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“खुशी”😊

बहुत दिन बाद पकड़ में आई…
थोड़ी सी खुशी…तो पूछ लिया,
“कहाँ रहती हो आजकल….ज्यादा मिलती नही?”,
“यही तो हूँ” जवाब मिला।

“बहुत भाव खाती हो…कुछ सीखो अपनी बहन से…
…हर दूसरे दिन आती है मिलने हमसे …..परेशानी”।

“आती तो मैं भी हूं…लेकिन आप ध्यान नही देते”।🌝

“अच्छा?…. कहाँ थी तुम जब पड़ोसी ने नई गाड़ी ली?”

“आपकी बेटी की टेस्ट रिपोर्ट पढ़ रही थी…जिस बीमारी का डर था वो नही निकली…वहीं खड़ी चैन की सांस ले रही थी”।😌

कुछ शर्मसार तो हुए हम
लेकिन हार नही मानी

“और तब कहाँ थी जब रिश्तेदार ने बड़ा घर बनाया?”
“तब आपके बेटे की जेब में थी…उसकी पहली कमाई बन कर”।😌

“और तब कहाँ थी…”
अगली शिकायत होंठो पे थी जब उसने टोक दिया बीच मे।🤫

“मैं रहती हूँ..…🤗
कभी आपकी पोतियों की किलकारियो में,
कभी रास्ते मे मिल जाती हूं एक बिछड़े दोस्त के रूप में,
कभी एक अच्छी फिल्म देखते हुए,
कभी गुम कर मिली हुई बालियों में,
कभी घरवालों की तालियों में,
कभी मानसून की पहली बारिश में,
कभी रेडियो पे पुराने गाने में,
दरअसल…थोड़ा थोड़ा बांट देती हूँ,
खुद को छोटे छोटे पलों में..उनके अहसासों में..!

लगता है चश्मे का नंबर बढ़ गया है आपके
सिर्फ बड़ी चीज़ो में ही ढूंढते हो मुझे
वहाँ भी आती हूं मैं…लेकिन कभी कभी
खैर…अब तो पता मालूम हो गया ना मेरा
अब ढूंढ लेना मुझे

लेकिन हाँ…चश्मे का नंबर बदलवा के”..😊😊

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एक मासूम ख़्वाहिश

पार्किंग में पहुँच कर जैसे ही स्नेहा ने अपनी छः साल की बेटी कुहू के लिए कार का बैक डोर खोला, वह मुँह चढ़ा कर फ्रंट डोर के सामने जा खड़ी हुई।
“कुहू बच्चे पीछे बैठते हैं, वहाँ मम्मा बैठेगी।” स्नेहा समझाते हुए बोली मगर कुहू कहाँ सुनने वाली थी। उसका गोलू सा मुँह फूल कर और कुप्पा हो गया। कुहू का रुआंसा चेहरा देख मयंक ने भीतर से अपनी बगल वाली सीट का दरवाज़ा खोल दिया। “पप्पा के साथ बैठना है प्रिंसेस को…आ जा” और वो छलांग लगाकर बैठ गई। बैठते ही उसने कार के म्यूजिक सिस्टम पर अपनी मनपसंद नर्सरी राइमस् लगा दी। रोज़ की तरह आज भी स्नेहा को पीछे बैठकर संतोष करना पड़ा।
हफ्ते भर से ये इस छोटे से परिवार का रोज़ का रूटीन हो गया था। डिनर के बाद कुहू का आइसक्रीम के लिए ज़िद करना, स्नेहा का सर्दी का हवाला दे कर मना करना और मयंक का दोनों के बीच में आकर यह कहते हुए कुहू की ज़िद मान लेना, “आइसक्रीम तो पप्पा को भी खानी है…”
बैक सीट पर बैठी स्नेहा दोनों को हँसते-गुनगुनाते देख रही थी मगर वो चाह कर भी उनका हिस्सा नहीं बन पा रही थी। आजकल अज़ीब सी जलन महसुस करने लगी थी वो…कुहू के लिए…अपनी बेटी के लिए! ये एक ऐसा ख़याल था जो उसे भीतर ही भीतर शर्मिंदा भी कर रहा था मगर वो करे भी तो क्या! कैसे नकारे मीठे मातृत्व की ओट से लुकाछिपी खेल रही इस कसैली भावना को?
स्नेहा आजकल कुछ ज़्यादा ही नोटिस कर रही थी कि मयंक जब-तब कुहू की हर सही-गलत ज़िद के आगे सहजता से झुकने लगा था… और जब जब ऐसा होता, स्नेहा अतीत के उन गलियारों में भटकने चली जाती जहाँ छोटी स्नेहा कोई गलती या ज़िद करने के बाद अपने पिताजी के सामने अपराधिनी बनी खड़ी होती और वे उसे आँखें चौड़ी कर तेज़ आवाज़ में डाँट रहे होते।
उसे याद ही नहीं है कि कभी उसने अपने पिताजी का चेहरा नार्मल और हंसते हुए देखा हो… हमेशा ‘ये करो, ये नहीं करो’ की पट्टी पढ़ाते, अनुशासन का ढोल बजाते, जरा जरा सी गलतियों पर डाँटते और मम्मी को सुनाते, ‘लड़की को ज़रा तमीज़ सिखाओ, इसे अगले घर जाना है…’ पिता के सामने स्नेहा ना कभी अपने मन की कह पाई, ना ही कर पाई। शुष्क हवाओं के बीच जैसे-तैसे ये बेल परवान चढ़ी और एक दिन ससुराल की क्यारी में रौप दी गई।
सख़्त परवरिश के असर से हर काम तमीज़ से करना, समय पर करना और अपनी हद़ में रहना स्नेहा के खून में आ गया था। मंयक अच्छा पति था। वो हर वह काम करता था जो अच्छे पति किया करते हैं मसलन घर की जरूरतों का ख्याल रखना, कभी कभी स्नेहा को सिनेमा, डिनर पर ले जाना, बर्थ डे-ऐनीवर्सरी पर गिफ्ट देना…आदि।
दोनों में कभी किसी बात पर मतभेद नहीं हुए क्योंकि घर वैसे ही चल रहा था जैसे मयंक चाहता था। कार में वो ही गाने चलते थे जो मयंक ट्यून करता था। उसके हर निर्णय में स्नेहा की मौन स्वीकृति रहती।
सब कुछ सही चल रहा था। मगर उसकी बेटी ने, उसके भीतर दम तोड़ चुकी उस छोटी स्नेहा को फिर से जिंदा कर दिया था जिसे कुहू का बात-बात पर जिद़ करना अच्छा नहीं लगता था… और उससे भी ज्यादा बुरा लगता था उसके पापा का हर बार उसके सामने ख़ुशी ख़ुशी झुक जाना।
स्नेहा को यकीन नहीं होता था कि पिता ऐसे भी हो सकते हैं! वह यह देख कर हैरान रह जाती थी कि यह वही मयंक है जिसे हर काम अपने मन मुताबिक करने की आदत है, जो किसी के लिए अपना रूटिन नहीं बदल सकता…मगर कुहू के सामने कैसा मोम सा पिघला रहता, वो जैसा चाहती, प्यार से ढल जाता।
आज रविवार था। लंच के वक्त स्नेहा ने अपनी और मयंक की थाली लगा ली। कुहू को एक कटोरे में दाल-चावल मिला कर दे दिये। मगर कुहू अपने हाथ से न खाने की जिद़ करने लगी। स्नेहा ने उसे ज़ोर देकर ख़ुद खाने के लिए कहा तो उसने ठिनकना शुरु कर दिया। “नई…आप ई खिलाओं…” स्नेहा नहीं मानी।
“आओं, पप्पा खिला देंगें।” मयंक ने झट से उसका खाना लिया और खिलाने लगा। बस आज स्नेहा से बर्दाश्त नहीं हुआ और वो फट पड़ी।
“इसकी हर सही-गलत बात मान कर तुम इसे बिगाड़ रहे हो मंयक! इसकी उम्र में मैं खाना खाकर मेज़ भी पौंछ दिया करती थी।”
“अरे थोड़ा खिला दिया तो क्या हुआ, हमेशा हमारे हाथ से थोड़े ही खाएगी?” कहकर मयंक खिलाने लगा तो स्नेहा ने रोक दिया।
“नहीं, तुम आज खुद से ही खाओगी!” कहते हुए उसकी आँखें उतनी ही चौड़ी हो चली जितनी उसके पिता की हुआ करती थी, स्वर वैसा ही कर्कश हो गया जैसे उसके पिता का हो जाया करता था। फ़र्क बस इतना था, वो चुपचाप खड़ी रह जाती थी मगर कुहू दहाड़े मार कर रोने लगी।
इस पर मयंक चिल्ला पड़ा, “ये क्या ज़िद लगा रखी है तुमने! वो तो बच्ची है ज़िद करेगी ही, मगर तुम तो बड़ी हो, तुम्हारा यू ज़िद करना अच्छा लगता है क्या? देख रहा हूँ आजकल कुछ ज्यादा ही स़ख्त होती जा रही हो…” कह कर उसने कुहू को गोद में बैठा लिया और पुचकारते हुए खाना खिलाने लगा।
स्नेहा सन्न खड़ी रह गई। आज मैं बड़ी हूँ इसलिए ज़िद नहीं कर सकती और जब मैं छोटी थी तब! तब भी अपने मन की कहाँ कुछ कर पाई थी। उसे लगा जैसे पलकों पर बंधा बांध आज टूटने की कगार पर है, तो वह कमरे में चली आई।
स्नेहा आज खुद से ड़र गई थी। कुछ समझ नहीं आ रहा था उसे क्या हो रहा है। लग रहा था जैसे कंधे पर पिताजी की छाया आ बैठी हो जो उसे अपने जैसा बनाती जा रही हो। नहीं! ये सही नहीं है…मैं कुहू को दूसरी स्नेहा नहीं बनने दे सकती! उस दिन के बाद से स्नेहा कुहू से संभल कर व्यवहार करने लगी।
एक ख़ामोश रात तारों की चादर ओढ़ सुस्ताने चली थी। मयंक पास सोई कुहू के बालों को सहला रहा था। स्नेहा सोने से पहले हाथों पर नाइट क्रीम मलते हुए बिस्तर के सिराहने आ कर बैठ गई। मयंक ने उसे अपनी ओर खींच लिया और प्यार से बोला “दो दिन बाद तुम्हारा बर्थ डे है, बताओं क्या गिफ्ट लोगी इस बार?”
“क्या लूं? सब कुछ तो है मेरे पास”, स्नेहा ने उसके कंधे पर हौले से सिर टिका दिया।
“छोड़ो भी, अब इतना भी रानी बना कर नहीं रखा हुआ…कुछ तो होगा जिसे पाने को मन ललचता होगा?” सुन कर स्नेहा कहीं भीतर डूब गई जहाँ कुछ अधूरी ख्वाहिशें अधमृत पड़ी ऊंघ रही थी। कैसे कहूँ क्या चाहिए! मन क्या पाने को ललचता है आजकल! थोड़ा सा लाड़, थोड़ा दुलार, बेवज़ह की मनुहार…
“कहाँ खो गई, गिफ्ट के लिए इतना सोचना पड़ रहा है? अरे बोल कर तो देखो! तुम्हारे लिए तारें तोड़ कर न ले आऊँ तो कहना…” मयंक प्यार से उसकी आँखों में झांकते हुए उसकी उंगलियाँ सहलाने लगा।
“सुनो! बस एक वादा दे दो इस बार”, स्नेहा धीमे से फुसफुसाई।
“क्या?”
“अगर कभी कुछ ऐसी ज़िद करूं जिसमें तुम्हारी सहमति ना हो, जो तुम्हें ठीक ना लगे…तो ऐसे झुक जाना जैसे अपनी प्रिंसेस के सामने झुक जाते हो…बस यही चाहिए…” स्नेहा की सजल आँखों एक मासूम ख्वाहिश उभर आई। मयंक उसे अपलक देखता रह गया। उन आँखों से एक दमित बचपन झाँक रहा था जिसे देख वह सिहर गया। उसने स्नेहा के दोनों हाथों को कस कर थाम लिया।
“पहले तुम भी एक वादा करो, मुझसे उसी हक से जिद करोगी जिस हक से प्रिंसेस करती है”, सुनकर स्नेहा की आंखों से दो मोती लुढ़क गये, जो उसके नहीं उस छोटी स्नेहा के थे जिसे बरसों बाद अपनों से ज़िद करने का हक मिला था।

मौलिक एवं प्रकाशित
Deepti Mittal

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एक संन्यासी को दिखाई बिलकुल देना बंद हो गया था। एक दिन वह कहीं जा रहा था। मार्ग में उसे पता लगा कि राजा की सवारी आने वाली है। थोड़ी देर में ही रास्ते के दोनों ओर लोग फूल मालाएं लेकर खड़े होने लगे। संन्यासी की इच्छा भी इस दृश्य का अनुभव करने की हुई। वह देख भले ही नहीं सकता था, लेकिन सबसे आगे निकलकर खड़ा हो गया। राजा के रथ के आगे सिपाही, मंत्री और दरबारी चल रहे थे। सबसे आगे बाजा बजाते हुए एक दल था। कुछ देर में ही शाही सवारी एकदम करीब आ पहुंची। तभी एक सिपाही ने डपट कर सभी से कहा-‘दूर हटो।’ जवाब में निडर संन्यासी ने कहा- ‘समझ गया।’
मंत्रिमंडल के सदस्यों का समूह सामने आया तो उनमें से एक ने आगे आकर कहा-‘संन्यासी जी, जरा संभल कर! कहीं भीड़ में आप गिर न जाएं?’ संन्यासी ने जोर से कहा, ‘समझ गया।’ तभी राजा की शाही सवारी आ पहुंची। राजा ने देखा कि एक तेजस्वी संन्यासी राह में खड़ा है। उन्होंने रथ रुकवाया और उतरकर संन्यासी के चरण स्पर्श कर विनम्रता से कहा, ‘महाराज! आपको इस भीड़ में आने की क्या आवश्यकता थी। आदेश दे दिया होता मैं ही आपके दर्शन के लिए चला आता।’
संन्यासी ने इस बार भी जोर से कहा- ‘समझ गया, समझ गया।’ राजा यह सुनकर हैरान रह गया। उसने पूछ ही लिया, ‘आप क्या समझ गए महाराज?’ संन्यासी ने कहा, ‘राजन, हर व्यक्ति की आवाज में भी उसके व्यक्तित्व व गरिमा की झलक होती है। मैं देख तो नहीं सकता, लेकिन तीनों बार आवाज सुनकर ही समझ गया था कि पहला व्यक्ति आपका सिपाही था, दूसरा आपका मंत्री और तीसरी बार आप स्वयं।

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😖😖😖😖😖– उरियानी –😖😖😖😖😖

पटना की घटना।

पिछले सप्ताह पटना के बोरिंग रोड़ पर –जनाना कपड़ो की एक मशहूर दुकान पर – पत्नी के साथ जाना हुआ।

पत्नी को डिसप्ले के तौर पर रखा –एक पुतले को पहनाया गया –एक सुंदर वस्त्र भा गया।

पत्नी ने सेल्स मैन को उस तरह का ड्रेस दिखाने को कहा।
सेम कलर नहीं है।
सेम साइज़ नहीं है।
सेम पैटर्न नहीं है।
सेम फेब्रिक नहीं है।
जैसे नखरों के बाद पत्नी ने सुझाव दिया कि पुतले से उतार कर वह वस्त्र उसे दिया जाय।
“उसके लिये कल 11:00 बजे के बाद कभी भी आइये मैम”– सेल्स मैन विनित स्वर में बोला।
“अभी क्या प्रॉब्लम है ?”– मैं बोला।
“सर, अभी स्टोर में बहुत भीड़ है। डमी फुल लेंथ लेडीज़ साइज़ की है। अभी उसे मूव करना सम्भव नहीं है– प्लीज़, आप कल आइये। मैं ड्रेस निकाल कर पैक करके रखूँगा।”

मैंने उसे बताया कि मैं इंदौर में रहता हूँ। कल सुबह 11:00 बजे मेरी ट्रेन है। अगर ड्रेस अभी नहीं लिया तो ले ही नहीं पाऊँगा।
सेल्समैन कुछ सोचा फिर मैनेजर के पास गया।

मैनेजर सेल्समैन की पूरी बात सुना फिर स्टोर के मालिक के केबिन में चला गया। बाहर आ कर सेल्समैन को कुछ हिदायत देने लगा।

सेल्समैन को समझाने के बाद मैनेजर मेरे पास आया बोला– “सर, आपलोग कुछ और पसंद कीजिये। लड़के आधे घण्टे में ड्रेस पैक कर देंगे।”
“एक ड्रेस पैक करने में इतना टाइम लगता है?”– पत्नी उतावले स्वर में बोली थी।
“मैम”-मैनेजर विनित स्वर में बोला-“अमूनन हम लोग इस तरह सेल नहीं करते है। आप लोग बाहर से आये है और कल ही आपकी ट्रेन भी है इसलिये स्टोर के ऑनर से इज़ाज़त ले कर –आपको अभी ड्रेस दी जा रही है– प्लीज़ थोड़ा सा कॉपरेट कीजिये।”
हम पति-पत्नी वहीं स्टूल पर बैठ गए। मैनेजर के निर्देश पर – एक लड़का हमें भाँप उड़ाती कॉफ़ी का डिस्पोजल कप थमा गया। हमारे देखते ही देखते दो लड़के आये।पुतले को एक बन्द कमरे में ले गए। दस मिनट बाद पुतला नए पोशाक में अपनी जगह पर था।

अगले बीस मिनट के बाद मैनेजर ड्रेस पैक करवा लाया।
बिलिंग के दौरान मैंने मैनेजर से कह ही दिया – ” यार, दस मिनट के काम को करने में आधा घण्टा लगा दिया।पुतला मूव करने की क्या ज़रूरत थी। यहीं फटाफट चेंज कर कपड़ा हमारे हवाले कर देता।”
“सर, हम ऐसा नहीं कर सकते। स्टोर में इस समय हर तरह के हर उम्र के लेडीज़ और जेंट्स है। पुतले में भले ही जान नहीं है पर सम्पूर्ण नारी के आकार की और आकृति की है। इस समय उसे अनड्रेस करते तो लोगो को आपत्ति हो सकती है। साथ ही ड्रेस कई दिनों से डमी पर होने के कारण धूल, लोगो के बार-बार छूने से गन्दा मुचुड़ा हुआ हो जाता है –जिसे साफ करके – प्रेस करके– मेंटेन करके ही– कस्टमर को हैंडओवर किया जाता है।”

स्टोर से बाहर निकल कर मैं सोच रहा था कि कैसे-कैसे लोगों से भरा है मेरा देश!
कोई पुतले की उरियानी देखना बर्दास्त नहीं कर सकता– कोई हरामज़दगी पर उतर जाए तो चार-चार मिलकर एक युवती का अपहरण + बलात्कार + हत्या +जलाना जैसा सब कांड कर देता है।

चाहे कारण जो भी हो हैदराबादी हरामजादों का अंजाम बिल्कुल सही हुआ था।
वे उसी योग्य थे।

अगर ज़िंदा होते तो कम से कम दस साल तक युवती के घरवालों के ह्रदय पर मूंग दलते।
वैसे ही जैसे निर्भया की माँ के ह्रदय पर दला जा रहा था।

इंसाफ अगर हैदराबाद में न हुआ तो दिल्ली में भी नहीं हुआ था।

एक में प्रताड़ित बुरे मुजरिम लोग थे।

एक में प्रताड़ित अच्छे मज़लूम लोग थे।

किसे प्रताड़ित होना चाहियें ?

जबाब सबको मालूम है। अरुण कुमार अविनाश

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विवेकानंद


अगस्त का महीना था और साल था सन 1890. भागलपुर में बाबू मन्मथनाथ के घर पर दो साधु आए। वे भगवा पहने थे। मन्मथनाथ ने पहले उनके साथ बैठकर भोजन किया फिर उन्हें ज्यादा महत्व न देते हुए; बुद्धिज़्म पर इंगलिश की एक पुस्तक लेकर पढ़ने लगे। तभी एक साधु ने टोका यह पुस्तक किस बारे में है? इस पर मन्मथनाथ ने पूछा कि क्या आप इंग्लिश जानते हैं? मन्मथनाथ का घमंड तेल के ऊपर फैले पानी की तरह तैर रहा था।

साधु ने कहा : थोड़ा-थोड़ा। मन्मथनाथ ने उनसे इंग्लिश में बुद्धिज़्म पर बात की तो जवाब इंग्लिश में ही पाकर वे चकित हो गए! योगी से ऐसी आशा नहीं की थी। योगी ऐसा कहीं से इन्हें मालूम भी नहीं पड़ा था।

मन्मथनाथ ने चर्चा बढ़ाई तो आगंतुक ने सनातन और बौद्ध विचारधाराओं के ताले खोल दिए। उन्हें शक हुआ कि यह व्यक्ति असाधारण व्यक्तित्व का धनी है। जब परिचय पर उतरे तो पता चला कि बाबू नित्यानन्द सिन्हा ने उन्हें उनके घर भेजा है। बाबू मन्मथनाथ जिनके निजी शिक्षक थे। …फिर बात उपनिषदों पर चली तो मन्मथनाथ ने उन्हें अपने आवास पर रुकने का न्योता दे दिया। अब उनका अहंकार-लोप हो गया था। इस बीच एक दिन मन्मथनाथ ने कहा कि आपको मेरे आवास पर बहुत दिक्कत हो रही होगी मैं यहाँ के एक जमींदार के घर रुकने का इंतजाम कराता हूँ। इसपर योगी ने कहा कि वैरागी का धर्म यह स्वीकार नहीं करता है। मैं यहाँ आराम से हूँ। आप चिंतित कदापि नहीं हों। साधुओं की यह टोली उनके घर 7 दिनों तक रुकी इस दौरान योग क्रिया और वेदान्त दर्शन पर बहुत सारी बातें हुई और भजन कीर्तन भी। मन्मथनाथ बहुत प्रभावित थे।

11 सितंबर 1893 को शिकागो में हुए धर्म महासम्मेलन की खबर जब मन्मथनाथ ने अखबार में पढ़ी तो वे अगाध श्रद्धा से भर गए। वे आजन्म इस बात से दुखी थे कि जिस साधु के पहले आगमन में वे स्वागत नहीं कर सके थे वे वही #विवेकानंद थे जो विश्व के मन-प्राण में बस चुके थे।

विवेकानंद के बाद उनके साथ भागलपुर आए स्वामी अखंडानन्द ने भागलपुर से संबंध कायम रखा। सन 1913 की प्राकृतिक आपदा के वक़्त ये स्वयं आए और भागलपुर तथा मुंगेर में कई राहत शिविर लगवाए।

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राम धनुष टूटने की सत्य घटना……


राम धनुष टूटने की सत्य घटना……

बात 1880 के अक्टूबर नवम्बर की है बनारस की एक रामलीला मण्डली रामलीला खेलने तुलसी गांव आयी हुई थी… मण्डली में 22-24 कलाकार थे जो गांव के ही एक आदमी के यहाँ रुके थे वहीं सभी कलाकार रिहर्सल करते और खाना बनाते खाते थे…पण्डित कृपाराम दूबे उस रामलीला मण्डली के निर्देशक थे और हारमोनियम पर बैठ के मंच संचालन करते थे और फौजदार शर्मा साज-सज्जा और राम लीला से जुड़ी अन्य व्यवस्था देखते थे…एक दिन पूरी मण्डली बैठी थी और रिहर्सल चल रहा था तभी पण्डित कृपाराम दूबे ने फौजदार से कहा इस बार वो शिव धनुष हल्की और नरम लकड़ी की बनवाएं ताकि राम का पात्र निभा रहे 17 साल के युवक को परेशानी न हो पिछली बार धनुष तोड़ने में समय लग गया था…

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इस बात पर फौजदार कुपित हो गया क्योंकि लीला की साज सज्जा और अन्य व्यवस्था वही देखता था और पिछला धनुष भी वही बनवाया था… इस बात को लेकर पण्डित जी और फौजदार में से कहा सुनी हो गया..फौजदार पण्डित जी से काफी नाराज था और पंडित जी से बदला लेने को सोच लिया था …संयोग से अगले दिन सीता स्वयंवर और शिव धनुष भंग का मंचन होना था…फौजदार मण्डली जिसके घर रुकी थी उनके घर गया और कहा रामलीला में लोहे के एक छड़ की जरूरत आन पड़ी है दे दीजिए….. गृहस्वामी ने उसे एक बड़ा और मोटा लोहे का छड़ दे दिया छड़ लेके फौजदार दूसरे गांव के लोहार के पास गया और उसे धनुष का आकार दिलवा लाया। रास्ते मे उसने धनुष पर कपड़ा लपेट कर और रंगीन कागज से सजा के गांव के एक आदमी के घर रख आया…

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रात में रामलीला शुरू हुआ तो फौजदार ने चुपके धनुष बदल दिया और लोहे वाला धनुष ले जा के मंच के आगे रख दिया और खुद पर्दे के पीछे जाके तमाशा देखने के लिए खड़ा हो गया…रामलीला शुरू हुआ पण्डित जी हारमोनियम पर राम चरणों मे भाव विभोर होकर रामचरित मानस के दोहे का पाठ कर रहे थे… हजारों की संख्या में दर्शक शिव धनुष भंग देखने के लिए मूर्तिवत बैठे थे… रामलीला धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था सारे राजाओं के बाद राम जी गुरु से आज्ञा ले के धनुष भंग को आगे बढ़े…पास जाके उन्होंने जब धनुष हो हाथ लगाया तो धनुष उससे उठी ही नही कलाकार को सत्यता का आभास हो गया गया उस 17 वर्षीय कलाकार ने पंडित कृपाराम दूबे की तरफ कतार दृष्टि से देखा तो पण्डित जी समझ गए कि दाल में कुछ काला है…उन्होंने सोचा कि आज इज्जत चली जायेगी हजारों लोगों के सामने और ये कलाकार की नहीं स्वयं प्रभु राम की इज्जत दांव पर लगने वाली है.. पंडित जी ने कलाकार को आंखों से रुकने और धनुष की प्रदक्षिणा करने का संकेत किया और स्वयं को मर्यादा पुरुषोत्तम के चरणों में समर्पित करते हुए आंखे बंद करके उंगलियां हारमोनियम पर रख दी और राम जी की स्तुति करनी शुरू….

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जिन लोगों ने ये लीला अपनी आँखों से देखी थी बाद में उन्होंने बताया कि इस इशारे के बाद जैसे पंडित जी ने आंख बंद करके हारमोनियम पर हाथ रखा हारमोनियम से उसी पल दिव्य सुर निकलने लगे वैसा वादन करते हुए किसी ने पंडित जी को कभी नहीं देखा था…सारे दर्शक मूर्तिवत हो गए… नगाडे से निकलने वाली परम्परागत आवाज भीषण दुंदभी में बदल गयी..पेट्रोमेक्स की धीमी रोशनी बढ़ने लगी आसमान में बिन बादल बिजली कौंधने लगी और पूरा पंडाल अद्भुत आकाशीय प्रकाश से रह रह के प्रकाशमान हो रहा था…दर्शकों के कुछ समझ में नही आ रहा था कि क्या हो रहा और क्यों हो रहा….पण्डित जी खुद को राम चरणों मे आत्मार्पित कर चुके थे और जैसे ही उन्होंने चौपाई कहा—

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लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें॥

तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा॥

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पण्डित जी के चौपाई पढ़ते ही आसमान में भीषण बिजली कड़की और मंच पर रखे लोहे के धनुष को कलाकार ने दो भागों में तोड़ दिया…

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लोग बताते हैं हैं कि ये सब कैसे हुआ और कब हुआ किसी ने कुछ नही देखा सब एक पल में हो गया..धनुष टूटने के बाद सब स्थिति अगले ही पल सामान्य हो गयी पण्डित जी मंच के बीच गए और टूटे धनुष और कलाकार के सन्मुख दण्डवत हो गए…. लोग शिव धनुष भंग पर जय श्री राम का उद्घोषणा कर रहे थे और पण्डित जी की आंखों से श्रद्धा के आँसू निकल रहे थे..

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…राम “सबके” है एक बार “राम का” होकर तो देखिए…..

🚩राम सियाराम🚩
🚩सियाराम जय जय राम 🚩

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐शिक्षा से समाज सेवा💐💐

एक समय की बात है स्वामी विवेकानंद अपने आश्रम में वेदों का पाठ कर रहे थे, तभी उनके पास चार ब्राह्मण आए वह बड़े व्याकुल थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह किसी प्रश्न का हल ढूंढने के लिए परिश्रम कर रहे हैं।

चारों ब्राह्मण ने स्वामी जी को प्रणाम किया और कहा – स्वामी जी! हम बड़ी दुविधा में हैं , आपसे अपने समस्या का हल जानना चाहते हैं। हमारी जिज्ञासाओं को शांत करें

स्वामी जी ने आश्वासन दिया और जानना चाहा

कैसी जिज्ञासा ? कैसा प्रश्न है आपका ?
ब्राह्मण बोले महात्मा हम चारों ने वेद – वेदांतों की शिक्षा ग्रहण की है। हम सभी समाज में अलग-अलग दिशाओं में घूम कर समाज को अपने ज्ञान से सुखी, संपन्न और समृद्ध देखना चाहते हैं।

इसके लिए हमारा मार्गदर्शन करें !

स्वामी जी के मुख पर हल्की सी मुस्कान आई और उन्होंने ब्राह्मण देवताओं को कहा –

है ब्राह्मण! आप सभी यह सब लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं, इसके लिए आपको मिलकर समाज में शिक्षा का प्रचार प्रसार करना होगा।

ब्राह्मण देवता शिक्षा से हमारा लक्ष्य कैसे प्राप्त हो सकता है ?
स्वामी जी जिस प्रकार बगीचे में पौधे को लगाकर बाग को सुंदर बनाया जाता है, ठीक उसी प्रकार शिक्षा के द्वारा समाज का उत्थान संभव है।

शिक्षा व्यक्ति में समझ पैदा करती है , उन्हें जीवन के लिए समृद्ध बनाती है। साधनों से संपन्न होने में शिक्षा मदद करती है, सभी अभाव को दूर करने का मार्ग शिक्षा दिखाती है। यह सभी प्राप्त होने पर व्यक्ति स्वयं समृद्ध हो जाता है।

ब्राह्मण देवता को अब स्वामी विवेकानंद जी का विचार बड़े ही अच्छे ढंग से समझ आ चुका था।

अब उन्होंने मिलकर प्रण लिया वह अपने शिक्षा का प्रचार – प्रसार समाज में करेंगे यही उनकी समाज सेवा होगी।

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

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♦️♦️♦️ रात्रि कहांनी ♦️♦️♦️

👉🏿 बंदे ! शुभ कर्मों से 🏵️प्रीति करले..🙏
🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅
🌴 एक गांव था ! वह ऐसी जगह बसा था… जहाँ आने जाने के लिए एक मात्र साधन नाव थी …. क्योंकि बीच में नदी पड़ती थी और कोई रास्ता भी नहीं था.🌹
⛳ एक बार उस गाँव में महामारी फैल गई और बहुत सी मौते हो गयी… लगभग सभी लोग वहाँ से जा चुके थे… 🍃
अब कुछ ही गिने चुने लोग बचें थे और वो नाविक गाँव में बोल कर आ गया था कि मैं इसके बाद नहीं आऊँगा जिसको चलना है वो आ जाये…. सबसे पहले एक भिखारी आ गया और बोला मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है…. मुझे अपने साथ ले चलो… ईश्वर आपका भला करेगा ! नाविक सज्जन पुरुष था…. उसने कहा कि यही रुको यदि जगह बचेगी तो तुम्हें मैं ले जाऊँगा….🌻
धीरे -धीरे करके पूरी नाव भर गई सिर्फ एक ही जगह बची ! नाविक भिखारी को बोलने ही वाला था कि एक आवाज आयी रुको मैं भी आ रहा हूँ …. 🌺☀
यह आवाज जमीदार की थी…. जिसका धन-दौलत से लोभ और मोह देख कर उसका परिवार भी उसे छोड़कर जा चुका था…. अब सवाल यह था कि किसे लिया जाए….. 🌟🌴
जमीदार ने नाविक से कहा – मेरे पास सोना चांदी है …. मैं तुम्हें दे दूँगा और भिखारी ने हाथ जोड़कर कहा कि भगवान के लिए मुझे ले चलो… नाविक समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ तो उसने फैसला नाव में बैठे सभी लोगों पर छोड़ दिया और वो सब आपस में चर्चा करने लगे….🔆 इधर जमीदार सबको अपने धन का प्रलोभन देता रहा और उसने उस भिखारी को बोला ये सबकुछ तू ले ले…. मैं तेरे हाथ पैर जोड़ता हूँ….मुझे जाने दे ! तो भिखारी ने कहा:- मुझे भी अपनी जान बहुत प्यारी है अगर मेरी जिंदगी ही नहीं रहेगी तो मैं इस धन दौलत का क्या करूँगा.. ? जीवन है तो जहान है ! ⛳
तो सभी ने मिलकर… ये फैसला किया कि ये जमीदार ने आज तक हमसे लुटा ही है ब्याज पर ब्याज लगाकर हमारी जमीन अपने नाम कर ली…..और माना की ये भिखारी हमसे हमेशा माँगता रहा पर उसके बदले में इसने हमें खूब दुआएं दी और इस तरह भिखारी को साथ में ले लिया गया… ! 🌴
बस यही फैसला है… ईश्वर भी वही हमारे साथ न्याय करता है… जब अंत समय आता हैं … वो सारे कर्मों का लेखा- जोखा हमारे सामने रख देता हैं और फैसले उसी हिसाब से होते हैं … फिर रोना गिड़गिगिड़ाना काम नहीं आता ! शुभ कर्म ही साथ होते है… ✨🌏
☀ इसलिए अभी भी वक्त है- हमारे पास सम्भलने का….और शुभ कर्म करने का….. बाद में कुछ नहीं होगा… शायद इसलिए कहा गया है.. अब पछताय क्या जब चिड़ियाँ चुग गयी खेत…. 🦆*🌷 🙏 ॐ नमः*🙏🌷*

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रसखान


🔥 “#भक्त #रसखान” 🔥 एक मुसलमान था जो रोज पान की दुकान पर पान खाने जाता था। एक दिन उसकी नजर वहाँ लगी हुई #कन्हैया की तस्वीर पर पड़ी तो उसने पान वाले से पूछा भाई ये बालक किसका है और इसका क्या नाम है। पान वाला बोला ये श्याम है। खान साहब बोले ये बालक बहुत सुन्दर है, घुंघराले बाल हैं, हाथ में मुरली भी मनोहर लगती है मगर ये जिस जमीन पर खड़ा है वो खुरदरी है, इसके पैरों में छाले पड़ जायेंगे, इसको चप्पल क्यों नहीं पहनाते हो। पान वाला बोला तुझे दया आ रही है तो तू ही पहना दे। ये बात खान भाई के दिल में उतर गई और दूसरे दिन कन्हैया के लिए चप्पल खरीदकर ले आया और बोला लो भाई मैं चप्पल ले आया बुलाओ बालक को। पान वाला बोला कि ये बालक यहाँ नहीं रहता है ये वृंदावन रहता है, #वृंदावन ही जाओ। खान साहब ने पूछा की इसका पता तो बताओ कि वृंदावन में कहाँ रहता है पान वाला बोला इसका नाम श्याम है और #वृंदावन के #बांके #बिहारी मन्दिर में रहता है। खान साहब वृंदावन के लिए चल दिए वृंदावन में बांके बिहारी मंदिर में जैसे ही प्रवेश करने लगा तो मंदिर के पुजारी ने बाहर ही रोक दिया और कहा कि तुम दूसरे समाज के हो इसलिए मंदिर में तुम्हारा प्रवेश नहीं कर सकते। खान भाई यह सोचकर कि मेरा श्याम कभी तो घर से बाहर आयेगा मन्दिर के गेट पर ही बैठकर इन्तजार करने लग गया। उसे इन्तजार करते-करते पूरा दिन निकल गया रात भी निकल गई भोर का समय था तो उसके कानों में घुंघरूओं की आवाज आई उसने खड़ा होकर चारों तरफ देखा कुछ दिखाई नहीं दिया फिर उसने अपने चरणों की तरफ देखा तो श्याम उसके चरणों में बैठा हुआ दिखते हैं। श्याम को देखकर खान भाई की खुशी का ठिकाना नहीं रहा मगर उसे बहुत दुःख हुआ जब कन्हैया के चरणों से खून निकलता हुआ देखा। खान भाई नें कन्हैया को गोद में उठाकर प्यार से उसके चरणों से खून पूँछते हुए पूछा बेटे तेरा क्या नाम है कन्हैया बोला श्याम, खान भाई बोला तुम तो मंदिर से आये हो फिर ये खून क्यों निकल रहे हैं। कन्हैया बोला नहीं मैं मन्दिर से नहीं गोकुल से पैदल चलकर आया हूँ क्योंकि तुमने मेरी जैसी मूरत दिल में बसाई में उसी मूरत में तुम्हारे पास आया हूँ इसलिए मुझे गोकुल से पैदल आना पड़ा है और पैरों में काँटे लग गये हैं। खान भाई भगवान को पहचान गया और वादा किया कि हे कन्हैया, हे मेरे मालिक, में तेरा हूँ और तेरे गुण गाया करुँगा और तेरे ही पद लिखा करूँगा इस तरह एक मुसलमान खान भाई से #रसखान बनकर भगवान का पक्का भक्त बना। "जय जय श्री राधे"

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मुफ्त खोरी और कॉम्युनिस्ट


एक जमाना था .. कानपुर की “कपड़ा मिल” विश्व प्रसिद्ध थीं कानपुर को “ईस्ट का मैन्चेस्टर” बोला जाता था। लाल इमली जैसी फ़ैक्टरी के कपड़े प्रेस्टीज सिम्बल होते थे. वह सब कुछ था जो एक औद्योगिक शहर में होना चाहिए।
मिल का साइरन बजते ही हजारों मज़दूर साइकिल पर सवार टिफ़िन लेकर फ़ैक्टरी की ड्रेस में मिल जाते थे। बच्चे स्कूल जाते थे। पत्नियाँ घरेलू कार्य करतीं । और इन लाखों मज़दूरों के साथ ही लाखों सेल्समैन, मैनेजर, क्लर्क सबकी रोज़ी रोटी चल रही थी।


फ़िर “कम्युनिस्टो” की निगाहें कानपुर पर पड़ीं.. तभी से….बेड़ा गर्क हो गया।

“आठ घंटे मेहनत मज़दूर करे और गाड़ी से चले मालिक।”

ढेरों हिंसक घटनाएँ हुईं,
मिल मालिक तक को मारा पीटा भी गया।

नारा दिया गया
“काम के घंटे चार करो, बेकारी को दूर करो”

अलाली किसे नहीं अच्छी लगती है. ढेरों मिडल क्लास भी कॉम्युनिस्ट समर्थक हो गया। “मज़दूरों को आराम मिलना चाहिए, ये उद्योग खून चूसते हैं।”

कानपुर में “कम्युनिस्ट सांसद” बनी सुभाषिनी अली । बस यही टारगेट था, कम्युनिस्ट को अपना सांसद बनाने के लिए यह सब पॉलिटिक्स कर ली थी ।


अंततः वह दिन आ ही गया जब कानपुर के मिल मज़दूरों को मेहनत करने से छुट्टी मिल गई। मिलों पर ताला डाल दिया गया।

मिल मालिक आज पहले से शानदार गाड़ियों में घूमते हैं (उन्होंने अहमदाबाद में कारख़ाने खोल दिए।) कानपुर की मिल बंद होकर भी ज़मीन के रूप में उन्हें (मिल मालिकों को) अरबों देगी। उनको फर्क नहीं पड़ा ..( क्योंकि मिल मालिकों कभी कम्युनिस्ट के झांसे में नही आए !)

कानपुर के वो 8 घंटे यूनिफॉर्म में काम करने वाला मज़दूर 12 घंटे रिक्शा चलाने पर विवश हुआ .. !! (जब खुद को समझ नही थी तो कम्युनिस्ट के झांसे में क्यों आ जाते हो ??)

स्कूल जाने वाले बच्चे कबाड़ बीनने लगे…

और वो मध्यम वर्ग जिसकी आँखों में मज़दूर को काम करता देख खून उतरता था, अधिसंख्य को जीवन में दुबारा कोई नौकरी ना मिली। एक बड़ी जनसंख्या ने अपना जीवन “बेरोज़गार” रहते हुए “डिप्रेशन” में काटा।


“कॉम्युनिस्ट अफ़ीम” बहुत “घातक” होती है, उन्हें ही सबसे पहले मारती है, जो इसके चक्कर में पड़ते हैं..!

कॉम्युनिज़म का बेसिक प्रिन्सिपल यह है :

“दो क्लास के बीच पहले अंतर दिखाना, फ़िर इस अंतर की वजह से झगड़ा करवाना और फ़िर दोनों ही क्लास को ख़त्म कर देना”!!