Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक समय ऐसा था जब हमारे समाज में मांगलिक आयोजन तवायफों की अनुपस्थिति में अपूर्ण समझे जाते थे।मांगलिक तो छोड़िए आज भी धार्मिक अनुष्ठान दुर्गापूजा में मां दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए कुम्हार तवायफ के कोठे के आंगन की मिट्टी मांगकर लाता है और सामान्य मिट्टी में मिलाकर मूर्ति बनाता है और उसी मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा कर हम लोग पूजन करते है
क्या है लॉजिक?????
यह साल 1970 में उस दौर की बात है जब शन्नो बाई 68 साल की थीं. जवानी की परछाई उनसे उतर रही थी और वो वृद्धावस्था में प्रवेश कर चुकी थीं.

एक दौर था जब अमीर और बाहुबली उनका मुजरा सुनने आते थे और रात की महफिल में चुनिंदा मेहमानों को ही जगह मिल पाती थी.

शन्नो उस समय हैरान रह गईं जब मूर्तियां बनाने वाला एक कुम्हार उनके कोठे में आया और पूछा कि क्या वह उनके आंगन से थोड़ी मिट्टी ले सकता है. बेहद दुबले से उस बुज़ुर्ग से शन्नो बोलीं, “किसलिए चाहिए?” उसने जवाब दिया, “मां दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए.
“मैं वो महिला हूं जिसे समाज अपवित्र मानता है. तो फिर तुम्हें यहां की मिट्टी क्यों चाहिए? और वैसे भी तुम देख सकते हो कि ये आंगन कच्चा नहीं है. तो फिर मिट्टी कैसे ले जाओगे?”

प्रतिमा बनाने वाला वह शख़्स थोड़ा उलझन में पड़ गया मगर फिर उसका चेहरा अचानक खिल उठा. उसने कुछ गुलदस्तों की ओर इशारा किया और कहा, “मैं इनसे मिट्टी ले सकता हूं. ये भी तो आपके आंगन का ही हिस्सा हैं.”

शन्नो बाई मुस्कुराईं और गर्दन हिलाकर उन्होंने सहमति दे दी. जब यह आदमी चला गया तो शन्नो बाई ने एक बड़ी बाई से पूछा कि दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए तवायफ़ के आंगन की मिट्टी क्यों चाहिए होती है.

देवकी बाई ने कहा कि उन्होंने एक कहानी सुनी है कि यह मिट्टी समाज की लालसाएं हैं जो कोठों पर जमा हो जाती हैं. इसे दुर्गा को अर्पित किया जाता है ताकि जिन्होंने ग़लतियां की हैं, उन्हें पापों से मुक्ति मिल जाए.
आगे उन्होंने कहा कि एक बार एक ऋषि ने देवी की प्रतिमा बनवाई और बड़े गर्व से इसे अपने आश्रम के सामने स्थापित कर दिया ताकि लोग आएं और नौ दुर्गा या नवरात्रि में वहां आकर पूजा कर सकें. उसी रात को देवी उस ऋषि के सपने में आई और कहा कि मेरी नजर में घमंड की कोई इज्जत नहीं है. देवी ने बताया कि उन्हें इंसानियत और बलिदान चाहिए और इसके बिना आस्था खोखली है.

फिर ऋषि ने पूछा, “हे देवी, फिर मैं क्या करूं?” तब देवी ने कहा कि शहर में रहने वाली तवायफों के कोठे से कीचड़ लाओ और कुम्हार से कहो कि इसे मिट्टी में मिलाकर मेरी नई प्रतिमा बनाए. तभी मैं उस प्रतिमा को इस लायक मानूंगी कि जब पुजारी इसमें प्राण प्रतिष्ठा करे, मैं उसमें प्रवेश कर सकूं.

“जिन लोगों को समाज में उपेक्षित कर दिया जाता है, जिन्हें बुरा या पापी समझा जाता है, वे अपनी मर्जी से ऐसे नहीं होते बल्कि जो लोग उनका शोषण करते हैं, वे उन्हें ऐसा बनाते हैं. वे भी मेरे आशीष के हक़दार हैं”, देवी ने कहा और अंतर्धान हो गईं.

ऋषि ने उठकर वही किया जो देवी ने कहा था. तभी से मूर्ति बनाने वाले (कुम्हारटोली वाले भी) इसी पुरानी परंपरा का पालन करते हैं.

Dinesh Singh

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