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हमारे पड़ोस में एक आँटी रहती हैं


 

हमारे पड़ोस में एक आँटी रहती हैं। क्रिश्चि-यन है, पति काफी पहले एक हादसे में गुज़र गए थे। एक बेटा और एक बेटी है। बेटी की एक सम्पन्न परिवार मैं शादी हो चुकी है। बेटा पढ़ाई पूरी कर चुका है और ज्यादातर समय दोस्तों के साथ घूमने में बिताता है। जिंदगी सुख से कट रही थी कि तभी किसी ने आंटी के बेटे को परधानी का चुनाव लड़ने की सलाह दे दी।

प्रधानी जीतने के लिए सबसे पहले तो समाज में अच्छी छवि होनी चाहिए, तो बेटे ने समाजसेवा काम शुरू कर दिया। हर आपदा में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने लगा। पिछले दिनों केरल में बाढ़ आई थी तो बेटा तुंरन्त ही केरल के सबसे ज्यादा बाढ़ प्रभावित जिलों जर्मनी और इंग्लैंड की यात्रा पर निकल गया था। परधानी का चुनाव जीतने के लिए समाज सेवा तक तो ठीक था, लेकिन धीरे-धीरे परधान बनना उसकी बीमारी बनता गया।

उसकी बीमारी का सबसे पहला लक्षण तब प्रकट हुआ जब उसने गांव में बेरोजगारी के खिलाफ एक जनसभा की और वहां माइक पर जोर जोर से चिल्लाने लगा ‘खून मेरा गरम है क्योंकि हिंदू मेरा धर्म है।’ मैंने उसी वक्त आंटी को चेताया था कि इस पर कड़ी नजर रखो वरना ये मेरा जशु जशु करना भूल कर वसीम रिजवी बन जाएगा।

आंटी ने ध्यान नहीं दिया और लड़के की बीमारी बढ़ती गई। दिन भर गाँधी जी की फ़ोटो सीने से लगाकर घूमता है और कहता है कि अंग्रेज़ो का दला-ल सावर-कर अगर चाहता तो गाँधी जी को बचा सकता था। मैंने पूछा किसने कहा तो बोला मेरे बाप का नाना रिटायर्ड स्वतंत्रता सेनानी ज्वार लाल लेहरू जिसने अंग्रेज़ो से लोहा लेकर मेरे बाप को कम्प्यूटर बनाने के लिए दिया।

ऐसा नहीं है कि लड़का दिल का बुरा हो। सर्वधर्म समभाव में यकीन रखता है। हिन्दू बनने को इतना उतावला है कि अंतरराष्ट्रीय गो रक्षक समूह के नाम से व्हाटसअप और फेसबुक ग्रुप बना लिया है। भोला इतना है कि एक दिन सड़क पर घूम रहे सांड को गाय समझ बैठा। फिर क्या था, फेसबुक पर अपलोड करने के लिए सांड़ के साथ सेल्फी लेने बैठ गया, “आज सुबह गाय माता का दूध दुहते आपके गौ सेवक राहुल पंडा।’

सांड़ ने दो तीन बार मुंडी हिलाकर चेतावनी दी कि तेरे हाथ मे जो हैं वो तेरे नाना का कश्मीर नहीं, मेरा अंडमान निकोबार है, लेकिन लड़के का ध्यान बाएं हाथ मे पकड़े मोबाइल के कैमरे की तरफ था और वो लगातार दाएं हाथ से सांड़ का दूध दुहने का प्रयास करता रहा।

फिर मजबूरन सांड़ को अपना अंडमान निकोबार बचाना पड़ा। लड़के की पीछे वाली छाती में सींगों के आधा दर्जन घाव हैं, 24 टांकें लगे हैं। लड़का सरकारी अस्पताल में भर्ती है और ‘हिंदुत्ववा-दी पीछे से छाती में वा-र करता है’ चिल्ला चिल्ला कर पूरा अस्पताल सर पर उठा रखा है। उसकी माँ का रो रो कर बुरा हाल है। पीछे वाले दिमाग का कोई डॉक्टर हो सजेस्ट करिए, लड़के की जान बचाना बहुत जरूरी है।

रामचंद्र आर्य

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श्रीकाशी विश्वनाथ


मार्कण्डेय स्वर्णकार

ये कहानी है अहल्या बाई होल्कर और श्रीकाशी विश्वनाथ की….. इसी कहानी में मोदी और श्रीकाशी विश्वनाथ धाम के विरोध का रहस्य छिपा है……..विरोध केवल मोदी का ही नहीं हो रहा है और विरोध पहली बार ही हो रहा है ऐसा भी नहीं है।विरोध तो श्रीमंत मल्हार राव होल्कर और मातोश्री अहल्याबाई होल्कर का भी हुआ था। बुरा लग सकता है लेकिन आज लिखना आवश्यक है: 1735 में बाजीराव पेशवा की माँ राधाबाई तीर्थयात्रा पर काशी आईं।उनके लौटने के पश्चात ‘काशी के कलंक’ को मिटा देने के संकल्प के साथ पेशवा बाज़ीराव के सेनापति मल्हार राव होल्कर 1742 में गंगा के मैदानों में आगे बढ़ रहे थे। उस समय पेशवाओं की विजय पताका चहुँओर लहरा रही थी।काशी विश्वनाथ के मन्दिर की मुक्ति सुनिश्चित थी। 27 जून 1742 को मल्हार राव होल्कर जौनपुर तक आ चुके थे। उस समय काशी के कुछ तथाकथित प्रतिष्ठित लोग उनके पास पहुँच गए और कहा कि “आप तो मस्जिद को तोड़ देंगे लेकिन आप के चले जाने के बाद मुसलमानों से हमारी रक्षा कौन करेगा।” इस तरह बाबा की मुक्ति के बजाय स्वयं की सुरक्षा को ऊपर रखने वाले काशी के कुछ धूर्तों ने उन्हें वापस लौटा दिया। बाबा विश्वनाथ के मन्दिर की पुनर्स्थापना होती होती रह गई। मल्हार राव होल्कर लौट तो गए लेकिन उनके मन में कसक बनी रही। वही कसक और पीड़ा श्रीमन्त मल्हार राव होल्कर से उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई होल्कर को स्थानान्तरित हुई।अहल्याबाई के लिए उनके ससुर मल्हार राव होल्कर ही प्रेरणा थे क्योंकि अहल्याबाई का जन्म किसी राजघराने में नहीं हुआ था। उनके पिता एक गाँव के सरपंच मात्र थे। एक दिन कुमारिका अहल्या मंदिर में सेवा कर रही थी। भजन गाती और गरीबों को भोजन कराती अहल्याबाई के उच्च कोटि के संस्कारों को मालवा के अधिपति मल्हारराव होल्कर ने देखा। उसी समय उन्होंने तय कर लिया कि अहल्य ही उनके बेटे खाण्डेराव की पत्नी बनेंगी। वर्ष 1733 में अहल्याबाई का विवाह खाण्डेराव होल्कर से हो गया। अहल्याबाई की आयु 8 वर्ष थी। खाण्डेराव अहल्याबाई से 2 साल बड़े थे।सन 1754 में एक युद्ध के दौरान खाण्डेराव वीरगति को प्राप्त हो गए। अहल्याबाई के जीवन में अंधेरा छा गया। अहल्याबाई सती हो जाना चाहती थी किन्तु मल्हार राव ने अहल्याबाई को न केवल सती होने से रोका बल्कि मानसिक तौर पर उन्हें मजबूत भी किया। शासन सञ्चालन के सूत्रों का प्रशिक्षण देकर मालवा का शासन सम्भालने के लिए तैयार किया। 1766 में मल्हार राव के मृत्योपरांत अहल्याबाई होल्कर ने मालवा का शासन अपने हाथों में ले लिया।काशी विश्वनाथ का मन्दिर महारानी अहल्याबाई होल्कर की अमूल्य कीर्ति है। काशी के लिए अहल्याबाई होल्कर का क्या योगदान है। इसे इतिहास का अवलोकन किए बिना नहीं समझा जा सकता।आनन्दवन काशी को पहला आघात 1194 में लगा था। जब मोहम्मद गोरी के सिपहसलार क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने काशी विश्वनाथ समेत यहाँ के प्रमुख मंदिरों को तोड़ दिया। बाद के कालखण्डों में हुसैन शाह सिरकी (1447-1458) और सिकंदर लोधी (1489-1517) ने काशी विश्वनाथ और काशी के अन्य प्रमुख मंदिरों को तोड़ा। बार-बार काशी पर इस्लामिक हमलावर आघात करते रहे लेकिन शिवनगरी काशी पुनः पुनः हिन्दुत्व के अमृततत्व से सँवरती रही।अकबर के कालखण्ड में काशी के जगतप्रसिद्ध धर्मगुरु पण्डित नारायण भट्ट की प्रेरणा से राजा टोडरमल ने 1585 में पुनः काशी विश्वनाथ के भव्य मंदिर का निर्माण कराया। हालाँकि इसमें अकबर का कोई योगदान नहीं था। यह बात इसलिए लिखनी पड़ रही है कि सुब्रह्मण्यम स्वामी ने अपने एक लेख में लिखा था और अभी फिर से लिखा है कि विश्वनाथ मंदिर के लिए अकबर ने धन दिया था।यह सच नहीं है। इसी मन्दिर को औरंगज़ेब के 18 अप्रेल 1669 के फ़रमान से तोड़ दिया गया। मन्दिर के ध्वस्त अवशेषों से ही उसी स्थान पर वर्तमान मस्जिद खड़ी कर दी गयी। पीछे की तरफ मन्दिर का कुछ हिस्सा छोड़ दिया गया ताकि इसे देख कर ग्लानि से हिन्दु रोते रहें।काशी विश्वनाथ का मन्दिर ध्वस्त कर दिया गया था लेकिन 1669 से ही भग्नावशेष एवं स्थान की पूजा चलती रही। मुक्ति के विभिन्न प्रयास भी चलते रहे। मंदिर का पुनर्निर्माण और भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा करना समस्त राजा महाराजाओं और संतों के सामने प्रश्नचिह्न बना हुआ था। काशी के तीर्थपुरोहितों की बहियों से ऐसा ज्ञात होता है कि 1676 ई. में रीवा नरेश महाराजा भावसिंह तथा बीकानेर के राजकुमार सुजानसिंह काशी आए थे। इन दोनों राजाओं ने मंदिर निर्माण की पहल तो की लेकिन सफल नहीं हो पाये। उन्होंने विश्वेश्वर के निकट ही शिवलिंगों को स्थापित अवश्य किया। इसी क्रम में मराठों के मंत्री नाना फड़नवीस के प्रयास भी असफल रहे। 1750 में जयपुर के महाराजा सवाई माधो सिंह ने परिसर की पूरी ज़मीन ख़रीद कर विश्वनाथ मंदिर के निर्माण की योजना बनायी जो कि परवान नहीं चढ़ सकी। 7 अगस्त 1770 को महादजी सिंधिया ने दिल्ली के बादशाह शाह आलम से मंदिर तोड़ने की क्षतिपूर्ति वसूल करने का आदेश जारी करा लिया परंतु तब तक काशी पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज हो गया था।यह योजना भी पूरी नहीं हो पायी।इतने असफल प्रयासों के पश्चात अहल्याबाई होलकर को सफलता प्राप्त हुई। अहल्याबाई ने वह करके दिखा दिया जिसे समस्त हिन्दू राजा 111 वर्षों में नहीं कर सके थे। अहल्याबाई के प्रयासों से 1777 से प्रारंभ होकर 1781 ई. में वर्तमान मंदिर का निर्माण मूल स्थान से दक्षिण की दिशा में थोड़ा हटकर भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पूर्ण हुआ।महारानी अहल्याबाई ने काशी विश्वनाथ मंदिर की स्थापना के साथ-साथ जो भी धार्मिक स्थल भग्नावस्था में थे, उन सभी को शास्त्रीय मर्यादाओं के साथ पुर्नस्थापित करवाया। वहाँ पूजा-पाठ नित्य होता रहे, इसकी व्यवस्था भी राजकीय कोष से करवायी।किन्तु काशी ने उस समय भी महारानी का साथ नहीं दिया था। शिवलिंग की प्रतिष्ठा के लिए महारानी को माहेश्वर से पण्डितों बुलवाना पड़ा था। मन्दिर के लिए नित्य पुजारी को लेकर भी समस्या आयी। काशी का कोई ब्राह्मण पुजारी के पद पर कार्य करने को तैयार नहीं था। इसलिए काशी विश्वनाथ का पहला पुजारी तारापुर के एक भूमिहार ब्राह्मण को बनाया गया। ये प्रमाण आज भी इन्दौर के अभिलेखागार में सुरक्षित हैं। मल्हार राव को मार्ग से भटकाने वाले और अहल्याबाई का साथ न देने वालों धूर्तों के वंशज आज भी काशी में ही हैं। यही लोग वर्तमान में श्रीकाशी विश्वनाथ धाम का विरोध कर रहे हैं। 294 वर्षों के बाद नरेन्द्र मोदी ने अहल्याबाईके अधूरे कार्यों को आगे बढ़ा कर उन्हें सच्ची श्रद्धाञ्जलि अर्पित की है। नए परिसर में मातोश्री की प्रतिमा स्थापित कर उनकी कीर्ति को सदैव के लिए अक्षय कर दिया है। तीन हज़ार वर्गफीट में सिमटा मन्दिर आज पाँच लाख वर्ग फ़ीट के भव्य परिसर में विस्तार ले चुका है। काशी की छाती पर खड़ा हुआ ‘कलंक’ एक कोने में सिमट चुका है। विश्व के नाथ को गलियों में सिमटा देख कर हृदय में ग्लानि लिए सदियों से रोता हिन्दू आज धाम के विस्तारीकरण से प्रफुल्लित है।गजवा-ए-हिंद का सपना देखने वाले मुग़लों के वंशजों को भी अब विश्वनाथ धाम के दरवाज़े से ही प्रवेश लेना होगा। नरेन्द्र मोदी अपना कार्य कर चुके। अब बचे हुए कार्य को पूरा करने की ज़िम्मेदारी हिन्दू समाज के कन्धों पर है।गोविन्द शर्मा संगठन मन्त्री,

श्रीकाशी विद्वत्परिषद्साभारः पूज्य श्री स्वामी चिदम्बरानन्द सरस्वती जी

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શ્રદ્ધાની કિંમત


ઘણા સમય પહેલાની વાત છે. એક માણસ ખુબ અમીર હતો અને તે દેશ-વિદેશમાં પોતાના ધંધા માટે ફરતો રહેતો હતો. એક વખત એક લાંબી મુસાફર બાદ તે દરિયાયી માર્ગે એક વહાણમાં પરત ફરી રહ્યો હતો. અચાનક જ સમુદ્રમાં તોફાન શરુ થયું, એવું લાગતું હતું કે હવે બચવાનો કોઈ રસ્તો નથી.
આ માણસને એક સુંદર આરસનો મહેલ હતો અને તેને તેનો ગર્વ હતો. તેના દેશના રાજાને પણ તેવો મહેલ  નહોતો અને રાજાએ તેને એ મહેલમાટે ઘણી કિંમત  આપવાની કોશિશ કરી હતી. એ સિવાય બીજ ઘણા શ્રીમંતોએ તેને એ મહેલ માટે મોટી મોટી રકમ આપવાની વાત કરી હતી પરંતુ આ માણસે કોઈને પણ એ મહેલ વેચવાની સાફ ના પાડી દીધી હતી.
પરંતુ હવે જયારે એનું પોતાનું જીવન જ જોખમ મ હતું, ત્યારે તેણે ભગવાનને પ્રાર્થના કરી કે જો એ તોફાનમાં થી હેમખેમ બહાર નીકળી જાય  તો તે તેનો મહેલ વેચી અને જે મળે તે ગરીબોમાં વહેચી દેશે.
અને ચમત્કાર થયો ! થોડા જ સમયમાં તોફાન શાંત  થવા લાગ્યું. અને જેવું તોફાન ઓછું થવા લાગ્યું તરત જ તે માણસના મનમાં બીજો વિચાર શરુ થયો  “મહેલ વેચી દેવો એ વધારે પડતું છે, અને કદાચ તોફાન થોડા સમય પછી શાંત થવાનું જ હતું. માટે  મહેલ વેચવાની વાત નહોતી કરવી જોઈતી હતી.”
અને તેના આશ્ચર્ય વચ્ચે સમુદ્રના મોજાઓ ફરીથી  ઉછળવા લાગ્યા અને તોફાન વિકરાળ સ્વરૂપ ધારણ કરવા લાગ્યું. આથી તે માણસ ખુબજ ડરી  ગયો. અને તેણે મનોમન પ્રાર્થના કરી, “હે પ્રભુ, મુર્ખ છું, મારા વિચારોની ચિંતા ન કરો, મેં જે કહ્યું  છે તે હું કરીને જ રહીશ, મારો મહેલ વેચીને તેમાંથી  જે મળે તે ગરીબોને વહેચી દઈશ.”
અને ફરી વખત તોફાન શાંત થયું અને ફરી વખત તેને બીજો વિચાર આવવા લાગ્યો, પરંતુ આ વખતે ખુબજ ડરી ગયો હતો.
તોફાન જતું રહ્યું અને તે હેમખેમ કિનારે પહોચી ગયો  બીજા દિવસે તેણે શહેરમાં પોતાના મહેલની  હરાજી કરવાનું જાહેર કરી દીધું, અને રાજા તથા   બીજા શ્રીમંતોને તેમાં આવવાનું આમંત્રણ આપ્યું રાજા, મીનીસ્ટર ઉચ્ચ અધિકારીઓ થી માંડી શહેરના દરેક મોટા શ્રીમંતો હરરાજીમાં આવ્યા  કારણકે દરેક આ મહેલને ખરીદવા ઈચ્છતા હતા  પરંતુ આ માણસ જે કરી રહ્યો હતો તે જોઇને દરેક નવાઈ લાગી.
તેણે મહેલની પાસે જ એક બિલાડી રાખી અને તે લોકોને કહ્યું, “આ બિલાડી ની કિંમત ૧૦ લાખ અને આ મહેલ ની કિંમત છે માત્ર એક કોડી. પરંતુ આં બંને એકસાથે એક જ વ્યક્તિને વેચીશ. આખી વાત  વિચિત્ર લાગતી  હતી. લોકો વિચારતા હતા કે બિલાડી તો સામાન્ય છે અને જરૂર એ કોઈ રખડતી  બિલાડીને ઉપાડી લાવ્યો છે. પરંતુ આપણે શું આપણને તેનાથી શું નિસ્બત ?
રાજાએ બિલાડી ના દસ લાખ અને મહેલ ની  કોડી આપીને બંને ખરીદી લીધા. પછી એ માણ એક કોડી ભિખારીને આપીને ઉપર જોઇને કહ્યું  “ભગવાન ! મેં જે માનતા માની હતી તે પૂરી કરી મહેલની જે કિંમત આવી તે આ ભિખારીને આપ દીધી.”
જે કામ ડરથી કરવામાં આવે છે તેમાં આપણે મન નથી  લગાવી શકતા. અને આપણે ચાલાકી કરવા માંડી છીએ અને આપણી જાતને જ છેતરતા હોઈએ છીએ  કામ ડરથી નહિ પ્રેમથી કરવું જોઈએ.
પ્રભુને ડરથી નહિ પ્રેમ થી યાદ કરો. તે ક્યાય ઉપર  નહિ પરંતુ આપણી અંદર જ છે. તેમને સોદાબાજી થી  નહિ પરંતુ શ્રદ્ધા અને વિશ્વાસથી જીતી શકાય છે. પરંતુ આપણો સમાજ અને તેનો વ્યવહાર એવો થઇ ગયો છે કે આપણે દરેક વસ્તુની કિંમત કરતા થઇ ગયા  છીએ, અને શ્રદ્ધાની પણ કિંમત મુકતા થઇ ગયા  છીએ. અને સરવાળે આપણે આપણી જાતને છેતરવા લાગ્યા છીએ.

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तृप्ति की चमक


“तृप्ति की चमक””मांजी बहुत तेज बारिश हो रही है आप खिड़की बंद कर दीजिए बारिश की बूंदे आपको बीमार कर सकती हैं।” प्रिशा अपनी सास मिथलेश जी से बोली।” नहीं बहू बूंदे यहां नहीं आ रही। तुम्हारे बाबूजी को बहुत पसंद थी बारिश। घंटो बैठे रहते थे खिड़की पर हम दोनों। साथ में चलता था पकोड़े और चाय का दौर। सच क्या दिन थे वो भी अब तो ना उनका साथ रहा ना पकोड़े झेलने वाला जिस्म!” मिथलेश जी ठंडी आह भरकर बोली।प्रिशा ने पकोडों की बात होने पर मिथलेश जी की आंखों में जो चमक देखी उससे प्रिशा की आंख भर आई। सच में बुढ़ापा ऐसा होता है जब जीभ तो बच्चों की तरह मचलती पर शरीर कुछ भी ऐसा वैसा खाने की इजाज़त नहीं देता है। मांजी को शूगर और ब्लड प्रेशर की बीमारी के कारण डाक्टर ने तला हुआ और मसालेदार खाना मना किया है।मिथलेश जी अभी दो महीने पहले ही पति के मरने के बाद गांव का घर छोड़ बेटे बहु के पास आई है। यहां बहू प्रिशा बेटा तरुण पोता पोती सब हैं। बेटे बहू ने बाबूजी के ना रहने पर उन्हें अकेले नहीं रहने दिया तो मजबूरी में उन्हें शहर आना पड़ा था हालाकि उनके मन में शंका थी बहू कैसा व्यवहार करेगी पर बहू प्रिशा बहुत ध्यान रखती है सास का। पोते पोती भी आगे पीछे घूमते रहते तो मिथलेश जी का मन लगा रहता है। पर इस उम्र में जीवनसाथी की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता क्योंकि इस उम्र में रिश्ता शरीर से नहीं दिल से बंधा होता है।” तरुण मांजी बहुत उदास हो जाती हैं कभी कभी मुझे समझ नहीं आता उन्हें कैसे खुश रखूं!” प्रिशा अपने पति से बोली।” प्रिशा अभी बाबूजी को गए ज्यादा वक़्त नहीं हुआ है उन्हें संभलने का मौका दो धीरे धीरे वो यहां के माहौल में रम जाएंगी!” तरुण बोला।प्रिशा हर संभव कोशिश करती मांजी को खुश रखने की।” मांजी चलिए पार्क चलते हैं!” एक दिन प्रिशा बोली।” अरे नहीं बेटा मैं क्या करूंगी वहां जाओ तुम घूम आओ!” मिथलेश जी बोली।” मांजी चलिए तो सही !” मिथलेश जी का हाथ पकड़ती हुई प्रिशा बोली।पार्क में जा मिथलेश जी एक बेंच पर बैठ गई और बच्चों को खेलते देखने लगी।” दादी आप भी खेलो ना हमारे साथ!” बैडमिंटन खेलती उनकी पोती पलक बोली।” अरे मैं कहां ये खेल सकती!” मिथलेश जी बोली जबकि उनकी आंखों की चमक बता रही थी वो खेलना चाहती हैं पर माहौल को देख झिझक रही।” आओ ना मांजी हम दोनों खेलते हैं मुझे भी नहीं आता ये खेल इसलिए बच्चों के साथ तो खेल नहीं सकती!” प्रिशा जानबूझ के झूठ बोल गई।सास बहू ने खेलना शुरू किया। प्रिशा जान बूझ कर मांजी से हारने लगी जिससे मांजी खुश हो गई।” अरे बहू तुझमें तो जान ही नहीं है एक चिड़िया( शटल कॉक) नहीं उछाल सकती!” मांजी हंसते हुए बोली।”मांजी मुझे क्या पता था आपको इतना अच्छा खेलना आता है!” प्रिशा मुंह बना बोली।”अच्छा अब घर चलो मैं थक गई और लगता है बारिश भी होने वाली है!” मिथलेश जी बोली।सबके घर पहुंचते पहुंचते बारिश शुरू हो गई। तभी तरुण भी आ गए ।”प्रिशा आज तो गरम चाय और पकोड़े हो जाएं देखो कितनी अच्छी बारिश है!” तरुण बोले।पकोड़े का नाम सुन मिथलेश जी की आंखों में एक चमक आई पर तभी बूझ भी गई। प्रिशा जानती थी मांजी को एक – दो पकोड़ो से तसल्ली नहीं होगी और ज्यादा उनके लिए जहर हैं।” लीजिए तरुण आपके पकोड़े और चाय और मांजी ये आपके!” प्रिशा प्लेट बढ़ाते हुए बोली।” दिमाग खराब है प्रिशा जो मां को इतने सारे पकोड़े दे रही हो याद नहीं डॉक्टर ने कहा था तला इनके लिए जहर है!” तरुण भड़क कर बोले।” मांजी आप खाइए पकोड़े वरना ठंडे हो जाएंगे और तरुण मैं मां की दुश्मन नहीं हूं ये पकोड़े मैने एयर फ्रायर में बनाए है बिन तेल के जो मैने कल ही ऑर्डर कर मंगवाया था क्योंकि मुझे पता है मांजी को पकोड़ो का कितना शौक है पर वो अपने शौक मारे हुए हैं!” प्रिशा बोली।तरुण प्रिशा को प्रशंसा की दृष्टि से देखने लगा।मांजी पकोड़े खाते हुए नम आंखों से बहू को देख रही थी। उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे और दिल में बहू के लिए ढेरों दुआएं । बात मामूली से पकोड़ो की थी पर बहू ने सास के मन को जाना ये मामूली बात नहीं थी। आज मांजी के चेहरे पर तृप्ति देख प्रिशा को बहुत अच्छा लग रहा था।दोस्तों काश हर बहू प्रिशा जैसी हो तो सास बहू का रिश्ता कभी बदनाम ना हो।

तृप्ति अग्रवाल

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मेड इन चाइना


चीन से एक आदमी भारत आया। उसने हवाई अड्डे पर एक टैक्सी ली।सड़क पर बस को देखकर उसने टैक्सी ड्राइवर से कहा कि भारत में बसें बहुत धीमी चलती हैं। चीन में बसें बहुत तेज चलती हैं।कुछ पल बाद, वह एक रेलवे पुल पर आया और देखा कि पुल के ऊपर से एक ट्रेन गुजर रही है। तब चीनी आदमी ने ड्राइवर से कहा कि, यहां ट्रेनें भी बहुत धीमी चलती हैं। चीन में ट्रेनें बहुत तेज चलती हैं।पूरी यात्रा के दौरान उसने ड्राइवर से भारत की बदनामी की शिकायत की। हालांकि, पूरी यात्रा के दौरान टैक्सी चालक चुप रहा।चीनी आदमी जब अपने गंतव्य स्थान पर पहुंचा तो उसने ड्राइवर से पूछा मीटर रीडिंग और टैक्सी का किराया क्या है।टैक्सी ड्राइवर ने जवाब दिया कि रु. 10,000/- हैटैक्सी का किराया सुनकर चीनियों के होश उड़ गए। वह चिल्लाया “क्या तुम मुझसे मजाक कर रहे हो? आपके देश में बसें धीमी चलती हैं, ट्रेन धीमी चलती है, सब कुछ धीमी है। एक मीटर अकेले तेज कैसे दौड़ता है? “इस पर टैक्सी ड्राइवर ने शांतिपूर्वक जवाब दिया,सर, *”मीटर मेड इन चाइना है”* 😜

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19 ऊंट की कहानी


19 ऊंट की कहानी..केवल हास्य में मत लेना जी..

एक गाँव में एक व्यक्ति के पास 19 ऊंट थे। एक दिन उस व्यक्ति की मृत्यु हो गयी। मृत्यु के पश्चात वसीयत पढ़ी गयी । जिसमें लिखा था कि:मेरे 19 ऊंटों में से आधे मेरे बेटे को,19 ऊंटों में से एक चौथाई मेरी बेटी को, और 19 ऊंटों में से पांचवाँ हिस्सा मेरे नौकर को दे दिए जाएँ ।सब लोग चक्कर में पड़ गए कि ये बँटवारा कैसे हो ?19 ऊंटों का आधा अर्थात एक ऊँट काटना पड़ेगा, फिर तो ऊँट ही मर जायेगा । चलो एक को काट दिया तो बचे 18 उनका एक चौथाई साढ़े चार – साढ़े चार… फिर..?सब बड़ी उलझन में थे । फिर पड़ोस के गांव से एक बुद्धिमान व्यक्ति को बुलाया गया ।वह बुद्धिमान व्यक्ति अपने ऊँट पर चढ़ कर आया, समस्या सुनी, थोडा दिमाग लगाया, फिर बोला इन 19 ऊंटों में मेरा भी ऊँट मिलाकर बाँट दो ।सबने सोचा कि एक तो मरने वाला पागल था, जो ऐसी वसीयत कर के चला गया, और अब ये दूसरा पागल आ गया जो बोलता है कि उनमें मेरा भी ऊँट मिलाकर बाँट दो । फिर भी सब ने सोचा बात मान लेने में क्या हर्ज है ।19+1=20 हुए ।20 का आधा 10, बेटे को दे दिए ।20 का चौथाई 5, बेटी को दे दिए ।20 का पांचवाँ हिस्सा 4, नौकर को दे दिए ।10+5+4=19 बच गया एक ऊँट, जो बुद्धिमान व्यक्ति का था…वो उसे लेकर अपने गॉंव लौट गया ।इस तरह 1 उंट मिलाने से, बाकी 19 उंटो का बंटवारा सुख, शांति, संतोष व आनंद से हो गया ।सो हम सब के जीवन में भी 19 ऊंट होते हैं ।5 ज्ञानेंद्रियाँ(आँख, नाक, जीभ, कान, त्वचा)5 कर्मेन्द्रियाँ(हाथ, पैर, जीभ, मूत्र द्वार, मलद्वार)5 प्राण(प्राण, अपान, समान, व्यान, उदान)और4 अंतःकरण(मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार)कुल 19 ऊँट होते हैं। सारा जीवन मनुष्य इन्हीं 19 ऊँटो के बँटवारे में उलझा रहता है।और जब तक उसमें प्रेम रूपी ऊँट नहीं मिलाया जाता यानी के अपनों के साथ…. सगे-संबंधियों के साथ, जीवन नहीं जिया जाता, तब तक सुख, शांति, संतोष व आनंद की प्राप्ति नहीं हो सकती ।यह है 19 ऊंट की कहानी…!प्रेम है तो जीवन में आनंद हैजय सियाराम.

अनिल त्रिवेदी

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कहानी ज्ञान वापी की


[कहानी ज्ञान वापी की]मजहब का कोहराम किसी भी देश के आगन में उतना नहीं मचा है जितना भारत में मचा है! और उससे भी बड़ा नासूर ये की हम आज भी “धर्मनिरपेक्ष” मुल्क़ हैं। ये तस्वीर देख कर आप “वावो” कर सकते हैं परंतु जब इस तस्वीर को ध्यान से देखेंगे तो आप पाएंगे की बाबर औरंगजेब आज भी भारत की रगो में बसा हुआ है। यों तो ये तस्वीर आप ने पहले सायद देखी होगी परंतु तस्वीर के पीछे जो भाईचारा दिख रहा है ये हमे और आप को रौंद कर बनाया गया है। अयोध्या जी मथुरा जी हों या शिव भूमि काशी बनारस, येरूशलेम ये तस्वीर आम है! इस तस्वीर को आप जब ध्यान से देखेंगे तो एसा लगेगा मानो मज़लिस के पीछे मातम खड़ा हो। ये तस्वीर सबूत है भाई चारे और गंगा यमुना के “जमुनिकरण” का ।काशी का उल्लेख भारत और सनातन के सभी ग्रंथो और लिपियों और काव्यों में मिलता है! लेकिन उसी काशी में विश्वनाथ से भौतिक रुप मे बृहद और भयानक “ज्ञानवापी” खड़ी है ! जो केवल और केवल आप को ये याद दिलाते रहने के लिए बनाई गयी है की भविष्य में देखते रहना ही मजहबी लुटेरों ने आप के साथ क्या सुलूक किया था । आप के हर आस्था वाली जगह पर इनकी व्यवस्था है कही इमारत के नाम पर तो कही भाईचारा के नाम पर ।नतीजतन नसीबन द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी विश्वनाथ मंदिर अनादिकाल से काशी में है। यह स्थान शिव और पार्वती का आदि स्थान है इसीलिए आदिलिंग के रूप में अविमुक्तेश्वर को ही प्रथम लिंग माना गया है। इसका उल्लेख महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है। ईसा पूर्व 11वीं सदी में राजा हरीशचन्द्र ने जिस विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था उसका सम्राट विक्रमादित्य ने जीर्णोद्धार करवाया था। उसे ही ग्यारह सौ चौरानवे में मुहम्मद गौरी ने लूटने के बाद तुड़वा दिया था।इतिहासकारों के अनुसार इस भव्य मंदिर को सन् ग्यारह सौ चौरानवे में मुहम्मद गौरी द्वारा तोड़ा गया था। इसे फिर से बनाया गया, लेकिन एक बार फिर इसे सन् चौदह सौ सैतालास में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह द्वारा तोड़ दिया गया। पुन: सन् पंद्रह सौ पचासी ई. में राजा टोडरमल की सहायता से पं. नारायण भट्ट द्वारा इस स्थान पर फिर से एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया। इस भव्य मंदिर को सन् सोलह सौ बत्तीस में शाहजहां ने आदेश पारित कर इसे तोड़ने के लिए सेना भेज दी। सेना हिन्दुओं के प्रबल प्रतिरोध के कारण विश्वनाथ मंदिर के केंद्रीय मंदिर को तो तोड़ नहीं सकी, लेकिन काशी के सत्तर अन्य मंदिर तोड़ दिए गए।डॉ. एएस भट्ट ने अपनी किताब ‘दान हारावली’ में इसका जिक्र किया है कि टोडरमल ने मंदिर का पुनर्निर्माण पंद्रह सौ पचासी में करवाया था। 18 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया। यह फरमान एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित है। उस समय के लेखक साकी मुस्तइद खां द्वारा लिखित ‘मासीदे आलमगिरी’ में इस ध्वंस का वर्णन है। औरंगजेब के आदेश पर यहां का मंदिर तोड़कर एक ज्ञानवापी मस्जिद बनाई गई। दो सितंबर सोलह सौ उनहत्तर को औरंगजेब को मंदिर तोड़ने का कार्य पूरा होने की सूचना दी गई थी। औरंगजेब ने प्रतिदिन हजारों ब्राह्मणों को मुसलमान बनाने का आदेश भी पारित किया था। सत्रहवीं शताब्दी के मध्य से लेकर सन् अस्सी के बीच मराठा सरदार दत्ताजी सिंधिया व मल्हारराव होलकर ने मंदिर मुक्ति के प्रयास किए। 7 अगस्त सत्रह सौ सत्तर ई. में महादजी सिंधिया ने दिल्ली के बादशाह शाह आलम से मंदिर तोड़ने की क्षतिपूर्ति वसूल करने का आदेश जारी करा लिया, परंतु तब तक काशी पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज हो गया था इसलिए मंदिर का नवीनीकरण रुक गया। सतहत्तर- अस्सी में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया था।अहिल्याबाई होलकर ने इसी परिसर में विश्वनाथ मंदिर बनवाया जिस पर पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने सोने का छत्र बनवाया। ग्वालियर की महारानी बैजाबाई ने ज्ञानवापी का मंडप बनवाया और महाराजा नेपाल ने वहां विशाल नंदी प्रतिमा स्थापित करवाई।सन् सत्रह सौ नब्बे में काशी के हिन्दुओं ने जबरन बनाई गई मस्जिद पर कब्जा कर लिया था, क्योंकि यह संपूर्ण क्षेत्र ज्ञानवापी मं‍डप का क्षेत्र है जिसे आजकल ज्ञानवापी मस्जिद कहा जाता है। तीस दिसंबर अठारह सौ अस्सी को बनारस के तत्कालीन जिला दंडाधिकारी मि. वाटसन ने ‘वाइस प्रेसीडेंट इन काउंसिल’ को एक पत्र लिखकर ज्ञानवापी परिसर हिन्दुओं को हमेशा के लिए सौंपने को कहा था, लेकिन यह कभी संभव नहीं हो पाया।*********हमारा इतिहास इतना काला है की दस हजार कथा वाचक और गौ प्रेमी फयज एक पलड़े पर रखिए और दूसरे पर इतिहास तो इतिहास का पलड़ा हमेशा भारी रहेगा बहुत भारी रहेगा ।अयोध्या जी तो बस प्रारंभ का प्रारंभ है आप यों ही “हिदुत्व” की डगर पर बने रहिए मैं सूरज उपाध्याय आप को वचन देता हूँ की हमे हर दशक में एक “पांच अगस्त” देखने को मिलेगा। आने वाले समय में योगी अमित शाह कभी काशी तो कभी मथुरा में भूमि पूजन और शिलान्यास करते रहेंगे।

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बंधन मुक्ति


एक रोज़ एक वेटनिरी डॉक्टर के मोबाईल पर कॉल आया। एक हाथी बीमार पड़ गया था। डॉक्टर साहब हाथी को देखने निकले ही थे के उनका 10 वर्षीय बेटा भी साथ जाने की ज़िद करने लगा।
डॉक्टर साहब ने सुपुत्र को साथ ले लिया।
हाथी का हाल चाल देख कर डॉक्टर साहब ने महावत को बुलाया और उसे कुछ दवाइयां लाने को कहा।

डॉक्टर साहब के साथ आया सुपुत्र सुदूर खड़ा हाथी को देख रहा था। डॉक्टर साहब ने बेटे को हाथी के समीप आने को कहा।
बेटे ने हाथी के समीप आने से इनकार कर दिया।
डॉक्टर ने बेटे का हाथ पकड़ा और उसे हाथी के समीप ले आये।
हाथी के पाँव की ओर इशारा करते हुये बोले…..” वह देखो। उसके पाँव में बेड़ियां जकड़ी हुई हैं। वह चाह कर भी हिल नहीं सकता ….जब हिलेगा नहीं तो तुम्हें चोट कैसे पहुंचायेगा।”

यह सुन कर लड़का सरपट भागने लगा और तब तक भागता रहा जब तक हाथी उसकी आँखों से ओझल नहीं हो गया।
डॉक्टर साहब भी लड़के के पीछे पीछे भागते रहे।

लंबी दौड़ लगा कर लड़का रुक गया …..उसके पीछे दौड़ते पिता की भी सांस फूल गयी।

डॉक्टर ने लड़के को क्रोध भरी नजरों से देखा और बोले….”कहा ना के उसके पाँव में बेड़ियां हैं। वह नहीं हिलेगा। फिर डर के क्यों भाग आये।”

लड़के ने बाप की आखों में आँखें डाल कर कहा ……” बेड़ियां ……वह पतली सी ज़ंजीर। इतना बड़ा हाथी तो एक झटके में उन बेड़ियों को तोड़ देगा और फिर आपको और मुझे कुचल देगा।”

बात तर्कपूर्ण रही। हाथी की अदम्य शक्ति के समक्ष उन बेड़ियों की क्या औकात थी।

डॉक्टर मुस्कुराये। बेटे का हाथ पकड़ा और उसे महावत के घर की ओर ले गये। घर के पीछे हाथी का बच्चा बेड़ियों से बंधा हुआ था।
लड़के ने देखा के हाथी का बच्चा बार बार बेड़ियों से निकलने का प्रयास कर रहा था लेकिन उसकी कद काठी और उसकी शक्ति बेड़ियां तोड़ने में नाकामयाब थी।

डॉक्टर ने बेटे से कहा…..”ध्यान से देख। वही बेड़ियां हैं। वही जंजीरें हैं। हाथी के बच्चे को काबू में करने के लिये बाल्यकाल से ही उसे जड़क दिया जाता है। वह कुछ दिन छटपटाता है…..फिर वह बेड़ियों का आदि हो जाता है। फिर उसे लगने लगता है के जंजीर के आगे उसकी शक्ति कम है।
तभी से वह ज़ंजीर को अपने ऊपर हावी कर लेता है।”

डॉक्टर ने लड़के का हाथ पकड़ा और उसे पुनः विशालकाय हाथी की ओर ले गये।
उन्होंने पुनः पैर की बेड़ियों की ओर इशारा किया और बोले ….”तुमने सही पहचाना। हाथी अपनी शक्ति से पाँव झटक भी दे तो इन बेड़ियों को तहस नहस कर देगा। लेकिन यह बेड़ियां उसके तन पर नहीं ….उसके मन पर बन्ध चुकी हैं। वह इन जंजीरों की ताकत स्वीकार कर चुका है।”

हिंदुत्व एक हाथी है जिसमें अदम्य शक्ति है।

…….और हक़ीक़त यह है के उसके पाँव में ज़ंजीर बंधी है जिसके कारण वह अपनी सारी शक्ति …सारी ऊर्जा को भूल गया है।

“जातिवाद” हिंदुत्व के पाँव में जकड़ी ज़ंज़ीर है।

Late night thoughts…🤔

श्रीधर जोशी

【रचित】

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जीवन संगीत


Jeevan Sangeet….🌹🎻

समुद्र के किनारे जब एक लहर आयी तो एक बच्चे का चप्पल ही अपने साथ बहा ले गयी.. बच्चा रेत पर अंगुली से लिखता है “समुद्रचोरहै”😊

उसी समुद्र के एक, दूसरे किनारे कुछ मछुवारा बहुत सारी मछलियाँ पकड़ लेता है. …
वह उसी रेत पर लिखता है “समुद्रमेरापालनहार है”☺

एक युवक समुद्र में डूब कर मर जाता है….उसकी मां रेत पर लिखती है,

“समुद्र_हत्यारा है”🤔

एक दूसरे किनारे एक गरीब बूढ़ा टेढ़ी कमर लिए रेत पर टहल रहा था…उसे एक बड़े सीप में एक अनमोल मोती मिल गया, वह रेत पर लिखता है

“समुद्रदानीहै”😊

…. अचानक एक बड़ी लहर आती है और सारे लिखा मिटा कर चली जाती है😂😂😂

मतलब समंदर को कहीं कोई फर्क नहीं पड़ा कि, लोगों की क्या राय हैं उस के बारे में ,अपनी लहरों में मस्त रहा आता है.. 👍

अगर विशाल समुद्र बनना है तो किसी की बातों पर ध्यान ना दें….अपने उफान और शांति समुंदर की भाँती अपने हिसाब से तय करो।

लोगों का क्या है …. उनकी राय कंडीशन के हिसाब से बदलती रहती है 😊चाय मक्खी में गिरे तो चाय फेंक देते हैं और देशी घी मे गिरे तो मक्खी को फेंक देते हैं 😊 *जो जितनी "सुविधा" में है* *वो उतनी "दुविधा" में है।*

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महाराणा प्रताप


‘𝑺

मेवाड़ के महाराणा प्रताप और अकबर की मुगल सेनाओं के बीच हल्दीघाटी की लड़ाई हमें दो असाधारण वफादार जानवरों- चेतक, एक घोड़ा और राम प्रसाद, एक हाथी से परिचित कराती है। चेतक महाराणा प्रताप का पर्यायवाची नाम है, लेकिन हम में से बहुत से लोग राम प्रसाद के बारे में नहीं जानते हैं।

जबकि एक बुरी तरह से घायल चेतक अपने गुरु प्रताप को हल्दीघाटी के युद्ध के मैदान से दूर एक सुरक्षित स्थान पर ले गया और शहादत प्राप्त की, राम प्रसाद को मुगलों ने पकड़ लिया। हल्दीघाटी युद्ध के मैदान में युद्ध-कठोर राम प्रसाद को वश में करना आसान नहीं था, जिसने कई मुगल सैनिकों और हाथियों के घाव और मृत्यु को सुविधाजनक बनाया था। अपने हाथियों के साथ कई महावतों के एक चक्रव्यूह ने राम प्रसाद को पकड़ लिया और अकबर के पास ले जाया गया।

युद्ध के मैदान में राम प्रसाद के पराक्रम को सुनकर अकबर इतना अचंभित था कि वह उसे अपना बनाना चाहता था। उन्होंने राम प्रसाद का नाम बदलकर पीर प्रसाद कर दिया। उन्होंने आदेश दिया कि पीर प्रसाद का विशेष ध्यान रखा जाए। मुगलों ने हाथी को रसदार गन्ना और विशेष भोजन दिया लेकिन वह महाराणा प्रताप के प्रति इतना वफादार था कि पकड़े जाने के बाद से उसने कुछ भी नहीं खाया, पानी भी नहीं!

राम प्रसाद की 18 दिन बाद भूख से मौत हो गई। राम प्रसाद की वफादारी देखकर अकबर ने कहा था कि जब वह राणा प्रताप के वफादार जानवर पर भी काबू नहीं पा सके तो राणा प्रताप पर काबू पाना नामुमकिन था।

साभार: मानोशी सिन्हा