Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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દુબઈને દુનિયાના નકશામાં
એક આગવી વિશિષ્ટ ઓળખ અપાવનાર
શેખ રશીદને પત્રકારે પ્રશ્ન પૂછ્યો:
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“તમને તમારા દેશનું ભવિષ્ય કેવું લાગે છે?”
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શેખ રશીદે જવાબ આપ્યો તેને બહુ ધ્યાનથી સમજવા જેવો છે. તેમાં આધુનિક સમયના યુવાનો માટે બહુ મોટો ગર્ભિત સંદેશ સમાયેલો છે.
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જવાબ વાંચો….
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“મારા દાદા ઊંટ ચલાવતા.
મારા પિતા પણ ઊંટ પર સવારી કરતા.
હું મર્સિડિઝમાં બેસું છું.
મારો પુત્ર લેન્ડ રોવરમાં ફરે છે.
મારો પૌત્ર પણ લેન્ડરોવરમાં અથવા
તેથી ય મોંઘી અને આધુનિક સુવિધાઓવાળી
કારમાં ફરશે.
પરંતુ……
મને ખાત્રી છે કે
મારો પ્રપૌત્ર પુન:
ઊંટ પર સવારી કરશે…!!!”
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પત્રકારને આશ્ચર્ય થયું.
કોઈને પણ આશ્ચર્ય જ થાય એવો જવાબ હતો.
કુબેરનો ભંડાર ધરાવતો ભંડારી
આવું શા માટે કહે…???
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પત્રકારે સામો પ્રશ્ન કર્યો:
“તમે એવું કેમ કહો છો?”
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હવે શેખ રશીદ જે સાહજીકતાથી જવાબ આપે છે
એ ખરેખર સમજવા જેવો છે.
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શેખ રશીદ ઉત્તર આપતાં કહે છે:
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“સંઘર્ષ અને મુશ્કેલીઓ
મજબૂત માણસો પેદા કરે છે.
મજબૂત માણસો પોતાના સામર્થ્યથી,
સમય અને જીવન બંનેને આસાન બનાવી દે છે.
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તકલીફો વિનાની સરળ જિંદગી
નિર્બળ માણસો પેદા કરે છે.
નિર્બળ માણસો સમયને
સમજવામાં ઊણા ઊતરે છે
અને
તેઓ જીવનમાં મુશ્કેલીઓને નિમંત્રે છે.
આવી પડેલી આપત્તિઓનો
સામનો કરવાની સમજણ ન હોય તેવા
પોતાની પાસે જે કાંઈ હોય
તે પણ ગુમાવી બેસે છે.
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આપણે બળવાન યોદ્ધા પેદા કરવા જોઈએ
નહીં કે પરજીવી”
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શેખ રશીદનું આ વિધાન
આજની ટેકનોલોજીની સગવડમાં
કોઈપણ જાતની અગવડ વગર
ઉછરી રહેલી અને જીવી રહેલી
આધુનિક પેઢી માટે Eye Opener છે.
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આધુનિકતાથી પોષણ પામતા સંતાનોને
આપણે જે મુશ્કેલીઓનો સામનો કરવો પડેલો,
તેનાથી તેઓને દૂર રાખવાના મોહમાં,
શક્ય તેટલી વધુ સુવિધાઓ પૂરી પાડીએ છીએ
અને અન્ય પર અવલંબિત રહીને
જીવન જીવતાં શિખવાડીએ છીએ.
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પરિણામે તેઓ સ્વયંની શક્તિથી,
સ્વયંની સમજણથી,
સ્વયંની કુનેહથી કે
સ્વયંની આવડત અને હોંશિયારીથી
વિકાસ કે સફળતાના પગથિયાં
ચડવાનું સામર્થ્ય ગુમાવી બેસે છે.
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સંક્ષેપમાં…
આ કારણોથી જ
આપણે શક્તિમાન નહીં પણ
નિર્બળ વારસદારો તથા
નેતાઓ પેદા કરી રહ્યા છીએ.
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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐मेहनत की रोटी💐💐

प्राचीन काल में देवदत्त नाम का एक चोर रहता था। वह छोटी-मोटी चोरियां अपना भरण-पोषण करता था। एक बार जब वह एक सेठ के घर चोरी तो सिपाहियों ने उसे घेर लिया। उसके कई साथी पकड़ लिए गए। वह जान बचाकर भाग निकला। सिपाही उसके पीछे पड़े हुए थे।

अपनी जान बाने के लिए वह एक आश्रम में जा छुपा। जब सिपाही चले गए तो वह आश्रम स्वामी के पास गया और उनसे अपनी शरण में लेने की विनती की। यद्यपि स्वामी जी उसकी असलियत से परिचित हो चुके थे। किंतु उन्होंने उसे यह सोचकर आश्रम में रहने की अनुमति दे दी कि शायद सुसंगति से वह सुधर जाए।

देवदत्त तपस्वियों के वेष में आश्रम में रहने लगा। वह दुराचारी व्यक्ति था। ससंगति के बावजूद उसके स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आया। आश्रम के स्वामी जी के पास एक सोने की कुल्हाड़ी थी। जिसे आत्मरक्षा के लिए वे सदैव अपने पास रखते थे। वह सोने की कुल्हाड़ी देवदत्त की नजरों में चढ़ चुकी थी। देवदत्त किसी प्रकार कुल्हाड़ी को चुराना चाहता था।

आखिरकार एक दिन उसे मौका मिल गया। जब स्वामी जी सो रहे थे तो देवदत्त ने उस कुल्हाड़ी को चुरा लिया। देवदत्त ने वह कुल्हाड़ी एक थैले में छुपा ली। उसी रात वह आश्रम से चुपचाप निकल गया।

अगले दिन प्रातः देवदत्त आश्रम से बहुत दूर जा चुका था। देवदत्त ने सोचा कि वह सोने की कुल्हाड़ी को किसी स्वर्णकार के यहां बेच दे। जिससे उसे धन की प्राप्ति हो सके। यह सोचकर देवदत्त एक स्वर्णकार के पास पहुंचा और सोने की कल्हाडी का सौदा तय करने लगा। स्वर्णकार ने सोने की कुल्हाडी दिखाने को कहा। देवदत्त ने जैसे ही कुल्हाड़ी को निकाला उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा।

सोने की कुल्हाड़ी की जगह उसके थैले से लोहे की कुल्हाड़ी निकली। यह देख देवदत्त के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि एक रात में इतना परिवर्तन कैसे हो सकता है। स्वर्णकार ने जब लोहे की कुल्हाड़ी देखी तो देवदत्त को फटकारते हुए अपनी दुकान से निकाल दिया। देवदत्त को स्वर्णकार के ऊपर गुस्सा आ रहा था। साथ-साथ उसे इस बात का आश्चर्य भी हो रहा था कि सोने की कुल्हाड़ी लोहे की कुल्हाड़ी में कैसे परिवर्तित हो गई।

देवदत्त लोहे की कुल्हाड़ी लिए भटकता रहा, किंतु उसे उसका कोई ग्राहक नहीं मिला। थक-हार कर वह एक वृक्ष के नीचे बैठकर आराम करने लगा। उसे इस बात की चिंता थी कि वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कैसे कर पाएगा। और इस बात का दुख भी था कि उसने स्वामी जी को धोखा देकर कल्हाड़ी चुराई क्यों? उसे लगा कि जैसे उसे उसकी करनी का फल मिल गया हो। वह भूख और प्यास से व्याकुल था।

वह उदास मन से बैठा ही था कि अचानक उसकी नजर सामने वन में कार्य कर रहे मजदूरों पर गई। वे लकड़ियां काट रहे थे। देवदत्त के दिमाग में विचार आया कि क्यों न वह भी रोजी-रोटी के लिए कुछ काम ही करे। इसके अलावा उसे कोई दूसरा विकल्प नजर नहीं आ रहा था। पेट की आग बुझाने के लिए कुछ न कछ तो करना ही था। अत: मन में निश्चय कर वह ठेकेदार के पास जा पहुंचा और उससे काम देने का आग्रह किया। ठेकेदार ने उसे लकड़ी काटने का काम दे दिया, जिसे उसने हंसी-खुशी स्वीकार कर लिया। उसके पास कुल्हाड़ी तो थी ही, अत: वह अविलंब अपनी कुल्हाड़ी लेकर लकड़ी काटने चल पड़ा।

उस दिन देवदत्त ने खूब मेहनत की। ठेकेदार उसके काम से बहुत प्रसन्न हुआ और उसे पारिश्रमिक के रूप में कुछ स्वर्ण मुद्राएं दीं। साथ ही अगले दिन भी आने को कहा। देवदत्त स्वर्ण मुद्राएं पाकर अति प्रसन्न हुआ। वह उन मुद्राओं से बाजार से आवश्यक वस्तुएं खरीद लाया। शाम को देवदत्त ने अपने हाथों से भोजन तैयार किया। रोटियां देवदत्त को आज कुछ ज्यादा ही मीठी लग रही थीं, क्योंकि वह मेहनत की रोटियां थीं।

उसे ज्ञात हो चुका था कि जो वस्तु मेहनत से प्राप्त होती है वह आत्मा को कितना सकून व आनंद प्रदान करती है। उन रोटियों का स्वाद देवदत्त को इतना अच्छा लगा कि उसने मेहनत की रोटी ही कमाने का निश्चय कर लिया।

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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गुरु गोविंसिंहजी


विश्व के एकमात्र योद्धा जिनकी लड़ाई न राज्य के सीमा के लिए थी, न धन के लिए और न ही किसी अन्य लालसा के लिए था … वो था मात्र धर्म रक्षा का संकल्प युद्ध …
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महाभारत था धर्म युद्ध और अर्जुन से बड़ा धनुर्धारी न पैदा हुआ लेकिन पुत्र अभिमन्यु वध का समाचार मिलते ही दुःख और क्षोभ से गांडीव फ़िसल गया, पैर काँप गया …… अर्जुन के गुरु द्रोण अपने पुत्र की मृत्यु के झूठे ख़बर मात्र से धनुष रख के रोने लगे और युद्ध बंद कर दिया ….
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पुत्र से बिछड़ने मात्र के संताप से देवासुर संग्राम के विजेता चक्रवर्ती सम्राट महाराज दशरथ गिर पड़े और फिर न उठे …
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ऐसे में गुरु गोविंद सिंह मात्र एक ऐसे देवतुल्य महापुरुष हुए जिन्होंने पुत्रों को बलिदान होने के लिए अपने हाथ से सज़ा के भेजा …. चमकौर का क़िला छोड़ते समय जब उनके अनुयायियों ने अपने पगड़ी खोलकर दोनो साहबजादों के बलिदानी शरीर को ढकना चाहा तो गुरु जी ने ये कह के मना कर दिया कि बाकी के बलिदानी भी उनके पुत्र ही हैं .. फिर इनके लिए व्यवस्था क्यों, बाक़ी के वंचित रहें क्यों ?
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लड़ाई चलते रहने के समय, पुत्रों के बलिदानी होने के पहले या बाद … उफ़नाइ नदी पार करने के बाद उसी हाल में गुरु जी ने धर्म रक्षा के लिए बिना विचलित हुए ईश्वर का पूजन और शबद कीर्तन भी किया ….
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चारों साहबजादों के बलिदान होने पर गुरु जी ही एक मात्र थे, जिनके न पैर कांपे, न धनुष फिसला, न तलवार की चमक कम हुई, जिन्होंने धर्म रक्षार्थ योद्धा लोगों की ओर देखकर कहा …
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इन पुतरन के शीश पर वार दिए सुत चार ..
चार मुए तो क्या हुआ, जीवित कई हज़ार ..
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ऐसे महानायक, महायोद्धा, धर्मरक्षक, महाज्ञानि ईश्वर तुल्य गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म दिवस है ……
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किसी के भी जीवन में मनाने के लिए इससे बड़ा उपलक्ष और क्या हो सकता है ….
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शत शत प्रणाम ….
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Ranjay Tripathi जी का शानदार लेख..