Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

🌹 पद्मा एकादशी : 17 सितंबर 2021
🎥https://youtu.be/x0yOImm4ZfQ

🌹 युधिष्ठिर ने पूछा : केशव ! कृपया यह बताइये कि भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है, उसके देवता कौन हैं और कैसी विधि है?

🌹 भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! इस विषय में मैं तुम्हें आश्चर्यजनक कथा सुनाता हूँ, जिसे ब्रह्माजी ने महात्मा नारद से कहा था ।

🌹 नारदजी ने पूछा : चतुर्मुख ! आपको नमस्कार है ! मैं भगवान विष्णु की आराधना के लिए आपके मुख से यह सुनना चाहता हूँ कि भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष में कौन सी एकादशी होती है?

🌹 ब्रह्माजी ने कहा : मुनिश्रेष्ठ ! तुमने बहुत उत्तम बात पूछी है । क्यों न हो, वैष्णव जो ठहरे ! भादों के शुक्लपक्ष की एकादशी ‘पधा’ के नाम से विख्यात है । उस दिन भगवान ह्रषीकेश की पूजा होती है । यह उत्तम व्रत अवश्य करने योग्य है । सूर्यवंश में मान्धाता नामक एक चक्रवर्ती, सत्यप्रतिज्ञ और प्रतापी राजर्षि हो गये हैं । वे अपने औरस पुत्रों की भाँति धर्मपूर्वक प्रजा का पालन किया करते थे । उनके राज्य में अकाल नहीं पड़ता था, मानसिक चिन्ताएँ नहीं सताती थीं और व्याधियों का प्रकोप भी नहीं होता था । उनकी प्रजा निर्भय तथा धन धान्य से समृद्ध थी । महाराज के कोष में केवल न्यायोपार्जित धन का ही संग्रह था । उनके राज्य में समस्त वर्णों और आश्रमों के लोग अपने अपने धर्म में लगे रहते थे । मान्धाता के राज्य की भूमि कामधेनु के समान फल देनेवाली थी । उनके राज्यकाल में प्रजा को बहुत सुख प्राप्त होता था ।

🌹 एक समय किसी कर्म का फलभोग प्राप्त होने पर राजा के राज्य में तीन वर्षों तक वर्षा नहीं हुई । इससे उनकी प्रजा भूख से पीड़ित हो नष्ट होने लगी । तब सम्पूर्ण प्रजा ने महाराज के पास आकर इस प्रकार कहा :

🌹 प्रजा बोली: नृपश्रेष्ठ ! आपको प्रजा की बात सुननी चाहिए । पुराणों में मनीषी पुरुषों ने जल को ‘नार’ कहा है । वह ‘नार’ ही भगवान का ‘अयन’ (निवास स्थान) है, इसलिए वे ‘नारायण’ कहलाते हैं । नारायणस्वरुप भगवान विष्णु सर्वत्र व्यापकरुप में विराजमान हैं । वे ही मेघस्वरुप होकर वर्षा करते हैं, वर्षा से अन्न पैदा होता है और अन्न से प्रजा जीवन धारण करती है । नृपश्रेष्ठ ! इस समय अन्न के बिना प्रजा का नाश हो रहा है, अत: ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे हमारे योगक्षेम का निर्वाह हो ।

🌹 राजा ने कहा : आप लोगों का कथन सत्य है, क्योंकि अन्न को ब्रह्म कहा गया है । अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं और अन्न से ही जगत जीवन धारण करता है । लोक में बहुधा ऐसा सुना जाता है तथा पुराण में भी बहुत विस्तार के साथ ऐसा वर्णन है कि राजाओं के अत्याचार से प्रजा को पीड़ा होती है, किन्तु जब मैं बुद्धि से विचार करता हूँ तो मुझे अपना किया हुआ कोई अपराध नहीं दिखायी देता । फिर भी मैं प्रजा का हित करने के लिए पूर्ण प्रयत्न करुँगा ।

🌹 ऐसा निश्चय करके राजा मान्धाता इने गिने व्यक्तियों को साथ ले, विधाता को प्रणाम करके सघन वन की ओर चल दिये । वहाँ जाकर मुख्य मुख्य मुनियों और तपस्वियों के आश्रमों पर घूमते फिरे । एक दिन उन्हें ब्रह्मपुत्र अंगिरा ॠषि के दर्शन हुए । उन पर दृष्टि पड़ते ही राजा हर्ष में भरकर अपने वाहन से उतर पड़े और इन्द्रियों को वश में रखते हुए दोनों हाथ जोड़कर उन्होंने मुनि के चरणों में प्रणाम किया । मुनि ने भी ‘स्वस्ति’ कहकर राजा का अभिनन्दन किया और उनके राज्य के सातों अंगों की कुशलता पूछी । राजा ने अपनी कुशलता बताकर मुनि के स्वास्थय का समाचार पूछा । मुनि ने राजा को आसन और अर्ध्य दिया । उन्हें ग्रहण करके जब वे मुनि के समीप बैठे तो मुनि ने राजा से आगमन का कारण पूछा ।

🌹 राजा ने कहा : भगवन् ! मैं धर्मानुकूल प्रणाली से पृथ्वी का पालन कर रहा था । फिर भी मेरे राज्य में वर्षा का अभाव हो गया । इसका क्या कारण है इस बात को मैं नहीं जानता ।

🌹 ॠषि बोले : राजन् ! सब युगों में उत्तम यह सत्ययुग है । इसमें सब लोग परमात्मा के चिन्तन में लगे रहते हैं तथा इस समय धर्म अपने चारों चरणों से युक्त होता है । इस युग में केवल ब्राह्मण ही तपस्वी होते हैं, दूसरे लोग नहीं । किन्तु महाराज ! तुम्हारे राज्य में एक शूद्र तपस्या करता है, इसी कारण मेघ पानी नहीं बरसाते । तुम इसके प्रतिकार का यत्न करो, जिससे यह अनावृष्टि का दोष शांत हो जाय ।

🌹 राजा ने कहा : मुनिवर ! एक तो वह तपस्या में लगा है और दूसरे, वह निरपराध है । अत: मैं उसका अनिष्ट नहीं करुँगा । आप उक्त दोष को शांत करनेवाले किसी धर्म का उपदेश कीजिये ।

🌹 ॠषि बोले : राजन् ! यदि ऐसी बात है तो एकादशी का व्रत करो । भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष में जो ‘पधा’ नाम से विख्यात एकादशी होती है, उसके व्रत के प्रभाव से निश्चय ही उत्तम वृष्टि होगी । नरेश ! तुम अपनी प्रजा और परिजनों के साथ इसका व्रत करो ।

🌹 ॠषि के ये वचन सुनकर राजा अपने घर लौट आये । उन्होंने चारों वर्णों की समस्त प्रजा के साथ भादों के शुक्लपक्ष की ‘पधा एकादशी’ का व्रत किया । इस प्रकार व्रत करने पर मेघ पानी बरसाने लगे । पृथ्वी जल से आप्लावित हो गयी और हरी भरी खेती से सुशोभित होने लगी । उस व्रत के प्रभाव से सब लोग सुखी हो गये ।

🌹 भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : राजन् ! इस कारण इस उत्तम व्रत का अनुष्ठान अवश्य करना चाहिए । ‘पधा एकादशी’ के दिन जल से भरे हुए घड़े को वस्त्र से ढकँकर दही और चावल के साथ ब्राह्मण को दान देना चाहिए, साथ ही छाता और जूता भी देना चाहिए । दान करते समय निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करना चाहिए :

*नमो नमस्ते गोविन्द *बुधश्रवणसंज्ञक ॥*
अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वसौख्यप्रदो भव ।
भुक्तिमुक्तिप्रदश्चैव लोकानां सुखदायकः ॥

‘बुधवार और श्रवण नक्षत्र के योग से युक्त द्वादशी के दिन बुद्धश्रवण नाम धारण करनेवाले भगवान गोविन्द ! आपको नमस्कार है… नमस्कार है ! मेरी पापराशि का नाश करके आप मुझे सब प्रकार के सुख प्रदान करें । आप पुण्यात्माजनों को भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले तथा सुखदायक हैं |’

राजन् ! इसके पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है ।


Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🔥रिश्तों की महक🔥

“बहू!.तुमसे एक बात कहनी थी।”

“जी मम्मी जी!”

अभी-अभी दफ्तर से लौटकर झटपट फ्रेश होकर रसोई में पहुंच सभी के लिए चाय बना रही सौम्या ने चूल्हे की आंच थोड़ी कम कर दी।

“आज पड़ोस में रहने वाली मिसेज शर्मा हमारे घर आई थी।” धीमी आंच पर खौलते चाय को संभालती सौम्या ने हुंकार भरी..

“जी मम्मी जी!”

“उनके बेटे की शादी पिछले वर्ष हुई थी और तुम्हारी तरह उनकी बहू भी घर के सारे काम अच्छे से संभालती है।”

चाय का स्वाद बढ़ाने के लिए अपनी सास की मनपसंद इलायची कूटकर चाय ने मिलाती सौम्या मुस्कुराई कुछ बोली नहीं। लेकिन प्रभा जी ने अपनी बात आगे बढ़ाई..

,“थोड़ी कम पढ़ी लिखी है इसलिए तुम्हारी तरह ऑफिस नहीं जाती लेकिन उसके माथे से पल्लू कभी नहीं हटता।”

अपनी सास के मन की बात समझने की कोशिश करती सौम्या ने काफी देर उबल चुके चाय का स्वाद कड़वा होने से पहले ही चूल्हे की आंच बुझा दी लेकिन सौम्या की सास प्रभा जी ने अपनी बात पूरी की..

“लोग ऐसी-वैसी बातें करें मुझे पसंद नहीं!. इसलिए तुम कल से सूट-सलवार या ट्राउजर नहीं!.साड़ी पहनकर अपने ऑफिस जाया करना।”

सास की बातों पर सर हिलाकर हांमी भरती सौम्या ने छन्नी रख प्याली में चाय छानकर अपनी सास को थमा दिया और घर के अन्य सदस्यों को चाय देने रसोई से बाहर चली गई।

सास-बहू के बीच हुए बातों की चर्चा बिना किसी से किए अगले दिन दफ्तर जाने के लिए सौम्या एक सुंदर सी साड़ी में तैयार हुई।

हमेशा सूट-सलवार या ट्राउजर पहनकर ऑफिस जाने वाली सौम्या को साड़ी में देख उसका पति मुस्कुराया लेकिन उसके ससुर तनिक हैरान हुए।

रोज की तरह सौम्या ने अपने पति के साथ दफ्तर के लिए निकलने से पहले सास-ससुर के पांव छुए और रोज की तरह प्रभा जी और उनके पति ने हाथ हिलाकर खुशी-खुशी बेटे बहू को दफ्तर के लिए विदा किया।

“आज सौम्या के ऑफिस में कोई फंक्शन है क्या?” वहीं बरामदे में रखी कुर्सी पर बैठते हुए सौम्या के ससुर ने आखिर अपनी पत्नी से पूछ ही लिया।

“ऐसा कुछ तो उसने मुझे नहीं बताया।”

“असल में आज सौम्या साड़ी पहनकर ऑफिस के लिए निकली इसलिए मैंने तुमसे पूछा।”

“अब से रोज साड़ी पहनकर ऑफिस जाने के लिए मैंने ही उसे कहा है।”

नई-नवेली बहू पर अपने सास होने का धौंस जमाने की कोशिश करती पत्नी की ओर देख सौम्या के ससुर मुस्कुराए लेकिन आज प्रभा जी अपने पति पर भी तनिक नाराज हुई।

“और तुम!.बहू को हमेशा उसके नाम से क्यों पुकारते हो?”

“अरे! तो क्या कह कर पुकारूं?”सौम्या के ससुर हैरान हुए।

“बहू कहा करो!”

प्रभा जी ने सलाह दी।

“क्यों?”

“अच्छा लगता है।”

प्रभा जी की बात सुन सौम्या के ससुर मुस्कुराए..

“जैसी तुम्हारी मर्जी!. लेकिन आज मैंने एक बात गौर किया।”

“क्या?”

“बहू ने रोज की तरह ऑफिस के लिए निकलने से पहले तुम्हारे पांव छुएं लेकिन रोज की तरह आज तुम्हारे गले नहीं लगी।”

“अगर सास को मांँ की तरह समझती तो जरूर गले लगती।”

पति की बात सुन कर प्रभा जी तनिक चिढ़ गई लेकिन पत्नी के चेहरे के भाव पढ़ते सौम्या के ससुर जी अपने मन की बात कहने से नहीं चूके..

“मुझे लगता है कि,.अगर तुम बहू को बेटी की तरह समझती तब भी वह जरूर तुम्हारे गले लगती!”

पति की बात सुनकर प्रभाजी गहरी सोच में पड़ गई।

शाम को दफ्तर से घर लौटी सौम्या ने महसूस किया कि घर के भीतर सौंधी खुशबू फैली थी। उसकी सास रसोई में कुछ पका रही थी।

सौम्या ने घड़ी पर नजर डाली। उसे ऑफिस से आने में बिल्कुल देर नहीं हुई थी वह रोज की तरह वक्त पर घर पहुंची थी। खैर सौम्या झटपट फ्रेश होकर रसोई में पहुंची।

रसोई में उसकी सास चूल्हे पर एक ओर पकौड़े तल रही थी और दूसरी ओर चाय चढ़ी हुई थी। सौम्या ने आगे बढ़कर सास के हाथ से कलछी ले ली..

“मम्मी जी!.मैं तो बस आ ही गई थी,.आपने खामखा इतनी मेहनत कर दी।”

“बहू!.तुम रोज दुगनी मेहनत करती हो मैंने तो आज बस यूंँही मन बहलाने के लिए…”

प्रभाजी मुस्कुराई लेकिन सौम्या बीच में ही बोल पड़ी..

“मेरे रहते आपको यह सब करने की क्या जरूरत?”

“जरूरत है बहू!”

“क्यों मांँजी?”

“एक समझदार बहू अपनी सास को मांँ समझती है लेकिन एक सास को भी समझदारी के साथ अपनी बहू को बेटी मानने का अभ्यास करना चाहिए।” प्रभाजी भावुक हो उठी।

सौम्या ने आगे बढ़कर अपनी सास को गले लगा लिया.. “मैंने तो हमेशा ही आपको अपनी मांँ समझा है!”

“लेकिन बहू मैंने तो दूसरों की बातों में आकर तुम्हें सिर्फ बहू समझने की भूल की है।”

प्रभा जी ने अपनी गलती मान मांँ बनकर अपनी बहू के माथे पर हाथ रखा और रसोई में सास-बहू के रिश्तो में आए बदलाव से पूरा घर महक उठा।

🚩पंकज पाराशर🚩