Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🌹मार्मिक कहानी~ ममता🌹

क्यूं जरूरी है घर में बड़े बुजुर्गों की उपस्थिति

बच्चों को स्कूल बस में बैठाकर वापस आ शालू खिन्न मन से टैरेस पर जाकर बैठ गई.

शालू की इधर-उधर दौड़ती सरसरी नज़रें थोड़ी दूर एक पेड़ की ओट में खड़ी बुढ़िया पर ठहर गईं.

‘ओह! फिर वही बुढ़िया, क्यों इस तरह से उसके घर की ओर ताकती है ?’

शालू की उदासी बेचैनी में तब्दील हो गई, मन में शंकाएं पनपने लगीं. इससे पहले भी शालू उस बुढ़िया को तीन-चार बार नोटिस कर चुकी थी.

दो महीने हो गए थे शालू को पूना से गुड़गांव शिफ्ट हुए, मगर अभी तक एडजस्ट नहीं हो पाई थी.

सब कुछ कितना सुव्यवस्थित चल रहा था पूना में. उसकी अच्छी जॉब थी. घर संभालने के लिए अच्छी मेड थी, जिसके भरोसे वह घर और रसोई छोड़कर सुकून से ऑफ़िस चली जाती थी.

घर के पास ही बच्चों के लिए एक अच्छा-सा डे केयर भी था. स्कूल के बाद दोनों बच्चे शाम को उसके ऑफ़िस से लौटने तक वहीं रहते. लाइफ़ बिल्कुल सेट थी, मगर सुधीर के एक तबादले की वजह से सब गड़बड़ हो गया.

दो दिन बाद सुधीर टूर से वापस आए, तो शालू ने उस बुढ़िया के बारे में बताया. सुधीर को भी कुछ चिंता हुई, “ठीक है, अगली बार कुछ ऐसा हो, तो वॉचमैन को बोलना वो उसका ध्यान रखेगा, वरना फिर देखते हैं, पुलिस कम्प्लेन कर सकते हैं.” कुछ दिन ऐसे ही गुज़र गए.

शालू का घर को दोबारा ढर्रे पर लाकर नौकरी करने का संघर्ष जारी था, पर इससे बाहर आने की कोई सूरत नज़र नहीं आ रही थी.

एक दिन सुबह शालू ने टैरेस से देखा, वॉचमैन उस बुढ़िया के साथ उनके मेन गेट पर आया हुआ था. सुधीर उससे कुछ बात कर रहे थे.

पास से देखने पर उस बुढ़िया की सूरत कुछ जानी पहचानी-सी लग रही थी. शालू को लगा उसने यह चेहरा कहीं और भी देखा है, मगर कुछ याद नहीं आ रहा था.

बात करके सुधीर घर के अंदर आ गए और वह बुढ़िया मेन गेट पर ही खड़ी रही.

“अरे, ये तो वही बुढ़िया है, जिसके बारे में मैंने आपको बताया था. ये यहां क्यों आई है ?” शालू ने चिंतित स्वर में सुधीर से पूछा.

“बताऊंगा तो आश्चर्यचकित रह जाओगी. जैसा तुम उसके बारे में सोच रही थी, वैसा कुछ भी नहीं है. जानती हो वो कौन है ?”

शालू का विस्मित चेहरा आगे की बात सुनने को बेक़रार था.

“वो इस घर की पुरानी मालकिन हैं.”

“क्या ? मगर ये घर तो हमने मिस्टर शांतनु से ख़रीदा है.”

“ये लाचार बेबस बुढ़िया उसी शांतनु की अभागी मां है, जिसने पहले धोखे से सब कुछ अपने नाम करा लिया और फिर ये घर हमें बेचकर विदेश चला गया, अपनी बूढ़ी मां गायत्री देवी को एक वृद्धाश्रम में छोड़कर.

छी… कितना कमीना इंसान है, देखने में तो बड़ा शरीफ़ लग रहा था.”

सुधीर का चेहरा वितृष्णा से भर उठा. वहीं शालू याद्दाश्त पर कुछ ज़ोर डाल रही थी.

“हां, याद आया. स्टोर रूम की सफ़ाई करते हुए इस घर की पुरानी नेमप्लेट दिखी थी. उस पर ‘गायत्री निवास’ लिखा था,

वहीं एक राजसी ठाठ-बाटवाली महिला की एक पुरानी फ़ोटो भी थी. उसका चेहरा ही इस बुढ़िया से मिलता था,

तभी मुझे लगा था कि इसे कहीं देखा है, मगर अब ये यहां क्यों आई हैं ?

क्या घर वापस लेने ? पर हमने तो इसे पूरी क़ीमत देकर ख़रीदा है.” शालू चिंतित हो उठी.

“नहीं, नहीं. आज इनके पति की पहली बरसी है. ये उस कमरे में दीया जलाकर प्रार्थना करना चाहती हैं,

जहां उन्होंने अंतिम सांस ली थी.”

“इससे क्या होगा, मुझे तो इन बातों में कोई विश्वास नहीं.”

“तुम्हें न सही, उन्हें तो है और अगर हमारी हां से उन्हें थोड़ी-सी ख़ुशी मिल जाती है, तो हमारा क्या घट जाएगा ?”

“ठीक है, आप उन्हें बुला लीजिए.” अनमने मन से ही सही, मगर शालू ने हां कर दी.

गायत्री देवी अंदर आ गईं. क्षीण काया, तन पर पुरानी सूती धोती, बड़ी-बड़ी आंखों के कोरों में कुछ जमे, कुछ पिघले से आंसू. अंदर आकर उन्होंने सुधीर और शालू को ढेरों आशीर्वाद दिए.

नज़रें भर-भरकर उस पराये घर को देख रही थीं, जो कभी उनका अपना था. आंखों में कितनी स्मृतियां, कितने सुख और कितने ही दुख एक साथ तैर आए थे.

वो ऊपरवाले कमरे में गईं. कुछ देर आंखें बंद कर बैठी रहीं. बंद आंखें लगातार रिस रही थीं.

फिर उन्होंने दिया जलाया, प्रार्थना की और फिर वापस से दोनों को आशीर्वाद देते हुए कहने लगीं, “मैं इस घर में दुल्हन बनकर आई थी. सोचा था, अर्थी पर ही जाऊंगी, मगर…” स्वर भर्रा आया था.

“यही कमरा था मेरा. कितने साल हंसी-ख़ुशी बिताए हैं यहां अपनों के साथ, मगर शांतनु के पिता के जाते ही…” महिला की आंखें पुनः भर आईं.

शालू और सुधीर नि:शब्द बैठे रहे. थोड़ी देर घर से जुड़ी बातें कर गायत्री देवी भारी क़दमों से उठीं और चलने लगीं.

पैर जैसे इस घर की चौखट छोड़ने को तैयार ही न थे, पर जाना तो था ही. उनकी इस हालत को वो दोनों भी महसूस कर रहे थे.

“आप ज़रा बैठिए, मैं अभी आती हूं.” शालू गायत्री देवी को रोककर कमरे से बाहर चली गई और इशारे से सुधीर को भी बाहर बुलाकर कहने लगी, “सुनिए, मुझे एक बड़ा अच्छा आइडिया आया है,

जिससे हमारी लाइफ़ भी सुधर जाएगी और इनके टूटे दिल को भी आराम मिल जाएगा.

क्यों न हम इन्हें यहीं रख लें ?

अकेली हैं, बेसहारा हैं और इस घर में इनकी जान बसी है. यहां से कहीं जाएंगी भी नहीं और हम यहां वृद्धाश्रम से अच्छा ही खाने-पहनने को देंगे उन्हें.”

“तुम्हारा मतलब है, नौकर की तरह ?”

“नहीं, नहीं. नौकर की तरह नहीं हम इन्हें कोई तनख़्वाह नहीं देंगे.

काम के लिए तो मेड भी है. बस, ये घर पर रहेंगी, तो घर के आदमी की तरह मेड पर, आने-जानेवालों पर नज़र रख सकेंगी. बच्चों को देख-संभाल सकेंगी.

ये घर पर रहेंगी, तो मैं भी आराम से नौकरी पर जा सकूंगी. मुझे भी पीछे से घर की, बच्चों के खाने-पीने की टेंशन नहीं रहेगी.”

“आइडिया तो अच्छा है, पर क्या ये मान जाएंगी ?”

“क्यों नहीं. हम इन्हें उस घर में रहने का मौक़ा दे रहे हैं, जिसमें उनके प्राण बसे हैं, जिसे ये छुप-छुपकर देखा करती हैं.”

“और अगर कहीं मालकिन बन घर पर अपना हक़ जमाने लगीं तो ?”

“तो क्या, निकाल बाहर करेंगे. घर तो हमारे नाम ही है. ये बुढ़िया क्या कर सकती है.”

“ठीक है, तुम बात करके देखो.” सुधीर ने सहमति जताई.

शालू ने संभलकर बोलना शुरू किया, “देखिए, अगर आप चाहें, तो यहां रह सकती हैं.”

बुढ़िया की आंखें इस अप्रत्याशित प्रस्ताव से चमक उठीं. क्या वाक़ई वो इस घर में रह सकती हैं, लेकिन फिर बुझ गईं.

आज के ज़माने में जहां सगे बेटे ने ही उन्हें घर से यह कहते हुए बेदख़ल कर दिया कि अकेले बड़े घर में रहने से अच्छा उनके लिए वृद्धाश्रम में रहना होगा. वहां ये पराये लोग उसे बिना किसी स्वार्थ के क्यों रखेंगे ?

“नहीं, नहीं. आपको नाहक ही परेशानी होगी.”

“परेशानी कैसी, इतना बड़ा घर है और आपके रहने से हमें भी आराम हो जाएगा.”

हालांकि दुनियादारी के कटु अनुभवों से गुज़र चुकी गायत्री देवी शालू की आंखों में छिपी मंशा समझ गईं, मगर उस घर में रहने के मोह में वो मना न कर सकीं.

गायत्री देवी उनके साथ रहने आ गईं और आते ही उनके सधे हुए अनुभवी हाथों ने घर की ज़िम्मेदारी बख़ूबी संभाल ली.

सभी उन्हें अम्मा कहकर ही बुलाते. हर काम उनकी निगरानी में सुचारु रूप से चलने लगा.

घर की ज़िम्मेदारी से बेफ़िक्र होकर शालू ने भी नौकरी ज्वॉइन कर ली. सालभर कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला.

अम्मा सुबह दोनों बच्चों को उठातीं, तैयार करतीं, मान-मनुहार कर खिलातीं और स्कूल बस तक छोड़तीं. फिर किसी कुशल प्रबंधक की तरह अपनी देखरेख में बाई से सारा काम करातीं. रसोई का वो स्वयं ख़ास ध्यान रखने लगीं,

ख़ासकर बच्चों के स्कूल से आने के व़क़्त वो नित नए स्वादिष्ट और पौष्टिक व्यंजन तैयार कर देतीं.

शालू भी हैरान थी कि जो बच्चे चिप्स और पिज़्ज़ा के अलावा कुछ भी मन से न खाते थे, वे उनके बनाए व्यंजन ख़ुशी-ख़ुशी खाने लगे थे.

बच्चे अम्मा से बेहद घुल-मिल गए थे. उनकी कहानियों के लालच में कभी देर तक टीवी से चिपके रहनेवाले बच्चे उनकी हर बात मानने लगे. समय से खाना-पीना और होमवर्क निपटाकर बिस्तर में पहुंच जाते.

अम्मा अपनी कहानियों से बच्चों में एक ओर जहां अच्छे संस्कार डाल रही थीं, वहीं हर व़क़्त टीवी देखने की बुरी आदत से भी दूर ले जा रही थीं.

शालू और सुधीर बच्चों में आए सुखद परिवर्तन को देखकर अभिभूत थे, क्योंकि उन दोनों के पास तो कभी बच्चों के पास बैठ बातें करने का भी समय नहीं होता था.

पहली बार शालू ने महसूस किया कि घर में किसी बड़े-बुज़ुर्ग की उपस्थिति, नानी-दादी का प्यार, बच्चों पर कितना सकारात्मक प्रभाव डालता है. उसके बच्चे तो शुरू से ही इस सुख से वंचित रहे, क्योंकि उनके जन्म से पहले ही उनकी नानी और दादी दोनों गुज़र चुकी थीं.

आज शालू का जन्मदिन था. सुधीर और शालू ने ऑफ़िस से थोड़ा जल्दी निकलकर बाहर डिनर करने का प्लान बनाया था. सोचा था, बच्चों को अम्मा संभाल लेंगी,

मगर घर में घुसते ही दोनों हैरान रह गए. बच्चों ने घर को गुब्बारों और झालरों से सजाया हुआ था.

वहीं अम्मा ने शालू की मनपसंद डिशेज़ और केक बनाए हुए थे. इस सरप्राइज़ बर्थडे पार्टी, बच्चों के उत्साह और अम्मा की मेहनत से शालू अभिभूत हो उठी और उसकी आंखें भर आईं.

इस तरह के वीआईपी ट्रीटमेंट की उसे आदत नहीं थी और इससे पहले बच्चों ने कभी उसके लिए ऐसा कुछ ख़ास किया भी नहीं था.

बच्चे दौड़कर शालू के पास आ गए और जन्मदिन की बधाई देते हुए पूछा, “आपको हमारा सरप्राइज़ कैसा लगा ?”

“बहुत अच्छा, इतना अच्छा, इतना अच्छा… कि क्या बताऊं…” कहते हुए उसने बच्चों को बांहों में भरकर चूम लिया.

“हमें पता था आपको अच्छा लगेगा. अम्मा ने बताया कि बच्चों द्वारा किया गया छोटा-सा प्रयास भी मम्मी-पापा को बहुत बड़ी ख़ुशी देता है, इसीलिए हमने आपको ख़ुशी देने के लिए ये सब किया.”

शालू की आंखों में अम्मा के लिए कृतज्ञता छा गई. बच्चों से ऐसा सुख तो उसे पहली बार ही मिला था और वो भी उन्हीं के संस्कारों के कारण केक कटने के बाद गायत्री देवी ने अपने पल्लू में बंधी लाल रुमाल में लिपटी एक चीज़ निकाली और शालू की ओर बढ़ा दी.

“ये क्या है अम्मा ?”

“तुम्हारे जन्मदिन का उपहार.”

शालू ने खोलकर देखा तो रुमाल में सोने की चेन थी.

वो चौंक पड़ी, “ये तो सोने की मालूम होती है.”

“हां बेटी, सोने की ही है. बहुत मन था कि तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हें कोई तोहफ़ा दूं. कुछ और तो नहीं है मेरे पास, बस यही एक चेन है, जिसे संभालकर रखा था. मैं अब इसका क्या करूंगी. तुम पहनना, तुम पर बहुत अच्छी लगेगी.”

शालू की अंतरात्मा उसे कचोटने लगी. जिसे उसने लाचार बुढ़िया समझकर स्वार्थ से तत्पर हो अपने यहां आश्रय दिया, उनका इतना बड़ा दिल कि अपने पास बचे इकलौते स्वर्णधन को भी वह उसे सहज ही दे रही हैं.

“नहीं, नहीं अम्मा, मैं इसे नहीं ले सकती.”

“ले ले बेटी, एक मां का आशीर्वाद समझकर रख ले. मेरी तो उम्र भी हो चली. क्या पता तेरे अगले जन्मदिन पर तुझे कुछ देने के लिए मैं रहूं भी या नहीं.”

“नहीं अम्मा, ऐसा मत कहिए. ईश्वर आपका साया हमारे सिर पर सदा बनाए रखे.” कहकर शालू उनसे ऐसे लिपट गई, जैसे बरसों बाद कोई बिछड़ी बेटी अपनी मां से मिल रही हो.

वो जन्मदिन शालू कभी नहीं भूली, क्योंकि उसे उस दिन एक बेशक़ीमती उपहार मिला था, जिसकी क़ीमत कुछ लोग बिल्कुल नहीं समझते और वो है नि:स्वार्थ मानवीय भावनाओं से भरा मां का प्यार. वो जन्मदिन गायत्री देवी भी नहीं भूलीं, क्योंकि उस दिन उनकी उस घर में पुनर्प्रतिष्ठा हुई थी.

घर की बड़ी, आदरणीय, एक मां के रूप में, जिसकी गवाही उस घर के बाहर लगाई गई वो पुरानी नेमप्लेट भी दे रही थी, जिस पर लिखा था –
‘गायत्री निवास’

यदि इस कहानी को पढ़कर आपकी थोड़ी सी भी आंखे नम हो गई हो तो अकेले में 2 मिनट चिंतन जरूर करे कि पाश्चात्य संस्कृति की होड़ में हम अपनी मूल संस्कृति को भुलाकर, बच्चों की उच्च शिक्षा पर तो सभी का ध्यान केंद्रित हैं किन्तु उन्हें संस्कारवान बनाने में हम पिछड़ते जा रहे हैं…
🙏🏻🌹जय श्री जिनेन्द्र🌹🙏🏻

Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

नारी


संसार की किसी भी धर्म पुस्तक में नारी की महिमा का इतना सुंदर गुण गान नहीं मिलता जितना वेदों में मिलता हैं.कुछ उद्हारण
१. उषा के समान प्रकाशवती-
ऋग्वेद ४/१४/३
हे राष्ट्र की पूजा योग्य नारी! तुम परिवार और राष्ट्र में सत्यम, शिवम्, सुंदरम की अरुण कान्तियों को छिटकती हुई आओ , अपने विस्मयकारी सद्गुणगणों के द्वारा अविद्या ग्रस्त जनों को प्रबोध प्रदान करो. जन-जन को सुख देने के लिए अपने जगमग करते हुए रथ पर बैठ कर आओ.
२. वीरांगना-
यजुर्वेद ५/१०
हे नारी! तू स्वयं को पहचान. तू शेरनी हैं, तू शत्रु रूप मृगों का मर्दन करनेवाली हैं, देवजनों के हितार्थ अपने अन्दर सामर्थ्य उत्पन्न कर. हे नारी ! तू अविद्या आदि दोषों पर शेरनी की तरह टूटने वाली हैं, तू दिव्य गुणों के प्रचारार्थ स्वयं को शुद्ध कर! हे नारी ! तू दुष्कर्म एवं दुर्व्यसनों को शेरनी के समान विश्वंस्त करनेवाली हैं, धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलंकृत कर.
३. वीर प्रसवा
ऋग्वेद १०/४७/३
राष्ट्र को नारी कैसी संतान दे
हमारे राष्ट्र को ऐसी अद्भुत एवं वर्षक संतान प्राप्त हो, जो उत्कृष्ट कोटि के हथियारों को चलाने में कुशल हो, उत्तम प्रकार से अपनी तथा दूसरों की रक्षा करने में प्रवीण हो, सम्यक नेतृत्व करने वाली हो, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूप चार पुरुषार्थ- समुद्रों का अवगाहन करनेवाली हो, विविध संपदाओं की धारक हो, अतिशय क्रियाशील हो, प्रशंशनीय हो, बहुतों से वरणीय हो, आपदाओं की निवारक हो.
४. विद्या अलंकृता
यजुर्वेद २०/८४
विदुषी नारी अपने विद्या-बलों से हमारे जीवनों को पवित्र करती रहे. वह कर्मनिष्ठ बनकर अपने कर्मों से हमारे व्यवहारों को पवित्र करती रहे. अपने श्रेष्ठ ज्ञान एवं कर्मों के द्वारा संतानों एवं शिष्यों में सद्गुणों और सत्कर्मों को बसाने वाली वह देवी गृह आश्रम -यज्ञ एवं ज्ञान- यज्ञ को सुचारू रूप से संचालित करती रहे.
५. स्नेहमयी माँ
अथर्वेद ७/६८/२
हे प्रेमरसमयी माँ! तुम हमारे लिए मंगल कारिणी बनो, तुम हमारे लिए शांति बरसाने वाली बनो, तुम हमारे लिए उत्कृष्ट सुख देने वाली बनो. हम तुम्हारी कृपा- दृष्टि से कभी वंचित न हो.
६. अन्नपूर्ण
अथर्ववेद ३/२८/४
इस गृह आश्रम में पुष्टि प्राप्त हो, इस गृह आश्रम में रस प्राप्त हो. इस गिरः आश्रम में हे देवी! तू दूध-घी आदि सहस्त्रों पोषक पदार्थों का दान कर. हे यम- नियमों का पालन करने वाली गृहणी! जिन गाय आदि पशु से पोषक पदार्थ प्राप्त होते हैं उनका तू पोषण कर.
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:
जिस कुल में नारियो कि पूजा, अर्थात सत्कार होता हैं, उस कुल में दिव्यगुण , दिव्य भोग और उत्तम संतान होते हैं और जिस कुल में स्त्रियो कि पूजा नहीं होती, वहां जानो उनकी सब क्रिया निष्फल हैं

अरुण सुक्ला

Posted in संस्कृत साहित्य

मृत्यु


💥✳
किरलियान ने मरते हुए आदमी के फोटो लिए, उसके शरीर से ऊर्जा के छल्‍ले बाहर लगातार विसर्जित हो रहे थे, और वो मरने के तीन दिन बाद तक भी होते रहे।

अब तो वह जलाने के बाद औपचारिक तौर पर उसकी हड्डियाँ उठाना ही तीसरा हो गया। यानि अभी जिसे हम मरा समझते हैं वो मरा नहीं है। आज नहीं कल वैज्ञानिक कहते हैं तीन दिन बाद भी मनुष्‍य को जीवित कर सकेगें।

और एक मजेदार घटना किरलियान के फोटो में देखने को मिली। की जब आप क्रोध की अवस्‍था में होते हो तो तब वह ऊर्जा के छल्‍ले आपके शरीर से निकल रहे होते हैं। यानि क्रोध भी एक छोटी मृत्‍यु तुल्‍य है।

*एक बात और किरलियान ने अपनी फोटो से सिद्ध की कि मरने से ठीक छह महीने पहले ऊर्जा के छल्‍ले मनुष्‍य के शरीर से निकलने लग जाते हैं। यानि मरने की प्रक्रिया छ: माह पहले शुरू हो जाती है, जैसे मनुष्‍य का शरीर मां के पेट में नौ महीने विकसित होने में लेता है वैसे ही उसे मिटने के लिए छ: माह का समय चाहिए।

भारत में हजारों साल से योगी मरने के छ:माह पहले अपनी तिथि बता देते थे।

ये छ: माह कोई संयोगिक बात नहीं है। इस में जरूर कोई रहस्‍य होना चाहिए। कुछ और तथ्‍य किरलियान ने मनुष्‍य के जीवन के सामने रखे, एक फोटो में उसने दिखाया है, छ: महीने पहले जब उसने जिस मनुष्‍य को फोटो लिया तो उसके दायें हाथ में ऊर्जा प्रवाहित नहीं हो रही थी। यानि दाया हाथ उर्जा को नहीं दर्शा रहा था। जबकि दांया हाथ ठीक ठाक था, पर ठीक छ: माह बाद अचानक एक ऐक्सिडेन्ट के कारण उस आदमी का वह हाथ काटना पड़ा।

यानि हाथ की ऊर्जा छ: माह पहले ही अपना स्‍थान छोड़ चुकी थी।

भारतीय योग तो हजारों साल से कहता आया है कि मनुष्‍य के स्थूल शरीर में कोई भी बिमारी आने से पहले आपके सूक्ष्‍म शरीर में छ: माह पहले आ जाती है। यानि छ: माह पहले अगर सूक्ष्म शरीर पर ही उसका इलाज कर दिया जाये तो बहुत सी बिमारियों पर विजय पाई जा सकती है।

इसी प्रकार भारतीय योग कहता है कि मृत्‍यु की घटना भी अचानक नहीं घटती वह भी शरीर पर छ: माह पहले से तैयारी शुरू कर देती है। पर इस बात का एहसास हम क्‍यों नहीं होता।

पहली बात तो मनुष्‍य मृत्‍यु के नाम से इतना भयभीत है कि वह इसका नाम लेने से भी डरता है। दूसरा वह भौतिक वस्तुओं के साथ रहते-रहते इतना संवेदन हीन हो गया है कि उसने लगभग अपनी अतीन्द्रिय शक्‍तियों से नाता तोड़ लिया है। वरन और कोई कारण नहीं है।

पृथ्‍वी का श्रेष्‍ठ प्राणी इतना दीन हीन। पशु पक्षी भी अतीन्द्रिय ज्ञान में उससे कहीं आगे है।

साइबेरिया में आज भी कुछ ऐसे पक्षी हैं जो बर्फ गिरने के ठीक 14 दिन पहले वहां से उड़ जाते हैं। न एक दिन पहले न एक दिन बाद।

जापान में आज भी ऐसी चिड़िया पाई जाती है जो भुकम्‍प के12 घन्‍टे पहले वहाँ से गायब हो जाती है।

और भी न जाने कितने पशु-पक्षी हैं जो अपनी अतीन्द्रिय शक्‍ति के कारण ही आज जीवित हैं।

भारत में हजारों योगी मरने की तिथि पहले ही घोषित कर देते हैं। अभी ताजा घटना विनोबा भावे जी की है। जिन्‍होंने महीनों पहले कह दिया था कि में शरद पूर्णिमा के दिन अपनी देह का त्‍याग करूंगा।

ठीक महाभारत काल में भी भीष्‍म पितामह ने भी अपने देह त्‍याग के लिए दिन चुना था। कुछ तो हमारे स्थूल शरीर के उपर ऐसा घटता है, जिससे योगी जान जाते हैं कि अब हमारी मृत्‍यु का दिन करीब आ गया है।

एक उदाहरण। जब आप रात को बिस्तर पर सोने के लिए जाते है। सोने ओर निंद्रा के बीच में एक संध्या काल आता है, एक न्यूटल गीयर, पर वह पल के हज़ारवें हिस्‍से के समान होता है। उसे देखने के लिए बहुत होश चाहिए। आपको पता ही नहीं चल पाता कि कब तक जागे ओर कब नींद में चले गये। पर योगी सालों तक उस पर मेहनत करता है। जब वह उस संध्‍या काल की अवस्था से परिचित हो जाता है। मरने के ठीक छ: महीने पहले मनुष्‍य के चित्त की वही अवस्‍था सारे दिन के लिए हो जाती है। तब योगी समझ जाता है अब मेरी बड़ी संध्‍या का समय आ गया। पर पहले उस छोटी संध्‍या के प्रति सजग होना पड़ेगा। तब महासंध्या के प्रति आप जान पायेंगे।

*और हमारे पूरे शरीर का स्नायु तंत्र प्राण ऊर्जा का वर्तुल उल्‍टा कर देता है। यानि आप साँसे तो लेंगे पर उसमें प्राण तत्‍व नहीं ले रहे होगें। शरीर प्राण तत्‍व छोड़ना शुरू कर देता है।

अरुण सुक्ला

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चमकीले नीले पत्थर की कीमत


एक शहर में बहुत ही ज्ञानी प्रतापी साधु महाराज आये हुए थे, बहुत से दीन दुखी, परेशान लोग उनके पास उनकी कृपा दृष्टि पाने हेतु आने लगे। ऐसा ही एक दीन दुखी, गरीब आदमी उनके पास आया और साधु महाराज से बोला ‘महाराज में बहुत ही गरीब हूँ, मेरे ऊपर कर्जा भी है, मैं बहुत ही परेशान हूँ। मुझ पर कुछ उपकार करें’। साधु महाराज ने उसको एक चमकीला नीले रंग का पत्थर दिया, और कहा ‘कि यह कीमती पत्थर है, जाओ जितनी कीमत लगवा सको लगवा लो। वो आदमी वहां से चला गया और उसे बचने के इरादे से अपने जान पहचान वाले एक फल विक्रेता के पास गया और उस पत्थर को दिखाकर उसकी कीमत जाननी चाही।

फल विक्रेता बोला ‘मुझे लगता है ये नीला शीशा है, महात्मा ने तुम्हें ऐसे ही दे दिया है, हाँ यह सुन्दर और चमकदार दिखता है, तुम मुझे दे दो, इसके मैं तुम्हें 1000 रुपए दे दूंगा।
वो आदमी निराश होकर अपने एक अन्य जान पहचान वाले के पास गया जो की एक बर्तनों का व्यापारी था। उनसे उस व्यापारी को भी वो पत्थर दिखाया और उसे बचने के लिए उसकी कीमत जाननी चाही। बर्तनो का व्यापारी बोला ‘यह पत्थर कोई विशेष रत्न है में इसके तुम्हें 10,000 रुपए दे दूंगा। वह आदमी सोचने लगा की इसके कीमत और भी अधिक होगी और यह सोच वो वहां से चला आया।

उस आदमी ने इस पत्थर को अब एक सुनार को दिखाया, सुनार ने उस पत्थर को ध्यान से देखा और बोला ये काफी कीमती है इसके मैं तुम्हें 1,00,000 रूपये दे दूंगा। वो आदमी अब समझ गया था कि यह बहुत अमुल्य है, उसने सोचा क्यों न मैं इसे हीरे के व्यापारी को दिखाऊं, यह सोच वो शहर के सबसे बड़े हीरे के व्यापारी के पास गया। उस हीरे के व्यापारी ने जब वो पत्थर देखा तो देखता रह गया, चौकने वाले भाव उसके चेहरे पर दिखने लगे। उसने उस पत्थर को माथे से लगाया और और पुछा तुम यह कहा से लाये हो. यह तो अमुल्य है. यदि मैं अपनी पूरी सम्पति बेच दूँ तो भी इसकी कीमत नहीं चुका सकता।

शिक्षा:-
हम अपने आप को कैसे आँकते हैं। क्या हम वो हैं जो राय दूसरे हमारे बारे में बनाते हैं।आपकी लाइफ अमूल्य है आपके जीवन का कोई मोल नहीं लगा सकता।आप वो कर सकते हैं जो आप अपने बारे में सोचते हैं. कभी भी दूसरों के नेगेटिव कमैंट्स से अपने आप को कम मत आंकियें।

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

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*कुछ मजदूर पत्थर के खंभे बना रहे थे। उधर से एक साधु गुजरे। उन्होंने एक मजदूर से पूछा- यहां क्या बन रहा है??*

उसने कहा- देखते नहीं पत्थर काट रहा हूं??

साधु ने कहा- हां, देख तो रहा हूं, लेकिन यहां बनेगा क्या??

मजदूर झुंझला कर बोला- मालूम नहीं। यहां पत्थर तोड़ते-तोड़ते जान निकल रही है और इनको यह चिंता है कि यहां क्या बनेगा, यह कहते हुए साधु आगे बढ़े।

एक दूसरा मजदूर मिला। साधु ने पूछा- यहां क्या बनेगा??

मजदूर बोला- देखिए साधु बाबा, यहां कुछ भी बने। चाहे मंदिर बने या जेल, मुझे क्या। मुझे तो दिन भर की मजदूरी के रूप में १०० रुपए मिलते हैं। बस शाम को रुपए मिलें और मेरा काम बने। मुझे इससे कोई मतलब नहीं कि यहां क्या बन रहा है।

साधु आगे बढ़े तो तीसरा मजदूर मिला। साधु ने उससे पूछा- यहां क्या बनेगा?? मजदूर ने कहा- मंदिर। इस गांव में कोई बड़ा मंदिर नहीं था।

इस गांव के लोगों को दूसरे गांव में उत्सव मनाने जाना पड़ता था। मैं भी इसी गांव का हूं। ये सारे मजदूर इसी गांव के हैं। मैं एक-एक छेनी चला कर, जब पत्थरों को गढ़ता हूं तो छेनी की आवाज में मुझे मधुर संगीत सुनाई पड़ता है और मैं आनंद में रहता हूं। कुछ दिनों बाद यह मंदिर बन कर तैयार हो जाएगा और यहां धूमधाम से पूजा होगी। मेला लगेगा। कीर्तन होगे, मैं यही सोच कर मस्त रहता हूं। मेरे लिए यह काम, काम नहीं है। मैं हमेशा अपनी मस्ती में रहता हूं – मंदिर बनाने की मस्ती में। मैं रात को सोता हूं तो मंदिर की कल्पना के साथ और सुबह जगता हूं तो मंदिर के खंभों को तराशने के लिए चल पड़ता हूं। बीच-बीच में जब ज्यादा मस्ती आती है, तो भजन गाने लगता हूं। मेरे जीवन में इससे ज्यादा काम करने का आनंद कभी नहीं आया।

साधु ने कहा- यही जीवन का रहस्य है, मेरे भाई। बस नजरिया का फर्क है । कोई अपने काम को बोझ समझ रहा है और पूरा जीवन झुंझलाते और हाय-हाय करते बीता देता है।

लेकिन कोई अपने काम को आनंद समझ कर जीवन आनंद लेता हैं।
ये तो बस नजरिये का फर्क हैं।
||👍 श्री कृष्ण👍||
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वसीयत कृति को कहां पता था कि अबकी बार डैडी जो अस्पताल जाएंगे तो लौट कर नहीं आएंगे। वह पिछले एक साल तेरह दिनों तक डैडी को लेकर अस्पताल के चक्कर लगाती रही। डैडी अस्पताल जाते, ठीक होते और फिर वह लेकर उन्हें घर आ जाती। लेकिन अबकी बार डैडी की तबीयत बिगड़ती जा रही थी। कृति को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे, किससे जाकर अपने मन की व्यथा कहे। घर में ऐसा कोई बड़ा नहीं था जिसके आगोश में सर रखकर वह रो सके। घर में इस समय एकमात्र कोई बड़ा था तो वह थी बीमार मां । उसके सामने जाकर रोए तो मां की तबीयत खराब होगी। दोनों बड़ी बहनें अपने घर परिवार में रमी थीं तो छोटी बहन भी अपनी नौकरी और गृहस्थी में व्यस्त थी। और इकलौता भाई पिछले पांच वर्षों से अमेरिका में नौकरी कर रहा था। जिस पिता से वह अपने मन की व्यथा कहती थी, वह तो आज अस्पताल में पड़ा है। अध्यापक पिता ने कृति ही नहीं सभी बच्चों को संस्कार दिए थे। लेकिन कृति उनकी आन-बान-शान थी। कृति अपने अम्मा और डैडी के लिए भगवान से भी लड़ने को तत्पर हो जाती। अध्यापक पिता और अपने अध्यापकों द्वारा प्राप्त ज्ञान से कृति मुखर, स्पष्टवादी और अन्याय के खिलाफ लड़ने वाली लड़की थी। सही को सही और ग़लत को ग़लत कहना उसकी आदत थी, *इसलिए लोगों को उसका यह नजरिया खटकता था।* ख़ैर कृति को इसकी ज़रा भी परवाह नहीं थी। उसे लगता था कि ईश्वर ने हमें इस संसार में भेजा है कुछ जिम्मेदारियों के साथ। कुछ रिश्तों के साथ। उन जिम्मेदारियों, उन रिश्तों को निभाने में वह ज़रा भी कोताही नहीं बरतती थी। लेकिन यह भी कटु सत्य है कि उसके अपने ही रिश्ते उससे छल और कपट करते रहते *जिससे उसमें विद्रोह का भाव प्रबल होता जा रहा था।* कृति के इस विद्रोही भाव ने उसे मजबूत बनाया और समाज का सामना करने की शक्ति भी दी। पिता के अस्पताल में भर्ती होते ही उसने डॉक्टर से कहा कि डॉक्टर साहब जितना भी खर्च हो, लेकिन मेरे डैडी को बचा लीजिए।जितने दिन तक मेरे डैडी हैं उतने दिन तक मैं पिता की पुत्री कहलवाऊंगी। लड़की के लिए पिता क्या होता है, यह सिर्फ एक लड़की ही समझ सकती है। पिता उसके लिए वरदहस्त-वटवृक्ष होता है। अस्पताल में पिता के भर्ती होने पर कृति अपनी नौकरी, अपने परिवार को संभालते हुए अस्पताल में पिता को संभालने की भी जिम्मेदारी उठाती। उसकी इस जिम्मेदारी में उसकी बड़ी दीदी और उनके दो लड़के सहयोग करते थे। उसे लगता कि डैडी धीरे-धीरे ठीक हो जाएंगे ,लेकिन उनकी तबीयत बिगड़ती जा रही थी। कृति एक स्वाभिमानी लड़की थी। किसी के आगे हाथ पसारना उसका स्वभाव नहीं था। यहां तक कि वह ईश्वर के दरबार में जाकर भी भिक्षा नहीं मांगती थी। हां, वह इतना जरूर कहती - " हे प्रभु तूने मुझे चुनौतियां दी हैं। मैं उन्हें स्वीकार करती हूं। बस उन चुनौतियों का सामना करने की शक्ति तू मुझे प्रदान कर। तू अगर मेरी परीक्षा लेना चाहता है तो मैं उस परीक्षा में सफल होकर दिखाऊंगी।" और वह लग जाती अगली चुनौती का सामना करने में। डॉक्टरों ने कह दिया कि पिता की तबीयत में सुधार नहीं हो रहा है, इन्हें किसी दूसरे अस्पताल में ले जाएं जहां इनके इलाज के लिए एडवांस सुविधाएं मौजूद हों। कृति ने सोचा कि डैडी को घर के ही नज़दीक किसी अस्पताल में एडमिट करवाया जाए जिससे बूढ़ी मां भी उन्हें देखने के लिए आ सके। पहले तो कृति ने जाकर अस्पताल में डॉक्टर को पूरी फाइल दिखाई और फिर उनके लिए बेड की व्यवस्था करवाई। इस दौरान उसकी दूसरी दीदी और बड़ी दीदी का लड़का अस्पताल में डैडी की देखभाल के लिए अस्पताल में मौजूद थे। इसी बीच घर की दुल्हन सरिता भी अपने बच्चों के साथ ससुर के अंतिम दर्शन के लिए अमेरिका से आ चुकी थी। लेकिन ट्रंप प्रशासन की नीतियों के चलते भाई नहीं आ सका था। हां, इतना जरूर था कि पिता का हाल-चाल जानने के लिए वह पिता के मोबाइल पर फोन करता और उन्हीं से बात करके रख देता। वह घर के किसी अन्य सदस्य से ना बात करता था और ना ही डॉक्टर से। डैडी से उनकी तबीयत पूछने पर डैडी बोलते कि मैं ठीक हूं। डैडी तो पेशेंट थे, उन्हें तो कोई नहीं कह पा रहा था कि आप ....!!!

ख़ैर, भाई किसी से बात नहीं करता तो कृति भी उससे कुछ नहीं कहती। कृति को लगता कि अगर वह भाई से कहेगी कि डैडी की तबीयत बिगड़ती जा रही है तो भाई यह भी कर सकता है कि वे तुम्हारे भी डैडी हैं। तुम्हें उनके लिए करना चाहिए और फिर उसे अगर बूढ़े माता-पिता की चिंता होती तो अमेरिका जाने से पहले वह बहनों के पास जाकर कहता कि मेरी अनुपस्थिति में मेरे माता-पिता की जिम्मेदारी मैं आप लोगों को सौंपकर जा रहा हूं। हां, सिर्फ छोटी बहन स्वाति सारी ख़बरें अमित को देती रहती थी। कृति का अपने छोटे भाई अमित से छत्तीस का आंकड़ा था क्योंकि भाई थोड़ा उद्दंड था। कृति को लगता कि वह छोटा है, छोटा बन कर रहे। एकलौता है तो क्या सिर पर नाचेगा और अमित को लगता था कि वह छोटा है, एकमात्र भाई है इसलिए उसका हर चीज पर हक़ बनता है। घर में उसकी ही चलनी चाहिए। इसी बात को लेकर दोनों में वैचारिक मतभेद अब तक बने हुए थे। कृति ने डैडी को नजदीकी अस्पताल में भर्ती करवाया जिससे बीमार मां और दोनों छोटे पोते उन्हें देखने अस्पताल में आ सकें। मां कृति से एक ही बात कहती कि बेटा इस समू तुम नहीं करोगी तो कौन करेगा? और फिर कौन इतना काबिल है जो तुम्हारे पिता के लिए अस्पताल के चक्कर लगा सके? कृति को लगता कि मां को केवल उस पर ही यकीन है। इसलिए वह जी जान से पूरी कोशिश कर रही थी कि उसके पिता शीघ्रातिशीघ्र ठीक होकर घर लौट आएं, जबकि उसे पता था कि उसके पिता शनै: शनै: काल के गाल में समाते जा रहे हैं। दूसरी तरफ नौकरी और परिवार का बोझ भी उस पर पड़ रहा था। परिवार, नौकरी और अस्पताल में डैडी- इन सब को संभालने की शक्ति कृति में न जाने कहां से आती जा रही थी। अस्पताल में भर्ती पिता उसे बार-बार घर ले चलने के लिए कहते। लेकिन उसे डर था कि घर ले जाने पर पिता की तबीयत और बिगड़ सकती है। यहां अस्पताल में डॉक्टर हैं, नर्स हैं, दवाइयां हैं। घर में बूढ़ी और रुग्ण मां, बहू और उसके दो बच्चे। उस पर बीमार पिता का बोझ। और पिता भी मरणासन्न अवस्था में। वह चाह कर भी पिता को घर ले जाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी। डैडी अब ऑक्सीजन के भरोसे जीवित थे। 12 अगस्त रविवार को उसने डैडी को अंतिम बार अपने हाथों से खिलाया था। ऑक्सीजन की मशीन हटाकर बमुश्किल दो निवाला खिला पाई थी कि उनकी सांस फूलने लगी और उसने तुरंत ही फिर से मशीन लगा दिया। अगर वह थोड़ी भी देर करती तो अनर्थ हो जाता ।उनकी हालत देखकर कृति के हाथ-पांव फूलने लगे थे। अब डैडी की नाक में नली लगाकर लिक्विड दिया जाने लगा।अब वे बोल नहीं पा रहे थे क्योंकि बोलने के लिए ऑक्सीजन की मशीन हटाना जरूरी था। इसलिए वे लिख कर बात कर रहे थे। हिम्मत करके कृति ने डैडी से दो बातें पूछीं, जो ईश्वर किसी संतान के नसीब में ना लिखे। कृति का दिल बैठा जा रहा था‌। उसने कभी ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि जीवन में ऐसे पल भी आएंगे कि जो उसका जीवन दाता है, उसकी मुखाग्नि- क्रिया की बातें उससे पूछनी पड़ेंगी। कितना कठोर और कितना भावुक पल था। कृति कमज़ोर पड़ रही थी लेकिन उसने ख़ुद को संभाला- "नहीं,जिस पिता ने मुझ पर हमेशा यकीन किया है उसके लिए करने की बारी अब मेरी है। केवल कहने के लिए बेटा और बेटी में फ़र्क है। मैं साबित कर दूंगी कि बेटियां, बेटों से कहीं ज़्यादा काबिल होती हैं। कृति ने खुद को संभालते हुए डैडी से पूछा कि अगर किन्हीं कारणों से भाई अमेरिका से लौट कर ना आ सके तो उनकी मुखाग्नि क्रिया कौन करे? यह कितना क्रूर सवाल था!! मरणासन्न अवस्था में बिस्तर पर पड़े पिता से उनकी मुखाग्नि की बात पूछी जा रही थी!!क्रूर काल ने कृति के जीवन में यह दिन भी दिखाया कि जिस पिता ने उसे बहादुर लड़की बनाया आज उस बहादुरी का उपयोग इस तरह के सवालों के लिए कर रही है। पिता ने कागज़ पर तीन नाम लिख दिए- दीपक, विनय और प्रियम। दीपक और विनय उसकी बड़ी दीदी के बेटे थे, जिन्होंने पिछले एक वर्ष से अस्पताल में उनकी सेवा की थी और प्रियम उनका अपना सबसे प्रिय नाती और कृति का बेटा। हिम्मत करके कृति ने एक और अंतिम सवाल पिता से पूछा कि आप की अंतिम क्रिया कहां होनी चाहिए? मुंबई में या बनारस? पिता बोल नहीं सकते थे तो कृति के बनारस बोलते ही उन्होंने हामी में जवाब दिया। इसका अर्थ यह था कि अंतिम क्रिया बनारस के मणिकर्णिका घाट पर होनी चाहिए। कृति को ऐसे दो क्रूर सवालों का सामना करना पड़ा कि अपने वटवृक्ष पिता के लिए। अगर उसका भाई यहां होता तो शायद उसे ऐसे सवालों का सामना नहीं करना पड़ता। लेकिन फिर वह अपने आपको समझाती है कि शायद इसीलिए ईश्वर ने उसे इतना मजबूत बनाया है‌‌। मां और डैडी कई बार कहते- "कृति आप बेटी बनकर क्यों पैदा हुईं? बेटा बनकर क्यों नहीं पैदा हुई? इतनी बहादुर बेटी को मुझे दूसरे के घर भेजना पड़ा। बेटा होती तो मेरे ही घर पर रहती।" 16 अगस्त की शाम को पिताजी ने अंतिम सांसें लीं। इस दुनिया से कूच करने के पहले कृति और मां दोनों डैडी के पास थे। असहाय डैडी को देखकर मां बिलखती और कृति अपने बहादुर डैडी से कहती -" डैडी, यू आर माई डैडी." तो वे भी हामी भरते हुए सिर हिला देते। फिर वह कहती - डैडी, मेरी हथेली को ज़ोर से दबाइए। जैसे बचपन में जब मैं आपकी उंगलियां पकड़कर चलती थी तो आप दबा देते थे। कृति चाहती कि डैडी उसी शक्ति, उसी बल से उसके हथेलियों को दबाएं। लेकिन उनका शरीर तो लगभग बेजान हो चुका था। वे उसकी हथेलियों को दबाने की भरसक कोशिश कर रहे थे। कृति बार-बार कह रही थी-" डैडी और ज़ोर से।" लेकिन डैडी के शरीर में अब वह शक्ति कहां थी!! मरीजों से मिलने का समय ख़त्म होने पर केवल एक व्यक्ति पेशेंट के साथ रह सकता था। कृति दिनभर अस्पताल में थी और वह थक कर चूर हो गई थी। उसने सोचा कि उसे घर जाना चाहिए। घर में बच्चे उसका इंतज़ार कर रहे होंगे। सुबह फिर उसे अस्पताल आना है। यह सोचकर वह अस्पताल से घर के लिए निकली। स्टेशन पहुंची ही थी कि अस्पताल से विनय का फोन आया कि मौसी नाना जी नहीं रहे। सुनकर कृति की आंखों में आंसुओं की झड़ी लग गई। बचपन से ही जिसका हाथ पकड़ कर उसने चलना सीखा।वह पिता आज उससे अपना हाथ छुड़ाकर इस दुनिया से सदा के लिए कूच कर चुका था। उसे आज पहली बार लग रहा था कि वह अनाथ हो गई। और वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पाई। इस बात का अपराध बोध उसे हो रहा था। डैडी की मृत्यु की ख़बर बिजली की तरह पूरे शहर में फैल गई। तेज़ बरसात के मौसम में भी परिजनों के साथ- साथ, रिश्तेदारों, उनके विद्यार्थियों और इष्ट मित्रों का हुजूम उनके अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पड़ा। कृति के सामने अगली चुनौती थी पिता के शरीर को बनारस के मणिकर्णिका घाट ले जाने की। उसने पिता से वादा किया था और इस तेज़ बारिश में भी उसने वे सारे इंतज़ाम किए। अपने पिता के शरीर को वह न केवल मणिकर्णिका घाट बल्कि उनकी जन्मभूमि, उनके पैतृक गांव में भी ले गई। पिता के शरीर को लेकर जैसे ही हवाई जहाज उतरा कृति का दिल धड़कने लगा। पिता के शरीर को लेने के लिए उसके क़दम आगे बढ़ ही नहीं रहे थे।उससे ऐसा लग रहा था कि अब उसके पिता उसके साथ कुछ ही घंटे हैं। वह रोना चाहती थी। लेकिन जिसके आगोश में छुपकर कृति रो लेती थी , वह उसे अकेला छोड़कर चला गया था। पिता के शरीर को लेकर कृति जैसे ही गांव में पहुंची उनके अंतिम दर्शन के लिए बुआ, काकी, रिश्तेदारों, उनके बचपन के मित्रों, उनके विद्यालय के कुछ सहपाठियों का हुजूम उमड़ पड़ा। इस तेज बरसात में दूर-दराज के गांव के लोग भी उनके अंतिम दर्शनार्थ आए क्योंकि उनका शरीर हर हज़ारों किलोमीटर की यात्रा करके गांव पहुंचा था। इसके बाद पिता का शरीर उस यात्रा के लिए निकल पड़ा जहां से कोई लौटकर नहीं आता। पिता की तेरहवीं और अन्य क्रियाएं करके कृति जब शहर को लौटी तो अमेरिका से उसके भाई अमित ने फोन करके कृति से इतना ही कहा कि डैडी अपनी वसीयत मेरे नाम कर गए हैं और भाड़े का पैसा जो तुमने ले लिया है वह मेरी पत्नी को दे दो। इतना सुनते ही कृति ने मन में सोचा कि यह कैसा पुत्र और कैसा भाई है? इसे पिता के देहांत के बाद वसीयत और भाड़े का होश तो है, लेकिन एक महीना तीन दिन तक पिता अस्पताल में भर्ती रहे। उसने कृति से यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि अस्पताल और दवाइयों के लिए पैसा कौन खर्च कर रहा है? उस भाई ने अगर अस्पताल के चक्कर लगाते समय कृति को सांत्वना के दो शब्द के लिए फोन किया होता तो भी उसे अच्छा लगता। लेकिन आज उसका फोन आया तो पिता की वसीयत और भाड़े के लिए। जबकि भाड़े की असली हक़दार मां अभी जिंदा थी। वाह रे कलयुग!!!

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  • संगीता दुबे
    गोरेगांव, मुंबई।
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अच्छाई का अभाव ही बुराई का पोषण है !!


एक दिन कॉलेज में प्रोफेसर ने विद्यर्थियों से पूछा कि – इस संसार में जो कुछ भी है उसे भगवान ने ही बनाया है न?

सभी ने कहा – “हां भगवान ने ही बनाया है।“

प्रोफेसर ने कहा कि इसका मतलब ये हुआ कि बुराई भी भगवान की बनाई चीज़ ही है।

प्रोफेसर ने इतना कहा तो एक विद्यार्थी उठ खड़ा हुआ और उसने कहा कि इतनी जल्दी इस निष्कर्ष पर मत पहुंचिए सर।

प्रोफेसर ने कहा, क्यों? अभी तो सबने कहा है कि सबकुछ भगवान का ही बनाया हुआ है फिर तुम ऐसा क्यों कह रहे हो?

विद्यार्थी ने कहा कि सर, मैं आपसे छोटे-छोटे दो सवाल पूछूंगा। फिर उसके बाद आपकी बात भी मान लूंगा।

विद्यार्थी ने पूछा , “सर क्या दुनिया में ठंड का कोई वजूद है?”

प्रोफेसर ने कहा – बिल्कुल है !! सौ फीसदी है। हम ठंड को महसूस करते हैं।

विद्यार्थी ने कहा – “नहीं सर, ठंड कुछ है ही नहीं। ये असल में गर्मी की अनुपस्थिति का अहसास भर है। जहां गर्मी नहीं होती,वहां हम ठंड को महसूस करते हैं।”

प्रोफेसर चुप रहे।

विद्यार्थी ने फिर पूछा, “सर क्या अंधेरे का कोई अस्तित्व है?”

प्रोफेसर ने कहा, “बिल्कुल है। रात को अंधेरा होता है।”

विद्यार्थी ने कहा, “नहीं सर। अंधेरा कुछ होता ही नहीं। ये तो जहां रोशनी नहीं होती वहां अंधेरा होता है।

प्रोफेसर ने कहा, “तुम अपनी बात आगे बढ़ाओ।”

*विद्यार्थी ने फिर कहा, “सर आप हमें सिर्फ लाइट एंड हीट (प्रकाश और ताप) ही पढ़ाते हैं। आप हमें कभी डार्क एंड कोल्ड (अंधेरा और ठंड) नहीं पढ़ाते। फिजिक्स में ऐसा कोई विषय ही नहीं !! सर, ठीक इसी तरह ईश्वर ने सिर्फ अच्छा-अच्छा बनाया है। अब जहां अच्छा नहीं होता, वहां हमें बुराई नज़र आती है। *पर बुराई को ईश्वर ने नहीं बनाया। ये सिर्फ अच्छाई की अनुपस्थिति भर है।”*

👉दरअसल दुनिया में कहीं बुराई है ही नहीं। ये सिर्फ प्यार, विश्वास और ईश्वर में हमारी आस्था की कमी का नाम है।ज़िंदगी में जब और जहां मौका मिले अच्छाई बांटिए।अच्छाई बढ़ेगी तो बुराई होगी ही नहीं…..

🌸हम बदलेंगे,युग बदलेगा।🌸
❤️🙏🏻जय श्री जिनेन्द्र🙏🏻❤️

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મારી સાથે કયાં સુધી?



વનના અંતિમ છેડા સુધી, ધન કમાવામાં
પોતાની
બધી જ શક્તિઓને
ખર્ચનાર એક
ધનાઢ્ય શેઠ, તિજોરીમાં રહેલા નાણાંને પૂછયું :
તને મેળવવા માટે, સાચવવા માટે મેં અનેક પ્રકારના
પાપો, અન્યાય, અનીતિ, વિશ્વાસઘાત, જીવો
પ્રતિ નિદ્દયતા, કુરતા વગેરે કરી. ધર્મ માર્ગની
ઉપેક્ષા કરી. તો તમે મારા મર્યા પછી ક્યાં સુધી
સાથે રહેશો?
તિજોરીના રૂપિયા બોલ્યા કે – એક ડગલું
પણ અમે તારી સાથે આવવાના નથી.
શેઠ કહે, પણ, તમારા ખાતર તો મેં શાંતિથી
ખાધું પણ નથી, મજાથી ઊંધ્યો પણ નથી. તોય
મારી આટલી જ કદર?
રૂપિયા કહે કે – “ખબરદાર! વધુ બોલશો તો!
કડવું સત્ય એ છે કે, તારા મર્યા પછી નનામી અને
બાળવાના લાકડા પણ અમે જ પૂરા પાડવાના છીએ.
ધનાઢ્ય શેઠ તો આ જવાબ સાંભળીને સજ્જડ
થઈ ગયા.
પછી પોતાની પ્રાણપ્રિય પત્નીને પૂછ્યું :- તારી
ખાતર તો મેં મારું સત્ત્વ નીચોવી નાખ્યું, બ્રહ્મચર્ય
વ્રતને પણ ગૌણ કર્યું, તને શણગારવામાં મેં ઘણાના
ઘાટ ઉતાર્યા, ભારે અન્યાય કીધા. બોલ! મારા
મરણ પછી તું ક્યાં સુધી?
વધુમાં વધુ આંગણા સુધી, એથી આગળ તો
નહિ જ, પત્ની બોલી.
હવે પોતાના વ્હાલસોયા પુત્રને પૂછ્યું : બેટા!
તું મારી સાથે ક્યાં સુધી? તને વારસામાં સંપત્તિ, મકાન, પેઢી વગેરે આપવામાં મેં દિવસ-રાત મજુરી કીધી, ઘણાની સાથે વેરઝેર કર્યા, સગાભાઈને પડતો મુકયો અને સામે કોર્ટે ચડ્યો, ધર્મને તો મેં પડતો જ મૂક્યો, ડગલેને પગલે હું જુઠું જ બોલ્યો..

બાપુજી! મારે સ્મશાન સુધી તો આવવું જ પડશેને! કારણ તમને બાળવાનો આદેશ વગર માગે મને જ મળ્યું છે. કદાચ બહારગામ હોઈશ તો પણ તમને, બાળવા માટે મારે જ હાજર થવુ પડશેને.: દોકરાની વાત્ત સાંભળીને શેઠની આંખમાં આંસુ;. આવી ગયા.

અંતે, નિરાશ થઈને શેઠે છેલ્લે પોતાના શરીરને * પૂછ્યું : જન્મ્યો ત્યારથી જ આખી જિંદગી તારી .

. આળપંપાળ કરી, નખાવાનું તને ખવડાવ્યું, અભક્ષ્ય, *

હા

અનંતકાય ખવડાવું, રાત્રે ખવડાવ્યું, ન બોલવાનું હુંબોલ્યો, તપ-ત્યાગ વગેરે બધું જ પડતું મૂકયું અને તને નવડાવવા, શણગારવા, ખવડાવવા ઘણાં ઘણાં પાપ કર્યા. બોલ તું તું મારી સાથે ક્યાં સુધી? »

શરીર બોલ્યું – હું વધુમાં વધુ ચિતા સુધી!

, આગળ નહિજ.

શેઠ તો આ સાંભળી બેભાન જ થઈ ગયા.

જે કંચન, કામિની, કુટુંબ, કાયા ખાતર આ જન્મમાં ભારે પાપો કાર્યા, તે બધા અહીં જ રહી જવાના અને એમનાખાતર કરેલા પાપો જન્મોજન્મ આભ્ાને દુર્ગતિમાં ભટકાજા કરે અને ત્રાસની

હારમાળા સર્જે. માટે જ જ્ઞાની મહાપુરુષો કહે છે કેમળેલી શક્તિઓનો સન્માર્ગે ઉપયોગ કરી શીદ્ન આભ્મકલ્યાણ સાધી લો.

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दोस्त


🙏☞ ♔ 🅥🅛🅢🅡 ♔ ☜🙏

दोस्त

एक बार मैं अपने एक मित्र का तत्काल केटेगरी में पासपोर्ट बनवाने पासपोर्ट ऑफिस गया।
लेकिन जैसे ही हमारा नंबर आया बाबू ने खिड़की बंद कर दी और कहा कि समय खत्म हो चुका है अब कल आइएगा। मैंने उससे मिन्नतें की,उससे कहा कि आज पूरा दिन हमने खर्च किया है और बस अब केवल फीस जमा कराने की बात रह गई है, कृपया फीस ले लीजिए।

बाबू बिगड़ गया।
कहने लगा – आपने पूरा दिन खर्च कर दिया तो उसके लिए वो जिम्मेदार है क्या?अरे सरकार ज्यादा लोगों को बहाल करे।
मैं तो सुबह से अपना काम ही कर रहा हूं।”

खैर !! मेरा मित्र बहुत मायूस हुआ और उसने कहा कि चलो अब कल आएंगे।मैंने उसे रोका,कहा कि रुको एक और कोशिश करता हूं।

बाबू अपना थैला लेकर उठ चुका था। मैंने कुछ कहा नहीं,चुपचाप उसके-पीछे हो लिया। वो एक कैंटीन में गया,वहां उसने अपने थैले से लंच बॉक्स निकाला और धीरे-धीरे अकेला खाने लगा।

मैं उसके सामने की बेंच पर जाकर बैठ गया। मैंने कहा कि तुम्हारे पास तो बहुत काम है, रोज बहुत से नए-नए लोगों से मिलते होगे?वो कहने लगा कि हां मैं तो एक से एक बड़े अधिकारियों से मिलता हूं।
कई आई.ए.एस.,आई.पी.एस., विधायक रोज यहां आते हैं।
मेरी कुर्सी के सामने बड़े-बड़े लोग इंतजार करते हैं।

फिर मैंने उससे पूछा कि एक रोटी तुम्हारी प्लेट से मैं भी खा लूं?
उसने हाँ कहा।मैंने एक रोटी उसकी प्लेट से उठा ली और सब्जी के साथ खाने लगा।
मैंने उसके खाने की तारीफ की, और कहा कि तुम्हारी पत्नी बहुत ही स्वादिष्ट खाना पकाती है।

मैंने उसे कहा तुम बहुत महत्वपूर्ण सीट पर बैठे हो। बड़े-बड़े लोग तुम्हारे पास आते हैं।तो क्या तुम अपनी कुर्सी की इज्जत करते हो? तुम बहुत भाग्यशाली हो, तुम्हें इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली है, लेकिन तुम अपने पद की इज्जत नहीं करते।

उसने मुझसे पूछा कि ऐसा कैसे कहा आपने?मैंने कहा कि जो काम दिया गया है उसकी इज्जत करते तो तुम इस तरह रुखे व्यवहार वाले नहीं होते।

देखो तुम्हारा कोई दोस्त भी नहीं है। तुम दफ्तर की कैंटीन में अकेले खाना खाते हो,अपनी कुर्सी पर भी मायूस होकर बैठे रहते हो, लोगों का होता हुआ काम पूरा करने की जगह अटकाने की कोशिश करते हो।

बाहर गाँव से आ कर सुबह से परेशान हो रहे लोगों के अनुरोध करने पर कहते हो,
“सरकार से कहो कि ज्यादा लोगों को बहाल करे।”अरे ज्यादा लोगों के बहाल होने से तो तुम्हारी अहमियत घट जाएगी? हो सकता है तुमसे ये काम ही ले लिया जाए।

भगवान ने तुम्हें मौका दिया है रिश्ते बनाने के लिए।
लेकिन अपना दुर्भाग्य देखो, तुम इसका लाभ उठाने की जगह रिश्ते बिगाड़ रहे हो।
मेरा क्या है,कल आ जाउंगा या परसों आ जाउंगा।पर तुम्हारे पास तो मौका था किसी को अपना अहसानमंद बनाने का। तुम उससे चूक गए। मैंने कहा कि पैसे तो बहुत कमा लोगे, लेकिन रिश्ते नहीं कमाए तो सब बेकार है।
क्या करोगे पैसों का? अपना व्यवहार ठीक नहीं रखोगे तो तुम्हारे घर वाले भी तुमसे दुखी रहेंगे, यार दोस्त तो पहले से ही नहीं है।

मेरी बात सुन कर वो रुंआसा हो गया।उसने कहा कि आपने बात सही कही है साहब। मैं अकेला हूं।पत्नी झगड़ा कर मायके चली गई है।बच्चे भी मुझे पसंद नहीं करते।मां है, वो भी कुछ ज्यादा बात नहीं करती।सुबह चार-पांच रोटी बना कर दे देती है और मैं तन्हा खाना खाता हूं। रात में घर जाने का भी मन नहीं करता।
समझ में नहीं आता कि गड़बड़ी कहां है?

मैंने हौले से कहा कि खुद को लोगों से जोड़ो। किसी की मदद कर सकते तो तो करो।
देखो मैं यहां अपने दोस्त के पासपोर्ट के लिए आया हूं।
मेरे पास तो पासपोर्ट है। मैंने दोस्त की खातिर तुम्हारी मिन्नतें कीं। निस्वार्थ भाव से। इसलिए मेरे पास दोस्त हैं,तुम्हारे पास नहीं हैं। वो उठा और उसने मुझसे कहा कि आप मेरी खिड़की पर पहुंचो। मैं आज ही फार्म जमा करुंगा और उसने काम कर दिया।
फिर उसने मेरा फोन नंबर मांगा, मैंने दे दिया।

बरसों बीत गए…
इस दिवाली पर एक फोन आया।रविंद्र कुमार चौधरी बोल रहा हूं साहब* !! कई साल पहले आप हमारे पास अपने किसी दोस्त के पासपोर्ट के लिए आए थे और आपने मेरे साथ रोटी भी खाई थी।आपने कहा था कि पैसे की जगह रिश्ते बनाओ। मुझे एकदम याद आ गया।मैंने कहा हां जी चौधरी साहब कैसे हैं ? उसने खुश होकर कहा – साहब आप उस दिन चले गए,फिर मैं बहुत सोचता रहा।मुझे लगा कि पैसे तो सचमुच बहुत लोग दे जाते हैं, लेकिन साथ खाना खाने वाला कोई नहीं मिलता।
मैं साहब अगले ही दिन पत्नी के मायके गया,बहुत मिन्नतें कर उसे घर लाया।वो मान ही नहीं रही थी,
वो खाना खाने बैठी तो मैंने उसकी प्लेट से एक रोटी उठा ली, कहा कि साथ खिलाओगी ? वो हैरान थी,रोने लगी।मेरे साथ चली आई।बच्चे भी साथ चले आए।

साहब !! अब मैं पैसे नहीं कमाता।रिश्ते कमाता हूं।जो आता है उसका काम कर देता हूं।

साहब आज आपको हैप्पी दिवाली बोलने के लिए फोन किया है।अगले महीने बिटिया की शादी है।आपको आना है।बिटिया को आशीर्वाद देने।रिश्ता जोड़ा है आपने।वो बोलता जा रहा था, मैं सुनता जा रहा था। सोचा नहीं था कि सचमुच उसकी ज़िंदगी में भी पैसों पर रिश्ता इतना भारी पड़ेगा।

दोस्तों !!मुझे नही पता कि मैं एक बेहतरीन दोस्त हूँ या नही !!
लेकिन
मुझे पूरा यकीन है कि जिनके साथ मेरी दोस्ती है…
वो अच्छे दोस्त जरुर है।

🙏 जय श्री राम🙏