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सालगिरह


जल्दी-जल्दी अपना काम निपटाकर जॉन ऑफिस से बाहर निकला। आज उसकी एनीवर्सरी थी। उसका टीना से वादा था कि आज का दिन वह सदा उसके साथ बिताएगा। पर सुबह सुबह बॉस का फ़ोन आ गया था, कुछ ज़रूरी फाइल्स निपटानी थी कल के प्रेजेंटेशन के लिए।

फूलवाले से उसने लाल गुलाब खरीदे, टीना के पसन्दीदा फूल थे ये। उसने गाड़ी फुल स्पीड से बढ़ा दी। तभी उसकी नज़र टीना के सेल्फी पर पड़ी।
उसके नीचे लिखा था,
“मुझे पता है तुम मुझसे बहुत प्यार करते हो, तुम्हें जल्दी से मेरे पास पहुँचना है, पर तुम कभी तेज़ गाड़ी नहीं चलाओगे।
तुम्हारी टीना!”
पैर खुद-ब-खुद ब्रेक पर चले गए!

तीन वर्ष पुरानी बात थी। उनकी तीसरी एनीवर्सरी थी। सनसेट के बाद उनका मूवी देखने का प्लान था। टीना के फ़ेवरिट हीरो की फ़िल्म थी। जॉन भूल न जाए, इसलिए टीना ने उसे ढेरों मैसेज कर दिए थे। उस दिन बॉस ने छुट्टी भी नहीं दी और देर तक काम भी कराता रहा। लौटते वक्त, घर पहुँचने की जल्दी में जॉन ने खूब स्पीड से गाड़ी चलाई। जब टीना के पास पहुँचा तो सिर व हाथों पर पट्टियाँ बंधी हुई थीं!

उसे देख दौड़ी चली आई थी टीना! बेतहाशा रोते हुए उसे सीने से भींच लिया था।
“मुझे लगा, मैंने तुम्हें खो दिया है! अब आगे से ऐसा कुछ मत करना।”
उसने जॉन को बहुत समझाया, उससे वादा भी लिया कि वह तेज गाड़ी नहीं चलाएगा।
“मुझे बिल्कुल भरोसा नहीं तुम पर। कार में बैठ तुम मदहोश हो जाते हो!” उसकी पट्टियों वाली शक्ल के साथ उसने सेल्फी खींची और प्रिंट लेकर स्टीयरिंग व्हील के सामने लगा दी थी।
बहुत प्यार करती थी टीना उससे!

अपनी एनीवर्सरी वे बीच पर मनाते थे… आती हुई लहरों के बीच, हाथों में हाथ थामे डूबते हुए सूरज को देखते रहते। फिर कोई मूवी देखते। और अंत में एक अच्छी सी जगह डिनर! पर विगत दो वर्षों से…

“आ गया मैं, डिअर! नाराज़ मत हो। मि. शर्मा ने बुला लिया था। तुम्हें पता है, उन्हें अब मुझ पर नाज़ है। मैं उनका पसंदीदा एम्प्लॉई हूँ। अरे, हँसो मत! वो अब सचमुच मुझ पर सबसे ज़्यादा भरोसा करते हैं।”
……….
“हाँ, मैं अपनी पूरी देखभाल कर रहा हूँ, बिल्कुल वैसे ही, जैसे तुमने कहा था!”
………..
“पर अब मन करता है तुम्हारे पास आ जाऊँ, जल्दी से…”
अपने अविरल बहते आँसुओं की तरफ से बेपरवाह, जॉन ने गुलाब के लाल फूल टीना को दे दिए। वह कितना खुश हो जाती थी इन फूलों को पाकर। पर आज……

“हमारे सालगिरह की बहुत बहुत बधाई, प्रिय टीना!”

फूल उसने टीना के कब्र पर रख दिए थे। हाँ, अब टीना यहीं थी। सबको सेफ ड्राइविंग का सलाह देने वाली टीना को सड़क दुर्घटना में एक शराबी, मदहोश ड्राइवर ने टक्कर मार दी थी।

स्वरचित
प्रीति आनंद अस्थाना

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बहुत समय पहले की बात है एक बड़ा सा तालाब था उसमें सैकड़ों मेंढक रहते थे। तालाब में कोई राजा नहीं था, सच मानो तो सभी राजा थे। दिन पर दिन अनुशासन हीनता बढ़ती जाती थी और स्थिति को नियंत्रण में करने वाला कोई नहीं था। उसे ठीक करने का कोई यंत्र तंत्र मंत्र दिखाई नहीं देता था। नई पीढ़ी उत्तरदायित्व हीन थी। जो थोड़े बहुत होशियार मेंढक निकलते थे वे पढ़-लिखकर अपना तालाब सुधारने की बजाय दूसरे तालाबों में चैन से जा बसते थे।
हार कर कुछ बूढ़े मेंढकों ने घनी तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर लिया और उनसे आग्रह किया कि तालाब के लिये कोई राजा भेज दें। जिससे उनके तालाब में सुख चैन स्थापित हो सके। शिव जी ने प्रसन्न होकर नंदी को उनकी देखभाल के लिये भेज दिया। नंदी तालाब के किनारे इधर उधर घूमता, पहरेदारी करता लेकिन न वह उनकी भाषा समझता था न उनकी आवश्यकताएँ। अलबत्ता उसके खुर से कुचलकर अक्सर कोई न कोई मेंढक मर जाता। समस्या दूर होने की बजाय और बढ़ गई थी। पहले तो केवल झगड़े झंझट होते थे लेकिन अब तो मौतें भी होने लगीं।
फिर से कुछ बूढ़े मेंढकों ने तपस्या से शिव जी को प्रसन्न किया और राजा को बदल देने की प्रार्थना की। शिव जी ने उनकी बात का सम्मान करते हुए नंदी को वापस बुला लिया और अपने गले के सर्प को राजा बनाकर भेज दिया। फिर क्या था वह पहरेदारी करते समय एक दो मेंढक चट कर जाता। मेंढक उसके भोजन जो थे। मेंढक बुरी तरह से परेशानी में घिर गए थे।
फिर से मेंढकों ने घबराकर अपनी तपस्या से भोलेशंकर को प्रसन्न किया और कहा कि आप कोई पशु पक्षी राज करने के लिये न भेजें कोई यंत्र या मंत्र दे दें जिससे तालाब में सुख शांति स्थापित हो सके। शिव ने सर्प को वापस बुला लिया और अपनी शिला उन्हें पकड़ा दी। मेंढकों ने जैसे ही शिला को तालाब के किनारे रखा वह उनके हाथ से छूट गई और बहुत से मेंढक दबकर मर गए। मेंढकों की समस्याओं हल होना तो दूर उनके ऊपर मुसीबतों को पहाड़ टूट पड़ा
फिर क्या था। तालाब के मेंढकों में हंगामा मच गया। चीख पुकार रोना धोना वे मिलकर शिव की उपासना में लग गए,
‘हे भगवान, आपने ही यह मुसीबत हमें दी है, आप ही इसे दूर करें।’
शिव भी थे तो भोलेबाबा ही, सो जल्दी से प्रकट हो गए।
मेंढकों ने कहा, ‘आपका भेजा हुआ कोई भी राजा हमारे तालाब में व्यवस्था नहीं बना पाया। समझ में नहीं आता कि हमारे कष्ट कैसे दूर होंगे। कोई यंत्र या मंत्र काम नहीं करता। आप ही बताएँ हम क्या करें?’
इस बार शिव जी जरा गंभीर हो गए। थोड़ा रुक कर बोले, यंत्र मंत्र छोड़ो और स्वतंत्र स्थापित करो। मैं तुम्हें यही शिक्षा देना चाहता था। तुम्हें क्या चाहिये और तुम्हारे लिये क्या उपयोगी वह केवल तुम्हीं अच्छी तरह समझ सकते हो। किसी भी तंत्र में बाहर से भेजा गया कोई भी विदेशी शासन या नियम चाहे वह कितना ही अच्छा क्यों न हो तुम्हारे लिये अच्छा नहीं हो सकता। इसलिये अपना स्वाभिमान जागृत करो, संगठित बनो, अपना तंत्र बनाओ और उसे लागू करो। अपनी आवश्यकताएँ समझो, गलतियों से सीखो। माँगने से सबकुछ प्राप्त नहीं होता, अपने परिश्रम का मूल्य समझो और समझदारी से अपना तंत्र विकसित करो।
मालूम नहीं फिर से उस तालाब में शांति स्थापित हो सकी या नहीं। लेकिन इस कथा से भारतवासी भी बहुत कुछ सीख सकते हैं।

मिश्रा

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एक अखबार वाला प्रात:काल लगभग 5 बजे जिस समय अख़बार देने आता था, उस समय रमेश बाबू उसको अपने मकान की गैलरी में टहलते हुए मिल जाते थे ।

प्रतिदिन वह रमेश बाबू के आवास के मुख्य द्वार के सामने चलती साइकिल से निकलते हुए अख़बार फेंकता और उनको ‘नमस्ते बाबू जी’ बोलकर अभिवादन करता हुआ फर्राटे से आगे बढ़ जाता था।

क्रमश: समय बीतने के साथ रमेश बाबू के सोकर उठने का समय बदलकर प्रात: 7:00 बजे हो गया।

जब कई दिनों तक रमेश बाबू उस अखबार वाले को प्रात: टहलते नहीं दिखे तो एक रविवार को प्रात: लगभग 9:00 बजे वह उनका कुशल-क्षेम लेने उनके आवास पर आ गया।

तब उसे ज्ञात हुआ कि घर में सब कुशल- मंगल है, रमेश बाबू बस यूँ ही देर से उठने लगे थे ।

वह बड़े सविनय भाव से हाथ जोड़ कर बोला, “बाबू जी! एक बात कहूँ?”

रमेश बाबू ने कहा… “बोलो”

वह बोला… “आप सुबह तड़के सोकर जगने की अपनी इतनी अच्छी आदत को क्यों बदल रहे हैं? आपके लिए ही मैं सुबह तड़के विधानसभा मार्ग से अख़बार उठा कर और फिर बहुत तेज़ी से साइकिल चलाकर आप तक अपना पहला अख़बार देने आता हूँ…सोचता हूँ कि आप प्रतीक्षा कर रहे होंगे।”

रमेश बाबू ने विस्मय से पूछा…अरे तुम ! विधान सभा मार्ग से अखबार लेकर आते हो….इतनी दूर से ?”

“हाँ ! सबसे पहला वितरण वहीं से प्रारम्भ होता है ,” उसने उत्तर दिया।

“तो फिर तुम जगते कितने बजे हो?” रमेश बाबू ने पूछा ।

“ढाई बजे…. फिर साढ़े तीन तक वहाँ पहुँच जाता हूँ।”

“फिर ?” रमेश बाबू ने जानना चाहा ।

“फिर लगभग सात बजे अख़बार बाँटकर घर वापस आकर सो जाता हूँ….. फिर दस बजे कार्यालय…… अब बच्चों को बड़ा करने के लिए ये सब तो करना ही होता है।”

रमेश बाबू कुछ पलों तक उसकी ओर देखते रह गए और फिर बोले, “ठीक! तुम्हारे बहुमूल्य सुझाव को अवश्य ध्यान में रखूँगा।”

घटना को लगभग पन्द्रह वर्ष बीत गये।

एक दिन प्रात: नौ बजे के लगभग वह अखबार वाला रमेश बाबू के आवास पर आकर एक निमंत्रण-पत्र देते हुए बोला, “बाबू जी! बिटिया का विवाह है….. आप को सपरिवार आना है।“

निमंत्रण-पत्र के आवरण में अभिलेखित सामग्री को रमेश बाबू ने सरसरी निगाह से जो पढ़ा तो संकेत मिला कि किसी डाक्टर लड़की का किसी डाक्टर लड़के से परिणय का निमंत्रण था। तो जाने कैसे उनके मुँह से निकल गया, “तुम्हारी लड़की ?”

उसने भी जाने उनके इस प्रश्न का क्या अर्थ निकाल लिया कि विस्मय के साथ बोला, “कैसी बात कर रहे हैं, बाबू जी! मेरी ही बेटी।”

रमेश बाबू अपने को सम्भालते हुए और कुछ अपनी झेंप को मिटाते हुए बोले , “नहीं! मेरा तात्पर्य कि अपनी लड़की को तुम डाक्टर बना सके, इसी प्रसन्नता में वैसा कहा।“

“हाँ बाबू जी! मेरी लड़की ने एमबीबीएस किया है और उसका होने वाला पति भी एमडी है ……. और बाबू जी! मेरा लड़का इंजीनियरिंग के अन्तिम वर्ष का छात्र है।”

रमेश बाबू किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े सोच रहे थे कि उससे अन्दर आकर बैठने को कहूँ कि न कहूँ कि वह स्वयम् बोला, “अच्छा बाबू जी! अब चलता हूँ….. अभी और कई कार्ड बाँटने हैं…… आप लोग आइयेगा अवश्य।”

रमेश बाबू ने भी फिर सोचा… आज अचानक अन्दर बैठने को कहने का आग्रह मात्र एक छलावा ही होगा। अत: औपचारिक नमस्ते कहकर उन्होंने उसे विदाई दे दी।

उस घटना के दो वर्षों के बाद जब वह पुनः रमेश बाबू के आवास पर आया तो ज्ञात हुआ कि उसका बेटा जर्मनी के किसी नामी कंपनी में कहीं कार्यरत था।

उत्सुक्तावश रमेश बाबू ने उससे प्रश्न कर ही डाला कि आखिर उसने अपनी सीमित आय में रहकर अपने बच्चों को वैसी उच्च शिक्षा कैसे दे डाली?

उसने कहना शुरू किया….“बाबू जी! इसकी बड़ी लम्बी कथा है , फिर भी कुछ आपको बताए देता हूँ। अख़बार, नौकरी के अतिरिक्त भी मैं ख़ाली समय में कुछ न कुछ कमा लेता था । साथ ही अपने दैनिक व्यय पर इतना कड़ा अंकुश कि भोजन में सब्जी के नाम पर रात में बाज़ार में बची खुची कद्दू, लौकी, बैंगन जैसी मौसमी सस्ती-मद्दी सब्जी को ही खरीदकर घर पर लाकर बनायी जाती थी। एक दिन मेरा लड़का परोसी गयी थाली की सामग्री देखकर रोने लगा और अपनी माँ से बोला, ‘ये क्या रोज़ बस वही कद्दू, बैंगन, लौकी, तरोई जैसी नीरस सब्ज़ी… रूख़ा-सूख़ा ख़ाना…… ऊब गया हूँ इसे खाते-खाते। अपने मित्रों के घर जाता हूँ तो वहाँ मटर-पनीर, कोफ़्ते, दम आलू आदि….। और यहाँ कि बस क्या कहूँ!!'”

मैं सब सुन रहा था तो रहा न गया और मैं बड़े उदास मन से उसके पास जाकर बड़े प्यार से उसकी ओर देखा और फिर बोला, “पहले आँसू पोंछ फिर मैं आगे कुछ कहूँ।”

मेरे ऐसा कहने पर उसने अपने आँसू स्वयम् पोछ लिये। फिर मैं बोला, *”बेटा! सिर्फ़ अपनी थाली देख। दूसरे की देखेगा तो तेरी अपनी थाली भी चली जायेगी…… और सिर्फ़ अपनी ही थाली देखेगा तो क्या पता कि तेरी थाली किस स्तर तक अच्छी होती चली जाये। इस रूख़ी-सूख़ी थाली में मैं तेरा भविष्य देख रहा हूँ। इसका अनादर मत कर। इसमें जो कुछ भी परोसा गया है उसे मुस्करा कर खा ले ….।”

उसने फिर मुस्कराते हुए मेरी ओर देखा और जो कुछ भी परोसा गया था खा लिया। उसके बाद से मेरे किसी बच्चे ने मुझसे किसी भी प्रकार की कोई भी माँग नहीं रखी । बाबू जी! आज का दिन मेरे बच्चों के उसी त्याग औऱ तपस्या का परिणाम है।

उसकी बातों को रमेश बाबू बड़ी तन्मयता के साथ लगातार चुपचाप सुनते रहे औऱ बस यही सोचते रहे कि आज के बच्चों की कैसी मानसिकता है कि वे अपने अभिभावकों की हैसियत पर दृष्टि डाले बिना उन पर लगातार अपनी ऊटपटाँग माँगों का दबाव डालते रहते हैं…………!!

कोई इस दिल का हाल क्या जाने…
एक ख़्वाहिश हज़ार तह-ख़ाने…!!!

रवि कांत

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અજનબીહમસફર

“તમારૂ પોસ્ટિંગ તમને કાલે મળી જશે ” આ સાંભળી દિયા ની હાલત રડવા જેવી થઇ ગઇ .મનમાં કલેક્ટર ઉપર બો ગુસ્સો આવ્યો. 6 વાગ્યા ની પોસ્ટિંગ માટે રાહ જોતી કલેકટર ઓફીસ ની બહાર ઉભી હતી .એને પોસ્ટિંગ ની ઉતાવળ ના હતી પણ એને ઘરે જવાની ઉતાવળ હતી.એના મન માં ગુસ્સો તો આવ્યો પણ એના કરતાં વધારે એને ઘરે જવાની ચિંતા થવા લાગી. કઇ રીતે હુ ઘરે પહોચીસ. “સાલા એ અહિયાં જ 8 વગાડી દીધાં ને પાછું કેટલા અહંકારથી પોસ્ટિંગ આપવાની ના પાડી ને કહી દીધું કે કાલે આવજો.” મન માં બે ચાર ખરાબ શબ્દો ઓફિસર માટે બોલી દીધા ને ફટાફટ ઓફીસ ની બહાર નીકળી ગઈ.
દિયાની સરકારી નોકરી ભરૂચની કલેકટર કચેરીમાં લાગેલી પણ કમ્પ્યુટર સર્ટિફિકેટનાં અભાવ ને લીધે એને પોસ્ટિંગ હજુ મળ્યયુ ન હતુ.કલેકટર ઓફિસની બહાર લોબીમાં ઝડપથી ચાલતી દિયા અચાનક એક પરિચિત ચહેરો જુએ છે જેની નજર પણ દિયા સામે હોય છે, દિયા ને જોઈને એ એની પાસે આવે છે, ‘ અરે દિયા તું અત્યારે ક્યાંથી ?’ એ રાકેશ હતો જેને એ પ્રથમ દિવસે મળી હતી.બધાનું પોસ્ટિંગ થયું ત્યારે અમુક લોકોનું પોસ્ટિંગ કંઈક ડોક્યુમેન્ટેશન ને લીધે બાકી હતું જેમાં દિયા અને રાકેશ પણ હતા. એનું પોસ્ટીંગ ના થયું હોવાથી એ લોકો એકબીજા સાથે ચર્ચા કરતા હતા એમાં જ થઈ હતી દિયા અને રાકેશ ની પ્રથમ મુલાકાત .રાકેશ ને કંઈક એજ્યુકેશનલ સર્ટીફીકેટ માં પ્રોબ્લેમ હતો અને દિયા નેે કમ્પ્યુટર સર્ટિફિકેટમાં. દિયા નો પ્રોબ્લેમ જાણીને રાકેશે તેને એના ફ્રેન્ડ નો નંબર પણ આપેલો જે કમ્પ્યુટર સર્ટિફિકેટ ઇસ્યુ કરતો હતો બસ આ જ બાબતે બંન્નેનો પરિચય થયેલો.

રાકેશનું પોસ્ટિંગ તો થોડા દિવસ પહેલા જંબુસર થઇ ગયું હતું આથી તેનેે આ સમયે જોઈ દિયા નવાઈ પામી અને તેણે પણ પૂછ્યું કે ‘તુ અહીંયા?’ જવાબમાં રાકેશ એ કહ્યું કે ‘મારે કલેકટર કચેરીએ કંઈક ડોક્યુમેન્ટ આપવાના હતા પણ તું કેમ અહીંયા? અત્યારના સમયમાં ? જવાબમાં દિયા એ નિસાસો નાખતા કહ્યું ,”મનેેેે પોસ્ટિંગ માટે રાખેલી પરંતુુુ પોસ્ટિંગ ન આપ્યું ” રાકેશ એ પૂછ્યું ” પણ કેમ?” જવાબમાં દિયા એ કહ્યું “ખબર નહી એ તો કલેક્ટર છે તમે એની સામે સવાલ ના કરી શકો છેલ્લા પંદર દિવસથી મારું સર્ટિફિકેટ મેં જમા કરાવી દીધુ છે છતાં પણ પોસ્ટિંગ નથી આપ્યું અને આજે તો હદ થઈ ગઈ.હુ છ વાગ્યા ની રાહ જોઉં છું કેટલી રાહ જોવડાવી અને પછી ના પાડી દીધી “બોલતા બોલતા દિયા ની આંખમાં આસુ આવી ગયા ,રાકેશે તેનેે સમજાવી ,એમાં શું થઈ ગયું કાલે આપી દેશે એમાં રડે છે શું કામ ? દિયા એ કહ્યું કે હજુુુ મારે સુરત જવાનું છે અને અત્યારે તો મને એ પણ નથી ખબર કે સુરત માટે કોઈ બસ મળશે કે નહીં આટલા મોડા સમયે આ કલેક્ટર કચેરી માંથી નીકળવું પણ ડર લાગે એવું છે અને ત્યાં જઈને બસ ના મળે તો હું શું કરીશ એ વિચાર પણ ડરાવી મૂકે એવો છે એમ કહી દિયા રડવા લાગી . થોડીવાર પછી શાંત થઇ પોતાની જાતને સંભાળતા રાકેશને કહ્યું તારે પણ જંબુસર જવું હશે ને તો ચાલને તું પણ મારી સાથે બસ સ્ટેન્ડ સુધી.. મને પણ કંપની રહેશે .રાકેશ એ કહ્યું “હા ચલ મારે પણ જવું જ છે એક કામ કરું હું તારી સાથે સુરત આવું અને તને મૂકી જાવ ” .દિયા રાકેશ ની વાત સાંભળી થોડીવાર આશ્ચર્ય પામી. એ વ્યક્તિ જેને ફક્ત બે જ વાર મળી છે જેની સાથે કોઈ સંબંધ નથી જેને પાંચ મિનિટ પહેલા એની તકલીફની જાણ થઈ અને એને સુરત મૂકવા આવવાની વાત કરે છે ત્યાં દિયા નો ફોન વાગે છે સ્ક્રીન પર જુએ છે તો એની મમ્મી નો હોય છે દિયા ફોન રિસિવ કરીને વાત કરે છે જે રાકેશ સાંભળી શકતો હોય છે “હા મમ્મી હું આવી જઈશ તું ચિંતા ન કર બસ સ્ટેન્ડ પહોંચવા આવી હમણાં બસ આવે એટલે આવી જાવ “એમ કહી ફોન મૂકે છે એ સાથે જ રાકેશ બોલે છે ચલ સુરત મૂકી જાવ મતલબ કે હું તારી સાથે બસમાં સુરત આવું .ના હું જતી રહીશ હમણાં બસ આવી જશે દિયાએ રાકેશને કહ્યું પણ મનથી ઈચ્છતી હતી કે એ એની સાથે આવે કારણ કે એ ખૂબ જ ડરી ગઈ હતી પરંતુ રાકેશને ના એટલા માટે પાડી કે જો તે તેની સાથે સુરત આવશે તો કાલે તેની નોકરી પર કઈ રીતે જશે કેમકે સુરત થી જંબુસર ઘણું દૂર હતું એટલે અપડાઉન પણ પોસિબલ ન હતું જો એ અપડાઉન કરે તો નોકરી પર મોડો પહોંચે અને બીજી વાત રાકેશ તો ઉત્તર ગુજરાતી હતો કદાચ સુરતમાં એનું કોઈ સગુ ના હોય એટલે સુરતમાં આવે તો પણ રાત ક્યાં રોકાય ? પણ રાકેશે તેની કંઈ પણ વાત ન માની અને જાણે દિયા નું મન વાંચી કહ્યું ,”સુરત મારા મામા રહે છે હું એમના ઘરે ચાલ્યો જઈશ સવારે ત્યાંથી જંબુસર જતો રહીશ અને રહી વાત નોકરી પર પહોંચવાની તો ત્યાં તો હું બે કલાક મોડો જાવ તો પણ ચાલે ..તું બેસ બસની રાહ જો ,હું હમણાં આવ્યો” દિયા એ કહ્યુ ,”હા ” અને એ રાકેશ ના જતો જોઈ રહી મનમાં થયું કે ક્યાં ગયો હશે. ત્યાં થોડી વારમા રાકેશ પાણીની બોટલ લઇને આવ્યો અને દિયા ને આપ્યું અને કહ્યું લે પી લે. દિયા એક શ્વાસ માં ઘણું પાણી પી ગઈ ખરેખર એને તરસ લાગી હતી પણ ચિંતામાં ને ચિંતામાં એને પાણી પીવાનું પણ યાદ નહોતું આવ્યું ને જાણે રાકેશ ને ખબર પડી ગઈ હોય એ રીતે એ પાણી લઈ આવ્યો થોડીવારમાં બસ આવી રાકેશ ફટાફટ બસમાં ચડી ગયો અને જોયું તો એક સીટ ખાલી હતી એમાં બેસી ગયો પાછળથી દિયા આવી , રાકેશે જોઈ એટલે તરત એને પોતાની સીટ પર બેસવાનું કહી પોતે ઉભો થઇ ગયો. દિયા એ સીટ પર બેસી ગઈ અને રાકેશ વિશે વિચારવા લાગી. એક અજનબી ‌છતા કેટલી કેર…
” અનજાન રીશ્તા ભી આજ અચ્છા લગા,
એક અજનબી ભી દિલ કા સચ્ચા લગા.”

મિત્રો આ મારી પ્રથમ વાર્તા છે મને વાર્તા લખવાનો કોઈ અનુભવ નથી આથી આમાં ઘણી બધી ભૂલો હશે તે બદલ માફી માગું છું .વાર્તા વાંચ્યા બાદ આપના પ્રતિભાવ જરૂર આપશો .
આપ ઈન્સ્ટાગ્રામ પર dipupatel55 પર મને ફોલો કરી શકો છો.

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माफी

नन्हे राजू को जगतलाल जी की किराने की दुकान पे काम करते हुए बस सात दिन हुए थे.
पिता सुखलाल रिक्शा चलाकर राजू ,उसकी दो छोटी बहनो और पत्नी का भरण पोषण कर लिया करते थे.पर दो महीने पहले रास्ते मे बिजली के टूट कर झूलते तार ने सुखलाल को लपेटे में ले लिया था. बुरी तरह झुलस कर सुखलाल ने वही पे दम तोड़ दिया था.सरकार से मुआवजे के रूप में पांच हजार मिले थे. पर आगे जीवन चलाने के लिए कोई न कोई रास्ता ढूढना था.
राजू की मां ने दौड़ धूप कर किसी तरह नन्हे राजू को सेठ जगतलाल के किराने की दुकान में लगवा दिया था.

सेठ जी को आज दुकान बन्द करते समय हिसाब में पांच सौ रुपये की गड़बड़ी मिली तो बार बार जोड़ घटाव करने लगे.जगतलाल हिसाब के बड़े पक्के थे.पांच रुपए की भी गलती उनसे नही होती थी. फिर ये पांच सौ रुपये का गोलमाल कैसे हो गया.दुकान के बाकी दोनो मुलाजिम तो वर्षो पुराने थे बस ये राजू नया था.
सेठ जी को पक्का भरोसा होने लगा था कि राजू ने चोरी की है.
राजू को जगतलाल ने जोर से डाँटा तो नन्हा राजू फफक फफक कर रोने लगा था.
पिता के रहते उससे कभी किसी ने जोर से बात भी नही की थी.पर जगत लाल इन आंसुओ से भला कहाँ पिघलने वाले थे.
आज इसकी चोरी को नजरअंदाज कर देंगे तो कल दूसरे मुलाजीमो की भी हिम्मत बढ़ जाएगी.
बस फिर जगतलाल ने एक झन्नाटेदार थप्पड़ राजू को जड़ दिया.
राजू तो जैसे बेहोश सा हो गया था.
“बिन बाप का है इसलिए पुलिस के हवाले नही कर रहा हूँ.कल अपनी माँ को बुलाकर लाना .”
बोलते हुए जगतलाल ने धक्के से राजू को दुकान से बाहर कर दिया.
जगतलाल को अपनी पत्नी पे ग़ुस्सा आ रहा था.उसी के कहने पर उसने इस चोर लड़के को दुकान पे रखकर इतना बड़ा नुकसान कर लिया.
तमतमाये जगतलाल ने घर मे जैसे ही कदम रखा तो सामने हॉल में बड़ा सा केक सजा हुआ था.
दीवार पे हैप्पी अन्निवेर्सरी लिखा कार्डबोर्ड देख जगतलाल को याद आया कि आज उसके विवाह को सत्रह साल हो गए.
बेटे गप्पू ने बताया कि वो केक के पैसे लेने दुकान गया था पर जगतलाल को ग्राहक से बाते करते देख गल्ले से एक पांच सौ का नोट निकाल कर ले आया था.
सबकुछ सुनकर जगतलाल अपराध बोध से ग्रसित हो गया था.
उसके मन पर जैसे एक बहुत भारी पत्थर का बोझ पड़ गया हो.
“बेटा इस केक को काटने से पहले एक विशेष मेहमान को बुलाना जरूरी है.चलो हम सब उस मेहमान को लेकर आते है.”कहते हुए वो गाड़ी की तरफ बढ़ गया .बेटा और पत्नी भी उस गुमनाम मेहमान को देखने पीछे पीछे हो गए.
थोड़ी देर बाद गाड़ी राजू के झोपड़ी के बाहर रुकी.
जगतलाल ने हाथ जोड़ते हुए अंदर प्रवेश किया तो राजू लालटेन की रोशनी में छोटी बहनों को पढ़ा रहा था और उसकी मां खाना बना रही थी.
“अरे सेठजी और सेठानी जी आप दोनो.”राजू की मां जल्दी से खड़ी होते हुए बोल पड़ी.
जगत लाल अपने किये के लिए माफी मांग रहे थे.
“नही सेठजी इसमे माफी की क्या बात है.मैंने राजू को समझा दिया है कि अब उसे इन सब की आदत डाल लेनी पड़ेगी.बगैर पिता के गरीब बच्चे के लिए दुत्कार और मार तो दिनचर्या बन जाती है और आप चाहे तो घर की तलाशी ले ले.पांच सौ रुपये का भारी भरकम नोट छुपाने लायक तो जगह भी नही इस झोपड़ी में”
कहते हुए फटी चटाई उसने मेहमानों के लिए जमीन में बिछा दी.
जगत लाल को समझ नही आ रहा था कि उसे माफी मिली है या उस थप्पड़ के बदले एक बड़ा थप्पड़.

✍️सहरिया
संजय सहरिया
मुम्बई (महाराष्ट्र)

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💦👍👌👌
एक पुत्र अपने वृद्ध पिता को रात्रिभोज के लिये एक अच्छे रेस्टोरेंट में लेकर गया। खाने के दौरान वृद्ध पिता ने कई बार भोजन अपने कपड़ों पर गिराया। रेस्टोरेंट में बैठे दूसरे खाना खा रहे लोग वृद्ध को घृणा की नजरों से देख रहे थे लेकिन उसका पुत्र शांत था।

खाने के बाद पुत्र बिना किसी शर्म के वृद्ध को वॉशरूम ले गया। उनके कपड़े साफ़ किये, चेहरा साफ़ किया, बालों में कंघी की, चश्मा पहनाया, और फिर बाहर लाया। सभी लोग खामोशी से उन्हें ही देख रहे थे।

फ़िर उसने बिल का भुगतान किया और वृद्ध के साथ बाहर जाने लगा। तभी डिनर कर रहे एक अन्य वृद्ध ने उसे आवाज दी, और पूछा – क्या तुम्हें नहीं लगता कि यहाँ अपने पीछे तुम कुछ छोड़ कर जा रहे हो?

उसने जवाब दिया – नहीं सर, मैं कुछ भी छोड़कर नहीं जा रहा।

वृद्ध ने कहा – बेटे, तुम यहाँ प्रत्येक पुत्र के लिए एक शिक्षा, सबक और प्रत्येक पिता के लिए उम्मीद छोड़कर जा रहे हो।

आमतौर पर हम लोग अपने बुजुर्ग माता-पिता को अपने साथ बाहर ले जाना पसंद नहीं करते,
और कहते हैं – क्या करोगे, आपसे चला तो जाता नहीं, ठीक से खाया भी नहीं जाता, आप तो घर पर ही रहो, वही अच्छा होगा।

लेकिन क्या आप भूल गये कि जब आप छोटे थे, और आपके माता पिता आपको अपनी गोद में उठाकर ले जाया करते थे। आप जब ठीक से खा नहीं पाते थे तो माँ आपको अपने हाथ से खाना खिलाती थी, और खाना गिर जाने पर डाँट नही प्यार जताती थी।

फिर वही माँ बाप बुढ़ापे में बोझ क्यों लगने लगते हैं?

माँ-बाप भगवान का रूप होते हैं। उनकी सेवा कीजिये, और प्यार दीजिये क्योंकि एक दिन आप भी बूढ़े होंगे।

अपनेमातापिताकासर्वदासम्मानकरें।🙏🚩

रवि कांत

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कहानी
शीर्षक- “फर्क आखिर क्यों?”

उस रात जाने क्या हुआ…. सोते-सोते अचानक से जोर से खांसी आने लगी और मेरी आंख खुल गई।
तभी आवाज आई- “मम्मा जी! ठीक हो आप?”
“हां! बेटा मैं ठीक हूं, आप सो जाओ।”
मेरा दस वर्षीय बेटा…. जिसे सुबह-सवेरे न तो घड़ी का तेज बजता अलार्म जगा पाता है और न ही उसके पापा की गरजती जोरदार आवाज, आज जब मेरे जरा-सा खांसने पर, नींद में ही उसके मुंह से अनायास ही मेरे लिए ये चिंता भरे शब्द निकले…. तो सच कहूं, तो बड़ा प्यार आया अपने बेटे पर।
वैसे तो ऐसा पहली बार नहीं है, जब मुझे उस पर इस तरह से प्यार आया… वो है ही इतना प्यारा और समझदार। एक पूरे कामकाजी सप्ताह के बाद रविवार की एकमात्र छुट्टी में भी, जब वह मुझे घर के कामों में लगा हुआ देखता है, तो झुंझला जाता है और बार-बार केवल यही कहता है- “आप इतना काम क्यों करती हो?”
इसका जवाब तो मैं खुद भी नहीं जानती, चुप ही रह जाती हूं…. बस कोशिश करती हूं जल्दी से जल्दी काम निपटाने की।
सर्दियों में जल्दी ढलती मेरी शामें अक्सर रजाई में दुबककर स्वेटर बुनने में ही व्यतीत होती हैं, लेकिन मेरा प्यारा बेटा मुझसे भी ज्यादा खुश होता है उन दिनों। मेरा ऐसे फुर्सत में बैठे रहना उसे खूब भाता है।
अभी पिछले सप्ताह की बात है। दो दिन लगातार बारिश में भीग जाने से तबीयत थोड़ी खराब हो गई। उस दिन घर वापस आई, तो सिर में तेज दर्द था। बिस्तर पर लेटते ही ऐसी आंख लगी, कि शाम को ही खुली। सामने देखा, तो बेटा अपने फेवरेट बाउल में मेरे लिए मैगी लिए खड़ा था। आंखें भर आईं, मन से अनगिनत दुआएं निकल रही थीं उसके लिए और उमड़ रहा था ढेर सारा प्यार।
बार-बार मन में बस यही ख्याल आ रहा था कि कौन है वे लोग, जो कहते हैं कि बेटियां अपने माता-पिता का ध्यान बेटों से ज्यादा रखती हैं या बेटियां अपने माता-पिता का दर्द बेटों से ज्यादा महसूस करती हैं। मैं नहीं मानती ऐसी अनर्गल बातों को। बेटा हो या बेटी…. हैं तो हमारा ही अंश, हमारा ही खून दौड़ रहा है दोनों की नसों में….तो बेटियां मां-बाप के ज्यादा करीब कैसे हो सकती हैं, और बेटा उतना ही दूर कैसे हो सकता है….? बात केवल भावनाओं को, संवेदनाओं को महसूस करने की है। समाज ने, बल्कि खुद परिवार ने ही बेटों को कठोर रहना , संवेदनहीन रहना सिखाया हो…. तो बेटों की भला क्या गलती!!
हां, कुछ परिस्थितियों में अवश्य अनुवांशिक गुणों या अवगुणों के रूप में लड़के अपने पिता या दादा से संवेदनहीनता, भावहीनता अथवा क्रोध ग्रहण करते हैं। परंतु फिर भी यह हम माता-पिता का कर्तव्य है अपितु, सबसे ज्यादा तो मां का कर्तव्य है कि वह अपने बेटों में दूसरे मनुष्यों के सुख-दुख, उनकी समस्याएं, उनकी भावनाएं आदि महसूस करने के गुण विकसित करें।
परिवार की सभी स्त्रियों का सम्मान करना सिखाएं, फिर चाहे वह मां हो, बहन हो अथवा पत्नी। साथ ही न केवल अपने परिवार की, बल्कि समाज की सभी स्त्रियों का सम्मान करना सिखाएं। बस इतना ध्यान रखें कि यदि हमारी बेटियां आज बेटों की बराबरी कर रही हैं तो हमारे बेटे भी बेटियों से कम नहीं है। वे भी अपनी मां के उतने ही करीब होते हैं जितने कि बेटियां।
भेदभाव खत्म करना है तो शुरुआत खुद से ही करनी होगी। खुद बेटा-बेटी को एक समान समझिए। न किसी को कम आंकिए, न किसी को ज्यादा फिर देखिए समाज से बेटा-बेटी का भेदभाव खुद ब खुद मिट जाएगा।

स्वरचित – रुचिका राणा

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मुफ्त का लूंगा नही


कजाकिस्तान में क्या चल रहा है?

सरकार सस्ती LPG दिया करती थी। सरकार दिवालिया हो गयी तो सब्सिडी समाप्त कर दी सरकार ने। तो लोग सड़कों पर आ गए, “हमें नही पता कहाँ से पैसे लाओगे। पैसे लाओ व हमारी मुफ़्तखोरी जारी रखो। नही तो देश जलाएँगे।”

तो देश को जला रहे है कज़ाख। पुलिस व पब्लिक दोनो के कई दर्जन लोग मरने के बाद रूसी सेना आ गयी है। याने एक और अफ़ग़ानिस्तान।

मुफ़्तखोरी की तीन स्टेज होती है:

१. सरकार मुफ़्तखोरी आरम्भ करती है एक दो वस्तुओं से व थोड़े से लोगों से। फिर मुफ़्त आइटम व लाभान्वित संख्या बढ़ने लगती है।

२ सरकार दिवालिया हो जाती है व मुफ़्तखोरी समाप्त करने का प्रयास करती है। लोग सड़कों पर आ जाते है व देश को जलाना आरम्भ कर देते है। सरकार गिर जाती है। नई सरकार क़र्ज़ लेकर फिर मुफ़्तखोरी आरम्भ करती है लेकिन कुछ समय बाद ही क़र्ज़ मिलना भी बंद हो जाता है। फिर सरकार गिर जाती है। ये चक्र कुछ दिन चलता है।

३. अंतत इतना क्रूर व्यक्ति सत्ता मे आता है जो घरों में लोगों को मारने लगता है। कोई बाहर ही नही निकल पाता। मीडिया सब अपने नियंत्रण में ले लेता है व घोषित कर देता है कि कोई भूखमरी नही है व चिकित्सा व्यवस्था भी दुनिया की सबसे अच्छी है। कोई व्यक्ति कहता है कि वह भूखा है तो उसके सिर में गोली मार देता है। व्यक्ति समाप्त तो भूख समाप्त। पुरुष पलायन कर जाते है, महिलायें वैश्यावृति को विवश हो जाती है। उदाहरण: क्यूबा, उत्तर कोरिया, वेनेज़ुएला, ज़िम्बाब्वे।

ऊपर लिखी अवस्थाओ का कोई अपवाद नही है। लेकिन मुफ़्तखोरी की नई नई योजनाये देश को बर्बाद ही करती है
साभार

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सुपरहीरो_रघु (2022 की पहली कहानी 😊)

“सर कुछ काम नहीं है तो आज मैं थोड़ा जल्दी निकल जाऊं ।” एक घंटे से कुर्सी पर बैठे घड़ी की सुइयां देख रहे रघु ने प्रकाश के कैबिन में घुसते हुए कहा ।

“यार रघु, बस ये फाइल गुप्ता जी के ऑफिस में दे देना फिर तुम उधर से ही निकल जाना ।” प्रकाश ने भी एक नज़र घड़ी पर मारी और जवाब दिया ।

“ठीक है सर ।”

“और सुनो, जाने से पहले एक कप चाय पिला दो यार, सिर फटा जा रहा है ।” रघु निकल ही रहा था कि प्रकाश ने एक और काम बता दिया उसे ।

“ठीक सर, अभी लाया ।”

थोड़ी देर में रघु चाय बना कर ले आया । उसने चाय प्रकाश को दी और फाइल लेकर निकल पड़ा । हालांकि फाइल गुप्ता जी के ऑफिस तक पहुंचाना कोई आसान काम नहीं था । रघु को वहां जाने में आधा घंटा लगता और फिर वापस आ कर घर जाने में आधा घंटा और । वो लगातार अपनी घड़ी देखे जा रहा था ।

जैसे तैसे वो अपनी साइकिल खींचता हुआ गुप्ता जी के ऑफिस पहुंचा, फाइल रखी और वहां से चलने लगा ।

“अरे रघु, यार रहीम आज छुट्टी पर है और कुछ क्लाइंट्स आने वाले हैं । ज़रा यार ये समान ला दो मार्किट से ।” गुप्ता जी ने एक और काम फ़र्मा दिया था रघु को । उसने घड़ी की तरफ देखा 5.45 हो चुके थे । देर हो रही थी मगर वो गुप्ता जी को ना भी नहीं कह सकता था । मजबूरी में उसे जाना पड़ा ।

आधा घंटा लग गया उसे समान लेकर लौटने में । उसने जल्दी से समान रखा और वहां से निकलने लगा तभी गुप्ता जी बोले “रघु यार थोड़ी देर रुक जाओ । क्लाइंट्स के रहते कुछ ज़रूरत पड़ सकती है । यकीन रखो तुम्हें निराशा नहीं होगी दोस्त ।” रघु ने एक बार फिर से घड़ी की तरफ देखा । हालांकि वो जानता था गुप्ता जी दिलेर आदमी हैं । काम के बदले में वो कुछ ना कुछ तो ज़रूर देंगे । लेकिन अभी उसके लिए पैसे से भी ज़रूरी कुछ था ।

“वो बात नहीं है सर । आज ज़रा जल्दी घर जाना था ।”

“समझ सकता हूं भाई लेकिन अभी मैं किसी और को बुला भी नहीं सकता और ये क्लाइंट बहुत ज़रूरी हैं । इनके स्वागत में कमी नहीं करना चाहता मैं । देख लो अगर रुक सको तो अहसान होगा तुम्हारा । मैं सच में निराश नहीं करूंगा तुम्हें ।” गुप्ता जी को काम करवाना अच्छे से आता है और रघु तो वैसे भी दो मीठे शब्दों का भूखा रहा है हमेशा से । उसने कुछ सोचा और फिर उसे बात माननी ही पड़ी गुप्ता जी की ।

कुछ ही देर में उनके क्लाइंट्स आ गये और उनकी पार्टी शुरू हो गई । देखते देखते 2 घंटे बीत गए । इस बीच रघु को कई बार बाज़ार दौड़ना पड़ा था । 8.30 हो चुके थे । गुप्ता जी ने रघु की तरफ देखा और फिर उसे बाहर ले गए ।

“मुझे लगता है अब कुछ चाहिए नहीं होगा । तो तुम जा सकते हो । वैसे भी बहुत समय ले लिया तुम्हारा यार । शुक्रिया तुम्हारा ।” इतना कहते हुए गुप्ता जी ने रघु के हाथ में 500 का नोट थमा दिया । रघु ने मुस्कुराते हुए उनका धन्यवाद किया और एक बार घड़ी की तरफ फिर से देखते हुए वहां निकल गया ।

वो मार्किट में कुछ देर रुका और फिर 10 बजे तक घर पहुंचा । दरवाजा खटखटाया तो रोशनी ने दरवाजा खोला । उसके चेहरे पर नाराजगी झलक रही थी ।

“अरे ऐसे मत देखो, बुरा फंस गया था । गुप्ता जी के यहां रुकना पड़ गया ।” रघु ने घर में घुसते हुए हाथ में पकड़े लिफाफे एक तरफ रखे और जूते उतारते हुए अपनी सफाई देने लगा ।

“जल्दी आ जाते तो सब साथ में खाना खा लेते ?”

“क्या हुआ ? सो गया क्या ?”

“हां काफ़ी देर पूछता रहा पापा कब आएंगे, फिर टीवी देखते देखते सो गया । ये सब क्या है ?” रोशनी ने लिफाफों को देखते हुए पूछा ।

“सब तुम्हें ही बता दें ?” रोशनी ने तब तक लिफाफे में देख लिया था ।

“अरे वाह, मगर आप तो कह रहे थे फिज़ूलखर्ची है ?”

“है तो लेकिन अब साल में उसकी एक मांग भी पूरी ना कर सकें तो कमाने पर लानत है ।”

“अच्छा अब डयलॉग ना मारिए । चल के उसे उठाने की कोशिश करते हैं । वैसे उम्मीद कम ही है क्योंकि वो ढीठ है आपकी तरह ही । एक बार सो गया तो फिर उठता नहीं ।”

“चलो तो देखते हैं ज़्यादा ढीठ कौन है उसे जगाने वाला बाप या वो खुद ।” दोनों मुस्कुराए और कमरे की तरफ बढ़ गए ।

“सोमू, ए सोमू । उठ तो, पापा आ गए ।”

“मां, सोने दो ना ।”

“ए बेटा देख तो सही पापा क्या लाए हैं ।”

“नहीं देखना ना अभी । सुबह देख लूंगा ।”

“ठीक है तो मत देख । जा रहा हूं मैं ये लेकर ।” रघु कमरे से जाने लगा ।

“क्या है पापा ?” रघु के जाने ए पहले सोमू आंख मलता हुआ उठकर बैठ गया था ।

रघु ने एक बड़ा सा लिफ़ाफ़ा खोला और उसमें से एक केक निकालते हुए बोला “हैप्पी बड्डे बेटा ।” इसके बाद रोशनी और रघु दोनों उसे बड्डे विश करने लगे । सोमू केक देख कर ऐसे खुश हुआ कि ना जाने क्या मिल गया हो उसे । काफ़ी महीने पहले से ही वो अपनी क्लास के दोस्तों के किस्से सुनाता रहता था कि किसने अपने जन्म दिन पर कैसे केक काटा ।

रोशनी भी महीने भर पहले से रघु को कह रही थी कि इस बार सोमू के जन्मदिन पर केक काटेंगे लेकिन रघु ये कह कर मना कर देता कि 300-400 का केक आता है, बेकार में इतने पैसे क्यों बर्बाद करने । वो भले ही ऐसा कहता था लेकिन उसने मन ही मन सोच लिया था कि इस बार वो बेटे की ये इच्छा ज़रूर पूरी करेगा । हालांकि बेटे को हैसीयत से ज़्यादा महंगे स्कूल में पढ़ाने और घर का खर्च निकालने के बाद उसके हाथ में कुछ बचता नहीं था लेकिन इस बार उसने इतने पैसे अलग से निकाल लिए थे । इसके बाद आज गुप्ता जी के दिए पैसों से और आसानी हो गई थी ।

रघु ने दूसरे लिफाफे भी खोले । उनमें खाने पीने का सामान और एक सोमू के पसंद की ड्रेस थी । सोमू की तो खुशी का ठिकाना ही नहीं था । वो बार बार अपने पिता को गौर से देख रहा था ।

ज़माने के लिए एक नौकर जो दूसरों का आदेश मानता है, चाय बनाता है जूठे बर्तन धोता है वो रघु अपने बेटे की नज़रों में हीरो है । शायद यही हीरो बनने के लिए वो ये काम करता है ।

बच्चे सुपरहीरोज़ के बारे में बाद में जानते हैं लेकिन उनका पहला हीरो उनके पिता ही होते हैं फिर भले वे किसी दफ्तर के चपरासी हों या फिर अधिकारी । और इधर एक पिता की ज़िंदगी खुद को अपने बच्चों की नज़र में हीरो बनाए रखने में ही निकल जाती है ।

धीरज झा

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कहानी बड़ा सुहानी बुद्धिमानी से सेवा करें!


एक लड़की विवाह करके ससुराल में आयी| घर में एक तो उसका पति था, एक सास थी और एक दादी सास थी| वहाँ आकर उस लड़की ने देखा कि दादी सास का बड़ा अपमान, तिरस्कार हो रहा है! छोटी सास उसको ठोकर मार देती, गाली दे देती| यह देखकर उस लड़की को बड़ा बुरा लगा और दया भी आयी! उसने विचार किया कि अगर मैं सास से कह कहूँ कि आप अपनी सास का तिरस्कार मत किया करो तो वह कहेगी कि कल की छोकरी आकर मुझे उपदेश देती है, गुरु बनती है! अतः उसने अपनी सास से कुछ नहीं कहा| उसने एक उपाय सोचा| वह रोज काम-धंधा करके दादी सास के पास जाकर बैठ जाती और उसके पैर दबाती| जब वह वहाँ ज्यादा बैठने लगी तो यह सास को सुहाया नहीं| एक दिन सास ने उससे पूछा कि ‘बहु! वहाँ क्यों जा बैठी?’ लड़की ने कहा कि ‘बोलो, काम बताओ!’ सास बोली कि ‘काम क्या बतायें, तू वहाँ क्यों जा बैठी?’ लड़की बोली कि ‘मेरे पिता जी ने कहा था कि जवान लड़कों के साथ तो कभी बैठना ही नहीं, जवान लड़कियों के साथ भी कभी मत बैठना; जो घर में बड़े-बूढ़े हों, उनके पास बैठना, उनसे शिक्षा लेना| हमारे घर में सबसे बूढ़ी ये ही हैं, और किसके पास बैठूँ? मेरे पिताजी ने कहा था कि वहाँ हमारे घर की रिवाज नहीं चलेगी, वहाँ तो तेरे ससुराल की रिवाज चलेगी| मेरे को यहाँ की रिवाज सीखनी है, इसलिये मैं उनसे पूछती हूँ कि मेरी सास आपकी सेवा कैसे करती है?’ सास ने पूछा कि ‘बुढ़िया ने क्या कहा?’ वह बोली कि ‘दादी जी कहती हैं कि यह मेरे को ठोकर नहीं मारे, गाली नहीं दे तो मैं सेवा ही मान लूँ!’ सास बोली कि ‘क्या तू भी ऐसा ही करेगी?’ वह बोली कि ‘मैं ऐसा नहीं कहती हूँ, मेरे पिता जी ने कहा कि बड़ों से ससुराल की रीति सीखना!’

सास डरने लग गयी कि मैं अपनी सास के साथ जो बर्ताव करुँगी, वही बर्ताव मेरे साथ होने लग जायगा! एक जगह कोने में ठीकरी इकट्ठी पड़ी थीं| सास ने पूछा-‘बहू! ये ठीकरी क्यों क्यों इकट्ठी की हैं?’

लड़की ने कहा-‘आप दादी जी को ठीकरी में भोजन दिया करती हो, इसलिये मैंने पहले ही जमा कर ली|’

‘तू मेरे को ठीकरी में भोजन करायेगी क्या?’

‘मेरे पिता जी ने कहा कि तेरे वहाँ की रीति चलेगी|’

‘यह रीति थोड़े ही है!’

‘तो आप फिर आप ठीकरी मैं क्यों देती हो?’

‘थाली कौन माँजे?’

‘थाली तो मैं माँज दूँगी|’

‘तो तू थाली में दिया कर, ठीकरी उठाकर बाहर फेंक|’ अब बूढ़ी माँजी को थाली में भोजन मिलने लगा| सबको भोजन देने के बाद जो बाकी बचे, वह खिचड़ी की खुरचन, कंकड़ वाली दाल माँ जी को दी जाती थी| लड़की उसको हाथ में लाकर देखने लगी| सास ने पूछा-‘बहू! क्या देखती हो?’

‘मैं देखती हूँ कि बड़ों को भोजन कैसा दिया जाय|’

‘ऐसा भोजन देने की कोई रीति थोड़े ही है!’

‘तो फिर आप ऐसा भोजन क्यों देती हो?’

‘पहले भोजन कौन दे?’

‘आप आज्ञा दो तो मैं दे दूँगी|’

‘तो तू पहले भोजन दे दिया कर|’

‘अच्छी बात है!’

अब बूढ़ी माँ जी को बढ़िया भोजन मिलने लगा| रसोई बनते ही वह लड़की ताजी खिचड़ी, ताजा फुलका, दाल-साग ले जाकर माँ जी को दे देती| माँ जी तो मन-ही-मन आशीर्वाद देने लगी| माँ जी दिनभर एक खटिया में पड़ी रहती| खटिया टूटी हुई थी| उसमें से बन्दनवार की तरह मूँज नीचे लटकती थी| लड़की उस खटिया को देख रही थी| सास बोली कि ‘क्या देखती हो?’

‘देखती हूँ कि बड़ों को खाट कैसे दी जाय|’

‘ऐसी खाट थोड़े ही दी जाती है! यह तो टूट जाने से ऐसी हो गयी|’

‘तो दूसरी क्यों नही बिछातीं?’

‘तू बिछा दे दूसरी|’

‘आप आज्ञा दो तो दूसरी खाट बिछा दूँ!’

अब माँ जी के लिए निवार की खाट लाकर बिछा दी गयी| एक दिन कपड़े धोते समय वह लड़की माँ जी के कपड़े देखने लगी| कपड़े छलनी हो रखे थे| सास ने पूछा कि ‘क्या देखती हो?’

‘देखती हूँ कि बूढों को कपड़ा कैसे दिया जाय|’

‘फिर वही बात, कपड़ा ऐसा थोड़े ही दिया जाता है? यह तो पुराना होने पर ऐसा हो जाता है|’

‘फिर वही कपड़ा रहने दें क्या?’

‘तू बदल दे|’

अब लड़की ने माँ जी का कपड़ा चादर, बिछौना आदि सब बदल दिया| उसकी चतुराई से बूढ़ी माँ जी का जीवन सुधर गया!

अगर वह लड़की सास को कोरा उपदेश देती तो क्या वह उसकी बात मान लेती? बातों का असर नहीं पड़ता, आचरण का असर पड़ता है| इसलिये लड़कियों को चाहिये कि ऐसी बुद्धिमानी से सेवा करें और सबको राजी रखें|

ओम शांति