) में एक विशाल नगरीय सभ्यता विद्यमान थी। मोहनजोदारो, हड़प्पा, कालीबंगा, लोथल आदि इस सभ्यता के नगर थे।

पहले इस सभ्यता का विस्तार सिंध, पंजाब, राजस्थान और गुजरात आदि बताया जाता था, किन्तु अब इसका विस्तार समूचा भारत, तमिलनाडु से वैशाली बिहार तक, आज का पूरा पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान तथा (पारस) ईरान का हिस्सा तक पाया जाता है। अब इसका समय 7000 BC से भी प्राचीन पाया गया है।

इस प्राचीन सभ्यता की सीलों, टेबलेट्स और बर्तनों पर जो लिखावट पाई जाती है उसे सिन्धु घाटी की लिपि कहा जाता है। इतिहासकारों का दावा है, कि यह लिपि अभी तक अज्ञात है, और पढ़ी नहीं जा सकी। जबकि सिन्धु घाटी की लिपि से समकक्ष और तथाकथित प्राचीन सभी लिपियां जैसे इजिप्ट, चीनी, फोनेशियाई, आर्मेनिक, सुमेरियाई, मेसोपोटामियाई आदि सब पढ़ ली गयी हैं।

आजकल कम्प्यूटरों की सहायता से अक्षरों की आवृत्ति का विश्लेषण कर मार्कोव विधि से प्राचीन भाषा को पढना सरल हो गया है।

सिन्धु घाटी की लिपि को जानबूझ कर नहीं पढ़ा गया और न ही इसको पढने के सार्थक प्रयास किये गए।
भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद (Indian Council of Historical Research) जिस पर पहले अंग्रेजो और फिर कम्युनिस्टों का कब्ज़ा रहा, ने सिन्धु घाटी की लिपि को पढने की कोई भी विशेष योजना नहीं चलायी।

आखिर ऐसा क्या था सिन्धु घाटी की लिपि में? अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकार क्यों नहीं चाहते थे, कि सिन्धु घाटी की लिपि को पढ़ा जाए?

अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकारों की नज़रों में सिन्धु घाटी की लिपि को पढने में निम्नलिखित खतरे थे –

  1. सिन्धु घाटी की लिपि को पढने के बाद उसकी प्राचीनता और अधिक पुरानी सिद्ध हो जायेगी। इजिप्ट, चीनी, रोमन, ग्रीक, आर्मेनिक, सुमेरियाई, मेसोपोटामियाई से भी पुरानी. जिससे पता चलेगा, कि यह विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता है। भारत का महत्व बढेगा जो अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकारों को बर्दाश्त नहीं होगा।
  2. सिन्धु घाटी की लिपि को पढने से अगर वह वैदिक सभ्यता साबित हो गयी तो अंग्रेजो और कम्युनिस्टों द्वारा फैलाये गए आर्य- द्रविड़ युद्ध वाले प्रोपगंडा के ध्वस्त हो जाने का डर है।
  3. अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकारों द्वारा दुष्प्रचारित ‘आर्य बाहर से आई हुई आक्रमणकारी जाति है और इसने यहाँ के मूल निवासियों अर्थात सिन्धु घाटी के लोगों को मार डाला व भगा दिया और उनकी महान सभ्यता नष्ट कर दी। वे लोग ही जंगलों में छुप गए, दक्षिण भारतीय (द्रविड़) बन गए, शूद्र व आदिवासी बन गए’, आदि आदि गलत साबित हो जायेगा।
    कुछ फर्जी इतिहासकार सिन्धु घाटी की लिपि को सुमेरियन भाषा से जोड़ कर पढने का प्रयास करते रहे तो कुछ इजिप्शियन भाषा से, कुछ चीनी भाषा से, कुछ इनको मुंडा आदिवासियों की भाषा, और तो और, कुछ इनको ईस्टर द्वीप के आदिवासियों की भाषा से जोड़ कर पढने का प्रयास करते रहे। ये सारे प्रयास असफल साबित हुए।

सिन्धु घाटी की लिपि को पढने में निम्लिखित समस्याए बताई जाती है –
सभी लिपियों में अक्षर कम होते है, जैसे अंग्रेजी में 26, देवनागरी में 52 आदि, मगर सिन्धु घाटी की लिपि में लगभग 400 अक्षर चिन्ह हैं। सिन्धु घाटी की लिपि को पढने में यह कठिनाई आती है, कि इसका काल 7000 BC से 1500 BC तक का है, जिसमे लिपि में अनेक परिवर्तन हुए साथ ही लिपि में स्टाइलिश वेरिएशन बहुत पाया जाता है। लेखक ने लोथल और कालीबंगा में सिन्धु घाटी व हड़प्पा कालीन अनेक पुरातात्विक साक्षों का अवलोकन किया।
भारत की प्राचीनतम लिपियों में से एक लिपि है जिसे ब्राह्मी लिपि कहा जाता है। इस लिपि से ही भारत की अन्य भाषाओँ की लिपियां बनी। यह लिपि वैदिक काल से गुप्त काल तक उत्तर पश्चिमी भारत में उपयोग की जाती थी। संस्कृत, पाली, प्राकृत के अनेक ग्रन्थ ब्राह्मी लिपि में प्राप्त होते है।
सम्राट अशोक ने अपने धम्म का प्रचार प्रसार करने के लिए ब्राह्मी लिपि को अपनाया। सम्राट अशोक के स्तम्भ और शिलालेख ब्राह्मी लिपि में लिखे गए और सम्पूर्ण भारत में लगाये गए।
सिन्धु घाटी की लिपि और ब्राह्मी लिपि में अनेक आश्चर्यजनक समानताएं है। साथ ही ब्राह्मी और तमिल लिपि का भी पारस्परिक सम्बन्ध है। इस आधार पर सिन्धु घाटी की लिपि को पढने का सार्थक प्रयास सुभाष काक और इरावाथम महादेवन ने किया।
सिन्धु घाटी की लिपि के लगभग 400 अक्षर के बारे में यह माना जाता है, कि इनमे कुछ वर्णमाला (स्वर व्यंजन मात्रा संख्या), कुछ यौगिक अक्षर और शेष चित्रलिपि हैं। अर्थात यह भाषा अक्षर और चित्रलिपि का संकलन समूह है। विश्व में कोई भी भाषा इतनी सशक्त और समृद्ध नहीं जितनी सिन्धु घाटी की भाषा।
बाएं लिखी जाती है, उसी प्रकार ब्राह्मी लिपि भी दाएं से बाएं लिखी जाती है। सिन्धु घाटी की लिपि के लगभग 3000 टेक्स्ट प्राप्त हैं।
इनमे वैसे तो 400 अक्षर चिन्ह हैं, लेकिन 39 अक्षरों का प्रयोग 80 प्रतिशत बार हुआ है। और ब्राह्मी लिपि में 45 अक्षर है। अब हम इन 39 अक्षरों को ब्राह्मी लिपि के 45 अक्षरों के साथ समानता के आधार पर मैपिंग कर सकते हैं और उनकी ध्वनि पता लगा सकते हैं।

ब्राह्मी लिपि के आधार पर सिन्धु घाटी की लिपि पढने पर सभी संस्कृत के शब्द आते है जैसे – श्री, अगस्त्य, मृग, हस्ती, वरुण, क्षमा, कामदेव, महादेव, कामधेनु, मूषिका, पग, पंच मशक, पितृ, अग्नि, सिन्धु, पुरम, गृह, यज्ञ, इंद्र, मित्र आदि।
निष्कर्ष यह है कि –

  1. सिन्धु घाटी की लिपि ब्राह्मी लिपि की पूर्वज लिपि है।
  2. सिन्धु घाटी की लिपि को ब्राह्मी के आधार पर पढ़ा जा सकता है।
  3. उस काल में संस्कृत भाषा थी जिसे सिन्धु घाटी की लिपि में लिखा गया था।
  4. सिन्धु घाटी के लोग वैदिक धर्म और संस्कृति मानते थे।
  5. वैदिक धर्म अत्यंत प्राचीन है।
    हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन व मूल सभ्यता है, हिन्दुओं का मूल निवास सप्त सैन्धव प्रदेश (सिन्धु सरस्वती क्षेत्र) था जिसका विस्तार ईरान से सम्पूर्ण भारत देश था।वैदिक धर्म को मानने वाले कहीं बाहर से नहीं आये थे और न ही वे आक्रमणकारी थे। आर्य – द्रविड़ जैसी कोई भी दो पृथक जातियाँ नहीं थीं जिनमे परस्पर युद्ध हुआ हो।

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जब जब होय धरम कै हानी, बाढहिं असुर अधम अभिमानी,।
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा,
हरहि सदा भव सज्जन पीरा,।।
अपने धर्म पर विश्वास बनाए रखना,

कण कण में विष्णु बसें जन जन में श्रीराम,
प्राणों में माँ जानकी मन में बसे हनुमान।

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पंडित बिरजू महाराज


महाराज की शिष्यायें
घूंघरु बांध रहीं थी।।

पैर में पहले पाउडर लगाया गया था। पैर का मर्दन भी तरुणियों द्वारा श्रद्धाभाव से किया जा रहा था।

जानकी नाम की एक अप्सरा सदृश नृत्यांगना तभी नेपथ्य से बाहर आई।

उसका मृदुहास आज भी याद है।

रवीन्द्र सभागार, मुम्बई पूर्णतः सज्जित था।।

कार्यक्रम का मुख्य विषय था अमर क्रांतिकारी वैकुण्ठ शुक्ल ::::::::::::::

योगेन्द्र शुक्ल के भ्रातृज। गांव जलालपुर, थाना लालगंज।

जिला हाजीपुर।

बिहार :::::::::: वही वैकुण्ठ शुक्ल जिसने भगत सिंह की फांसी का बदला नरसिंह लीला द्वारा फणीन्द्रनाथ घोष का वध कर लिया था।
महाराज जी को यह विषय मैंने दिया था।

नृत्य का आधार एक महान् पुस्तक बनी थी::::::::

महावर्षाररांगाजल,

एक कालजयी रचना जो काल के महागर्त में समा गयी।

इस पुस्तक के लेखक थे विभूति भूषण सेन गुप्ता।

पुस्तक का विषय था गया जेल में वैकुण्ठ की फांसी की पूर्व रात्री।

उनका गायन।।
निनाद। विप्लव घोष।

अमार मरण मिलन ::::://// रवीन्द्र ठाकुर की कविता

जिसे वैकुण्ठ ने वैकुण्ठ गमन पूर्व गाया था। जिसे लेखक विभूति सेन ने सुना था।

दिल्ली में जब यह विषय महाराज को दिया था।

वे विश्रान्त भावुक मन से सुनते हुये बोले
बेटा, क्या कहूं
क्रांतिकारी की फांसी पर नृत्य।

वाह! आज धन्य हो गया।

तैयारी आरंभ हुई।
फांसी की रात्री, रवीन्द्र की कविता
दिनकर के कुछ गीत लाओ
तब बात बने।

महाराज ओज के साथ बोले।।
। हमने सुना दिया

विपथगा।।।।।

छूम छनन छनन झूम झनन झनन।।।।

वाह वाह!

गुरु ये कमाल हो गया ::////

नाचेंगे हम।
अरे गजब वाला। जय नटेश! का विषय दियो हो।

फांसी पर कत्थक!!
सुस्मिता! सुनो।।
जानकी को फोन करो :::::::
तैयार करो उसे:::::

आज दिव्यरुपा जानकी को हमने जी भर के देखा।

अनींद्यसुन्दरी। जैसे तिलोत्तमा।
महाराज बोले ::::यही हैं देवता आनंद । आज के सूत्रधार।

नृत्य के पहले प्रयाग शुक्ल को बोलना था।
शैक्षणिक भाषण हुआ। दर्शक बेमन से बगलें झांकते रहे।
नृत्य आरंभ होना था और मुझे वैकुण्ठ की वैकुण्ठगति पर बोलना था। साथ ही टैगोर और दिनकर की क्रांति लहरी कविता पर।

———– एक लहर सी उठी तालियों की। हम बोलते रहे।
महाराज और जानकी पग बांधे खग से खड़े हो अधिष्ठान पर ताली बजाते रहे। फिर आगे बढ़े। तालियों की गूंज गगनभेदी हो गई।।

अकल्पनीय ताल, लय, छंद, मुद्रा, गति, करविन्यास.

जानकी बनी विपथगामिनी, ओज और श्रृंगार की उर्जस्वित आभा बिखेर रही थी।
वैकुण्ठगति और हुंकार पर वृद्ध महाराज का पलटा और फांसी चढ़ रहे वैकुण्ठ शुक्ल की मृत्युविजयिनी लीला का नृत्य रुपांतरण भला कौन कर सकता था!!!!

जय दिनकर जय वैकुण्ठ जय रवीन्द्र जय बिरजू महाराज की ध्वनि सभागार में स्वर निनादनी बन गयी।
भावुक महाराज ने सस्नेह अंकभर दुलारा मुझे और हर्षित जानकी नेपथ्य के इस दृश्य को प्रलुब्ध साक्षिणी बन देखती रही।

आनन्द खूब नचवायो आज। आनन्द आ गया। नाचा बहुत पर आज सबैकुछ अलग रहा, ::::::

नमन महाराज जी।आज वैकुण्ठलोक अवश्य हर्षित होगा।।

नृत्य के युग का नहीं::::::::
, यह तो युगाब्द का अंत है।

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐भगवान के साथ एक नाता💐💐

बरसाना मे एक भक्त थे ब्रजदास।उनके एक पुत्री थी, नाम था रतिया। यही ब्रजदास का परिवार था।ब्रजदास दिन मे अपना काम क़रतेऔर शाम को श्री जी के मन्दिर मे जाते दर्शन करते और जो भी संत आये हुवे हो तै उनके साथ सत्संग करते। यह उनका नियम था।
एक बार एक संत ने कहा भइया हमें नन्दगांव जाना है। सामान ज्यादा है पैसे है नही नहीतो सेवक क़रलेते। तुम हम को नन्दगाँव पहुँचा सकते हो क्या? ब्रजदास ने हां भरली ।ब्रजदास ने कहागर्मी का समय है सुबह जल्दी चलना ठीक रहेगा जिससे मै 10 बजे तक वापिस आजाऊ।संत ने भी कहा ठीक है मै 4बजे तैयार मिलूँगा।
ब्रज दास ने अपनी बेटी से कहा मुझे एक संत को नन्दगाँव पहुचाना है। समय पर आ जाऊँगा प्रतीक्षा मत करना। ब्रजदास सुबह चार बजे राधे राधे करतै नंगे पांव संत के पास गये। सन्त ने सामान ब्रजदास को दिया और ठाकुर जी की पैटी और बर्तन स्वयं ने लाई लिये। रवाना तो समय पर हुवे लैकिन संत को स्वास् रोग था कुछ दूर चलते फिर बैठ जाते।इस प्रकार नन्दगाँव पहुँचने मे ही 11 बज गये। ब्रजदास ने सामान रख कर जाने की आज्ञा मांगी।संत ने कहा जून का महीना है 11 बजे है जल पी लो। कुछ जलपान करलो, फिर जाना। ब्रजदास ने कहा बरसाने की वृषभानु नंदनी नन्दगाँव मे ब्याही हुई है अतः मै यहाँ जल नही पी सकता। संत की आँखो से अश्रुपात होने लगा। कितने वर्ष पुरानी बात है ,कितना गरीब आदमी है पर दिल कितना ऊँचा है।

ब्रजदास वापिस राधे राधे करते रवाना हुवे। ऊपर से सूरज की गर्मी नीचे तपती रेत।भगवान को दया आगयी वे भक्त ब्रजदास के पीछैपीछै चलने लगे। एक पेड़ की छाया मेब्रजदास रुके और वही मूर्छित हो कर गिर पड़ै।भगवान ने मूर्छा दूर क़रने के प्रयास किये पर मूर्छा दूर नही हुई।भगवान ने विचार किया कि मेने अजामिल गीध गजराज को तारा द्रोपदी को संकट से बचाया पर इस भक्त के प्राण संकट मे हैकोई उपाय नही लग रहा है।ब्रजदास राधारानी का भक्त है वे ही इस के प्राणों की रक्षा कर सकती है ।उनको ही बुलाया जावे। भगवान ने भरी दुपहरी मे राधारानी के पास महल मे गये।राधा रानी ने इस गर्मी मे आने का कारण पूछा।भगवान भी पूरे मसखरे है।उन्होंने कहातुम्हारे पिताजी बरसाना और नन्दगाँव की डगर मे पड़ै है तुम चलकर संभालो। राधा जी ने कहा कौन पिताजी? भगवान ने सारी बात समझाई और चलने को कहा। यह भी कहा की तुमको ब्रजदास की बेटी की रूप मे भोजन जल लेकर चलना है।राधा जी तैयार होकर पहुँची। पिताजी पिताजी आवाज लगाई।
ब्रजदास जागे।बेटी के चरणों मे गिर पड़े आज तू न आती तो प्राण चले जाते।बेटी से कहा आज तुझे बार बार देखने का मन कर रहा है।राधा जी ने कहा माँ बाप को संतान अच्छी लगती ही है।आप भोजन लीजिये। ब्रजदास भोजन लेंने लगे तो राधा जी नेकहा घर पर कुछ मेहमान आये है मैउनको संभालू आप आ जाना। कुछ दूरी के बाद राधारानी अदृश्य हो गयी। ब्रजदास ने ऐसा भोजन कभी नही पाया।
शाम को घर आकर ब्रजदास बेटी के चरणों मे गिर पड़े। बेटी ने कहा आप ये क्या कर ऱहै है? ब्रजदास नेकहा आज तुमने भोजन जल ला कर मेरे प्राण बचा लिये। बेटी ने कहा मै तो कही नही गयी।ब्रजदास ने कहा अच्छा बता मेहमान कहॉ है? बेटी ने कहा कोई मेहमान नही आया। अब ब्रजदास के समझ मे सारी बात आई।उसनै बेटी से कहा कि आज तुम्हारे ही रूप मे राधा रानी के दर्शन हुवे।

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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