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बभनी घाट का महायुद्ध : गया, बिहार

(सर्वेभ्योतीर्थपुरोहितेभ्यो नमः)

यह प्रश्न गंभीर है!
जब मथुरा, अयोध्या और काशी में मस्जिद बने तो गयाजी में विध्वंसित विष्णु पद मंदिर और दक्षिणार्क परिवृत में ऐसा कार्य आक्रान्ता दल क्यों नहीं कर पाये?

एक अनुश्रुति के अनुसार गयावाल पुरोहितों ने आंशिक इस्लाम स्विकृति की शपथ ले मुस्लिम सेना से आजीविका की दुहाई दे मस्जिद न बनाने का अनुरोध किया., औरंगजेब के सैनिकों से। बदले में लोकाचार बदल लिया और कुछ इस इस्लामी परंपरा को स्वीकार किया।

यह अनुश्रुति भ्रांतिमूलक है। गया की संघर्ष गाथा और मुक्ति कथा एक महावृतांत है रण का। रक्तस्नात युद्ध का। रक्तरंजित जनोन्मादित धर्म प्रज्ञा के अहर्निश प्रतिरोध शक्ति का। जिसके आगे आक्रान्ताओं के बुलंद हौसले धूलनिमग्न हुये। दाउद खां हारा और स्थानीय मगध बाभन विजयमाल धारणकर गया की विराट पितृशिला पर सगर्व ब्राह्मणोवर्चसो$जायत् लिख गये।

गया के कई आक्रमणों में ऐसी विजयों की अपनी महत्ता है। इन धर्मान्तरण और मंदिर विध्वंस युद्धों की गाथायें धीरे धीरे विस्मृति के तामिस्र में गौण हो रहीं हैं। हम शितल चौधरी और तिलक चौधरी की बम्भई और दरघा नदी युद्ध भी भूल गए।

इससे भी अधिक दुःखद है बभनी घाट के युद्ध और रक्ततांडव की रौरवगाथा भूल जाना। कम से कम गया के बाभनों और गयावालों हेतु तो यह अक्षम्य अपराध है।

आश्चर्य तब और गहरा हो जाता है जब इस रणकथा पर गोलावर और कोलकट पंडे मौन धारण कर विस्मय प्रकट करते हैं।
पहले यह जान लें गोलावर और कोलकट दोनों पंडा समूह स्थानीय बाभनों के दो वर्ग हैं जो धामी पंडा वर्ग से पृथक् हैं।

झांगी, धोकड़ी और गुरदा समूह के साथ वर्ग बोध भी उनका बाद में बना।

गोलावर पंडे तो वे हैं जो बाभन बर्खन्दाज थे और कोलकट वे जिन्होने चेरो राजाओं से युद्ध में विजय प्राप्त कर अपनी जमींदारी बनायी थी।

बुकानन ने कोलों को विजित करने वाले जमींदार ब्राह्मण के जहानाबाद और अरवल क्षेत्र में वर्चस्व को उद्घाटित किया है।

विष्णुपद में आक्रमणकारियों के विरुद्ध दक्षिणार्क प्रांगण में भयावह युद्ध हुआ। सूर्य तडाग रक्त से भर गया। पर बाभन हार नहीं माने। परिणामतः आक्रान्ताओं को पीछे हटना पड़ा।

लगातार चलते इस संघर्ष में विजय मिली महाराजा किला ए द्रुम टेकार, भारद्वाज गोत्रोत्पन्न द्रोणोद्भव ( द्रोणविद्याविभूषितभूभोक्ता ब्राह्मण) विप्रराजेन्द्रवंशयशस्तितिलक
नृपेन्द्र त्रिभुवन सिंह को। वे गया के मुक्तिनायक हैं। हां स्वतंत्र गया के।

पुनः महाराज सुन्दर ने दो युद्धों में मुगल फौजदारों को रौंद डाला। फैजुल्ला खां की भीषण पराजय हुई। महाराजा ने कामदार खां की गया विध्वंस योजना को चुनोती भेजी। गया जी को अप्रतिम स्वाभिमान का विषय बनाते हुये जो संदेश सुन्दर सिंह ने भेजी इतिहास में किसी आक्रान्ता की विधर्मी योजना का ऐसा प्रत्युत्तर हमें नहीं दिखता।
आओ! बभनी घाट की पितृशिला का वंदन करें।
ओम् विष्णवे नमः।

आनंद वर्धन

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