Posted in संस्कृत साहित्य

तीर्थ यात्रा विधान


वास्तव में तीर्थ अगर करना है तो अपने शरीर मैं किया जासकता है। इस के लिए बाहिर जाने की आवश्यकता नहीं है। अगर भौहों के उर्ध्व चढ़ा जासके तो वहाँ काशिगति प्राप्त हो जाती है।अगर वहाँ अहंबुद्धि- देह अभिमान का त्याग हो जाए तो उसी का नाम काशी-मृत्यु है–यह कोई नई बात नहीं है। यह पद्धति उन के लिये है जिन्हें योग के द्वारा प्रवेश करने का अधिकार है। परंतु साधारण लोगों के लिए जिन्हें प्रवेश करने का अधिकार नहीं है।वे तीर्थों में जाकर ठीक ढंग से अगर तीर्थ कर सकें, सात्विक भाव से,सदाचार परायण होकर, मन में सद्भाव रखते हुए। तीर्थ के अधिष्ठातृ देवी,देवता का ध्यान करते हुए तीर्थ यात्रा करें तो तीर्थ उन के प्रति प्रसन्न होता है।तब उसे जो देने लायक है, अपनी ओर से देता है अर्थात चित- शुद्धि होती है।
अब सवाल यह है कि तीर्थ- गमन या तीर्थ यात्रा कैसे करनी चाहिए? इस का विवरण सूक्ष्म रूप से बता रहा हुँ। प्राचीन काल मे यह नियम था कि पहले संयम करना चाहिए, उस के बाद संयत भाव से लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहये। कुछ अन्य नियम हैं। झूठ मत बोलना, मिथ्या चिंता ना करें, अन्य कोई चिंता ना करें, घर- ग्रहस्ती की चिंता न करें। जिस तीर्थ की ओर जारहे हैं, केवल उसी की चिंता करें। घर द्वार, बाल- बच्चे छोड़कर जा रहा हुँ, सब को भूल जाना है। सभी बातों को भूल कर अधिष्ठातृ देवी अथवा देव की चिंता करनी चाहिए। अन्य लोगों से उतनी बातें ही करें जितना आवयश्क है। बाकी समय मन- प्राण इष्ट की ओर लगाये रखें, इष्ट का अर्थ है तीर्थ के देवता।
जिस तीर्थ की ओर जा रहे हैं उस तीर्थ के अधिष्ठातृ देवी- देवता।
यहाँ एक घटना का उलेख कर दूं । आज से ३०-४० वर्ष पहले की बात है,पारुल नामक एक महिला थी। वे काशी में रहती थी । उनमें कुछ अस्वाभाविक स्थिति थी। अक्सर देव- देवी का दर्शन कर लेती थी।उन्हें देव -वाणी सुनाई देती थी। उन्होंने मुझे एक कहानी सुनाई थी। उन की एक बुआ थी । वे काशि में मरने के लिए वियकुल हुई थी, पर उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। इच्छा रहते हुए भी वह काशी नहीं आ पाई।
एक दिन की घटना की चर्चा करती हुई वे बोलीं की बंगाली खण्ड में एक जगह काशीखण्ड का पाठ चल रहा था। उस जगह पर वे उपस्थित थी। सहसा वहां पर उन की दृष्टि एक ओर गयी, जहां उनकी बुआ मौजूद थी। ये दृश्य देख कर उन्हें आश्चर्य हुआ। उन की काशी आने की आकांक्षा थी। लगता है, अब कोई सुविधा प्राप्त हो गयी है। पाठ समाप्त होने पर उन्होंने गोर किया कि बुआ जी बैठी हैं, अन्य लोगों के व्यवहार से ऐसा लग की उन्हें कोई देख नहीं रहा है। उन्होंने बुआ जी से पूछा – ‘में आप को देख रही हुँ ,कोई भूल तो नहीं है?’ उतर मे बुआ ने कहा कि –’नहीं, भूल नहीं देख रही हो। में ही तुम्हारी बुआ हुँ। तब उन्होंने पूछा- ‘अब काशी काशी में आप आगयी हैं ?’ तब बुआ जी ने कहा कि― में विदेह अवस्था में हूँ। मृत्यु के समय मेरा प्राण भयानक व्याकुल हो गया था– विश्वनाथ दर्शन के लिए। मन ही मन कहती रही- है विश्वनाथ, तुम्हारा दर्शन नहीं कर पाई। तभी देखा- सामने विश्वनाथ ओर काशी है। ओर स्वयं को काशी में उस्थित पाया, आगे उन्होंने यह भी कहा कि- ‘ ‘विश्वनाथ की कृपा से काशी- मृत्यु हुई है ओर विश्वनाथ की काशी में स्थान प्राप्त हुआ है।’
यह कैसे संभव हुआ ? शिव पर इतनी तीव्र भगति थी कि शिव ने बाह्यता आकांक्षा पूर्ण न करने पर भी भीतर से पूर्ण कर दिया था।
ये सब कहने का उद्देश्य यह है कि सभी चीजें हैं, पर उसे पाने के लिए भावना की ज़रूरत है। उस भाव से ना मांगने पर उन्हें पाया नहीं जा सकता। जो उन्हें उस रूप मैं चाहेगा, वो पाए गा। जब तक उस भाव से नहीं पकड़ो गे तब तक नहीं पाओगे।।
तीर्थ यात्रा के लिए एक लक्ष्य रखना चाहिए। में कामाख्या जा रहा हूं तो कामाख्या की अधिष्ठात्री देवी की भगवति कामाख्या की ही चिंता करूँ गा। जब काशी जाओं गा तब विश्वनाथ की ही चिंता करूँ गा, क्यों कि वे काशी के अधिष्ठाता देव हैं।

अर्थात जो लोग शास्त्रीय क्रिया नहीं कर सकते, यज्ञ- अनुष्ठान , योगिक क्रिया आदी नहीं कर सकते , वे अगर तीर्थो की सेवा सात्विक नियमानुसार कर सकें तो भी उन की अन्तरशुद्ध हो जाता है। यही है तीर्थ यात्रा का विधान।


श्रध्देय श्री गोपीनाथ कविराज जी🙏🌷🌷🌷🌷🌷🌷

अजय कुमार

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