Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

अपनापन


डा. मीनाक्षी दो साल बाद लंदन से भारत लौटी हैं। वहाँ हर तरीके से सब कुछ बढ़िया होते हुए भी वो चैन से नही थी।विदेशी भूमि को उनका परिवार कभी अपना नहीं पाया। अब पटना लौट कर चैन की सांस आई है।

दीपावली की कुछ शॉपिंग करने अपने प्रिय पटना मार्केट आई थीं। तभी एक संभ्रांत महिला ने टोका,”मैडम, बहुत दिनों के बाद देखा आपको। आप शायद इंग्लैंड चली गई थीं…कितने दिनों के लिए आई हैं”

वो बहुत अभिभूत सी थीं। वहां लंदन में कोई पहचानता भी नही था…किसी को किसी से कोई मतलब ही नही होता था और यहाँ इस महिला ने देखते ही पहचान लिया और रोक कर स्नेहप्रदर्शन भी किया। उन्होने भी उतनी ही कोमलता से उस महिला से बात की। अभी थोड़ा आगे बढ़ी ही थीं कि एक बड़े साड़ी शोरूम से एक सज्जन निकले और उनका अभिवादन किया,”आप मैडम मीनाक्षी! बहुत दिनों के बाद दिखाई दी हैं। कहां रही इतने दिन?”

वो भी राकेश बाबू को पहचान कर बड़ी खुश हो गई,”अरे भाईसाहब, आपने हमें पहचान लिया। हमारी ननद के विवाह की काफ़ी खरीदारी आपके यहां से ही तो की गई थी”

वो भी बहुत आत्मीयता से बोले,”जी बिल्कुल याद है। आपने तो मेरे पोते को नया जीवन दिया था। मेरा परिवार तो आपका सदा ही ऋणी रहेगा।” उन्होने उनको शोरूम के अंदर आकर कॉफी़ पीने का आग्रह किया। वो उस स्नेही आग्रह को ठुकरा नहीं सकीं…सारे कामों की लिस्ट उनके मन में उछलकूद मचा रही थी पर उस स्नेह…उस आत्मीयता… उस प्यार भरी मनुहार को कैसे टाल दें जिसके लिए वहाँ सुदूर इंग्लैंड में वो हर पल…हर क्षण तड़पती रही थीं। कॉफी़ पीते पीते उन्हें बुआजी की याद आ गई। आज सुबह ही तो वो कितना अचरज कर रही थी,”अरे मीनू, इतना बढ़िया जॉब, इतना ठाठबाट… सबसे बढ़ कर इतना सुंदर देश…सब छोड़छाड़ कर तुमलोग यहाँ वापस कैसे आ गए? जो एक बार जाता है.. बस वहीं का होकर रह जाता है।”

उस समय तो वो सिर्फ मुस्कुरा कर रह गई थीं पर अब बुआजी की बात का…उनके अचरज का जवाब देने का मन हो रहा था…देखिए बुआजी… यही अपनापन…यही अपनी पहचान …जो शायद वहां की चमकदमक में कहीं ओझल सी हो गई थी…वहाँ की सुंदर राजसी सड़कों पर कोई पहचानने वाला नहीं था…यहाँ तो कदम कदम पर अपने लोग हैं…अपनापन है।

नीरजा कृष्णा
पटनासिटी

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