Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

એક નાનો બાળક રોજ શાળાએ જતી વખતે
રસ્તામાં આવતા એક મંદિરમાં દર્શન
કરવા માટે જતો. ભગવાનની મુર્તિ સામે બે
હાથ જોડીને ઉભો રહેતો. આંખો બંધ કરીને
એ પ્રાર્થનામાં એવો તો મશગુલ થઇ જતો કે
મંદિરમાં દર્શનાર્થે
આવતા ભક્તો ભગવાનને બદલે આ બાળકને
જોયા કરતા.
મંદિરના પુજારી પણ આ બાળકની રાહ
જોઇને બેઠા હોય. ઘણા તો એવી પણ
વાતો કરતા કે આ બાળક સાક્ષાત
હનુમાનજી છે,
કેટલા ભાવથી ભગવાનના દર્શન કરે છે.
આંખો બંધ કરીને ઉભેલા બાળકના માત્ર
હોઠ ફફળતા હોય.
થોડી મિનિટો સુધી બસ એમ જ કંઇક
બોલ્યા કરે. બધાને એ વાતનું આશ્વર્ય હતું કે
આ નાનો બાળક ભગવાનને શું
પ્રાર્થના કરતો હશે !
એક દિવસ બધા ભક્તોએ ભેગા થઇને
પુજારીને વિનંતિ કરી કે આ છોકરાને આપણે
પુછીએ કે એ ભગવાનને શું પ્રાર્થના કરે છે ?
પુજારીને પણ આ જાણવું જ હતું એટલે
બધા પેલા બાળકની રાહ જોવા લાગ્યા.
બાળક આવ્યો. બુટ ઉતારીને
મંદિરમાં પ્રવેશ્યો. દફતર ખભા પર જ હતું
ને બે હાથ જોડીને પ્રાર્થના ચાલુ કરી.
પ્રાર્થના પુરી કરીને એ બહાર
નિકળ્યો એટલે બધા લોકોએ એને
ઘેરી લીધો.
પુજારીએ પુછ્યુ , “ સાચુ કહેજો આપ કોણ
છો અને રોજ શું પ્રાર્થના કરો છો?”
પેલા બાળકે કહ્યુ , “ અરે, પુજારીજી મને
ના ખોળખ્યો હું
તો બાજુની ચાલીમાં રહેતા ઇશ્વરભાઇનો માનવ
છું અને મને પ્રાર્થનામાં કંઇ જ ખબર
પડતી નથી. ભગવાનને શું કહેવાય અને શું ન
કહેવાય એ કંઇ જ સમજાતું નથી. હું
તો ભગવાન સામે ઉભો રહીને આંખ બંધ કરીને
5 વખત એબીસીડી બોલી જાવ છું. ભગવાને
એમાંથી જે શબ્દો જોઇતા હોય એ લઇ લે અને
જેવી પ્રાર્થના બનાવવી હોય
એવી બનાવી લે.”
પ્રાર્થનાને શબ્દોની કોઇ જરુર
નથી હોતી , શબ્દોમાં તો મોટા ભાગે
માંગણીઓ જ હોય છે.
પ્રાર્થના તો શબ્દો બનીને હદયથી જીભ
સુધી પહોંચે તે પહેલા તો ભગવાન
સુધી પહોંચી જતી હોય છે.

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” अमीर…..

बाहर हो रही बरसात की गडगडाहट सुधा का दिल जोरों से धडका रही वह तेजी से बर्तन और किचन साफ करते वो अपनी मालकिन गौरी से बोली-दीदी सब निपट गया मे घर जाऊं….
गौरी -बाहर बहुत तेज बारिश है सुधा…..और आकाशजी भी मेहमानों को छोडने गए है अबतक लौटे नहीं है… ..
सुधा-मे चली जाऊंगी दीदी….
गौरी- हूह ….अच्छा वो खाना केक वगैरह ले लिया ना ..
ये ले 500 रू जा खुश रहे अच्छा सुन ये छाता ले जा वरना बारिश में भीग जाएगी
मालकिन कितनी अमीर है ना ….कितनी बडी पार्टी की बेटे के बर्थडे की ..मन मे सोचती हाथों मे खाने की थैलियां पकडे सुधा ने छाता लिया और तेजी से निकल पडी बाहर सचमुच बहुत तेज बारिश थी रात का अंधियारा ऊपर से 11 बज चुके थे ….
शाम को जब घर से निकली थी तो उसके बेटे सोनू को तेज बुखार था डाक्टर से दवाई लेकर अपनी सास के हवाले कर सुधा को मजबूरी मे आना पडा कयोंकि उसकी मालकिन के इकलौते बेटे का बर्थडे था सबकुछ उसके ऊपर पहले से तय किया था सो मना भी नही सकती थी ऐसे मे मालिक लोग रुठ जाए तो फट से दूसरे नौकर का इंतजाम कर लेते है
पानी घुटनों तक भरा था उसके कदम तेजी से घर पहुंचने मे लगे थे की अचानक पैर पर कोई ठोकर लगी देखा तो अंगूठा खूनमखून था दर्द भी बडे जोरों से हो रहा था मगर उसे तो बेटे सोनू के बुखार और सास एवं पति के रात के खाने की चिंता थी कारण सभी एकसाथ खाना खाते थे रात का …जैसे तैसे घर पहुंची तो पति मोहन दरवाजे पर खडा था जोकि गार्ड की डयूटी से लौटा था झोपड़ी मे घुसते ही सोनू खुशी से उछलते बोला-मम्मा आ गई मम्मा आ गई… सुधा ने सास को थैलियां पकडाते पूछा-अम्मा …बुखार कैसा है सोनू का ..
अम्मा-ठीक है बहुरिया ..दवाई दे दी थी ..
अरे वाह ..केक मटर पनीर चावल कोफ्ते कया कया ले आई आज तो…
सुधा-अम्मा वो मालकिन के बेटे का जन्मदिन था बहुत खाना बना था कहकर रस्सी से एक साडी उठाई और पर्दे नुमा बाथरूम मे बदलने लगी बारिश मे छाता होने पर भी सुधा पूरी तरह भीग चुकी थी सोनू ने खुश होकर केक खाया तो पति मोहन और सास संग सुधा ने भी स्वादिष्ट खाने का भरपूर मजा लिया पूरा परिवार इस पार्टी से खुश था कयोंकि सुधा एक कामवाली तो उसका पति मोहन एक सिक्योरिटी गार्ड …
ऐसी मंहगाई मे कहा इतना बढिया खाना खाने को नसीब होता है ..
खाते पीते 1 बज गया सोनू जहां अपनी दादी से कहानी सुनते सो गया था वहीं दिनभर की थकी सुधा जैसे ही बिस्तर पर लेटी तो उसे अंगूठे पर कुछ महसूस हुआ देखा तो उसका पति मोहन उसके जख्मी अंगूठे पर हल्दी लगा रहा था -ये आप कया कर रहे हो जी …
कोशिश कर रहा हूं तुम्हारे साथ कदम मिलाने की ….जीवन मे साथ निभाकर चलने की जो कसमें खाई थी उसमें पास होने की तुम तो अव्वल आई हो सुधा…
मुझे और अम्मा और सोनू को ही नही इस घर को भी बखूबी तुम्ही ने संभाला है सच कहते है लोग आदमी मकान तो बना सकता है मगर घर उसे एक बहु एक जीवनसाथी एक लक्ष्मी ही बना सकती है …..
सुधा-चलिए छोडिये लग गई हल्दी ….कहकर भीगी हुई पलकों को साफ करती सुधा मोहन से लिपट गई
आज वो सचमुच एक अमीर औरत बन गई थी…..
एक दोस्त की सुंदर रचना

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. धर्मपरायण राजा की कहानी,,,,

बाहु बड़े धर्मपरायण राजा थे, वे अपनी प्रजा का पालन पुत्रों के समान करते थे। पापियों और द्रोहियों को उचित दंड देते थे जिससे समस्त प्रजा निर्भय होकर धर्मपूर्वक रहते थे।

उनके राज्य में अन्न वस्त्र की कोई कमी नहीं थी जिससे समस्त प्रजाजन वहाँ सुखपूर्वक निवास करते थे।

एक समय राजा बाहु के मन में अहंकार उत्पन्न हो गया। वे सोचने लगे – ‘ पुरे पृथ्वी पर मेरे जैसा कोई राजा नहीं है। मेरे राज्य में हर ओर सुख शांति है।

मैंने अपने सभी शत्रुओं को जीत लिया है। मुझे समस्त वेद और शास्त्रों का ज्ञान है। इस संसार में मुझसे बढ़कर दूसरा कौन है। ‘

जब मनुष्य स्वयं को सबसे अच्छा मानने लगता है तो उसे दूसरों में दोष दिखाई देने लगते हैं। जो दूसरों में दोष देखते हैं उनकी वाणी भी दूसरों के प्रति कठोर हो जाती है।

जिसका मन सदा दूसरों में दोष देखने में लगा रहता है और जो सदा कठोर भाषण किया करते हैं, उनके प्रियजन, पुत्र तथा भाई बन्धु भी शत्रु बन जाते हैं।

इसलिए जो मनुष्य मित्र, संतान, गृह, धन-धान्य आदि सबकी हानि देखना चाहता हो उसे ही यह काम करना चाहिए।

इस प्रकार अहंकार के बढ़ जाने के कारण राजा बाहु अत्यंत उदंड हो गए और परिणामस्वरूप उनके बहुत सारे शत्रु बन गए।

हैहय और तालजंघ कुल के क्षत्रियों से उनकी प्रबल शत्रुता हो गई और उनके साथ राजा बाहु का घोर युद्ध छिड़ गया।

युद्ध में राजा बाहु परास्त हो गए और दुखी होकर अपनी दोनों पत्नियों के साथ वन में चले गए और वहीं समय व्यतीत करने लगे।

दुःख और संताप से राजा बाहु का शरीर जर्जर हो गया और कुछ समय बाद वन में ही उन्होंने प्राण त्याग दिए।

उस समय उनकी छोटी पत्नी गर्भवती थी पति के गुजर जाने से उन्हें बहुत दुःख हुआ और उन्होंने पति के साथ ही चिता में जल मरने का निश्चय किया।

उस स्थान से कुछ ही दूरी पर और्व मुनि का आश्रम था। और्व मुनि परम तेजस्वी ऋषि थे, उन्हें तीनों कालों का ज्ञान था।

जब उन्होंने राजा बाहु की उस पतिव्रता छोटी रानी को सती होते देखा तो उनको मना करते हुए कहा – ” हे देवी, तेरे गर्भ में शत्रुओं का नाश करने वाला चक्रवर्ती बालक है।

इसलिए तुम चिता पर चढ़ने का साहस मत करो, वैसे भी शास्त्रों में गर्भवती स्त्री के सती होने का निषेध है।

यद्यपि तुम स्वयं अपनी इक्षा से सती होना चाहती हो पर तुम्हें अपने गर्भ में पल रहे शिशु की हत्या करने का अधिकार नहीं है। अतः तुम्हें यह पाप नहीं करना चाहिए। “

मुनि के इस प्रकार कहने पर रानी उनकी बात मान गई और फिर दोनों रानियों ने मिलकर पति का विधिपूर्वक अंतिम संस्कार किया और ऋषि के कहने पर उन्हीं के आश्रम में रहने चली गयी।

और्व मुनि के आश्रम में रहकर दोनों रानियां महर्षि के सेवा सत्कार में समय व्यतीत करने लगीं।

पर छोटी रानी अपने पूर्व के संस्कारों के कारण धर्म कर्म में विशेष रूचि लेतीं और और्व मुनि के सुन्दर प्रवचनों को अपने ह्रदय में धारण करके हमेशा परमेश्वर के ध्यान भजन में ही संलग्न रहती थी।

जिससे बड़ी रानी के मन में उसके प्रति ईर्ष्या होने लगी और एक दिन बड़ी रानी ने छोटी रानी को भोजन में जहर मिला कर दे दिया।

पर ईश्वर की कृपा से छोटी रानी पर उस जहर का कोई प्रभाव नहीं पड़ा और नाही गर्भ में पल रहे शिशु पर।

समय आने पर छोटी रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया। और्व मुनि ने गर (विष) के साथ उत्पन्न हुए उस बालक का नाम सगर रखा। माता ने बालक सगर का बड़े प्रेमपूर्वक पालन पोषण किया।

जब बालक सगर कुछ बड़ा हुआ तो और्व मुनि ने उसका यज्ञोपवीत संस्कार किया और उसे शास्त्रों का अध्ययन कराया साथ ही अस्त्र शस्त्रों की शिक्षा भी दी।

और्व मुनि से शिक्षा पाकर बालक सगर बलवान, बुद्दिमान और धर्मात्मा हो गए।

एक दिन सगर ने अपनी माता से पिता के बारे में जानना चाहा तब माता ने उन्हें सारा वृतान्त कह सुनाया की किस प्रकार सगर के पिता शत्रुओं से हारकर वन में आए और यहाँ और्व मुनि के आश्रम में सगर का जन्म हुआ।

सारी कथा जानकर सगर को भीषण क्रोध उपजा और उसने माता के सामने प्रतिज्ञा ली कि वह अपने पिता के शत्रुओं का नाश कर देगा और अपना खोया हुआ राज्य वापस लेगा।

तब माता से आज्ञा लेकर सगर और्व मुनि के पास पहुँचे और उनका आशीर्वाद लेकर वहां से प्रस्थान किया और अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ के पास पहुँचे।

कुलगुरु वशिष्ठ से मिलकर उन्हें प्रणाम करके सगर ने उन्हें सब समाचार सुनाया।

महर्षि वशिष्ठ सगर को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें विभिन्न प्रकार के दिव्य अस्त्र शस्त्र प्रदान किए।

इस प्रकार सभी दिव्य अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित होकर सगर कुलगुरु वशिष्ठ से आज्ञा लेकर अपने पिता के शत्रुओं से युद्ध करने पहुँचे।
जय महादेव
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ईश्वर

एक दिन सुबह सुबह दरवाजे की घंटी बजी । दरवाजा खोला तो देखा एक आकर्षक कद- काठी का व्यक्ति चेहरे पे प्यारी सी मुस्कान लिए खड़ा हैं ।

मैंने कहा, “जी कहिए..”

तो उसने कहा,

अच्छा जी, आप तो रोज़ हमारी ही गुहार लगाते थे,

मैंने कहा
“माफ कीजिये, भाई साहब ! मैंने पहचाना नहीं, आपको…”

तो वह कहने लगे,

“भाई साहब, मैं वह हूँ, जिसने तुम्हें साहेब बनाया हैं… अरे ईश्वर हूँ.., ईश्वर.. तुम हमेशा कहते थे न कि नज़र में बसे हो पर नज़र नहीं आते.. लो आ गया..! अब आज पूरे दिन तुम्हारे साथ ही रहूँगा।”

मैंने चिढ़ते हुए कहा,

“ये क्या मज़ाक हैं?”

“अरे मज़ाक नहीं हैं, सच हैं। सिर्फ़ तुम्हें ही नज़र आऊंँगा। तुम्हारे सिवा कोई देख- सुन नहीं पायेगा, मुझे।”

कुछ कहता इसके पहले पीछे से माँ आ गयी..
: “अकेला ख़ड़ा- खड़ा क्या कर रहा हैं यहाँ, चाय तैयार हैं , चल आजा अंदर..”

अब उनकी बातों पे थोड़ा बहुत यकीन होने लगा था, और मन में थोड़ा सा डर भी था.. मैं जाकर सोफे पर बैठा ही था, तो बगल में वह आकर बैठ गए। चाय आते ही जैसे ही पहला घूँट पिया मैं गुस्से से चिल्लाया,

“अरे मां..ये हर रोज इतनी चीनी ?”

इतना कहते ही ध्यान आया कि अगर ये सचमुच में ईश्वर है तो इन्हें कतई पसंद नही आयेगा कि कोई अपनी माँ पर गुस्सा करे। अपने मन को शांत किया और समझा भी दिया कि ‘भई, तुम नज़र में हो आज… ज़रा ध्यान से।’

बस फिर मैं जहाँ- जहाँ… वह मेरे पीछे- पीछे पूरे घर में… थोड़ी देर बाद नहाने के लिये जैसे ही मैं बाथरूम की तरफ चला, तो उन्होंने भी कदम बढ़ा दिए..

मैंने कहा,

“प्रभु, यहाँ तो बख्श दो…”

खैर, नहा कर, तैयार होकर मैं पूजा घर में गया, यकीनन पहली बार तन्मयता से प्रभु वंदन किया, क्योंकि आज अपनी ईमानदारी जो साबित करनी थी.. फिर आफिस के लिए निकला, अपनी कार में बैठा, तो देखा बगल में महाशय पहले से ही बैठे हुए हैं। सफ़र शुरू हुआ तभी एक फ़ोन आया, और फ़ोन उठाने ही वाला था कि ध्यान आया, ‘तुम नज़र मे हो।’

कार को साइड मे रोका, फ़ोन पर बात की और बात करते- करते कहने ही वाला था कि ‘इस काम के ऊपर के पैसे लगेंगे’ …पर ये तो गलत था, : पाप था तो प्रभु के सामने कैसे कहता तो एकाएक ही मुँह से निकल गया,
“आप आ जाइये । आपका काम हो जाएगा, आज।”

फिर उस दिन आफिस में ना स्टाफ पर गुस्सा किया, ना किसी कर्मचारी से बहस की 25 – 50 गालियाँ तो रोज़ अनावश्यक निकल ही जाती थी मुँह से, पर उस दिन सारी गालियाँ, ‘कोई बात नहीं, इट्स ओके…’ में तब्दील हो गयीं।

वह पहला दिन था जब
क्रोध, घमंड, किसी की बुराई, लालच, अपशब्द , बेईमानी, झूठ
ये सब मेरी दिनचर्या का हिस्सा नहीं बनें

शाम को आफिस से निकला, कार में बैठा, तो बगल में बैठे ईश्वर को बोल ही दिया…
“प्रभु सीट बेल्ट लगा लें, कुछ नियम तो आप भी निभायें… उनके चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान थी…”

घर पर रात्रि भोजन जब परोसा गया तब शायद पहली बार मेरे मुख से निकला,

“प्रभु, पहले आप लीजिये ।”

और उन्होंने भी मुस्कुराते हुए निवाला मुँह में रखा। भोजन के बाद माँ बोली,

“पहली बार खाने में कोई कमी नहीं निकाली आज तूने। क्या बात हैं ? सूरज पश्चिम से निकला हैं क्या, आज?”

मैंने कहाँ,

“माँ आज सूर्योदय मन में हुआ है… रोज़ मैं महज खाना खाता था, आज प्रसाद ग्रहण किया हैं माँ, और प्रसाद में कोई कमी नहीं होती।”

थोड़ी देर टहलने के बाद अपने कमरे मे गया, शांत मन और शांत दिमाग के साथ तकिये पर अपना सिर रखा तो ईश्वर ने प्यार से सिर पर हाथ फिराया और कहा,

“आज तुम्हे नींद के लिए किसी संगीत, किसी दवा और किसी किताब के सहारे की ज़रुरत नहीं हैं।”

गहरी नींद गालों पे थपकी से उठी…

“कब तक सोयेगा .., जाग जा अब।”

माँ की आवाज़ थी… सपना था शायद… हाँ, सपना ही था पर नीँद से जगा गया… अब समझ में आ गया उसका इशारा…

“तुम नज़र में हो…।”

जिस दिन ये समझ गए कि “वो” देख रहा हैं, सब कुछ ठीक हो जाएगा।
सपने में आया एक विचार भी आंँखे खोल सकता हैं।
🌹🙂🙏 🌹

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कृष्ण जन्म भूमि


16 हजार 500 करोड़.. #कृष्ण_जन्मभूमि पर बने उस मंदिर की कीमत जिसे 1670 में औरंगजेब ने तोड़ा #कृष्ण जन्मभूमि पर जिस मंदिर को औरंगजेब ने तोड़ा था उसकी कीमत आज के हिसाब से 16 हजार 500 करोड़ रुपए थी । ये जानकर आपको आश्चर्य होगा लेकिन ये बात एकदम सत्य है 1489 ईस्वी में दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी ने कृष्ण जन्मभूमि पर बना मंदिर तुड़वा दिया था । 129 साल बाद ओरछा के राजा वीर सिंह बुंदेला ने यहां पर भव्य मंदिर बनवाया था पद्मश्री से सम्मानित इतिहासकार मीनाक्षी जैन ने अपनी किताब वासुदेव कृष्ण एंड मथुरा में बताया है कि वीर सिंह बुंदेला ने उस वक्त इस मंदिर को बनाने में 3 करोड़ 30 लाख रुपए खर्च किए थे

इसी किताब में मीनाक्षी जैन ने बताया है कि साल 1608 में यानी वीर सिंह बुंदेला के समय में हिंदुस्तान में सोने की कीमत 10 रुपए तोला थी ।

राजा वीर सिंह बुंदेला ने 3 करोड़ 30 लाख रुपए खर्च किए थे… ये रकम उस समय के हिसाब से 33 लाख तोला सोने के बराबर थी… आज एक तोला सोना करीब 50 हजार रुपए का है… इस हिसाब से आज 33 लाख तोले सोने की कीमत करीब 16 हजार 500 करोड़ बैठती है ।

इटली के यात्री Niccolao Manucci ने वीर सिंह बुंदेला के समय मथुरा आए थे और उन्होंने अपने यात्रा विवरण में था कि मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि पर बने मंदिर का शिखर सोने का था… मंदिर इतना ऊंचा था कि आगरा से भी नजर आता था।
(Source-Manucci Voulume-2 पेज नंबर 154)

लेकिन इस भव्य मंदिर जो पूरी दुनिया में धीरे धीरे प्रसिद्ध हो रहा था… औरंगजेब की आंखों में बहुत चुभ रहा था… इसलिए 1670 ईस्वी में औरंगजेब ने ओरछा के राजा के द्वारा बनवाया हुआ मंदिर तोड़वा दिया
(स्वराज भारत)

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मकसद


🌸🌸मकसद 🌸🌸

उसने आंखें खोली बहुत मुश्किल हो रही थी। पिछली दो रात पहले ड्रग्स का ओवर डोज लिया था। क्योंकि वह बहुत गमजदा था। डाक्टर की रिपोर्ट में एचआईवी पॉजिटिव लिखा था। ये उन अंधी गलियों से गुजरने का परिणाम था या फिर वो ड्रग्स की सीरिंज जिनका इस्तेमाल उसने बिना सोचे समझे किया था। ऐसा कौन-सा ऐब था जो उसमें नहीं था। मां बाप के प्यार और अपने इकलौते बेटे होने का उसने हमेशा गलत फायदा उठाया था। मां बाप ने बडे़ अरमान से उसे पढ़ने बाहर भेजा था।हर जरूरत पूरी की थी पर उसने गलत संगत में पड़ कर अपने आप को बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया था। मां का फोन आया। मां ने कांपती हुई आवाज में पूछा “श्री”मेरे बच्चे कैसा है तू? बहुत बुरा सपना देखा मैंने आज सुबह। उसके शब्द गले में अटक गए।बड़ी मुश्किल से बोल पाया नहीं मां मैं ठीक हूं।आप और पापा कैसे हो? उसका मन हुआ कि गला फाड़कर रो पड़े।पर अगले पल ही अपने को संभालते हुए बोला। मां आप मेरी इतनी चिंता मत किया करो। आपकी तबियत पहले ही खराब रहती है। मां की आवाज में उसके आंसुओं का अक्श था। हमारे पास तेरे सिवा है ही क्या? अरे तुझे ये ‌बताने को फोन किया आज नवरात्र का सातवां दिन है। आज महाकाली की पूजा होती है।बेटा हम तो रात में हवन करते हैं।तू भी मंदिर में जाकर शीश नवा कर अपनी कामयाबी की प्रार्थना करना। ठीक है मां।उसका मन विचलित हो उठा। वह बेचैन था उठा नहा धोकर कर तैयार हो कर मंदिर चल दिया। आज महाकाली से अपने सारे प्रश्र पूछूंगा कि उन्होंने क्यों किया मेरे साथ ऐसा। महाकाली की मूर्ति के आगे नतमस्तक हो कर रो पड़ा। मां क्यों किया मेरे साथ ऐसा? मेरी मां का क्या ‌होगा? वो दोनों तो मर जाएंगे। जबाब दीजिए मेरे साथ ऐसा क्यों किया? तभी सामने एक प्रकाश प्रज्वलित हो उठा।आज उसके सामने स्वयं महाकाली वो तो पापी है ये कैसे हो सकता है? मां काली का रौद्र रूप देख कर वो सहम गया। मां की गंभीर वाणी वातावरण में गूंज उठी। इसका उत्तर स्वयं से पूछो। क्या ये सब वस्तुएं मैंने तुम्हें दी हैं? मैंने तो तुम्हें खूबसूरत प्रकृति दी थी। मनुष्य का शरीर दिया था। सोचने समझने की शक्ति दी थी। और तुमने क्या किया?सब कुछ खत्म कर दिया। और अब मुझे इसका दोष दे रहे हो। अपने पतन का कारण तुम स्वयं हो। मां काली का अट्टहास वातायन में गूंज उठा। अगले पल उसके चेहरे पर पानी की बूंदें गिरी लोग उसे उठा रहे थे । अरे तुम बेहोश कैसे हो ग‌ए देवी मां के सामने। चलो डाक्टर के पास ले चलें। उसने कहा नहीं मैं ठीक हूं।वह‌ बुदबुदाया होश में तो आज आया हूं। आज सत्य से साक्षात्कार हुआ है।वह उठ खड़ा हुआ यह सोचते हुए जो जीवन शेष‌ है उससे अपने जैसे भटके हुए लोगों को रास्ता दिखाऊंगा अगर किसी एक को भी सही ‌राह दिखा पाया तो शायद जिन्दगी उतनी बे मकसद खत्म न हो जितनी कि आज है। उसकी कम होती सांसों ने उसे जीने का एक “मकसद” दे दिया था।

लेखिका–रचना कंडवाल
सर्वाधिकार सुरक्षित

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एक शिक्षाप्रद लघु दृष्टांत!!!!!!!

किसी राजा के पास एक बकरा था। एक बार उसने एलान किया की जो कोई इस बकरे को जंगल में चराकर तृप्त करेगा मैं उसे आधा राज्य दे दूंगा।

किंतु बकरे का पेट पूरा भरा है या नहीं इसकी परीक्षा मैं खुद करूँगा।

इस एलान को सुनकर एक मनुष्य राजा के पास आकर कहने लगा कि बकरा चराना कोई बड़ी बात नहीं है।

वह बकरे को लेकर जंगल में गया और सारे दिन उसे घास चराता रहा,, शाम तक उसने बकरे को खूब घास खिलाई और फिर सोचा की सारे दिन इसने इतनी घास खाई है। अब तो इसका पेट भर गया होगा तो अब इसको राजा के पास ले चलूँ,,

बकरे के साथ वह राजा के पास गया,, राजा ने थोड़ी सी हरी घास बकरे के सामने रखी तो बकरा उसे खाने लगा।

इस पर राजा ने उस मनुष्य से कहा की तूने उसे पेट भर खिलाया ही नहीं वर्ना वह घास क्यों खाने लगता।

बहुत जनो ने बकरे का पेट भरने का प्रयत्न किया किंतु ज्यों ही दरबार में उसके सामने घास डाली जाती तो वह फिर से खाने लगता।

एक विद्वान् ब्राह्मण ने सोचा इस एलान का कोई तो रहस्य है, तत्व है,,

मैं युक्ति से काम लूँगा,, वह बकरे को चराने के लिए ले गया। जब भी बकरा घास खाने के लिए जाता तो वह उसे लकड़ी से मारता,, सारे दिन में ऐसा कई बार हुआ,, अंत में बकरे ने सोचा की यदि मैं घास खाने का प्रयत्न करूँगा तो मार खानी पड़ेगी।

शाम को वह ब्राह्मण बकरे को लेकर राजदरबार में लौटा,, बकरे को तो उसने बिलकुल घास नहीं खिलाई थी फिर भी राजा से कहा मैंने इसको भरपेट खिलाया है।

अत: यह अब बिलकुल घास नहीं खायेगा,, लो कर लीजिये परीक्षा….

राजा ने घास डाली लेकिन उस बकरे ने उसे खाया तो क्या? देखा और सूंघा तक नहीं….

बकरे के मन में यह बात बैठ गयी थी कि अगर घास खाऊंगा तो मार पड़ेगी….अत: उसने घास नहीं खाई….

चिंतन करें,यह बकरा हमारा मन ही है ” बकरे को घास चराने ले जाने वाला ब्राह्मण ” आत्मा” है।

राजा “परमात्मा” है। मन को मारो नहीं,,, मन पर अंकुश रखो…. मन सुधरेगा तो जीवन भी सुधरेगा।

अतः मन को विवेक रूपी लकड़ी से रोज पीटो..

कमाई छोटी या बड़ी हो सकती है…पर रोटी की साईज़ लगभग सब घर में एक जैसी ही होती है…

अगर आप किसी को छोटा देख रहे हो, तो आप उसे; या तो “दूर” से देख रहे हो, या अपने “गुरुर” से देख रहे हो !

प्रस्तुतीकरण।
पंडित कृष्ण दत्त शर्मा नई दिल्ली।

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टिफिन

“एक तो इतनी देर से आई .. ऊपर से गेट भी खुला छोड़ गयी महारानी.. अब इतनी तेज धूप में बंद करके आओ” अपनी बाई पर गुस्से में बड़बडाती हुई गेट बंद करने गयी तो भरी दुपहरी में दोनों हाथों में टिफिन लटकाये तेज चाल से जाती अम्मा जी दिखी ..रोक कर बरामदे में बिठाया.. पंखा चला कर पानी देने के बाद मैं भी उनकी कुर्सी के पास अपनी कुर्सी डाल कर बैठ गयी।

” अम्मा जी ! इतनी धूप में कहाँ जा रही हो? .”

“दुकान पर खाना देने..और कहाँ “

अम्मा जी के घर और दोनों लड़कों की दुकान की दूरी करीब डेढ़ किलो मीटर .. यह तो मुझे पता था पर इतनी धूप में अम्माजी ही क्यों?

“सहायक नही है दुकान पर ..”

“हैं ..क्यों नही है? दो- दो है दोनों की दुकान पर ” तपती धूप के कारण रोष में भरी अम्मा जी बोली

“घर पर और कोई नही है टिफिन पहुँचाने के लिए?”

“है ..तीन पोते है” ।

“फिर आप ही क्यों जाती हो?”

“बिठा कर कौन खिलाता है आज कल?घर का काम न सही तो यही सही.. बहुओं ने कह रखा है दोनों टाइम का खाना तब मिलेगा जब टिफिन दुकान पर देने जाओगी।”

“लड़के कुछ नही कहते बहुओं को?”

“अरे नालायक है दोनों .. वही कह ले तो मैं इतनी धूप में क्यों झुलसू?”

“छाता ले कर चला करों ना ..रिक्शा कर लेती अम्माजी!”

“अरे यहाँ खाने के लाले पड़े हुए है तुझे छाते और रिक्शे की पड़ी है.. अपने पुराने सूट देती है उन्हें ठीक करके पहनती हूँ ” डपटती हुई बोली अम्माजी

” अम्मा जी!आपके पति आपके नाम..” मैं बोली।

“वो तो सब मेरे नाम करने वाले थे पर एक दिन पहले उनका एक्सीडेन्ट हो गया..दसवीं पास हूँ मैं पर लड़कों ने वकील से मिल कर मुझसे कागजों पर साइन करवा लिये.. बेटे थे इसलिए शक करने की वजह भी नही थी मेरे पास”अम्माजी मेरी बात काट कर बोली।

“दस साल हो गये उन्हें गये हुए .. उनके सामने बहुत मौज थी मेरी ” यादों में खो गयी अम्माजी

” पचपन साल पहले मुझे ब्याह कर लाये थे..मैं सुबह घर के चबूतरे पर झाड़ू लगा रही थी ..एक आदमी मुझे देखता हुआ चला गया.. बाद में पता चला वो तो मेरे ससुर थे ..मुहल्ले के किसी बिरादरी वाले के यहाँ आये थे.. टहलने निकले थे सुबह..गोरी तो थी मैं …रात का लगा काजल भी गालों पर फैल गया था.. पता नही उन्होंने क्या देख कर पसंद कर लिया ..बाबू से बात तय कर ली और हमारी शादी हो गयी.. ससुराल बहुत अच्छा मिला मुझे।

“अम्माजी !सुंदर तो आप आज भी हो।”

“अब क्या सुंदर.. चलूँ नही तो दोनों चिल्लायेंगे। वैसे अब गर्मी की धूप और जाड़ों की ठंडी हवा नही सताती मुझे।

मैंने मन मे बोला ” अम्माजी! सब सताती है गर्मी हो या सर्दी.. पर कोई दूर करे तब ना।”

टिफिन लटका कर तेज चाल से निकल गयी अम्मा जी..गेट बंद करके लौटी तो कमरा काफी ठंडा लग रहा था मैं तो कुछ देर पहले नये ए.सी. बारे में सोच रही थी।

दीप्ति सिंह (मौलिक)