Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

लोहड़ी


आज माघ माह की सन्क्रांति की पूर्व सन्ध्या केवल पंजाब ही नहीं, अपितु पूरे विश्व में फैले पंजाबी लोहड़ी मना रहे हैं । पौराणिक कथाओं के अनुसार आज ही के दिन श्रीकृष्ण जी ने लोहिता राक्षसी का वध किया परन्तु पंजाब के इस पर्व के साथ अन्य संदर्भ जुड़े हैं। पंजाब आज सीमांत प्रदेश है तो विभाजन से पूर्व भी इसकी यही स्थिति थी जहां उसे लगातार विधर्मी आक्रांताओं का सामना करना पड़ता था। उस दौर में दुल्ला भट्टी नामक वीर ने आक्रांताओं का बहुत बहादुरी से सामना किया। भारत की वर्तमान सीमा से लगभग 200 किलोमीटर उस पार, पश्चिमी पंजाब में आज भी पिंडी भट्टियां (भट्टी गौत्र के राजपूतों का गांव) है। उसी गांव में 1547 में जन्में दुल्ला भट्टी। उनके जन्म से चार माह पूर्व उनके दादा सन्दल भट्टी और पिता को मुगल सम्राट हुमायूं ने मरवा कर उनकी खाल में भूसा भरवा के गांव के बाहर लटकवा दिया क्योंकि उन्होंने आक्रांता मुगलों को लगान देने से मना कर दिया था। आज भी पंजाब की लोकगाथाओं में हुमायूं की बर्बरता के किस्से सुनने को मिलते हैं। एक लोकगीत में गायक कहता है :-
तेर सान्दल दादा मारया।
दित्ता बोरे विच पा।
मुगलां पुट्ठियां खालां लाह के।
भरया नाल हवा।
वीर योद्धा दुल्ला भट्टी आक्रांताओं के पिट्ठू जमींदारों, सिपाहियों से लूट कर जरूरतमंदों में बान्टता था इसलिए वह उनकी आंख की किरकिरी था। एक प्रचलित कथा के अनुसार एक बार थोड़े से सैनिकों के साथ भटक रहे शहजादा सलीम को दुल्ला भट्टी ने पकड़ लिया परंतु उसे यह कहते छोड़ दिया कि, ‘बाप से है, बेटे से नहीं।’ पाकिस्तानी पंजाब में आज भी प्रचलित एक कथा के अनुसार दुल्ला ने अकबर को भी पकड़ा था। परंतु जब अकबर ने कहा, ‘भईया मैं शहंशाह नहीं, उसका भाण्ड हूं।’ तो दुल्ला भट्टी ने उसे भी यह कहते हुए छोड़ दिया कि, उसे क्या मारूं जो अकबर होकर खुद को भाण्ड बता रहा है।’

दुल्ला भट्टी और लोहड़ी
लाहौर के पास के एक गांव में सुंदर दास नामक किसान की दो बेटियों पर थीं आक्रांताओं के पिट्ठू नम्बरदार की नीयत ठीक नहीं थी। जब वह शादी का दबाव बनाने लगा तो सुंदर दास ने दुल्ला भट्टी तक संदेश पहुंचाया। दुल्ला भट्टी ने स्वयं उस गांव पहुंचकर सबसे पहले नम्बरदार के खेतों में आग लगाई और फिर बेटियों का विवाह पिता द्वारा तय लड़कों से करते हुए स्वयं उनका कन्यादान कर उन्हें शगुन में शक्कर दी। बस उसी दिन से, लोहड़ी की रात उसी तरह से शक्कर, गुड़, रेवड़ी, मुंगफली, मक्की के दाने, तिल के लड्डू आदि अग्नि को भेंट कर इनका प्रसाद वितरित किया जाता है। दुल्ला भट्टी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते आज भी गीत गाते हैं : –
सुन्दर मुन्दरिए …हो
तेरा कौन विचारा…हो
दुल्ला भट्टीवाला…हो
दुल्ले दी धी ब्याही …हो
सेर शक्कर पाई …हो
कुड़ी दा लाल पताका …हो
कुड़ी दा सालू पाटा …हो
सालू कौन समेटे …हो
मामे चूरी कुट्टी …हो
जिमींदारां लुट्टी …हो
जमींदार सुधाए …हो
गिन गिन पोले लाए …हो
इक पोला घट गया
जिमींदार वोहटी ले के नस गया
इक पोला होर आया
जिमींदार वोहटी ले के दौड़ आया
सिपाही फेर के ले गया
सिपाही नूं मारी इट्ट
भावें रो ते भावें पिट्ट
साहनूं दे लोहड़ी
तेरी जीवे जोड़ी
साहनूं दे दाणे तेरे जीण न्याणे !

अब आधुनिकता की आंधी ने बहुत कुछ बदल दिया है लेकिन कुछ वर्ष पूर्व तक गांव के बच्चे घर घर जाकर यह गीत दोहराते तो उन्हें परिवार जनों की ओर से मूंगफली रेवड़ी आदि दिए जाते थे!

अकबर की विशाल सेना भी दुल्ला भट्टी को न पकड़ पाई थी, तो उसे 1599 में धोखे से पकड़वा कर आनन-फानन फांसी दे दी गई। लाहौर के पास मियानी साहिब कब्रगाह में अब भी दुल्ला की कब्र है।

🚩 आप सभी को लोहड़ी की शुभकामनाएं 🚩

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पहचान

एक बार एक आदमी महात्मा बुद्ध के पास पहुँचा। उसने पूछा, “प्रभु, मुझे यह जीवन क्यों मिला, इतनी बड़ी दुनिया में मेरी क्या कीमत है?”

बुद्ध उसकी बात सुनकर मुसकराए और उसे एक चमकीला पत्थर देते हुए बोले, ‘जाओ, पहले इस पत्थर का मूल्य पता करके आओ, पर ध्यान रहे, इसे बेचना नहीं, सिर्फ मूल्य पता करना है।’

वह आदमी उस पत्थर को लेकर एक आमवाले के पास पहुँचा और उसे पत्थर दिखाते हुए बोला, ‘इसकी कीमत क्या होगी?’

आमवाला पत्थर की चमक देखकर समझ गया कि अवश्य ही यह कोई कीमती पत्थर है, लेकिन वह बनावटी आवाज में बोला, “देखने में तो कुछ खास नहीं लगता, पर मैं इसके बदले दस आम दे सकता हूँ।”

वह आदमी आगे बढ़ गया। सामने एक सब्जीवाला था। उसने उससे पत्थर का दाम पूछा। सब्जीवाला बोला, ‘मैं इस पत्थर के बदले एक बोरी आलू दे सकता हूँ।’

आदमी आगे चल पड़ा। उसे लगा पत्थर कीमती है, किसी जौहरी से इसकी कीमत पता करनी चाहिए। वह एक जौहरी की दुकान पर पहुँचा और उसकी कीमती पूछी। जौहरी उसे देखते ही पहचान गया कि यह बेशकीमती रूबी पत्थर है, जो किस्मतवाले को मिलता है। वह बोला, “पत्थर मुझे दे दो और मुझसे दस हजार रुपए ले लो।”

उस आदमी को अब तक पत्थर की कीमत का अंदाजा हो गया था। वह बुद्ध के पास लौटने के लिए मुड़ा। जौहरी उसे रोकते हुए बोला, “अरे रुको तो भाई, मैं इसके पचास हजार दे सकता हूँ।”

लेकिन वह आदमी फिर भी नहीं रुका। जौहरी किसी कीमत पर उस पत्थर को अपने हाथ से नहीं जाने देना चाहता था, वह उछलकर उसके आगे आ गया और हाथ जोड़कर बोला, “तुम यह पत्थर मुझे दे दो, मैं एक लाख रुपए देने को तैयार हूँ।”

वह आदमी जौहरी से पीछा छुड़ाकर जाने लगा। जौहरी ने पीछे से आवाज लगाई, “ये बेशकीमती पत्थर है, अनमोल है। तुम जितने पैसे कहोगे, मैं दे दूँगा।”

यह सुनकर वह आदमी हैरान-परेशान हो गया। वह सीधा बुद्ध के पास पहुँचा और उन्हें पत्थर वापस करते हुए सारी बात कह सुनाई।

बुद्ध मुसकरा कर बोले, “आमवाले ने इसकी कीमत ‘दस आम’ लगाई, आलूवाले ने ‘एक बोरी आलू’ और जौहरी ने बताया कि ‘अनमोल’ है। इस पत्थर के गुण जिसने जितने समझे, उसने उसकी उतनी कीमत लगाई। ऐसे ही यह जीवन है। हर आदमी एक हीरे के समान है। दुनिया उसे जितना पहचान पाती है, उसे उतनी महत्ता देती है, लेकिन आदमी और हीरे में एक फर्क यह है कि हीरे को कोई दूसरा तराशता है, और आदमी को खुद अपने आपको तराशना पड़ता है। तुम भी अपने आपको तराशकर अपनी चमक बिखेरो, तुम्हें भी तुम्हारी कीमत बताने वाले मिल ही जाएँगे।”

👏👏👏

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जीजाबाई


शिवाजी को वीर शिवाजी बनाने बाली माँ #जीजाबाई का आज जन्मदिवस है
NCRTE की कक्षा 1 से 5 तक कि किस किताब में जीजाबाई का जीवन चरित्र पढ़ाया जाता है ओर यदि पढ़ाया भी जाता है तो मात्र इतना कि शिवजी की माँ जीजा बाई थी
खैर… सत्ता का मजा लूटिए प्रचारक से मंत्री बने जवाडेकर साहब आपके बस की नही है….
12 जनवरी/जन्म-दिवस
शिवाजी की निर्माता माँ जीजाबाई
यों तो हर माँ अपनी सन्तान की निर्माता होती है; पर माँ जीजा ने अपने पुत्र शिवाजी के केवल शरीर का ही निर्माण नहीं किया, अपितु उनके मन और बुद्धि को भी इस प्रकार गढ़ा कि वे आगे चलकर भारत में मुगल शासन की चूलें हिलाकर हिन्दू साम्राज्य की स्थापना में सफल हुए।

जीजा का जन्म महाराष्ट्र के सिन्दखेड़ ग्राम में 12 जनवरी, 1602 (पौष शुक्ल पूर्णिमा) को हुआ था। उनके पिता लखूजी जाधव अन्य मराठा सरदारों की तरह निजामशाही की सेवा करते थे। इन सरदारों को निजाम से जमींदारी तथा उपाधियाँ प्राप्त थीं; पर ये सब एक-दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास करते रहते थे। इनमें परस्पर युद्ध भी होते रहते थे।

एक बार रंगपंचमी पर लखूजी के घर में उत्सव मनाया जा रहा था। अनेक सरदार वहाँ सपरिवार आये थे। लखूजी की पुत्री जीजा तथा उनके अधीन कार्यरत शिलेदार मालोजी के पुत्र शहाजी आपस में खूब खेल रहे थे। लखूजी ने कहा – वाह, इनकी जोड़ी कितनी अच्छी लग रही है। मालोजी ने लखूजी से कहा, इसका अर्थ है कि हम आपस में समधी हो गये।

इस पर लखूजी बिगड़ गये। उन्होंने कहा कि मैंने तो यह मजाक में कहा था। मेरे जैसे सरदार की बेटी तुम्हारे जैसे सामान्य शिलेदार की बहू कैसे बन सकती है ? इस पर मालोजी नाराज हो गये। उन्होंने कहा, अब मैं यहाँ तभी आऊँगा, जब मेरा स्तर भी तुम जैसा हो जाएगा। मालोजी ने लखूजी की नौकरी भी छोड़ दी।

अब वे अपने गाँव आ गये; पर उनका मन सदा उद्विग्न रहता था। एक रात उनकी कुलदेवी जगदम्बा ने स्वप्न में उन्हें आशीर्वाद दिया। अगले दिन जब वे अपने खेत में खुदाई कर रहे थे, तो उन्हें स्वर्ण मुद्राओं से भरे सात कलश मिले। इससे उन्होंने 2,000 घोड़े खरीदे और 1,000 सैनिक रख लिये। उन्होंने ग्रामवासियों तथा यात्रियों की सुविधा के लिए अनेक मन्दिर, धर्मशाला तथा कुएँ बनवाये। इससे उनकी ख्याति सब ओर फैल गयी।

यह देखकर निजाम ने उन्हें ‘मनसबदार’ का पद देकर शिवनेरी किला तथा निकटवर्ती क्षेत्र दे दिया। अब वे मालोजी राव भोंसले कहलाने लगे। उधर लखूजी की पत्नी अपने पति पर दबाव डाल रही थी कि जीजा का विवाह मालोजी के पुत्र शहाजी से कर दिया जाये। लखूजी ने बड़ी अनिच्छा से यह सम्बन्ध स्वीकार किया। कुछ समय बाद मालोजी का देहान्त हो गया और उनके बदले शहाजी निजाम के अधीन सरदार बनकर काम करने लगे।

जीजाबाई के मन में यह पीड़ा थी कि उसके पिता और पति दोनों मुसलमानों की सेवा कर रहे हैं; पर परिस्थिति ऐसी थी कि वह कुछ नहीं कर सकती थी। जब वह गर्भवती हुई, तो उन्होंने निश्चय किया कि वे अपने पुत्र को ऐसे संस्कार देंगी, जिससे वह इस परिस्थिति को बदल सके।

शहाजी प्रायः युद्ध में व्यस्त रहते थे, इसलिए उन्होंने जीजाबाई को शिवनेरी दुर्ग में पहुँचा दिया। वहाँ उन्होंने रामायण और महाभारत के युद्धों की कथाएँ सुनीं। इससे गर्भस्थ बालक पर वीरता के संस्कार पड़े।

19 फरवरी, 1630 को शिवाजी का जन्म हुआ। आगे चलकर छत्रपति शिवाजी ने मुगल राजशाही को परास्त कर 6 जून, 1674 को भारत में हिन्दू पद पादशाही की स्थापना की। जीजाबाई मानो इसी दिन के लिए जीवित थीं। शिवाजी को सिंहासन पर विराजमान देखने के बारहवें दिन 17 जून, 1674 (ज्येष्ठ कृष्ण 9) को उन्होंने आँखें मूँद लीं।

हरदिनपावन है..

मीरा गोयल

Posted in लक्ष्मी प्राप्ति - Laxmi prapti

आर्थिक तंगी दूर करने के लिए करें हनुमानजी की आराधना एवं पीपल के पत्तों का उपाय –


☘️💐आर्थिक तंगी दूर करने के लिए करें हनुमानजी की आराधना एवं पीपल के पत्तों का उपाय -☘️💐
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शास्त्रों के अनुसार हनुमानजी शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवी-देवताओं में से एक हैं। गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस के अनुसार माता सीता द्वारा पवनपुत्र हनुमानजी को अमरता का वरदान दिया गया है। इसी वरदान के प्रभाव से इन्हें भी अष्टचिरंजीवी में शामिल किया जाता है। कलयुग में हनुमानजी भक्तों की सभी मनोकामनाएं तुरंत ही पूर्ण करते हैं।

बजरंगबली को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार के उपाय बताए गए हैं। इन्हीं उपायों में से एक उपाय यहां बताया जा रहा है। इस उपाय को विधिवत किया जाए तो बहुत जल्दी सकारात्मक फल प्राप्त होते हैं। यह उपाय पीपल के पत्तों से किया जाता है।

श्रीराम के अनन्य भक्त हनुमानजी की कृपा प्राप्त होते ही भक्तों के सभी दुख दूर हो जाते हैं। पैसों से जुड़ी समस्याएं समाप्त हो जाती हैं। कोई रोग हो तो वह भी नष्ट हो जाता है। इसके साथ ही यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में कोई ग्रह दोष हो तो पवनपुत्र की पूजा से वह भी दूर हो जाता है। हनुमानजी की पूजा में पवित्र का पूरा ध्यान रखना चाहिए।

यदि कोई व्यक्ति पैसों की तंगी का सामना करना रहा है तो उसे प्रति मंगलवार और शनिवार को पीपल के 11 पत्तों का यह उपाय अपनाना चाहिए।

उपाय इस प्रकार है👉 प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को ब्रह्म मुहूर्त में उठें। इसके बाद नित्य कर्मों से निवृत्त होकर किसी पीपल के पेड़ से 11 पत्ते तोड़ लें। ध्यान रखें पत्ते पूरे होने चाहिए, कहीं से टूटे या खंडित नहीं होने चाहिए। इन 11 पत्तों पर स्वच्छ जल में कुमकुम या अष्टगंध या चंदन मिलाकर इससे पूरे पत्ते पर आगे पीछे सभी तरफ अधिक से अधिक संख्या में श्रीराम का नाम लिखें। नाम लिखते समय हनुमान चालीसा का पाठ अवश्य करते रहें।

जब सभी पत्तों पर श्रीराम नाम लिख लें, उसके बाद राम नाम लिखे हुए इन पत्तों की एक माला बनाएं। इस माला को किसी भी हनुमानजी के मंदिर जाकर वहां बजरंगबली को अर्पित करें। इस प्रकार यह उपाय करते रहें। कुछ समय में सकारात्मक परिणाम प्राप्त होंगे।

ध्यान रखें उपाय करने वाला भक्त किसी भी प्रकार के अधार्मिक कार्य न करें। अन्यथा इस उपाय का प्रभाव निष्फल हो जाएगा। उचित लाभ प्राप्त नहीं हो सकेगा। साथ ही अपने कार्य और कर्तव्य के प्रति ईमानदार रहें।

🌺🌺हनुमान जी को प्रसन्न करने के अन्य उपाय!
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👉 किसी भी हनुमान मंदिर जाएं और अपने साथ नारियल लेकर जाएं। मंदिर में नारियल को अपने सिर पर सात बार वार लें। इसके बाद यह नारियल हनुमानजी के सामने फोड़ दें। इस उपाय से आपकी सभी बाधाएं दूर हो जाएंगी।

👉 शनिवार को हनुमानजी के मंदिर में 1 नारियल पर स्वस्तिक बनाएं और हनुमानजी को अर्पित करें। हनुमान चालीसा का पाठ करें।

👉 हनुमानजी को सिंदूर और तेल अर्पित करें। जिस प्रकार विवाहित स्त्रियां अपने पति या स्वामी की लंबी उम्र के लिए मांग में सिंदूर लगाती हैं, ठीक उसी प्रकार हनुमानजी भी अपने स्वामी श्रीराम के लिए पूरे शरीर पर सिंदूर लगाते हैं। जो भी व्यक्ति शनिवार को हनुमानजी को सिंदूर अर्पित करता है उसकी सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं।

👉 अपनी श्रद्धा के अनुसार किसी हनुमान मंदिर में बजरंग बली की प्रतिमा पर चोला चढ़वाएं। ऐसा करने पर आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाएंगी।

👉 हनुमानजी के सामने शनिवार की रात को चौमुखा दीपक लगाएं। यह एक बहुत ही छोटा लेकिन चमत्कारी उपाय है। ऐसा नियमित रूप से करने पर आपके घर-परिवार की सभी परेशानियां समाप्त हो जाती हैं।

👉 किसी पीपल पेड़ को जल चढ़ाएं और सात परिक्रमा करें। इसके बाद पीपल के नीचे बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ करें।

🌺विशेष-
उपाय करते समय धैर्य का परिचय दें कोई भी उपाय तुरंत लाभ नही दे सकता पहले प्रारब्ध कमजोर करेगा उसके बाद ही लाभ होगा।

ओली अमित

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1 जनवरी की सर्द रात रमेश अपनी पत्नी रीता संग एक दोस्त के यहां हुई नये साल की पार्टी से लौट रहा था, बाहर बड़ी ठंड थी।

दोनों पति पत्नी कार से वापस घर की ओर जा रहे थे तभी सड़क किनारे पेड़ के नीचे पतली पुरानी फटी चिथड़ी चादर में लिपटे एक बूढ़े भिखारी को देख रमेश का दिल द्रवित हो गया.

उसने गाडी़ रोकी ।

पत्नी रीता ने रमेश को हैरानी से देखते हुए कहा….क्या हुआ , गाडी़ क्यों रोकी आपने …??

वह बूढ़ा ठंड से कांप रहा है रीता, इसलिए गाडी़ रोकी ।

तो -?

रमेश बोला, अरे यार ..गाडी़ में जो कंबल पड़ा है ना उसे दे देते हैं..

क्या – वो कंबल – रमेश जी इतना मंहगा कंबल आप इसको देंगे ?? अरे वह उसे ओढेगा नहीं बल्की उसे बेच देगा , ये ऐसे ही होते है….।

रमेश मुस्कुराकर गाडी से उतरा और कंबल डिग्गी से निकालकर उस बुजुर्ग को दे दिया ।

रीता बहुत गुस्से में आ गई ।

दोनों फ़िर घर की ओर चल पड़े ।

अगले दिन भी बड़े गजब की ठंड थी…

आज भी रमेश और रीता एक पार्टी से लौट रहे थे तो अचानक रीता ने कहा..चलिए रमेश जी एकबार देखे. कल रात वाले बूढ़े का क्या हाल है..

रमेश ने वहीं गाडी़ रोकी और जब देखा तो बूढ़ा भिखारी वही था , मगर उसके पास वह कंबल नहीं था..

वह अपनी वही पुरानी चादर ओढ़े लेटा था.

रीता ने आँखे बडी करते हुए कहा देखा..मैंने कहा था कि वो कंबल उसे मत दो, इसने जरूर बेच दिया होगा ।

दोनों कार से उतर कर उस बूढे के पास गये.

रीता ने व्यंग्य करते हुए पूछा क्यों बाबा…कल रात वाला कंबल कहां है ? बेचकर नशे का सामान ले आये क्या…?

बुजुर्ग ने हाथ से इशारा किया जहां थोड़ी दूरी पर एक बूढ़ी औरत लेटी हुई थी….जिसने वही कंबल ओढा हुआ था…

बुजुर्ग बोला….बेटा वह औरत पैरों से विकलांग है और उसके कपडे भी कहीं कहीं से फटे हुए है , लोग भीख देते वक्त भी गंदी नजरों से देखते है , ऊपर से इतनी ठंड ..मेरे पास कम से कम ये पुरानी चादर तो है, उसके पास कुछ नहीं था तो मैंने कंबल उसे दे दिया..।

रीता हतप्रभ सी रह गयी..अब उसकी आँखो में पश्चाताप के आँसु थे , वो धीरे से आकर रमेश से बोली..चलिए…
घर से एक कंबल और लाकर बाबा जी को दे भी देते हैं……!!

………….

दोस्तों…. ईश्वर का धन्यवाद कीजिए कि उसने आपको देनेवालों की श्रेणी में रखा है , अतः जितना हो सके जरूरतमंदों की मदद करें……!!

चिड़ी चोंच भर ले गई…
नदी न् घटिये नीर…!
दान दिए धन ना घटे…
कह गए दास कबीर…!!

रवि कांत

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐निंदा करना, घाटे का सौदा💐💐

एक बार एक राजा ने फैसला लिया कि वह प्रतिदिन 100 अंधे लोगों को खीर खिलाया करेगा।

एक दिन खीर वाले दूध में सांप ने मुंह डाला और दूध में विष डाल दी। ज़हरीली खीर को खाकर 100 के 100 अंधे व्यक्ति मर गए। राजा बहुत परेशान हुआ कि मुझे 100 आदमियों की हत्या का पाप लगेगा।

राजा परेशानी की हालत में अपने राज्य को छोड़कर जंगलों में भक्ति करने के लिए चल पड़ा, ताकि इस पाप की माफी मिल सके। रास्ते में एक गांव आया। राजा ने चौपाल में बैठे लोगों से पूछा कि क्या इस गांव में कोई भक्ति भाव वाला परिवार है ताकि उसके घर रात काटी जा सके?

चौपाल में बैठे लोगों ने बताया कि इस गांव में दो बहन भाई रहते हैं जो खूब पूजा करते हैं। राजा उनके घर रात में ठहर गया।

सुबह जब राजा उठा तो लड़की पूजा पर बैठी हुई थी। इससे पहले लड़की का रूटीन था कि वह दिन निकलने से पहले ही पूजा से उठ जाती थी और नाश्ता तैयार करती थी।

लेकिन उस दिन वह लड़की बहुत देर तक पूजा पर बैठी रही। जब लड़की उठी तो उसके भाई ने कहा कि बहन तू इतनी देर से उठी है। अपने घर मुसाफिर आया हुआ है और उसे नाश्ता करके दूर जाना है।

लड़की ने जवाब दिया कि भैया ऊपर एक मामला उलझा हुआ था। धर्मराज को किसी उलझन भरी स्थिति पर कोई फैसला लेना था और मैं वह फैसला सुनने के लिए रुक गयी थी। इसलिए देर तक ध्यान करती रही।

तो उसके भाई ने पूछा ऐसी क्या बात थी? तो लड़की ने बताया कि फलां राज्य का राजा अंधे व्यक्तियों को खीर खिलाया करता था। लेकिन सांप के दूध में विष डालने से 100 अंधे व्यक्ति मर गए। अब धर्मराज को समझ नहीं आ रहा कि अंधे व्यक्तियों की मौत का पाप राजा को लगे, सांप को लगे या दूध बिना ढ़के छोड़ने वाले रसोइये को लगे।

राजा भी सुन रहा था। राजा को अपने से संबंधित बात सुन कर दिलचस्पी हो गई और उसने लड़की से पूछा कि फिर क्या फैसला हुआ ?

लड़की ने बताया कि अभी तक कोई फैसला नहीं हो पाया था। तो राजा ने पूछा कि क्या मैं आपके घर एक रात के लिए और रुक सकता हूं ? दोनों बहन भाइयों ने खुशी से उसको हां कर दी।

राजा अगले दिन के लिए रुक गया, लेकिन चौपाल में बैठे लोग दिन भर यही चर्चा करते रहे कि कल जो व्यक्ति हमारे गांव में एक रात रुकने के लिए आया था और कोई भक्ति भाव वाला घर पूछ रहा था, उसकी भक्ति का नाटक तो सामने आ गया है।

रात काटने के बाद वह इसलिए नहीं गया क्योंकि जवान लड़की को देखकर उस व्यक्ति की नियत खोटी हो गई। इसलिए वह उस सुन्दर और जवान लड़की के घर पक्के तौर पर ही ठहरेगा या फिर लड़की को लेकर भागेगा।

दिनभर चौपाल में उस राजा की निंदा होती रही।

अगली सुबह लड़की फिर ध्यान पर बैठी और रूटीन के टाइम अनुसार उठ गई। तो राजा ने पूछा- “बेटी अंधे व्यक्तियों की हत्या का पाप किसको लगा ?”

तो लड़की ने बताया कि- “वह पाप तो हमारे गांव के चौपाल में बैठने वाले लोग बांट के ले गए।”

शिक्षा:-
निंदा करना कितना घाटे का सौदा है? निंदक हमेशा दूसरों के पाप अपने सर पर ढ़ोता रहता है। और दूसरों द्वारा किये गए उन पाप-कर्मों के फल को भी भोगता है। अतः हमें सदैव निंदा से बचना चाहिए।

💐💐 प्रेषक अभिजीत चौधरी 💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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