Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

1 जनवरी की सर्द रात रमेश अपनी पत्नी रीता संग एक दोस्त के यहां हुई नये साल की पार्टी से लौट रहा था, बाहर बड़ी ठंड थी।

दोनों पति पत्नी कार से वापस घर की ओर जा रहे थे तभी सड़क किनारे पेड़ के नीचे पतली पुरानी फटी चिथड़ी चादर में लिपटे एक बूढ़े भिखारी को देख रमेश का दिल द्रवित हो गया.

उसने गाडी़ रोकी ।

पत्नी रीता ने रमेश को हैरानी से देखते हुए कहा….क्या हुआ , गाडी़ क्यों रोकी आपने …??

वह बूढ़ा ठंड से कांप रहा है रीता, इसलिए गाडी़ रोकी ।

तो -?

रमेश बोला, अरे यार ..गाडी़ में जो कंबल पड़ा है ना उसे दे देते हैं..

क्या – वो कंबल – रमेश जी इतना मंहगा कंबल आप इसको देंगे ?? अरे वह उसे ओढेगा नहीं बल्की उसे बेच देगा , ये ऐसे ही होते है….।

रमेश मुस्कुराकर गाडी से उतरा और कंबल डिग्गी से निकालकर उस बुजुर्ग को दे दिया ।

रीता बहुत गुस्से में आ गई ।

दोनों फ़िर घर की ओर चल पड़े ।

अगले दिन भी बड़े गजब की ठंड थी…

आज भी रमेश और रीता एक पार्टी से लौट रहे थे तो अचानक रीता ने कहा..चलिए रमेश जी एकबार देखे. कल रात वाले बूढ़े का क्या हाल है..

रमेश ने वहीं गाडी़ रोकी और जब देखा तो बूढ़ा भिखारी वही था , मगर उसके पास वह कंबल नहीं था..

वह अपनी वही पुरानी चादर ओढ़े लेटा था.

रीता ने आँखे बडी करते हुए कहा देखा..मैंने कहा था कि वो कंबल उसे मत दो, इसने जरूर बेच दिया होगा ।

दोनों कार से उतर कर उस बूढे के पास गये.

रीता ने व्यंग्य करते हुए पूछा क्यों बाबा…कल रात वाला कंबल कहां है ? बेचकर नशे का सामान ले आये क्या…?

बुजुर्ग ने हाथ से इशारा किया जहां थोड़ी दूरी पर एक बूढ़ी औरत लेटी हुई थी….जिसने वही कंबल ओढा हुआ था…

बुजुर्ग बोला….बेटा वह औरत पैरों से विकलांग है और उसके कपडे भी कहीं कहीं से फटे हुए है , लोग भीख देते वक्त भी गंदी नजरों से देखते है , ऊपर से इतनी ठंड ..मेरे पास कम से कम ये पुरानी चादर तो है, उसके पास कुछ नहीं था तो मैंने कंबल उसे दे दिया..।

रीता हतप्रभ सी रह गयी..अब उसकी आँखो में पश्चाताप के आँसु थे , वो धीरे से आकर रमेश से बोली..चलिए…
घर से एक कंबल और लाकर बाबा जी को दे भी देते हैं……!!

………….

दोस्तों…. ईश्वर का धन्यवाद कीजिए कि उसने आपको देनेवालों की श्रेणी में रखा है , अतः जितना हो सके जरूरतमंदों की मदद करें……!!

चिड़ी चोंच भर ले गई…
नदी न् घटिये नीर…!
दान दिए धन ना घटे…
कह गए दास कबीर…!!

रवि कांत

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