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नींद कब नहीं आती है ?


महाभारतमें एक समय जब महाराज धृतराष्ट्र बहुत व्याकुल थे और उन्हें नींद नहीं आ रही थी, तब उन्होंने महामन्त्री विदुरको बुलवाया । कुछ समय पश्चात महात्मा विदुर प्रासादमें (महलमें) महाराजके सामने पहुंच गए ।
महाराज धृतराष्ट्रने महात्मा विदुरसे कहा, “जबसे संजय पाण्डवोंके यहांसे लौटकर आया है, तबसे मेरा मन बहुत अशान्त है । संजय कल सभामें सभीके सामने क्या कहेगा ? यह सोच-सोचकर मन व्यथित हो रहा है । नींद नहीं आ रही है ।”
यह सुनकर महात्मा विदुरने महाराजसे महत्त्वपूर्ण नीतिकी बात कही । महात्मा विदुरने कहा, “जब किसी व्यक्ति, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, दोनोंके जीवनमें ये चार बातें होती हैं, तब उसकी नींद उड जाती है और मन अशान्त हो जाता है ।”
ये चार बातें कौन-कौन सी हैं, आइए जानते हैं :-

पहली बात : महात्मा विदुरने महाराज धृतराष्ट्रसे कहा कि यदि किसी व्यक्तिके मनमें काम-वासना जाग गई हो तो उसे नींद नहीं आती है । जबतक कामी व्यक्तिकी वासना तृप्त नहीं हो जाती है, तबतक वह सो नहीं सकता है । कामकी वासना व्यक्तिके मनको अशान्त कर देती है और कामी किसी भी कार्यको ठीकसे नहीं कर पाता है । यह भावना स्त्री और पुरुष दोनोंकी नींद उडा देती है ।

दूसरी बात : जब किसी स्त्री या पुरुषकी शत्रुता बहुत बलवान व्यक्तिसे हो जाती है तो उसकी नींद उड जाती है । निर्बल और साधनहीन व्यक्ति प्रत्येक क्षण बलवान शत्रुसे बचनेके उपाय सोचता रहता है । उसे सदैव यह भय सताता है कि कहीं बलवान शत्रुके कारण कोई अनहोनी न हो जाए ।

तीसरी बात : यदि किसी व्यक्तिका सब कुछ हडप लिया गया हो तो उसकी रातोंकी नींद उड जाती है । ऐसा व्यक्ति न तो शान्तिसे जी पाता है और न ही सो पाता है । इस परिस्थितिमें व्यक्ति प्रत्येक क्षण छिनी हुई वस्तुओंको पुन: पानेकी योजनाएं बनाते रहता है । जबतक वह अपनी वस्तुएं पुन: पा नहीं लेता है, तबतक उसे नींद नहीं आती है ।

चौथी बात : यदि किसी व्यक्तिकी प्रवृत्ति चोरीकी है, अर्थात जो चोरी करके ही अपने उदर भरण करता है, या जिसे चोरी करनेकी वृति है, या जो दूसरोंका धन चुरानेकी योजनाएं बनाते रहता है, उसे नींद नहीं आती है । चोर सदैव रातमें चोरी करता है और दिनमें इस बातसे डरता है कि कहीं उसकी चोरी पकडी न जाए । इस कारणसे उसकी नींद भी उडी रहती है ।

रवि कांत

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भाव से बड़ा कुछ नही


🌹 आज का प्रेरक प्रसंग 🌹

🌷 भाव से बड़ा कुछ नही🌷

एक करोड़पति बहुत अड़चन में था। करोड़ों का घाटा लगा था, और सारी जीवन की मेहनत डूबने के करीब थी! नौका डगमगा रही थी। कभी मंदिर नहीं गया था, कभी प्रार्थना भी न की थी। फुरसत ही न मिली थी !

पूजा के लिए उसने पुजारी रख छोड़े थे, कई मंदिर भी बनवाये थे, जहां वे उसके नाम से नियमित पूजा किया करते थे लेकिन आज इस दुःख की घड़ी में कांपते हाथों से वह भी मंदिर गया!

सुबह जल्दी गया, ताकि परमात्मा से पहली मुलाकात उसी की हो, पहली प्रार्थना वही कर सके। कोई दूसरा पहले ही मांग कर परमात्मा का मन खराब न कर चुका हो! बोहनी की आदत जो होती है, कमबख्त यहां भी नहीं छूटी….सो अगली-सुबह पहुंचा मन्दिर।

लेकिन यह देख कर हैरान हुआ कि गांव का एक भिखारी उससे पहले से ही मन्दिर में मौजूद था। अंधेरा था, वह भी पीछे खड़ा हो गया, कि भिखारी क्या मांग रहा है? धनी आदमी सोचता है, कि मेरे पास तो मुसीबतें हैं; भिखारी के पास क्या मुसीबतें हो सकती हैं? और भिखारी सोचता है, कि मुसीबतें मेरे पास हैं। धनी आदमी के पास क्या मुसीबतें होंगी? एक भिखारी की मुसीबत दूसरे भिखारी के लिए बहुत बड़ी न थी !

उसने सुना, कि भिखारी कह रहा है –हे परमात्मा ! अगर पांच रुपए आज न मिलें तो जीवन नष्ट हो जाएगा। आत्महत्या कर लूंगा। पत्नी बीमार है और दवा के लिए पांच रुपए होना बिल्कुल आवश्यक हैं ! मेरा जीवन संकट में है !

अमीर आदमी ने यह सुना और वह भिखारी बंद ही नहीं हो रहा है; कहे जा रहा है और प्रार्थना जारी है ! तो उसने झल्लाकर अपने खीसे से पांच रुपए निकाल कर उस भिखारी को दिए और कहा – जा ले जा पांच रुपए, तू ले और जा जल्दी यहां से !

अब वह परमात्मा से मुखातिब हुआ और बोला — प्रभु, अब आप ध्यान मेरी तरफ दें, इस भिखारी की तो यही आदत है। दरअसल मुझे पांच करोड़ रुपए की जरूरत है !”

भगवान मुस्करा उठे बोले — एक छोटे भिखारी से तो तूने मुझे छुटकारा दिला दिया, लेकिन तुझसे छुटकारा पाने के लिए तो मुझको तुमसे भी बड़ा भिखारी ढूंढना पड़ेगा ! तुम सब लोग यहां कुछ न कुछ मांगने ही आते हो, कभी मेरी जरूरत का भी ख्याल आया है?

धनी आश्चर्यचकित हुआ बोला – प्रभु आपको क्या चाहिए?

भगवान बोले – प्रेम ! मैं भाव का भूखा हूँ । मुझे निस्वार्थ प्रेम व समर्पित भक्त प्रिय है ! कभी इस भाव से मुझ तक आओ; फिर तुम्हे कुछ मांगने की आवश्यकता ही नही पड़ेगी !!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।


क्षमया क्रोधमुच्छिन्द्यात्
कामं संकल्पवर्जनात्।
सत्त्वसंसेवनाद् धीरो
निद्रां च च्छेत्तुमर्हति ॥
महाभारतम् शान्तिपर्व २७४
अर्थात्👉
मुमुक्षु पुरुष को चाहिए कि क्षमा से क्रोध का और संकल्प के त्याग से कामनाओं का उच्छेद कर डाले। धीर पुरुष ज्ञानध्यानादि सात्त्विक गुणों के सेवन से निद्रा का क्षय करने में समर्थ होता है।


🙏🙏🙏🌹🌹🌹🙏🙏🙏
28.12.2021.

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पति पत्नी


पति पत्नी के बीच प्रेम क्या होता है कोई विजेंद्र सिंह राठौड़ से सीखे!!

यह तस्वीर अजेमर के निवासी विजेंद्र सिंह राठौड़ और उनकी धर्मपत्नी लीला की है। 2013 में लीला ने विजेंद्र से आग्रह किया के वह चार धाम की यात्रा करना चाहती हैं। विजेंद्र एक ट्रेवल एजेंसी में कार्यरत थे। इसी दरमियां ट्रैवेल एजेंसी का एक टूर केदारनाथ यात्रा जाने के लिये निश्चित हुआ। पतिपत्नी ने अपना बोरिया बिस्तर बांधा और केदारनाथ जा पहुंचे।

विजेंद्र और लीला एक लॉज में रुके थे। लीला को लॉज में छोड़ विजेंद्र कुछ दूर ही गये थे के चारों ओर हाहाकार मच गई। उत्तराखंड में आई भीषण बाढ़ का उफनता पानी केदारनाथ आ पहुंचा था। विजेंद्र ने बामुश्किल अपनी जान बचाई।
मौत का तांडव और उफनते हुये पानी का वेग शांत हुआ तो विजेंद्र बदहवास होकर उस लॉज की ओर दौड़े जहाँ वह लीला को छोड़ कर आये थे। परन्तु वहाँ पहुंच कर जो नज़ारा दिखा वह दिल दहला देने वाला था। सब कुछ बह चुका था। प्रकृति के इस तांडव के आगे वहां मौजूद हर इंसान बेबस दिख रहा था।
तो क्या लीला भी …..
नहीं नहीं। ऐसा नहीं हो सकता।विजेंद्र ने अपने मन को समझाया।
“वह जीवित है” विजेंद्र का मन कह रहा था। इतने वर्षों का साथ पल भर में तो नहीं छूट सकता।
परन्तु आस पास कहीं जीवन दिखाई नहीं दे रहा था। हर ओर मौत तांडव कर रही थी। लाशें बिखरी हुई थी। किसी का बेटा किसी का भाई तो किसी का पति बाढ़ के पानी मे बह गया था।
विजेंद्र के पास लीला की एक तस्वीर थी तो हर समय उसके पर्स में रहती थी। अगले कुछ दिन वह घटनास्थल पर हाथ मे तस्वीर लिये घूमता रहा। हर किसी से पूछता “भाई इसे कहीं देखा है”।
और जवाब मिलता ………
“ना”
एक विश्वास था जिसने विजेंद्र को यह स्वीकारने से रोक रखा था के लीला अब इस दुनिया में नहीं है।
दो हफ्ते बीत चुके थे। राहत कार्य जोरों पर थे। इसी दरमियां उसे फौज के कुछ अफसर भी मिले जिन्होंने उससे बात की। लगभग सबका यही निष्कर्ष था के लीला बाढ़ में बह चुकी है।
विजेंद्र ने मानने से इनकार कर दिया।
घर मे फोन मिला कर बच्चों को इस हादसे के बारे में सूचित किया। बच्चे अनहोनी के डर से घबराये हुये थे। रोती बिलखती बिटिया ने पूछा के “क्या अब माँ नहीं रही” तो विजेंद्र ने उसे ज़ोर से फटकार दिया और कहा “वह ज़िंदा है “।
एक महीना बीत चुका था। अपनी पत्नी की तालाश में विजेंद्र दर दर भटक रहा था। हाथ मे एक तस्वीर थी और मन मे एक आशा।
“वह जीवित है”
इसी बीच विजेंद्र के घर सरकारी विभाग से एक फोन आया। एक कर्मचारी ने कहा के लीला मृत घोषित कर दी गयी है और हादसे में जान गवां चुके लोगों को सरकार मुआवजा दे रही है। मृत लीला के परिजन भी सरकारी ऑफिस में आकर मुआवजा ले सकते हैं।
विजेंद्र ने मुआवज़ा लेने से भी इंकार कर दिया।
परिजनों ने कहा के अब तो सरकार भी लीला को मृत मान चुकी है।
अब तलाशने से कोई फ़ायदा नहीं है। परन्तु विजेंद्र ने मानने से इनकार कर दिया। जिस सरकारी कर्मचारी ने लीला की मौत की पुष्टि की थी उसे भी विजेंद्र ने कहा ….
“वह जीवित है”
विजेंद्र फिर से लीला की तालाश में निकल पड़े। उत्तराखंड का एक एक शहर नापने लगे। हाथ मे एक तस्वीर और ज़ुबाँ पर एक सवाल ” भाई इसे कहीं देखा है?” और सवाल का एक ही जवाब
“ना”
लीला से विजेंद्र को बिछड़े अब 19 महीने बीत चुके थे। इस दरमियां वह लगभग 1000 से अधिक गाँव मे लीला को तालाश चुके थे।

27 जनवरी 2015, उत्तराखंड के गंगोली गाँव मे एक राहीगर को विजेंद्र सिंह राठौर ने एक तस्वीर दिखाई और पूछा “भाई इसे कहीं देखा है”
राहीगर ने तस्वीर ध्यान से देखी और बोला ……..
“हां”
“देखा है। इसे देखा है”। ” यह औरत तो बौराई सी हमारे गाँव मे घूमती रहती है”।
विजेंद्र राहीगर के पांव में गिर पड़े। राहीगर के साथ भागते भागते वह गाँव पहुंचे। वही एक चैराहा था और सड़क के दूसरे कोने पर एक महिला बैठी थी।
“लीला”
वह “नज़र” जिससे “नज़र” मिलाने को “नज़र” तरस गयी थी।
वह लीला थी। विजेंद्र लीला का हाथ पकड़ कर अबोध बच्चे की तरह रोते रहे। इस तलाश ने उन्हें तोड़ दिया था। भावनायें और संवेदनायें आखों से अविरल बह रही थी। आँखें पत्थर हो चुकी थी फिर भी भावनाओं का वेग उन्हें चीरता हुआ बह निकला था।

लीला की मानसिक हालत उस समय स्थिर नहीं थी। वह उस शख्स को भी नहीं पहचान पाई जो उसे इस जगत में सबसे ज्यादा प्यार करता था। विजेंद्र ने लीला को उठाया और घर ले आये। 12 जून 2013 से बिछड़े बच्चे अपनी मां को 19 महीने के अंतराल के बाद देख रहे थे। आखों से आंसुओं का सैलाब बह रहा था।

यह 19 महीने विजेंद्र सिंह राठौर के जीवन का सबसे कठिनतम दौर था। परन्तु इस कठिनाई के बीच भी विजेंद्र के हौसले को एक धागे ने बांधे रखा। वह “प्रेम” का धागा है। एक पति का अपनी पत्नी के प्रति प्रेम और समर्पण जिसने प्रकृति के आदेश को भी पलट कर रख दिया। लीला के साथ बाढ़ में बह जाने वाले अधिकतर लोग नहीं बचे। लीला बच गयी। शायद विजेंद्र प्रभु से भी कह रहे थे………
“वह जीवित है” और प्रभु को भी विजेंद्र के प्रेम और समर्पण के आगे अपना फैसला बदलना पड़ा। आज का लेख एक पति के प्रेम की पराकाष्ठा को समर्पित है।
लेकिन मीडिया को यह सब दिखाने की फुर्सत नहीं है

साभार :- 🙏🏼🙏🏼🚩

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थर्ड पर्सन


  • थर्ड पर्सन *
    आजकल घर का वातावरण कुछ अजीब हो गया है।
    बेटे बहू में कुछ मनमुटाव चल रहा है। कभी घर बिल्कुल शांत लगता है। कभी घर के बरतनों से बैंड बाजा बजने लगता है । दोनों की चीखने चिल्लाने की आवाजें …।
    पड़ोसी पूरा डिस्को म्यूजिक का मजा ले रहे हैं….

अक्सर मन में शंका होने लगती है,… आजकल मै ‘महाभारत ‘ ग्रंथ पढ़ रही हूँ ,कहीं उसी का असर तो दोनों पर नही पड़ रहा…।मैंने सुना है…महाभारत ग्रंथ घर मे नही रखना चाहिये… अपशगुन होता है ।

एक दिन परेशान होकर मै बेटे से बोल पड़ी,” बहुत असभ्य हो गये हो,क्या प्राब्लम है,क्यों लड़ रहे हो ।”
बेटा बोला, ” आप परेशान मत हो, मेरा मैटर है, मै साल्व कर लूंगा ” ।
मै हतप्रभ रह गयी , मै बोली ,” पूरा घर सर पर उठा रखा है और ये तुम्हारा पर्सनल मैटर हो गया “।

जब बेटा ही ऐसा कह रहा है ,तो बहू से क्या उम्मीद करूँ ।
हार कर मैंने समधन जी को फोन मिलाया , “आइए समधन जी, थोड़ा डिस्को म्यूजिक आप भी सुन जाइये “। बेचारी परेशान सी बोली, ” मै खुद परेशान हूँ, बेटी कह रही है, ये उसका फैमली मैटर है, वो खुद सुलझा लेगी । बहन जी अब हम लोग थर्ड पर्सन हो गये हैं “।
लगा मेरे दिमाग में विस्फोट होजायेगा ,” अब हम थर्ड पर्सन हो गये “।

सोच विचार कर निर्णय लिया । बेटे बहू को उनके युद्ध स्थल मे छोड़ कर , दो दिन बाद हम चारों थर्ड पर्सन ने गोवा की एयर टिकट बुक कराई और उड़ गये नीले सागर के सौंदर्य में डूबने के लिये ।
( स्वरचित )

  • vandana pandey *
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खूबसूरत तस्वीर


🍁🍁
एक राजा था जिसकी केवल एक टाँग और एक आँख थी। उस राज्य में सभी लोग खुशहाल थे क्यूंकि राजा बहुत बुद्धिमान और प्रतापी था।
एक बार राजा के विचार आया कि क्यों खुद की एक तस्वीर बनवायी जाये। फिर क्या था, देश विदेशों से चित्रकारों को बुलवाया गया और एक से एक बड़े चित्रकार राजा के दरबार में आये।
राजा ने उन सभी से हाथ जोड़ कर आग्रह किया कि वो उसकी एक बहुत सुन्दर तस्वीर बनायें जो राजमहल में लगायी जाएगी। सारे चित्रकार सोचने लगे कि राजा तो पहले से ही विकलांग है, फिर उसकी तस्वीर को बहुत सुन्दर कैसे बनाया जा सकता है? ये तो संभव ही नहीं है और अगर तस्वीर सुन्दर नहीं बनी तो राजा गुस्सा होकर दंड देगा।
यही सोचकर सारे चित्रकारों ने राजा की तस्वीर बनाने से मना कर दिया।तभी पीछे से एक चित्रकार ने अपना हाथ खड़ा किया और बोला कि मैं आपकी बहुत सुन्दर तस्वीर बनाऊँगा जो आपको जरूर पसंद आएगी। फिर चित्रकार जल्दी से राजा की आज्ञा लेकर तस्वीर बनाने में जुट गया। काफी देर बाद उसने एक तस्वीर तैयार की जिसे देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ और सारे चित्रकारों ने अपने दातों तले उंगली दबा ली।
उस चित्रकार ने एक ऐसी तस्वीर बनायीं जिसमें राजा एक टाँग को मोड़कर जमीन पे बैठा है और एक आँख बंद करके अपने शिकार पे निशाना लगा रहा है।
राजा ये देखकर बहुत प्रसन्न हुआ कि उस चित्रकार ने राजा की कमजोरियों को छिपाकर कितनी चतुराई से एक सुन्दर तस्वीर बनाई है।
राजा ने उसे खूब इनाम एवं धन दौलत दी। तो क्यों ना हम भी दूसरों की कमियों को छुपाएँ, उन्हें नजरअंदाज करें और अच्छाइयों पर ध्यान दें।
आजकल देखा जाता है कि लोग एक दूसरे की कमियाँ बहुत जल्दी ढूंढ लेते हैं चाहें हममें खुद में कितनी भी बुराइयाँ हों लेकिन हम हमेशा दूसरों की बुराइयों पर ही ध्यान देते हैं कि अमुक आदमी ऐसा है, वो वैसा है।
हमें नकारात्मक परिस्थितियों में भी सकारात्मक सोचना चाहिए और हमारी सकारात्मक सोच हमारी हर समस्यों को हल करती है।
जय महाकाल!!!

शीतल दुबे

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तीन बहु


एक माताजी राशन की दुकान पर राशन लेने गई ।

दुकानवाला: मां जी, क्या चाहिए?

मां जी: एक किलो चना और एक एक किलो मूंग दाल और उड़द दाल दे दो। लो इस थेले में डाल दो सब एक साथ।

दुकानवाला: लेकिन मांजी इसमें तो सब मिक्स हो जायेगा।

मां जी: कोई बात नहीं। घर में तीन तीन बहूएं बैठी है खाली। कर लेगी अलग ।

दुकानवाले ने तीनों चीजें थेले में डाल दी और बोला: मां जी, और कुछ चाहिए क्या?

मां जी: हां , दो किलो चावल भी इसमें डाल दो।

दुकानवाला: मां जी, चावल भी इसमें?

मां जी: हां कोई बात नहीं। घर में तीन तीन बहूएं बैठी है बिलकुल बेकार । कर लेगी अलग।

दुकानवाले ने सब कुछ थेले में डालकर कहा: मां जी, चार सौ बारह रुपए हुए , दीजिए……!

मां जी: पैसे तो उधार रखने पड़ेंगे…..बाद में दूंगी ।

दुकानवाला: लेकिन मां जी…

मां जी: अगर उधार नहीं रखोगे तो नहीं चाहिए सामान । रख लो अपना माल।

दुकानवाला: मां जी, ले जाइए। हमारे यहां तीन तीन बहूएं नहीं हैं जो अलग कर लेंगी।

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नव नंदन प्रसाद

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राव रामबख्श सिंह का बलिदान


28 दिसम्बर/बलिदान-दिवस

राव रामबख्श सिंह का बलिदान

श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या और लक्ष्मणपुरी (लखनऊ) का निकटवर्ती क्षेत्र सदा से अवध कहलाता है। इसी अवध में उन्नाव जनपद का कुछ क्षेत्र बैसवारा कहा जाता है। इसी बैसवारा की वीरभूमि में राव रामबख्श सिंह का जन्म हुआ, जिन्होंने मातृभूमि को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए अन्तिम दम तक संघर्ष किया और फिर हँसते हुए फाँसी का फन्दा चूम लिया।

राव रामबख्श सिंह बैसवारा के संस्थापक राजा त्रिलोक चन्द्र की 16वीं पीढ़ी में जन्मे थे। रामबख्श सिंह ने 1840 में बैसवारा क्षेत्र की ही एक रियासत डौडियाखेड़ा का राज्य सँभाला। यह वह समय था, जब अंग्रेज छल-बल से अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे। इसी के साथ स्वाधीनता संग्राम के लिए रानी लक्ष्मीबाई, बहादुरशाह जफर, नाना साहब, तात्या टोपे आदि के नेतृत्व में लोग संगठित भी हो रहे थे। राव साहब भी इस अभियान में जुड़ गये।

31 मई, 1857 को एक साथ अंग्रेजों के विरुद्ध सैनिक छावनियों में हल्ला बोलना था; पर दुर्भाग्यवश समय से पहले ही विस्फोट हो गया, जिससे अंग्रेज सतर्क हो गये। कानपुर पर नानासाहब के अधिकार के बाद वहाँ से भागे 13 अंग्रेज बक्सर में गंगा के किनारे स्थित एक शिव मन्दिर में छिप गये।

वहाँ के ठाकुर यदुनाथ सिंह ने अंग्रेजों से कहा कि वे बाहर आ जायें, तो उन्हें सुरक्षा दी जाएगी; पर अंग्रेज छल से बाज नहीं आये। उन्होंने गोली चला दी, जिससे यदुनाथ सिंह वहीं मारे गये। क्रोधित होकर लोगों ने मन्दिर को सूखी घास से ढककर आग लगा दी। इसमें दस अंग्रेज जल मरे; पर तीन गंगा में कूद गये और किसी तरह गहरौली, मौरावाँ होते हुए लखनऊ आ गये।

लखनऊ में अंग्रेज अधिकारियों को जब यह वृत्तान्त पता लगा, तो उन्होंने मई 1858 में सर होप ग्राण्ट के नेतृत्व में एक बड़ी फौज बैसवारा के दमन के लिए भेज दी। इस फौज ने पुरवा, पश्चिम गाँव, निहस्था, बिहार और सेमरी को रौंदते हुए दिसम्बर 1858 में राव रामबख्श सिंह के डौडियाखेड़ा दुर्ग को घेर लिया। राव साहब ने सम्पूर्ण क्षमता के साथ युद्ध किया; पर अंग्रेजों की सामरिक शक्ति अधिक होने के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा।

इसके बाद भी राव साहब गुरिल्ला पद्धति से अंग्रेजों को छकाते रहे; पर उनके कुछ परिचितों ने अंग्रेजों द्वारा दिये गये चाँदी के टुकड़ों के बदले अपनी देशनिष्ठा गिरवी रख दी। इनमें एक था उनका नौकर चन्दी केवट। उसकी सूचना पर अंग्रेजों ने राव साहब को काशी में गिरफ्तार कर लिया।

रायबरेली के तत्कालीन जज डब्ल्यू. ग्लाइन के सामने न्याय का नाटक खेला गया। मौरावाँ के देशद्रोही चन्दनलाल खत्री व दिग्विजय सिंह की गवाही पर राव साहब को मृत्युदंड दिया गया। अंग्रेज अधिकारी बैसवारा तथा सम्पूर्ण अवध में अपना आतंक फैलाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने बक्सर के उसी मन्दिर में स्थित वटवृक्ष पर 28 दिसम्बर, 1861 को राव रामबख्श सिंह को फाँसी दी, जहाँ दस अंग्रेजों को जलाया गया था। राव साहब डौडियाखेड़ा के कामेश्वर महादेव तथा बक्सर की माँ चन्द्रिका देवी के उपासक थे। इन दोनों का ही प्रताप था कि फाँसी की रस्सी दो बार टूट गयी।

राव रामबख्श सिंह भले ही चले गये; पर डौडियाखेड़ा दुर्ग एक तीर्थ बन गया, जहाँ भरने वाले मेले में अवध के लोकगायक आज भी गाते हैं –

अवध मा राव भये मरदाना।
………………………इस प्रकार के भाव पूण्य संदेश के लेखक एवं भेजने वाले महावीर सिघंल जी

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एक विद्वान किसी गाँव से गुजर रहा था,
उसे याद आया, उसके बचपन का मित्र इस गावँ में है, सोचा मिला जाए ।
मित्र के घर पहुचा, लेकिन देखा, मित्र गरीबी व दरिद्रता में रह रहा है, साथ मे दो नौजवान भाई भी है।

बात करते करते शाम हो गयी, विद्वान ने देखा, मित्र के दोनों भाइयों ने घर के पीछे आंगन में फली के पेड़ से कुछ फलियां तोड़ी, और घर के बाहर बेचकर चंद पैसे कमाए और दाल आटा खरीद कर लाये।
मात्रा कम थी, तीन भाई व विद्वान के लिए भोजन कम पड़ता,
एक ने उपवास का बहाना बनाया,
एक ने खराब पेट का।
केवल मित्र, विद्वान के साथ भोजन ग्रहण करने बैठा।
रात हुई,
विद्वान उलझन में कि मित्र की दरिद्रता कैसे दूर की जाए?, नींद नही आई,
चुपके से उठा, एक कुल्हाड़ी ली और आंगन में जाकर फली का पेड़ काट डाला और रातों रात भाग गया।

सुबह होते ही भीड़ जमा हुई, विद्वान की निंदा हरएक ने की, कि तीन भाइयों की रोजी रोटी का एकमात्र सहारा, विद्वान ने एक झटके में खत्म कर डाला, कैसा निर्दयी मित्र था??
तीनो भाइयों की आंखों में आंसू थे।

2-3 बरस बीत गए,
विद्वान को फिर उसी गांव की तरफ से गुजरना था, डरते डरते उसने गांव में कदम रखा, पिटने के लिए भी तैयार था,
वो धीरे से मित्र के घर के सामने पहुचा, लेकिन वहां पर मित्र की झोपड़ी की जगह कोठी नज़र आयी,
इतने में तीनो भाई भी बाहर आ गए, अपने विद्वान मित्र को देखते ही, रोते हुए उसके पैरों पर गिर पड़े।
बोले यदि तुमने उस दिन फली का पेड़ न काटा होता तो हम आज हम इतने समृद्ध न हो पाते,
हमने मेहनत न की होती, अब हम लोगो को समझ मे आया कि तुमने उस रात फली का पेड़ क्यो काटा था।

जब तक हम सहारे के सहारे रहते है, तब तक हम आत्मनिर्भर होकर प्रगति नही कर सकते।
जब भी सहारा मिलता है तो हम आलस्य में दरिद्रता अपना लेते है।

दूसरा, हम तब तक कुछ नही करते जब तक कि हमारे सामने नितांत आवश्यकता नही होती, जब तक हमारे चारों ओर अंधेरा नही छा जाता।

जीवन के हर क्षेत्र में इस तरह के फली के पेड़ लगे होते है। आवश्यकता है इन पेड़ों को एक झटके में काट देने की।.

प्रगति का इक ही रास्ता आत्मनिर्भरता।

🙏🙏हरिओम 🙏🙏

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एक बार
संख्या 9 ने 8 को थप्पड़ मारा
8 रोने लगा…
पूछा मुझे क्यों मारा..?

9 बोला…
मैं बड़ा हु इसीलए मारा..

सुनते ही 8 ने 7 को मारा
और 9 वाली बात दोहरा दी

7 ने 6 को..
6 ने 5 को..
5 ने 4 को..
4 ने 3 को..
3 ने 2 को..
2 ने 1 को..

अब 1 किसको मारे
1 के निचे तो 0 था !

1 ने उसे मारा नहीं
बल्कि प्यार से उठाया
और उसे अपनी बगल में
बैठा लिया

जैसे ही बैठाया…
उसकी ताक़त 10 हो गयी..!

Give Respect &
be eligible for respect..!
😊
जिन्दगीं में किसी का साथ काफी हैं,
कंधे पर किसी का हाथ काफी हैं,
दूर हो या पास..
…क्या फर्क पड़ता हैं,
💐”अनमोल रिश्तों”💐
का तो बस “एहसास” ही काफी हैं !

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🚩🚩लीजिये एक नया जेहाद आ गया,नाम है

  • नम्बर जेहाद*👇👇

पूरे विश्व मे ये पहला उदाहरण है। दुनिया चकित है, केरल के महाज्ञानी छात्रों के नम्बर देख कर।
आज TV पर बताया गया कि केरल बोर्ड से 100% नम्बर लेकर आये चार हजार से ज्यादा छात्र छात्राओं ने दिल्ली वि वि मे फार्म भरा जिसमे एक ही कॉलेज मे, इतिहास मे 38, भूगोल मे 34, गणित मे 45, बायोलॉजी मे 51, अंग्रेजी मे 50 बच्चों को एडमिशन मिला। जितने भी केरल के छात्रों ने फार्म भरा सब के सब दाखिला पा गए। ये एक कॉलेज का परिणाम था बाकी चार हजार को भी अन्य कॉलेज मे दाखिला मिलना तय है ।
गौर तलब है कि गणित मे तो समझ मे आता है की 100% नंबर मिल सकते हैं , पर इतिहास, भूगोल, बायोलॉजी, और भाषा मे 100% नम्बर तो नामुमकिन ही है।
इस घोटाले को पकड़ा दिल्ली वि वि के प्रोफेसर राकेश पांडेय ने प्रो.पांडेय 2016 से ही इस बात पर गौर कर रहे थे , पर उनकी बात वि वि प्रशासन और मुख्य मंत्री तक ने नकार दी, तब उन्होंने ये मुद्दा TV पर उठाया तो हड़कंप मच गया, अब जाँच हो रही है।
ये पूरा खेल केरल की वाम पंथी सरकार का है जो नेहरू के मदरसे JNU की तरह दिल्ली वि वि को भी अपना अपराधी अड्डा बनाना चाह रही है।
वि वि के शिक्षकों का कहना है की केरल का ढिंढोरा पीटने वालों सुनो इन छात्रों की ना हिंदी अच्छी है ना ही अंग्रेजी भाषा, उनका उच्चारण ही गलत होता है जो समझ ने नही आता, और जब केरल की शिक्षा का स्तर बहुत ऊँचा बताया जाता है तो 2000 km दूर केरल से कमतर स्तर वाले दिल्ली क्यों आ रहे हैं ये छात्र ??
जब ये बात प्रोफेसर पांडेय ने उठाई तो उनको धमकी मिलना शुरू गयी, शशि थरूर जैसा आदमी उनकी आलोचना करने लगा, असल मे ये सारे वाम पंथी और कांग्रेस टुकड़े टुकड़े गैंग JNU की तरह दिल्ली वि वि को बना देना चाहते हैं, अब देखना ये है की ये हरकत भारत के और कौन कौन से वि वि मे की जा रही है।
सबसे खास बात ये है कि केरल मे आन लाईन परीक्षा भी नहीं हुई है। छात्र को व्यक्तिगत रूप से परीक्षा मे बैठना पड़ा था, जबकि आन लाइन परीक्षा देने वाले छात्रों जो किताबें देख कर और कंप्युटर रख कर परीक्षा दिये हैं उनको भी दो चार को ही 100% नम्बर मिले हैं।
इसके पूर्व UPSC मे उर्दू को माध्यम बना कर षड्यंत्र रचा गया था जिसमे जांचने वाले भी मुस्लिम ही होते हैं दूसरों को उर्दू आती ही नहीं तो जाँच भी उर्दू जानने वाले ही करते रहे। उसमे भी 100% नंबर देकर मुस्लिमों को IAS, IPS, आदि जगह पर 2009 से घुसेड़ रहे थे,
शाह फ़ैसल आदि ऐसे ही टॉपर बने थे।
केरल मे कानून की डिग्री मे शरिया कानून एक सब्जेक्ट है। अब ऐसे वकील कल को हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट मे पहुंचेंगे तो क्या हाल करेंगे भारतीय कानून का ये विचारणीय प्रश्न है।
जागो हिंदुओं जागो।🙏