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केदारनाथ मंदिर


केदारनाथ मंदिर
एक अनसुलझी पहेली
केदारनाथ मंदिर किसने बनवाया, इसको लेकर काफी चर्चा है। पांडवों से लेकर आद्य शंकराचार्य तक।
आज का विज्ञान बताता है कि केदारनाथ मंदिर का निर्माण संभवत: 8वीं शताब्दी में हुआ था। यह मंदिर कम से कम 1200 वर्षों से अस्तित्व में है।

केदारनाथ के पास की भूमि 21वीं सदी में भी बहुत प्रतिकूल है। केदारनाथ पर्वत एक तरफ 22,000 फीट ऊंचा है, दूसरी तरफ कराचकुंड 21,600 फीट ऊंचा और तीसरी तरफ भरतकुंड 22,700 फीट ऊंचा है। इन तीन पर्वतों से बहने वाली पांच नदियां हैं मंदाकिनी, मधुगंगा, चिरगंगा, सरस्वती और स्वरंदरी। पुराणों में इसका उल्लेख मिलता है।

यह क्षेत्र “मंदाकिनी नदी” में एकमात्र राज्य है। ठंड के दिनों में भारी हिमपात और बरसात के मौसम में भारी बारिश। इतनी शत्रुतापूर्ण जगह में मंदिर बनाने में बहुत मेहनत करनी पड़ती।

आज भी आप उतनी दूर तक गाड़ी नहीं चला सकते जितना “केदारनाथ मंदिर” खड़ा है। ऐसा स्थान क्यों बनाया गया? इसके बिना 100-200 नहीं, 1000 साल से भी अधिक, ऐसी प्रतिकूल स्थिति में कोई मंदिर कैसे जीवित रह सकता है? हम सभी को कम से कम एक बार यह सोचना चाहिए। वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि अगर यह 10वीं शताब्दी के आसपास होता तो मंदिर एक छोटी “हिम युग” अवधि के दौरान पृथ्वी पर स्थित होता।

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ जियोलॉजी, देहरादून ने केदारनाथ मंदिर की चट्टानों पर “लिग्नोमेट्रिक डेटिंग” परीक्षण किया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह पूरी तरह से बर्फ से ढका होना चाहिए जहां मंदिर स्थित है। लिग्नोमैटिक डेटिंग टेस्ट “स्टोन लाइफ” की पहचान के लिए किए जाते हैं। इस परीक्षण से पता चलता है कि मंदिर 14वीं सदी से लेकर 17वीं सदी के मध्य तक पूरी तरह से बर्फ से ढका हुआ था। हालांकि मंदिर के निर्माण को कोई नुकसान नहीं हुआ है।

साल 2013 में केदारनाथ में आई विनाशकारी बाढ़ को सभी ने देखा होगा। इस अवधि के दौरान वर्षा “औसत से 375% अधिक” थी। अगली बाढ़ में कम से कम 5,748 लोग मारे गए (सरकारी आंकड़े)। 4200 गांवों को नुकसान पहुंचा है. भारतीय वायुसेना ने 1 लाख 10 हजार से ज्यादा लोगों को एयरलिफ्ट किया। सब बह गया। लेकिन इस भीषण बाढ़ में भी केदारनाथ मंदिर का पूरा ढांचा ज़रा भी प्रभावित नहीं हुआ।

भारतीय पुरातत्व सोसायटी के अनुसार बाढ़ के बाद भी मंदिर के पूरे ढांचे के ऑडिट में 99 फीसदी मंदिर पूरी तरह सुरक्षित हैं। 2013 की बाढ़ और इसकी वर्तमान स्थिति के दौरान इमारत को कितना नुकसान हुआ था, इसका अध्ययन करने के लिए “आईआईटी मद्रास” ने मंदिर पर “एनडीटी परीक्षण” किया। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर पूरी तरह से सुरक्षित और मजबूत है।

मंदिर ने दो अलग-अलग संस्थानों द्वारा बहुत “वैज्ञानिक और वैज्ञानिक” तरीके से की गई परीक्षा को पास नहीं किया, लेकिन निर्वाला हमें क्या बताता है कि यह “सर्वश्रेष्ठ” था? 1200 साल बाद, जहां उस क्षेत्र में सब कुछ बहता है, वहां एक भी संरचना नहीं बची है। यह मंदिर मन ही मन वहीं खड़ा है और न केवल खड़ा है बल्कि बहुत मजबूत भी है। मानो या न मानो, जिस तरह से इस मंदिर को बनाया गया है। जो जगह चुनी गई है। आज विज्ञान कहता है कि इस मंदिर के निर्माण में जिस पत्थर और संरचना का उपयोग किया गया है, वही कारण है कि यह मंदिर इस बाढ़ में अपने दो पैरों पर खड़ा हो सका।

यह मंदिर “उत्तर-दक्षिण” के रूप में बनाया गया है। केदारनाथ का निर्माण “दक्षिण-उत्तर” है जबकि भारत में लगभग सभी मंदिर “पूर्व-पश्चिम” हैं। जानकारों के मुताबिक अगर यह मंदिर “पूर्व-पश्चिम” होता तो पहले ही नष्ट हो चुका होता। या कम से कम यह 2013 के अंत तक नष्ट हो जाता।

लेकिन इस दिशा की वजह से केदारनाथ मंदिर बच गया है। दूसरी बात यह है कि इसमें इस्तेमाल किया गया पत्थर बहुत सख्त और टिकाऊ होता है। खास बात यह है कि इस मंदिर के निर्माण के लिए इस्तेमाल किया गया पत्थर वहां उपलब्ध नहीं है, तो जरा सोचिए कि वह पत्थर वहां कैसे ले जाया जा सकता था? उस समय इतने बड़े पत्थर को ढोने के लिए कोई औजार नहीं था। इस पत्थर की ख़ासियत यह है कि बर्फ के नीचे रहने के 400 साल बाद भी इसने अपने “गुणों” को नहीं बदला है, इसके बावजूद वातावरण में अंतर है।

इसलिए मंदिर प्रकृति के चक्र में अपनी ताकत बरकरार रखता है। मंदिर के इन मजबूत पत्थरों को बिना किसी सीमेंट के “एशलर” तरीके से आपस में जोड़ा गया है। इसलिए, पत्थर के जोड़ों पर तापमान परिवर्तन के किसी भी प्रभाव के बिना मंदिर की ताकत अभेद्य है। 2013 में वीटा घलाई द्वारा मंदिर के पिछले हिस्से में एक बड़ी चट्टान फंस गई थी और पानी की धार फट गई थी। जिन्हें अगले दिन भारतीय वायुसेना ने एयरलिफ्ट किया था।

सवाल यह है कि आस्था रखनी है या नहीं। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि मंदिर के निर्माण के लिए स्थल का चयन करने के बाद, जो अपनी संस्कृति और शक्ति को 1200 से अधिक वर्षों तक बनाए रखेगा, इसकी दिशा, समान निर्माण सामग्री और प्रकृति को भी ध्यान में रखा गया था। टाइटैनिक के डूबने के बाद, पश्चिम में लोगों ने महसूस किया कि कैसे “एनडीटी परीक्षण” और “तापमान” ज्वार को मोड़ सकते हैं। लेकिन हमने 1200 साल पहले सोचा था।

क्या केदारनाथ वही ज्वलंत उदाहरण नहीं है? कुछ महीने बारिश, कुछ महीने बर्फ, और कुछ साल बर्फ में, अभी भी ऊन, हवा और बारिश से ढके हुए हैं। और 6 फुट ऊंचे मंच की ताकत को देखते हुए हम सोच कर हैरान हैं। विज्ञान का कितना उपयोग किया गया है।

आज सभी बाढ़ों के बाद हम एक बार फिर केदारनाथ के वैज्ञानिकों की रचना को नमन कर रहे हैं, जिन्हें एक बार फिर “12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वोच्च” के रूप में सम्मानित किया जाएगा।

यह इस बात का उदाहरण है कि वैदिक हिंदू धर्म और संस्कृति कितनी आगे थी।
जिसने भी लिखा है बहुत अच्छा लिखा है।
|| Om नमः शिवाय ||

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गाय सर्वोत्तम हितकारी पशु होने सहित मनुष्यों की पूजनीय देवता है


ओ३म्
-आज गोवर्धन पर्व पर-

“गाय सर्वोत्तम हितकारी पशु होने सहित मनुष्यों की पूजनीय देवता है”

परमात्मा ने इस सृष्टि को जीवात्माओं को कर्म करने व सुखों के भोग के लिए बनाया है। जीवात्मा का लक्ष्य अपवर्ग होता है। अपवर्ग मोक्ष वा मुक्ति को कहते हैं। दुःखों की पूर्ण निवृत्ति ही मोक्ष कहलाती है। यह मोक्ष मनुष्य योनि में जीवात्मा द्वारा वेदाध्ययन द्वारा ज्ञान प्राप्त कर एवं उसके अनुरूप आचरण करने से प्राप्त होता है। सांख्य दर्शन में महर्षि कपिल ने मोक्ष का सूक्ष्मता से विवेचन किया है जिससे यह ज्ञात होता है कि मनुष्य जीवन का उद्देश्य वेद विहित सद्कर्मों अर्थात् ईश्वरोपासना द्वारा ईश्वर साक्षात्कार, अग्निहोत्र यज्ञ एवं परोपकार आदि को करके जन्म व मरण के बन्धन वा दुःखों से छूटना है, यही मोक्ष है। मनुष्य को जीवित रहने के लिए भूमि, अन्न व जल सहित गोदुग्ध व फलों आदि मुख्य पदार्थों की आवश्यकता होती है। गोदुग्ध हमें गाय से मिलता है। दूध व घृत आदि वैसे तो अनेक पशु से प्राप्त होते है परन्तु देशी गाय के दूध के गुणों की तुलना अन्य किसी भी पशु से नहीं की जा सकती। गाय का दुग्ध मनुष्य के स्वास्थ्य, बल, बुद्धि, ज्ञान-प्राप्ति, दीर्घायु आदि के लिए सर्वोत्तम साधन व आहार है। मनुष्य का शिशु अपने जीवन के आरम्भ में अपनी माता के दुग्ध पर निर्भर रहता है। माता के बाद उसका आहार यदि अन्य कहीं से मिलता है तो वह गाय का दुग्ध ही होता है। गाय का दूध भी लगभग मां के दूध के समान गुणकारी व हितकर होता। भारत के ऋषि, मुनि, योगी व विद्वान गोपालन करते थे और गाय का दूध, दधि, छाछ व घृत आदि का सेवन करते थे। गोदुग्ध से घृत भी बनाते थे और उससे अग्निहोत्र यज्ञ कर वायु व जल आदि की शुद्धि करते थे। इन सब कार्यों से वह स्वस्थ, सुखी व दीर्घायु होते थे। ईश्वर प्रदत्त वेद के सूक्ष्म व सर्वोपयोगी ज्ञान को प्राप्त होकर सृष्टि के सभी रहस्यों यहां तक की ईश्वर का साक्षात्कार करने में भी सफल होते थे और मृत्यु होने पर मोक्ष या श्रेष्ठ योनि में जन्म लेकर सुखों से पूर्ण जीवन प्राप्त करते थे।

गाय से हमें केवल दूध ही नहीं मिलता अपितु गाय माता नाना प्रकार से हमारी सेवा करती है और साथ ही कुछ महीनों व वर्षों के अन्तराल पर हमें पुनः बछड़ी व बछड़े देकर प्रसन्न व सन्तुष्ट करती है। बछड़ी कुछ वर्ष में ही गाय बन जाती है और हम उसके भी दुग्ध, गोबर, गोमूत्र, गोचर्म (मरने के बाद) को प्राप्त कर अपने जीवन मे सुख प्राप्त करते हैं। गोबर न केवल ईधन है जिससे विद्युत उत्पादन, गुणकारी खाद, घर की लिपाई आदि में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसी प्रकार से गोमूत्र भी एक महौषधि है। इससे कैंसर जैसे रोगों का सफल उपचार होता है। नेत्र ज्योति को बनाये रखने नेत्र रोगों को दूर करने में भी यह रामबाण के समान औषध है। त्वचा के रोगों में भी गोमूत्र से लाभ होता है। आजकल पंतजलि आयुर्वेद द्वारा गोमूत्र को सस्ते मूल्य व आकर्षक पैकिंग में उपलब्ध कराया जा रहा है जिसे लाखों लोग अमृत समान इस औषध-द्रव का प्रतिदिन सेवन करते हैं। गोमूत्र किटाणु नाशक होता है। इससे उदरस्थ कीड़े भी समाप्त हो जाते हैं। ऐसे और भी अनेक लाभ गोमूत्र से होते हैं। गाय के मर जाने पर उसका चर्म भी हमारे पैरों आदि की रक्षा करता है। गोचर्म के भी अनेक उपयोग हैं अतः हम जो-जो लाभ गो माता से लेते जाते हैं उस उससे हम गोमाता के ऋणी होते जाते हैं। हमारा भी कर्तव्य होता है कि हम भी गोमाता को उससे हमें मिलने वाले लाभों का प्रत्युपकार करें, उसका ऋण उतारें, उसको अच्छा चारा दें, उसकी खूब सेवा करें और उसके दुग्ध व गोमूत्र का पान करें जिससे हम स्वस्थ, सुखी, आनन्दित व दीर्घायु होकर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति कर सकंे।

गाय से हमें सबसे अधिक लाभ गोदुग्ध से ही होता है। जो मनुष्य गोदुग्ध का सेवन अधिक करता है उसको अधिक अन्न की आवश्यकता नहीं होती। इससे अन्न की बचत होती है और देश के करोड़ो भूखे व निर्धन लोगों को अपनी भूख की निवृत्ति में सहायता मिल सकती है। यह रहस्य की बात है कि देश में जितनी अधिक गौंवे होंगी देश में गोदुग्ध, गोघृत व अन्न उतना ही अधिक सस्ता होगा जिससे निर्धन व देश के भूखे रहने वाले लोगों को लाभ होगा। अनुमान से ज्ञात होता है कि देश की लगभग 40 प्रतिशत से अधिक जनता निर्धन एवं अन्न संकट से ग्रसित है। हमने भी अपने जीवन में निर्धनता और परिवारों में अन्न संकट देखा है। ऐसी स्थिति में यदि किसी निर्धन व्यक्ति के पास एक गाय है और आस-पास से उसे चारा मिल जाता है तो वह परिवार अन्न संकट सहित गम्भीर रोगों व मृत्यु का ग्रास बनने से बचाया जा सकता है।

ऋषि दयानन्द ने गाय के दूध और अन्न के उत्पादन से संबंधित गणित के अनुसार गणना कर बताया है कि एक गाय के जन्म भर के दूघ मात्र से 25,740 पच्चीस हजार सात सौ चालीस लोगों का एक समय का भोजन होता है अर्थात् इतनी संख्या में लोगों की भूख से तृप्ति होती है। स्वामी जी ने एक गाय की एक पीढ़ी अर्थात् उसके जीवन भर के कुल बछड़ी व बछड़ों से दूघ मात्र से एक बार के भोजन से कितने लोग तृप्त हो सकते हैं, इसकी गणना कर बताया है कि 1,54,440 लोग तृप्त व सन्तुष्ट होते हैं। वह बताते हैं कि एक गाय से जन्म में औसत 6 बछड़े होते हैं। उनके द्वारा खेतों की जुताई से लगभग 4800 मन अन्न उत्पन्न होता है। इससे कुल 2,56,000 हजार मनुष्य का भोजन से निर्वाह एक समय में हो सकता है। यदि एक गाय की एक पीढ़ी से कुल दूघ व अन्न से तृप्त होने वाले मनुष्यों को मिला कर देखें तो कुल 4,10,440 चार लाख दस हजार चार सौ चालीस मनुष्यों का पालन एक बार के भोजन से होता है। वह यह भी बताते हैं कि यदि एक गाय से उसके जीवन में उत्पन्न औसत 6 गायों वा बछड़ियों से उत्पन्न दूध व बछड़ों-बैलों से अन्न की गणना की जाये तो असंख्य मनुष्यों का पालन हो सकता है। इसके विपरीत यदि एक गाय को मार कर खाया जाये तो उसके मांस से एक समय में केवल अस्सी मनुष्य ही पेट भर कर सन्तुष्ट हो सकते है। निष्कर्ष में ऋषि दयानन्द जी कहते हैं कि ‘देखो! तुच्छ लाभ के लिए लाखों प्राणियों को मार कर असंख्य मनुष्यों की हानि करना महापाप क्यों नहीं?’ गायों से इतने लाभ मिलने पर भी यदि कोई व्यक्ति व समूह गाय की हत्या करता व करवाता है और मांस खाता है व उसे प्रचारित व समर्थन आदि करता है तो वह बुद्धिमान कदापि नहीं कहा जा सकता। गाय सही अर्थों में देवता है जो न केवल हमें अपितु सृष्टि के आरम्भ से हमारे पूर्वजों का पालन करती आ रही है और प्रलय काल तक हमारी सन्तानों का भी पालन करती रहेगी। गाय से होने वाले इन लाभों के कारण निश्चय ही वह एक साधारण नहीं अपितु सबसे महत्वपूर्ण वा प्रमुख देवता है। हम गोमाता को नमन करते हैं। हमें गोमाता पृथिवी माता व अपनी जन्मदात्री माता के समान महत्वपूर्ण अनुभव होती है। वेद ने तो भूमि, गाय और वेद को माता कह कर उसका स्तुतिगान किया है।

गोकरूणानिधि लघु पुस्तक की भूमिका में ऋषि दयानन्द जी के गोपालन व गोरक्षा के समर्थन में लिखे कुछ शब्द लिख कर हम इस लेख को विराम देते हैं। वह कहते हैं ‘सृष्टि में ऐसा कौन मनुष्य होगा जो सुख और दुःख को स्वयं न मानता हो? क्या ऐसा कोई भी मनुष्य है कि जिसके गले को काटे वा रक्षा करे, वह दुःख और सुख को अनुभव न करे? जब सबको लाभ और सुख ही में प्रसन्नता है, तब विना अपराध किसी प्राणी का प्राण वियोग करके अपना पोषण करना सत्पुरुषों के सामने निन्द्य (निन्दित) कर्म क्यों न होवे? सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर इस सृष्टि में मनुष्यों की आत्माओं में अपनी दया और न्याय को प्रकाशित करे कि जिससे ये सब दया और न्याययुक्त होकर सर्वदा सर्वोपकारक काम करें और स्वार्थपन से पक्षपातयुक्त होकर कृपापात्र गाय आदि पशुओं का विनाश न करें कि जिससे दुग्ध आदि पदार्थों और खेती आदि क्रिया की सिद्धि से युक्त होकर सब मनुष्य आनन्द में रहें।’ हम अनुरोध करते हैं कि पाठकों को गोरक्षा का महत्व जानने के लिए ऋषि दयानन्द जी की ‘गोकरुणानिधि’ तथा पं. प्रकाशवीर शास्त्री लिखित ‘गोहत्या राष्ट्रहत्या’ पुस्तकें पढ़नी चाहिये। गोरक्षा से देश की अर्थव्यवस्था भी सुदृण होती है। गोरक्षा व गोपालन आदि कार्यों से हम अपने अगले जन्म को सृष्टिकर्ता ईश्वर से उत्तम परिवेश में मनुष्य जन्म प्राप्त करने के अधिकारी बनते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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निज भाषा


निज भाषा
इतिहास के प्रकांड पंडित डॉ. रघुबीर प्राय: फ्रांस जाया करते थे। वे सदा फ्रांस के राजवंश के एक परिवार के यहाँ ठहरा करते थे।
उस परिवार में एक ग्यारह साल की सुंदर लड़की भी थी। वह भी डॉ. रघुबीर की खूब सेवा करती थी। अंकल-अंकल बोला करती थी।
एक बार डॉ. रघुबीर को भारत से एक लिफाफा प्राप्त हुआ। बच्ची को उत्सुकता हुई। देखें तो भारत की भाषा की लिपि कैसी है। उसने कहा अंकल लिफाफा खोलकर पत्र दिखाएँ। डॉ. रघुबीर ने टालना चाहा। पर बच्ची जिद पर अड़ गई।
डॉ. रघुबीर को पत्र दिखाना पड़ा। पत्र देखते ही बच्ची का मुँह लटक गया अरे यह तो अँगरेजी में लिखा हुआ है।
आपके देश की कोई भाषा नहीं है?
डॉ. रघुबीर से कुछ कहते नहीं बना। बच्ची उदास होकर चली गई। माँ को सारी बात बताई। दोपहर में हमेशा की तरह सबने साथ साथ खाना तो खाया, पर पहले दिनों की तरह उत्साह चहक महक नहीं थी।
गृहस्वामिनी बोली डॉ. रघुबीर, आगे से आप किसी और जगह रहा करें। जिसकी कोई अपनी भाषा नहीं होती, उसे हम फ्रेंच, बर्बर कहते हैं। ऐसे लोगों से कोई संबंध नहीं रखते।
गृहस्वामिनी ने उन्हें आगे बताया “मेरी माता लोरेन प्रदेश के ड्यूक की कन्या थी। प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व वह फ्रेंच भाषी प्रदेश जर्मनी के अधीन था। जर्मन सम्राट ने वहाँ फ्रेंच के माध्यम से शिक्षण बंद करके जर्मन भाषा थोप दी थी।
फलत: प्रदेश का सारा कामकाज एकमात्र जर्मन भाषा में होता था, फ्रेंच के लिए वहाँ कोई स्थान न था।
स्वभावत: विद्यालय में भी शिक्षा का माध्यम जर्मन भाषा ही थी। मेरी माँ उस समय ग्यारह वर्ष की थी और सर्वश्रेष्ठ कान्वेंट विद्यालय में पढ़ती थी।

एक बार जर्मन साम्राज्ञी कैथराइन लोरेन का दौरा करती हुई उस विद्यालय का निरीक्षण करने आ पहुँची। मेरी माता अपूर्व सुंदरी होने के साथ साथ अत्यंत कुशाग्र बुद्धि भी थीं। सब ‍बच्चियाँ नए कपड़ों में सजधज कर आई थीं। उन्हें पंक्तिबद्ध खड़ा किया गया था।
बच्चियों के व्यायाम, खेल आदि प्रदर्शन के बाद साम्राज्ञी ने पूछा कि क्या कोई बच्ची जर्मन राष्ट्रगान सुना सकती है?
मेरी माँ को छोड़ वह किसी को याद न था। मेरी माँ ने उसे ऐसे शुद्ध जर्मन उच्चारण के साथ इतने सुंदर ढंग से सुना पाते।
साम्राज्ञी ने बच्ची से कुछ इनाम माँगने को कहा। बच्ची चुप रही। बार बार आग्रह करने पर वह बोली ‘महारानी जी, क्या जो कुछ में माँगू वह आप देंगी?’
साम्राज्ञी ने उत्तेजित होकर कहा ‘बच्ची! मैं साम्राज्ञी हूँ। मेरा वचन कभी झूठा नहीं होता। तुम जो चाहो माँगो। इस पर मेरी माता ने कहा ‘महारानी जी, यदि आप सचमुच वचन पर दृढ़ हैं तो मेरी केवल एक ही प्रार्थना है कि अब आगे से इस प्रदेश में सारा काम एकमात्र फ्रेंच में हो, जर्मन में नहीं।’
इस सर्वथा अप्रत्याशित माँग को सुनकर साम्राज्ञी पहले तो आश्चर्यकित रह गई, किंतु फिर क्रोध से लाल हो उठीं। वे बोलीं ‘लड़की’ नेपोलियन की सेनाओं ने भी जर्मनी पर कभी ऐसा कठोर प्रहार नहीं किया था, जैसा आज तूने शक्तिशाली जर्मनी साम्राज्य पर किया है।
साम्राज्ञी होने के कारण मेरा वचन झूठा नहीं हो सकता, पर तुम जैसी छोटी सी लड़की ने इतनी बड़ी महारानी को आज पराजय दी है, वह मैं कभी नहीं भूल सकती।
जर्मनी ने जो अपने बाहुबल से जीता था, उसे तूने अपनी वाणी मात्र से लौटा लिया।
मैं भलीभाँति जानती हूँ कि अब आगे लारेन प्रदेश अधिक दिनों तक जर्मनों के अधीन न रह सकेगा।
यह कहकर महारानी अतीव उदास होकर वहाँ से चली गई। गृहस्वामिनी ने कहा ‘डॉ. रघुबीर, इस घटना से आप समझ सकते हैं कि मैं किस माँ की बेटी हूँ।
हम फ्रेंच लोग संसार में सबसे अधिक गौरव अपनी भाषा को देते हैं। क्योंकि हमारे लिए राष्ट्र प्रेम और भाषा प्रेम में कोई अंतर नहीं…।’
हमें अपनी भाषा मिल गई। तो आगे चलकर हमें जर्मनों से स्वतंत्रता भी प्राप्त हो गई। आप समझ रहे हैं ना !

“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा ज्ञान के,मिटे न हिय की शूल”

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शाहजहाँ ने बताया था, हिंदू क्यों गुलाम हुआ?

समय न हो तो भी, एक बार तो अवश्य पढें ।

मुग़ल बादशाह शाहजहाँ लाल किले में तख्त-ए-ताऊस पर बैठा हुआ था ।

दरबार का अपना सम्मोहन होता है और इस सम्मोहन को राजपूत वीर अमर सिंह राठौर ने अपनी पद चापों से भंग कर दिया । अमर सिंह राठौर शाहजहां के तख्त की तरफ आगे बढ़ रहे थे । तभी मुगलों के सेनापति सलावत खां ने उन्हें रोक दिया ।

सलावत खां – ठहर जाओ अमर सिंह जी, आप 8 दिन की छुट्टी पर गए थे और आज 16वें दिन तशरीफ़ लाए हैं ।

अमर सिंह – मैं राजा हूँ । मेरे पास रियासत है फौज है, मैं किसी का गुलाम नहीं ।

सलावत खां – आप राजा थे ।अब सिर्फ आप हमारे सेनापति हैं, आप मेरे मातहत हैं । आप पर जुर्माना लगाया जाता है । शाम तक जुर्माने के सात लाख रुपए भिजवा दीजिएगा ।

अमर सिंह – अगर मैं जुर्माना ना दूँ ।

सलावत खां- (तख्त की तरफ देखते हुए) हुज़ूर, ये काफि़र आपके सामने हुकूम उदूली कर रहा है ।

अमर सिंह के कानों ने काफि़र शब्द सुना । उनका हाथ तलवार की मूंठ पर गया, तलवार बिजली की तरह निकली और सलावत खां की गर्दन पर गिरी ।

मुगलों के सेनापति सलावत खां का सिर जमीन पर आ गिरा । अकड़ कर बैठा सलावत खां का धड़ धम्म से नीचे गिर गया । दरबार में हड़कंप मच गया । वज़ीर फ़ौरन हरकत में आया और शाहजहां का हाथ पकड़कर उन्हें सीधे तख्त-ए-ताऊस के पीछे मौजूद कोठरीनुमा कमरे में ले गया । उसी कमरे में दुबक कर वहां मौजूद खिड़की की दरार से वज़ीर और बादशाह दरबार का मंज़र देखने लगे ।

दरबार की हिफ़ाज़त में तैनात ढाई सौ सिपाहियों का पूरा दस्ता अमर सिंह पर टूट पड़ा था । देखते ही देखते अमर सिंह ने शेर की तरह सारे भेड़ियों का सफ़ाया कर दिया ।

बादशाह – हमारी 300 की फौज का सफ़ाया हो गया्, या खुदा ।

वज़ीर – जी जहाँपनाह ।

बादशाह – अमर सिंह बहुत बहादुर है, उसे किसी तरह समझा बुझाकर ले आओ । कहना, हमने माफ किया ।

वज़ीर – जी जहाँपनाह ।

हुजूर, लेकिन आँखों पर यक़ीन नहीं होता । समझ में नहीं आता, अगर हिंदू इतना बहादुर है तो फिर गुलाम कैसे हो गया ?

बादशाह – सवाल वाजिब है, जवाब कल पता चल जाएगा ।

अगले दिन फिर बादशाह का दरबार सजा ।

शाहजहां – अमर सिंह का कुछ पता चला ।

वजीर- नहीं जहाँपनाह, अमर सिंह के पास जाने का जोखिम कोई नहीं उठाना चाहता है ।

शाहजहां – क्या कोई नहीं है जो अमर सिंह को यहां ला सके ?

दरबार में अफ़ग़ानी, ईरानी, तुर्की, बड़े बड़े रुस्तम-ए-जमां मौजूद थे, लेकिन कल अमर सिंह के शौर्य को देखकर सबकी हिम्मत जवाब दे रही थी ।

आखिर में एक राजपूत वीर आगे बढ़ा, नाम था अर्जुन सिंह ।

अर्जुन सिंह – हुज़ूर आप हुक्म दें, मैं अभी अमर सिंह को ले आता हूँ ।

बादशाह ने वज़ीर को अपने पास बुलाया और कान में कहा, यही तुम्हारे कल के सवाल का जवाब है ।

हिंदू बहादुर है लेकिन वह इसीलिए गुलाम हुआ । देखो, यही वजह है ।

अर्जुन सिंह अमर सिंह के रिश्तेदार थे । अर्जुन सिंह ने अमर सिंह को धोखा देकर उनकी हत्या कर दी । अमर सिंह नहीं रहे लेकिन उनका स्वाभिमान इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में प्रकाशित है । इतिहास में ऐसी बहुत सी कथाएँ हैं जिनसे सबक़ लेना आज भी बाकी है ।

शाहजहाँ के दरबारी, इतिहासकार और यात्री अब्दुल हमीद लाहौरी की किताब बादशाहनामा से ली गईं ऐतिहासिक कथा ।

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70 साल में हिंदू नहीं समझा कि एक परिवार देश को मुस्लिम राष्ट्र बनाना चाहता है किंतु 7 ही सालों में मुसलमान समझ गया कि मोदी हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते हैं।

देश के दो टुकड़े कर दिए गये, मगर कही से कोई आवाज नहीं आई?

आधा कश्मीर चला गया कोई शोर नहीं?

तिब्बत चला गया कही कोई विद्रोह नहीं हुआ?

आरक्षण, एमरजेंसी, ताशकंद, शिमला, सिंधु जैसे घाव दिए गये मगर किसी ने उफ्फ नहीं की ?

2G स्पेक्ट्रम, कोयला, CWG, ऑगस्टा वेस्टलैंड, बोफोर्स जैसे कलंक लगे मगर किसी ने चूँ नहीं की?

वीटो पावर चीन को दे आये कही ट्रेन नहीं रोकी।

लाल बहादुर जैसा लाल खो दिया किसी ने मोमबत्ती जलाकर सीबीआई जाँच की मांग नहीं की?

माधवराव, राजेश पायलट जैसे नेता मार दिये, कोई फर्क नहीं?

परन्तू जैसे ही गौ मांस बंद किया, प्रलय आ गई..

जैसे ही राष्ट्रगान अनिवार्य किया चींख पड़े..

वंदे मातरम्, भारत माता की जय बोलने को कहा तो जीभ सिल गई..

नोटबंदी, GST पर तांडव करने लगे..

आधार को निराधार करने की होड़ मच गई..

अपने ही देश में शरणार्थी बने कश्मीर के पंडितो पर किसी को दर्द नहीं हुआ..

रोहिंग्या मुसलमानो के लिये दर्द फूट रहा हैं।

किसी ने सच ही कहा था:
देश को डस लिया ज़हरीले नागो ने, घर को लगा दी आग घर के चिरागों ने।

विचार करना…… काग्रेस ने हिन्दूओ को नामर्द बना दिया है।

आतंकवाद के कारण कश्मीर में बंद हुए व तोड़े गए कुल 50 हजार मंदिर खोले व बनवाये जाएंगे

  • केंद्रीय मंत्री किशन रेड्डी

बहुत अच्छी खबर है,
पर 50 हजार?
ये आंकड़ा सुनकर ही मन सुन्न हो गया
एक चर्च की खिड़की पर पत्थर पड़े या मस्जिद पर गुलाल पड़ जाए
तो मीडिया सारा दिन हफ्तों तक बताएगी
पर एक दो एक हजार नहीं,,,
बल्कि पूरे 50 हजार मंदिर बंद हो गए
इसकी भनक तक किसी हिन्दू को न लगी ?

पहले हिन्दुओ को घाटी से जबरन भगा देना,
फिर हिंदुत्व के हर निशान को मिटा देना,
सोचिए कितनी बड़ा षड्यंत्र था..
पूरी घाटी से पूरे धर्म को जड़ से खत्म कर देने का ?

अगर मोदी सरकार न आती तो शायद ही ये बात किसी को पता चलती ! पर हम हिन्दू इसी बात का रोना रोते हैं कि हम मिडिल क्लास लोग हैं हमें इस सब से कोई मतलब नहीं क्योंकि हमें तो सस्ता पेट्रोल पीना है। देश जाये भाड़ में। अफगानिस्तान में पेट्रोल सस्ता है पर आज वहां कोई रहना नहीं चाहता। कल्पना कीजिए अगर वैसी ही मानसिकता वाले देश के शासक बन गये तो सस्ता पेट्रोल ले कर क्या कर लेंगे।

वामपंथी पत्रकारों, मुस्लिम बुद्धिजीवियों और कांग्रेस और उसके चाटुकारो ने कभी इस मुद्दे को देश के समक्ष क्यों नहीं रखा।

पदाहतं सदुत्थाय मूर्धानमधिरोहति।
स्वस्थादेवाबमानेपि देहिनस्वद्वरं रज:॥

जो पैरोंसे कुचलने पर भी उपर उठता है ऐसा मिट्टी का कण अपमान किए जाने पर भी चुप बैठनेवाले व्यक्ति से श्रेष्ठ है।

One who rises up even after being crushed by the feet, such a particle of soil is better than a person who sits silent even after being insulted.

Posted in हास्यमेव जयते

🙋🏻‍♀ पति पत्नी का 🙋🏻‍♂★ एक खूबसूरत संवाद ★


🙋🏻‍♀ पति पत्नी का 🙋🏻‍♂
★ एक खूबसूरत संवाद ★

           (((((((())))))))

मैंने एक दिन अपनी पत्नी से पूछा ~
क्या तुम्हें बुरा नहीं लगता,
मैं बार-बार तुमको बोल देता हूँ,
डाँट देता हूँ , फिर भी तुम
◆ पति भक्ति में लगी रहती हो, ◆
❗ जबकि मैं कभी ❗
पत्नी भक्त बनने का प्रयास नहीं करता ?

मैं वेद का विद्यार्थी और मेरी पत्नी
     विज्ञान की, परन्तु उसकी 

आध्यात्मिक शक्तियाँ मुझसे कई गुना
ज्यादा हैं , क्योकि मैं केवल पढता हूँ,
❗और वो ❗
जीवन में उसका पालन करती है.

  मेरे प्रश्न पर, जरा वो हँसी, और 
   गिलास में पानी देते हुए बोली ~
      ये बताइए, एक पुत्र यदि 
 माता की भक्ति करता है, तो उसे 
  मातृ भक्त कहा जाता है, परन्तु 
        माता यदि पुत्र की 
         कितनी भी सेवा करे,
           उसे पुत्र भक्त तो 
       नहीं कहा जा सकता न.

          मैं सोच रहा था,
आज पुनः ये मुझे निरुत्तर करेगी.
  मैंने प्रश्न किया ~ ये बताओ ....
   जब जीवन का प्रारम्भ हुआ, तो 
     पुरुष और स्त्री समान थे,

फिर पुरुष बड़ा कैसे हो गया, जबकि
स्त्री तो शक्ति का स्वरूप होती है ?

मुस्काते हुए उसने कहा ~आपको
थोड़ी विज्ञान भी पढ़नी चाहिए थी.
मैं झेंप गया.

   उसने कहना प्रारम्भ किया ~
दुनिया मात्र दो वस्तु से निर्मित है ...
     ◆  ऊर्जा और पदार्थ, ◆

पुरुष -->  ऊर्जा का प्रतीक है, और
 स्त्री  -->  पदार्थ की.

पदार्थ को यदि विकसित होना हो, तो
वह ऊर्जा का आधान करता है,
ना की ऊर्जा पदार्थ का.

 ठीक इसी प्रकार ... जब एक स्त्री 
एक पुरुष का आधान करती है, तो 
   शक्ति स्वरूप हो जाती है, और 
     आने वाली पीढ़ियों अर्थात् 
         अपनी संतानों के लिए 
         प्रथम पूज्या हो जाती है, 
                  क्योंकि 
         वह पदार्थ और ऊर्जा
     दोनों की स्वामिनी होती है,
            जबकि पुरुष 
मात्र ऊर्जा का ही अंश रह जाता है.

     मैंने पुनः कहा ~
      तब तो तुम मेरी भी
        पूज्य हो गई न, क्योंकि 
          तुम तो ऊर्जा और पदार्थ 
            दोनों की स्वामिनी हो ?

अब उसने झेंपते हुए कहा ~ आप भी
पढ़े लिखे मूर्खो जैसे बात करते हैं.
आपकी ऊर्जा का अंश
मैंने ग्रहण किया और
शक्तिशाली हो गई, तो क्या
उस शक्ति का प्रयोग
आप पर ही करूँ ?
ये तो कृतघ्नता हो जाएगी.

      मैंने कहा ~ मैं तो तुम पर
        शक्ति का प्रयोग करता हूँ ,
            फिर तुम क्यों नहीं ?

          उसका उत्तर सुन ...
     मेरी आँखों में आँसू आ गए.
उसने कहा ~ जिसके संसर्ग मात्र से 
   मुझमें जीवन उत्पन्न करने की 
          क्षमता आ गई, और 
      ईश्वर से भी ऊँचा जो पद 
      आपने मुझे प्रदान किया,
  ★  जिसे माता कहते हैं  ★

उसके साथ मैं विद्रोह नहीं कर सकती.

फिर मुझे चिढ़ाते हुए उसने कहा ~
  यदि शक्ति प्रयोग करना भी होगा, 
     तो मुझे क्या आवश्यकता ?

👉 मैं तो माता सीता की भाँति
लव कुश तैयार कर दूँगी,
जो आपसे मेरा
हिसाब किताब कर लेंगे. 👈

🙏 नमन है … सभी मातृ शक्तियों को
जिन्होंने अपने प्रेम और मर्यादा में
समस्त सृष्टि को बाँध रखा है.

Posted in હાસ્ય કવિતા

तारक मेहता का उल्टा चश्मा


“तारक मेहता का उल्टा चश्मा” के “जेठालाल” के माध्यम से आज के ओछी मानसिकता वाले पुरुषों पर तीक्ष्ण प्रहार करता व्यंग्यात्मक गीत-

“जेठालाल”

छोड़ ‘दया’ की फिक्र ‘बबीता’,
की क्यों करते ‘जेठालाल’?

रोज़-रोज़ समझाता हारा,
बापू अपना ‘चंपकलाल’।
गुस्से में है ‘अय्यर’ देखो,
पीछे पड़ा खींचने खाल।

क्या तुम उनके प्रतिघातों से,
कभी न डरते ‘जेठालाल’।

देखो तो ‘पोपट’ ने अब तक,
नहीं रचाया अपना ब्याह।
फिर भी देख गैर नारी को,
कभी न भरता वह तो आह।

और तुम्हारी पत्नी होकर,
आहे भरते ‘जेठालाल’।।

देखो-देखो ‘हाथीभाई’
‘सोडी’ ‘तारक’ ‘आत्माराम’।
करते नहीं तुम्हारे जैसे,
वे कोई भी ओछे काम।

छोड़ो ऐसी हरकत तुम, ये-
इज्जत हरते ‘जेठालाल’।