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🌳🌳सम्बन्ध🌳🌳
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एक पंडित जी थे। पंडित जी ने एक दुकानदार के पास पाँच सौ रुपये रख दिये..उन्होंने सोचा कि जब बच्ची की शादी होगी, तो पैसा ले लेंगे,थोड़े दिनों के बाद ज ब बच्ची सयानी हो गयी,तो पंडित जी उस दुकानदार के पास गये।
दुकानदार ने नकार दिया कि आपने कब हमें पैसा दिया था।उसने पंडित जी से कहा कि क्या हमने कुछ लिखकर दिया है ?पंडित जी इस हरकत से परेशान हो गये और चिन्ता में डूब गये¶
थोड़े दिन के बाद उन्हें याद आया कि क्यों न राजा से इस बारे में शिकायत कर दें !ताकि वे कुछ फैसला कर दें
एवं मेरा पैसा कन्या के विवाह के लिए मिल जाये।वे राजा के पास पहुँचे तथा अपनी फरियाद सुनाई¶
राजा ने कहा..कल हमारी सवारी निकलेगी तुम उस लालाजी की दुकान के पास खड़े रहना¶¶
राजा की सवारी निकली.. सभी लोगों ने फूलमालाएँ पहनायीं,किसी ने आरती उतारी।पंडित जी लालाजी की दुकान के पास खड़े थे¶
राजा ने कहा…गुरुजी आप यहाँ कैसे !आप तो हमारे गुरु हैं ?आइये इस बग्घी में बैठ जाइये,लालाजी यह सब देख रहे थे,उन्होंने आरती उतारी, सवारी आगे बढ़ गयी।थोड़ी दूर चलने के बाद राजा ने पंडित जी को उतार दिया और कहा कि पंडित जी हमने आपका काम कर दिया¶
अब आगे आपका भाग्य¶
उधर लालाजी यह सब देखकर हैरान थे कि पंडित जी की तो राजा से अच्छी साँठ-गाँठ है¶
कहीं वे हमारा कबाड़ा न करा दें !!लालाजी ने अपने मुनीम को पंडित जी को ढूँढ़कर लाने को कहा..पंडित जी एक पेड़ के नीचे बैठकर कुछ विचार कर रहे थे,मुनीम जी आदर के साथ उन्हें अपने साथ ले गये¶
लालाजी ने प्रणाम किया और बोले..पंडित जी हमने काफी श्रम किया तथा पुराने खाते को देखा..तो पाया कि हमारे खाते में आपका पाँच सौ रुपये जमा है¶
पंडित जी दस साल में ब्याज के बारह हजार रुपये हो गये,पंडित जी आपकी बेटी हमारी बेटी है_ अत:1000₹ आप हमारी तरफ से ले जाइये तथा उसे लड़की की शादी में लगा देना¶ इस प्रकार लालाजी ने पंडित जी को तेरह हजार रुपये देकर प्रेम के साथ विदा किया जब मात्र एक राजा के साथ सम्बंध होने भर से विपदा दूर जो जाती है तो_
हम सब भी अगर इस दुनिया के राजा,दीनदयालु भगवान् से अगर अपना सम्बन्ध जोड़ लें तो
हमारी कोई समस्या,कठिनाई या फिर हमारे साथ अन्याय का.. कोई प्रश्न ही नही उत्पन्न हो¶
जब एक राजा से पहचान होने पर बिगड़े काम सुधर सकते हैं तो भगवान से सीधा पहचान है सीधा संबंध है तो निश्चित ही हमारे सारे बिगड़े काम बन जायेंगे¶¶
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 *असली संत कौन*?

      *🍁 हरे कृष्ण 🍁*

एक सन्त को एक नाविक रोज इस पार से उस पार ले जाता था, बदले मैं कुछ नहीं लेता था, वैसे भी सन्त के पास पैसा कहां होता था !

नाविक सरल था, पढ़ा लिखा तो नहीं, पर समझ की कमी नहीं थी ! सन्त रास्ते में ज्ञान की बात कहते, कभी भगवान की सर्वव्यापकता बताते , और कभी अर्थ सहित श्रीमदभगवद्गीता के श्लोक सुनाते…

✍️नाविक मछुआरा बड़े ध्यान से सुनता, और बाबा की बात ह्रदय में बैठा लेता !

🕉️एक दिन उस पार उतरने पर सन्त नाविक को कुटिया में ले गये, और बोले, वत्स, मैं पहले व्यापारी था, धन तो कमाया था, पर अपने परिवार को आपदा से नहीं बचा पाया था, अब ये धन मेरे किसी का काम का नहीं, तुम ले लो, तुम्हारा जीवन संवर जायेगा, तेरे परिवार का भी भला हो जाएगा !

✍️नहीं बाबाजी, मैं ये धन नही ले सकता, मुफ्त का धन घर में जाते ही आचरण बिगाड़ देगा , कोई मेहनत नहीं करेगा, आलसी जीवन लोभ लालच ,और पाप बढायेगा ! आप ही ने मुझे ईश्वर के बारे में बताया , मुझे तो आजकल लहरों में भी कई बार वो नजर आया……जब मै उसकी नजर में ही हूँ, तो फिर अविश्वास क्यों करूं, मैं अपना काम करूं, और शेष उसी पर छोड़ दूं !
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✍️ प्रसंग तो समाप्त हो गया, पर एक सवाल छोड़ गया, “इन दोनों पात्रों में सन्त कौन था ?

🛕एक वो था, जिसे दुःख आया, गृह त्याग किया , नाम दान लिया, धर्म ग्रंथों का अध्ययन किया, याद किया, और समझाने लायक स्थिति में भी आ गया, फिर भी धन की ममता नहीं छोड़ पाया, सुपात्र की तलाश करता रहा ।

✍️..और दूसरी तरफ वो निर्धन नाविक , सुबह खा लिया, तो शाम का पता नहीं, फिर भी पराये धन के प्रति कोई ललक नहीं !
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🙏संसार में लिप्त रहकर भी निर्लिप्त रहना आ गया, न ही घर बार छोड़ा , न ही नाम दान लिया, पर उस का ईश्वरीय सत्ता में विश्वास जम गया ! श्रीमदभगवद्गीता के श्लोक को ना केवल समझा बल्कि उन्हें व्यवहारिक जीवन में कैसे उतारना है ये सीख गया, और पल भर में धन के मोह को ठुकरा गया!

✍️”वास्तव में वैरागी कौन”….विचार कीजिए !!🙏
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सन्तोष और प्रसन्नता वह औषधि है…जो हर मर्ज को ठीक कर सकती है , सबसे ख़ास बात यह है कि ये मिलती अपने अन्दर ही है !!

” ✍️सदा सुखी कौन है ? जिसको भगवान् की कृपा पर भरोसा है और उनके न्याय पर विश्वास है , उसको संसार की कोई भी स्थिति विचलित नहीं कर सकती “
ठाकुर बांके बिहारी लाल की जय !!

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐चरित्र💐💐

एक राजपुरोहित थे। वे अनेक विधाओं के ज्ञाता होने के कारण राज्य में अत्यधिक प्रतिष्ठित थे। बड़े-बड़े विद्वान उनके प्रति आदरभाव रखते थे पर उन्हें अपने ज्ञान का लेशमात्र भी अहंकार नहीं था। उनका विश्वास था कि ज्ञान और चरित्र का योग ही लौकिक एवं परमार्थिक उन्नति का सच्चा पथ है। प्रजा की तो बात ही क्या स्वयं राजा भी उनका सम्मान करते थे और उनके आने पर उठकर आसन प्रदान करते थे।

एक बार राजपुरोहित के मन में जिज्ञासा हुई कि राजदरबार में उन्हें आदर और सम्मान उनके ज्ञान के कारण मिलता है अथवा चरित्र के कारण? इसी जिज्ञासा के समाधान हेतु उन्होंने एक योजना बनाई। योजना को क्रियान्वित करने के लिए राजपुरोहित राजा का खजाना देखने गए। खजाना देखकर लौटते समय उन्होंने खजाने में से पाँच बहुमूल्य मोती उठाए और उन्हें अपने पास रख लिया। खजांची देखता ही रह गया। राजपुरोहित के मन में धन का लोभ हो सकता है। खजांची ने स्वप्न में भी नहीं सोचा था। उसका वह दिन उसी उधेड़बुन में बीत गया।

दूसरे दिन राजदरबार से लौटते समय राजपुरोहित पुन: खजाने की ओर मुड़े तथा उन्होंने फिर पाँच मोती उठाकर अपने पास रख लिए। अब तो खजांची के मन में राजपुरोहित के प्रति पूर्व में जो श्रद्धा थी वह क्षीण होने लगी।

तीसरे दिन जब पुन: वही घटना घटी तो उसके धैर्य का बाँध टूट गया। उसका संदेह इस विश्वास में बदल गया कि राजपुरोहित की ‍नीयत निश्चित ही खराब हो गई है।

उसने राजा को इस घटना की विस्तृत जानकारी दी। राजा को इस सूचना से बड़ा आघात पहुँचा। उनके मन में राजपुरोहित के प्रति आदरभाव की जो प्रतिमा पहले से प्रतिष्ठित थी वह चूर-चूर होकर बिखर गई।

चौथे दिन जब राजपुरोहित सभा में आए तो राजा पहले की तरह न सिंहासन से उठे और न उन्होंने राजपुरोहित का अभिवादन किया, यहाँ तक कि राजा ने उनकी ओर देखा तक नहीं। राजपुरोहित तत्काल समझ गए कि अब योजना रंग ला रही है। उन्होंने जिस उद्देश्य से मोती उठाए थे, वह उद्देश्य अब पूरा होता नजर आने लगा था।

यही सोचकर राजपुरोहित चुपचाप अपने आसन पर बैठ गए। राजसभा की कार्यवाही पूरी होने के बाद जब अन्य दरबारियों की भाँति राजपुरोहित भी उठकर अपने घर जाने लगे तो राजा ने उन्हें कुछ देर रुकने का आदेश दिया। सभी सभासदों के चले जाने के बाद राजा ने उनसे पूछा – ‘सुना है आपने खजाने में कुछ गड़बड़ी की है।’

इस प्रश्न पर जब राजपुरोहित चुप रहे तो राजा का आक्रोश और बढ़ा। इस बार वे कुछ ऊँची आवाज में बोले -‘क्या आपने खजाने से कुछ मोती उठाए हैं?’ राजपुरोहित ने मोती उठाने की बात को स्वीकार किया।

राजा का अगला प्रश्न था – ‘आपने कितेने मोती उठाए और कितनी बार?’ राजा ने पुन: पूछा – ‘वे मोती कहाँ हैं?’
राजपुरोहित ने एक पुड़िया जेब से निकाली और राजा के सामने रख दी जिसमें कुल पंद्रह मोती थे। राजा के मन में आक्रोश, दुख और आश्चर्य के भाव एक साथ उभर आए।

राजा बोले – ‘राजपुरोहित जी आपने ऐसा गलत काम क्यों किया? क्या आपको अपने पद की गरिमा का लेशमात्र भी ध्यान नहीं रहा। ऐसा करते समय क्या आपको लज्जा नहीं आई? आपने ऐसा करके अपने जीवनभर की प्रतिष्ठा खो दी। आप कुछ तो बोलिए, आपने ऐसा क्यों किया?

राजा की अकुलाहट और उत्सुकता देखकर राजपुरोहित ने राजा को पूरी बात विस्तार से बताई तथा प्रसन्नता प्रकट करते हुए राजा से कहा – ‘राजन् केवल इस बात की परीक्षा लेने हेतु कि ज्ञान और चरित्र में कौन बड़ा है, मैंने आपके खजाने से मोती उठाए थे अब मैं निर्विकल्प हो गया हूँ। यही नहीं आज चरित्र के प्रति मेरी आस्था पहले की अपेक्षा और अधिक बढ़ गई है।

आपसे और आपकी प्रजा से अभी तक मुझे जो प्यार और सम्मान मिला है। वह सब ज्ञान के कारण नहीं ‍अपितु चरित्र के ही कारण था। आपके खजाने में सबसे अधिक बहुमू्ल्य वस्तु सोना-चाँदी या हीरा-मोती नहीं बल्कि चरित्र है।

अत: मैं चाहता हूँ कि आप अपने राज्य में चरित्र संपन्न लोगों को अधिकाधिक प्रोत्साहन दें ताकि चरित्र का मूल्य उत्तरोत्तर बढ़ता रहे। कहा जाता है –

धन गया, कुछ नहीं गया,
स्वास्थ्‍य गया, कुछ गया।
चरित्र गया तो सब कुछ गया।

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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