Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मशहूर वाहन कम्पनी फोर्ड के मालिक हेनरी फोर्ड को अपनी कार के लिए एक ड्राइवर की आवश्यकता थी।

तीन ड्राईवरों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया।

सबसे उनकी विशेषता पूछी गयी।

पहले व्यक्ति ने बताया कि वह भीड़ में भी सौ मील की रफ्तार से गाड़ी चला सकता है।

दूसरे ने बताया कि वह छह फुट के गड्ढ़ों को भी आसानी से पार कर सकता है।

जबकि तीसरे व्यक्ति ने उत्तर दिया, “मैं चालीस से साठ मील की रफ्तार से ही गाड़ी चलाता हूँ , क्योंकि मैं स्वयं अपनी एवं अपने मालिक की जान को कतई खतरे में नहीं डाल सकता।”

शायद यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि तीसरे व्यक्ति को ही चुना गया क्योंकि संयम एवं जिम्मेदारी सबसे बड़ी विशेषता है।

Posted in संस्कृत साहित्य

घर के पितर रुष्ट होने के लक्षण और उपाय:-


आखिर ये पितृदोष है क्या? पितृ -दोष शांति के सरल उपाय पितृ या पितृ गण कौन हैं ?आपकी जिज्ञासा को शांत करती विस्तृत प्रस्तुति।

पितृ गण हमारे पूर्वज हैं जिनका ऋण हमारे ऊपर है ,क्योंकि उन्होंने कोई ना कोई उपकार हमारे जीवन के लिए किया है मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है,पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इस से भी ऊपर स्वर्ग लोक है।

आत्मा जब अपने शरीर को त्याग कर सबसे पहले ऊपर उठती है तो वह पितृ लोक में जाती है ,वहाँ हमारे पूर्वज मिलते हैं अगर उस आत्मा के अच्छे पुण्य हैं तो ये हमारे पूर्वज भी उसको प्रणाम कर अपने को धन्य मानते हैं की इस अमुक आत्मा ने हमारे कुल में जन्म लेकर हमें धन्य किया इसके आगे आत्मा अपने पुण्य के आधार पर सूर्य लोक की तरफ बढती है।

वहाँ से आगे ,यदि और अधिक पुण्य हैं, तो आत्मा सूर्य लोक को भेज कर स्वर्ग लोक की तरफ चली जाती है,लेकिन करोड़ों में एक आध आत्मा ही ऐसी होती है ,जो परमात्मा में समाहित होती है जिसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता मनुष्य लोक एवं पितृ लोक में बहुत सारी आत्माएं पुनः अपनी इच्छा वश ,मोह वश अपने कुल में जन्म लेती हैं।

पितृ दोष क्या होता है?
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हमारे ये ही पूर्वज सूक्ष्म व्यापक शरीर से अपने परिवार को जब देखते हैं ,और महसूस करते हैं कि हमारे परिवार के लोग ना तो हमारे प्रति श्रद्धा रखते हैं और न ही इन्हें कोई प्यार या स्नेह है और ना ही किसी भी अवसर पर ये हमको याद करते हैं,ना ही अपने ऋण चुकाने का प्रयास ही करते हैं तो ये आत्माएं दुखी होकर अपने वंशजों को श्राप दे देती हैं,जिसे “पितृ- दोष” कहा जाता है।

पितृ दोष एक अदृश्य बाधा है .ये बाधा पितरों द्वारा रुष्ट होने के कारण होती है पितरों के रुष्ट होने के बहुत से कारण हो सकते हैं ,आपके आचरण से,किसी परिजन द्वारा की गयी गलती से ,श्राद्ध आदि कर्म ना करने से ,अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई किसी त्रुटि के कारण भी हो सकता है।

इसके अलावा मानसिक अवसाद,व्यापार में नुक्सान ,परिश्रम के अनुसार फल न मिलना , विवाह या वैवाहिक जीवन में समस्याएं,कैरिअर में समस्याएं या संक्षिप्त में कहें तो जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति और उसके परिवार को बाधाओं का सामना करना पड़ता है पितृ दोष होने पर अनुकूल ग्रहों की स्थिति ,गोचर ,दशाएं होने पर भी शुभ फल नहीं मिल पाते,कितना भी पूजा पाठ ,देवी ,देवताओं की अर्चना की जाए ,उसका शुभ फल नहीं मिल पाता।

पितृ दोष दो प्रकार से प्रभावित करता है

1.अधोगति वाले पितरों के कारण
2.उर्ध्वगति वाले पितरों के कारण

अधोगति वाले पितरों के दोषों का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया गया गलत आचरण,की अतृप्त इच्छाएं ,जायदाद के प्रति मोह और उसका गलत लोगों द्वारा उपभोग होने पर,विवाहादिमें परिजनों द्वारा गलत निर्णय .परिवार के किसी प्रियजन को अकारण कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध हो जाते हैं ,परिवार जनों को श्राप दे देते हैं और अपनी शक्ति से नकारात्मक फल प्रदान करते हैं।

उर्ध्व गति वाले पितर सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते ,परन्तु उनका किसी भी रूप में अपमान होने पर अथवा परिवार के पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन नहीं करने पर वह पितृदोष उत्पन्न करते हैं।

इनके द्वारा उत्पन्न पितृदोष से व्यक्ति की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति बिलकुल बाधित हो जाती है ,फिर चाहे कितने भी प्रयास क्यों ना किये जाएँ ,कितने भी पूजा पाठ क्यों ना किये जाएँ,उनका कोई भी कार्य ये पितृदोष सफल नहीं होने देता। पितृ दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी होता है कि किस गृह के कारण और किस प्रकार का पितृ दोष उत्पन्न हो रहा है ?

जन्म पत्रिका और पितृ दोष जन्म पत्रिका में लग्न ,पंचम ,अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष का विचार किया जाता है। पितृ दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि और राहू -केतु की स्थितियों से पितृ दोष का विचार किया जाता है।

इनमें से भी गुरु ,शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक पितृ दोष में महत्वपूर्ण होती है इनमें सूर्य से पिता या पितामह , चन्द्रमा से माता या मातामह ,मंगल से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है।

अधिकाँश लोगों की जन्म पत्रिका में मुख्य रूप से क्योंकि गुरु ,शनि और राहु से पीड़ित होने पर ही पितृ दोष उत्पन्न होता है ,इसलिए विभिन्न उपायों को करने के साथ साथ व्यक्ति यदि पंचमुखी ,सातमुखी और आठ मुखी रुद्राक्ष भी धारण कर ले , तो पितृ दोष का निवारण शीघ्र हो जाता है।

पितृ दोष निवारण के लिए इन रुद्राक्षों को धारण करने के अतिरिक्त इन ग्रहों के अन्य उपाय जैसे मंत्र जप और स्तोत्रों का पाठ करना भी श्रेष्ठ होता है।

विभिन्न ऋण और पितृ दोष
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हमारे ऊपर मुख्य रूप से 5 ऋण होते हैं जिनका कर्म न करने(ऋण न चुकाने पर ) हमें निश्चित रूप से श्राप मिलता है ,ये ऋण हैं : मातृ ऋण ,पितृ ऋण ,मनुष्य ऋण ,देव ऋण और ऋषि ऋण।

मातृ ऋण👉 माता एवं माता पक्ष के सभी लोग जिनमेंमा,मामी ,नाना ,नानी ,मौसा ,मौसी और इनके तीन पीढ़ी के पूर्वज होते हैं ,क्योंकि माँ का स्थान परमात्मा से भी ऊंचा माना गया है अतः यदि माता के प्रति कोई गलत शब्द बोलता है ,अथवा माता के पक्ष को कोई कष्ट देता रहता है,तो इसके फलस्वरूप उसको नाना प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं। इतना ही नहीं ,इसके बाद भी कलह और कष्टों का दौर भी परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता ही रहता है।

पितृ ऋण👉 पिता पक्ष के लोगों जैसे बाबा ,ताऊ ,चाचा, दादा-दादी और इसके पूर्व की तीन पीढ़ी का श्राप हमारे जीवन को प्रभावित करता है पिता हमें आकाश की तरह छत्रछाया देता है,हमारा जिंदगी भर पालन -पोषण करता है ,और अंतिम समय तक हमारे सारे दुखों को खुद झेलता रहता है।

पर आज के के इस भौतिक युग में पिता का सम्मान क्या नयी पीढ़ी कर रही है ?पितृ -भक्ति करना मनुष्य का धर्म है ,इस धर्म का पालन न करने पर उनका श्राप नयी पीढ़ी को झेलना ही पड़ता है ,इसमें घर में आर्थिक अभाव,दरिद्रता ,संतानहीनता ,संतान को विभिन्न प्रकार के कष्ट आना या संतान अपंग रह जाने से जीवन भर कष्ट की प्राप्ति आदि।

देव ऋण👉 माता-पिता प्रथम देवता हैं,जिसके कारण भगवान गणेश महान बने |इसके बाद हमारे इष्ट भगवान शंकर जी ,दुर्गा माँ ,भगवान विष्णु आदि आते हैं ,जिनको हमारा कुल मानता आ रहा है ,हमारे पूर्वज भी भी अपने अपने कुल देवताओं को मानते थे , लेकिन नयी पीढ़ी ने बिलकुल छोड़ दिया है इसी कारण भगवान /कुलदेवी /कुलदेवता उन्हें नाना प्रकार के कष्ट /श्राप देकर उन्हें अपनी उपस्थिति का आभास कराते हैं।

ऋषि ऋण👉 जिस ऋषि के गोत्र में पैदा हुए ,वंश वृद्धि की ,उन ऋषियों का नाम अपने नाम के साथ जोड़ने में नयी पीढ़ी कतराती है ,उनके ऋषि तर्पण आदि नहीं करती है इस कारण उनके घरों में कोई मांगलिक कार्य नहीं होते हैं,इसलिए उनका श्राप पीडी दर पीढ़ी प्राप्त होता रहता है।

मनुष्य ऋण👉 माता -पिता के अतिरिक्त जिन अन्य मनुष्यों ने हमें प्यार दिया ,दुलार दिया ,हमारा ख्याल रखा ,समय समय पर मदद की गाय आदि पशुओं का दूध पिया जिन अनेक मनुष्यों ,पशुओं ,पक्षियों ने हमारी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मदद की ,उनका ऋण भी हमारे ऊपर हो गया।

लेकिन लोग आजकल गरीब ,बेबस ,लाचार लोगों की धन संपत्ति हरण करके अपने को ज्यादा गौरवान्वित महसूस करते हैं। इसी कारण देखने में आया है कि ऐसे लोगों का पूरा परिवार जीवन भर नहीं बस पाता है,वंश हीनता ,संतानों का गलत संगति में पड़ जाना,परिवार के सदस्यों का आपस में सामंजस्य न बन पाना ,परिवार कि सदस्यों का किसी असाध्य रोग से ग्रस्त रहना इत्यादि दोष उस परिवार में उत्पन्न हो जाते हैं।

ऐसे परिवार को पितृ दोष युक्त या शापित परिवार कहा जाता है रामायण में श्रवण कुमार के माता -पिता के श्राप के कारण दशरथ के परिवार को हमेशा कष्ट झेलना पड़ा,ये जग -ज़ाहिर है इसलिए परिवार कि सर्वोन्नती के पितृ दोषों का निवारण करना बहुत आवश्यक है।

पितृों के रूष्‍ट होने के लक्षण
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पितरों के रुष्ट होने के कुछ असामान्‍य लक्षण जो मैंने अपने निजी अनुभव के आधार एकत्रित किए है वे क्रमशः इस प्रकार हो सकते है।

खाने में से बाल निकलना
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अक्सर खाना खाते समय यदि आपके भोजन में से बाल निकलता है तो इसे नजरअंदाज न करें

बहुत बार परिवार के किसी एक ही सदस्य के साथ होता है कि उसके खाने में से बाल निकलता है, यह बाल कहां से आया इसका कुछ पता नहीं चलता। यहां तक कि वह व्यक्ति यदि रेस्टोरेंट आदि में भी जाए तो वहां पर भी उसके ही खाने में से बाल निकलता है और परिवार के लोग उसे ही दोषी मानते हुए उसका मजाक तक उडाते है।

बदबू या दुर्गंध
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कुछ लोगों की समस्या रहती है कि उनके घर से दुर्गंध आती है, यह भी नहीं पता चलता कि दुर्गंध कहां से आ रही है। कई बार इस दुर्गंध के इतने अभ्‍यस्‍त हो जाते है कि उन्हें यह दुर्गंध महसूस भी नहीं होती लेकिन बाहर के लोग उन्हें बताते हैं कि ऐसा हो रहा है अब जबकि परेशानी का स्रोत पता ना चले तो उसका इलाज कैसे संभव है

पूर्वजों का स्वप्न में बार बार आना
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मेरे एक मित्र ने बताया कि उनका अपने पिता के साथ झगड़ा हो गया है और वह झगड़ा काफी सालों तक चला पिता ने मरते समय अपने पुत्र से मिलने की इच्छा जाहिर की परंतु पुत्र मिलने नहीं आया, पिता का स्वर्गवास हो गया हुआ। कुछ समय पश्चात मेरे मित्र मेरे पास आते हैं और कहते हैं कि उन्होंने अपने पिता को बिना कपड़ों के देखा है ऐसा स्‍वप्‍न पहले भी कई बार आ चुका है।

शुभ कार्य में अड़चन
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कभी-कभी ऐसा होता है कि आप कोई त्यौहार मना रहे हैं या कोई उत्सव आपके घर पर हो रहा है ठीक उसी समय पर कुछ ना कुछ ऐसा घटित हो जाता है कि जिससे रंग में भंग डल जाता है। ऐसी घटना घटित होती है कि खुशी का माहौल बदल जाता है। मेरे कहने का तात्‍पर्य है कि शुभ अवसर पर कुछ अशुभ घटित होना पितरों की असंतुष्टि का संकेत है।

घर के किसी एक सदस्य का कुंवारा रह जाना
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बहुत बार आपने अपने आसपास या फिर रिश्‍तेदारी में देखा होगा या अनुभव किया होगा कि बहुत अच्‍छा युवक है, कहीं कोई कमी नहीं है लेकिन फिर भी शादी नहीं हो रही है। एक लंबी उम्र निकल जाने के पश्चात भी शादी नहीं हो पाना कोई अच्‍छा संकेत नहीं है। यदि घर में पहले ही किसी कुंवारे व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है तो उपरोक्त स्थिति बनने के आसार बढ़ जाते हैं। इस समस्‍या के कारण का भी पता नहीं चलता।

मकान या प्रॉपर्टी की खरीद-फरोख्त में दिक्कत आना
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आपने देखा होगा कि कि एक बहुत अच्छी प्रॉपर्टी, मकान, दुकान या जमीन का एक हिस्सा किन्ही कारणों से बिक नहीं पा रहा यदि कोई खरीदार मिलता भी है तो बात नहीं बनती। यदि कोई खरीदार मिल भी जाता है और सब कुछ हो जाता है तो अंतिम समय पर सौदा कैंसिल हो जाता है। इस तरह की स्थिति यदि लंबे समय से चली आ रही है तो यह मान लेना चाहिए कि इसके पीछे अवश्य ही कोई ऐसी कोई अतृप्‍त आत्‍मा है जिसका उस भूमि या जमीन के टुकड़े से कोई संबंध रहा हो।

संतान ना होना
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मेडिकल रिपोर्ट में सब कुछ सामान्य होने के बावजूद संतान सुख से वंचित है हालांकि आपके पूर्वजों का इस से संबंध होना लाजमी नहीं है परंतु ऐसा होना बहुत हद तक संभव है जो भूमि किसी निसंतान व्यक्ति से खरीदी गई हो वह भूमि अपने नए मालिक को संतानहीन बना देती है

उपरोक्त सभी प्रकार की घटनाएं या समस्याएं आप में से बहुत से लोगों ने अनुभव की होंगी इसके निवारण के लिए लोग समय और पैसा नष्ट कर देते हैं परंतु समस्या का समाधान नहीं हो पाता। क्या पता हमारे इस लेख से ऐसे ही किसी पीड़ित व्यक्ति को कुछ प्रेरणा मिले इसलिए निवारण भी स्पष्ट कर रहा हूं।

पितृ-दोष कि शांति के उपाय
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1👉 सामान्य उपायों में षोडश पिंड दान ,सर्प पूजा ,ब्राह्मण को गौ -दान ,कन्या -दान,कुआं ,बावड़ी ,तालाब आदि बनवाना ,मंदिर प्रांगण में पीपल ,बड़(बरगद) आदि देव वृक्ष लगवाना एवं विष्णु मन्त्रों का जाप आदि करना ,प्रेत श्राप को दूर करने के लिए श्रीमद्द्भागवत का पाठ करना चाहिए।

2👉 वेदों और पुराणों में पितरों की संतुष्टि के लिए मंत्र ,स्तोत्र एवं सूक्तों का वर्णन है जिसके नित्य पठन से किसी भी प्रकार की पितृ बाधा क्यों ना हो ,शांत हो जाती है अगर नित्य पठन संभव ना हो , तो कम से कम प्रत्येक माह की अमावस्या और आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या अर्थात पितृपक्ष में अवश्य करना चाहिए।
वैसे तो कुंडली में किस प्रकार का पितृ दोष है उस पितृ दोष के प्रकार के हिसाब से पितृदोष शांति करवाना अच्छा होता है।

3👉 भगवान भोलेनाथ की तस्वीर या प्रतिमा के समक्ष बैठ कर या घर में ही भगवान भोलेनाथ का ध्यान कर निम्न मंत्र की एक माला नित्य जाप करने से समस्त प्रकार के पितृ- दोष संकट बाधा आदि शांत होकर शुभत्व की प्राप्ति होती है |मंत्र जाप प्रातः या सायंकाल कभी भी कर सकते हैं :

मंत्र : “ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय च धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।

4👉 अमावस्या को पितरों के निमित्त पवित्रता पूर्वक बनाया गया भोजन तथा चावल बूरा ,घी एवं एक रोटी गाय को खिलाने से पितृ दोष शांत होता है।

5👉 अपने माता -पिता ,बुजुर्गों का सम्मान,सभी स्त्री कुल का आदर /सम्मान करने और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहने से पितर हमेशा प्रसन्न रहते हैं।

6👉 पितृ दोष जनित संतान कष्ट को दूर करने के लिए “हरिवंश पुराण ” का श्रवण करें या स्वयं नियमित रूप से पाठ करें।

7👉 प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती या सुन्दर काण्ड का पाठ करने से भी इस दोष में कमी आती है।

8👉 सूर्य पिता है अतः ताम्बे के लोटे में जल भर कर ,उसमें लाल फूल ,लाल चन्दन का चूरा ,रोली आदि डाल कर सूर्य देव को अर्घ्य देकर ११ बार “ॐ घृणि सूर्याय नमः ” मंत्र का जाप करने से पितरों की प्रसन्नता एवं उनकी ऊर्ध्व गति होती है।

9👉 अमावस्या वाले दिन अवश्य अपने पूर्वजों के नाम दुग्ध ,चीनी ,सफ़ेद कपडा ,दक्षिणा आदि किसी मंदिर में अथवा किसी योग्य ब्राह्मण को दान करना चाहिए।

10👉 पितृ पक्ष में पीपल की परिक्रमा अवश्य करें अगर १०८ परिक्रमा लगाई जाएँ ,तो पितृ दोष अवश्य दूर होगा।

विशिष्ट उपाय :
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1👉 किसी मंदिर के परिसर में पीपल अथवा बड़ का वृक्ष लगाएं और रोज़ उसमें जल डालें ,उसकी देख -भाल करें ,जैसे-जैसे वृक्ष फलता -फूलता जाएगा,पितृ -दोष दूर होता जाएगा,क्योकि इन वृक्षों पर ही सारे देवी -देवता ,इतर -योनियाँ ,पितर आदि निवास करते हैं।

2👉 यदि आपने किसी का हक छीना है,या किसी मजबूर व्यक्ति की धन संपत्ति का हरण किया है,तो उसका हक या संपत्ति उसको अवश्य लौटा दें।

3👉 पितृ दोष से पीड़ित व्यक्ति को किसी भी एक अमावस्या से लेकर दूसरी अमावस्या तक अर्थात एक माह तक किसी पीपल के वृक्ष के नीचे सूर्योदय काल में एक शुद्ध घी का दीपक लगाना चाहिए,ये क्रम टूटना नहीं चाहिए।

एक माह बीतने पर जो अमावस्या आये उस दिन एक प्रयोग और करें
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इसके लिए किसी देसी गाय या दूध देने वाली गाय का थोडा सा गौ -मूत्र प्राप्त करें उसे थोड़े जल में मिलाकर इस जल को पीपल वृक्ष की जड़ों में डाल दें इसके बाद पीपल वृक्ष के नीचे ५ अगरबत्ती ,एक नारियल और शुद्ध घी का दीपक लगाकर अपने पूर्वजों से श्रद्धा पूर्वक अपने कल्याण की कामना करें,और घर आकर उसी दिन दोपहर में कुछ गरीबों को भोजन करा दें ऐसा करने पर पितृ दोष शांत हो जायेगा।

4👉 घर में कुआं हो या पीने का पानी रखने की जगह हो ,उस जगह की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें,क्योंके ये पितृ स्थान माना जाता है इसके अलावा पशुओं के लिए पीने का पानी भरवाने तथा प्याऊ लगवाने अथवा आवारा कुत्तों को जलेबी खिलाने से भी पितृ दोष शांत होता है।

5 👉 अगर पितृ दोष के कारण अत्यधिक परेशानी हो,संतान हानि हो या संतान को कष्ट हो तो किसी शुभ समय अपने पितरों को प्रणाम कर उनसे प्रण होने की प्रार्थना करें और अपने द्वारा जाने-अनजाने में किये गए अपराध / उपेक्षा के लिए क्षमा याचना करें ,फिर घर अथवा शिवालय में पितृ गायत्री मंत्र का सवा लाख विधि से जाप कराएं जाप के उपरांत दशांश हवन के बाद संकल्प ले की इसका पूर्ण फल पितरों को प्राप्त हो ऐसा करने से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं ,क्योंके उनकी मुक्ति का मार्ग आपने प्रशस्त किया होता है।

6👉 पितृ दोष की शांति हेतु ये उपाय बहुत ही अनुभूत और अचूक फल देने वाला देखा गया है,वोह ये कि- किसी गरीब की कन्या के विवाह में गुप्त रूप से अथवा प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक सहयोग करना |(लेकिन ये सहयोग पूरे दिल से होना चाहिए ,केवल दिखावे या अपनी बढ़ाई कराने के लिए नहीं )|इस से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं ,क्योंकि इसके परिणाम स्वरुप मिलने वाले पुण्य फल से पितरों को बल और तेज़ मिलता है ,जिस से वह ऊर्ध्व लोकों की ओरगति करते हुए पुण्य लोकों को प्राप्त होते हैं.|

7👉 अगर किसी विशेष कामना को लेकर किसी परिजन की आत्मा पितृ दोष उत्पन्न करती है तो तो ऐसी स्थिति में मोह को त्याग कर उसकी सदगति के लिए “गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र ” का पाठ करना चाहिए।

8👉 पितृ दोष दूर करने का अत्यंत सरल उपाय : इसके लिए सम्बंधित व्यक्ति को अपने घर के वायव्य कोण (N -W )में नित्य सरसों का तेल में बराबर मात्रा में अगर का तेल मिलाकर दीपक पूरे पितृ पक्ष में नित्य लगाना चाहिए+दिया पीतल का हो तो ज्यादा अच्छा है ,दीपक कम से कम 10 मिनट नित्य जलना आवश्यक है।

इन उपायों के अतिरिक्त वर्ष की प्रत्येक अमावस्या को दोपहर के समय गूगल की धूनी पूरे घर में सब जगह घुमाएं ,शाम को आंध्र होने के बाद पितरों के निमित्त शुद्ध भोजन बनाकर एक दोने में साड़ी सामग्री रख कर किसी बबूल के वृक्ष अथवा पीपल या बड़ किजद में रख कर आ जाएँ,पीछे मुड़कर न देखें। नित्य प्रति घर में देसी कपूर जाया करें। ये कुछ ऐसे उपाय हैं,जो सरल भी हैं और प्रभावी भी,और हर कोई सरलता से इन्हें कर पितृ दोषों से मुक्ति पा सकता है। लेकिन किसी भी प्रयोग की सफलता आपकी पितरों के प्रति श्रद्धा के ऊपर निर्भर करती है।

पितृदोष निवारण के लिए करें विशेष उपाय (नारायणबलि-नागबलि)
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अक्सर हम देखते हैं कि कई लोगों के जीवन में परेशानियां समाप्त होने का नाम ही नहीं लेती। वे चाहे जितना भी समय और धन खर्च कर लें लेकिन काम सफल नहीं होता। ऐसे लोगों की कुंडली में निश्चित रूप से पितृदोष होता है।

यह दोषी पीढ़ी दर पीढ़ी कष्ट पहुंचाता रहता है, जब तक कि इसका विधि-विधानपूर्वक निवारण न किया जाए। आने वाली पीढ़ीयों को भी कष्ट देता है। इस दोष के निवारण के लिए कुछ विशेष दिन और समय तय हैं जिनमें इसका पूर्ण निवारण होता है। श्राद्ध पक्ष यही अवसर है जब पितृदोष से मुक्ति पाई जा सकती है। इस दोष के निवारण के लिए शास्त्रों में नारायणबलि का विधान बताया गया है। इसी तरह नागबलि भी होती है।

क्या है नारायणबलि और नागबलि
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नारायणबलि और नागबलि दोनों विधि मनुष्य की अपूर्ण इच्छाओं और अपूर्ण कामनाओं की पूर्ति के लिए की जाती है। इसलिए दोनों को काम्य कहा जाता है। नारायणबलि और नागबलि दो अलग-अलग विधियां हैं। नारायणबलि का मुख्य उद्देश्य पितृदोष निवारण करना है और नागबलि का उद्देश्य सर्प या नाग की हत्या के दोष का निवारण करना है। इनमें से कोई भी एक विधि करने से उद्देश्य पूरा नहीं होता इसलिए दोनों को एक साथ ही संपन्न करना पड़ता है।

इन कारणों से की जाती है नारायणबलि पूजा
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जिस परिवार के किसी सदस्य या पूर्वज का ठीक प्रकार से अंतिम संस्कार, पिंडदान और तर्पण नहीं हुआ हो उनकी आगामी पीढि़यों में पितृदोष उत्पन्न होता है। ऐसे व्यक्तियों का संपूर्ण जीवन कष्टमय रहता है, जब तक कि पितरों के निमित्त नारायणबलि विधान न किया जाए।प्रेतयोनी से होने वाली पीड़ा दूर करने के लिए नारायणबलि की जाती है।परिवार के किसी सदस्य की आकस्मिक मृत्यु हुई हो। आत्महत्या, पानी में डूबने से, आग में जलने से, दुर्घटना में मृत्यु होने से ऐसा दोष उत्पन्न होता है।

क्यों की जाती है यह पूजा…?
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शास्त्रों में पितृदोष निवारण के लिए नारायणबलि-नागबलि कर्म करने का विधान है। यह कर्म किस प्रकार और कौन कर सकता है इसकी पूर्ण जानकारी होना भी जरूरी है। यह कर्म प्रत्येक वह व्यक्ति कर सकता है जो अपने पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता है। जिन जातकों के माता-पिता जीवित हैं वे भी यह विधान कर सकते हैं।संतान प्राप्ति, वंश वृद्धि, कर्ज मुक्ति, कार्यों में आ रही बाधाओं के निवारण के लिए यह कर्म पत्नी सहित करना चाहिए। यदि पत्नी जीवित न हो तो कुल के उद्धार के लिए पत्नी के बिना भी यह कर्म किया जा सकता है।यदि पत्नी गर्भवती हो तो गर्भ धारण से पांचवें महीने तक यह कर्म किया जा सकता है। घर में कोई भी मांगलिक कार्य हो तो ये कर्म एक साल तक नहीं किए जा सकते हैं। माता-पिता की मृत्यु होने पर भी एक साल तक यह कर्म करना निषिद्ध माना गया है।

कब नहीं की जा सकती है नारायणबलि-नागबलि
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नारायणबलि गुरु, शुक्र के अस्त होने पर नहीं किए जाने चाहिए। लेकिन प्रमुख ग्रंथ निर्णण सिंधु के मतानुसार इस कर्म के लिए केवल नक्षत्रों के गुण व दोष देखना ही उचित है। नारायणबलि कर्म के लिए धनिष्ठा पंचक और त्रिपाद नक्षत्र को निषिद्ध माना गया है।धनिष्ठा नक्षत्र के अंतिम दो चरण, शततारका, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद एवं रेवती, इन साढ़े चार नक्षत्रों को धनिष्ठा पंचक कहा जाता है। कृतिका, पुनर्वसु, विशाखा, उत्तराषाढ़ा और उत्तराभाद्रपद ये छह नक्षत्र त्रिपाद नक्षत्र माने गए हैं। इनके अलावा सभी समय यह कर्म किया जा सकता है।

पितृपक्ष सर्वाधिक श्रेष्ठ समय
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नारायणबलि- नागबलि के लिए पितृपक्ष सर्वाधिक श्रेष्ठ समय बताया गया है। इसमें किसी योग्य पुरोहित से समय निकलवाकर यह कर्म करवाना चाहिए। यह कर्म गंगा तट अथवा अन्य किसी नदी सरोवर के किनारे और महाराष्ट्र् में नासिक के समीप स्थित प्रमुख ज्योतिर्लिंग त्रयंबकेश्वर में भी संपन्न कराया जाता है। संपूर्ण पूजा तीन दिनों की होती है।

ओली अमित

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

बभनी घाट का महायुद्ध : गया, बिहार

(सर्वेभ्योतीर्थपुरोहितेभ्यो नमः)

यह प्रश्न गंभीर है!
जब मथुरा, अयोध्या और काशी में मस्जिद बने तो गयाजी में विध्वंसित विष्णु पद मंदिर और दक्षिणार्क परिवृत में ऐसा कार्य आक्रान्ता दल क्यों नहीं कर पाये?

एक अनुश्रुति के अनुसार गयावाल पुरोहितों ने आंशिक इस्लाम स्विकृति की शपथ ले मुस्लिम सेना से आजीविका की दुहाई दे मस्जिद न बनाने का अनुरोध किया., औरंगजेब के सैनिकों से। बदले में लोकाचार बदल लिया और कुछ इस इस्लामी परंपरा को स्वीकार किया।

यह अनुश्रुति भ्रांतिमूलक है। गया की संघर्ष गाथा और मुक्ति कथा एक महावृतांत है रण का। रक्तस्नात युद्ध का। रक्तरंजित जनोन्मादित धर्म प्रज्ञा के अहर्निश प्रतिरोध शक्ति का। जिसके आगे आक्रान्ताओं के बुलंद हौसले धूलनिमग्न हुये। दाउद खां हारा और स्थानीय मगध बाभन विजयमाल धारणकर गया की विराट पितृशिला पर सगर्व ब्राह्मणोवर्चसो$जायत् लिख गये।

गया के कई आक्रमणों में ऐसी विजयों की अपनी महत्ता है। इन धर्मान्तरण और मंदिर विध्वंस युद्धों की गाथायें धीरे धीरे विस्मृति के तामिस्र में गौण हो रहीं हैं। हम शितल चौधरी और तिलक चौधरी की बम्भई और दरघा नदी युद्ध भी भूल गए।

इससे भी अधिक दुःखद है बभनी घाट के युद्ध और रक्ततांडव की रौरवगाथा भूल जाना। कम से कम गया के बाभनों और गयावालों हेतु तो यह अक्षम्य अपराध है।

आश्चर्य तब और गहरा हो जाता है जब इस रणकथा पर गोलावर और कोलकट पंडे मौन धारण कर विस्मय प्रकट करते हैं।
पहले यह जान लें गोलावर और कोलकट दोनों पंडा समूह स्थानीय बाभनों के दो वर्ग हैं जो धामी पंडा वर्ग से पृथक् हैं।

झांगी, धोकड़ी और गुरदा समूह के साथ वर्ग बोध भी उनका बाद में बना।

गोलावर पंडे तो वे हैं जो बाभन बर्खन्दाज थे और कोलकट वे जिन्होने चेरो राजाओं से युद्ध में विजय प्राप्त कर अपनी जमींदारी बनायी थी।

बुकानन ने कोलों को विजित करने वाले जमींदार ब्राह्मण के जहानाबाद और अरवल क्षेत्र में वर्चस्व को उद्घाटित किया है।

विष्णुपद में आक्रमणकारियों के विरुद्ध दक्षिणार्क प्रांगण में भयावह युद्ध हुआ। सूर्य तडाग रक्त से भर गया। पर बाभन हार नहीं माने। परिणामतः आक्रान्ताओं को पीछे हटना पड़ा।

लगातार चलते इस संघर्ष में विजय मिली महाराजा किला ए द्रुम टेकार, भारद्वाज गोत्रोत्पन्न द्रोणोद्भव ( द्रोणविद्याविभूषितभूभोक्ता ब्राह्मण) विप्रराजेन्द्रवंशयशस्तितिलक
नृपेन्द्र त्रिभुवन सिंह को। वे गया के मुक्तिनायक हैं। हां स्वतंत्र गया के।

पुनः महाराज सुन्दर ने दो युद्धों में मुगल फौजदारों को रौंद डाला। फैजुल्ला खां की भीषण पराजय हुई। महाराजा ने कामदार खां की गया विध्वंस योजना को चुनोती भेजी। गया जी को अप्रतिम स्वाभिमान का विषय बनाते हुये जो संदेश सुन्दर सिंह ने भेजी इतिहास में किसी आक्रान्ता की विधर्मी योजना का ऐसा प्रत्युत्तर हमें नहीं दिखता।
आओ! बभनी घाट की पितृशिला का वंदन करें।
ओम् विष्णवे नमः।

आनंद वर्धन

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चाणक्य


एक बार चाणक्य का एक परिचित उनसे मिलने आया और बोला – क्या आप जानते हैं कि मैंने आपके मित्र के बारे में क्या क्या सुना है?”

चाणक्य ने उसे टोकते हुए कहा – ” कुछ पल के लिए रुको ” इसके पहले कि तुम मुझे मेरे मित्र के बारे में कुछ बताओ, उसके पहले मैं तीन छन्नी परीक्षण करना चाहता हूं।

मित्र ने कहा “तीन छन्नी परीक्षण ,ये क्या होता है ?”

चाणक्य ने कहा – “जी हां मैं इसे तीन छन्नी परीक्षण इसलिए कहता हूं क्योंकि जो भी बात आप मुझसे कहेंगे, उसे तीन छन्नी से गुजारने के बाद ही कहें।”

“पहली छन्नी है “सत्य “।

क्या आप यह विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि जो बात आप मुझसे कहने जा रहे हैं, वह पूर्णतः सत्य है?”

“व्यक्ति ने उत्तर दिया – *”जी नहीं, दरअसल वह बात मैंने अभी-अभी सिर्फ़ कान से सुनी है और….”

चाणक्य बोले – “तो तुम्हें इस बारे में ठीक से कुछ नहीं पता है। “

“आओ अब दूसरी छन्नी लगाकर देखते हैं।

दूसरी छन्नी है “भलाई “।

क्या तुम मुझसे मेरे मित्र के बारे में कोई अच्छी बात कहने जा रहे हो?”

“जी नहीं, बल्कि मैं तो…… “

“तो तुम मुझे कोई बुरी बात बताने जा रहे थे लेकिन तुम्हें यह भी नहीं मालूम है कि यह बात सत्य है या नहीं।”- चाणक्य बोले।

“तुम एक और परीक्षण से गुजर सकते हो।

तीसरी छन्नी है “उपयोगिता “।

क्या वह बात जो तुम मुझे बताने जा रहे हो, मेरे लिए उपयोगी है?”

“शायद नहीं…” उस व्यक्ति ने जबाब दिया ।

यह सुनकर चाणक्य ने कहा…”जो बात तुम मुझे बताने जा रहे हो, न तो वह सत्य है, न अच्छी और न ही उपयोगी……. तो फिर ऐसी बात कहने का क्या फायदा?”

चाणक्य की बातों को सुनकर वो व्यक्ति ख़ामोश हो गया ।

……………
जब भी आप अपने परिचित, मित्र, सगे संबंधी के बारे में कुछ गलत बात सुने तो स्वयं अच्छी तरह परीक्षण अवश्य कर लें क्योंकि बहुत से रिश्ते अक़्सर गलतफहमी के कारण विखर जाते हैं……..!!

रवि कांत

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एक गिलास पानी

एक सरकारी कार्यालय में लंबी लाइन लगी हुई थी। खिड़की पर जो क्लर्क बैठा हुआ था, वह बहुत ही तेज मिजाज़ का था और सभी से उच्चे स्वर में बात कर रहा था। उस समय भी एक महिला को डांटते हुए वह कह रहा था, “आपको ज़रा भी पता नहीं चलता, जो फॉर्म आप भर कर लायीं हैं, उसमें कुछ भी सही नहीं हैं। सरकार ने फॉर्म फ्री कर रखा है तो कुछ भी भर दो। जेब का पैसा लगता तो दस लोगों से पूछ कर भरती आप।”

एक व्यक्ति पंक्ति में पीछे खड़ा काफी देर से यह देख रहा था। वह पंक्ति से बाहर निकल कर, पीछे के रास्ते से उस क्लर्क के पास जाकर खड़ा हो गया और वहाँ रखे मटके से पानी का एक गिलास भरकर उस क्लर्क की तरफ बढ़ा दिया।

क्लर्क ने उस व्यक्ति की तरफ आँखें तरेर कर देखा और गर्दन उचका कर कहा, “क्या है?”

उस व्यक्ति ने कहा, “सर, आप काफी देर से बोल रहे हैं, गला सूख गया होगा आपका, पानी पी लीजिये।”

क्लर्क ने पानी का गिलास हाथ में ले लिया और उसकी तरफ ऐसे देखा जैसे किसी दूसरे ग्रह के प्राणी को देख लिया हो और कहा, “जानते हो, मैं कड़वा सच बोलता हूँ, इसलिए सब नाराज़ रहते हैं मुझसे, चपरासी तक मुझे पानी नहीं पिलाता…”

वह व्यक्ति मुस्कुरा दिया और फिर पंक्ति में अपने स्थान पर जाकर खड़ा
हो गया।

शाम को उस व्यक्ति के पास एक फ़ोन आया, दूसरी तरफ वही क्लर्क था, उसने कहा, “भाईसाहब, आपका नंबर आपके फॉर्म से लिया था, शुक्रिया अदा करने के लिये फ़ोन किया है।
मेरी माँ और पत्नी में बिल्कुल नहीं बनती। आज भी जब मैं घर पहुँचा तो दोनों बहस कर रहीं थी, लेकिन आपका गुरुमन्त्र काम आ गया।”

वह व्यक्ति चौंका और कहा, “जी, गुरुमंत्र?”

“जी हाँ, मैंने एक गिलास पानी अपनी माँ को दिया और दूसरा गिलास अपनी पत्नी को और यह कहा कि गला सूख रहा होगा पानी पी लो… बस फिर हम तीनों हँसते-खेलते बातें कर रहे हैं। अब भाईसाहब, आज खाने पर आप हमारे घर आ जाइये।

मैं जानना चाहता हूँ, आपके दिए एक गिलास पानी में इतना जादू है, तो आपके साथ खाना खाने से कितना जादू होगा?” ♾️

“ध्यान का उद्देश्य मन को नियमित कर एक ऐसी स्थिरता पर ला देना होता है जिससे जीवन की अत्यंत भयंकर परिस्थितियों में भी हम थोड़ा रुककर उसका विश्लेषण करके सही कार्यवाही कर सकें।”

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तीर्थ यात्रा विधान


वास्तव में तीर्थ अगर करना है तो अपने शरीर मैं किया जासकता है। इस के लिए बाहिर जाने की आवश्यकता नहीं है। अगर भौहों के उर्ध्व चढ़ा जासके तो वहाँ काशिगति प्राप्त हो जाती है।अगर वहाँ अहंबुद्धि- देह अभिमान का त्याग हो जाए तो उसी का नाम काशी-मृत्यु है–यह कोई नई बात नहीं है। यह पद्धति उन के लिये है जिन्हें योग के द्वारा प्रवेश करने का अधिकार है। परंतु साधारण लोगों के लिए जिन्हें प्रवेश करने का अधिकार नहीं है।वे तीर्थों में जाकर ठीक ढंग से अगर तीर्थ कर सकें, सात्विक भाव से,सदाचार परायण होकर, मन में सद्भाव रखते हुए। तीर्थ के अधिष्ठातृ देवी,देवता का ध्यान करते हुए तीर्थ यात्रा करें तो तीर्थ उन के प्रति प्रसन्न होता है।तब उसे जो देने लायक है, अपनी ओर से देता है अर्थात चित- शुद्धि होती है।
अब सवाल यह है कि तीर्थ- गमन या तीर्थ यात्रा कैसे करनी चाहिए? इस का विवरण सूक्ष्म रूप से बता रहा हुँ। प्राचीन काल मे यह नियम था कि पहले संयम करना चाहिए, उस के बाद संयत भाव से लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहये। कुछ अन्य नियम हैं। झूठ मत बोलना, मिथ्या चिंता ना करें, अन्य कोई चिंता ना करें, घर- ग्रहस्ती की चिंता न करें। जिस तीर्थ की ओर जारहे हैं, केवल उसी की चिंता करें। घर द्वार, बाल- बच्चे छोड़कर जा रहा हुँ, सब को भूल जाना है। सभी बातों को भूल कर अधिष्ठातृ देवी अथवा देव की चिंता करनी चाहिए। अन्य लोगों से उतनी बातें ही करें जितना आवयश्क है। बाकी समय मन- प्राण इष्ट की ओर लगाये रखें, इष्ट का अर्थ है तीर्थ के देवता।
जिस तीर्थ की ओर जा रहे हैं उस तीर्थ के अधिष्ठातृ देवी- देवता।
यहाँ एक घटना का उलेख कर दूं । आज से ३०-४० वर्ष पहले की बात है,पारुल नामक एक महिला थी। वे काशी में रहती थी । उनमें कुछ अस्वाभाविक स्थिति थी। अक्सर देव- देवी का दर्शन कर लेती थी।उन्हें देव -वाणी सुनाई देती थी। उन्होंने मुझे एक कहानी सुनाई थी। उन की एक बुआ थी । वे काशि में मरने के लिए वियकुल हुई थी, पर उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। इच्छा रहते हुए भी वह काशी नहीं आ पाई।
एक दिन की घटना की चर्चा करती हुई वे बोलीं की बंगाली खण्ड में एक जगह काशीखण्ड का पाठ चल रहा था। उस जगह पर वे उपस्थित थी। सहसा वहां पर उन की दृष्टि एक ओर गयी, जहां उनकी बुआ मौजूद थी। ये दृश्य देख कर उन्हें आश्चर्य हुआ। उन की काशी आने की आकांक्षा थी। लगता है, अब कोई सुविधा प्राप्त हो गयी है। पाठ समाप्त होने पर उन्होंने गोर किया कि बुआ जी बैठी हैं, अन्य लोगों के व्यवहार से ऐसा लग की उन्हें कोई देख नहीं रहा है। उन्होंने बुआ जी से पूछा – ‘में आप को देख रही हुँ ,कोई भूल तो नहीं है?’ उतर मे बुआ ने कहा कि –’नहीं, भूल नहीं देख रही हो। में ही तुम्हारी बुआ हुँ। तब उन्होंने पूछा- ‘अब काशी काशी में आप आगयी हैं ?’ तब बुआ जी ने कहा कि― में विदेह अवस्था में हूँ। मृत्यु के समय मेरा प्राण भयानक व्याकुल हो गया था– विश्वनाथ दर्शन के लिए। मन ही मन कहती रही- है विश्वनाथ, तुम्हारा दर्शन नहीं कर पाई। तभी देखा- सामने विश्वनाथ ओर काशी है। ओर स्वयं को काशी में उस्थित पाया, आगे उन्होंने यह भी कहा कि- ‘ ‘विश्वनाथ की कृपा से काशी- मृत्यु हुई है ओर विश्वनाथ की काशी में स्थान प्राप्त हुआ है।’
यह कैसे संभव हुआ ? शिव पर इतनी तीव्र भगति थी कि शिव ने बाह्यता आकांक्षा पूर्ण न करने पर भी भीतर से पूर्ण कर दिया था।
ये सब कहने का उद्देश्य यह है कि सभी चीजें हैं, पर उसे पाने के लिए भावना की ज़रूरत है। उस भाव से ना मांगने पर उन्हें पाया नहीं जा सकता। जो उन्हें उस रूप मैं चाहेगा, वो पाए गा। जब तक उस भाव से नहीं पकड़ो गे तब तक नहीं पाओगे।।
तीर्थ यात्रा के लिए एक लक्ष्य रखना चाहिए। में कामाख्या जा रहा हूं तो कामाख्या की अधिष्ठात्री देवी की भगवति कामाख्या की ही चिंता करूँ गा। जब काशी जाओं गा तब विश्वनाथ की ही चिंता करूँ गा, क्यों कि वे काशी के अधिष्ठाता देव हैं।

अर्थात जो लोग शास्त्रीय क्रिया नहीं कर सकते, यज्ञ- अनुष्ठान , योगिक क्रिया आदी नहीं कर सकते , वे अगर तीर्थो की सेवा सात्विक नियमानुसार कर सकें तो भी उन की अन्तरशुद्ध हो जाता है। यही है तीर्थ यात्रा का विधान।


श्रध्देय श्री गोपीनाथ कविराज जी🙏🌷🌷🌷🌷🌷🌷

अजय कुमार

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औरंगज़ेब


एक बार औरंगजेब के दरबार में एक शिकारी जंगल से
पकड़कर एक बड़ा भारी शेर लाया ! लोहे के पिंजरे में बंद
शेर बार-बार दहाड़ रहा था ! बादशाह कहता था… इससे
बड़ा भयानक शेर दूसरा नहीं मिल सकता ! दरबारियों ने
हाँ में हाँ मिलायी.. किन्तु वहाँ मौजूद राजा यसवंत सिंह
जी ने कहा – इससे भी अधिक शक्तिशाली शेर मेरे पास है !
क्रूर एवं अधर्मी औरंगजेब को बड़ा क्रोध हुआ ! उसने
कहा तुम अपने शेर को इससे लड़ने को छोडो..
यदि तुम्हारा शेर हार गया तो तुम्हारा सर काट
लिया जायेगा …… !
दुसरे दिन किले के मैदान में दो शेरों का मुकाबला देखने
बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गयी ! औरंगजेब बादशाह
भी ठीक समय पर आकर अपने सिंहासन पर बैठ गया !
राजा यशवंत सिंह अपने दस वर्ष के पुत्र पृथ्वी सिंह के
साथ आये ! उन्हें देखकर बादशाह ने पूछा– आपका शेर
कहाँ है ? यशवंत सिंह बोले- मैं अपना शेर अपने साथ
लाया हूँ ! आप केवल लडाई की आज्ञा दीजिये !
बादशाह की आज्ञा से जंगली शेर को लोहे के बड़े पिंजड़े में
छोड़ दिया गया ! यशवंत सिंह ने अपने पुत्र को उस पिंजड़े
में घुस जाने को कहा ! बादशाह एवं वहां के लोग हक्के-
बक्के रह गए ! किन्तु दस वर्ष का निर्भीक बालक
पृथ्वी सिंह पिता को प्रणाम करके हँसते-हँसते शेर के
पिंजड़े में घुस गया ! शेर ने पृथ्वी सिंह की ओर देखा ! उस
तेजस्वी बालक के नेत्रों में देखते ही एकबार तो वह पूंछ
दबाकर पीछे हट गया.. लेकिन मुस्लिम सैनिकों द्वारा भाले
की नोक से उकसाए जाने पर शेर क्रोध में दहाड़ मारकर
पृथ्वी सिंह पर टूट पड़ा ! वार बचा कर वीर बालक एक
ओर हटा और अपनी तलवार खींच ली ! पुत्र को तलवार
निकालते हुए देखकर यशवंत सिंह ने पुकारा – बेटा, तू यह
क्या करता है ? शेर के पास तलवार है क्या जो तू उसपर
तलवार चलाएगा ? यह हमारे हिन्दू-धर्म की शिक्षाओं के
विपरीत है और धर्मयुद्ध नहीं है !
पिता की बात सुनकर पृथ्वी सिंह ने तलवार फेंक दी और
निहत्था ही शेर पर टूट पड़ा ! अंतहीन से दिखने वाले एक
लम्बे संघर्ष के बाद आख़िरकार उस छोटे से बालक ने शेर
का जबड़ा पकड़कर फाड़ दिया और फिर पूरे शरीर को चीर
दो टुकड़े कर फेंक दिया ! भीड़ उस वीर बालक पृथ्वी सिंह
की जय-जयकार करने लगी ! अपने.. और शेर के खून से
लथपथ पृथ्वी सिंह जब पिंजड़े से बाहर निकला तो पिता ने
दौड़कर अपने पुत्र को छाती से लगा लिया !
तो ऐसे थे हमारे पूर्वजों के कारनामे.. जिनके मुख-मंडल
वीरता के ओज़ से ओतप्रोत रहते थे !
और आज हम क्या बना रहे हैं अपनी संतति को..
सारेगामा लिट्ल चैंप्स के नचनिये.. ?
आज समय फिर से मुड़ कर इतिहास के
उसी औरंगजेबी काल की ओर ताक रहा है.. हमें
चेतावनी देता हुआ सा.. कि ज़रुरत है कि हिन्दू अपने
बच्चों को फिर से वही हिन्दू संस्कार दें.. ताकि बक्त पड़ने
पर वो शेर से भी भिड़ जाये.. न कि “सुवरों” की तरह
चिड़ियाघर के पालतू शेर के आगे भी हाथ पैर जोड़ें.. !

अरुण सुक्ला

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐उर्मिला-त्याग की देवी💐💐

रामायण जीवन जीने की सबसे उत्तम शिक्षा देती हैं । भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो उनकी पत्नी माँ सीता ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया परन्तु बचपन से ही बड़े भाई की सेवा मे रहने वाले लक्ष्मण जी कैसे राम जी से दूर हो जाते! माता सुमित्रा से तो उन्होंने आज्ञा ले ली थी, वन जाने की.. परन्तु जब पत्नी उर्मिला के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे तो सोच रहे थे कि माँ ने तो आज्ञा दे दी, परन्तु उर्मिला को कैसे समझाऊंगा!! क्या कहूंगा!

यहीं सोच विचार करके लक्ष्मण जी जैसे ही अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा कि उर्मिला जी आरती का थाल लेके खड़ी थीं और बोलीं- “आप मेरी चिंता छोड़ प्रभु की सेवा में वन को जाओ। मैं आपको नहीं रोकूँगीं। मेरे कारण आपकी सेवा में कोई बाधा न आये, इसलिये साथ जाने की जिद्द भी नहीं करूंगी।”

लक्ष्मण जी को कहने में संकोच हो रहा था। परन्तु उनके कुछ कहने से पहले ही उर्मिला जी ने उन्हें संकोच से बाहर निकाल दिया। वास्तव में यहीं पत्नी का धर्म है। पति संकोच में पड़े, उससे पहले ही पत्नी उसके मन की बात जानकर उसे संकोच से बाहर कर दे!

लक्ष्मण जी चले गये परन्तु 14 वर्ष तक उर्मिला ने एक तपस्विनी की भांति कठोर तप किया। वन में भैया-भाभी की सेवा में लक्ष्मण जी कभी सोये नहीं परन्तु उर्मिला ने भी अपने महलों के द्वार कभी बंद नहीं किये और सारी रात जाग जागकर उस दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया।

मेघनाथ से युद्ध करते हुए जब लक्ष्मण को शक्ति लग जाती है और हनुमान जी उनके लिये संजीवनी का पहाड़ लेके लौट रहे होते हैं, तो बीच में अयोध्या में भरत जी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमान जी गिर जाते हैं। तब हनुमान जी सारा वृत्तांत सुनाते हैं कि सीता जी को रावण ले गया, लक्ष्मण जी मूर्छित हैं।

यह सुनते ही कौशल्या जी कहती हैं कि राम को कहना कि लक्ष्मण के बिना अयोध्या में पैर भी मत रखना। राम वन में ही रहे।

माता सुमित्रा कहती हैं कि राम से कहना कि कोई बात नहीं। अभी शत्रुघ्न है। मैं उसे भेज दूंगी। मेरे दोनों पुत्र राम सेवा के लिये ही तो जन्मे हैं।

माताओं का प्रेम देखकर हनुमान जी की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी परन्तु जब उन्होंने उर्मिला जी को देखा तो सोचने लगे कि यह क्यों एकदम शांत और प्रसन्न खड़ी हैं? क्या इन्हें अपनी पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं?

हनुमान जी पूछते हैं- देवी! आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है? आपके पति के प्राण संकट में हैं। सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जायेगा। उर्मिला जी का उत्तर सुनकर तीनों लोकों का कोई भी प्राणी उनकी वंदना किये बिना नहीं रह पाएगा।

वे बोलीं- “मेरा दीपक संकट में नहीं है, वो बुझ ही नहीं सकता”। रही सूर्योदय की बात तो आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में विश्राम कर लीजिये, क्योंकि आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदित हो ही नहीं सकता।

आपने कहा कि प्रभु श्रीराम मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं। जो योगेश्वर राम की गोदी में लेटा हो, काल उसे छू भी नहीं सकता। यह तो वो दोनों लीला कर रहे हैं। मेरे पति जब से वन गये हैं, तबसे सोये नहीं हैं। उन्होंने न सोने का प्रण लिया था। इसलिए वे थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं और जब भगवान् की गोद मिल गयी तो थोड़ा विश्राम ज्यादा हो गया। वे उठ जायेंगे।

शक्ति मेरे पति को लगी ही नहीं शक्ति तो राम जी को लगी है। मेरे पति की हर श्वास में राम हैं, हर धड़कन में राम, उनके रोम रोम में राम हैं, उनके खून की बूंद बूंद में राम हैं, और जब उनके शरीर और आत्मा में हैं ही सिर्फ राम, तो शक्ति राम जी को ही लगी, दर्द राम जी को ही हो रहा। इसलिये हनुमान जी आप निश्चिन्त होके जाएँ। सूर्य उदित नहीं होगा।”

यह भोग की नहीं….त्याग की कथा हैं, यहाँ त्याग की प्रतियोगिता चल रही हैं और सभी प्रथम हैं, कोई पीछे नहीं रहा। चारो भाइयों का प्रेम और त्याग एक दूसरे के प्रति अद्भुत-अभिनव और अलौकिक हैं । राम राज्य की नींव जनक की बेटियां ही थीं… कभी सीता तो कभी उर्मिला। भगवान् राम ने तो केवल राम राज्य का कलश स्थापित किया परन्तु वास्तव में राम राज्य इन सबके प्रेम, त्याग, समर्पण , बलिदान से ही आया।

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏