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बाबा विश्वनाथ


बाबा विश्वनाथ के नवीन प्रांगण को देखकर फारसी भाषा में लिखे गए कुल्लियात-ए-बरहमन नामक औरंगजेब कालीन दस्तावेज में दर्ज एक बूढ़े ब्राह्मण से जुड़ी घटना फिर से कागज़ों से बाहर झांकने लगी है । संभवतः इसका प्रामाणिक उल्लेख काशी का इतिहास नामक ग्रंथ में अथवा कुबेर शुकुल द्वारा लिखित वाराणसी इतिहास-वैभव में मिलता है।

कथा के अनुसार, ईस्वी सन् 1669 में अप्रैल महीने की 18 तारीक को औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर को ज़मींदोज़ करने का फरमान जारी किया। इसके पहले अविमुक्तेश्वर काशीविश्वनाथ मंदिर तोड़ने की शुरूआत मुहम्मद गोरी ने की थी। ई. सन1194 में पहली बार कुतुबुद्दीन ऐबक ने मुहम्मद गोरी के आदेश पर विश्वनाथ जी के मंदिर समेत एक हजार से ज्यादा मंदिरों को ध्वस्त करते हुए पूरे उत्तर भारत को बरबाद कर रख दिया। लाखों लोगों का कत्लेआम हुआ। यही समय था कि पृथ्वीराज चौहान और जयचंद आपसी कटुता में खुद के साथ देश की राजनीति का सारा दांव मुस्लिम हमलावरों के सामने हार चुके थे। इस्लाम की खूनी तलवार ई. सन 1002-1024 के दरम्यान सोमनाथ मंदिर को पूरी तरह से कई बार लूटमारकर ध्वस्त कर चुकी थी। सौराष्ट्र, गुजरात में यह खूनी खेल पूरा कर चुकने के करीब 170 साल बाद गंगा के मैदान में चारों ओर रक्त ही रक्त फैल गया था। जिंदा रहने की एक आस बची, और कुछ भी तो नहीं बचा।

फिर तो आने वाली हर सदी में मानो एक खेल हो गया। गणराज्य बार बार इस्लाम की खूनी तलवार से भिड़ते रहे। कटते रहे, लड़ते रहे लेकिन गिरकर भी फिर फिर उठने की जिजीविषा खत्म नहीं हुई। यही कारण है कि काशी में विश्वनाथ जी मौका देखते ही फिर से मौके पर अपनी जगह बना लेते थे, टूटने और बनने का सिलसिला हर सदी और दशक में चलने लगा। दिल्ली और आगरे में इंतजामों से इस्लाम की सियासी तलवार को जब भी फुरसत मिलती, वह फिर से विश्वनाथ मंदिर समेत हर मंदिर को ज़मींदोज करने में कसर नहीं छोड़ते। कुतुबुद्दीन के बाद रजिया सुल्तान, फिर खिलजी, उसके बाद फिरोज तुगलक(1351-1388), उसके बाद शरकी बादशाहों ने, फिर सिकन्दर लोदी( ई.1494) आदि ने वाराणसी समेत उत्तर भारत को तहस-नहस कर सारे बड़े केंद्रों को बरबाद कर डाला।

वो बार-बार तोड़ते जाते थे लेकिन हार न मानने वाला समाज और उसका नेतृत्व हर बार मौका देखते ही विश्वनाथ मंदिर को मिट्टी से उठाकर फिर से उसका ध्वज आसमान तक तान देते थे। अस्तित्व बचाने के इस विकट संघर्ष में अकबर का समय ही अपवाद था। अकबर के समय ईस्वी सन 1580-85 के आस-पास राजा मान सिंह और राजा टोडरमल ने विश्वनाथ मंदिर का भव्यतम मंदिर शिखर फिर से वहीं पर खड़ा कर दिया, जहां आज ज्ञानवापी मस्जिद है। मस्जिद के पीछे के मंदिर के खंडहर मानसिंह और टोडरमल के बनाए मंदिर के प्राचीन अवशेष हैं। लेकिन यह शिखर भी लंबे समय तक मुस्लिम सूबेदारों को सहन नहीं हुआ। औरगंजेब के समय 18 अप्रैल 1669 ई. सन में मुगलिया स्टेट यानी सरकार के द्वारा दिया गया ये छठवां आदेश था कि विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त कर दिया जाए।

और सूबेदार ने बेहद तेजी दिखाते हुए ध्वस्तीकरण का सारा काम फरमान के मुताबिक पूरा कर दिया। हजारों निरपराध हिन्दुओं का कत्लेआम करते हुए सूबेदार ने माधवराव का धौरहरा, काशी विश्वनाथ समेत बिन्दु माधव का धौरहरा और हरतीरथ में एक अन्य भव्य मंदिर तोड़कर आलमगीर के नाम से तीन-तीन मस्जिदों का निर्माण पूरा कर दिया। इस काम की पूरी विस्तृत खबर सूबेदार ने जहांपनाह की खिदमत में लिखकर भेज दी। 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को दरबार में पूरी सूचना मिली कि सरकार के आदेशानुसार, उसके अमलों ने विश्वनाथ मंदिर समेत पूरा शहर ही नेस्तनाबूद कर दिया है।

खबर सुनकर औरंगजेब खुशी से फूला न समाया। उस समय औरंगजेब के दरबार में एक बूढ़े 80-90 साल के ब्राह्मण जिनका असल नाम चंद्रभानु था और उन्हें जहांगीर, शाहजहां के समय से दरबार में फारसी शेरो शायरी और साहित्य आदि के सिलसिले में रखा गया था। औरंगजेब के समय भी वह दरबार में फारसी खतो-किताबत में जुटे रहते थे किन्तु धरम के पक्के थे। 90 साल की उम्र थी, मौत का कोई भय भी नहीं था। दरबार के कितने ही हाकिम उन्हें मुसलमान बना पाने में नाकाम थे, इसीलिए औरंगजेब हमेशा उन्हें चिढ़ाने के लिए कुछ ना कुछ व्यंग्य बोलता था।

काशी विश्वनाथ की जगह मस्जिद तामीर की खबर पाते ही इन्हीं बरहमन से औरंगजेब ने उछलते हुए पूछा-‘अरे बरहमन, तुम्हारे काशी विश्वनाथ की जगह अब मस्जिदे आलमगीर बन चुकी है। अपने विश्वनाथ के बारे में अब तुम्हारा क्या ख्याल है?’ उस बूढ़े ब्राह्मण ने बेधड़क उत्तर दिया-‘जहांपनाह शेर हाजिर है, आपका हुक्म हो तो अर्ज कर दूं।’ औरंगजेब का हुक्म मिलते ही बरहमन फारसी भाषा में ही भरे दरबार में गरज उठे-

बेबीन करामातेबुतखान-ए-मरा ऐ शेख, कि चूं खराबशवद खान-ए-खुदा गरदद। (कुल्लियात-ए- बरहमन से उद्धृत)

अर्थात, ऐ शेख, हमारे विश्वनाथ का यह कौतुक तो देखिए कि उनके हट जाने पर ही आपके खुदा की वहां तक पहुंच हो पाई। जहांपनाह ये समझ लें कि उस जमीन पर विश्वनाथ के मौजूद रहते पहुंचने की हिम्मत खुदा में है ही नहीं।

बरहमन की बात सुनते ही औरगंजेब गुस्से में दांत पीसने लगा। उसके कारिंदे बरहमन को घूरने लगे। कितनों की मुट्ठियां म्यान के हत्थे से टकरा उठीं कि अब नहीं तब बादशाह का आदेश हो।
बरहमन को लेकिन मौत का भय नहीं था। बोलते रहे कि-एक दिन आएगा और देख लीजिएगा कि विश्वनाथ फिर से अपनी जगह आ विराजेंगे और आपके खुदा उनकी ओर देखकर शरम से मुंह चुराते घूमेंगे। और जो तोड़ना है तो तोड़ते रहिए। मुझ बूढ़े को चिढ़ाना बंद कर दीजिए। क्योंकि आपके बापजान शाहजहां साहेब भी अक्सर मुझे ऐसे ही चिढ़ाते थे, लेकिन उनका क्या हुआ? आपसे बेहतर कौन जानता है। तब भी मैंने उनसे कहा था-

मरा दिलेस्त बकुफ्रआश्ना कि सदबारश, बकाबा बर्दम व बाजश बरहमन आबुर्दम।। (कुल्लियात-ए- बरहमन)
यानि कि मेरा दिल मेरे हिन्दू धर्म में इतना डूबा हुआ है कि यदि सौ बार काबा जाऊं तो भी वहां से ब्राह्मण रहकर ही लौटूंगा। मुझे मुसलमान बनाकर काबा भेजने की कोशिश मत करिए। काबा जाऊंगा तो भी जाने कब लौटकर विश्वनाथ की शरण में ही चला जाऊंगा।

फिर क्या था। औरंगजेब दांत पीसता हुआ भरे दरबार से उठकर चला गया। चाहता तो एक 90 साल के बूढ़े बरहमन की गर्दन धड़ से उड़वा सकता था लेकिन संभवतः उसे अहसास हो गया था कि तलवार की धारों और अत्याचारों से यह धर्म झुकने वाला नहीं। जिस विश्वनाथ को मानने वाले ऐसे निडर आस्था से भरे लोग हैं तो फिर इस सनातन हिन्दू धर्म और इनके भगवान विश्वनाथ को तलवार की धार से मिटा पाना किसी भी भांति संभव नहीं है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कलश में गंगाजल भरकर भगवान विश्वनाथ के भव्य प्रांगण की ओर बढ़ते सबने देखा। सबका मनआंगन आनन्द से भर उठा।

गर्भगृह में पंडितों ने उन्हें इस महानतम ऐतिहासिक कार्य के लिए शुभकामनाएं दीं। प्रधानमंत्री ने भी विनत भाव से बाबा भोलेनाथ की ओर संकेत कर दिया। सब यही विश्वनाथ जी कर और करवा रहे हैं, इसमें मेरा कुछ नहीं है।

प्रधानमंत्री जी का यह विचार सुनते ही मुझे महाभारत का एक बहुत ही महत्व का आख्यान याद आ गया। यह आख्यान भगवान विश्वेश्वर काशी विश्वनाथ से ही जुड़ा बताया जाता है। द्रोण पर्व में इसका वर्णन आता है।

दरअसल, द्रोणाचार्य के मारे जाने के बाद आगबबूला द्रोणपुत्र महारथी अश्वत्थामा आपे में नहीं रहे। वह पाण्डवों की सेना पर वज्र बनकर बरस पड़े। उन्होंने ऐसे दिव्य आग्नेय अस्त्र अर्जुन और उनकी सेना पर फेंके जो कि अकाट्य थे, और किसी का भी जान बचा पाना मुश्किल था। अर्जुन ने किसी तरह से उस हमले में अपनी और सेना के प्रमुख योद्धाओं की जान बचाई।

रात में अर्जुन जब अगले दिन के युद्ध की योजना बना रहे थे तो उन्हें बार बार दिन के युद्ध की स्मृति हो आती। वह हैरान व परेशान थे कि आखिर उनकी जान कैसे बच गई क्योंकि हमला भयानक और खतरनाक था। वह सोच में पड़े थे कि तभी महर्षि वेदव्यास मिलने आ पहुंचे। अर्जुन ने तब अश्वत्थामा के शस्त्र प्रयोग के बारे में महर्षि को जानकारी देते हुए एक आश्चर्यजनक अनुभव साझा किया।

अर्जुन ने भगवान वेदव्यास को बताया कि -गुरुदेव जब मैं युद्धभूमि में चारों ओर से घिर गया था तब मैंने देखा कि एक अग्नि के समान तेजस्वी पुरुष मेरे आगे आगे हाथ में जलता हुआ त्रिशूल लेकर चल रहा है।

अर्जुन जैसे कोई स्वप्न सुना रहा था कि मैं जिस दिशा में कौरवों को रोकने बढ़ता कि वह ज्योतिर्मय पुरुष पहले ही मैदान साफ कर देता था। उसके पैर पृथ्वी पर नहीं थे, उसका त्रिशूल उनसे कभी अलग नहीं होता था, उनके एक त्रिशूल से हजारों त्रिशूल निकलकर शत्रू सेना पर कहर ढा रहे थे।

हे व्यासजी सच कहता हूं कि लोगों को लग रहा था कि मैं शत्रुओं को मार रहा हूं लेकिन असल में तो मैं अवाक् होकर उस ज्योतिर्मय सूर्य से भी ज्यादा प्रखर उस पुरुष को ही देख रहा था, मैं तो केवल उनके पीछे पीछे चल रहा था, वह आगे आगे चलकर मेरे सारे शत्रुओं का सर्वनाश कर रहे थे। उन्होंने ही मुझे अश्वत्थामा के शस्त्रों से बचा लिया। वह कौन थे, मैं नहीं जान सका।

हे भगवान व्यास जी, मुझे बताइए कि आखिर वह महापुरुष कौन थे? कहां से आए थे, क्यों आए थे? जैसे मेरे धनुष और बाणों की दिशा वही तय कर रहे थे, अरे वही तो सब कर रहे थे, वो कौन थे।

अर्जुन ने जो कहा, उसे व्यासमुनि ने द्रोण पर्व में ज्यों का त्यों दर्ज किया था।
अग्रतो लक्षये यान्तं पुरुषं पावकप्रभम्।…ज्वलन्तं शूलमुद्यम्य यां दिशं प्रतिपद्यते। तस्यां दिशि विदीर्यन्ते शत्रवो मे महामुुने।..

अर्थात..मेरे आगे आगे वह अग्नि जैसे विराट पुरुष चल रहे थे…जिनका जलता त्रिशूल जिधर जाता, उधर ही शत्रूसेना साफ हो जाती थी…

को वै स पुरुषोत्तमः। शूलपाणिर्मया दृष्टस्तेजसा सूर्यसंनिभः। न पदभ्यां स्पृशते भूमिं न च शूलं विमुञ्चति…।।

आखिर वह महापुरुष कौन थे। हे व्यासजी, मैंने उस अग्निमय महापुरुष के हाथ में में जलता त्रिशूल देखा था, उनके पैर भूमि पर नहीं थे, त्रिशूल से हजारों त्रिशूल निकलकर शत्रुओँ को समाप्त कर रहे थे…वह मेरे आगे थे, मैं तो कुछ कर ही नहीं रहा था, सब कुछ वही कर रहे थे, आखिर वो कौन थे।

भगवान वेदव्यास ने बड़े भाव से हैरान हुए अर्जुन को देखा, मन ही मन बुदबुदाने लगे, अरे तुमने नहीं पहचाना, वही तो विश्वनाथ थे। कुछ देर तक अर्जुन की आंखों में झांककर फिर व्यासजी बोलने लगे कि अर्जुन, रणभूमि में जो तुम्हारे आगे आगे चलकर शत्रुओं का नाश कर रहे थे, वह साक्षात हर हर महादेव थे…। वह वही विश्वेश्वर महादेव थे…।..वह साक्षात वही शंकर थे जो श्मशानभूमि काशीपुरी में निवास करते हैं…।

महादेवं हरं स्थाणु वरदं…।.विश्वेश्वरम् विश्वनरं कर्मणामीश्वरं प्रभुम…। स महादेवः पूज्यमानो महेश्वरः…। दृष्टवानसि शंकरम्..।..एष चैव श्मशानेषु देवो वसति नित्यशः।।
हरहर महादेव हैं वो, विश्वेश्वर विश्वनाथ, सब कर्मों के ईश्वर मेरे प्रभु वही महादेव, सब देवों के देव, पूज्य वही महेश्वर जिन्हें यह संसार शंकर के नाम से देखता और जानता है, वही जो काशीपुरी के महाश्मशान में निवास करते हैं।…अर्जुन समझ लो कि कौन तुम्हारे साथ युद्धभूमि में खड़ा था।

भगवान वेदव्यास ने अर्जुन को बताया कि तुम्हारी विजय के लिए भोलेनाथ साक्षात रणभूमि में उतर पड़े हैं। इस संग्राम में जो तुम्हारे सामने शत्रुओँ का कोई वश नहीं चल पा रहा है तो ये पिनाकधारी भगवान महादेव ही तुम्हारे आगे आगे चल रहे हैं।

एष देवो महादेवो योअसौ पार्थ तवाग्रतः। संग्रामे शात्रवान् निघ्नंस्त्वया दृष्टः पिनाकधृक्।।।
अरे, वह महादेव तेरे आगे आगे चल रहे हैं अर्जुन। वही पिनाक धनुष को धारण करने वाले, संग्राम में सारे शत्रुओँ का विनाश करने वाले, उन्हीं महादेव की अर्चना करो अर्जुन।

काशी विश्वेश्वर महादेव विश्वनाथ की महिमा का यह संकेत भगवान वेदव्यास ने महाभारत के द्रोणपर्व में संकेतों में किया है। वेदव्यास ने अर्जुन को कहा कि जहां धर्म है वहीं महादेव हैं, श्रीकृष्ण तो है हीं, जो साक्षात तुम्हारा मार्गदर्शन कर रहे हैं। तुम निर्भीक होकर रणभूमि में पराक्रम करो।

गच्छ युद्धयस्व कौन्तेय न तवास्ति पराजयः। यस्य मन्त्री च गोप्ता च पार्श्वस्थो हि जनार्दनः।।।
जाओ कुन्तीपुत्र, जाकर युद्ध करो, अब तुम्हारी पराजय नहीं हो सकेगी क्योंकि साक्षात श्रीकृष्ण तुम्हारे साथ विराजमान है…और महादेव शिव तुम्हारे आगे आगे चल ही रहे हैं जो चराचर जगत के कारण और स्वामी हैं…। चराचरस्य जगतः प्रभुः स भगवान हरः।। नमस्कुरुष्व कौन्तेय तस्मै शान्ताय वै सदा..।

स्पष्ट है कि काशी विश्वनाथ जब चाहते हैं, अपनी इच्छा से हर खेल पलट देते है। जैसे कि वह स्वयं अर्जुन के आगे आगे चलकर महाभारत का युद्ध लड़ रहे थे। अब किसी को अगर यही गलतफहमी है कि काशी विश्वनाथ केवल जीवन के अन्तकाल में ही याद किए जाते हैं तो उसे तत्काल अपनी बुद्धि दुरुस्त कर लेनी चाहिए। और जिन्होंने हिन्दू और हिन्दुत्व के वामपाठ को ही हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व का पैमाना मान रखा है, उन्हें क्या कहें? कहीं सचमुच ही तो शिव ने पहले ही बुद्धि विपरीतकर युद्ध एकतरफा तो नहीं कर दिया है? खैर, रणनीति ही महत्वपूर्ण होती है, वही पार लगाती है या फिर डुबा डालती है।

किन्तु यहां सवाल चुनावी रण में राजनीतिक लिहाज से सफलता के स्वप्न देखते हुए कुछ भी अंटशंट बकने का नहीं है, सवाल है कि सांस्कृतिक विषयों को राजनीतिक विषवमन से अलग क्यों नहीं रखा जा सकता? सदबुद्धि और विवेक क्यों इसी वक्त हमारे नेताओं का साथ छोड़कर दूर चला जाता है? जाहिर तौर पर ऐसे तत्वों को शिव के सम्मुख जाकर अपने पिताई और खुद की गलतबयानी और तीर्थ की अवहेलना पर पश्चाताप अवश्य प्रकट करना चाहिए ताकि सम्मानजनक हार मिल सके। गलतियों के लिए क्षमा याचना करनी चाहिए।

लेकिन क्या शिव मानेंगे और क्षमा प्रदान करेंगे? यह तो शिव ही जाने और सचमुच शिव ही जानते हैं क्योंकि वह तो सबके नाथ और विश्वनाथ हैं। कर्मों के अनुसार वह जीव के साथ रहते या उसका साथ छोड़ते हैं। और क्षमायाचना करने का समय भी तो अब कहां शेष है? चुनाव तो सर्वोपरि है ना।

जो भी हो, संकेत समझिए कि ज्योतिर्मय शिव तो अपने जलते त्रिशूल को लेकर आगे आगे चलने का संकेत दे रहे हैं। 2022, 2024, 2027 और 2029 का अब सवाल ही कहां है। इससे भी बड़ा सवाल हमारे सामने खड़ा है जिसमें उत्तर बनकर एक बीज पड़ा है।

यह तो अपने मन-आंगन में 2047 में स्वतंत्रता के 100 सालों की तस्वीर लेकर उग रहा और निरंतर बढ़ रहा यह भारत है। जितने घाव विगत एक हजार साल में शरीर पर लगे हैं, सबका परिमार्जन करते हुए सभी कुटिल चालों को ध्वस्त करने के लिए अग्निपथ पर निकल पड़ा यह भारत है।

किसी को भ्रम नहीं रहना चाहिए। आज से ठीक एक हजार साल पहले 1002 से 1024 तक आतंकी हमलावरों की जिहादी रक्तरंजित तलवार सोमनाथ से लेकर विश्वनाथ तक कहर ढा रही थी, तब शिव शांत भाव से सब सह रहे थे। लेकिन अब इतिहास की धारा उलट चुकी है, 2019 से 2021 के दो सालों में ही शिव भी काशी से कश्मीर तक कुछ करवट ले चुके हैं और कुछ अभी लेने वाले हैं। जाहिर है, इसके नतीजे कुछ ही वर्षों में काल के भाल पर भारत के उज्जवलतम रूप के साक्षी बनेंगे।

जबतक शिव की आंखें बंद और ध्यानमग्न थीं, जिसे जो करना व कहना था वो कर और कह रहा था, किन्तु अब आंखे खुल चुकी हैं, अब जो होगा, होने जा रहा है, समय चक्र ने ऐसी तस्वीर न देखी होगी। 13 दिसंबर 2021 की तारीख इतिहास में दर्ज हो चुकी है।

लेखक : प्रो.राकेश उपाध्याय, बीएचयू

Vijaykant Kant जी की वाल से।

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एकऔर झूठा


“अम्मा!.आपके बेटे ने मनीआर्डर भेजा है।”
डाकिया बाबू ने अम्मा को देखते अपनी साईकिल रोक दी। अपने आंखों पर चढ़े चश्मे को उतार आंचल से साफ कर वापस पहनती अम्मा की बूढ़ी आंखों में अचानक एक चमक सी आ गई..
“बेटा!.पहले जरा बात करवा दो।”
अम्मा ने उम्मीद भरी निगाहों से उसकी ओर देखा लेकिन उसने अम्मा को टालना चाहा..
“अम्मा!. इतना टाइम नहीं रहता है मेरे पास कि,. हर बार आपके बेटे से आपकी बात करवा सकूं।”
डाकिए ने अम्मा को अपनी जल्दबाजी बताना चाहा लेकिन अम्मा उससे चिरौरी करने लगी..
“बेटा!.बस थोड़ी देर की ही तो बात है।”
“अम्मा आप मुझसे हर बार बात करवाने की जिद ना किया करो!”
यह कहते हुए वह डाकिया रुपए अम्मा के हाथ में रखने से पहले अपने मोबाइल पर कोई नंबर डायल करने लगा..
“लो अम्मा!.बात कर लो लेकिन ज्यादा बात मत करना,.पैसे कटते हैं।”
उसने अपना मोबाइल अम्मा के हाथ में थमा दिया उसके हाथ से मोबाइल ले फोन पर बेटे से हाल-चाल लेती अम्मा मिनट भर बात कर ही संतुष्ट हो गई। उनके झुर्रीदार चेहरे पर मुस्कान छा गई।
“पूरे हजार रुपए हैं अम्मा!”
यह कहते हुए उस डाकिया ने सौ-सौ के दस नोट अम्मा की ओर बढ़ा दिए।
रुपए हाथ में ले गिनती करती अम्मा ने उसे ठहरने का इशारा किया..
“अब क्या हुआ अम्मा?”
“यह सौ रुपए रख लो बेटा!”
“क्यों अम्मा?” उसे आश्चर्य हुआ।
“हर महीने रुपए पहुंचाने के साथ-साथ तुम मेरे बेटे से मेरी बात भी करवा देते हो,.कुछ तो खर्चा होता होगा ना!”
“अरे नहीं अम्मा!.रहने दीजिए।”
वह लाख मना करता रहा लेकिन अम्मा ने जबरदस्ती उसकी मुट्ठी में सौ रुपए थमा दिए और वह वहां से वापस जाने को मुड़ गया।
अपने घर में अकेली रहने वाली अम्मा भी उसे ढेरों आशीर्वाद देती अपनी देहरी के भीतर चली गई।
वह डाकिया अभी कुछ कदम ही वहां से आगे बढ़ा था कि किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा..
उसने पीछे मुड़कर देखा तो उस कस्बे में उसके जान पहचान का एक चेहरा सामने खड़ा था।
मोबाइल फोन की दुकान चलाने वाले रामप्रवेश को सामने पाकर वह हैरान हुआ..
“भाई साहब आप यहां कैसे?. आप तो अभी अपनी दुकान पर होते हैं ना?”
“मैं यहां किसी से मिलने आया था!.लेकिन मुझे आपसे कुछ पूछना है।”
रामप्रवेश की निगाहें उस डाकिए के चेहरे पर टिक गई..
“जी पूछिए भाई साहब!”
“भाई!.आप हर महीने ऐसा क्यों करते हैं?”
“मैंने क्या किया है भाई साहब?”
रामप्रवेश के सवालिया निगाहों का सामना करता वह डाकिया तनिक घबरा गया।
“हर महीने आप इस अम्मा को भी अपनी जेब से रुपए भी देते हैं और मुझे फोन पर इनसे इनका बेटा बन कर बात करने के लिए भी रुपए देते हैं!.ऐसा क्यों?”
रामप्रवेश का सवाल सुनकर डाकिया थोड़ी देर के लिए सकपका गया!.
मानो अचानक उसका कोई बहुत बड़ा झूठ पकड़ा गया हो लेकिन अगले ही पल उसने सफाई दी..
“मैं रुपए इन्हें नहीं!.अपनी अम्मा को देता हूंँ।”
“मैं समझा नहीं?”
उस डाकिया की बात सुनकर रामप्रवेश हैरान हुआ लेकिन डाकिया आगे बताने लगा…
“इनका बेटा कहीं बाहर कमाने गया था और हर महीने अपनी अम्मा के लिए हजार रुपए का मनी ऑर्डर भेजता था लेकिन एक दिन मनी ऑर्डर की जगह इनके बेटे के एक दोस्त की चिट्ठी अम्मा के नाम आई थी।”
उस डाकिए की बात सुनते रामप्रवेश को जिज्ञासा हुई..
“कैसे चिट्ठी?.क्या लिखा था उस चिट्ठी में?”
“संक्रमण की वजह से उनके बेटे की जान चली गई!. अब वह नहीं रहा।”
“फिर क्या हुआ भाई?”
रामप्रवेश की जिज्ञासा दुगनी हो गई लेकिन डाकिए ने अपनी बात पूरी की..
“हर महीने चंद रुपयों का इंतजार और बेटे की कुशलता की उम्मीद करने वाली इस अम्मा को यह बताने की मेरी हिम्मत नहीं हुई!.मैं हर महीने अपनी तरफ से इनका मनीआर्डर ले आता हूंँ।”
“लेकिन यह तो आपकी अम्मा नहीं है ना?”
“मैं भी हर महीने हजार रुपए भेजता था अपनी अम्मा को!. लेकिन अब मेरी अम्मा भी कहां रही।” यह कहते हुए उस डाकिया की आंखें भर आई।
हर महीने उससे रुपए ले अम्मा से उनका बेटा बनकर बात करने वाला रामप्रवेश उस डाकिया का एक अजनबी अम्मा के प्रति आत्मिक स्नेह देख नि:शब्द रह गया।

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श्रीकाशी विश्वनाथ


ये कहानी है अहिल्या बाई होल्कर और श्रीकाशी विश्वनाथ की….. इसी कहानी में मोदी और श्रीकाशी विश्वनाथ धाम के विरोध का रहस्य छिपा है……..

विरोध केवल मोदी का ही नहीं हो रहा है और विरोध पहली बार ही हो रहा है ऐसा भी नहीं है।विरोध तो श्रीमंत मल्हार राव होल्कर और मातोश्री अहिल्याबाई होल्कर का भी हुआ था।

बुरा लग सकता है लेकिन आज लिखना आवश्यक है: 1735 में बाजीराव पेशवा की माँ राधाबाई तीर्थयात्रा पर काशी आईं।उनके लौटने के पश्चात ‘काशी के कलंक’ को मिटा देने के संकल्प के साथ पेशवा बाज़ीराव के सेनापति मल्हार राव होल्कर 1742 में गंगा के मैदानों में आगे बढ़ रहे थे। उस समय पेशवाओं की विजय पताका चहुँओर लहरा रही थी।काशी विश्वनाथ के मन्दिर की मुक्ति सुनिश्चित थी। 27 जून 1742 को मल्हार राव होल्कर जौनपुर तक आ चुके थे। उस समय काशी के कुछ तथाकथित प्रतिष्ठित लोग उनके पास पहुँच गए और कहा कि “आप तो मस्जिद को तोड़ देंगे लेकिन आप के चले जाने के बाद मुसलमानों से हमारी रक्षा कौन करेगा।” इस तरह बाबा की मुक्ति के बजाय स्वयं की सुरक्षा को ऊपर रखने वाले काशी के कुछ धूर्तों ने उन्हें वापस लौटा दिया। बाबा विश्वनाथ के मन्दिर की पुनर्स्थापना होती होती रह गई। मल्हार राव होल्कर लौट तो गए लेकिन उनके मन में कसक बनी रही। वही कसक और पीड़ा श्रीमन्त मल्हार राव होल्कर से उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई होल्कर को स्थानान्तरित हुई।

अहिल्याबाई के लिए उनके ससुर मल्हार राव होल्कर ही प्रेरणा थे क्योंकि अहिल्याबाई का जन्म किसी राजघराने में नहीं हुआ था। उनके पिता एक गाँव के सरपंच मात्र थे। एक दिन कुमारिका अहिल्या मंदिर में सेवा कर रही थी। भजन गाती और गरीबों को भोजन कराती अहिल्याबाई के उच्च कोटि के संस्कारों को मालवा के अधिपति मल्हारराव होल्कर ने देखा। उसी समय उन्होंने तय कर लिया कि अहिल्या ही उनके बेटे खाण्डेराव की पत्नी बनेंगी। वर्ष 1733 में अहिल्याबाई का विवाह खाण्डेराव होल्कर से हो गया। अहिल्याबाई की आयु 8 वर्ष थी। खाण्डेराव अहिल्याबाई से 2 साल बड़े थे।

सन 1754 में एक युद्ध के दौरान खाण्डेराव वीरगति को प्राप्त हो गए। अहिल्याबाई के जीवन में अंधेरा छा गया। अहिल्याबाई सती हो जाना चाहती थी किन्तु मल्हार राव ने अहिल्याबाई को न केवल सती होने से रोका बल्कि मानसिक तौर पर उन्हें मजबूत भी किया। शासन सञ्चालन के सूत्रों का प्रशिक्षण देकर मालवा का शासन सम्भालने के लिए तैयार किया। 1766 में मल्हार राव के मृत्योपरांत अहिल्याबाई होल्कर ने मालवा का शासन अपने हाथों में ले लिया।

काशी विश्वनाथ का मन्दिर महारानी अहिल्याबाई होल्कर की अमूल्य कीर्ति है। काशी के लिए अहिल्याबाई होल्कर का क्या योगदान है। इसे इतिहास का अवलोकन किए बिना नहीं समझा जा सकता।

आनन्दवन काशी को पहला आघात 1194 में लगा था। जब मोहम्मद गोरी के सिपहसलार क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने काशी विश्वनाथ समेत यहाँ के प्रमुख मंदिरों को तोड़ दिया। बाद के कालखण्डों में हुसैन शाह सिरकी (1447-1458) और सिकंदर लोधी (1489-1517) ने काशी विश्वनाथ और काशी के अन्य प्रमुख मंदिरों को तोड़ा। बार-बार काशी पर इस्लामिक हमलावर आघात करते रहे लेकिन शिवनगरी काशी पुनः पुनः हिन्दुत्व के अमृततत्व से सँवरती रही।

अकबर के कालखण्ड में काशी के जगतप्रसिद्ध धर्मगुरु पण्डित नारायण भट्ट की प्रेरणा से राजा टोडरमल ने 1585 में पुनः काशी विश्वनाथ के भव्य मंदिर का निर्माण कराया। हालाँकि इसमें अकबर का कोई योगदान नहीं था। यह बात इसलिए लिखनी पड़ रही है कि सुब्रह्मण्यम स्वामी ने अपने एक लेख में लिखा था और अभी फिर से लिखा है कि विश्वनाथ मंदिर के लिए अकबर ने धन दिया था।यह सच नहीं है। इसी मन्दिर को औरंगज़ेब के 18 अप्रेल 1669 के फ़रमान से तोड़ दिया गया। मन्दिर के ध्वस्त अवशेषों से ही उसी स्थान पर वर्तमान मस्जिद खड़ी कर दी गयी। पीछे की तरफ मन्दिर का कुछ हिस्सा छोड़ दिया गया ताकि इसे देख कर ग्लानि से हिन्दु रोते रहें।

काशी विश्वनाथ का मन्दिर ध्वस्त कर दिया गया था लेकिन 1669 से ही भग्नावशेष एवं स्थान की पूजा चलती रही। मुक्ति के विभिन्न प्रयास भी चलते रहे।

मंदिर का पुनर्निर्माण और भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा करना समस्त राजा महाराजाओं और संतों के सामने प्रश्नचिह्न बना हुआ था। काशी के तीर्थपुरोहितों की बहियों से ऐसा ज्ञात होता है कि 1676 ई. में रीवा नरेश महाराजा भावसिंह तथा बीकानेर के राजकुमार सुजानसिंह काशी आए थे। इन दोनों राजाओं ने मंदिर निर्माण की पहल तो की लेकिन सफल नहीं हो पाये। उन्होंने विश्वेश्वर के निकट ही शिवलिंगों को स्थापित अवश्य किया। इसी क्रम में मराठों के मंत्री नाना फड़नवीस के प्रयास भी असफल रहे। 1750 में जयपुर के महाराजा सवाई माधो सिंह ने परिसर की पूरी ज़मीन ख़रीद कर विश्वनाथ मंदिर के निर्माण की योजना बनायी जो कि परवान नहीं चढ़ सकी। 7 अगस्त 1770 को महादजी सिंधिया ने दिल्ली के बादशाह शाह आलम से मंदिर तोड़ने की क्षतिपूर्ति वसूल करने का आदेश जारी करा लिया परंतु तब तक काशी पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज हो गया था।यह योजना भी पूरी नहीं हो पायी।

इतने असफल प्रयासों के पश्चात अहिल्याबाई होलकर को सफलता प्राप्त हुई।अहिल्याबाई ने वह करके दिखा दिया जिसे समस्त हिन्दू राजा 111 वर्षों में नहीं कर सके थे।अहिल्या बाई के प्रयासों से 1777 से प्रारंभ होकर 1781 ई. में वर्तमान मंदिर का निर्माण मूल स्थान से दक्षिण की दिशा में थोड़ा हटकर भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पूर्ण हुआ।

महारानी अहिल्याबाई ने काशी विश्वनाथ मंदिर की स्थापना के साथ-साथ जो भी धार्मिक स्थल भग्नावस्था में थे, उन सभी को शास्त्रीय मर्यादाओं के साथ पुर्नस्थापित करवाया। वहाँ पूजा-पाठ नित्य होता रहे, इसकी व्यवस्था भी राजकीय कोष से करवायी।

किन्तु काशी ने उस समय भी महारानी का साथ नहीं दिया था। शिवलिंग की प्रतिष्ठा के लिए महारानी को माहेश्वर से पण्डितों बुलवाना पड़ा था। मन्दिर के लिए नित्य पुजारी को लेकर भी समस्या आयी। काशी का कोई ब्राह्मण पुजारी के पद पर कार्य करने को तैयार नहीं था। इसलिए काशी विश्वनाथ का पहला पुजारी तारापुर के एक भूमिहार ब्राह्मण को बनाया गया। ये प्रमाण आज भी इन्दौर के अभिलेखागार में सुरक्षित हैं।

मल्हार राव को मार्ग से भटकाने वाले और अहिल्या बाई का साथ न देने वालों धूर्तों के वंशज आज भी काशी में ही हैं। यही लोग वर्तमान में श्रीकाशी विश्वनाथ धाम का विरोध कर रहे हैं।

294 वर्षों के बाद नरेन्द्र मोदी ने अहिल्या बाई के अधूरे कार्यों को आगे बढ़ा कर उन्हें सच्ची श्रद्धाञ्जलि अर्पित की है। नए परिसर में मातोश्री की प्रतिमा स्थापित कर उनकी कीर्ति को सदैव के लिए अक्षय कर दिया है। तीन हज़ार वर्गफीट में सिमटा मन्दिर आज पाँच लाख वर्ग फ़ीट के भव्य परिसर में विस्तार ले चुका है। काशी की छाती पर खड़ा हुआ ‘कलंक’ एक कोने में सिमट चुका है। विश्व के नाथ को गलियों में सिमटा देख कर हृदय में ग्लानि लिए सदियों से रोता हिन्दू आज धाम के विस्तारीकरण से प्रफुल्लित है।गजवा-ए-हिंद का सपना देखने वाले मुग़लों के वंशजों को भी अब विश्वनाथ धाम के दरवाज़े से ही प्रवेश लेना होगा। नरेन्द्र मोदी अपना कार्य कर चुके। अब बचे हुए कार्य को पूरा करने की ज़िम्मेदारी हिन्दू समाज के कन्धों पर है।

गोविन्द शर्मा
संगठन मन्त्री, श्रीकाशी विद्वत्परिषद्

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देवी सुलोचना का सतीत्व


सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी थी। लक्ष्मण के साथ हुए एक भयं कर युद्ध में मेघनाद का वध हुआ। उसके कटे हुए शीश को भगवान श्री राम के शिविर में लाया गया था। अपने पति की मृत्यु का समाचार पाकर सुलोचना ने अपने ससुर रावण से श्री राम के पास जाकर पति का शीश लाने की प्रार्थना की, किंतु रावण इसके लिए तैयार नहीं हुआ। उसने सुलोचना से कहा कि वह स्वयं राम के पास जाकर मेघनाद का शीश ले आये, क्योंकि राम पुरुषोत्तम हैं, इसीलिए उनके पास जाने में तुम्हें किसी भी प्रकार का भय नहीं करना चाहिए। रावण के महापराक्रमी पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाद) का वध करने की प्रतिज्ञा लेकर लक्ष्मण जिस समय युद्ध भूमि में जाने के लिये प्रस्तुत हुए, तब श्री राम उनसे कहते हैं- “लक्ष्मण, रण में जाकर तुम अपनी वीरता और रण कौशल से रावण-पुत्र मेघनाद का वध कर दोगे, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है, परंतु एक बात का विशेष ध्यान रखना कि मेघनाद का मस्तक भूमि पर किसी भी प्रकार न गिरे, क्योंकि मेघनाद एक नारी-व्रत का पालक है और उसकी पत्नी परम पतिव्रता है। ऐसी साध्वी के पति का मस्तक अगर पृथ्वी पर गिर पड़ा तो हमारी सारी सेना का ध्वंस हो जाएगा और हमें युद्ध में विजय की आशा त्याग देनी पड़ेगी। लक्ष्मण अपनी सेना लेकर चल पड़े। समरभूमि में उन्होंने वैसा ही किया। युद्ध में अपने बाणों से उन्होंने मेघनाद का मस्तक उतार लिया, पर उसे पृथ्वी पर नहीं गिरने दिया। श्री हनुमान उस मस्तक को रघुनंदन के पास ले आये। इसी बीच मेघनाद की दाहिनी भुजा आकाश में उड़ती हुई उसकी पत्नी सुलोचना के पास जाकर गिरी। सुलोचना चकित हो गयी। दूसरे ही क्षण अन्यंत दु:ख से कातर होकर विलाप करने लगी। पर उसने भुजा को स्पर्श नहीं किया। उसने सोचा, सम्भव है यह भुजा किसी अन्य व्यक्ति की हो। ऐसी दशा में पर-पुरुष के स्पर्श का दोष मुझे लगेगा। निर्णय करने के लिये उसने भुजा से कहा- “यदि तू मेरे स्वामी की भुजा है, तो मेरे पतिव्रत की शक्ति से युद्ध का सारा वृतान्त लिख दे। भुजा में दासी ने लेखनी पकड़ा दी।लेखनी ने लिख दिया- “प्राणप्रिये, यह भुजा मेरी ही है। युद्ध भूमि में श्री राम के भाई लक्ष्मण से मेरा युद्ध हुआ। लक्ष्मण ने कई वर्षों से पत्नी, अन्न और निद्रा छोड़ रखी है। वे तेजस्वी तथा समस्त दैवी गुणों से सम्पन्न है। संग्राम में उनके साथ मेरी एक नहीं चली। अन्त में उन्हीं के बाणों से विद्ध होने से मेरा प्राणान्त हो गया। मेरा शीश श्रीराम के पास है।पति की भुजा-लिखित पंक्तियां पढ़ते ही सुलोचना व्याकुल हो गयी। पुत्र- वधु के विलाप को सुनकर लंकापति रावणने आकर कहा- ‘शोक न कर पुत्री। प्रात: होते ही सहस्त्रों मस्तक मेरे बाणों से कट-कट कर पृथ्वी पर लोट जाऐंगे। मैं रक्त की नदियां बहा दूंगा। करुण चीत्कार करती हुई सुलोचना बोली- “पर इससे मेरा क्या लाभ होगा, पिताजी। सहस्त्रों नहीं करोड़ों शीश भी मेरे स्वामी के शीश के अभाव की पूर्ति नहीं कर सकेंगे।सुलोचना ने निश्चय किया कि ‘मुझे अब सती हो जाना चाहिए।’ किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती? जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दिया- “देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो। जिस समाज में बाल ब्रह्मचारी हनुमान, परम जितेन्द्रिय लक्ष्मण तथा एकपत्नीव्रती भगवान श्री राम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।” सुलोचना के आने का समाचार सुनते ही श्रीराम खड़े हो गये और स्वयं चलकर सुलोचना के पास आये और बोले- “देवी, तुम्हारे पति विश्व के अन्यतम योद्धा और पराक्रमी थे। उनमें बहुत-से सदगुण थे; किंतु विधि की लिखी को कौन बदल सकता है?आज तुम्हें इस तरह देखकर मेरे मन में पीड़ा हो रही है। सुलोचना भगवान की स्तुति करने लगी।श्रीराम ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा- “देवी, मुझे लज्जित न करो। पतिव्रता की महिमा अपार है, उसकी शक्ति की तुलना नहीं है। मैं जानता हूँ कि तुम परम सती हो। तुम्हारे सतीत्व से तो विश्व भी थर्राता है। अपने स्वयं यहाँ आने का कारण बताओ, बताओ कि मैं तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ?सुलोचना ने अश्रुपूरित नयनों से प्रभु की ओर देखा और बोली- “राघवेन्द्र, मैं सती होने के लिये अपने पति का मस्तक लेने के लिये यहाँ पर आई हूँ।श्रीराम ने शीघ्र ही ससम्मान मेघनाद का शीश मंगवाया और सुलोचना को दे दिया। पति का छिन्न शीश देखते ही सुलोचना का हृदय अत्यधिक द्रवित हो गया। उसकी आंखें बड़े जोरों से बरसने लगीं। रोते-रोते उसने पास खड़े लक्ष्मण की ओर देखा और कहा- “सुमित्रानन्दन, तुम भूलकर भी गर्व मत करना की मेघनाथ का वध मैंने किया है। मेघनाद को धराशायी करने की शक्ति विश्व में किसी के पास नहीं थी। यह तो दो पतिव्रता नारियों का भाग्य था। आपकी पत्नी भी पतिव्रता हैं और मैं भी पति चरणों में अनुरक्ती रखने वाली उनकी अनन्य उपासिका हूँ। पर मेरे पति देव पतिव्रता नारी का अपहरण करने वाले पिता का अन्न खाते थे और उन्हीं के लिये युद्ध में उतरे थे, इसी से मेरे जीवन धन परलोक सिधारे।” सभी योद्धा सुलोचना को राम शिविर में देखकर चकित थे। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि सुलोचना को यह कैसे पता चला कि उसके पति का शीश भगवान राम के पास है। जिज्ञासा शान्त करने के लिये सुग्रीव ने पूछ ही लिया कि यह बात उन्हें कैसे ज्ञात हुई कि मेघनाद का शीश श्रीराम के शिविर में है। सुलोचना ने स्पष्टता से बता दिया- “मेरे पति की भुजा युद्ध भूमि से उड़ती हुई मेरे पास चली गयी थी। उसी ने लिखकर मुझे बता दिया।” व्यंग्य भरे शब्दों में सुग्रीव बोल उठे- “निष्प्राण भुजा यदि लिख सकती है फिर तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है। श्रीराम ने कहा- “व्यर्थ बातें मत करो मित्र। पतिव्रता के महाम्तय को तुम नहीं जानते। यदि वह चाहे तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है।श्री राम की मुखकृति देखकर सुलोचना उनके भावों को समझ गयी। उसने कहा- “यदि मैं मन, वचन और कर्म से पति को देवता मानती हूँ, तो मेरे पति का यह निर्जीव मस्तक हंस उठे।” सुलोचना की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि कटा हुआ मस्तक जोरों से हंसने लगा। यह देखकर सभी दंग रह गये। सभी ने पतिव्रता सुलोचना को प्रणाम किया। सभी पतिव्रता की महिमा से परिचित हो गये थे। चलते समय सुलोचना ने श्रीराम से प्रार्थना की- “भगवन, आज मेरे पति की अन्त्येष्टि क्रिया है और मैं उनकी सहचरी उनसे मिलने जा रही हूँ। अत: आज युद्ध बंद रहे। श्रीराम ने सुलोचना की प्रार्थना स्वीकार कर ली। सुलोचना पति का सिर लेकर वापस लंका आ गई। लंका में समुद्र के तट पर एक चंदन की चिता तैयार की गयी। पति का शीश गोद में लेकर सुलोचना चिता पर बैठी और धधकती हुई अग्नि में कुछ ही क्षणों में सती हो गई। ऐसी महान पतिव्रता नारी सुलोचना को कोटि कोटि नमन और वंदन। जय श्री राम।

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जातिवाद


एक रोज़ एक वेटनिरी डॉक्टर के मोबाईल पर कॉल आया। एक हाथी बीमार पड़ गया था। डॉक्टर साहब हाथी को देखने निकले ही थे के उनका 10 वर्षीय बेटा भी साथ जाने की ज़िद करने लगा। डॉक्टर साहब ने सुपुत्र को साथ ले लिया। हाथी का हाल चाल देख कर डॉक्टर साहब ने महावत को बुलाया और उसे कुछ दवाइयां लाने को कहा। डॉक्टर साहब के साथ आया सुपुत्र सुदूर खड़ा हाथी को देख रहा था। डॉक्टर साहब ने बेटे को हाथी के समीप आने को कहा। बेटे ने हाथी के समीप आने से इनकार कर दिया। डॉक्टर ने बेटे का हाथ पकड़ा और उसे हाथी के समीप ले आये। हाथी के पाँव की ओर इशारा करते हुये बोले…..” वह देखो। उसके पाँव में बेड़ियां जकड़ी हुई हैं। वह चाह कर भी हिल नहीं सकता ….जब हिलेगा नहीं तो तुम्हें चोट कैसे पहुंचायेगा।” यह सुन कर लड़का सरपट भागने लगा और तब तक भागता रहा जब तक हाथी उसकी आँखों से ओझल नहीं हो गया। डॉक्टर साहब भी लड़के के पीछे पीछे भागते रहे। लंबी दौड़ लगा कर लड़का रुक गया …..उसके पीछे दौड़ते पिता की भी सांस फूल गयी। डॉक्टर ने लड़के को क्रोध भरी नजरों से देखा और बोले….”कहा ना के उसके पाँव में बेड़ियां हैं। वह नहीं हिलेगा। फिर डर के क्यों भाग आये।” लड़के ने बाप की आखों में आँखें डाल कर कहा ……” बेड़ियां ……वह पतली सी ज़ंजीर। इतना बड़ा हाथी तो एक झटके में उन बेड़ियों को तोड़ देगा और फिर आपको और मुझे कुचल देगा।” बात तर्कपूर्ण रही। हाथी की अदम्य शक्ति के समक्ष उन बेड़ियों की क्या औकात थी। डॉक्टर मुस्कुराये। बेटे का हाथ पकड़ा और उसे महावत के घर की ओर ले गये। घर के पीछे हाथी का बच्चा बेड़ियों से बंधा हुआ था। लड़के ने देखा के हाथी का बच्चा बार बार बेड़ियों से निकलने का प्रयास कर रहा था लेकिन उसकी कद काठी और उसकी शक्ति बेड़ियां तोड़ने में नाकामयाब थी। डॉक्टर ने बेटे से कहा…..”ध्यान से देख। वही बेड़ियां हैं। वही जंजीरें हैं। हाथी के बच्चे को काबू में करने के लिये बाल्यकाल से ही उसे जड़क दिया जाता है। वह कुछ दिन छटपटाता है…..फिर वह बेड़ियों का आदि हो जाता है। फिर उसे लगने लगता है के जंजीर के आगे उसकी शक्ति कम है। तभी से वह ज़ंजीर को अपने ऊपर हावी कर लेता है।”डॉक्टर ने लड़के का हाथ पकड़ा और उसे पुनः विशालकाय हाथी की ओर ले गये। उन्होंने पुनः पैर की बेड़ियों की ओर इशारा किया और बोले ….”तुमने सही पहचाना। हाथी अपनी शक्ति से पाँव झटक भी दे तो इन बेड़ियों को तहस नहस कर देगा। लेकिन यह बेड़ियां उसके तन पर नहीं ….उसके मन पर बन्ध चुकी हैं। वह इन जंजीरों की ताकत स्वीकार कर चुका है।” हिंदुत्व एक हाथी है जिसमें अदम्य शक्ति है। …….और हक़ीक़त यह है के उसके पाँव में ज़ंजीर बंधी है जिसके कारण वह अपनी सारी शक्ति …सारी ऊर्जा को भूल गया है। “जातिवाद” हिंदुत्व के पाँव में जकड़ी ज़ंज़ीर है।

रामचंद्र आर्य

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ગુજરાતી વાર્તા નાં ૯૦૦ પુસ્તકો વાચવા લાયક.


  1. ૧૦૦ ઝેન કથાઓ
  2. ૧૦૦ મહાન પ્રેરણાત્મક વાર્તાઓ
  3. ૧૦૧ પ્રેરણાત્મક વાર્તાઓ
  4. Ancient Children Stories Gujarat Part 1
  5. Ancient Children Stories Gujarat Part 2
  6. Coffee સ્ટોરીઝ  .epub
  7. Gujarati Reading Series – Fifth
  8. Gujarati Reading Series – Sixth
  9. અંતરનાં અજવાળાં
  10. અંતરને અજવાળો
  11. અંશ પ્રસંગ વર્ણનો – પ્રેરણા મહેતા
  12. અકબર અને બીરબલ વાર્તાઓ – સજીવ
  13. અકબર બાદશાહ અને દીવાન બિરબલ ની વાર્તાઓ – ભાગ ૧ લો
  14. અકબર બાદશાહ અને દીવાન બિરબલ ની વાર્તાઓ – ભાગ ૨ જો
  15. અકબર બાદશાહ અને દીવાન બિરબલ ની વાર્તાઓ – ભાગ ૩ જો
  16. અકબર બાદશાહ અને દીવાન બિરબલ ની વાર્તાઓ – ભાગ ૪ થો
  17. અકબર-બિરબલ ની વિનોદી વાર્તાઓ – મરહૂમ પેસ્ટનજી જમશેદજી સઠા
  18. અકબર-બિરબલનો વિનોદી વાર્તાસંગ્રહ
  19. અટંકી વીર
  20. અડશઠ તીરથ આંગણમાં
  21. અદભુત પ્રાહુણો – બાબુલાલ ઈચ્છારામ દેસાઇ
  22. અનામિકા વાર્તા
  23. અનુભવનું અમૃત
  24. અભય કુમાર ની કથાઓ – ભાગ ૨ જો
  25. અભિજ્ઞાનસાંકુંતલમ – કાલીદાસ
  26. અમારી વાર્તાઓ – ભાગ ૧ લો
  27. અમારી વાર્તાઓ – ભાગ ૨ જો
  28. અમાસનાં તારા – કિશનસિંહ ચાવડા
  29. અમૂલ્ય રત્ન હાર – વૈધ શાસ્ત્રી સામળદાસ સેવકરામ
  30. અરધી સદીની વાંચનયાત્રા – મહેન્દ્ર મેઘાણી – ભાગ ૧
  31. અરધી સદીની વાંચનયાત્રા – મહેન્દ્ર મેઘાણી – ભાગ ૨
  32. અરધી સદીની વાંચનયાત્રા – મહેન્દ્ર મેઘાણી – ભાગ ૩
  33. અરધી સદીની વાંચનયાત્રા – મહેન્દ્ર મેઘાણી – ભાગ ૪
  34. અરેબિયન નાઇટ – ભાગ ૦૧
  35. અરેબિયન નાઇટ – ભાગ ૧ – જહાંગીર બેજનજી કરાંણી
  36. અરેબિયન નાઇટ – ભાગ ૨ – જહાંગીર બેજનજી કરાંણી
  37. અરેબિયન નાઇટ – ભાગ ૦૩
  38. અરેબિયન નાઇટ – ભાગ ૦૪
  39. અરેબિયન નાઇટ – ભાગ ૦૫
  40. અરેબિયન નાઇટ – ભાગ ૦૬
  41. અરેબિયન નાઇટ – ભાગ ૦૭
  42. અરેબિયન નાઇટ – ભાગ ૦૮
  43. અરેબિયન નાઇટ – ભાગ ૧૫
  44. અરેબિયન નાઇટ – ભાગ ૧૬
  45. અરેબિયન નાઇટ – ભાગ ૧૭
  46. અરેબિયન નાઇટ – ભાગ ૧૮
  47. અરેબિયન નાઇટ – ભોગીલાલ તરાચંદ
  48. અરેબિયન નાઈટ્સ ની રોમાંચક વાર્તાઓ – વિનુભાઈ ઉ. પટેલ
  49. અલગારી રખડપટ્ટી – રસિક ઝવેરી
  50. અલાઉદિન અને તિલસ્મી ચિરાગ
  51. અવકાશ કથાઓ
  52. અવશેષ – ધૂમકેતુ
  53. અસ્ત વ્યસ્ત ચકલો
  54. આ તે શી માથાફોડ – સ્વ. ગિજુભાઈ
  55. આંખો ની ચમક
  56. આકાસ માં ઊડતો
  57. આત્માનું સૌંદર્ય 
  58. આદર્શ ચરિત્ર-સંગ્રહ – સસ્તું સાહિત્ય
  59. આદર્શ જીવન જ્યોત – ચોથી કિરણાવલી
  60. આદર્શ જીવન જ્યોત – છઠ્ઠી કિરણાવલી
  61. આદર્શ જીવન જ્યોત – ત્રીજી કિરણાવલી
  62. આદર્શ જીવન જ્યોત – પાંચમી કિરણાવલી
  63. આદર્શ જીવન જ્યોત – બીજી કિરણાવલી
  64. આદર્શ દ્રષ્ટાંત માળા – ભાગ ૨
  65. આધ્યાત્મિક વાર્તામાળા – પરાગજી ડાહ્યાભાઇ દેશાઈ
  66. આનંદ ધારા – ભાગ ૪
  67. આનંદ રાત્રિ અને બીજી વાતો – ધૂમકેતુ
  68. આનંદ લહરી – ચીમનલાલ ર. દેસાઇ
  69. આપણા દેશ ના મહાન સ્ત્રીપુરુષો ની સચિત્ર ઐતિહાસિક વાતો
  70. આપણા દેશના મહાન પુરુષોની ઐતિહાસિક વાતો – દિવાળીબાઈ રાઠોડ
  71. આપણાં સાક્ષરરત્નો – ભાગ ૧ લો
  72. આપણાં સાક્ષરરત્નો – ભાગ ૨ જો
  73. આપણી આસપાસ – વિષ્ણુકુમાર પંડયા
  74. આપણી શ્રેષ્ઠ નવલિકાઓ – ગુલાબદાસ બ્રોકર
  75. આપણો સાંસ્કૃતિક વારસો
  76. આલા ખાચર અને બીજી વાતો
  77. ઇતિહાસ વિકાસ સુંદર બાળ વાતો – ભાગ ૨
  78. ઇન્દુ બાલા
  79. ઇમેન્યુઅલ નું સપનું
  80. ઇસપ અને તેની વાતો – ભાગ ૪ – મગનભાઇ પ્રભુદાસ દેસાઇ
  81. ઈનામ
  82. ઉપદેશપ્રદ વાર્તાઓ
  83. ઉપનિષદ કથામંગલ
  84. ઉપનિષદો ની કથાઓ અને ચિંતન – સ્વામી સચ્ચિદાનંદ
  85. એક પળ અનેરી હિમત
  86. એક વખત એવું બન્યું
  87. એક વખત ની વાત – ભાગ ૧
  88. એક વખત ની વાત – ભાગ ૨
  89. એક હતો કૂતરો
  90. એક હતો સેઠ
  91. એકલવ્ય અને ધ્રુવ – ચંદુલાલ મણિલાલ પરીખ
  92. એતો ગંગાનો પ્રવાહ – તરચંદ પો. અડાલજા
  93. ઐતિહાસિક વાર્તામાળા – મોગલ વંશ – ના. ન. ચોક્સી
  94. ઓરીંગટન માં ઉજવણી – બુક ૧૦ 
  95. ઓળીપો અને બીજી પ્રેમ કથાઓ – ઝવેરચંદ મેઘાણી
  96. કંસ વધ – બાલ વાર્તા – જે . કે. ચૌધરી
  97. કચ્છ ની કહેવતો
  98. કચ્છ ની જૂની વાર્તાઓ
  99. કચ્છની લોક કથાઓ – ભાગ ૧
  100. કચ્છની લોકવાર્તા – ડુંગરસી ધરમસી સંપટ
  101. કચ્છી કથાઓ – સ્વામી સચ્ચિદાનંદ
  102. કથા કુસુમાંજલી
  103. કથા ગુચ્છ – ભાગ ૧ લો
  104. કથા ઝરણું
  105. કથા પ્રબોધિકા ૧ – પં. શ્રી ચંદ્ર શેખર વિજયજી ગણિવર 
  106. કથા પ્રબોધિકા ૨ – પં. શ્રી ચંદ્ર શેખર વિજયજી ગણિવર 
  107. કથા પ્રબોધિકા ૩ – પં. શ્રી ચંદ્ર શેખર વિજયજી ગણિવર 
  108. કથા ભારતી ગુજરાતી ટૂંકી વાર્તાઓ – યશવંત શુક્લ અનિરુદ્ધ બ્રહ્મભટ્ટ
  109. કથા મંગલ – ભાગવત
  110. કથા મંજરી – ભાગ પહેલો
  111. કથા લોક -૩ – ચાંદની
  112. કથાકુસુમાજ્જલિ – દેસાઇ વાલજી ગોવિન્દજી
  113. કથાગુચ્છ – ભાગ ૧ લો – શિવ પ્રસાદ દલપતરામ પંડિત
  114. કથામંગલ – ઉપનિષદો અને ભાગવત
  115. કથાસરિતત્સાગર – મહાકવિ શ્રી સોમદેવભટ્ટ – ભાગ ૧ લો
  116. કથાસરિતત્સાગર – મહાકવિ શ્રી સોમદેવભટ્ટ – ભાગ ૨ જો  
  117. કન્યા વાંચન માળા – પુસ્તક ત્રીજાના અર્થ
  118. કન્યા વાંચન માળા – પુસ્તક પહેલાના અર્થ
  119. કન્યા વાંચન માળા – પુસ્તક બીજાનાં અર્થ  (2)
  120. કન્યા વાંચન માળા – પુસ્તક બીજાનાં અર્થ  (3)
  121. કન્યા વાંચન માળા – પુસ્તક બીજાનાં અર્થ
  122. કફન
  123. કલજુગના કૌટક, ને બિરબલ ની વાણી
  124. કલ્પના મૂર્તિ
  125. કવિ કીર્તિ – મણિભાઈ ભુલાભાઈ પટેલ
  126. કવિકુલગુરુ મહાકવિ કાલિદાસ
  127. કવિજી નાં કથા રત્નો
  128. કવિવર રવીન્દ્ર નાથ ટાગોર ની ટુંકી વાર્તાઓ – ધનશંકર ત્રિપાઠી
  129. કવિવર રવીન્દ્ર નાથ ટાગોર ની ટુંકી વાર્તાઓ – ભાગ ૨
  130. કસદાર કચ્છના રત્નો
  131. કહાણી કહું રે કૈયા
  132. કહેવતો – શાંતિલાલ ઠાકર
  133. કળીયુગની વાતો – કેશવ હ. શેઠ
  134. કાઉન્ટ ટૉલ્સ્ટૉય ની ટુંકી વાર્તાઓ – વિભાગ ૧ લો – ભોગઈન્દ્ર રાવ રાતનલાલ દિવેટિયા
  135. કાઉન્ટ મોન્ટે ક્રિસ્ટો 
  136. કાઠિયાવાડ ની જૂની વાર્તાઓ – ભાગ પહેલો – હરગોવિંદ પ્રેમશંકર ત્રિવેદી
  137. કાઠિયાવાડ ની જૂની વાર્તાઓ – ભાગ બીજો – હરગોવિંદ પ્રેમશંકર ત્રિવેદી
  138. કાઠીયાવાડ ની રસીલી વાતો
  139. કાઠીયાવાડ ની લોકવાર્તાઓ – ભાઈદાસ ધારસી ભાઈ ભુતા
  140. કાલેલકર ગ્રંથાવલિ – ૧ પહેલો ભાગ 
  141. કાલેલકર ગ્રંથાવલિ – ૨ બીજો ભાગ
  142. કાલેલકર ગ્રંથાવલિ – ૩ ત્રીજો ભાગ
  143. કાલેલકર ગ્રંથાવલિ – ૪ ચોથો ભાગ
  144. કાલેલકર ગ્રંથાવલિ – ૫ પાંચમો ભાગ
  145. કાલેલકર ગ્રંથાવલિ – ૬ છઠો ભાગ
  146. કાલેલકર ગ્રંથાવલિ – ૭ સાતમો  ભાગ
  147. કાલેલકર ગ્રંથાવલિ – ૮ આઠમો ભાગ
  148. કાલેલકર ગ્રંથાવલિ – ૯ નવમો ભાગ
  149. કાલેલકર ગ્રંથાવલિ – ૧૦ દસમો ભાગ
  150. કાલેલકર ગ્રંથાવલિ – ૧૨ બારમો ભાગ
  151. કાળાપાણીની કથા
  152. કાળીદાસ અને રાજા ભોજ
  153. કિરીટ અને બીજી વાતો
  154. કિશોર વાર્તાવલી
  155. કિસા ગોતમી અને બીજાં સ્ત્રી રત્નો
  156. કીર્તિ કથાઓ – ઉમીયાશંકર ઠાકર
  157. કીર્તિ મંદિર
  158. કીર્તિ સ્તંભ
  159. કુટુંબી કથાઓ – રૂપાં બાઈ કે. દારા શાહજી તાલચેરીવાલા
  160. કુમાર કથાઓ – રમણલાલ સોની
  161. કુમારનાં સ્ત્રી રત્નો – ઇન્દુલાલ કનૈયાલાલ યાજ્ઞિક
  162. કુરબાની ની કથાઓ – ઝવેરચંદ મેઘાણી
  163. કુસુમાવલી – સાંકરલાલ ગણેશજી શાસ્ત્રી
  164. કેટલીક વાતો અને સંસાર ચિત્રો
  165. કેટલીક વાર્તાઓ
  166. કેડીઓ કલરવની મોતીચારો ભાગ 8 – ડૉ આઈ કે વીજળીવાળા
  167. કેમ કથાઓ – હિંમતલાલ ચું. શાહ
  168. કેળા વાળી અને બીજી વાતો
  169. કોની બહેન અને બીજી વાતો – લીઓ ટૉલ્સ્ટૉય
  170. કૌતક સંગ્રહ – જો. બે. મરઝ્બાન
  171. ક્યાંય ન જતો પૂલ
  172. ક્રાંતિ કથાઓ – સ્વામી સચ્ચિદાનંદ
  173. ખરા બપોરે – ડો. જયંત ખત્રી
  174. ખરેખરી વાતો – ગાંડીવ
  175. ખાદી ની પ્રસાદી અને બીજી મનોરંજક વાર્તાઓ
  176. ખોટી ખોટી વાતો
  177. ગંગાજળ
  178. ગજ મોતી નો મહેલ – પશુ પ્રેમ કથાવલી
  179. ગધેડાનું રાજ
  180. ગધેડાનો મેળો
  181. ગબ્બુ કે ઢબ્બુ
  182. ગરવી ગુજરાત – રસીકલાલ જ. જોષી
  183. ગરવી ગુજરાત
  184. ગરુડજી ના કાકા
  185. ગાંધી-પારસમણિ
  186. ગાગરમાં સાગર
  187. ગિજુભાઈ ની બાલ વાર્તાઓ (2)
  188. ગિજુભાઈ ની બાલ વાર્તાઓ ૧ 
  189. ગિજુભાઈ ની બાલ વાર્તાઓ ૨
  190. ગિજુભાઈ ની બાલ વાર્તાઓ
  191. ગિજુભાઈની બાલવાર્તાઓ – ગિજુભાઈ બધેકા
  192. ગિજુભાઈની બાલવાર્તાઓ
  193. ગિજુભાઈની બાળવાર્તાઓ – 0૧
  194. ગિજુભાઈની બાળવાર્તાઓ – 0૨
  195. ગિજુભાઈની બાળવાર્તાઓ – 0૩
  196. ગિજુભાઈની બાળવાર્તાઓ – 0૪
  197. ગિજુભાઈની બાળવાર્તાઓ – 0૫
  198. ગિજુભાઈની બાળવાર્તાઓ – 0૬
  199. ગિજુભાઈની બાળવાર્તાઓ – 0૭
  200. ગિજુભાઈની બાળવાર્તાઓ – 0૮
  201. ગિજુભાઈની બાળવાર્તાઓ – 0૯
  202. ગિજુભાઈની બાળવાર્તાઓ – ૧૦
  203. ગિરિબાલા – રમણલાલ સોની
  204. ગુજરાત અને વડોદરા રાજ્યના ઇતિહાસ ની વાતો – ભાગ ૧
  205. ગુજરાત તથા કાઠીયાવાડ દેશ ની વાર્તા
  206. ગુજરાત ના ઇતિહાસ ની કથાઓ – ઝીણા ભાઈ ર. દેસાઇ
  207. ગુજરાત ની જૂની વાર્તાઓ – રા. મણિલાલ છબારામ ભટ્ટ
  208. ગુજરાત નો બાલ ઇતિહાસ
  209. ગુજરાતણ ટાયપિસ્ટ
  210. ગુજરાતની લોકકથાઓ – ડાહ્યાલાલ બ્રહ્મભટ્ટ
  211. ગુજરાતી છઠી ચોપડી
  212. ગુજરાતી ટૂંકીવાર્તાની વિકાસ રેખા
  213. ગુજરાતી ત્રીજી ચોપડી
  214. ગુજરાતી પહેલી ચોપડી
  215. ગુજરાતી પાંચમી ચોપડી  (2)
  216. ગુજરાતી પાંચમી ચોપડી
  217. ગુજરાતી પાઠ્ય પુસ્તક – ડૉ. શ્રીમતી ઉષા નાયર
  218. ગુજરાતી બીજી ચોપડી
  219. ગુજરાતી ભાષાના અણમોલ રત્નો
  220. ગુપ્તધન – રવીન્દ્રનાથ ટાગોર – રમણલાલ સોની
  221. ગૃહપ્રવેશ – સુરેશ જોષી
  222. ગોપાળ અથવા ગુપ્ત ખજાનો
  223. ગોરસ – ભાગ ૧
  224. ગોવાલણી
  225. ઘર ની લક્ષ્મી
  226. ઘાઘરાવાળી અને બીજી વાતો
  227. ચંચળ હૃદય પ્રેમ સભર ગુજરાતી ટુંકી વાર્તાઓ
  228. ચંચળ હ્દય – હિરેન કવાડ
  229. ચતુર કથાઓ
  230. ચતુર સુજાણ
  231. ચમત્કારિક વાતો
  232. ચાર કહેવત ની રમુજી વારતા
  233. ચાર બાલસંવાદો
  234. ચાર વાર્તાઓ – માણેકજી એડળજી વાછા
  235. ચેતનાની ચિનગારી
  236. ચોર નો ભાઈ ઘંટી ચોર – ચોર નો ભાઈ ઘંટી ચોર – રાજેન્દ્ર – સાગર
  237. છુંમંતર
  238. છુપાયેલું રહસ્ય
  239. જંગલ બુક – જોસેફ રુડયાર્ડ કિપ્લિંગ
  240. જંગલ માં મંગળ
  241. જગવિખ્યાત પુરુષો – ભાગ ૧ લો
  242. જગવિખ્યાત પુરુષો – ભાગ ૨ જો
  243. જન રમુજ વાર્તા સંગ્રહ – રુસ્તમ ઈરાની
  244. જનકલ્યાણ
  245. જયંતીની સાહસ કથાઓ – નાગરદાસ ઇ. પટેલ
  246. જયકાંતનની વાર્તાઓ – ત. જયકાંતન
  247. જલબિંદુ – ધૂમકેત
  248. જવાહરના જીવનના પ્રેરક પ્રસંગો
  249. જાણ્યું છતાં અજાણ્યું
  250. જાદુઇ ઘોડો
  251. જાદુઇ ચક્કી – રમણલાલ સોની
  252. જાદુઇ જમરૂખ – ભાગ ૧
  253. જાદુઇ જમરૂખ – ભાગ ૨
  254. જાદુઇ ડાયરી
  255. જાદુઇ દીવો – વીરબલ હ. મહેતા 
  256. જાદુઇ બાગ – ભાગ ૧
  257. જાદુઇ માછલી
  258. જાદુઇ વાતો
  259. જાદુઇ હાર
  260. જીવન એક ઉત્સવ – પ્રજજવલિત
  261. જીવન સ્મરણો – પૂર્વાધ – કેશવ હ. શેઠ
  262. જે રાહ જુએ છે તે માં
  263. જૈન કથા સંગ્રહ
  264. જૈન ધર્મ ની વાર્તાઓ
  265. જૈન રત્નચિંતામણી વાર્તામાળા – ભાગ ૧ – પાનાચંદ મોહનલાલ જૈન
  266. જ્ઞાનેશ્વર અને ચાંગદેવ
  267. જ્યોતિષી કાગડાભાઇ – ધ્રુવી અમૃતિયા
  268. ઝાકળ ભીના મોતી
  269. ટચૂકડી કથાઓ – ભાગ ૧
  270. ટચૂકડી કથાઓ – ભાગ ૨
  271. ટચૂકડી કથાઓ – ભાગ ૩
  272. ટચૂકડી કથાઓ – ભાગ ૪
  273. ટચૂકડી કથાઓ – ભાગ ૫
  274. ટચૂકડી કથાઓ – ભાગ ૬
  275. ટચૂકડી કથાઓ – મુનિ શ્રી ચંદ્ર શેખર વિજયજી
  276. ટાગોરની સુંદર વાતો
  277. ટીના ભાઈ નું પરાક્રમ
  278. ટુંકી વાર્તાઓ – ભાગ ૧ લો
  279. ટુંકી વાર્તાઓ – ભાગ ૨ જો  (2)
  280. ટુંકી વાર્તાઓ – ભાગ ૨ જો
  281. ટુંકી વાર્તાઓ – ભાગ ૩ જો
  282. ટુંકી વાર્તાઓ – ભાગ 4 થો
  283. ટુંકી વાર્તાઓ – ભાગ ૬ ઠો
  284. ટુંકી વાર્તાઓ – ભાગ ૭ મો
  285. ટુંકી વાર્તાઓ
  286. ટુચકા સંગ્રહ –
  287. ટુચકા સંગ્રહ – ભાગ ૧ લો
  288. ટુચકા સંગ્રહ
  289. ટૉલ્સ્ટૉય ની ત્રણ વાર્તાઓ
  290. ટોચકા સંગ્રહ
  291. ટોમી અને બીજી વાતો
  292. ઠગનો બાદશાહ – અંબાલાલ શનાભાઈ પટેલ 
  293. ડૉક્ટર ની ડાયરી
  294. ડોશીમાની વાતો – ભાગ ૧
  295. ડોશીમાની વાતો – ભાગ ૨
  296. ડોશીમાની વાતો – ભાગ ૩
  297. ડોસીમાંની વાતો – ઝવેરચંદ મેઘાણી
  298. ઢોંગ સોંગ વાર્તા માળા નંબર ૧ – દિનશા એદલજી કરકરીઆ
  299. તણખા – ટુંકી વાર્તાઓનો સંગ્રહ – ધૂમકેતુ
  300. તણખા – ધૂમકેતુ
  301. તન્ત્ર કથા
  302. તપોવન વાર્તા સંગ્રહ – ચંદ્રકાંત રાવ
  303. તપોવન
  304. તરંગ – મહેતા મોતીલાલ હરજીવનદાસ
  305. તરંગ – મોહનલાલ પાર્વતીશંકર દવે
  306. તારા મંડળ
  307. તારાસ બુલ્લા
  308. તેર ટુંકી વાર્તાઓ
  309. તેર હાથ નું બી – ભાગ ૧
  310. તેલુગુ વાર્તાઓ – પુરાણામ સુબ્રમણ્યં શર્મા
  311. તોતો ચાન
  312. તોફાની ટીપુડો
  313. ત્યારે કરીશું શું
  314. ત્યારે કરીશું શું
  315. ત્રણ વાર્તાઓ
  316. ત્રિવેદી વાંચન માળા – પુસ્તક પાંચમાના અર્થ
  317. ત્રિવેદી વાંચનમાળા -૧   પુસ્તક પહેલા ના સમજૂતી
  318. ત્રિવેદી વાંચનમાળા -૧  પુસ્તક પહેલું 
  319. ત્રિવેદી વાંચનમાળા -૨  પુસ્તક બીજું
  320. ત્રિવેદી વાંચનમાળા -૨  પુસ્તક બીજું સમજૂતી
  321. ત્રિવેદી વાંચનમાળા -૩   પુસ્તક ત્રીજુ   સમજૂતી
  322. ત્રિવેદી વાંચનમાળા -૩  પુસ્તક ત્રીજું
  323. ત્રિવેદી વાંચનમાળા -૩  પુસ્તક ત્રીજું 1
  324. ત્રિવેદી વાંચનમાળા -૪  પુસ્તક ચોથું
  325. ત્રિવેદી વાંચનમાળા -૫  પુસ્તક પાંચમું
  326. ત્રિવેદી વાંચનમાળા -૫  પુસ્તક પાંચમું સમજૂતી
  327. ત્રિવેદી વાંચનમાળા -૫  પુસ્તક સમજૂતી
  328. ત્રિવેદી વાંચનમાળા -૫ પુસ્તક પાંચમું 
  329. ત્રિવેદી વાંચનમાળા -૬  પુસ્તક છઠું
  330. ત્રિવેદી વાંચનમાળા -૬  પુસ્તક સમજૂતી
  331. થોડામાં ઘણું
  332. દયાનો બદલો
  333. દયાળુ માતા
  334. દરેકની એક વાર્તા હોય છે
  335. દલો મેરાઈ
  336. દશાવતાર
  337. દાદાજીની વાતો – ભાગ ૧ – ઝવેરચંદ મેગાણી
  338. દાદાજીની વાતો – ભાગ ૨ – ઝવેરચંદ મેગાણી
  339. દાદાજીની વાતો – ભાગ ૩ – ઝવેરચંદ મેગાણી
  340. દાદાજીની વાતો – ભાગ-૧ – પ. ચંદ્રશેખર વિજયજી
  341. દાદાજીની વાતો ભાગ-૨
  342. દાદાજીની વાતો ભાગ-૩
  343. દાદીમાની વાતો
  344. દિલ ખુશ વાર્તાઓ
  345. દિવ્ય જ્યોતિ
  346. દિવ્ય દર્શન – શ્રી જય ભીખુ
  347. દિવ્યસંદેશ
  348. દીવાદાંડી
  349. દુઃખિયા ના આસું
  350. દેવકથાઓ
  351. દેવતાઈ દીવો
  352. દેવતાઈ બોલતો પલંગ
  353. દેશદેશની અદભૂત વાતો – ભાગ ૧ 
  354. દેશદેશની ચાતુરી કથાઓ – યશવન્ત મહેતા 
  355. દેશદેશની દંતકથાઓ
  356. દોરાબજીના દિકરાઓની રમૂજી વારતા
  357. દ્રષ્ટાંત કથાઓ
  358. દ્રષ્ટાંત ગીતા – દિનેશ પાઠક – ભાગ ૧
  359. દ્રષ્ટાંત ગીતા – દિનેશ પાઠક – ભાગ ૨
  360. દ્રષ્ટાંત ગીતા – દિનેશ પાઠક – ભાગ ૩
  361. દ્રષ્ટાંત માળા – ભાગ ૧ લો
  362. દ્રષ્ટાંત વૈભવ
  363. દ્વાદશ જ્યોતિર્લિંગ
  364. દ્વિરેફ ની વાતો – રામનારાયણ વિશ્વનાથ પાઠક
  365. ધર્મ કથાઓ – વિજયરામચંદ્રસુરીશ્વરજી
  366. ધર્મ કથાઓ
  367. ધર્મ કથાઓ
  368. ધર્મ નીતિ બોધિની – ભાગ ૧ લો – ભીમ ભાઈ લાલ ભાઈ દેશાઈ  (2)
  369. ધર્મ નીતિ બોધિની – ભાગ ૧ લો – ભીમ ભાઈ લાલ ભાઈ દેશાઈ
  370. ધર્મ નીતી – ભાગ બીજો
  371. ધાર્મિક વાર્તાઓ
  372. ધાવણની ધાર અને બીજી વાતો
  373. ધી અરેબિયન નાઈટસ
  374. ધીરા સો ગંભીર
  375. ધૂપસળી – વલ્લભદાસ
  376. ધોરણ ચોથાની નોટ
  377. ન કહેવાયેલી વાતો
  378. નટવર મહેતાની વાર્તાઓ
  379. નવનીત
  380. નવરંગી બાળકો – સ્વ. ભોગી ન્દ્રરાવ રતનલાલ દિવેટિયા
  381. નવી અરેબ્યન વાર્તાઓ – માણેકજી એદલજી વાછા
  382. નવી પેઢી ની જુનવાણી વાર્તાઓ – મનીષ સુતરીયા – ભાગ ૩
  383. નવીન વાર્તા – મિસ્ત્રી લાલજીપિતાબર
  384. નવીન વિશેષ વાંચન
  385. નવો સિક્ષક વાર્તા
  386. નાનકડા આર્થર નો સૂરજ
  387. નાની નાની વાતો – ભાગ ૧ લો
  388. નિર્મળા અને બીજી વાતો
  389. નીતિ વાંચન માળા – પુસ્તક ૧ લુ
  390. નીતિ વાંચન માળા – પુસ્તક ૨ જુ
  391. નીતિ વાંચન માળા – પુસ્તક ૩ જુ
  392. નીતિ શિક્ષક યાને બાળકો નો ફૂલહાર
  393. પંચતંત્ર – ભોગીલાલ જ. સાંડેસરા
  394. પંચતંત્ર અને ગીત બોધ
  395. પંચતંત્ર ની વાર્તાઓ – વિનુભાઈ ઉ. પટેલ
  396. પંચામૃત – અશોક હર્ષ
  397. પંચામૃત
  398. પંચો પાખીઆન
  399. પચાસ વાર્તા – શિશુ સાહિત્ય ન. ૧
  400. પટલાઈ નાં પેચ – ઈશ્વર પેટલીકર
  401. પટેલ પટલાણી અને બીજી વાતો – રમણલાલ સોની
  402. પડપંછી પંચ પટેલ ની વાર્તા
  403. પતિવ્રતા સ્ત્રીઓ
  404. પત્થરોનો સોદાગર અને બીજી વાતો – પંડિત સુદર્શન
  405. પનિ અને બીજી વાતો
  406. પરમહંસદેવ ના કથા પ્રસંગો
  407. પહેલો ગોવળીયો – સુરેશ જાની
  408. પહેલો ફાલ  – ધનસુખલાલ મહેતા
  409. પાંચ વાર્તા
  410. પાપ નો પશ્ચાતાપ અને બીજી વારતાઓ
  411. પાપ પુણ્ય અને સંયમ – ગોપાલદાસ જીવાભાઈ પટેલ
  412. પારકા ઘર ની લક્ષ્મી – જયભિખ્ખુ
  413. પાલી પરવાળા
  414. પીળા પાંદડાની લીલાશ !
  415. પુદુમૈપિત્તનની વાર્તાઓ – મી. પ. સોમસુંદરમ
  416. પુરસ્કાર અને બીજી વાતો
  417. પુરાતન જ્યોત – ઝવેરચંદ મેઘાણી
  418. પુષ્પમાલા – જીવનલાલ અમરશી મહેતા
  419. પૂ શ્રી મોરારી બાપુ ની પ્રેરક કથાઓ
  420. પોપટ
  421. પૌરાણિક કથાઓ
  422. પૌરાણિક કથાકોષ – ચતુર્થ ખંડ
  423. પૌરાણિક કથાકોષ
  424. પૌરાણિક બોધકથાઓ
  425. પ્રકાશ ની પગદંડી
  426. પ્રતિભા ની પ્રતિમા
  427. પ્રબોધ ભારત – ભાગ ૨ જો
  428. પ્રમુખ ને એક પત્ર
  429. પ્રસંગ કલ્પલતા – આચાર્ય વિજય મુનીચંદ્ર સૂરી
  430. પ્રાચીન કિશોર કથાઓ
  431. પ્રાચીન ભક્તો
  432. પ્રાચીન ભારતનાં વિદેશયાત્રી – પ્રા. પ્રધુમ્ન બી. ખાચર
  433. પ્રાચીન શીલ કથાઓ
  434. પ્રાચીન સાહિત્ય – શ્રી રવીન્દ્રનાથ ઠાકુર
  435. પ્રેમ દીવાની
  436. પ્રેમ ના ફૂલ
  437. પ્રેમ પંથ
  438. પ્રેમચંદજીની પ્રતિનિધિ વાર્તાઓ – વિનુભાઈ ઉ. પટેલ
  439. પ્રેમચંદજીની શ્રેષ્ઠ વાર્તાઓ – યાકુબ મલેક
  440. પ્રેરક પ્રસંગો – ભાગ ૧ – ૨
  441. પ્રેરક પ્રસંગો – ભાગ ૧ – સત્યમ
  442. પ્રેરણા પુરુષો – ઈશ્વર વાઘેલા
  443. ફુલમાળા – 1 – રમણલાલ શાહ
  444. ફૂલડાં રંગ રંગી – ભીમભાઈ દેસાઇ
  445. ફૂલમાળા – ભાગ ૧ – રમણલાલ નાનાલાલ શાહ
  446. ફૂલમાળા – ભાગ ૨ – રમણલાલ નાનાલાલ શાહ
  447. બંગાળી બિરબલ
  448. બંદો અને બંદગી – શો. મ. દેશાઈ
  449. બજરંગી હનુમાન – જે. છ. ચૌધરી
  450. બજરંગી હનુમાન – બાલ વાર્તા – જે . કે. ચૌધરી
  451. બત્રીસ પૂતળીમાંની વાતો – ભાગ ૧
  452. બત્રીસ પૂતળીમાંની વાતો – ભાગ ૩
  453. બત્રીસ પૂતળીમાંની વાતો – ભાગ ૪
  454. બત્રીસ પૂતળીમાંની વાતો – ભાગ ૫
  455. બત્રીસ પૂતળીમાંની વાતો – ભાગ ૬
  456. બત્રીસ પૂતળીમાંની વાતો – ભાગ ૭
  457. બત્રીસ પૂતળીમાંની વાતો – ભાગ ૮
  458. બરાસ કસ્તૂરી
  459. બલિદાન – ૧૯
  460. બહાદુર બ્હારવટીઓ
  461. બા ની વાતો
  462. બાટલી નો બુચ – રમણલાલ સોની
  463. બાતાસી – રમણલાલ સોની
  464. બાદશાહ અકબર અને દીવાન બિરબલ ની વાર્તાઓ – ભાગ ૧ લો
  465. બાદશાહ અકબર અને દીવાન બિરબલ ની વાર્તાઓ – ભાગ ૨ જો
  466. બાદશાહ અકબર અને દીવાન બિરબલ ની વાર્તાઓ – ભાગ ૩ જો
  467. બાદશાહ અકબર અને દીવાન બિરબલ ની વાર્તાઓ – ભાગ ૪ થો
  468. બાદશાહ અકબર અને દીવાન બિરબલ ની વાર્તાઓ – ભાગ ૮ મો 
  469. બાદશાહ અને બિરબલ ની વાર્તાઓ – ભાગ ૧ લો
  470. બાદશાહ અને બિરબલ ની વાર્તાઓ – ભાગ ૮ મો
  471. બાપુ – ભાગ પહેલો nbt
  472. બાપુ – ભાગ બીજો  nbt
  473. બાપુ ની વાતો
  474. બાલ કાલિદાસ
  475. બાલ પંચતંત્ર
  476. બાલ બોધ માલા
  477. બાલ મિત્ર ની વાતો – ભાગ ૧
  478. બાલ મિત્ર ની વાતો – ભાગ ૨
  479. બાલ વાડી – ભાગ ૨ જો
  480. બાલ વાડી – ભાગ ૩ જો
  481. બાલ વાર્તા – ગિજુભાઈ – ભાગ ચોથો
  482. બાલ વાર્તાલાપ
  483. બાલ વિનોદ – સુમતિ નાગરદાસ પટેલ
  484. બાલ વિલાસ – મણિલાલ નથુભાઈ દ્વિવેદી
  485. બાલ વિલાસ
  486. બાલ-પંચતંત્ર
  487. બાળ કહાણિયો – ગોપાળજી કલ્યાણજી દેલવાડાકર
  488. બાળ નિર્માણ ની વાર્તાઓ – ૦૧
  489. બાળ નિર્માણ ની વાર્તાઓ – ૦૨
  490. બાળ નિર્માણ ની વાર્તાઓ – ૦૯
  491. બાળ નિર્માણ ની વાર્તાઓ – ૧૦
  492. બાળ નિર્માણ ની વાર્તાઓ – ૧૧
  493. બાળ નિર્માણ ની વાર્તાઓ – ૧૨
  494. બાળ નિર્માણ ની વાર્તાઓ – ૧૩
  495. બાળ નિર્માણ ની વાર્તાઓ – ૧૪
  496. બાળ નિર્માણ ની વાર્તાઓ – ૧૫
  497. બાળ નિર્માણ ની વાર્તાઓ – ૧૬
  498. બાળ પુસ્તિકા
  499. બાળ વાડી – ભાગ ૧ લો
  500. બાળ વાતો
  501. બાળ વાર્તા – ગંગાશંકરમણી શંકર વૈષ્ણવ
  502. બાળ વાર્તા
  503. બાળ વાર્તાઓ – શ્રી ગિજુભાઈ બધેકા
  504. બાળ વાર્તાલાપ – જગદીશ ઠાકર
  505. બાળ વાર્તાવલી – ભાગ બીજો
  506. બાળ વાર્તાવલી – સૌ. હંસા મહેતા
  507. બાળ વિહાર – ભાગ ૧ લો – ગાંડીવ
  508. બાળ શિક્ષણ – મણીલાલ મુળજીભાઈ
  509. બાળ સંસ્કાર શાળા
  510. બાળ સત્સંગ – ભાગ ૨
  511. બાળ સદબોધ – બળદેવ મોતીરામ વ્યાસ
  512. બાળ સાહિત્યની શિષ્ટવાર્તાઓ – શૈલેષ કે. રાયચુરા
  513. બાળકની વાતો – ભાગ ૨ – ભીખાભાઇ વ્યાસ
  514. બાળકોની વાતો – ભાગ ૧ – સ્વ. અમૃતલાલ સુંદરજી પઢિયાર
  515. બાળકોની વાતો – ભાગ બીજો
  516. બાળસાહિત્ય ગુચ્છ – ગિજુભાઈ તારાબહેન
  517. બિંદુ માં સિંધુ
  518. બિરબલ અને બાદશાહ – ભાગ ૧ થી ૧૮ સુધી
  519. બિરબલ અને બાદશાહ – ભાગ સાત થી બાર સુધી
  520. બિરબલ ની ચિત્રમય બાલ વાતો
  521. બિરબલ નો બંધુ – ભાગ ૨
  522. બિરબલ નો બંધુ – ભાગ ૩
  523. બિરબલ બાદશાહ નાટક ના ગાયનો
  524. બિરબલ વિનોદ – બદ્ર નીઝામી રાહતી
  525. બિહારનો બિરબલ
  526. બુંદેલખંડ ની લોક કથાઓ
  527. બુદ્ધ-જાતક ચિંતન – ભાગ ૧ – સ્વામી સચ્ચિદાનંદ
  528. બુદ્ધ-જાતક ચિંતન – ભાગ ૨ – સ્વામી સચ્ચિદાનંદ
  529. બુદ્ધિ ના બાદશાહ
  530. બુદ્ધિ પ્રેરક બાળ કથાઓ
  531. બુદ્ધિ વિલાસ – આનંદ કુમાર ભટ્ટ
  532. બુદ્ધિધન બિરબલ – ભાગ ૧ લો
  533. બુદ્ધિનો બાદશાહ – પ્રકાશમ રાવલ
  534. બુલબુલ – કથા લોક ૨
  535. બે દેશ દીપક – ઝવેરચંદ મેઘાણી (2)
  536. બે દેશ દીપક – ઝવેરચંદ મેઘાણી
  537. બેટા તારે વાર્તા સાંભળવી છે
  538. બોધ કથાઓ
  539. બોધ દાયક દ્રષ્ટાંતો
  540. બોધકથા 2
  541. બોધકથા
  542. બોધદાયક કથાઓ
  543. બોધપ્રદ અગિયાર વાર્તાઓ
  544. ભક્ત કવિઓ – પી.કે.દાવડા
  545. ભગલો ભોટ – માથું ભાંગ્યું – મનોરંજન ગ્રંથમાળા
  546. ભગીની નિવેદિતા અને બીજા સ્ત્રી રત્નો – ભાગ ૩
  547. ભવનું ભાથું
  548. ભાઈ બહેન
  549. ભાભીની બંગડીઓ અને બીજી વાતો
  550. ભારત લોક કથા – ભાગ ૧
  551. ભારત લોક કથા – ભાગ ૨
  552. ભારત લોક કથા – ભાગ ૩
  553. ભારત લોક કથા – ભાગ ૪
  554. ભારત લોક કથા – ભાગ ૫
  555. ભારત લોક કથા – ભાગ ૯
  556. ભારત લોકકથા – ભાગ ૧ લો
  557. ભારત લોકકથા – ભાગ ૨ જો
  558. ભારત લોકકથા – ભાગ ૩ જો
  559. ભારત લોકકથા – ભાગ ૪ થો
  560. ભારત લોકકથા – ભાગ ૫ મો
  561. ભારત લોકકથા – ભાગ ૯ મો
  562. ભારતના મહાન પુરુષો – ભાગ ૧ લો
  563. ભારતના મહાન પુરુષો – ભાગ ૨ જો
  564. ભારતના મહાન વૈજ્ઞાનિકો – રેવાશંકર ઓ. સોમપુરા
  565. ભારતના લડવીરો
  566. ભારતના વીર વીરાંગનાઓની કેટલીક વાતો – જેનબાઈ ભીખાભાઈ પટેલ
  567. ભારતના વીરપુરુષો – ભાગ પહેલો
  568. ભારતના સંગીત રત્નો – ભાગ ૧ – ડૉ. મૂળજીભાઈ પીતાંબરદાસ શાહ
  569. ભારતના સ્ત્રી રત્નો – શિવપ્રસાદ દલપતરામ પંડિત – ભાગ ૧ 
  570. ભારતના સ્ત્રી રત્નો – શિવપ્રસાદ દલપતરામ પંડિત – ભાગ ૨
  571. ભારતના સ્ત્રી રત્નો – શિવપ્રસાદ દલપતરામ પંડિત – ભાગ ૩
  572. ભારતીય નીતિ કથાઓ
  573. ભીલ્લ મહાપુરુષો – ભાગ ૧ લો – મોતીભાઈ રાયજીભાઈ વરેડીઆ
  574. ભૂત નો ભાઈ
  575. ભૂતિયો મહેલ
  576. ભૂલ-ભૂલામણી
  577. ભેદ ભરી સ્ત્રી ચરિત્રની વાર્તા
  578. ભોજ અને કાલિદાસ
  579. ભોજ રાજા અને કવિ કાલિદાસ ની જ્ઞાન વર્ધક વાર્તાઓનો ભંડાર
  580. ભોજ રાજા અને કાળીદાસ – ભાગ ૧ થી ૫
  581. મનોજ દાસની વાર્તાઓ
  582. મનોરંજક વારતા તથા ટુચકા સંગ્રહ – મગનરામ નારર રામ મુનશી
  583. મનોરંજક વાર્તા સંગ્રહ
  584. મહમદ સેલ અને – ગિજુભાઈ
  585. મહા પુરુષોના પ્રેરક જીવન પ્રસંગો
  586. મહાત્મા ગાંધી અને હિંદના મહાન નવરત્નો
  587. મહાત્માજીની વાતો
  588. મહાન બનો
  589. મહાન મહિલાઓ – સ્વામી સચ્ચિદાનંદ
  590. મહાન મુસાફરો – ભાગ ૨ – યશવંત મહેતા
  591. મહાન મુસાફરો – મૂળશંકર મો. ભટ્ટ
  592. મહાન વ્યક્તિઓ અને બાળકો
  593. મહાન શીખ ગુરુઓ
  594. મહાભારત ની જીવન કથાઓ .epub
  595. મહાભારત માં આવતી કેટલીક રસપ્રદ વાર્તાઓ
  596. મહાભારતનાં પાત્રોં
  597. મહાભારતની જીવનકથાઓ – સ્વામી સચ્ચિદાનંદ
  598. મહાભારતની નીતિ કથાઓ – મગનલાલ હરિકૃષ્ણ મ્હેતા
  599. મહારાણી લક્ષ્મીબાઈ અને બીજાં સ્ત્રી રત્નો
  600. મહાસભાનાં મહારથીઓ – મધુકર રાંદેરિયા
  601. મહુડાનો કેફ
  602. માં મને સાંભરે રે – ભાગ ૨
  603. માં મને સાંભરે રે – ભાગ ૪
  604. માં મને સાંભરે રે – ભાગ ૫
  605. માં મને સાંભરે રે – ભાગ ૬
  606. માં મને સાંભરે રે – ભાગ ૭
  607. માં મને સાંભરે રે – ભાગ ૮
  608. માણસાઈ ના દીવા
  609. માનવતાનાં મૂલ – રામનારાયણ પાઠક
  610. માનવતાની શોધમાં
  611. માનવતાની સાધના
  612. માનવી નું મન
  613. માયાવી દેશ
  614. મારી કમલા
  615. મારી પ્રિય વાર્તાઓ
  616. મારી માં
  617. મારી શ્રેષ્ઠ વાર્તા – મૌલિક વાર્તા સંગ્રહ
  618. મારો દેશ
  619. મિશકાની થૂલી
  620. મીની કથાઓ
  621. મુરખા – શ્રી હરિહર પુસ્તકાલય
  622. મૂરખ પંડિત
  623. મૂરખ રાજ – કાઉન્ટ લીઓ ટૉલ્સ્ટૉય
  624. મૂરખરામ મુરખા ની વાતો
  625. મેઘધનુષ્ય
  626. મેવાડના અણમોલ જવાહિર – વોરા ભોગીલાલ રાતનચંદ
  627. મોતી ની માળા
  628. મોસાદનાં જાસૂસી મિશનો – નગેન્દ્ર વિજય
  629. રંગ છે, બારોટ – ઝવેરચંદ મેઘાણી
  630. રંગ તરંગ – ભાગ – ૧
  631. રંગ તરંગ – ભાગ – ૨
  632. રંગ તરંગ – ભાગ – ૩
  633. રંગ તરંગ – ભાગ – ૪
  634. રંગબેરંગી વાર્તાઓ
  635. રખડું ટોળી
  636. રખડેલ અને બીજી વાતો
  637. રઘુ રાજા અને બીજી વાતો
  638. રજકણ  – ધૂમકેત
  639. રણ બને ઝરણ
  640. રણબંકા Jp Zala
  641. રત્ન ગ્રંથિ – ટુંકી વાર્તાઓ – ચતુર્ભુજ માણેકેશ્વર ભટ્ટ
  642. રમકડાંની દુકાન
  643. રમણલાલ સોનીની ઉત્તમ ૫૦ બાળવાર્તાઓ.epub
  644. રમુજ માળા – ભાગ પહેલો
  645. રમુજ માળા – ભાગ બીજો
  646. રમૂજી વાતો
  647. રમૂજી વારતા સંગ્રહ
  648. રમૂજી વાર્તાઓ
  649. રશીદની પેટી અને બીજી વાતો
  650. રશીલી વાર્તા – રણછોડદાસ એફ એમ
  651. રસધાર ની વાર્તાઓ – ભાગ ૧
  652. રસધાર ની વાર્તાઓ – ભાગ ૨
  653. રસધાર ની વાર્તાઓ – સૌરાષ્ટ્રની રસધાર – ચુટેલી વાર્તાઓ
  654. રસિક વાર્તામાળા – ભાગ ૨ જો
  655. રસીલી મનોરંજક વાર્તા – ફકિરભાઇ કાસીદાસ
  656. રસીલી વાર્તાઓ – ભાગ ૧ લો
  657. રસીલી વાર્તાઓ – રામમોહનરાય જશવંતરાય
  658. રસ્ટી ના પરાક્રમો
  659. રહસ્યમય સ્મિત અને અન્ય વાર્તાઓ – જશુરાજ
  660. રાક્ષસ ભાગ્યો – ધીરજલાલ ગજ્જર
  661. રાખ ની ઢગલી
  662. રાખડેલ અને બીજી વાતો
  663. રાખનાં રમકડાં
  664. રાજનગર નાં રત્નો – વલ્લભજી સુંદરજી પૂંજાભાઈ
  665. રાજપૂત વીરરસ કથા
  666. રાજમાતા જીજાબાઈ ને બીજાં સ્ત્રીરત્નો
  667. રાજા ભોજ અને કવિ કાલિદાસ
  668. રાજા ભોજ અને કવિ કાલિદાસ
  669. રાજાજી ની વાતો
  670. રાજાજીની વાતો – ભાગ ૨
  671. રામકૃષ્ણ પરમહંસ ની પ્રેરક દ્રષ્ટાંત કથાઓ
  672. રામાયણ માં આવતી કેટલીક રસપ્રદ વાર્તાઓ – તુષાર જ. અંજારિયા
  673. રાયચુરા ની રસ કથાઓ
  674. રાષ્ટ્રીય પહેલી ચોપડી
  675. રાષ્ટ્રીય બીજી ચોપડી
  676. રાષ્ટ્રીય સાહિત્ય વિનોદ
  677. રુપાની વાર્તાઓ – તાન્યા શેઠ.epub
  678. રૂપકથા – ભાગ પહેલો
  679. રૂપસુંદરી અને બીજાં સ્ત્રી રત્નો
  680. રૂપિયાનો વરસાદ – હર્ષદ પટેલ
  681. રૂપેરી દાધિવાળા બાળક
  682. રેવા શંકર કૃત એકાદશી ની કથાઓ – મોતીબાઈ મંજીવન દાસ
  683. લતા અને બીજી વાતો – ગુલાબદાસ બ્રોકર
  684. લાખા પટેલ ની લાકડી
  685. લાલા રૃખ અને બીજી વાતો
  686. લીઓ ટોલ્સટોય બાળવાર્તાઓ
  687. લોહાણા વીરોની વાતો – ભાગ ૧
  688. વણિક વિધ્યા ની વાતો – ભાગ ૧ લો – વકીલ દયાળજી રણછોડદાસ
  689. વનિતાની વાતો
  690. વફાદાર હાથી
  691. વસંત – સૌ. અર્યમન મહેતા
  692. વાંચનયાત્રા નો પ્રસાદ – મહેન્દ્ર મેઘાણી
  693. વાંચનયાત્રા નો પ્રસાદ
  694. વાંચવા લાયક વાતો – ભાગ પહેલો
  695. વાંચો વિચારો અને અનુસરો
  696. વાઘો નું વન
  697. વાનર સેના ની વાતો
  698. વાર્તા મંદિર – ૫
  699. વાર્તા રે વાર્તા
  700. વાર્તા સંગ્રહ અથવા વાવા બાય ની વાનગી
  701. વિક્રમ ની વાતો
  702. વિજ્ઞાન વિનોદ – પોપટલાલ ગોવીંદલાલ શાહ
  703. વિજ્ઞાનની રસિક વાર્તાઓ – શ્રીમાન છોટાલાલ જીવનલાલ
  704. વિધાર્થી વાંચન માળા
  705. વિધિના લેખ અને બીજી વાતો
  706. વિનોદ વિહાર – ધનસુખલાલ કૃષ્ણલાલ મહેતા
  707. વિલોપન અને બીજી વાતો – ઝવેરચંદ મેઘાણી
  708. વિશેષ વાંચન પ્રવેશ – ધોરણ ૪ માટે
  709. વિશ્વ ના મહાન વૈજ્ઞાનિકો – ભાગ ૨ – ભરત ચૌહાણ
  710. વિશ્વવિગ્રહની યાદગાર યુદ્ધ કથાઓ – ભાગ ૨
  711. વિશ્વવિગ્રહની યાદગાર યુદ્ધ કથાઓ – ભાગ 3
  712. વિષ્ણુ પુરાણ ની કથાઓ – ન્હાનાલાલ નાથાભાઈ શાહ
  713. વિસરાઈ જતી વારસાઈ વાર્તાઓ – ભાગ ૧
  714. વિસરાઈ જતી વારસાઈ વાર્તાઓ – ભાગ ૧ અ
  715. વિસરાઈ જતી વારસાઈ વાર્તાઓ – ભાગ ૨
  716. વિસરાઈ જતી વારસાઈ વાર્તાઓ – ભાગ ૨ બ
  717. વિસરાઈ જતી વારસાઈ વાર્તાઓ
  718. વિસામો
  719. વીર ધર્મ ની વાતો – જયભિખ્ખુ
  720. વીર ની વાતો – ભાગ ૧
  721. વીર ની વાતો – ભાગ ૩
  722. વીર બાળક
  723. વીર બાળકોની વાર્તાઓ
  724. વીર શિવાજી 
  725. વીરબાળા અને બુરખાવાળી બલા
  726. વીરાંગના ની વાતો
  727. વેદ કથાઓ – ભાગ ૧
  728. વેદ કથાઓ – ભાગ ૨
  729. વેદ કથાઓ – ભાગ ૩
  730. વેર અને બદલો
  731. શબ્દાનુષંગે 
  732. શરદબાબુની બાળવાતો
  733. શાહનામાની વાર્તાઓ – અરદેશર બ. વેસાવાલા
  734. શિક્ષણ-ગીતા
  735. શિયાળની ચતુરાઈ
  736. શિષ્યો ની ગૌરવવંતી ગાથાઓ
  737. શિષ્યોની ગૌરવવંતી ગાથાઓ
  738. શુદ્ધ વાર્તાઓ
  739. શુભ સંગ્રહ – ૧ ભાગ પહેલો 
  740. શુભ સંગ્રહ – ૨ ભાગ બીજો
  741. શુભ સંગ્રહ – ૩ ભાગ ત્રીજો
  742. શુભ સંગ્રહ – ૪ ભાગ ચોથો
  743. શુભ સંગ્રહ – ૫ ભાગ પાંચમો
  744. શુભ સંગ્રહ – ૬ ભાગ છઠો
  745. શુભ સંગ્રહ – ૭ ભાગ સાતમો
  746. શુભ સંગ્રહ – ૮ ભાગ આઠમો 
  747. શુરવીર પાળીયા
  748. શૂન્યાવકાશ
  749. શેરલોક હોમ્સ નાં સાહસ કર્મો – ચંદુલાલ જેઠાલાલ વ્યાસ
  750. શોધ ને અંતે
  751. શોધમાં
  752. શ્રમજીવીઓ
  753. શ્રવણ કથા યાને – માંબાપની સેવા
  754. શ્રાવણી મેળો – ઉમાશંકર જોષી
  755. શ્રી આદર્શ ચરિત્ર સંગ્રહ – ભાગ બીજો
  756. શ્રી ગોકુલેશ્જી નાં બાસેઠ ભગવદીય પ્રસંગો
  757. શ્રી જેઠવા રાજવંશ ની કેટલીક વાર્તાઓ
  758. શ્રી જૈન શાળાપયોગી શિક્ષણ માળા – બીજી ચોપડી
  759. શ્રી બુદ્ધ ચરિત્ર તથા અન્ય સંત પુરુષો
  760. શ્રી માળી બ્રાહ્મણ જ્ઞાતિ અને અગ્ર ગણ્ય સ્ત્રી પુરુષો – ભાગ ૨ જો
  761. શ્રી મોરારી બાપુ કથિત – બોધક દ્રષ્ટાંત કથા
  762. શ્રી રામ કૃષ્ણ પરમહંસ ની દ્રષ્ટાંત કથાઓ
  763. શ્રી સત્યનારાયણ કથાની દિવ્ય શક્તિ
  764. શ્રી સુબોધ રત્નાકર
  765. શ્રીમદ લોક ભાગવત – ભાગ ૧
  766. શ્રીમદ લોક ભાગવત – ભાગ ૨
  767. શ્રીમાળી બ્રાહ્મણ જ્ઞાતિ અને અગ્રગણ્ય સ્ત્રી પુરુષો – ભાગ ૧ 
  768. શ્રીમાળી બ્રાહ્મણ જ્ઞાતિ અને અગ્રગણ્ય સ્ત્રી પુરુષો – ભાગ ૨
  769. શ્રેષ્ઠ ભયાનક કથાઓ – અશ્વિન ભટ્ટ
  770. સંત ભક્ત ચરિત – શ્રી ડોંગરેજી મહારાજ
  771. સંતો ના પ્રેરક પ્રસંગો
  772. સંસાર સ્વરાજ્ય અને બહાદુર બાળાઓ
  773. સંસારના રંગ – સરોજિની મહેતા
  774. સંસ્કૃત સાહિત્ય ની કથાઓ – ભાગ ૧ લો – ન્હાનાલાલ નાથાભાઈ શાહ
  775. સચિત્ર ટચુકડી કથાઓ – ભાગ – ૧
  776. સજ્જનોની સખાવત
  777. સતી ચરિત્ર – એક રમૂજી વાર્તા
  778. સતી ભદ્રા અને કવિ કાળીદાસ
  779. સત્ય વચની વિક્ટર અને જાદુઇ માછલી
  780. સત્યજીત રાય ની વિજ્ઞાન કથાઓ
  781. સત્યનારાયણ કથા
  782. સત્સંગ વાંચન માળા – ભાગ પહેલો
  783. સત્સંગ વાંચન માળા – ભાગ બીજો
  784. સત્સંગ-પ્રસંગ પુષ્પાંજલિ
  785. સદગુણી બાળકો
  786. સદબોધ વાર્તા સંગ્રહ – ભાગ ૧
  787. સદબોધ વાર્તામાળા – મણકો ૧ લો – દિપસિંહ શામભાઈ
  788. સદબોધ વાર્તાવળી
  789. સદબોધ સરિતા
  790. સફળ સફર
  791. સમણા
  792. સમર્પણ ની કથાઓ
  793. સર્જાતું સાહિત્ય – સાદિક
  794. સહેલી પાંચ વાર્તાઓ – ગોર અંબાલાલ છગનલાલ બહેરા
  795. સાચા મહાપુરુષો – સ્વામી સચ્ચિદાનંદ
  796. સાચી સલાહ
  797. સાત સુંદર વાતો – શ્રીયુત દેવદાસ
  798. સાદી શિખામણ – ૨
  799. સાદી શિખામણ – ૪
  800. સાદી શિખામણ – ૬
  801. સાદી શિખામણ – ૭
  802. સાદી શિખામણ – ૮
  803. સાદી સીધી વાતો – ભાગ ૧
  804. સામાજિક ટુંકી વાર્તાઓ – ૧ ગ્રંથ પહેલો – ભાગ ૧ થી ૪
  805. સામાજિક ટુંકી વાર્તાઓ – ૩ ગ્રંથ ત્રીજો
  806. સામાજિક ટુંકી વાર્તાઓ – ૪ ગ્રંથ ચોથો – ભાગ ૯ મો
  807. સામાજિક ટુંકી વાર્તાઓ – ૫ ગ્રંથ ૫ મો – ભાગ ૧૦ મો
  808. સામાજિક ટુંકી વાર્તાઓ – 6 ગ્રંથ ૬ ઠો – ભાગ ૧૧  મો
  809. સામાજિક ટુંકી વાર્તાઓ
  810. સામે કાંઠે સ્યામ
  811. સારંગીવાળો
  812. સારી શાળા
  813. સારી સારી વાતો – ભાગ ૧ – રમણલાલ નાનાલાલ શાહ
  814. સારી સારી વાતો – માણેકલાલ કાલિદાસ ભટ્ટ
  815. સાવકી માં
  816. સાહિત્ય વિલાસ – ભાગ ૧
  817. સાહિત્ય વિલાસ – ભાગ ૨
  818. સાહિત્ય વિલાસ – ભાગ ૩
  819. સિંહાસન બત્રીસી – કવિ શામળભટ્ટ – ભાગ ૨
  820. સિંહાસન બત્રીસી – ભાગ ૨ – કાવ્ય
  821. સુંદર કથા માળા – વફાદાર કૂતરો
  822. સુંદર વાતો – ગિજુભાઈ
  823. સુંદરવન ની શ્રેષ્ઠ વાતોઓ – શૈલેષ રાયચુરા
  824. સુખ ના દ્વાર
  825. સુદામચારિત્ર અને હૂંડી
  826. સુધન હાસ્યવાર્તા – હરનિશ જાની
  827. સુબોધ લહેરી – દલછારામ લક્ષ્મીરામ ત્રિવેદી
  828. સુબોધક કથા વાર્તાઓ
  829. સુબોધક નીતિકથા – ખારસેદજી બામનજી ફરામરોજ
  830. સુબોધક નીતિકથા
  831. સુબોધક વાર્તા સંગ્રહ
  832. સુરસેન અને વિરભદ્ર ની વારતા – ભાગ ૧
  833. સુલતાના ચાંદબીબી અને બીજાં સ્ત્રીરત્નો
  834. સુષ્મા
  835. સોક્રેટિસ ની સફર – અર્વિન
  836. સોક્રેટિસ ની સફર
  837. સોનાનું દેડકું
  838. સોનાનો મોર
  839. સોનેરી બાળવાર્તાઓ – શૈલેષ રાયચુરા
  840. સોનેરી સવાર
  841. સોનેરી સૂચનાઓ અને સુવિચાર
  842. સોરઠ તારા વહેતા પાણી
  843. સોરઠ ના સંતો
  844. સોરઠ ના સિદ્ધો
  845. સોરઠનાં સંત મહાત્માઓ – શ્રી કાલીદાસ મહારાજ
  846. સોરઠી ગીત કથાઓ – ઝુમખું પહેલું
  847. સોરઠી ગીત કથાઓ
  848. સોરઠી બહારવટિયા – ભાગ ૧ 
  849. સોરઠી બહારવટિયા – ભાગ ૨
  850. સોરઠી બહારવટિયા – ભાગ ૩
  851. સોરઠી બહારવટિયા
  852. સોરઠી બહારવટિયા
  853. સોરઠી બ્હારવટિયા – ઝવેરચંદ મેગાણી
  854. સોરઠી રસ ઝરણા – કવિ શિવસિંહ કાળુંભાઈવાળા
  855. સોરઠી શૌર્ય કથાઓ – દ્વિજકુમાર
  856. સોરઠી સંતો – ઝવેરચંદ મેઘાણી
  857. સોરઠી સંતો – ભાગ ૧
  858. સોરઠી સ્ત્રી સંતો
  859. સોલંકી યુગ ની કીર્તિ કથાઓ
  860. સૌની વાતો
  861. સૌરાષ્ટ્રની રસધાર – ભાગ ૧
  862. સૌરાષ્ટ્રની રસધાર – ભાગ ૨
  863. સૌરાષ્ટ્રની રસધાર – ભાગ ૩
  864. સૌરાષ્ટ્રની રસધાર – ભાગ ૪
  865. સૌરાષ્ટ્રની રસધાર – ભાગ ૫
  866. સૌરાષ્ટ્રનો મધપૂડો – સ્વામી સચ્ચિદાનંદ
  867. સૌરાસ્ટ્ર નું શૂરાતન – સ્વામી સચ્ચિદાનંદ
  868. સ્કાઉટિંગ અને બીજી વાતો
  869. સ્ત્રી શક્તિ ની રમૂજી વાતો
  870. સ્ત્રી સુબોધક વાર્તા માળા – પ્રભુશંકર નરભેરામ વ્યાસ
  871. સ્વધર્મ-નિષ્ઠ દૈવી જીવન – જેઠાલાલ ડી.દવે
  872. સ્વરાજ્ય પછી અને બીજી નવલિકાઓ
  873. સ્વરાજ્યની કથા – ભાગ ૨
  874. સ્વર્ગ ની કૂંચી – અમૃતલાલ એસ..પઢિયાર
  875. સ્વર્ગ ની સડક – અમૃતલાલ એસ..પઢિયાર
  876. સ્વર્ગ ની સીડી – અમૃતલાલ એસ..પઢિયાર
  877. સ્વર્ગ નું વિમાન – અમૃતલાલ એસ..પઢિયાર
  878. સ્વર્ગ નો આનંદ – અમૃતલાલ એસ..પઢિયાર
  879. સ્વર્ગ નો ખજાનો – અમૃતલાલ એસ..પઢિયાર
  880. સ્વર્ગ નો પ્રકાશ – અમૃતલાલ એસ..પઢિયાર
  881. હરણ નું બચ્ચું
  882. હરીશચંદ્ર અને આશા વીરેન્દ્રની 25 વાર્તાઓ
  883. હાજર જવાબી પ્રધાન ની વાતો – વકીલ દયાળજી રણછોડદાસ 
  884. હાથી ધમ ધમ ચાલે
  885. હારો ના હામ
  886. હાસ્ય કથામંજરી – ભાગ પહેલો
  887. હાસ્ય કથામંજરી – ભાગ બીજો
  888. હાસ્ય વિનોદ ગ્રંથમાળા – ગધેડું ને ઘોડું
  889. હાસ્ય વિનોદ ગ્રંથમાળા – ગપગોળા
  890. હાસ્ય વિનોદ ગ્રંથમાળા – જરા હસો
  891. હાસ્ય વિનોદ ગ્રંથમાળા – બાળકોના બીરબલ ભાગ ૧
  892. હાસ્ય વિનોદ ગ્રંથમાળા – બાળકોના બીરબલ ભાગ ૨
  893. હાસ્ય વિનોદ ગ્રંથમાળા – રામજીભાઈ પડી ગયા
  894. હિંદનાં બાળકો – દલપતરામ કે. ભટ્ટ
  895. હિંદીની શ્રેષ્ઠ વાર્તાઓ- શ્રી ઇન્દ્ર વસાવડા
  896. હિંમતે મર્દા – જયભિખ્ખુ
  897. હિતોપદેશ – સાકરલાલ તુળજાશંકર યાજ્ઞિક
  898. હિતોપદેશ ની વાતો – મનોજ દરુ
  899. હિન્દના આચાર્યો – ડૉ. હરિપ્રસાદ વ્રજરાય દેસાઈ
  900. હિન્દુસ્તાન ના દેવો
  901. હિન્દુસ્તાનના ઇતિહાસમાંથી સહેલી વાર્તાઓ
  902. હિમ્મત ના હાર – જીવન ગાડતર ગ્રંથ માળા ૨૫
  903. હીરાકણી અને બીજી વાતો – ધૂમકેતુ
Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

नकारात्मक सोच


एक व्यक्ति जो हमेशा नकारात्मक सोच रखता था, वह जब भी बोलता तो उसके मुख से या तो नकारात्मक, निराशा, चिंता, उग्रता और कड़वाहट भरी वाणी निकलती थी।

उस सज्जन के इस दुर्व्यवहार से उनके सगे संबंधियों और मित्रों को भी उनका साथ पसंद नही था और वे सब उस सज्जन से दूर भागते थे।

एक दिन उस आदमी के एक मित्र ने दूसरे किसी ज्ञानी व्यक्ति से इस नकारात्मक व्यक्ति की चिंता प्रकट की और उस ज्ञानी व्यक्ति से इनके लिए कुछ उपाय बताने की बात व्यक्त की।

उस ज्ञानी व्यक्ति ने कुछ समय सोचने के पश्चात यह कहा की कल उस व्यक्ति का इलाज करने में उनके घर आऊंगा और वो मित्र वहा से चला गया।

दूसरे दिन निर्धारित समय पर वो ज्ञानी सज्जन व्यक्ति बताए पते पर समय पर पहुंच गए और बैठे, और उस नकारात्मक व्यक्ति को भी वहा बिठाया गया, और फिर तुरंत उस ज्ञानी व्यक्ति ने आदेश दिया की “मुझे कड़वा काढ़ा बहुत पसंद है तो सबके लिए बनाओ”

ज्ञानी व्यक्ति के आदेश पर तुरंत काढ़ा बनाया गया और सबके सामने रखा गया
सबने एक बार एक ही घुट में पी लिया

फिर वो ज्ञानी व्यक्ति ने इस नकारात्मक व्यक्ति की और इशारा कर के कहा की इनके बर्तन में और काढ़ा डाला जाए
जैसे आदेश हुआ वैसे ही उनके बर्तन में कड़वा काढ़ा डाला गया वो व्यक्ति फिर से पी गया
तीसरी बार वो ज्ञानी व्यक्ति ने कहा की फिर से डालो
फिर से वो नकारात्मक व्यक्ति पी गया
ज्ञानी व्यक्ति ने फिर से काढ़ा डालने का आदेश दिया

कड़वा काढ़ा इतनी बार पी कर उस नकारात्मक व्यक्ति की जीभ में बहुत कड़वाहट भर गई और वो गुस्से से लाल पीला हो गया और वह ज्ञानी व्यक्ति शांति से यह सब देख रहे थे
थोड़ी देर में वो नकारात्मक व्यक्ति गुस्से से बोल पड़ा यह क्या मजाक है..?

तब उस ज्ञानी व्यक्ति ने जैसे अपना मौन तोड़ते हुए कहा की अब इनके लिए कुछ मिष्टान्न रखे जाए।

जैसे ही आदेश किया गया उनके सामने कुछ व्यंजन और भांति भांति के मिष्टान्न रखे गए और ज्ञानी व्यक्ति ने उस व्यक्ति को खाने का आदेश दिया।

उस नकारात्मक व्यक्ति ने जैसे पहले कभी मिठाई देखी न हो ऐसे मिठाई पर टूट पड़ा फिर जब वो मिठाई से ऊब गया तब उस ज्ञानी व्यक्ति ने कहा

“देखा..? जैसे एक दो बार काढ़ा पीने की तुम्हारी क्षमता से ज्यादा कड़वाहट तुमको दी गई तो उससे आप ऊब से गए और क्रोधित हो गए और कड़वाहट के बाद आप मिठाई पर ऐसे टूट पड़े जैसे मक्खियां!
जिंदगी में कड़वाहट भरी वाणी भी जरूरी है परंतु उसके बाद मधुर और स्नेह भरी वाणी भी तो जरूरी है। तुम्हारी बात कहने का तात्पर्य सच हो सकता है लेकिन बात प्रकट करने का तरीका सही नही है, जैसे कौआ और कोयल दोनो क्या बोलते है हमे कुछ नही पता फिर भी हमें कौवे की वाणी कर्कश और कोयल की आवाज मधुर लगती हैं।
इसी प्रकार आप जो भी बोलो मधुर बोलो सब आपको सुनना पसंद करेंगे।”

उस व्यक्ति को अब समझ आ गया था और पछतावे के साथ वो माफी मांगते हुए उस ज्ञानी व्यक्ति का शरण ग्रहण करते हुए उनके पैर में गिर गया।

Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

वेदों की विहंगम दृष्टि में नारी


Anand Nimbadia,
चलिए हजारो साल पुराना इतिहास पढ़ते हैं।

सम्राट शांतनु ने विवाह किया एक मछवारे की पुत्री सत्यवती से।उनका बेटा ही राजा बने इसलिए भीष्म ने विवाह न करके,आजीवन संतानहीन रहने की भीष्म प्रतिज्ञा की।

सत्यवती के बेटे बाद में क्षत्रिय बन गए, जिनके लिए भीष्म आजीवन अविवाहित रहे, क्या उनका शोषण होता होगा?

महाभारत लिखने वाले वेद व्यास भी मछवारे थे, पर महर्षि बन गए, गुरुकुल चलाते थे वो।

विदुर, जिन्हें महा पंडित कहा जाता है वो एक दासी के पुत्र थे, हस्तिनापुर के महामंत्री बने, उनकी लिखी हुई विदुर नीति, राजनीति का एक महाग्रन्थ है।

भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया।

श्रीकृष्ण दूध का व्यवसाय करने वालों के परिवार से थे,

उनके भाई बलराम खेती करते थे, हमेशा हल साथ रखते थे।

यादव क्षत्रिय रहे हैं, कई प्रान्तों पर शासन किया और श्रीकृषण सबके पूजनीय हैं, गीता जैसा ग्रन्थ विश्व को दिया।

राम के साथ वनवासी निषादराज गुरुकुल में पढ़ते थे।

उनके पुत्र लव कुश महर्षि वाल्मीकि के गुरुकुल में पढ़े जो वनवासी थे

तो ये हो गयी वैदिक काल की बात, स्पष्ट है कोई किसी का शोषण नहीं करता था,सबको शिक्षा का अधिकार था, कोई भी पद तक पहुंच सकता था अपनी योग्यता के अनुसार।

वर्ण सिर्फ काम के आधार पर थे वो बदले जा सकते थे, जिसको आज इकोनॉमिक्स में डिवीज़न ऑफ़ लेबर कहते हैं वो ही।

प्राचीन भारत की बात करें, तो भारत के सबसे बड़े जनपद मगध पर जिस नन्द वंश का राज रहा वो जाति से नाई थे ।

नन्द वंश की शुरुवात महापद्मनंद ने की थी जो की राजा नाई थे। बाद में वो राजा बन गए फिर उनके बेटे भी, बाद में सभी क्षत्रिय ही कहलाये।

उसके बाद मौर्य वंश का पूरे देश पर राज हुआ, जिसकी शुरुआत चन्द्रगुप्त से हुई,जो कि एक मोर पालने वाले परिवार से थे और एक ब्राह्मण चाणक्य ने उन्हें पूरे देश का सम्राट बनाया । 506 साल देश पर मौर्यों का राज रहा।

फिर गुप्त वंश का राज हुआ, जो कि घोड़े का अस्तबल चलाते थे और घोड़ों का व्यापार करते थे।140 साल देश पर गुप्ताओं का राज रहा।

केवल पुष्यमित्र शुंग के 36 साल के राज को छोड़ कर 92% समय प्राचीन काल में देश में शासन उन्ही का रहा, जिन्हें आज दलित पिछड़ा कहते हैं तो शोषण कहां से हो गया? यहां भी कोई शोषण वाली बात नहीं है।

फिर शुरू होता है मध्यकालीन भारत का समय जो सन 1100- 1750 तक है, इस दौरान अधिकतर समय, अधिकतर जगह मुस्लिम शासन रहा।

अंत में मराठों का उदय हुआ, बाजी राव पेशवा जो कि ब्राह्मण थे, ने गाय चराने वाले गायकवाड़ को गुजरात का राजा बनाया, चरवाहा जाति के होलकर को मालवा का राजा बनाया।

अहिल्या बाई होलकर खुद बहुत बड़ी शिवभक्त थी। ढेरों मंदिर गुरुकुल उन्होंने बनवाये।

मीरा बाई जो कि राजपूत थी, उनके गुरु एक चर्मकार रविदास थे और रविदास के गुरु ब्राह्मण रामानंद थे|।

यहां भी शोषण वाली बात कहीं नहीं है।

मुग़ल काल से देश में गंदगी शुरू हो गई और यहां से पर्दा प्रथा, गुलाम प्रथा, बाल विवाह जैसी चीजें शुरू होती हैं।

1800 -1947 तक अंग्रेजो के शासन रहा और यहीं से जातिवाद शुरू हुआ । जो उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत किया।

अंग्रेज अधिकारी निकोलस डार्क की किताब “कास्ट ऑफ़ माइंड” में मिल जाएगा कि कैसे अंग्रेजों ने जातिवाद, छुआछूत को बढ़ाया और कैसे स्वार्थी भारतीय नेताओं ने अपने स्वार्थ में इसका राजनीतिकरण किया।

इन हजारों सालों के इतिहास में देश में कई विदेशी आये जिन्होंने भारत की सामाजिक स्थिति पर किताबें लिखी हैं, जैसे कि मेगास्थनीज ने इंडिका लिखी, फाहियान, ह्यू सांग और अलबरूनी जैसे कई। किसी ने भी नहीं लिखा की यहां किसी का शोषण होता था।

योगी आदित्यनाथ जो ब्राह्मण नहीं हैं, गोरखपुर मंदिर के महंत हैं, पिछड़ी जाति की उमा भारती महा मंडलेश्वर रही हैं। जन्म आधारित जातीय व्यवस्था हिन्दुओ को कमजोर करने के लिए लाई गई थी।

इसलिए भारतीय होने पर गर्व करें और घृणा, द्वेष और भेदभाव के षड्यंत्रों से खुद भी बचें और औरों को भी बचाएं..।।🚩🚩

भवितव्य मिश्र, [07/12/2021 8:22 PM]
🔥 वेदों की विहंगम दृष्टि में नारी 🔥

✍️ :- भवितव्य आर्य “मनुगामी”

स्त्री को शास्त्र-अध्ययन का निषेध करने वाले स्वयं शास्त्रों से कितनी दूर थे, इसका एक छोटा उदाहरण यह शोध-कणिका है।

पिछले दिनों सबरीमाला मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश और उसपर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की चर्चाएँ जोरों पर थीं। नारी अधिकारों की बात कुछ नई नहीं है।

इस्लाम में दो महिलाओं की गवाही को एक पुरुष के बराबर माना गया है वहीं प्रथम स्त्री हौवा को आदम की पसली से बना बताया जाता है, पुरूष वहां भी आगे है।

मुसलमानो के इस स्थापना की जड़ ईसाइयों की बाइबिल है, जो किसी स्थिति में कमतर नहीं है, जिसकी दृष्टि में महिला केवल पुरूष को इन्द्रिय सुख की तृप्ति के लिए गढ़ी गई है।

यहूदियों की मान्यता भी इसी के आर्श्व-पार्श्व विचरण करती है। इससे भी बड़ी भयावह बात यह है कि पश्चिमी सभ्यता में स्त्री की “मानव-जाति” में गिनती ही नहीं की जाती थी।

वो तो भला हो विज्ञान का, जिससे भयाकुल यूरोपीय समाज मजबूरन संसद में कानून बनाकर अभी कुछ सौ साल पहले स्त्री को “मानव जाति” का होना स्वीकार किया।

इसी प्रकार बौद्ध मत में स्त्रियों को बुद्धत्व प्राप्ति का अधिकार नहीं है। त्रिपिटक में स्त्रियों को अनेक जन्मजात दुर्गुणों से युक्त बताया है।

जैन मत में स्त्री को अगले जन्म में पुरुष शरीर धारण करने के पश्चात ही मोक्ष का अधिकारी माना है।

यदि वेदों की दिव्य विहंगम दृष्टि को स्वयं में स्थापित कर लिया जाए तो विश्व भर में मजहब अथवा सम्प्रदाय के नाम पर उत्पात मचाने वाले इन सभी मिथ्या-विवादों अथवा विश्वासों की चूल हिल जाएगी।

भारतीय ज्ञान परम्परा पर विहंगम दृष्टि डालने से यह विदित होता है कि इस समृद्ध परम्परा में लैंगिक समानता व न्याय के स्वर यत्र-तत्र बिखरे पड़े हैं। अग्रलिखित उद्धरण दृष्टव्य है:-

(1) वेद यदि पुरुष को ‘ओजस्वान्’ (अथर्व. 8.5.4) ओज वाला कहता है तो स्त्री को ‘ओजस्वती’ (यजु. 10.3) कहता है।

(2) पुरुष यदि ‘सहस्त्रवीर्यः’ (अथर्व. 2.4.2) सहस्त्र पराक्रम वाला है तो स्त्री ‘सहस्त्रवीर्याः’ (यजु. 13.26) कही गई है।

(3) पुरुष यदि ‘सहीयान्’ (ऋ. 1.61.7) अत्यन्त बल वाला है, तो स्त्री ‘सहीयसी’ (अथर्व. 10.5.43) बताई गई।

(4) पुरुष को यदि ‘सम्राट’ (ऋ. 2.28.6) शासक कहा, तो स्त्री को ‘सम्राज्ञी’ (ऋ. 1.85.64) कहा गया।

(5) पुरुष यदि ‘मनीषी’ (ऋ. 9.96.8) मन वशीकरण करने वाला है तो स्त्री ‘मनीषा’ (ऋ. 1.101.7) है।

(6) पुरुष यदि ‘राजा’ (अथर्व. 1.33.2) दीप्तिमान् कहा गया, तो स्त्री ‘राज्ञी’ (यजु. 14.13) कही गई।

(7) पुरुष यदि ‘सभासदः’ (अथर्व. 20.21.3) सभाओं के अधिकारी हैं, तो स्त्री ‘सभासदा’ (अथर्व. 8.8.9) है।

(8) पुरुष को यदि ‘अषाडहः’ (ऋ. 7.20.3) अपराजित घोषित किया गया, तो स्त्री ‘अषाढा’ (यजु. 13.26) प्रसिद्ध हुई।

(9) पुरुष यदि ‘यज्ञियः’ (ऋ. .14.3) यज्ञ करने वाला, की उपाधि से युक्त है तो स्त्री ‘यज्ञिया’ (यजु. 4.19) से सुभूषित है।

(10) यदि पुरुष ‘ब्रह्मायं वाचः’ (ऋ. 10.71.11) ब्रह्मा = (चतुर्वेद वेत्ता) नाम से शोभित हुआ, तो स्त्री भी ‘स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ’ (ऋ. 8.33.19) ‘ब्रह्मा’ संज्ञा से विभूषित हुई, आदि आदि।

ये तो बस कुछ उद्धरण मात्र हैं, वेदों में ऐसे प्रतिमानों का भण्डार है, जो कदाचित संसार के अन्य किसी ग्रंथ, साहित्य या परम्परा में देखने को नहीं मिलते।

भारतीय विश्वदृष्टि समस्त चराचर जगत् की तात्विक एकता का उद्घोष करती है।

आज आवश्यकता है वेदों की इस विहंगम सम्यक् दृष्टि को अपनाने की, जिसके द्वारा ही विज्ञानमय नए युग का भव्य स्वागत किया जा सकता है।

Posted in वर्णाश्रमव्यवस्था:

पिछड़ी जाती


Anand Nimbadia
चलिए हजारो साल पुराना इतिहास पढ़ते हैं।

सम्राट शांतनु ने विवाह किया एक मछवारे की पुत्री सत्यवती से।उनका बेटा ही राजा बने इसलिए भीष्म ने विवाह न करके,आजीवन संतानहीन रहने की भीष्म प्रतिज्ञा की।

सत्यवती के बेटे बाद में क्षत्रिय बन गए, जिनके लिए भीष्म आजीवन अविवाहित रहे, क्या उनका शोषण होता होगा?

महाभारत लिखने वाले वेद व्यास भी मछवारे थे, पर महर्षि बन गए, गुरुकुल चलाते थे वो।

विदुर, जिन्हें महा पंडित कहा जाता है वो एक दासी के पुत्र थे, हस्तिनापुर के महामंत्री बने, उनकी लिखी हुई विदुर नीति, राजनीति का एक महाग्रन्थ है।

भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया।

श्रीकृष्ण दूध का व्यवसाय करने वालों के परिवार से थे,

उनके भाई बलराम खेती करते थे, हमेशा हल साथ रखते थे।

यादव क्षत्रिय रहे हैं, कई प्रान्तों पर शासन किया और श्रीकृषण सबके पूजनीय हैं, गीता जैसा ग्रन्थ विश्व को दिया।

राम के साथ वनवासी निषादराज गुरुकुल में पढ़ते थे।

उनके पुत्र लव कुश महर्षि वाल्मीकि के गुरुकुल में पढ़े जो वनवासी थे

तो ये हो गयी वैदिक काल की बात, स्पष्ट है कोई किसी का शोषण नहीं करता था,सबको शिक्षा का अधिकार था, कोई भी पद तक पहुंच सकता था अपनी योग्यता के अनुसार।

वर्ण सिर्फ काम के आधार पर थे वो बदले जा सकते थे, जिसको आज इकोनॉमिक्स में डिवीज़न ऑफ़ लेबर कहते हैं वो ही।

प्राचीन भारत की बात करें, तो भारत के सबसे बड़े जनपद मगध पर जिस नन्द वंश का राज रहा वो जाति से नाई थे ।

नन्द वंश की शुरुवात महापद्मनंद ने की थी जो की राजा नाई थे। बाद में वो राजा बन गए फिर उनके बेटे भी, बाद में सभी क्षत्रिय ही कहलाये।

उसके बाद मौर्य वंश का पूरे देश पर राज हुआ, जिसकी शुरुआत चन्द्रगुप्त से हुई,जो कि एक मोर पालने वाले परिवार से थे और एक ब्राह्मण चाणक्य ने उन्हें पूरे देश का सम्राट बनाया । 506 साल देश पर मौर्यों का राज रहा।

फिर गुप्त वंश का राज हुआ, जो कि घोड़े का अस्तबल चलाते थे और घोड़ों का व्यापार करते थे।140 साल देश पर गुप्ताओं का राज रहा।

केवल पुष्यमित्र शुंग के 36 साल के राज को छोड़ कर 92% समय प्राचीन काल में देश में शासन उन्ही का रहा, जिन्हें आज दलित पिछड़ा कहते हैं तो शोषण कहां से हो गया? यहां भी कोई शोषण वाली बात नहीं है।

फिर शुरू होता है मध्यकालीन भारत का समय जो सन 1100- 1750 तक है, इस दौरान अधिकतर समय, अधिकतर जगह मुस्लिम शासन रहा।

अंत में मराठों का उदय हुआ, बाजी राव पेशवा जो कि ब्राह्मण थे, ने गाय चराने वाले गायकवाड़ को गुजरात का राजा बनाया, चरवाहा जाति के होलकर को मालवा का राजा बनाया।

अहिल्या बाई होलकर खुद बहुत बड़ी शिवभक्त थी। ढेरों मंदिर गुरुकुल उन्होंने बनवाये।

मीरा बाई जो कि राजपूत थी, उनके गुरु एक चर्मकार रविदास थे और रविदास के गुरु ब्राह्मण रामानंद थे|।

यहां भी शोषण वाली बात कहीं नहीं है।

मुग़ल काल से देश में गंदगी शुरू हो गई और यहां से पर्दा प्रथा, गुलाम प्रथा, बाल विवाह जैसी चीजें शुरू होती हैं।

1800 -1947 तक अंग्रेजो के शासन रहा और यहीं से जातिवाद शुरू हुआ । जो उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत किया।

अंग्रेज अधिकारी निकोलस डार्क की किताब “कास्ट ऑफ़ माइंड” में मिल जाएगा कि कैसे अंग्रेजों ने जातिवाद, छुआछूत को बढ़ाया और कैसे स्वार्थी भारतीय नेताओं ने अपने स्वार्थ में इसका राजनीतिकरण किया।

इन हजारों सालों के इतिहास में देश में कई विदेशी आये जिन्होंने भारत की सामाजिक स्थिति पर किताबें लिखी हैं, जैसे कि मेगास्थनीज ने इंडिका लिखी, फाहियान, ह्यू सांग और अलबरूनी जैसे कई। किसी ने भी नहीं लिखा की यहां किसी का शोषण होता था।

योगी आदित्यनाथ जो ब्राह्मण नहीं हैं, गोरखपुर मंदिर के महंत हैं, पिछड़ी जाति की उमा भारती महा मंडलेश्वर रही हैं। जन्म आधारित जातीय व्यवस्था हिन्दुओ को कमजोर करने के लिए लाई गई थी।

इसलिए भारतीय होने पर गर्व करें और घृणा, द्वेष और भेदभाव के षड्यंत्रों से खुद भी बचें और औरों को भी बचाएं..।।🚩🚩

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राजा भोज


भारत में कई सदियों पहले एक किताब (मेरुतुंगाचार्य रचित प्रबन्ध चिन्तामणि) आई थी जिसमें महान लोगों के बारे में कई हस्तलिखित कहानियाँ थी। कोई कहता है किताब १३१० के दशक में आई तो कोई उसे १३६० के दशक का मानता है, १३१० वाले ज़्यादा लोग हैं। खैर मुद्दा वो नहीं है, किताब का १४ वीं सदी का होना ही काफी है। उसमें राजा भोज पर भी कई कहानिया है जिसमें से एक ये है, जिसे थोड़ा ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए –
एक रात अचानक आँख खुल जाने से राजा भोज ने देखा कि चाँदनी के छिटकने से बड़ा ही सुहावना समय हो रहा है, और सामने ही आकाश में स्थित चन्द्रमा देखने वाले के मन मे आल्हाद उत्पन्न कर रहा है। यह देख राजा की आँखें उस तरफ अटक गई और थोड़ी देर में उन्होने यह श्लोकार्ध पढ़ा –
यदेतइन्द्रान्तर्जलदलवलीलां प्रकुरुते।
तदाचष्टे लेाकः शशक इति नो सां प्रति यथा॥
अर्थात् – “चाँद के भीतर जो यह बादल का टुकड़ा सा दिखाई देता है लोग उसे शशक (खरगोश) कहते हैं। परन्तु मैं ऐसा नहीं समझता।”
संयोग से इसके पहले ही एक विद्वान् चोर राज महल मे घुस आया था और राजा के जाग जाने के कारण एक तरफ छिपा बैठा था। जब भोज ने दो तीन वार इसी श्लोकार्ध को पढ़ा और अगला श्लोकार्ध उनके मुँह से न निकला तब उस चोर से चुप न रहा गया और उसने आगे का श्लोकार्ध कह कर उस श्लोक की पूर्ति इस प्रकार कर दी-
अहं त्विन्दु मन्ये त्वरिविरहाक्रान्ततरुणो।
कटाक्षोल्कापातव्रणशतकलङ्काङ्किततनुम्॥
अर्थात् – “मै तो समझता हूं कि तुम्हारे शत्रुओ की विरहिणी स्त्रियो के कटाक्ष रूपी उल्काओं के पड़ने से चन्द्रमा के शरीर में सैकड़ों घाव हो गए हैं और ये उसी के दाग़ हैं।”
अपने पकड़े जाने की परवाह न करने वाले उस चोर के चमत्कार पूर्ण कथन को सुनकर भोज बहुत खुश हुये और सावधानी के तौर पर उस चोर को प्रातःकाल तक के लिये एक कोठरी मे बंद करवा दिया। परंतु उस समय विद्वता की पूछ परख ज्यादा थी सो अगले दिन प्रातः उसे भारी पुरस्कार देकर विदा किया गया।

लगभग 250 साल के लंबे अंतराल के बाद, गेलेलियों ने ३० नवंबर सन १६०९ को पहली बार टेलिस्कोप से चंद्रमा देखा और अपनी डायरी में नोट किया कि, “चंद्रमा की सतह चिकनी नहीं है जैसी कि मानी जाती थी (क्योंकि केवल आंखो से वह ऐसी ही दिखती है), बल्कि असमतल और ऊबड़-खाबड़ है।” वहाँ उन्हे पहाड़ियाँ और गड्ढों जैसी रचनाएँ नज़र आई थी। उन्होने टेलिस्कोप से खुद के देखे चंद्रमा एक स्केच भी अपनी डायरी में बनाया।

कहानी का सार बस इतना है कि जिस समय चर्च यह मानता था कि रात का आसमान एक काली चादर है, जिसमें छेद हो गए और उसमे से स्वर्ग का प्रकाश तारों के रूप में दिख रहा है, उस समय भारत के एक चोट्टे को भी ये पता था कि चंद्रमा की सतह समतल नहीं है और उस पर जो दाग हैं वो उल्काओं के गिरने से बने हैं। बात खतम।

अब ये अलग बात है कि स्वयंभू वामपंथी इतिहासकारों, सेक्युलरता के घातक रोग से पीड़ित लिबरलों, और खुद पर ही शर्मिंदा कुछ भारतीय गोरों को यह बात आज भी नहीं पता, क्योंकि ना तो उन्हे इतिहास का अध्ययन करना आता है और ना ही उनमें इतनी क्षमता ही है।