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गयाजी में सीता माता ने दिया था इन तीन को शाप? 🙏🚩
#श्राद्ध_विशेष 🙏
वाल्मिकी रामायण में सीता द्वारा पिंडदान देकर दशरथ की आत्मा को मोक्ष मिलने का संदर्भ आता है। वनवास के दौरान भगवान राम, लक्ष्मण और सीता पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध करने के लिए गया धाम पहुंचे। वहां श्राद्ध कर्म के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने हेतु राम और लक्ष्मण नगर की ओर चल दिए।

दोपहर हो गई थी। पिंडदान का निश्चित समय निकलता जा रहा था और सीता जी की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी। तभी दशरथ की आत्मा ने पिंडदान की मांग कर दी। पढ़ें कथा विस्तार से….

वाल्मिकी रामायण में सीता द्वारा पिंडदान देकर दशरथ की आत्मा को मोक्ष मिलने का संदर्भ आता है। वनवास के दौरान भगवान राम, लक्ष्मण और सीता पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध करने के लिए गया धाम पहुंचे। वहां श्राद्ध कर्म के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने हेतु राम और लक्ष्मण नगर की ओर चल दिए।

उधर दोपहर हो गई थी। पिंडदान का समय निकलता जा रहा था और सीता जी की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी। तभी दशरथ की आत्मा ने पिंडदान की मांग कर दी। गया जी के आगे फल्गू नदी पर अकेली सीता जी असमंजस में पड़ गई। उन्होंने फल्गू नदी के साथ वटवृक्ष, केतकी के फूल और गाय को साक्षी मानकर बालू का पिंड बनाकर स्वर्गीय राजा दशरथ के निमित्त पिंडदान दे दिया।

थोडी देर में भगवान राम और लक्ष्मण लौटे तो उन्होंने कहा कि समय निकल जाने के कारण मैंने स्वयं पिंडदान कर दिया। बिना सामग्री के पिंडदान कैसे हो सकता है, इसके लिए राम ने सीता से प्रमाण मांगा। तब सीता जी ने कहा कि यह फल्गू नदी की रेत, केतकी के फूल, गाय और वटवृक्ष मेरे द्वारा किए गए श्राद्धकर्म की गवाही दे सकते हैं। लेकिन फल्गू नदी, गाय और केतकी के फूल तीनों इस बात से मुकर गए। सिर्फ वटवृक्ष ने सही बात कही। तब सीता जी ने दशरथ का ध्यान करके उनसे ही गवाही देने की प्रार्थना की।

दशरथ जी ने सीता जी की प्रार्थना स्वीकार कर घोषणा की कि ऐन वक्त पर सीता ने ही मुझे पिंडदान दिया। इस पर राम आश्वस्त हुए लेकिन तीनों गवाहों द्वारा झूठ बोलने पर सीता जी ने उनको क्रोधित होकर श्राप दिया कि फल्गू नदी- जा तू सिर्फ नाम की नदी रहेगी, तुझमें पानी नहीं रहेगा। इस कारण फल्गू नदी आज भी गया में सूखी रहती है।

गाय को श्राप दिया कि तू पूज्य होकर भी लोगों का जूठा खाएगी। और केतकी के फूल को श्राप दिया कि तुझे पूजा में कभी नहीं चढ़ाया जाएगा।

वटवृक्ष को सीता जी का आशीर्वाद मिला कि उसे लंबी आयु प्राप्त होगी और वह दूसरों को छाया प्रदान करेगा तथा पतिव्रता स्त्री तेरा स्मरण करके अपने पति की दीर्घायु की कामना करेगी। यही कारण है कि गाय को आज भी जूठा खाना पडता है, केतकी के फूल को पूजा पाठ में वर्जित रखा गया है और फल्गू नदी के तट पर सीताकुंड में पानी के अभाव में आज भी सिर्फ बालू या रेत से पिंडदान दिया जाता है।

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🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹एकादशी के दिन श्राद्ध नहीं होता
शास्त्र की आज्ञा है कि एकादशी के दिन श्राद्ध नहीं करना चाहिये। पुष्कर खंड में भगवान शंकर ने पार्वती जी को स्पष्ट रूप से कहा है ,जो एकादशी के दिन श्राद्ध करते हैं तो श्राद्ध को खाने वाला और श्राद्ध को खिलाने वाला और जिस के निमित्त वह श्राद्ध हो रहा है वह पितर, तीनों नर्क गामी होते हैं ।उसके लिए ठीक तो यही होगा कि वह उस दिन के निमित्त द्वादशी को श्राद्ध करें।

तो हमारे महापुरुषों का कहना है कि अगर द्वादशी को श्राद्ध नहीं करें और एकादशी को करना चाहे तो पितरों का पूजन कर निर्धन ब्राह्मण को केवल फलाहार करावे ।भले ही वह ब्राह्मण एकादशी करता हो या ना करता हो। लेकिन हमें उस दिन उसे फलाहार ही करवाना चाहिए ।

श्राद्ध में कभी स्त्री को श्राद्ध नहीं खिलाया जाता। आजकल एक प्रचलन है पिताजी का श्राद्ध है तो पंडित जी को खिलाया और माता जी का श्राद्ध है तो ब्राह्मणी को खिलाया यह शास्त्र विरुद्ध है। स्त्री को श्राद्ध का भोजन करने की आज्ञा नहीं है ।क्योंकि वह जनेऊ धारण नहीं कर सकती, उनको अशुद्ध अवस्था आती है, वह संकल्प नहीं करा सकती, तो ब्राह्मण को ही श्राद्ध का भोजन कराना चाहिए ।ब्राह्मण के साथ ब्राह्मणी आ जाए उनकी पत्नी आ जाए साथ में बच्चे आ जाएं कोई हर्ज नहीं पर अकेली ब्राह्मणी को भोजन कराना शास्त्र विरुद्ध है।

पितरों को पहले थाली नहीं देवें,
पित्तृ पूजन में पितरों को कभी सीधे थाली नहीं देनी चाहिए। वैष्णवो में पहले भोजन बनाकर पृथम ठाकुर जी को भोग लगाना चाहिए, और फिर वह प्रसाद पितरों को देना चाहिए, कारण क्या है वैष्णव कभी भी अमनिया वस्तु किसी को नहीं देगा। भगवान का प्रसाद ही अर्पण करेगा और भगवान का प्रसाद पितरों को देने से उनको संतुष्टि होगी। इसलिए पितरों को प्रसाद अर्पण करना चाहिए ।

पित्तृ लोक का एक दिन मृत्यु लोक के 1 वर्ष के बराबर होता है ।यहां 1 वर्ष बीतता है पितृ लोक में 1 दिन बीतता है ।

केवल श्राद्ध ही नहीं अपने पितरों के निमित्त श्री गीता पाठ, श्री विष्णु सहस्त्रनाम ,श्री महा मंत्र का जप ,और नाम स्मरण अवश्य करना चाहिए। पितृ कर्म करना यह हमारा दायित्व है ।जब तक यह पंच भौतिक देह है तब तक इस संबंध में जो शास्त्र आज्ञा और उपक्रम है उनका भी निर्वाह करना पड़ेगा ।

गया जी करने के बाद भी हमें श्राद्ध करना चाहिए। गयाजी का श्राद्ध एक विशिष्ट कर्म है, और प्रत्येक वर्ष की पित्तृ तिथि पर श्राद्ध यह हमारा नित्यकर्म है। इसलिए गया जी के बाद भी श्राद्ध कर्म करना गरुड़ पुराण अनुसार धर्म सम्मत है । यह सभी कर्म सनातन हिंदू धर्मावलंबियों के लिए हमारे ऋषियों ने निर्धारित किए हैं । इसकी विस्तृत व्याख्या है यहां केवल संक्षिप्त में हम बता रहे हैं ।

प्रत्येक धर्म में अपने पूर्वजों के लिए अलग-अलग प्रकार से सद्गति के लिए प्रक्रिया होती है । जिसका वे पालन करते हैं ।हम लोग केवल अपने सनातन धर्म की आज्ञा का ही पालन करते हैं। नास्तिक लोगों के लिए यहां पर कोई जगह नहीं है। क्योंकि यह कहा जाता है नास्तिक व्यक्ति भी मृत्यु के बाद में प्रेत योनि को ही प्राप्त होता है।
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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐ज्ञानचंद की लाल टोपी💐💐

   ज्ञानचंद नामक एक जिज्ञासु भक्त था।वह सदैव प्रभुभक्ति में लीन रहता था।रोज सुबह उठकर पूजा- पाठ,ध्यान-भजन करने का उसका नियम था।उसके बाद वह दुकान में काम करने  जाता।  

दोपहर के भोजन के समय वह दुकान बंद कर देता और फिर दुकान नहीं खोलता था,बाकी के समय में वह साधु-संतों को भोजन करवाता, गरीबों की सेवा करता, साधु-संग एवं दान-पुण्य करता।व्यापार में जो भी मिलता उसी में संतोष रखकर प्रभुप्रीति के लिए जीवन बिताता था।

  उसके ऐसे व्यवहार से लोगों को आश्चर्य होता और लोग उसे पागल समझते।

लोग कहतेः “यह तो महामूर्ख है। कमाये हुए सभी पैसों को दान में लुटा देता है। फिर दुकान भी थोड़ी देर के लिए ही खोलता है। सुबह का कमाई करने का समय भी पूजा-पाठ में गँवा देता है। यह पागल ही तो है।”

     एक बार गाँव के नगरसेठ ने उसे अपने पास बुलाया। उसने एक लाल टोपी बनायी थी।

नगरसेठ ने वह टोपी ज्ञानचंद को देते हुए कहा”यह टोपी मूर्खों के लिए है।तेरे जैसा महान् मूर्ख मैंने अभी तक नहीं देखा, इसलिए यह टोपी तुझे पहनने के लिए देता हूँ।
इसके बाद यदि कोई तेरे से भी ज्यादा बड़ा मूर्ख दिखे तो तू उसे पहनने के लिए दे देना।

  ज्ञानचंद शांति से वह टोपी लेकर घर वापस आ गया।एक दिन वह नगर सेठ खूब बीमार पड़ा। ज्ञानचंद उससे मिलने गया और उसकी तबीयत और हालचाल पूछे। 

नगरसेठ ने कहा”भाई ! अब तो जाने की तैयारी कर रहा हूँ।”

ज्ञानचंद ने पूछाः”कहाँ जाने की तैयारी कर रहे हो? वहाँ आपसे पहले किसी व्यक्ति को सब तैयारी करने के लिए भेजा कि नहीं? आपके साथ आपकी स्त्री, पुत्र,धन,गाड़ी,बंगला वगैरह जायेगा कि नहीं?

      "भाई ! वहाँ कौन साथ आयेगा? कोई भी साथ नहीं आने वाला है। अकेले ही जाना है।कुटुंब-परिवार, धन-दौलत, महल-गाड़ियाँ सब यहीं पर छोड़कर जाना है। आत्मा-परमात्मा के सिवाय किसी का साथ नहीं रहने वाला है।"  

सेठ के इन शब्दों को सुनकर ज्ञानचंद ने खुद को दी गयी वह लाल टोपी नगरसेठ को वापस देते हुए कहाः “यह लाल टोपी अब आप ही इसे पहनो।”

नगरसेठः “क्यों?”

     ज्ञानचंदः "मुझसे ज्यादा मूर्ख तो आप हैं।जब आपको पता था कि पूरी संपत्ति, मकान, दुकान दुनियादारी आपके साथ नही जाने वाले तब भी आप जीवन भर इसी लालच में लगे रहे और आवश्यकताओं की पूर्ति होने के बाद भी आप और कमाई करने के स्वार्थ में लगे रहे शारीरिक भौतिक इच्छा पूर्तियों में लगे रहे और सद्कर्म नही किये, जरूरतमंदों की सेवा नही की, ईश्वर की भक्ति नही की भजन नही किया, दान नही किया धर्मिक कार्य नही किये धर्म का प्रचार नही किया परलोक जाने की आपने कुछ भी तैयारी नही की अब आप खुद समझ जाइये की सबसे बड़ा मूर्ख कौन है।

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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Posted in PM Narendra Modi

भारत की राजनीति में नेताओं के जन्म दिन मनाए जाने की बड़ी प्राचीन परम्परा है.

जमाने थे राजीव जी प्रधान मंत्री होते थे. जन्म दिवस पर सरकारी हवाई जहाज़ से द्वीप पर ज़ाया जाता था सैकड़ों मित्र रिश्तेदारों के साथ. देश विदेश से चुनिंदा दारू मीट भोजन आता था सरकारी खर्च पर. बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड पहुँचता था मनोरंजन करने सरकारी खर्च पर. आख़िर भारत भाग्य विधाता का जन्म दिवस है.

हमारे यहाँ जब बहन जी मुख्य मंत्री थीं तो एक सार्वजनिक सभा होती थी. उसमें बहन जी को छोटे लोग नोटों की गड्डियाँ चढ़ाते थे और बड़े लोग दसियो लाख नोटों की माला पहनाते थे. पूरे साल बहन जी के बर्थ डे के लिए वसूली कार्यक्रम चलता था. सरकारी अधिकारी से लेकर इंजीनियर तक सबको बर्थ्डे गिफ़्ट में नोट चढ़ाने होते थे, ना नूकुर करने पर उराई में एक जूनियर इंजीनियर को विधायक जी ने पीट पीट कर मार डाला था. आख़िर जनता का फ़र्ज़ है कमा कर महारानी का बर्थ्डे में गिफ़्ट दे.

अखिलेश भैय्या की सरकार का अलग ही सिस्टम था. वह पहले ही इतना कमा लेते थे कि बर्थ डे आदि के लिए अलग से वसूली न होती थी. बर्थ डे अर्थात् सेलब्रेशन. नेता जी के बर्थ डे के लिए इंग्लैंड से बग्घी इंपोर्ट कर मंगाई जाती थी महारानी वाली. 75 फ़ीट का केक काटा जाता था जिसे बाद में फेंक फेंक कर बाँटा जाता था. करोड़ों उड़ाए जाते थे. ज़िले ज़िले में नाचने वाली बुलाई जाती थीं, पूरी सरकार जन्म दिन पर स्वर्गिक सुख अनुभव करती थी.

हा दुर्भाग्य अब एक ऐसा फ़क़ीर गद्दी पर बैठा है जिसे पता ही नहीं कि गद्दी पर जन्म दिवस में कैसे पैसे लुटाने चाहिए. जन्म दिवस वाले दिन को सेली ब्रेट करना हो तो है कि देश की जनता का रेकर्ड वैक्सिनेशन हो. आज मोदी जी के जन्म दिवस पर देश में दो करोड़ से जयादा लोगों को कोविड वैक्सीन लगा कर विश्व रेकर्ड बना सेली ब्रेट किया गया है.

सरकार के जन्म दिन पर नेता जी के नोटों की माला पहनने से लेकर जनता को वैक्सीन का विश्व रेकर्ड तक का जो बदलाव है यही मोदी के बदलते भारत की तशवीर है.

Nitin Tripathi