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मम्मी फटक लूं खिचड़ी को लाली निकल गई’, ‘नहीं अभी नहीं निकली और चोट मार।’ इन दिनों की यादों में शामिल है भाभी का बार-बार फटकने पर ज़ोर देना और मम्मी का चोट मारने के लिए कहना। मेरी मां बाजरे की खिचड़ी को कुटवा-कुटवा कर सफ़ेद करवा देती, कहती – ‘खिचड़ी धौली पड़क कुटनी चाहिए, जितनी मेहनत लगेगी उतनी ही स्वादिष्ट बनेगी।’ बचपन से मैं सर्दियों में मम्मी का ये खिचड़ी बनाओ का लंबा कार्यक्रम देखती आई हूं। अब सभी गांव में एक साथ नहीं रहते, तो जो जहां भी जा बसा, मां वहीं खिचड़ी कुटवाकर भिजवाने की कोशिश करती हैं।
मधुरिमा
बाजरे की खिचड़ी का शौक़ मेरे घर में सभी को है। हमारे गांव में शाम के वक़्त खिचड़ी बनती है जिसे रात को गर्मा-गर्म घी, गुड़, शक्कर के बूरे आदि के साथ खाई जाती है और सुबह बची हुई खिचड़ी दही के साथ खाई जाती है।

शाम को तीन-चार बजे मां खिचड़ी कूटना शुरू करती। पहले बाजरे में थोड़ा पानी का छिड़का देती, फिर कूटना शुरू करती। ऊखल (ओखली) में मूसल से चोट मारते जाओ, एक व्यक्ति तो कूटेगा ही।

कई बार मम्मी भाभी या बड़ी बहन के साथ कूटतीं, शानदार नज़ारा होता, दो जन मूसल से बारी-बारी चोट मारते। बच्चों को पीछे की तरफ़ जाने की मनाही थी क्योंकि मूसल से चोट लग सकती थी। मैं हमेशा सोचा करती कि इनके मूसल आपस में टकराते क्यों नहीं हैं। और तो और मम्मी दो मूसलों की चोट के बीच खिचड़ी को ऊपर नीचे भी करती जाती, बाजरे का छिलका बाहर आता जाता, उसे मां लाली कहतीं। शुरुआत में एकदम काले रंग की लाली निकलती, मां छाजले (छाज) से फटककर सारी लाली बाहर करतीं। खिचड़ी दोबारा ऊखल में जाती, फिर से कूटी जाती, दूसरी बार की लाली का रंग थोड़ा भूरा होता।

मां बाजरे को मसलकर देखतीं छिलका पूरी तरह उतर गया या नहीं। साथ कूटने वाली चोट मारती थक चुकी होती सो कह देती निकल गया सारा छिलका फटक लो अब। पर मां थोड़ा और कूटने का आदेश दे देती। कूटते-कूटते मां को भी समझ आ जाता कि थोड़ी छूट दे दी जाए, तो कहतीं, ‘चल जा चूल्हा जलाकर पानी चढ़ा आ खिचड़ी के लिए, इतने में मैं कूटती हूं।’ दो बार छिलके को फटककर निकाल देने के बाद बाजरे को महीन कूटा जाता। आख़िर में मां जब संतुष्ट हो जाती तो कहतीं, ‘जा थाली ले आ कुट गई खिचड़ी।’

खिचड़ी कूटने के बाद हम सारे बच्चे मां के साथ चूल्हे के पास पहुंच जाते, बड़े से बर्तन में उबलते पानी में मां धीरे-धीरे खिचड़ी डालतीं। उस वक़्त ध्यान से काम करना होता नहीं तो खिचड़ी में गुठली पड़ने का डर रहता। खिचड़ी डालने के बाद मां चने की दाल और चावल मंगवाती, दोनों की एक-एक मुट्ठी डाल देतीं और नमक डालकर चाटू (लकड़ी का चम्मच) से चलाती रहतीं। खिचड़ी जैसे ही खदकने लगती मां कहती, ‘बच्चों दूर हट जाओ खिचड़ी लात मारेगी।’ उबलती हुई खिचड़ी में से गरमा-गरम खिचड़ी उछलकर किसी के हाथ या पांव पर गिर जाना किसी लात से कम न होता था। हम बार-बार पूछते कितनी देर में बनेगी, मां कहती ‘अभी कसर है।’ थाली में थोड़ी-सी खिचड़ी डालकर चने की दाल को दबाकर देखती थीं मां कि बनी या‌ नहीं। हम कई बार थोड़ी-थोड़ी खिचड़ी डलवाकर चाटते पर मां थोड़ी-सी ही डालतीं। कहतीं, ‘कच्ची है पेट दर्द हो जाएगा।’ खिचड़ी बनते ही हम बच्चे घी या मक्खन के साथ खाते।

मेरे बड़े पापा का खिचड़ी खाने का अंदाज़ सबसे अलग था। वे अपनी थाली में खिचड़ी के बीच जगह बनाते उसमें तिल का तेल डलवाते। मां लोहे की फूंकनी या चिमटे को चूल्हे में डाल देती थी, जब वो एकदम गर्म हो जाता तो खिचड़ी में डले तेल को उससे छुआया जाता, चड़ाचड़ की आवाज़ आती और हल्का धुंआ भी उठता। इसे तेल को पकाना कहा जाता है, खिचड़ी में तेल को मिलाकर बड़े पापा खाते। कई बार मैंने भी ये अनोखा स्वाद चखा था। गुड़, लाल वाली शक्कर, बूरा के साथ भी ये खिचड़ी मज़ेदार लगती। पापा तो थाली में थोड़ी-सी खिचड़ी बचती तब कहते- ‘जा थोड़ा दूध डलवा ला इसमें।’ सच कहूं तो रात के समय खिचड़ी तो एक थी लेकिन उसके स्वाद अनेक थे। हम बच्चों का छोटा-सा पेट किस-किस स्वाद को समेटे इसलिए कुछ स्वाद अगली बारी के लिए छोड़ दिए जाते। सुबह खिचड़ी ठंडी होती तो दही के साथ ही खाई जाती। अब जब मैं ख़ुद खिचड़ी बनाती हूं तो मां के जितनी स्वादिष्ट नहीं बन पाती।

फोन पर कूटने संबंधी बारीकियां मां से पूछती हूं तो कहती हैं- ‘इमामदस्ते में बाजरे का दाना फूट जाता है इसलिए छिलका पूरा नहीं निकल पाता और थोड़ी कड़वी बनती है।’ मेरी समस्या के समाधान के लिए मां ने मेरे लिए ऊखल ख़रीद लिया है और कह रही थी, ‘तेरे लिए एक हल्का मूसल बनवाऊंगी।’ मैंने कहा, ‘ज़रूर बनवा देना।’ मैं कल्पना करने लगी ऊखल में खिचड़ी कूटती मैं, आस-पास मंडराते बच्चे। हम फिर से जिएंंगे बचपन को। विरासत में मिला यह ‘खिचड़ी दर्शन’ तो रहेगा भले ही वो मिट्टी के चूल्हे पर न बनकर गैस के चूल्हे पर बनेगी पर बनेगी ज़रूर, वादा रहा।

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कहानी
अनोखा बन्धन (पिया का लॉक डॉउन)

जैसे ही विदा हुई वह बस में बैठी थी और बस चल पड़ी थी उसने पीछे मुड़ कर खिड़की से देखा, उसको विदा करके माँ पाप भाई भाभी सभी रो रहे थे ।छोटा सा बिट्टू भी रो रहा था।।उनको रोता देख उसकी रुलाई भी बढ़ती जा रही थी।जैसे जैसे बस आगे बढ़ी सब पीछे रह गए थे।उसका अपना घर अपने लोग
सब कुछ मानों पीछे छूटता जा रहा था।
जैसे जैसे बस चलती जा रही थी।
उसका बेबस मन मानों आगे ना बढ़ान चाह रहा हो ।घूंघट की ओट में से रीना के बहते आँसू उसको यादों के दायरे से बहार ही नही निकलने दे रहे थे।
माता पिता की देहरी भाई बहनों का प्यार सखियाँ सब कुछ उसको मानो आवाज दे रही थी।
माँ आज मुझकों तो छोले ही खाना है मैं नही खाऊँगी दाल रोज रोज वह पैर पटक कर बोली ।अच्छा ठीक है शाम को छोले पूरी बना दूँगी ,अभी तो खा लो बेटा मां की प्यारी मनुहार ।भैया मुझको घड़ी चाहिए मेरी सभी सहेलियों के पास है।
अच्छा बाबा अबकी बार ला दूँगा जैसे ही तनख्वाह मिलेंगी।
घर में छोटी होने के कारण अपनी हर फरमाइश वह रो कर और जिद्द करके मनवा लेती ।पापा की भी बहुत लाडली थी वह।उसको याद आ रहा था वो दिन जब वह पहली बार कॉलेज से एजुकेशन ट्रिप पर जाना चाहती थी ,और पापा उसको अपने से दूर इतनी दूर नही भेज रहे थे ।नही गुड़ियां तुम नही जाओगी कैसे रहोगीं तुम वहां कौन ध्यान रखेगा तुम्हारा।पर बहुत जिद्द करके औऱ भैया के समझाने के बाद ही पापा ने उसकों भेजा था।और आज उसको एक नए घर में आसानी से भेज दिया अनजान लोगों के भरोसे। वह रोती ही जा रही थी।
वही पापा की प्यारी गुड़ियां आज सब को छोड़ कर एक नए परिवार नयें माहौल नए लोगों के साथ जा रही है।
जिन लोगों के बिना वह एक पल नही रह सकती थी, आज उन्हीं से दूर जा रही है।
कैसे रहेगी वह सबके बिना, वह रोती ही जा रही थी।तभी उसके पास बैठे अमित ने धीरे से उसका हाथ अपने हाथों में लेकर धीरे से सहलाया ।जैसे वह कहना चाह रहा हो कि मैं हर पल तुम्हारें साथ हूँ। उसके प्यार भरे स्पर्श से उसको एक पल को अच्छा लगा ,अब वह रोते हुए ही नींद के आगोश में जा चुकी थी।
चलो भाभी उतरो घर आ गया अचानक किसी ने हिलाया तो वह चौक कर उठ गई। उसकी ननद उसको उठा रही थी
देख तो उसका नया आशियाना आ चुका था।
शुरू के दो तीन दिन तो उसको अपने घर की बहुत ही याद आयी ।पर सब लोगो का व खास तौर पर पति अमित का व्यवहार उसका प्यार व हर पल उसका ध्यान रखना सब कुछ उसको अच्छा लगने लगा।उसको अमित से मिलकर ऐसा लगने लगा था कि जैसे उसकी जन्मों की पहचान हो। दो दिनों बाद ही वह लोग हनीमून पर शिमला कुल्लुमनाली निकल गए थे। वहाँ की हरी भरी वादियाँ बर्फ से ढके पहाड़ो पर नीचे आते बादल और अमित का साथ वो दस दिन कैसे निकल गए उसको पता नही चला।अमित मानों उसकी जिंदगी ही हो चुका था ।वह सभी को भूल गयी थी उसमें इतना खो चुकी थी।और अमित का भी यही हाल था। दस दिन बाद जब वह लौट कर आएं
तब आते ही सास बोली बेटा रीना के पापा पगफेरा के लिए रीना के भाई राजा को भेज रहे है पहला पगफेरा है मुहूर्त से होता है।
अमित बोले ठीक है मम्मी ।
रात को अमित और रीना दोनो ही उदास एकदूसरे की बाहों में खो गए थे।कल तुम चली जाओगी मैं कैसे रह पाऊँगा जानू अमित बोला। रीना ने प्यार से उसके बालो को सहलाने लगी और बोली मैं भी अब आपके बिना रहने का सोच नही सकती अब। कभी नही सोचा था चंद दिनों में जिंदगी इतनी खूबसूरत व हसीन लगने लगेगी ।आपका साथ पाकर हर एक पल इतना सुंदर लम्हा बन जाएगां।
मैं भी आपके बिना रह पाऊँगी क्या वह उसकी छाती में सिर छुपाते हुए बोली।अमित ने उसको बाहों में इस तरह कस लिया मानो अब दूर नही जाने देगा।
दूसरे दिन ही राजा आ गया था ।भैया को देख वो एकदम गले लगा गयी थी।सब कैसे है भैया। माँ पाप सब याद करते है ना भाभी बिट्टू।अरे भाई तुम चल तो रही हो सबसे मिल लेना । तुम्हारें बिन घर भर उदास है गुड़िया ।
उसकी तैयारी हो चुकी थी जाने की।
वह कपड़े बदलने जब कमरे आयी तो अमित ने पीछे से आकर उसको बाहों में भर लिया था।जल्दी आ जाओगी ना ।रीना रो पड़ी थी तुमको छोड़ कर जाने को मन नही कर रहा पर तुम जल्दी से लेने आ जाना मैं इंतजार करुँगी औऱ अमित को चूम लिया था।
बेटा जल्दी करो बस का समय हो रहा है।
जी पापा बस आ रहे है।
रीना ने बाहर आकर सबके पैर छुए।
सास उसको गले लगाकर बोली बेटा जल्दी आ जाना घर में सूना लगेगा तुम्हारें बिना।
वह सास के गले लग रो पड़ी उसको आज एक और माँ मिल गयी थी। हाँ मां
अमित छोड़ने के लिए बस स्टैंड पर आया था।
वह जैसे ही बस में बैठी अमित उससे बोला अपना ध्यान रखना।
और उतर गया था खिड़की पर आकर उसको हाथों में डेरीमिल्क चॉकलेट रख दी थी जो कि उसको बहुत पसंद थी।
और एक फ्लाइंग किस दिया।बस अब चल रही थी और वह आज एक बार फिर खिड़कीं से बाहर अमित को देख कर रो रही थी।उस दिन उसको अपने माँ पापा भैया भाभी सबको छोड़ कर रोना आ रहा था।और आज वह रो रही थीअपने प्रियतम की जुदाई में जिसके साथ वह चंद दिनों पहले ही एक प्यारें बन्धन में बंधी थी। सोच रही थी चंद दिनों में ये कैसा अनोखा प्यार बन्धन बन गया है, की आज का ये रिश्ता
मायके के पच्चीस साल के सबके रिश्तों पर भारी पड़ रहा है।

मंगला श्रीवास्तव
इंदौर स्वरचित मौलिक कहानी 🙏✍️✍️🙏

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દર્દ

સવારના સમયે મનહરભાઈ જાહેર ઉદ્યાનમાં એક ઝાડ નીચે ગોઠવેલ બાંકડા પર એમની ડાયરીમાં કંઈક લખી રહ્યા હતા.ખાસ્સા સમયની મહેનત પછી લખેલું એ પાનું એમણે ફાડીને ડૂચો વાળીને ફેંકી દીધું અને ત્યાંથી ધીમે ધીમે ચાલતા થયા.બાગના દરવાજે પહોંચીને વળી પાછા વળ્યા.જે બાંકડે બેઠા હતા ત્યાં આવીને જોયું તો ડૂચો દેખાયો નહીં. વળી એમણે વિચાર્યું, જરૂર કોઈ સારા માણસે કાગળનો ડૂચો કચરાપેટીમાં નાખી દીધો હશે.જાહેરમાં ડૂચો ફેંકવા પર મનહરભાઈને આફસોસ થયો….મનહરભાઈ ચાલતા થયા.
એ કાગળનો ડૂચો કોઈએ કચરાપેટીમાં તો નહોતો નાખ્યો પરંતુ મનહરભાઈની સોસાયટીમાં જ રહેતા અને એમના મકાનથી ચાર મકાન દૂર રહેતા એમના પાડોશી સંજયે ઉપાડી લીધો હતો.
ડુચો ખોલીને સંજય એમાં લખેલ લખાણને વાંચવા લાગ્યો.જેમ જેમ વાંચતો ગયો તેમ તેમ એની આંખો ભીની થતી ગઈ.શું હતું એવું લખાણ એમાં? બાધા પૂજાઓ બહું કરી: આખર રીઝ્યા કિરતાર, આશા પુરી કરી વ્હાલે: દીધો ખોળાનો ખુંદનાર. લડાવી લાડ કર્યો મોટો: સિંચ્યાં શિક્ષણ સંસ્કાર, ઈચ્છા એક જ હતી હૈયે: થશે ઘડપણનો આધાર. ઉજાળશે નામ અમ તણાં: કરીને પરમારથ કાજ,

સેવ્યા હતા ઉંચા મનોરથ:
સમાજે થશે સરતાજ.
ના થયું કંઈ ધારેલું ઉરે:
કાં કપાતર પાક્યો તું તન?
છતા ધન દોલતે આજે:
વેરાન લાગે છે જીવન.
માત જીવે મુરઝાઈને તારી:
બાપને વેદના ના જીરવાય,
પેટને જણ્યેય વાંઝીયા જેવાં:
ના કહેવાય કે સહેવાય. મનહરભાઈ અને દમયંતીબેનનો સુખી સંપન્ન પરિવાર.મનહરભાઈ ઉંચા હોદ્દાના સરકારી નોકરીયાત.દમયંતીબેન પણ સરકારી નોકરીયાત.ગામડે પોતાના ભાગની પચાસ વિઘા જમીનેય ખરી.નોકરીને કારણે શરૂઆતથી જ શહેરમાં રહેવાનું થયું.લગ્નના સાત વરસ પછી દિકરાનો જન્મ થયો.આખા પરિવારમાં આનંદ આનંદ થઈ ગયો. મનહરભાઈ અને દમયંતીબેન-બન્ને વિશાળ હ્રદયનાં માનવી.સેવાધર્મને પાળનાર દંપતિ સેવાકાર્યોમાં કાયમ મોખરે.ગામડાની જમીનની ઉપજ તો કાયમ ભાઈઓને જ હવાલે. બાળપણથી જ પુત્ર મનોરથને લાડકોડની સાથે ઉતમ શિક્ષણની વ્યવસ્થા કરવામાં આવી.ઈંગ્લીશ મીડીયમમાં ઉંચા ટકે ગ્રેજ્યુએટ થઈને ઉંચી પદવી માટે મનોરથ અમેરિકા ગયો.બસ,વિદેશની માયા લાગી ગઈ.લગ્ન પણ ગુજરાતી છોકરી સાથે ત્યાં જ કરી ને અમેરિકા જ સ્થાયી થઈ ગયો. લગ્ન કરીને તરત જ માતાપિતાને મળવા એકલો વતનમાં જરૂર આવ્યો પરંતુ મનહરભાઈ અને દમયંતીબેનને આવીને કહ્યું, 'ડેડી!મમ્મી! સોરી.... લગ્નના ખોટા ખર્ચામાંથી બચી જવાય એટલે મેં એકલે એકલે લગ્ન કરી લીધાં.મારી વાઈફને લઈને એકવાર જરૂર આવીશ. અત્યારે તો મારે મકાન માટે રૂપિયા જોઈએ છે,એટલે ઈન્ડિયા આવ્યો છું. દમયંતીબેન બોલ્યાં,'રૂપિયા તો તને આપીશું જ બેટા! પરંતુ વહુને એકવાર કુળદેવીનાં દર્શન કરાવવા ગામડે લઈ જવી પડે એ નિયમ આપણાથી ના ભુલાય બેટા.' 'સોરી મોમ! પરંતુ મારી વાઈફ એ ગામડાનાં આંટી અંકલનાં ફેમીલી જુએ તો એને બધાં પુઅર લાગે.એનો જન્મ જ અમેરિકામાં થયો છે.જો આ એનો ફોટો.કેટલી લેટેસ્ટ છે માય વાઈફ! (મોબાઈલમાં ફોટો બતાવે છે).હાં મોમ! તારી ઈચ્છા જ છે તો હું અમેરિકા જઈને વીડીયો કોલ કરીશ.તું ગામડે જજે.વીડીયો કોલથી માય વાઈફને માતાજીનાં દર્શન કરાવી દઈશ બસ!' આ બધું સાંભળીને મનહરભાઈના પગ નીચેથી જમીન સરકી રહી હતી.શરીરે પરસેવો વળી રહ્યો હતો.એક મોટા અધિકારી એવા બાપને દિકરાની ચર્ચા સાંભળીને જમીન આસમાન એક થઈ રહ્યાં હતાં.અમેરિકામાંય ગીતા, રામાયણના પાઠ થાય છે.ભારતની સંસ્કૃતિને ત્યાં રહેતો આપણો સમાજ હજી ભુલ્યો નથી અને આ દિકરો શું બકે છે?આ બધું ક્યાંથી શીખ્યો આ કૂળદીપક? મગજની કમાન છટકે એ પહેલાં મનહરભાઈ વચ્ચે બોલી ઉઠ્યા, 'કેટલા રૂપિયા જોઈએ છે મનોરથ?' 'જુઓને ડેડી !આમ તો તમે બન્ને જણ નોકરીયાત છો એટલે જે કંઈ બચત છે એ આપી દો.પગાર તો મન્થલી આવવાનો જ છે ને! અને હા! જો મેડીક્લેમ ના હોય તો જરૂર લઈ લેજો.આજની ફાસ્ટ લાઇફમાં ક્યારે શું થાય એ કહેવાય નહી એટલે આકસ્મિક ખર્ચ માટે એ જરૂરી છે.,' મનહરભાઈની આંખો લાલાશ પકડી રહી હતી એ દમયંતીબેનને ધ્યાને આવતાં જ એમના બે હાથ જોડાઈ ગયા.મનહરભાઈ સમસમીને બેસી રહ્યા. પચાસેક લાખની બચત અમેરિકન કરન્સીમાં ટ્રાન્સફર કરીને મનહરભાઈ અને દમયંતીબેનને "બાય"કહીને ઉપડી ગયો મનોરથ અમેરિકા...... મનહરભાઈ અને દમયંતીબેને ઘણું મનોમંથન કર્યું પરંતુ દિકરો આવો કેમ પાક્યો એનો તાળો ના મળ્યો.ગામડે કુટુંબ પરિવારને પણ બધી જાણ થઈ ચુકી હતી તો સોસાયટીમાંય ઘણાંને આછી પાતળી ખબર હતી જ પરંતુ આ સેવાભાવી દંપતિને સૌ સ્વમાનની નજરે જ જોતું હતું. મનહરભાઈનો કાયમનું મોર્નિંગ વોક અને બગીચામાં જઈને થોડી હળવી કસરત કરવાનો નિર્ણય જળવાઈ રહ્યો હતો પરંતુ મનથી ભાંગી પડ્યા હતા.બાળપણથી જ લેખનનો શોખ ધરાવતા મનહરભાઈ કાયમ ડાયરી સાથે જ રાખતા. પુત્ર વિષે લખતાં તો લખી દીધું પરંતુ છેવટે તો બાપનો જીવ ને! એટલે જ લખેલું એ પાનું ફાડીને ડૂચો વાળીને ફેંકી દીધું હતું........... સંજય બાળપણથી અનાથાશ્રમમાં ઉછરેલો પછી એનાં માબાપ કોણ એ તો એને ક્યાંથી ખબર હોય? અનાથાશ્રમમાં રહીને જ ભણ્યો અને કુદરતે એની જીંદગીને આબાદ બનાવી દીધી.નોકરીએ મળી અને અનાથાશ્રમમાં જ ઉછરેલી એક પગે સામાન્ય ખોડંગાતી પત્નિ પણ મળી.બન્ને પતિ પત્ની અત્યારે મનહરભાઈની સોસાયટીમાં જ એમના પોતાના મકાનમાં રહેતાં હતાં.સંજય પણ સવારે વોક અને બગીચે કસરત કરવા નિયમિત જતો.ઘણીવાર મનહરભાઈ સાથે એની વાતચીત થતી.મનહરભાઈ સંજયની જીવનકથની જાણી ચુક્યા ત્યારથી તેમને સંજય પ્રત્યે વિશેષ લાગણી હતી.અઠવાડિયે એકાદવાર બન્ને સાથે કોફી જરૂર પીવે. ધીમે ધીમે બન્ને વચ્ચે આત્મીયતા વધતી ગઈ.એમાંય જ્યારે મનહરભાઈના એકના એક દિકરા મનોરથ વિષે બધું જાણવા મળ્યું ત્યારે આ અનાથ સંજયને મનહરભાઈ માટે કંઈક કરી છુટવાની જિજીવિષા થઈ ઉઠી. એટલે જ છેલ્લા સમયથી સંજય મનહરભાઈને થોડા ખુશ કરવાના પ્રયત્નો જરૂર કરતો. રવિવારના દિવસે સંજય અને એની પત્ની મમતા મનહરભાઈના ઘેર આવી ચડ્યાં.મનહરભાઈ અને દમયંતીબેન આજનું છાપું વાંચી રહ્યાં હતાં.બન્ને જણ મનહરભાઈ અને દમયંતીબેનને વંદન કરીને ઉભાં રહ્યાં.દમયંતીબેને બન્નેને આવકાર આપીને બેસવાનું કહ્યું.મનહરભાઈએ કહ્યું, 'અરે સંજય! આમ અચાનક!બોલ ભાઈ, કંઈ કામકાજ હોય તો કહે.' સંજયે બગીચામાંથી મળેલ કાગળ મનહરભાઈના હાથમાં મુક્યો અને કહ્યું, 'માફ કરજો સાહેબ! અમને થોડી ઘણી તો મનોરથભાઈ વિષે જાણ હતી.આપની સતત ઉદાસી અમને કોરી ખાતી હતી પરંતુ અમે તમારી આગળ કંઈ બોલી શકતાં નહોતાં.આજે આ લખાણ અમને અહીં ખેંચી લાવ્યું છે. માબાપનો પ્રેમ કેવો હોય એ અમે બન્ને અભાગીયાંએ તો જોયો નથી પરંતુ બાળકો માટે માબાપની વેદના કેવી હોય એ હું છેલ્લા સમયથી અનુભવી રહ્યો છું.અમે બન્ને આપને એક વિનંતી કરવા આવ્યાં છીએ.અમે તમારાં દિકરો દિકરી બનીને તમારી સેવા કરવા માંગીએ છીએ.અમને નિરાશ ના કરતાં.અમનેય માબાપનો પ્રેમ કેવો હોય એ અનુભવવું છે.' મનહરભાઈએ કાગળ પર નજર ફેરવીને દમયંતીબેનને આપ્યો.દમયંતીબેને લખાણ ધ્યાનથી વાંચ્યું.મનહરભાઈની લખાયેલ વેદના હતી એ જાણતાં દમયંતીબેનને વાર ના લાગી. મનહરભાઈએ દમયંતીબેનને કહ્યું, 'લખતાં તો લખાઈ ગયું પરંતુ છેવટે તો એક બાપ છું ને! માવતર કમાવતર થોડાં થાય! -બસ, એટલે જ તો લખીનેય થોડો પસ્તાવો થતાં ફાડીને ફેંકી દીધું.પરંતુ એના લીધે જ તો આજે એકસાથે દિકરો અને દિકરી -બે મળી ગયાં.' મમતાએ બધું જ ઘરકામ ઉપાડી લીધું.મનહરભાઈ અને દમયંતીબેન નિવૃત થઈ ગયાં.વતનમાં જઈને ઠરીઠામ થવાનો વિચાર કરી જોયો પરંતુ પુત્રનું વર્તન સમાજમાં નીચાજોણા સમાન હોઈ અહીં જ રહેવાનું યોગ્ય લાગ્યું. લગ્નના ત્રણ વર્ષ પછી મનોરથને ત્યાં પુત્રનો જન્મ થયો.એ વખતે દમયંતીબેને સમાચાર મળતાં જ આખી સોસાયટીમાં મીઠાઈ વહેંચી હતી.પુત્ર મનોરથને પૌત્રને એકવાર અહીં લઇને આવવાની ફોન પર વિનંતી પણ કરી હતી પરંતુ મનોરથે મમ્મીને સંભળાવી દીધું કે, 'મોમ! પ્રિન્સ થોડો મોટો થશે ત્યારે જરૂર ઈન્ડિયા લઈને આવીશ. અત્યારે તો ખોટું હેરાન થઈ જવાય. 'આજ સુધી મનોરથ બે વખત ભારત આવી ગયો.મનહરભાઈ અને દમયંતીબેનની નિવૃત્તિ વખતે માત્ર મળેલ ગ્રેજ્યુએટીનાં નાણાંનો ભાગ પડાવવા પરંતુ પત્નિ અને દિકરા સાથે તો નહીં જ. ફોન પર ઔપચારિક સમાચાર તો જરૂર લેવાય. વીડીયો કોલથી વહુને કુળદેવીનાં દર્શન પણ કરાવેલ દમયંતીબેને.એ વખતે દિયર જેઠનાં દિકરા દિકરીઓએ ઘણી હોંશથી "કેમ છો ભાભી?"કહેલું પરંતુ "હાય! એવરી બડી "કહીને ફોન મુકાઈ ગયેલો.દમયંતીબેનની હાલત તો એ વખતે જોયા જેવી થયેલી. હા, આજ સુધી મનહરભાઈએ ફોન પર દિકરા સાથે વાત નથી જ કરી પરંતુ "કેમ છે દિકરો,પુત્રવધૂ અને પૌત્ર? "-એટલું દરેક ફોન વખતે જરૂર પુછ્યું છે દમયંતીબેનને........ પ્રિન્સ બાર વર્ષનો થઈ ગયો.મનોરથ અને એની પત્નિ હવાઈ સફર કરી રહ્યાં.એ વિમાન સમુદ્રમાં તૂટી પડ્યું. પ્રિન્સ સાથે નહોતો એ એનાં નસીબ.ઘણા। બધા મુસાફરોની ડેડ બૉડી હાથ ના લાગી એમાં મનોરથ અને એની પત્નિ પણ સામેલ હતાં. દુર્ઘટનાના ત્રીજા દિવસે મનહરભાઈને સમાચાર મળ્યા.દમયંતીબેન અને મનહરભાઈ સાવ પડી ભાગ્યાં."એક દિવસ તો સૌ સારૂ થશે જ"-એ આશા પણ ઠગારી નિવડી.ભગ્ન હ્રદયે સરકારી વિધિ પતાવીને મનહરભાઈ અમેરિકા પહોંચ્યા પૌત્ર પ્રિન્સને લેવા માટે. પુત્ર મનોરથના ભાડાના મકાનમાં દિવાલ પર મનોહર અને એની પત્નીની તસવીર લટકતી હતી.એની ઉપર ચિતરામણ કરીને લખેલું હતું "એન્જોય લાઈફ." જોઈને ઝળઝળિયાં આવી ગયાં મનહરભાઈની આંખોમાં.ત્યાં જ ગુજરાતી આડોશી પાડોશીઓ વચ્ચે રાહ જોઈને બેઠેલો અદ્લ મનહરભાઈ જેવો જ બારેક વર્ષનો છોકરો દેખાયો.મનહરભાઈએ સૌને પોતાની ઓળખાણ આપીને કહ્યું, 'આ મારો પૌત્ર પ્રિન્સ છે ને? ' ઉભેલાં પરિવારોમાં અરેકારો થઈ ગયો.શુ,સગા દાદા એમના પૌત્રને નહીં ઓળખતા હોય? મનહરભાઈ પાસે એનો જવાબેય ક્યાં હતો!તેઓ તો સૌનો આભાર માની, સૌ વિધિ વિધાન સંપન્ન કરી પૌત્રને લઈને ભારત આવવા નિકળી ગયા. ઘેર આવીને દમયંતીબેન,સંજય, મમતા અને પૌત્ર પ્રિન્સને સાથે લઈને મનહરભાઈ ઉપાડયા વતનના ગામડે. કુળદેવીના મંદિરે જઈને મનહરભાઈ બે હાથ જોડીને કરગરી પડ્યા,'હે મા! ધન, દોલત કંઈ ના આપે તો વાંધો નથી પરંતુ આ મારા પૌત્રને સંસ્કાર જરૂર આપજે મા!

બાર વર્ષની ઉંમરમાં પ્રથમવાર પથ્થરની પ્રતિમા સામે રડતા એક માનવીને પ્રિન્સ સજળ નયને જોઈ રહ્યો હતો.એના મનમાં કુતૂહલ સર્જાયું હતું પરંતુ માત્ર છ મહિનાના ટુંકા ગાળામાં એ સમગ્ર પરિવારનો લાડકો બનીને ઘરના મંદિરીયે સમૂહ પ્રાર્થના ગવડાવતો થઈ ગયો હતો.

લેખન-નટવરભાઈ રાવળદેવ થરા.

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माँसाहारी या शाकाहारी
कैसे पहचानेंगे??

असम में एक शिशु मन्दिर में जाना हुआ तो बच्चों में बड़ा उत्साह था जैसे किसी जादूगर के आने पर होता है,,

बात शुरू हुई तो मैंने बच्चों से पूछा – आप लोग कहीं जा रहे हैं, सामने से कोई कीड़ा मकोड़ा या कोई साँप छिपकली या कोई गाय भैंस या अन्य कोई ऐसा विचित्र जीव दिख गया जो आपने जीवन में पहले कभी नहीं देखा, तो प्रश्न यह है कि आप कैसे पहचानेंगे कि वह जीव अंडे देता है या बच्चे? क्या पहचान है उसकी?

बच्चे मौन रहे बस आंतरिक खुसर फुसर चलती रही…..

मिनट दो मिनट बाद मैंने ही बताया कि बहुत आसान है,, जिनके भी कान बाहर दिखाई देते हैं वे सब बच्चे देते हैं और जिन जीवों के कान बाहर नहीं दिखाई देते वे अंडे देते हैं….

फिर दूसरा प्रश्न पूछा – ये बताइए आप लोगों के सामने एकदम कोई प्राणी आ गया,, आप कैसे पहचानेंगे की यह शाकाहारी है या मांसाहारी? क्योंकि आपने तो उसे भोजन करते देखा नहीं है, बच्चों में फिर वही कौतूहल और खुसर फ़ुसर की आवाजें…..

मैंने कहा – देखो भाई बहुत आसान है,, जिन जीवों की आँखों की बाहर की यानी ऊपरी संरचना गोल है वे सब माँसाहारी हैं जैसे कुत्ता, बिल्ली, बाज, चिड़िया, शेर, भेड़िया, चील,, या अन्य कोई भी आपके आस पास का जीव जंतु जिसकी आँखे गोल हैं वह माँसाहारी है,, ठीक उसी तरह जिसकी आँखों की बाहरी संरचना लंबाई लिए हुए है, वे सब शाकाहारी हैं जैसे हिरन,, गाय, हाथी, बैल, भैंस, बकरी,, इनकी आँखे बाहर की बनावट में लंबाई लिए होती है ….

अब ये बताओ कि मनुष्य की आँखें गोल हैं या लंबाई वाली,,, सब बच्चों ने कहा कि लंबाई वाली,, मैंने फिर पूछा कि यह बताओ इस हिसाब से मनुष्य शाकाहारी जीव हुआ या माँसाहारी??सबका उत्तर था #शाकाहारी,,

फिर दूसरी बात यह बताई कि जिन भी जीवों के नाखून तीखे नुकीले होते हैं वे सब माँसाहारी होते हैं जैसे शेर बिल्ली, कुत्ता बाज गिद्ध या अन्य कोई तीखे नुकीले नाखूनों वाला जीव….

जिनके नाखून चौड़े चपटे होते हैं वे सब शाकाहारी होते हैं जैसे गाय, घोड़ा, गधा, बैल, हाथी, ऊँट, बकरी…..

अब ये बताओ बालकों कि मनुष्य के नाखून तीखे नुकीले हैं या चौड़े चपटे??

बालकों ने कहा कि चौड़े चपटे,, अब ये बताओ इस हिसाब से मनुष्य कौनसे जीवों की श्रेणी में हुआ??सब बालकों ने कहा कि शाकाहारी,,,

फिर तीसरी बात बताई,, जिन भी जीवों पशु प्राणियों को पसीना आता है वे सब शाकाहारी होते हैं जैसे घोड़ा बैल गाय भैंस खच्चर आदि अनेकों प्राणी…

माँसाहारी जीवों को पसीना नहीं आता है, इसलिए कुदरती तौर पर वे जीव अपनी #जीभ निकालकर लार टपकाते हुए हाँफते रहते हैं इस प्रकार वे अपनी शरीर की गर्मी को नियंत्रित करते हैं….

तो प्रश्न यह है कि मनुष्य को पसीना आता है या जीभ से एडजस्ट करता है??

बालकों ने कहा कि पसीना आता है,अच्छा यह बताओ कि इस बात से मनुष्य कौनसा जीव सिद्ध हुआ, सबने एकसाथ कहा – शाकाहारी…

ऐसे ही अनेकों विषयों पर बच्चों से बात की, आनंद आ गया….

#सभी लोग विशेषकर अध्यापन से जुड़े भाई बहन चाहें तो बच्चों को सीखने पढ़ाने के लिए इस तरह बातचीत की शैली विकसित कर सकते हैं, इससे जो वे समझेंगे सीखेंगे वह उन्हें जीवनभर काम आएगा याद रहेगा, पढ़ते वक्त बोर भी नहीं होंगे….

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

सहयोग की गुल्लक


रिटायर हुए उन्हें अभी अधिक समय नहीं हुआ था । 65 बरस के बाबूजी रिटायर्ड शिक्षक थे । उनकी बातचीत व आवाज़ में अलग ही रौब दिखता था।

अम्मा तो आठ साल पहले गुजर गयीं थीं। परिवार में तीन बेटे बहुएं व कुल सात पोते पोती थे। संयुक्त परिवार था । बाबूजी घर के मुखिया थे , सब उनका कहा मानतें थे ।

बाबूजी अपने पास एक बड़ी सी गुल्लक रखा करते थे । सभी को सख्त हिदायत थी कि अपनीं बचत के पैसे गुल्लक में अवश्य डाला करें ।

जब गुल्लक पूरी तरह से भर जाती तो उसे तोड़कर बाबूजी सबसे जरूरतें पूछते , आकलन कर तय करते कि राशि किसे देनी है। बाबूजी के निर्णय पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगाता . अगली बार फिर नई गुल्लक रख दी जाती।

इस बार जब गुल्लक तोड़ी गयी तो सबने अपनीं जरूरतें बढ़ा चढ़ा कर गिनाईं ! तभी बाबूजी की नज़र कामवाली ललिता पर पड़ी जो बड़ी उम्मीद भरी नजरों से पैसों को एकटक देख रही थी।

बाबूजी ने पूछा, ललिता तेरी क्या जरूरत है , चल तू बता ? घर के लोग आश्चर्य से बाबूजी ओर देखने लगे। ये तो उनकी कमाई का हिस्सा है कामवाली से क्यों पूछा जा रहा है ?

“बोल ललिता ” ! जब दोबारा जोर से बाबू जी ने कहा तो ललिता बड़े ही बुझे स्वर में बोली , “बाबूजी मेरी तो कोई जरूरत ना है “, पर बिटिया पूजा के स्कूल में ऑन लाइन पढ़ाई हो रही है । मेरे पास ऐसा मोबाइल नहीं , जिसमें वो पढ़ सके। सुनते ही बाबू जी बोले स्मार्ट फोन चाहिए ?
इधर आ बबलू , अपने छोटे बेटे से बाबूजी बोले । इन पैसों से स्मार्ट फोन लेते आना । सुनकर ललिता की आँख डबडबा गईं ! झट बाबूजी के चरणों पर मत्था टेक दिया। एक बच्ची पढ़ लिख जाए , इससे अच्छा और क्या हो सकता है ?

आजकल की मतलबी दुनियां में किसी के लिए दो पैसा खर्च करना भारी लगता है इसलिए बच्चों मैं इस दुनियाँ में रहूँ या ना रहूँ , तुम अपनीं आय के एक छोटे हिस्से से “सहयोग व साझेदारी” की एक गुल्लक जरूर बनाये रखना। इससे बचत की प्रवृत्ति तो बनेगी ही , किसी एक के ऊपर कोई भार भी नहीं आएगा….! यदि परपीड़ा महसूस कर , उसका सदुपयोग करोगे तो अलग से धर्म कर्म की आवश्यकता भी ना होगी…! !!

इस बूढ़े पिता की यह बात यदि अपनें “मन की गुल्लक” में सदा के लिए संचित कर लो तो मेरा जीवन सफल हो जाये….! सुनकर सब एक स्वर में बोल पड़े , जी बाबूजी ! इस घर में प्यार व सम्मान की गुल्लक हमेशां बनी रहेगी…!

आज के युवा भविष्य की वित्तीय जरूरतों के प्रति सचेत और गंभीर नहीं हैं। वे इसके महत्व को नहीं जानते। बढ़ती उम्र में जब आय के साधन सीमित हो जाते हैं या कहें खत्म हो जाते हैं, तो न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने और जीवन शैली को बनाये रखने के लिए बढ़ते खर्च को पूरा करना मुश्किल होता है इसलिए यह जरूरी है कि हम आप अपने बच्चों को शुरू से ही बचत और निवेश करना सीखाएं।

भारतीय परिवार में छोटी बचत का रिवाज बहुत पुराना है। लगभग हर घर में मिट्टी के गुल्लक होते थे और बच्चे उनमें पैसे जमा करते थे। यह चलन अब बहुत कम ही देखने को मिलता है। नयी पीढ़ी, जिसे मिलेनियम भी कहा जाता है, बचत और अपनी आर्थिक जिम्मेवारियों के प्रति लापरवाह दिखती है। यह भविष्य के लिए ज्यादा चिंतित नहीं रहती और आज में ही जीवन व्यतीत करने में विश्वास करती है अगर आनेवाली पीढ़ी के भविष्य को सुखमय बनाना चाहते हैं, तो यह जरूरी है कि बच्चों में बचत करने की प्रवृत्ति को विकसित करना होगा, ताकि निवेश करने के तरीके को वे समझें।

💐💐 प्रेषक अभिजीत चौधरी 💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।