Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के साथ करीब 250 साल बाद बदली काशी की सूरत, जानें कुछ रोचक बातें
1/8 काशी विश्वनाथ मंदिर के बारे में जानिए सबकुछ🙏🌹
🙏🌹काशी विश्वनाथ मंदिर से गंगा को एकाकार करने वाला काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनकर तैयार हो गया है और अब करीब 250 साल बाद काशी नगरी को एक नई काशी से रुबरू होने का मौका मिला है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद मोदी इसे राष्ट्र को भेंट कर चुके हैं। इस ऐतिहासिक अवसर पर देश के जाने माने संत और साधुजन, शंकराचार्य, महामंडलेश्वर, श्री महंत सहित सनातन धर्म के सभी संप्रदायों के प्रमुख और गणमान्य लोग काशी में मौजूद रहे। वहीं, विश्‍वनाथ धाम के साथ सजकर तैयार पूरी काशी मंत्रोच्चार और शंखनाद से गूंजेगी।

2/8 एकबार फिर विश्वनाथ धाम में आया ज्ञानवापी कूप

करीब ढाई सौ साल पहले महारानी अहिल्याबाई के बाद अब विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार विश्‍वनाथ धाम के रूप में सामने आया है। वास्तविक रूप से धर्म नगरी में आने और आनंद कानन का अहसास कराने वाला चुनार के गुलाबी पत्थरों की आभा से दमकता विश्‍वनाथ धाम रिकॉर्ड समय यानी 21 महीने में बनकर तैयार हुआ है। मंदिर के लिए सात तरह के पत्थरों से विश्‍वनाथ धाम को सजाया गया है। यहां आने वाले श्रद्धालु रुद्र वन यानी रुद्राक्ष के पेड़ों के बीच से होकर बाबा विश्‍वनाथ का दर्शन करने पहुंचेंगे। 352 साल पहले अलग हुआ ज्ञानवापी कूप एक बार फिर से बाबा विश्वनाथ धाम परिसर में आ गया है।

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3/8 चारों प्रतिमाएं लगा दी गईं

विश्‍वनाथ धाम में आदि शंकराचार्य, महारानी अहिल्याबाई, भारत माता और कार्तिकेय की प्रतिमाओं को स्थापित करने का काम शनिवार रात से शुरू होकर रविवार सुबह तक पूरा हो गया। इसके लिए विशेषज्ञों की टीम लगी रही। घाट से धाम जाते समय सबसे पहले कार्तिकेय, इसके बाद भारत माता और फिर अहिल्‍याबाई की प्रतिमा लगी है। अंत में आदि शंकराचार्य की प्रतिमा है। प्रधानमंत्री के बाबा के दरबार मे जाने के लिए मंदिर चौक की सीढ़ियां नहीं उतरनी होगी। उनके लिए रैंप बना उसपर शेड भी लगाया गया है।

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4/8 मंदिर के इतिहास को संरक्षित करेगा काशी विद्वत परिषद

काशी विद्वत परिषद काशी विश्वनाथ मंदिर के इतिहास से संबंधित दस्तावेजों को संरक्षित करेगा। मुगल शासक औरंगजेब के फरमान से 1669 में आदि विश्‍वेश्‍वर के मंदिर को ध्वस्त किए जाने के बाद 1777 में मराठा साम्राज्य की महारानी अहिल्याबाई ने विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। इसके बाद वर्ष 1835 में राजा रणजीत सिंह ने मंदिर के शिखर को स्वर्ण मंडित कराया तो राजा औसानगंज त्रिविक्रम सिंह ने मंदिर के गर्भगृह के लिए चांदी के दरवाजे चढ़ाए थे।

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5/8 436 में तीसरी बार हुआ मंदिर का जीर्णाद्धार

काशी विश्‍वनाथ से संबंधित महत्वपूर्ण कालखंड पर नजर डालें तो औरंगजेब से पहले 1194 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने काशी विश्वनाथ मंदिर पर हमला किया था। 13वीं सदी में एक गुजराती व्यापारी ने मंदिर का नवीनीकरण कराया तो 14वीं सदी में शर्की वंश के शासकों ने मंदिर को नुकसान पहुंचाया। 1585 में एक बार फिर टोडरमल द्वारा काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया था। अब 436 साल में तीसरी बार मंदिर का जीर्णोद्धार विश्‍वनाथ धाम के रूप में हुआ है।

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6/8 दर्शन मात्र से होती है मोक्ष की प्राप्ति

मान्यताओं के अनुसार, काशी के बाबा विश्वनाथ के दर्शन मात्र से ही पापों से मुक्ति मिल जाती है और मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। शास्त्रों और पुराणों के अनुसार, जब संसार में प्रलय आएगी और पूरी सृष्टि का विनाश हो जाएगा तब काशी ही एकमात्र जगह होगी, जो सुरक्षित रहेगी। क्योंकि काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है। इसलिए देश-विदेश से भक्तजन मंदिर के दर्शन करने आते हैं। काशी में देवी मां का एक शक्तिपीठ भी स्थित है, जिससे इस जगह की पवित्रता और बढ़ जाती है।

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7/8 भगवान शिव और माता पार्वती का है प्रिय स्थान

ऐसी मान्यता है कि सृष्टि के निर्माण के समय काशी में ही भगवान शिव ने अपने शरीर से नारी शक्ति रूप में देवी आदिशक्ति को प्रकट किया था। यहीं पर भगवान विष्णु का प्राकट्य हुआ था। काशी के विषय में कहा जाता है कि इस स्थान को भगवान शिव स्वयं अपने त्रिशूल पर धारण करते हैं। 5 कोश में फैली काशी की भूमि को अविमुक्तेश्वर स्थान कहा जाता है, जो भगवान शिव की राजधानी है। कहते हैं रुद्र ने भगवान शिव से इस स्थान को अपनी राजधानी बनाने का अनुरोध किया था। दूसरी ओर देवी पार्वती को हिमालय पर रहते हुए मायके में रहने का अनुभव होता था और वह किसी अन्य स्थान पर अपना निवास बनाने के लिए भगवान शिव से अनुरोध करती थीं। ऐसे में भगवान शिव ने लंका में सोने की नगरी का निर्माण करवाया लेकिन यह नगरी रावण ने भगवान शिव से दक्षिणा में मांग ली। बद्रीनाथ में भगवान शिव ने अपना ठिकाना बनाया तो भगवान विष्णु ने यह स्थान शिवजी से ले लिया। तब भगवान शिव ने काशी को अपना निवास बनाया। कहते हैं भगवान शिव से पहले यह स्थान भगवान विष्णु का स्थान हुआ करता था। काशी विश्वनाश रूप में भगवान शिव ने स्वयं अपने तेज से विश्वेश्वर शिवलिंग को स्थापित किया था। यह स्वयंभू लिंग साक्षात शिव रूप माना जाता है। बताया जाता है कि जब भगवान शिव काशी में आ गए थे तब उनके पीछे-पीछे उत्तम देव स्थान, नदियां, वन, पर्वत आदि काशी में पहुंच गए थे।

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8/8 भगवान विष्णु ने की थी यहां तपस्या

शिव और काल भैरव की इस नगरी को सप्तपुरियों में शामिल किया गया है। काल भैरव को इस शहर का कोतवाल कहा जाता है और भैरव बाबा पूरे शहर की व्यवस्था देखते हैं। बाबा विश्वनाथ के दर्शन से पहले काल भैरव के दर्शन करने होते हैं तभी दर्शन का महत्व माना जाता है। काशी दो नदियां वरुणा और असी के मध्य बसा होने की वजह से इसका नाम वारणसी पड़ा। बताया जाता है कि भगवान विष्णु ने अपने चिंतन से यहां एक पुष्कर्णी का निर्माण कराकर लगभग पचास हजार साल तक तपस्या की थी। भैरव को भगवान शिव का गण और माता पार्वती का अनुचर माना जाता है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, काशी को दुनिया का प्राचीनतम प्राचीन शहर माना जाता है

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