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व्यक्तित्व


व्यक्तित्व

एप्पल कंपनी का चखे हुए सेव के सिम्बल का सच.

एक थे एलेन मैथिसन ट्यूरिंग । उनका जन्म 23 जून 1912 को ग्रेट ब्रिटेन में हुआ था । वे बचपन से हीं धावक बनने का सपना संजोए थे । वे ओलम्पिक स्तर के धावक हो सकते थे , क्योंकि उनका समय अंतराष्ट्रीय स्तर से मात्र ग्यारह मिनट कम था । कोशिश कर उस स्तर तक पहुंचा जा सकता था , लेकिन उन्हें फूलों से एलर्जी थी । इसलिए एलेन ट्यूरिंग मास्क पहनकर दौड़ते थे । मास्क पहनने से उन्हें मनोवांछित आक्सीजन नहीं मिल पाती थी ।इसलिए उन्होंने धावक बनने का सपना छोड़ दिया और विज्ञान के क्षेत्र में उतर गये । उन्होंने जो सिद्धांत परिपादित किया उससे कम्प्यूटर बनाने का तरीका आसान हो गया । अतः उनके इस शोध से उनको कम्प्यूटर साईंस का जनक माना गया ।

उन दिनों द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था । प्रथम विश्व युद्ध की हार को जर्मनी पचा नहीं पाया था । इसलिए वह पूरे मनोयोग से द्वितीय विश्व युद्ध में बदला लेने के नियत से उतरा । उसने अटलांटिक महासागर में अपनी एक पनडुब्बी “ऊ बोट “उतारी । यह ऊ बोट अपनी सेनाओं को एक विशेष कोड के सहारे संदेश भेजती थी, जिसे डिकोड करने की क्षमता मित्र राष्ट्रों में किसी के पास नहीं थी । एलेन मिथिसन ट्यूरिंग ने इसे एक चैलेंज के रुप में लिया । उन्होंने थोड़े दिनों में हीं जर्मन कूटलेखों को पढ़ने में सफलता प्राप्त कर ली । अब जर्मन रणनीति का रहस्य मित्र राष्ट्रों के सामने खुल गया । जर्मन को घुटने टेकने पड़े । युद्ध जो और दो सालों तक चलना था , वह जल्द हीं समाप्त हो गया ।

एलेन मैथिसन ट्यूरिंग में एक दुर्गुण ( उस दौर के हिसाब से ) था । वे समलैंगिक थे । 1952 में उन्होंने सार्वजनिक रुप से अपने इस दुर्गुण को स्वीकार किया । उन दिनों यह दुर्गुण नहीं एक अपराध था । उन पर समाज में अश्लीलता फैलाने का आरोप लगा । उन पर मुकदमा चला । कोर्ट में एलेन मैथिसन ट्यूरिंग ने इसे अपराध नहीं माना , बल्कि इसे अपना स्वभाव कहा । कोर्ट ने उनकी एक न सुनी । उन्हें अपराधी माना । ट्यूरिंग के सामने दो आॅप्सन रखे गये -1) उन्हें जेल होगी या 2) उन्हें रासायनिक बधियापन को झेलना होगा । एलेन मैथिसन ट्यूरिंग ने दूसरे आॅप्सन को चुना । उन्हें जेल जाने से बेहतर यह सजा लगी थी ।

एलेन मैथिसन ट्यूरिंग को स्त्री हार्मोन के इंजेक्सन दिए जाने लगे । इस हार्मोन के चलते वे स्थायी तौर पर हमेशा के लिए नपुंसक हो गये । उनके स्तन निकल आए । एलेन ने शर्म के मारे घर से बाहर निकलना छोड़ दिया । उनका मन साईंस के अनुसंधानों में नहीं लगा । दो साल तक जलालत की जिंदगी जीने के बाद उन्होंने 7 जून 1954 को आत्म हत्या कर ली । उनके शव के पास एक चखा हुआ सेव रखा गया था । जांच के बाद उस सेव में पोटेशियम सायनायड पाया गया ।

एलेन मैथिसन ट्यूरिंग को नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए था । उनकी गिनती न्यूटन और आईंस्टीन के साथ होनी चाहिए थी । किंतु उनके साथ कदाचार किया गया । उन्हें बधिया बना दिया गया , जो आज के परिपेक्ष्य में अनैतिक और मानव अधिकारों के विरुद्ध है । 2009 में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधान मंत्री ने इसे मानवता के खिलाफ माना था और इस कृत्य के लिए सार्वजनिक रुप से माफी भी मांगी थी । इस बात को एप्पल कम्पनी के मालिक स्टीव जाॅब्स ने 1977 में हीं मान ली थी । उन्होंने एलेन मैथिसन ट्यूरिंग को श्रद्धांजलि स्वरुप अपनी कम्पनी का लोगो “चखा हुआ सेव ” रखा था । इतना सब होने के बावजूद ट्यूरिंग ने जो जलालत सही उसकी भरपाई नितांत हीं मुश्किल है । वे ये सब देखने आने से रहे ।

© ई एस डी ओझा

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गाय


एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है।
वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई।
वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था।
उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों ही करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फंस गए।
दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था।
थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है?
बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं।
गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारी उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है?
उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी ही है।

गाय ने मुस्कुराते हुए कहा,…. बिल्कुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा?

थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया।
जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञतापूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे, क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।

गाय — समर्पित ह्रदय का प्रतीक है।
बाघ — अहंकारी मन है।
और
मालिक — ईश्वर का प्रतीक है।
कीचड़ — यह संसार है।
और
यह संघर्ष — अस्तित्व की लड़ाई है।

किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है, लेकिन मैं ही सब कुछ हूं, मुझे किसी के सहयोग की आवश्यकता नहीं है, यही अहंकार है, और यहीं से विनाश का बीजारोपण हो जाता है।

ईश्वर से बड़ा इस दुनिया में सच्चा हितैषी कोई नहीं होता, क्यौंकि वही अनेक रूपों में हमारी रक्षा करता है।
🚩 जय श्री कृष्ण 🚩

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साक्षसात लक्ष्मी


साक्षात् लक्ष्मी ,,,,,,,,
एक सेठ नदी पर आत्महत्या करने जा रहा था। संयोग से एक लंगोटीधारी संत भी वहाँ थे।
संत ने उसे रोक कर, कारण पूछा, तो सेठ ने बताया कि उसे व्यापार में बड़ी हानि हो गई है।
संत ने मुस्कुराते हुए कहा- बस इतनी सी बात है? चलो मेरे साथ, मैं अपने तपोबल से लक्ष्मी जी को तुम्हारे सामने बुला दूंगा। फिर उनसे जो चाहे माँग लेना।
सेठ उनके साथ चल पड़ा। कुटिया में पहुँच कर, संत ने लक्ष्मी जी को साक्षात प्रकट कर दिया।
वे इतनी सुंदर, इतनी सुंदर थीं कि सेठ अवाक रह गया और धन माँगना भूल गया। देखते देखते सेठ की दृष्टि उनके चरणों पर पड़ी। उनके चरण मैल से सने थे।
सेठ ने हैरानी से पूछा- माँ! आपके चरणों में यह मैल कैसी?
माँ- पुत्र! जो लोग भगवान को नहीं चाहते, मुझे ही चाहते हैं, वे पापी मेरे चरणों में अपना पाप से भरा माथा रगड़ते हैं। उनके माथे की मैल मेरे चरणों पर चढ़ जाती है।
ऐसा कहकर लक्ष्मी जी अंतर्ध्यान हो गईं। अब सेठ धन न माँगने की अपनी भूल पर पछताया, और संत चरणों में गिर कर, एकबार फिर उन्हें बुलाने का आग्रह करने लगा।
संत ने लक्ष्मी जी को पुनः बुला दिया। इस बार लक्ष्मी जी के चरण तो चमक रहे थे, पर माथे पर धूल लगी थी।
पुनः अवाक होकर सेठ धन माँगना भूल कर पूछने लगा- माँ! आपके माथे पर मैल कैसे लग गई?
लक्ष्मी ने कहा- पुत्र! यह मैल नहीं है, यह तो प्रसाद है। जो लोग भगवान को ही चाहते हैं, उनसे मुझे नहीं चाहते, उन भक्तों के चरणों में मैं अपना माथा रगड़ती हूँ। उनके चरणों की धूल से मेरा माथा पवित्र हो जाता है।
लक्ष्मी जी ऐसा कहकर पुनः अंतर्ध्यान हो गईं। सेठ रोते हुए, संत चरणों में गिर गया।
संत ने मुस्कुराते हुए कहा- रोओ मत। मैं उन्हें फिर से बुला देता हूँ।
सेठ ने रोते रोते कहा- नहीं स्वामी जी, वह बात नहीं है। आपने मुझ पर बड़ी कृपा की। मुझे जीवन का सबसे बड़ा पाठ मिल गया। अब मैं धन नहीं चाहता। अब तो मैं अपने बचे हुए जीवन में भगवान का ही भजन करूंगा।
🙏जय श्री लक्ष्मीनारायण🙏

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वापसी


लघुकथा

वापसी

“सुनिए, जरा अम्मा बाबूजी से बात कर लीजिये”- ऑफिस से लौटे रमन का बैग लेते हुए रजनी बोली।
“क्या हुआ?”
“अरे, वापस जाने को कह रहे हैं।”
” अच्छा। तुम उन्ही के कमरे में चाय ले आओ, साथ पीते हुए बात भी कर लूँगा।”
चार कप चाय लेकर रजनी गेस्ट रूम में ही चली गयी। टीवी की आवाज कम कर दी। और बात शुरू करते हुए बोली-“लगता है, हमारे साथ रहना अच्छा नहीं लग रहा आप लोगों को। तभी गाँव वापस जाने को कह रहे हैं…”
“अरे…ना….
“अम्मा, वहां बिजली पानी की कितनी समस्या है। डॉक्टर मिलना मुश्किल हो जाये अगर तबियत खराब हो जाये। क्यों आपने रट लगा रखी है जाने जाने की, बताइए?
“ये बात ना है बेटा…हम तो बस ऐसे ही…
“बाबूजी आप देखिये न, यहाँ दसवें माले पर बना ये साफ़ सुथरा फ़्लेट। गाँव में तो आंगन ही बुहारे बुहारे दाई की कमर दोहरा जाती है। और बरसात में सांप बिच्छू का खतरा अलग। यहाँ आपको तकलीफ क्या है, मुझे बताइए?
“अरे मोर बहुरिया,बिटवा…तकलीफ कोई नाय है हम लोगन को इहाँ पर। तुम लोग खूब ख्याल भी रखे हो हमारा…
“फिर क्या बात है?
“वो ….यहाँ की लिफ्ट…बड़ी संकरी है….
“लिफ्ट?? तो उससे क्या ?
“अरे तुम बताये रहे न कि शिफ्ट होते समय अलमारी तक को भी इन्ही चक्करदार सीढ़ियों से ही ऊपर लाना पड़ा था…
“हाँ…
“बेटा, हमार अर्थी भी ऐसे ही नीचे ले जाहियो का ? वो भी सीधे सड़क पर? उन घुमावदार सीढ़ियों से नीचे देखने पर हमको तो वैसे ही चक्कर आवें हैं। न बाबा न!हमे तो वापस अपने गाँव छोड़ ही आओ….

-डॉ छवि निगम

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श्री काशी विश्वनाथ


बाबा काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़े 11 रहस्य

  1. काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग दो भागों में है। दाहिने भाग में शक्ति के रूप में मां भगवती विराजमान हैं। दूसरी ओर भगवान शिव वाम रूप (सुंदर) रूप में विराजमान हैं। इसीलिए काशी को मुक्ति क्षेत्र कहा जाता है।
  2. देवी भगवती के दाहिनी ओर विराजमान होने से मुक्ति का मार्ग केवल काशी में ही खुलता है। यहां मनुष्य को मुक्ति मिलती है और दोबारा गर्भधारण नहीं करना होता है। भगवान शिव खुद यहां तारक मंत्र देकर लोगों को तारते हैं। अकाल मृत्यु से मरा मनुष्य बिना शिव अराधना के मुक्ति नहीं पा सकता।
  3. श्रृंगार के समय सारी मूर्तियां पश्चिम मुखी होती हैं। इस ज्योतिर्लिंग में शिव और शक्ति दोनों साथ ही विराजते हैं, जो अद्भुत है। ऐसा दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता है।
  4. विश्वनाथ दरबार में गर्भ गृह का शिखर है। इसमें ऊपर की ओर गुंबद श्री यंत्र से मंडित है। तांत्रिक सिद्धि के लिए ये उपयुक्त स्थान है। इसे श्री यंत्र-तंत्र साधना के लिए प्रमुख माना जाता है।
  5. बाबा विश्वनाथ के दरबार में तंत्र की दृष्टि से चार प्रमुख द्वार इस प्रकार हैं :-
  6. शांति द्वार. 2. कला द्वार 3. प्रतिष्ठा द्वार 4. निवृत्ति द्वार
    इन चारों द्वारों का तंत्र में अलग ही स्थान है। पूरी दुनिया में ऐसा कोई जगह नहीं है जहां शिवशक्ति एक साथ विराजमान हों और तंत्र द्वार भी हो।
  7. बाबा का ज्योतिर्लिंग गर्भगृह में ईशान कोण में मौजूद है। इस कोण का मतलब होता है, संपूर्ण विद्या और हर कला से परिपूर्ण दरबार। तंत्र की 10 महा विद्याओं का अद्भुत दरबार, जहां भगवान शंकर का नाम ही ईशान है।
  8. मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण मुख पर है और बाबा विश्वनाथ का मुख अघोर की ओर है। इससे मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवेश करता है। इसीलिए सबसे पहले बाबा के अघोर रूप का दर्शन होता है। यहां से प्रवेश करते ही पूर्व कृत पाप-ताप विनष्ट हो जाते हैं।
  9. भौगोलिक दृष्टि से बाबा को त्रिकंटक विराजते यानि त्रिशूल पर विराजमान माना जाता है। मैदागिन क्षेत्र जहां कभी मंदाकिनी नदी और गौदोलिया क्षेत्र जहां गोदावरी नदी बहती थी। इन दोनों के बीच में ज्ञानवापी में बाबा स्वयं विराजते हैं। मैदागिन-गौदौलिया के बीच में ज्ञानवापी से नीचे है, जो त्रिशूल की तरह ग्राफ पर बनता है। इसीलिए कहा जाता है कि काशी में कभी प्रलय नहीं आ सकता।
  10. बाबा विश्वनाथ काशी में गुरु और राजा के रूप में विराजमान है। वह दिनभर गुरु रूप में काशी में भ्रमण करते हैं। रात्रि नौ बजे जब बाबा का श्रृंगार आरती किया जाता है तो वह राज वेश में होते हैं। इसीलिए शिव को राजराजेश्वर भी कहते हैं।
  11. बाबा विश्वनाथ और मां भगवती काशी में प्रतिज्ञाबद्ध हैं। मां भगवती अन्नपूर्णा के रूप में हर काशी में रहने वालों को पेट भरती हैं। वहीं, बाबा मृत्यु के पश्चात तारक मंत्र देकर मुक्ति प्रदान करते हैं। बाबा को इसीलिए ताड़केश्वर भी कहते हैं।
  12. बाबा विश्वनाथ के अघोर दर्शन मात्र से ही जन्म जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं। शिवरात्रि में बाबा विश्वनाथ औघड़ रूप में भी विचरण करते हैं। उनके बारात में भूत, प्रेत, जानवर, देवता, पशु और पक्षी सभी शामिल होते हैं।
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आत्मविश्वास


शहर के मशहूर लोहार के पास एक नौजवान आया और बोला …मुझे एक ऐसी तलवार बना दो जो सबसे अलग हो क्योंकि मुझे बादशाह की फौज के लिए जंग में जाना है। मैं कुछ कमाल करना चाहता हूँ।

लोहार ने उसकी बातों को बेहद गंभीरता से सुना और कहा कि ऐसी तलवार बनाने में समय लगता है । आपको एक साल तक इंतजार करना होगा……?

नौजवान तैयार हो गया।

लोहार ने उससे कहा कि अब आप एक साल फ्री हैं तो ऐसा करो कि तलवार चलाने की कला तलवार के गुरू से सीखो। आपकी ये तलवार बहुत खास होगी। इसलिए किसी माहिर गुरु का छात्र होना ज़रूरी है।

नौजवान ने प्रशिक्षण शुरू कर दिया।

एक साल बाद वो लोहार के पास आया और उससे अपनी तलवार ले ली। जंग में गया, खूब तारीफ और नाम कमाया।

जब नौजवान जंग से लौटकर लोहार का शुक्रिया अदा करने आया तो लोहार ने कहा कि शुक्रिया उस उस्ताद का अदा करो जिससे तुमने तलवारबाज़ी की कला सीखी । तुम्हारी ये तलवार भी आम तलवार के जैसी ही थी जो दो दिन में बन गई थी ।

नौजवान को अब ये समझते देर न लगी कि ” यह आपकी कला औऱ हुनर ही है जो एक साधारण चीज़ को भी ख़ास बनाती है। प्रशिक्षण औऱ निरंतर अभ्यास वह जादू है जो किसी भी कार्य के परिणाम को इतना विशेष बनाता है कि देखने वालों को लगता है कि यह जादू है, क्योंकि प्रशिक्षण ही आत्मविश्वास देता है।

इसलिए आत्मविश्वास एक जादू है। ये जादू आपसे कुछ भी करवा सकता है, अगर आपको इसका मंत्र मालुम हो।

रवि कांत

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साहबजादे


21 दिसम्बर सन सत्रह सौ चार…
छह महीने से पड़े मुगलों के घेरे को तोड़ कर अपनी चार सौ की फौज के साथ गुरु गोविन्द सिंह निकल गए थे। वहाँ से निकलने के बाद सबको सिरसा नदी को पार करना था। जाड़े की भीषण बरसात के कारण उफनती हुई नदी, और रात की बेला! आधे से अधिक लोगों को नदी लील गयी। जो बचे वे तीन हिस्सों में बंट गए। एक हिस्से में गुरुजी की दोनों पत्नियां और कुछ सिक्ख, दूसरे हिस्से में दो छोटे साहबजादों के साथ गुरुजी की माता गुजरी देवी जी और तीसरे हिस्से में गुरुजी के साथ उनके दो बड़े साहबजादे और 40 और सिक्ख।
43 सिक्खों का काफिला भागता दौड़ता एक छोटे से गाँव चमकौर पहुँचा और वहाँ एक कच्ची हवेली में शरण ली। उधर मुगल सेना को पता चला कि गुरुजी निकल गए तो पीछे दौड़ी। अगले दिन 22 दिसम्बर को मुगलों की फौज चमकौर में थी। बजीर खान की सरदारी में लाखों की फौज गुरुजी को जीवित या मृत पकड़ने के लिए पागल थी।
लाखों की मुगल सेना, 43 सिक्ख! भूल जाइए युद्ध को, बस इतना याद रखिये कि सिक्खों में 36 मरे और मुगलों में लगभग सब! आश्चर्य होगा न? आश्चर्य का नाम ही गुरु गोविंद सिंह जी था। मध्यकालीन भारत के हिन्दुओं ने जो जो किया है वह आश्चर्य ही है। हजारों सैनिकों के बीच में 5-5 सिक्खों का जत्था निकलता था और लगभग सबको मार कर वलिदान होता था। 18 वर्ष के साहबजादे अजीत सिंह जी और 14 वर्ष के साहबजादे जुझार सिंह जी भी अपने जत्थों के साथ निकले और बिना घबड़ाये हजारों को काट कर स्वयं का बलिदान दे दिया। आसमान रो रहा था, और हवेली की छत से अपने बेटों के अद्भुत शौर्य देख कर पिता गर्व से खिल रहा था।
जब केवल दस बचे थे तो सबने कहा, आप निकलिए गुरुजी! पंथ के लिए आपका निकलना आवश्यक है। लाशों के बीच निकलते भाई दया सिंह जी ने कहा, गुरुजी रुकिये! तनिक साहबजादे के शव को अपनी चादर से ढक दूँ।
गुरुजी ने कहा, तुम्हारे पास छत्तीस चादरें हैं? अगर मेरे छत्तीस साहबजादों के शव पर चादर डाल सकते हो तो डाल दो, नहीं तो साहबजादे अजीत सिंह और जुझार सिंह के शव भी अन्य सिक्खों की तरह खाली ही रहेंगे।। इस मिट्टी को याद रहना चाहिए कि उसके लिए उसके बच्चों ने कैसी कुर्बानी दी है।
पाँच दिनों बाद गुरुजी को पता चला, माता गुजरी के साथ गए दोनों छोटे साहबजादों को मुगलों ने पकड़ लिया था और वे सरहिंद के नवाब के यहाँ कैद थे…
बताया गया कि नवाब ने कचहरी में छोटे साहबजादों से बार-बार कहा, ” धर्म बदल लो तो जान बख्स दी जाएगी… 7 वर्ष के जोरावर सिंह जी और 5 वर्ष के फतेह सिंह बार-बार उनकी बात काट कर कहते रहे- जो बोले सो निहाल, सतश्री अकाल…” क्रुद्ध नवाब ने उन्हें एक ठंडे कमरे में कैद कर दिया, जहां उनके शरीर पर कोई कपड़ा भी नहीं था।
दोनों छोटे बच्चे नहीं टूटे तो अगले दिन उन्हें दीवाल में चुनवा देने का हुक्म दिया गया। दीवाल में चुनवाने का मतलब जानते हैं? बच्चों को खड़ा कर उनके चारों तरफ मसाले से ईंट थाप दी गयी। बच्चे मरे पर डरे नहीं… दीवाल गर्दन तक पहुँची तबतक दोनों बेहोश हो गए थे। फिर उन्हें बाहर निकाल कर गला…. शायद वह 27 दिसम्बर था।
बड़े साहबजादों के बलिदान ने पिता की कमर तोड़ दी थी, छोटे साहबजादों के बलिदान ने पिता का हृदय तोड़ दिया… सात दिनों के अंदर राष्ट्र के लिए अपने चारों बेटों की बलि दे चुके पिता देर तक शून्य में देखते रहे। किससे कहें, क्या कहें….
बहुत देर बात मुख से कुछ शब्द फूटे, ” ईश्वर! तू देख रहा है न? तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा…”
बस तीन सौ वर्ष ही तो बीते हैं उस दिन को… अधिकांश लोग भूल गए! हम बेईमानों की यादाश्त कमजोर होती है। अब तो बजीर खान दोस्त है…

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जरा याद करो कुर्बानी

सरदार उधम सिंह स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे ही जांबाज नौजवान थे जिन्होंने हंसते-हंसते मौत को गले लगाया था। उधम सिंह का जन्म आज ही के दिन यानी 26 दिसंबर 1899 को पटियाला में हुआ था।

उधम सिंह ने 13 अप्रैल 1919 को हुए जधन्य जलियावाला बाग नरसंहार को अपनी आंखों के सामने घटित होते देखा था और वहां की मिट्टी को हाथों में लेकर बदला लेने की कसम खाई थी। जलियावाला कांड का बदला उनके जीवन का लक्ष्य बन गया था। वे लगातार ताक में रहे और आखिर 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को उन्हें सफलता मिली।

उन्होंने इंग्लैड की ज़मीन पर रायल सेंट्रल एशियन सोसाइटी की मीटिंग के दौरान भरी सभा में जलियावाला कांड के दोषी माइकल ओ डायर को गोली मारकर ढेर कर दिया था। वे एक किताब के अंदर रिवाल्वर छुपाकर ले गए थे। वे चाहते तो इस घटना को अंजाम देने के बाद वहां से निकल सकते थे लेकिन वे अपनी रिवाल्वर लहराते वहीं खड़े रहे। अपनी गिरफ्तारी दी और फांसी के फंदे पर झूल गए। दरअसल वे भारतीयों के आत्म-सम्मान को झकझोरना चाहते थे। उनके अंदर आजादी की आकांक्षा को जागृत करना चाहते थे।

उधम सिंह क्रांतिकारियों के संपर्क में रहते थे और अमर शहीद भगत सिंह को अपना गुरु और आदर्श मानते थे। उधम सिंह का जन्म पटियाला में एक साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता टहल सिंह एक रेलवे क्रासिंग के चौकीदार थे। लेकिन मात्र सात वर्ष की आयु में माता-पिता का साया उधम सिंह के सर से उठ गया। बड़े भाई मुक्ता सिंह के साथ उनका प्रारंभिक जीवन केंद्रीय खालसा अनाथालय में गुजरा। 1917 में बड़े भाई का भी देहांत हो गया। उधम सिंह दुनिया में अकेले रह गए। भाई के देहांत के एक साल बाद 1918 में उन्होंने मैट्रिक किया और अनाथालय छोड़ दिया। इसके एक साल बाद 13 अप्रैल 1919 को उनके जीवन को झकझोरने वाली घटना घटित हुई।

वह बैसाखी का दिन था जब जनरल डायर के आदेश पर जलियावाला बाग के सभी दरवाजे बंद कर दिए गए और बाग में मौजूद निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई गईं। देखते-देखते वहां हजारों लोगों की लाशें बिछ गईं। उनमें मासूम बच्चे, महिलाएं, बूढ़े, नौजवान सभी आयुवर्ग के लोग शामिल थे। उधम सिंह भी बाग में मौजूद थे। उन्होंने अपनी आंखों के सामने इस भीषण अमानुषिक नरसंहार को देखा। उनका खून खौल उठा था और उन्होंने उसी समय बाग की मिट्टी उठाकर बदला लेने की कसम खाई थी। हालांकि भारी सुरक्षा के बीच रहने वाले डायर को मारना इतना आसान नहीं था। लेकिन वे इसी धुन में लगे रहे।

उधम सिंह ने 1920 ईं में अमेरिका की यात्रा की। वहां बब्बर खालसा आंदोलन से जुड़े लोगों से मिले। भारत लौटने के बाद अमृतसर पुलिस ने उन्हें बिना लाइसेंस के पिस्तौल के साथ पकड़ा और चार साल के लिए जेल में डलवा दिया। जेल से छूटने के बाद भी पुलिस उनके पीछे लगी रही। कुछ दिनों तक वे नाम बदलकर अमृतसर में रहे। 1935 में कश्मीर में वे भगत सिंह की तस्वीर रखने के कारण संदेह के आधार पर गिरफ्तार कर लिए गए। 30 के दशक में वे इंग्लैंड चले गए और बदला लेने के सही मौके की ताक में रहने लगे। अंततः उन्हें 10 साल बाद मौका मिला। उन्होंने माइकल ओ डायर को गोली मारकर ढेर कर दिया। अदालती कार्यवाही के बाद 31 जुलाई 1940 को लंदन में ही उन्हें फांसी की सजा दे दी गई।

उधम सिंह के क्रांतिकारी जज्बे को देशवासियों की ओर से क्रांतिकारी नमन।

हार्दिक कुमार

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સ્પર્શ નો સંબંધ


સ્પર્ષનો_સંબંધ

ભણવાનું પુરું કરીને અદિતિ મહિલા વકીલ મીના સહાયની મદદનીશ તરીકે ગોઠવાઈ ગઈ.. અને એની મહિલા જાગૃતિ ચળવળમાં પણ ભાગ લેવા લાગી..
જ્યારે વિશ્વા માનસશાસ્ત્રમાં સ્નાતક થઈ , ને પરણીને ગૃહિણી બની ગઈ.. છતાં એ બન્ને બેનપણીઓ ક્યારેક ક્યારેક મળતી રહેતી..
એક દિવસ બપોર બાદ અદિતિ વિશ્વાને ઘરે ગઈ..
” વિશ્વા , આજે અમારી સંસ્થાએ એક મહિલાહાટ રાખ્યો છે.. મહિલાઓએ બનાવેલી ઘણી ચીજ વસ્તુ જોવા મળશે.. હું તને લેવા આવી છું..”
વિશ્વાએ સાસુને પુછ્યું.. એ બોલ્યા.. ” મુન્નો જાગશે તો રડશે.. ભુખ્યો થશે તો હું શું કરીશ..?”
” હું એનું પેટ ભરાવીને જાઉં છું.. બહુ વાર નહીં લગાડું.. જલ્દી પાછી આવી જઈશ.. મમ્મી , જવા દોને..”
” તો જા.. પણ બહુ મોડું ના કરતી..”
વિશ્વા તૈયાર થઈને આવી.. સાસુ સામે હસીને હાથ ધર્યો.. સાસુએ થોડી નોટો એના હાથમાં મુકી..


એક દિવસ અચાનક બન્ને બગીચામાં ભેગી થઈ ગઈ.. પરચુરણ વાતો પછી અદિતિએ કહ્યું..
” તે દિવસે મને થોડું વિચિત્ર લાગ્યું.. મારી સાથે આવવા તારે સાસુની રજા લેવી પડી.. વાપરવાના પૈસા માંગવા પડ્યા.. આટલું બધું દબાઈને રહેવું પડે..?”
વિશ્વા હસી.. ” અદિ , અમે સાસુ વહુ નથી.. કંઈક બીજું છીએ .. શું છીએ , એ મને પણ સમજાતું નથી..” એમ કહીને એણે વાત માંડી..
” હું સાસરે આવી એને પંદર દિવસ જ થયા હતા.. રાકેશને ચાર દિવસ કંઈક તાલીમમાં જવાનું થયું.. એ ગયાને બીજે દિવસે મને તાવ ચડ્યો.. મમ્મી મને પડખેના દવાખાને લઈ ગયા.. રાતે મને થોડું વધારે અસુખ લાગ્યું.. પપ્પા ડોક્ટરને બોલાવી લાવ્યા..
ડોક્ટર ગયા પછી મમ્મી મારી પાસે બેઠા.. હળવે હળવે માથું દાબવા લાગ્યા.. કપાળ , માથા પર ફરતો હાથ મને ગમતો હતો.. મેં એના ખોળામાં માથું રાખ્યું.. એનો હાથ પીઠ સુધી ફરવા માંડ્યો..
એણે પુછ્યુ.. ” તેં સાંજે થોડુંક જ ખાધું છે.. ભૂખ લાગી છે.. ? સફરજન કાપી દઉં..?”
મેં હા પાડી , એ સફરજન લાવ્યા.. મેં ફરીથી ખોળામાં માથું રાખ્યું.. એ નાના ટુકડા કરીને મોંમાં આપતા હતા.. હું ખાતી હતી..
મેં ખાતાં ખાતાં જ કહ્યું.. ” હું નાની હતી ત્યારે એકવાર તાવ આવ્યો હતો.. તે વખતે મારી મમ્મી મને આમ ખવડાવતા..”
” તો હું તારી કોણ છું..?” એણે મને પુછ્યું..
” અદિતિ , એ દિવસથી અમારા સંબંધો સાવ ફરી ગયા.. નિશાળે જતી વખતે મમ્મી પાસે પૈસા માંગતી, તેમ સાસુ પાસે હાથ ધરીને પૈસા માંગવાનું મને ગમે છે.. એની સાથે બચપણ જેવી મસ્તી કરવાની હવે તો ટેવ પડી ગઈ છે..”
અદિતિ હજી કુંવારી હતી.. એનાથી પુછાઈ ગયું.. ” હેં.. ખરેખર.. સાસુ આવી પણ હોય..?”

  • જયંતીલાલ ચૌહાણ ૨૨ – ૧૨ – ૨૧
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टोडरमलजी


राजा रायसल दरबारी खंडेला के 12 पुत्रों को जागीर में अलग अलग ठिकाने मिले और यही से शेखावतों की विभिन्न शाखाओं का जन्म हुआ। इन्ही के पुत्रों में से एक ठाकुर भोजराज जी को उदयपुरवाटी जागीर के रूप में मिली। इन्ही के वंशज ‘भोजराज जी के शेखावत” कहलाते है।

भोजराज जी के पश्चात उनके पुत्र टोडरमल उदयपुर (शेखावाटी)के स्वामी बने,टोडरमल जी दानशीलता के लिए इतिहास विख्यात है,टोडरमलजी के पुत्रों में से एक झुंझार सिंह थे,झुंझार सिंह सबसे वीर प्रतापी निडर कुशल योद्धा थे, तत्कालीन समय “केड” गाँव पर नवाब का शासन था,नवाब की बढती ताकत से टोडरमल जी चिंतित हुए।

परन्तु वो काफी वृद्ध हो चुके थे। इसलिए केड पर अधिकार नहीं कर पाए। कहते है टोडरमल जी मृत्यु शय्या पर थे लेकिन मन्न में एक बैचेनी उन्हें हर समय खटकती थी,इसके चलते उनके पैर सीधे नहीं हो रहे थे। वीर पुत्र झुंझार सिंह ने अपने पिता से इसका कारण पुछा।

टोडरमल जी ने कहा “बेटा पैर सीधे कैसे करू,इनके केड अड़ रही है”(अर्थात केड पर अधिकार किये बिना मुझे शांति नहीं मिलेगी)। पिता की अंतिम इच्छा सुनकर वीर क्षत्रिये पुत्र भला चुप कैसे बैठ सकता था?

झुंझार सिंह अपने नाम के अनुरूप वीर योद्धा,पित्रभक्त थे !उन्होंने तुरंत केड पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में उन्होंने केड को बुरी तरह तहस नहस कर दिया। जलते हुए केड की लपटों के उठते धुएं को देखकर टोडरमल जी को परमशांति का अनुभव हुआ,और उन्होंने स्वर्गलोक का रुख किया।

इन्ही झुंझार सिंह ने अपनी प्रिय ठकुरानी गौड़जी के नाम पर “गुढ़ा गौड़जी का” बसाया। तत्कालीन समय में इस क्षेत्र में चोरों का आतंक था, झुंझार सिंह ने चोरों के आतंक से इस क्षेत्र को मुक्त कराया। किसी कवि का ये दोहा आज भी उस वीर पुरुष की यशोगाथा को बखूबी बयां कर रहा है-

डूंगर बांको है गुडहो,रन बांको झुंझार,
एक अली के कारण, मारया पञ्च हजार!!🚩