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कौन सा पति खरीदूँ…?


कौन सा पति खरीदूँ…?
शहर के बाज़ार में एक बड़ी दुकान खुली जिस पर लिखा था – “यहाँ आप पतियों को ख़रीद सकती है |”
देखते ही देखते औरतों का एक हुजूम वहां जमा होने लगा. सभी दुकान में दाख़िल होने के लिए बेचैन थी, लंबी क़तारें लग गयी.दुकान के मैन गेट पर लिखा था –
“पति ख़रीदने के लिए निम्न शर्ते लागू” 👇👇👇
✡️ इस दुकान में कोई भी औरत सिर्फ एक बार ही दाख़िल हो सकती है, आधार कार्ड लाना आवश्यक है …
✡️ दुकान की 6 मंज़िले है, और प्रत्येक मंजिल पर पतियों के प्रकार के बारे में लिखा है….
✡️ ख़रीदार औरत किसी भी मंजिल से अपना पति चुन सकती है….
✡️ लेकिन एक बार ऊपर जाने के बाद दोबारा नीचे नहीं आ सकती, सिवाय बाहर जाने के…
एक खुबसूरत लड़की को दूकान में दाख़िल होने का मौक़ा मिला…पहली मंजिल के दरवाज़े पर लिखा था – “इस मंजिल के पति अच्छे रोज़गार वाले है और नेक है.”लड़की आगे बढ़ी ..दूसरी मंजिल*
पर लिखा था – “इस मंजिल के पति अच्छे रोज़गार वाले है, नेक है और बच्चों को पसंद करते है.”लड़की फिर आगे बढ़ी …तीसरी मंजिल के दरवाजे पर लिखा था – “इस मंजिल के पति अच्छे रोज़गार वाले है, नेक है और खुबसूरत भी है.”यह पढ़कर लड़की कुछ देर के लिए रुक गयी मगर यह सोचकर कि चलो ऊपर की मंजिल पर भी जाकर देखते है, वह आगे बढ़ी…चौथी मंजिल के दरवाज़े पर लिखा था – “इस मंजिल के पति अच्छे रोज़गार वाले है, नेक है, खुबसूरत भी है और घर के कामों में मदद भी करते है.”
यह पढ़कर लड़की को चक्कर आने लगे और सोचने लगी “क्या ऐसे पति अब भी इस दुनिया में होते है ?
यहीं से एक पति ख़रीद लेती हूँ…लेकिन दिल ना माना तो एक और मंजिल ऊपर चली गयी…
पांचवीं मंजिल पर लिखा था – “इस मंजिल के पति अच्छे रोज़गार वाले है , नेक है और खुबसूरत है , घर के कामों में मदद करते है और अपनी बीबियों से प्यार करते है.”
अब इसकी अक़ल जवाब देने लगी वो सोचने लगी इससे बेहतर और भला क्या हो सकता है ? मगर फिर भी उसका दिल नहीं माना और आखरी मंजिल की तरफ क़दम बढाने लगी…
आखरी मंजिल
के दरवाज़े पर लिखा था – “आप इस मंजिल पर आने वाली 3339 वीं औरत है , इस मंजिल पर कोई भी पति नहीं है , ये मंजिल सिर्फ इसलिए बनाई गयी है ताकि इस बात का सबूत सुप्रीम कोर्ट को दिया जा सके कि महिलाओं को पूर्णत संतुष्ट करना नामुमकिन है.
हमारे स्टोर पर आने का धन्यवाद ! बांयी ओर 8सीढियाँ है जो बाहर की तरफ जाती है !!
🙏🙏 सांराश – आज समाज की सभी कन्याओं और वर पक्ष के माता पिता यह सब कर रहे है एवं ‘अच्छा’ और “अच्छा” … के चक्कर में शादी की सही उम्र तो खत्म ही हो रही है.

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सोलह सुख


🐙 सोलह सुखों के बारे में सुना था तो जानिये क्या हैं वो सोलह सुख 🐙
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1.पहला सुख निरोगी काया।
2.दूजा सुख घर में हो माया।
3.तीजा सुख कुलवंती नारी।
4.चौथा सुख सुत आज्ञाकारी।

5.पाँचवा सुख सदन हो अपना।
6.छट्ठा सुख सिर कोई ऋण ना।
7.सातवाँ सुख चले व्यापारा।
8.आठवाँ सुख हो सबका प्यारा।

9.नौवाँ सुख भाई और बहन हो ।
10.दसवाँ सुख न बैरी स्वजन हो।
11.ग्यारहवाँ मित्र हितैषी सच्चा।
12.बारहवाँ सुख पड़ौसी अच्छा।

13.तेरहवां सुख उत्तम हो शिक्षा।
14.चौदहवाँ सुख सद्गुरु से दीक्षा।
15.पंद्रहवाँ सुख हो साधु समागम।
16.सोलहवां सुख संतोष बसे मन।

सोलह सुख ये होते भाविक जन।
जो पावैं सोइ धन्य हो जीवन।। 🐙

हालांकि आज के समय में ये सभी सुख
हर किसी को मिलना मुश्किल है।
लेकिन इनमें से जितने भी सुख मिलें
उनसे खुश रहने की कोशिश करनी चाहिए।

जय जय श्री राम


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बनिया और एक कुम्हार


कहानी


NARRATIVE_BUILDING

एक गाँव में एक बनिया और एक कुम्हार था। कुम्हार ने बनिये से कहा :

मैं तो बर्तन बनाता हूँ, पर गरीब हूँ! तुम्हारी कौन सी रुपये बनाने की मशीन है जो तुम इतने अमीर हो?
बनिये ने कहा –
तुम भी अपने चाक पर मिट्टी से
रुपये बना सकते हो।
कुम्हार बोला –
मिट्टी से मिट्टी के रुपये ही बनेंगे ना,
सचमुच के तो नहीं बनेंगे।

बनिये ने कहा –
तुम ऐसा करो, अपने चाक पर 1000 मिट्टी के रुपये बनाओ, बदले में मैं उसे सचमुच के रुपयों में बदल कर दिखाऊँगा।
कुम्हार ज्यादा बहस के मूड में नहीं था… बात टालने के लिए हाँ कह दी।

महीने भर बाद कुम्हार से बनिये ने फिर पूछा –
क्या हुआ ? तुम पैसे देने वाले थे…!
कुम्हार ने कहा –
समय नहीं मिला… थोड़ा काम था, त्योहार बीत जाने दो… बनाऊंगा…!
फिर महीने भर बाद चार लोगों के बीच में बनिये ने कुम्हार को फिर टोका –
“क्या हुआ? तुमने हज़ार रुपये नहीं ही दिए… दो महीने हो गए…!”
वहां मौजूद एक-आध लोगों को कुम्हार ने बताया की मिट्टी के रुपयों की बात है।
कुम्हार फिर टाल गया – “दे दूँगा, दे दूँगा… थोड़ी फुरसत मिलने दो।”

अब कुम्हार जहाँ चार लोगों के बीच में मिले, बनिया उसे हज़ार रुपये याद दिलाए… कुम्हार हमेशा टाल जाए…लेकिन मिट्टी के रुपयों की बात नहीं उठी।
6 महीने बाद बनिये ने पंचायत बुलाई और कुम्हार पर हज़ार रुपये की देनदारी का दावा ठोक दिया।_
गाँव में दर्जनों लोग गवाह बन गए जिनके सामने बनिये ने हज़ार रुपये मांगे थे और कुम्हार ने देने को कहा था। कुम्हार की मिट्टी के रुपयों की कहानी सबको अजीब और बचकानी लगी। एकाध लोगों ने जिन्होंने मिटटी के रुपयों की पुष्टि की वो माइनॉरिटी में हो गए। और पंचायत ने कुम्हार से हज़ार रुपये वसूली का हुक्म सुना दिया...! _अब पंचायत छंटने पर बनिये ने समझाया - देखा, मेरे पास बात बनाने की मशीन है... इस मशीन में मिट्टी के रुपये कैसे सचमुच के रुपये हो जाते हैं, समझ में आया ?_

इस कहानी में आप नैतिकता, न्याय और विश्वास के प्रपंचों में ना पड़ें… सिर्फ टेक्निक को देखें :_
बनिया जो कर रहा था, उसे कहते हैं narrative building…
कथ्य निर्माण…
सत्य और तथ्य का निर्माण नहीं हो, कथ्य का निर्माण हो ही सकता है.
अगर आप अपने आसपास कथ्य निर्माण होते देखते हैं, पर उसकी महत्ता नहीं समझते, उसे चैलेंज नहीं करते तो एकदिन सत्य इसकी कीमत चुकाता है…
हमारे आस-पास ऐसे कितने ही नैरेटिव बन रहे हैं। दलित उत्पीड़न के, स्त्री-दासता और हिंसा के, बलात्कार की संस्कृति के, बाल-श्रम के, अल्पसंख्यक की लींचिंग के…!
ये सब दुनिया की पंचायत में हम पर जुर्माना लगाने की तैयारी है. हम कहते हैं, बोलने से क्या होता है?

कल क्या होगा, यह इसपर निर्भर करता है कि आज क्या कहा जा रहा है।
इतने सालों से कांग्रेस ने कोई जायदाद उठा कर मुसलमानों को नहीं दे दी थी…!
सिर्फ मुँह से ही सेक्युलर-सेक्युलर बोला था ना…!
सिर्फ मुँह से ही RSS को साम्प्रदायिक संगठन बोलते रहे. बोलने से क्या होता है?
बोलने से कथ्य-निर्माण होता है… दुनिया में देशों का इतिहास बोलने से, नैरेटिव बिल्डिंग से बनता बिगड़ता रहा है।

यही तमिल-सिंहली बोल बोल कर ईसाइयों ने श्रीलंका में गृह-युद्ध करा दिया…
दक्षिण भारत में आर्य -द्रविड़ बोल कर Sub- Nationalism की फीलिंग पैदा कर दी। भारत में आदिवासी आंदोलन चला रहे हैं केरल, कश्मीर, असम, बंगाल की वर्तमान दुर्दशा इसी कथ्य को नज़रअंदाज़ करने की वजह। _UN के Human Rights Reports में भारत के ऊपर सवाल उठाये जाते हैं….!
RSS को विदेशी (Even neutral) Publications में Militant Organizations बताया जा रहा है।
हम अक्सर नैरेटिव का रोल नहीं समझते… हम इतिहास दूसरे का लिखा पढ़ते हैं। हमारे धर्मग्रंथों के अनुवाद विदेशी आकर करते हैं। हमारी वर्ण-व्यवस्था अंग्रेजों के किये वर्गीकरण से एक कठोर और अपरिवर्तनीय जातिवादी व्यवस्था में बदल गई है...! हमने अपने नैरेटिव नहीं बनाए हैं... दूसरों के बनाये हुए नैरेटिव को सब्सक्राइब किया है...! अगर हम अपना कथ्य निर्माण नहीं करेंगे, तो सत्य सिर्फ परेशान ही नहीं, पराजित भी हो जाएगा।

थोड़ी सावधानी की समझने की आवश्यकता है !
क्योंकि मेरा देश बदल रहा है ।
वंदे मातरम🚩

वीरेंद्र त्रिवेदी

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फ्री कटिंग


एक आदमी एक दस साल के लड़के के साथ नाई की दुकान पर पहुंचा और नाई से बोला कि उसे पास ही कहीं जरुरी काम से जाना है……इसलिये वो पहले उसकी कटिंग कर दें, फिर उसके बाद लड़के की कटिंग कर दे.. !

नाई ने पहले उसकी कटिंग कर दी तो उसने बालक को अपनी ज़गह कुर्सी पर बिठाया,

उसके सिर पर प्यार से हाथ फ़ेरा और कहा…”आराम से कटिंग कराना, अंकल को तंग न करना..” इतना कहकर वो वहां से चला गया

नाई ने लड़के की कटिंग की, उसे कुर्सी से उतारा और कहा…..तू उधर बैठ जा, बेटा, तेरे डैडी अभी आते होंगे..

लड़का: अंकल वो मेरे डैडी थोड़े ही थे !

नाई: तो अंकल होंगे, बेटा..???

लड़का: नहीं !

नाई: अबे तो कौन थे वो..?

लड़के: मुझे क्या पता कौन थे, मैं तो गली में खेल रहा था कि वो आकर बोले कि फ्री में कटिंग करायेगा ?

मैंने कहा , “कराऊंगा” और मैं उसके साथ यहां चला आया !

Posted in हिन्दू पतन

अलाउद्दीन अहमद


कर्नाटक के बीदर जिले में 15वीं शताब्दी के एक संत का मकबरा है। अलाउद्दीन अहमद शाह उर्फ बाबा वली का। दक्षिण भारत खासकर पूरे कर्नाटक में उन्हें एक संत के रूप में याद किया जाता है ।

इस मकबरे पर हर साल उर्स लगता है जिसमें मुसलमानों से भी ज्यादा हिन्दू शिरकत करते है । वर्ष भर तो हिन्दू श्रद्धालु इस मकबरे पर आते ही आते हैं लेकिन उर्स के दौरान हिंदुओ के जत्थे के जत्थे उमड़ने लगते हैं ।

हिंदुओ में अलाउद्दीन अहमद शाह उर्फ बाबा वली बहुत पूजनीय हैं। उनकी लोकप्रियता का अन्दाजा इस बात से लगाइए कि उनकी मौत का उर्स इस्लामिक कलेंडर हिजरी सम्वत के आधार पर नहीं बल्कि हिन्दू पञ्चाङ्ग के आधार पर मनाया जाता है । यह हर साल फाल्गुन के महीने में होली वाले दिन (पूर्णिमा) को मनाया जाता है।

वैसे तो इस मकबरे का पूरी तरह से रख-रखाव मुसलमानों द्वारा किया जाता है लेकिन बाबा वली के उर्स की अध्यक्षता कोई मुस्लिम उलेमा या सूफी संत नहीं करता बल्कि शैव लिंगायतों का जंगम (लिंगायत धर्म गुरु) करता है।

हर साल इस उर्स में लाखों हिन्दू आते हैं । पूरी श्रद्धा से अलाउद्दीन अहमद शाह उर्फ बाबा वली के मकबरे पर माथा टेकते हैं और खुलकर सोना-चांदी , रुपया-पैसा दान करते हैं । इनकी महिमा ऐसी है कि लिंगायत श्रद्धालु तो अलाउद्दीन अहमद शाह उर्फ बाबा वली को अपने लिंगायत संत अल्लामा प्रभु का अवतार मानते हैं।

इस उर्स के दौरान जंगम बदन पर इस्लामिक खिलअत (ढीला फारसी चोगा/लबादा) व सर पर कुलाह (फारसी लंबी टोपी) पहनता है और रोज शाही प्रतीकों व गाजे-बाजे के साथ शाही कब्र पर जाता है । वहां शंख बजाता है । हिन्दू परंपराओं के अनुसार फल , फूल , मिठाईयां चढ़ाता और नारियल तोड़ता है । कुल मिलाकर उर्स के दौरान बड़ा सेक्युलरिज्म से भरा माहौल रहता है।

सवाल ये है कि आखिर ये अलाउद्दीन अहमद शाह उर्फ बाबा वली थे कौन ? इन्होंने किया क्या था जिसकी वजह से ये मुसलमानों से भी ज्यादा हिंदुओ में पूजनीय हैं…………?

तो आपकी जानकारी के लिए बता देता हूँ कि अलाउद्दीन अहमद शाह दक्षिण भारत के बहमनी साम्राज्य का सुलतान था । वही बहमनी साम्राज्य जिसकी नींव एक विदेशी तुर्क सैनिक अलाउद्दीन बहमन शाह ने रखी थी।

अलाउद्दीन अहमद शाह बहमनी साम्राज्य का नौवां सुल्तान था । इसने अपने शासन काल में हजारों हिन्दू मंदिरों को तोड़ा था । जब यह किसी हमले में 20 हजार हिंदुओं को कत्ल करवा देता था तब ये अपनी सेना व सिपहसालारों को खास दावत देकर जश्न मनाता था।

इसने हिंदुओ के कत्लेआम के लिए ईराक, खुरासान , ट्रांसजेनिया , तुर्की व अरब से तीरंदाजी में विशेष रूप से प्रशिक्षित दस हजार पेशेवर हत्यारों को भाड़े पर बुलाया था और इन हत्यारों का उसने विजयनगर साम्राज्य के खिलाफ खुलकर इस्तेमाल भी किया।

इसने कर्नाटक के प्रसिद्ध मंदिरों को तोड़ उनकी मूर्तियों के टुकड़े करवाकर सूफी संत गेसू दराज के मकबरे व मस्जिदों की सीढ़ियों में जड़वा दिया था ताकि नमाजी उन मूर्तियों के टुकड़ो पर अपने पांव रखकर सीढियां चढ़ते हुए नमाज पढ़ने आये।

अपने कातिलों से मोहब्बत और अपने आततायियों की शान में सजदा करने का हुनर सिर्फ हिंदुओ को ही आता है।

Ashish Pradhan जी की पोस्ट

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नाम


एक गाँव में एक बहुत बड़ा पियक्कड़ आदमी रहा करता था ।

वो अक़्सर अपने घर के बाहर चारपाई डाल कर बैठता था और गली में हर आने जाने वालों को गालियाँ बकता था ।

वहां से गुजरने वाला हर व्यक्ति उससे परेशान था लेकिन कोई भी उससे उलझता नहीं था ।

जब उस शराबी का अंतिम समय आया तो उसने अपने बेटों को पास बुलाकर कहा कि मेरे मरने के बाद तुमलोग कुछ ऐसा काम करना जिससे लोग मुझे अच्छा कहें औऱ हमेशा मेरा नाम लेते रहें ।

उसके बेटे बड़े बापभक्त थे ।

शराबी के गुजरने के बाद उसके बेटों ने बहुत सोचा और एक निर्णय लिया ताकि लोग उनके बापू का नाम जपते रहें ।

अब वो ख़ुद उसी गली में बैठने लगे और हर आने जाने वालों को गाली तो बकते ही थे , साथ मे लाठी से चार लाठी गिनकर मारते भी थे ।

ये सिलसिला लगातार कुछ दिनों तक चलता रहा ।

उसके बाद थक हारकर गाँव के लोगों ने ये कहना शुरू कर दिया कि इनसे अच्छा तो इनका बाप ही था …….
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जो सिर्फ गालियाँ ही देता था , कम से कम मारता तो नही था……..!!

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एक सहेली ने दूसरी सहेली से पूछा:- बच्चा पैदा होने की खुशी में तुम्हारे पति ने तुम्हें क्या तोहफा दिया ?
सहेली ने कहा – कुछ भी नहीं!
उसने सवाल करते हुए पूछा कि क्या ये अच्छी बात है ? क्या उस की नज़र में तुम्हारी कोई कीमत नहीं ?
लफ्ज़ों का ये ज़हरीला बम गिरा कर वह सहेली दूसरी सहेली को अपनी फिक्र में छोड़कर चलती बनी।।
थोड़ी देर बाद शाम के वक्त उसका पति घर आया और पत्नी का मुंह लटका हुआ पाया।। फिर दोनों में झगड़ा हुआ।।
एक दूसरे को लानतें भेजी।। मारपीट हुई, और आखिर पति पत्नी में तलाक हो गया।।

जानते हैं प्रॉब्लम की शुरुआत कहां से हुई ? उस फिजूल जुमले से जो उसका हालचाल जानने आई सहेली ने कहा था।।

रवि ने अपने जिगरी दोस्त पवन से पूछा:- तुम कहां काम करते हो?
पवन- फला दुकान में।। रवि- कितनी तनख्वाह देता है मालिक?
पवन-18 हजार।।
रवि-18000 रुपये बस, तुम्हारी जिंदगी कैसे कटती है इतने पैसों में ?
पवन- (गहरी सांस खींचते हुए)- बस यार क्या बताऊं।।
मीटिंग खत्म हुई, कुछ दिनों के बाद पवन अब अपने काम से बेरूखा हो गया।। और तनख्वाह बढ़ाने की डिमांड कर दी।। जिसे मालिक ने रद्द कर दिया।। पवन ने जॉब छोड़ दी और बेरोजगार हो गया।। पहले उसके पास काम था अब काम नहीं रहा।।

एक साहब ने एक शख्स से कहा जो अपने बेटे से अलग रहता था।। तुम्हारा बेटा तुमसे बहुत कम मिलने आता है।। क्या उसे तुमसे मोहब्बत नहीं रही? बाप ने कहा बेटा ज्यादा व्यस्त रहता है, उसका काम का शेड्यूल बहुत सख्त है।। उसके बीवी बच्चे हैं, उसे बहुत कम वक्त मिलता है।।
पहला आदमी बोला- वाह!! यह क्या बात हुई, तुमने उसे पाला-पोसा उसकी हर ख्वाहिश पूरी की, अब उसको बुढ़ापे में व्यस्तता की वजह से मिलने का वक्त नहीं मिलता है।। तो यह ना मिलने का बहाना है।।
इस बातचीत के बाद बाप के दिल में बेटे के प्रति शंका पैदा हो गई।। बेटा जब भी मिलने आता वो ये ही सोचता रहता कि उसके पास सबके लिए वक्त है सिवाय मेरे।।

याद रखिए जुबान से निकले शब्द दूसरे पर बड़ा गहरा असर डाल देते हैं।। बेशक कुछ लोगों की जुबानों से शैतानी बोल निकलते हैं।। हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बहुत से सवाल हमें बहुत मासूम लगते हैं।। जैसे-
तुमने यह क्यों नहीं खरीदा।।
तुम्हारे पास यह क्यों नहीं है।।
तुम इस शख्स के साथ पूरी जिंदगी कैसे चल सकती हो।।
तुम उसे कैसे मान सकते हो।। वगैरा वगैरा।।

इस तरह के बेमतलबी फिजूल के सवाल नादानी में या बिना मकसद के हम पूछ बैठते हैं।।
जबकि हम यह भूल जाते हैं कि हमारे ये सवाल सुनने वाले के दिल में नफरत या मोहब्बत का कौन सा बीज बो रहे हैं।।

आज के दौर में हमारे इर्द-गिर्द, समाज या घरों में जो टेंशन टाइट होती जा रही है, उनकी जड़ तक जाया जाए तो अक्सर उसके पीछे किसी और का हाथ होता है।। वो ये नहीं जानते कि नादानी में या जानबूझकर बोले जाने वाले जुमले किसी की ज़िंदगी को तबाह कर सकते हैं।।
ऐसी हवा फैलाने वाले हम ना बनें।। लोगों के घरों में अंधे बनकर जाओ और वहां से गूंगे बनकर निकलो।।
आंख बंद करके एक बार विचार जरूर करें….

लष्मीकांत

Posted in हिन्दू पतन

रावलपिंडी के समीप हिन्दुओं का एक छोटा सा गांव था। 500 के लगभग वयस्क होंगे।बाकि बच्चे,बुड्ढे। गांव के सरपंच रामलाल एक विशाल बरगद के नीचे बैठे थे। तभी मोहन भागता हुआ आया। बोला सरपंच जी,सरपंच जी। सरपंच जी ने कहा”क्या हुआ मोहन ? ” सरपंच जी मुझे पता लगा है यहाँ से 8 कोस दूर हिन्दुओं ने अपना गांव खाली करना शुरू कर दिया है। सिख भाई भी उनके साथ अमृतसर जाने की तैयारी कर रहे है। सरपंच जी ने एक लम्बी साँस ली और कहा,” मैंने कल ही रेडियो पर सुना था। महात्मा गाँधी ने कहा है कि “भारत-पाकिस्तान का विभाजन मेरी लाश पर होगा।” क्या तुम्हें उनकी बात पर भरोसा नहीं है?” मोहन बोला,” सुना तो मैंने भी है कि जवाहर लाल नेहरू ने कहा है कि हिन्दुओं आश्वस्त रहो। भारत के कभी टुकड़े नहीं होंगे। तुम लोग लाहौर और रावलपिंडी में आराम से रहो। पर जिस गांव की मैं बात कर रहा हूँ। उस गांव पर पिछली रात को चारों और के मुसलमान दंगाइयों ने इकट्ठे होकर हमला कर दिया। उनकी संपत्ति लूट ली। दुकानों में आग लगा दी। मैंने तो यह भी सुना की किसी गरीब हिन्दू की लड़की को भी उठा कर ले गए। भय के कारण उन्होंने आज ही पलायन करना शुरू कर दिया हैं।” सरपंचजी बोले,”देखो मोहन। हम यहाँ पर सदियों से रहते आये हैं। एक साथ ईद और दिवाली बनाते आये है। नवरात्र के व्रत और रोज़े रखते आये है। हमें डरने की कोई जरुरत नहीं है। तुम आश्वस्त रहो।” मोहन सरपंच जी की बात सुनकर चुप हो गया, मगर उसके मन में रह रहकर यह मलाल आता रहा कि सरपंच जी को कम से कम गांव के हिन्दुओं को इकट्ठा कर सावधान अवश्य करना चाहिए था। अभी दो दिन ही बीते थे। चारों ओर के गांवों के मुसलमान चौधरी इकट्ठे होकर सरपंच से मिलने आये और बोले। हमें मुस्लिम अमन कमेटी के लिए चंदा भेजना है। आप लोग चंदा दो। न नुकर करते हुए भी सरपंच ने गांव से पचास हज़ार रुपया इकठ्ठा करवा दिया। दो दिन बाद फिर आ गए। बोले कि और दो सरपंच ने कहा कि अभी तो दिया था। बोले की, “कम पड़ गया और दो। तुमने सुना नहीं 8 कोस दूर हिन्दुओं के गांव का क्या हश्र हुआ है। तुम्हें अपनी सुरक्षा चाहिए या नहीं?” सरपंच ने इस बार भय से सत्तर हज़ार इकट्ठे कर के दिए। दो दिन बाद बलूच रेजिमेंट की लोरी आई और हिन्दुओं कक इक्कट्ठा कर सभी हथियार यहाँ तक की लाठी, तलवार सब जमा कर ले गई। बोली की यह दंगों से बचाने के लिए किया है। क़ुराने पाक की कसम खाकर रक्षा का वायदा भी कर गई। नवें दिन गांव को मुसलमान दंगाइयों ने घेर लिया। सरपंच को अचरज हुआ जब उसने देखा कि जो हथियार बलूच रेजिमेंट उनके गांव से जब्त कर ले गयी थी. वही हथियार उन दंगाइयों के हाथ में हैं। दंगाइयों ने घरों में आग लगा दी।संपत्ति लूट ली।अनेकों को मौत के घाट उतार दिया गया। हिन्दुओं की माताओं और बहनों की उन्हीं की आँखों के सामने बेइज्जती की गई। सैकड़ों हिन्दू औरतों को नंगा कर उनका जुलुस निकाला गया।हिन्दू पुरुष मन मन में यही विनती कर रहे थे कि ऐसा देखने से पहले उन्हें मौत क्यों न आ गई… पर बेचारे क्या करते। गाँधी और नेहरू ने जूठे आश्वासन जो दिए थे। गांव के कुछ बचे लोग अँधेरे का लाभ उठाकर खेतों में भाग कर छुप गए। न जाने कैसे वह रात बिताई। अगले दिन अपने ही घर वालों की लाशे कुएं में डाल कर अटारी के लिए रेल पकड़नी थी। इसलिए किसी को सुध न थी। आगे क्या होगा? कैसे जियेंगे? कहाँ रहेंगे? यह कहानी कोई एक घर की नहीं थी। यह तो लाहौर, डेरा गाजी खां, झेलम, सियालकोट, कोहाट, मुलतान हर जगह एक ही कहानी थी। कहानी क्या साक्षात् नर पिशाचों का नंगा नाच था।

तत्कालीन कांग्रेस के अध्यक्ष आचार्य कृपलानी के शब्दों में इस कहानी को पढ़िए

“आठ मास हुए आपने मुझे कांग्रेस का अध्यक्ष चुना था। महात्मा गाँधी ने एक प्रार्थना सभा के भाषण में कहा था कि मुझे फूलों का मुकुट नहीं पहनाया जा रहा है। बल्कि काँटों की सेज पर सुलाया जा रहा है। उनका कहना बिलकुल ठीक है। उनकी घोषणा होने के दो दिन बाद मुझे नोआखली जाना पड़ा। वहां से बिहार और अभी मैं पंजाब होकर आया हूँ। नोआखली में जो देखा वह मेरे लिए नया अनुभव था। लेकिन बिहार में जो मैंने देखा वह और भी नया और पंजाब में जो देखा वह और भी अधिक था। मनुष्य मनुष्य नहीं रहा। स्त्रियां बच्चों को साथ लेकर इज्जत बचाने के लिए कुओं में कूद पड़ीं। उनको बाद में उससे बचाया गया। पूजा के एक स्थान में पचास स्त्रियों को इकठ्ठा करके उनके घर के लोगों ने उनको मार दिया। एक स्थान में 370 स्त्रियों और बच्चों ने अपने को आग को भेंट कर दिया है।- आचार्य कृपलानी”

(सन्दर्भ- श्यामजी पराशर, पाकिस्तान का विष वृक्ष, नवंबर,1947 संस्करण, राष्ट्रनिर्माण ग्रन्थ माला, दिल्ली, पृष्ठ 42)

दुरात्मा गाँधी और नेहरू जो पहले कहते थे कि पाकिस्तान हमारी लाश पर बनेगा अब कहने लगे कि हमने देश का विभाजन डरकर नहीं किया। जो खून खराबा हर तरफ हो रहा है,उसी को रोकने के लिए किया। जब हमने देखा कि हम किसी तरह भी मुसलमानों को मना नहीं सकते तब ऐसा किया गया। देश को तो 1942 में ही आज़ाद हो जाना था। अंग्रेजों ने देश छोड़ने से पहले मुस्लिम लीग को आगे कर दिया। जिन्नाह ने मांगे रखनी शुरू कर दी। मैं न मानूं की रट लगाए जिन्नाह तानाशाह की स्थिति अर्जित कर कायदे आज़म बन गया। बात बात पर वाक आउट की धमकी देता था। कभी कहता विभाजन कमेटी में सिखों को मत लो। अगर लिया तो मैं बहिष्कार कर दूंगा। कभी कहता सभी सब-कमेटियों का प्रधान किसी मुसलमान को बनाओ। नहीं तो मैं उठ कर चला जाऊंगा। कांग्रेस के लिए जिन्नाह के साथ जीना मुश्किल, जिन्नाह के बिना जीना मुश्किल। फिर जिन्नाह ने दबाव बनाने के लिए अपने गुर्गे सोहरावर्दी के माध्यम से नोआखली और कोलकाता के दंगे करवाए। सीमांत प्रान्त में दंगे करवाए। मेरठ, पानीपत, सहारनपुर, दिल्ली सारा देश जल उठा। आखिर कांग्रेस को विभाजन स्वीकार करना पड़ा। मुसलमानों को उनका देश मिल गया। हम हिन्दुओं को क्या मिला? एक हिन्दू राष्ट्र के स्थान पर एक सेक्युलर राष्ट्र। जिसमें बहुसंख्यक हिन्दुओं के अधिकारों से ज्यादा अल्पसंख्यक मुसलमानों के अधिकार हैं। पाकिस्तान में बचे हिन्दुओं के अधिकारों की कोई चर्चा नहीं छेड़ता। उसी कांग्रेस का 1947 में विस्थापित एक प्रधानमंत्री कहता था कि देश के संसाधनों पर उन्हीं अल्संख्यक मुसलमानों का अधिकार है। हिन्दू धर्मरक्षा के लिए अपने पूर्वजों की धरती छोड़ आये। अमानुषिक यातनायें सही। चित्तोड़ के जौहर के समान ललनाओं की जिन्दा चिताएं जली। राजसी ठाठ ठुकराकर दर दर के भिखारी बने। अपने बेगाने हो गए। यह सब जिन्नाह की जिद्द के चलते हुआ और आज मेरे देश के कुछ राजनेता यह कहते है कि जिन्नाह महान था। वह अंग्रेजों से लड़ा था।

अरे धिक्कार है तुमको जो तुम अपना इतिहास भूल गए। उन अकथनीय अत्याचारों को भूल गए। उन बलिदानों को भूल गए। अपने ही हाथों से अपनी बेटियों के काटे गए सरों को भूल गए। जिन्नाह को महान बताते हो। कुछ तो शर्म करो।

(यह लेख उन अज्ञात लाखों हिन्दू पूर्वजों को समर्पित है जिन्होंने धर्मरक्षा हेतु अपने पूर्वजों की भूमि को पंजाब और बंगाल में त्याग दिया। मगर अपने पूर्वजों के धर्म को नहीं छोड़ा।)

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શાણપણ


શાણપણ
એક ઘોડેસવાર જંગલમાંથી જઈ રહ્યો હતો. ળો ભરવા એની પાસે કરડિયો
હતો. ત્યાં તેણે જોયું કે એક નાગ જંગલમાં લાગેલા દેવમાં સપડાયો હતો. માણસે
તેના ભાલા વડે નાગને અગ્નિમાંથી બહાર કાઢ્યો. માણસે નાગને કહ્યું કે મેં
તારો પ્રાણ બચાવ્યો છે. તેના બદલામાં માનવજાતને હવે ડંખ મારીશ નહીં.
નાગે કહ્યું, ‘હું તો પહેલાં તને અને તારા ઘોડાને જ ડંખ મારીશ, કારણ
કે તું પણ એવું જ કરે છે.’
માણસે કહ્યું, ‘હું એવું કરતો જ નથી. તું કહે છે એનો કોઈ સાક્ષી છે?”
નાગે રસ્તે જતી એક ગાયને પૂછ્યું, “માણસનો તારા તરફનો વર્તાવ કેવો
રહ્યો છે?*
ગાયે કહ્યું, ‘અત્યંત ખરાબ! મેં એને કેટલાય વાછરડાં આપ્યાં. રોજ દૂધ
આપ્યું. હવે હું ઘરડી થઈ ત્યારે તેણે મને કાઢી મૂકી છે. હવે હું ઘાસચારા વગર
મરી રહી છું.’
માણસે કહ્યું, ‘કાયદા પ્રમાણે એક સાક્ષી પૂરતો નથી. બીજો સાક્ષી જોઈએ
માટે બીજો સાક્ષી લાવ.’ નાગે બાજુમાં ઊભેલા વૃક્ષને પૂછ્યું, “માણસ કેવો છે ?”
વૃક્ષે કહ્યું, ‘મેં માણસને શીતળ છાંયો આપ્યો, ફળ-ફૂલ આપ્યાં. બદલામાં માણસે
મારાં ડાળખાં કાણાં ને પાંદડાં તોડ્યાં. તેમાં તેણે ઘર બનાવ્યાં, વહાણ બનાવ્યાં,
ચૂલા પેટાવ્યા અને જરૂર પડશે ત્યારે તેં મને આખેઆખું વાઢી નાખશે.
હવે માણસ મૂંઝાયો. તેણે કહ્યું, ‘મને એક વધારે તક આપ. કોઈ એક
ત્રીજા સાક્ષીને પૂછ.’
એટલામાં ત્યાંથી એક શિયાળ નીકળ્યું. નાગે શિયાળને માણસ વિશે પૂછ્યું.
શિયાળે નાગને સામેથી પૂછયું, “માણસે તારું શું બગાડયું છે?’ નાગે ખોટેખોટું
કહ્યું, ‘આ માણસ મને પકડીને પેલા કરંડિયામાં પૂરવા માગતો હતો.’
શિયાળે કહ્યું, ‘આવડાક કરંડિયામાં તું કેવી રીતે સમાઈ શકે? તું તો મોટો
અને લાંબો છે.•
નાગે જવાબ આપ્યો, ‘વીંટળાઈ જાઉં તો એમાં સમાઈ શકુ. જુઓ, બતાઉં
એમ કહી એ કરંડિયામાં પેસીને બેઠો.
એ વખતે શિયાળે કહ્યું, “દુષ્ટ દુશ્મન સપડાયો હોય ત્યારે એને પકડીને
એવો બાંધી લો કે એ નીકળી ન શકે. માણસ સમજ્યો. એણે તરત જ કરંડિયાને
બંધ કરી તેના પર ભારે પથ્થર મૂકી દીધો.
આવી કથાઓ કહી જૂના જમાનાના ઋષિ-શિક્ષકો વિદ્યાર્થીઓને સમજાવતા
કે સારા માણસ પર ઉપકાર કરો, પણ ખરાબ માણસને બંધનમાં નાખો. એમાં
જ શાણપણ છે.

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सबेरे वाली गाड़ी


. ◆सबेरे वाली गाड़ी◆
कहानी
मौलिक रचनाकार: ©जयसिंह भारद्वाज, फतेहपुर (उ.प्र.)

पत्नी के अंतिम संस्कार व तेरहवीं के बाद रिटायर्ड पोस्टमैन मनोहर गाँव छोड़कर मुम्बई में अपने पुत्र सुनील के बड़े से मकान में आये हुए हैं। सुनील बहुत मनुहार के बाद यहाँ ला पाया है। यद्यपि वह पहले भी कई बार प्रयास कर चुका था किंतु अम्मा ही बाबूजी को यह कह कर रोक देती थी कि ‘कहाँ वहाँ बेटे बहू की ज़िंदगी में दखल देने चलेंगे। यहीं ठीक है। सारी जिंदगी यहीं गुजरी है और जो थोड़ी सी बची है उसे भी यहीं रह कर काट लेंगे। ठीक है न!’

बस बाबूजी की इच्छा मर जाती। पर इस बार कोई साक्षात अवरोध नहीं था और पत्नी की स्मृतियों में बेटे के स्नेह से अधिक ताकत नहीं थी इसलिए मनोहर बम्बई आ ही गए हैं।

सुनील एक बड़ी कंस्ट्रक्शन कम्पनी में इंजीनियर है। उसने आलीशान घर व गाड़ी ले रखी है।

घर में घुसते ही मनोहर ठिठक कर रुक गए। गुदगुदी मैट पर पैर रखे ही नहीं जा रहे हैं उनके। दरवाजे पर उन्हें रुका देख कर सुनील बोला – “आइये बाबूजी, अंदर आइये।”

  • “बेटा, मेरे गन्दे पैरों से यह कालीन गन्दी तो नहीं हो जाएगी।”
  • “बाबूजी, आप उसकी चिंता न करें। आइये यहाँ सोफे पर बैठ जाइए।”

सहमें हुए कदमों में चलते हुए मनोहर जैसे ही सोफे पर बैठे तो उनकी चीख निकल गयी – अरे रे! मर गया रे!

उनके बैठते ही नरम औऱ गुदगुदा सोफा की गद्दी अन्दर तक धँस गयी थी। इससे मनोहर चिहुँक कर चीख पड़े थे।

चाय पीने के बाद सुनील ने मनोहर से कहा – “बाबूजी, आइये आपको घर दिखा दूँ अपना।”

  • “जरूर बेटा, चलो।”
  • “बाबू जी, यह है लॉबी जहाँ हम लोग चाय पी रहे थे। यहाँ पर कोई भी अतिथि आता है तो चाय नाश्ता और गपशप होती है। यह डाइनिंग हाल है। यहाँ पर हम लोग खाना खाते हैं। बाबूजी, यह रसोई है और इसी से जुड़ा हुआ यह भण्डार घर है। यहाँ रसोई से सम्बंधित सामग्री रखी जाती हैं। यह बच्चों का कमरा है।”
  • “तो बच्चे क्या अपने माँबाप के साथ नहीं रहते?”
  • बाबूजी, यह शहर है और शहरों में मुंबई है। यहाँ बच्चे को जन्म से ही अकेले सोने की आदत डालनी पड़ती है। माँ तो बस समय समय पर उसे दूध पिला देती है और उसके शेष कार्य आया आकर कर जाती है।”

थोड़ा ठहर कर सुनील में आगे कहा,”बाबूजी यह आपकी बहू और मेरे सोने का कमरा है। और इस कोने में यह गेस्ट रूम है। कोई अतिथि आ जाय तो यहीं ठहरता है। यह छोटा सा कमरा पेट्स के लिए है। कभी कोई कुत्ता आदि पाला गया तो उसके लिए व्यवस्था कर रखी है।”

सीढियां चढ़ कर ऊपर पहुँचे सुनील ने लम्बी चौड़ी छत के एक कोने में बने एक टीन की छत वाले कमरे को खोल कर दिखाते हुए कहा – “बाबूजी यह है घर का कबाड़खाना। घर की सब टूटी फूटी और बेकार वस्तुएं यहीं पर एकत्र कर दी जाती हैं। और दीवाली- होली पर इसकी सफाई कर दी जाती है। ऊपर ही यह एक बाथरूम और टॉइलट भी बना हुआ है।”

मनोहर ने देखा कि इसी कबाड़ख़ाने के अंदर एक फोल्डिंग चारपाई पर बिस्तर लगा हुआ है और उसी पर उनका झोला रखा हुआ है। मनोहर ने पलट कर सुनील की तरफ देखा किन्तु वह नीचे जा चुका था।

मनोहर चारपाई में बैठ कर सोचने लगे कि ‘कैसा यह मकान है जहाँ भविष्य में पाले जाने वाले पशु के लिए कमरे का विधान कर लिया जाता है किंतु बूढ़े माँबाप के लिए नहीं। इनके लिए तो कबाड़ का कमरा ही उचित आवास मान लिया गया है। नहीं.. अभी मैं कबाड़ नहीं हुआ हूँ। सुनील की माँ की सोच बिल्कुल सही था। मुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था।’

अगली सुबह जब सुनील मनोहर के लिए चाय लेकर ऊपर गया तो कक्ष को खाली पाया। बाबू जी का झोला भी नहीं था वहाँ। उसने टॉयलेट व बाथरूम भी देख लिये किन्तु बाबूजी वहाँ भी नहीं थे। वह झट से उतर कर नीचे आया तो पाया कि मेन गेट खुला हुआ है। उधर मनोहर टिकिट लेकर गाँव वापसी के लिए सबेरे वाली गाड़ी में बैठ चुके थे। उन्होंने कुर्ते की जेब में हाथ डाल कर देखा कि उनके ‘अपने घर’ की चाभी मौजूद थी। उन्होंने उसे कस कर मुट्ठी में पकड़ लिया। चलती हुई गाड़ीमें उनके चेहरे को छू रही हवा उनके इस निर्णय को और मजबूत बना रही थी। ★समाप्त★