Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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👵🏻 ऋषि पंचमी का व्रत सभी महिलाएं व कन्याएं पूरी श्रद्धा व भक्ति के साथ रखेंगी। आज के दिन सप्तऋषियों का पूर्ण विधि-विधान से पूजन कर कथा श्रवण करने का महत्व है। यह व्रत पापों का नाश करने वाला व श्रेष्ठ फलदायी है। प्रत्येक काल में सप्तऋषि अलग अलग हुए हैं।

📚 पुराणों में सप्त ऋषि के नाम पर भिन्न-भिन्न नामावली मिलती है। विष्णु पुराण अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है:- वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत। विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्।। अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं:- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज। इसके अलावा पुराणों की अन्य नामावली इस प्रकार है:- ये क्रमशः केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ट तथा मारीचि है।
महाभारत में सप्तर्षियों की दो नामावलियां मिलती हैं। एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं तो दूसरी नामावली में पांच नाम बदल जाते हैं। कश्यप और वशिष्ठ वहीं रहते हैं पर बाकी के बदले मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु नाम आ जाते हैं। कुछ पुराणों में कश्यप और मरीचि को एक माना गया है तो कहीं कश्यप और कण्व को पर्यायवाची माना गया है।

💁🏻‍♀️ 1.वशिष्ठ : राजा दशरथ के कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ को कौन नहीं जानता। ये दशरथ के चारों पुत्रों के गुरु थे। वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में राक्षसों का वध करने के लिए भेज दिया था।
कामधेनु गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र में युद्ध भी हुआ था। वशिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो उन्हीं के कुल के मैत्रावरूण वशिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया इतिहास बनाया।

👉🏼 2.विश्वामित्र : ऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए। इस हार ने ही उन्हें घोर तपस्या के लिए प्रेरित किया। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा जगत प्रसिद्ध है। विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। लेकिन स्वर्ग में उन्हें जगह नहीं मिली तो विश्वामित्र ने एक नए स्वर्ग की रचना कर डाली थी। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य किस्से हैं।
माना जाता है कि हरिद्वार में आज जहां शांतिकुंज हैं उसी स्थान पर विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके इंद्र से रुष्ठ होकर एक अलग ही स्वर्ग लोक की रचना कर दी थी। विश्वामित्र ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्री मन्त्र की रचना की जो भारत के हृदय में और जिह्ना पर हजारों सालों से आज तक अनवरत निवास कर रहा है।
💁🏻‍♀️ 3.कण्व : माना जाता है इस देश के सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्वों ने व्यवस्थित किया। कण्व वैदिक काल के ऋषि थे। इन्हीं के आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था।
103 सूक्तवाले ऋग्वेद के आठवें मण्डल के अधिकांश मन्त्र महर्षि कण्व तथा उनके वंशजों तथा गोत्रजों द्वारा दृष्ट हैं। कुछ सूक्तों के अन्य भी द्रष्ट ऋषि हैं, किंतु ‘प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति’ के अनुसार महर्षि कण्व अष्टम मण्डल के द्रष्टा ऋषि कहे गए हैं। इनमें लौकिक ज्ञान-विज्ञान तथा अनिष्ट-निवारण सम्बन्धी उपयोगी मन्त्र हैं। सोनभद्र में जिला मुख्यालय से आठ किलो मीटर की दूरी पर कैमूर श्रृंखला के शीर्ष स्थल पर स्थित कण्व ऋषि की तपस्थली है जो कंडाकोट नाम से जानी जाती है।
👉🏼 4.भारद्वाज : वैदिक ऋषियों में भारद्वाज-ऋषि का उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। भारद्वाज ऋषि राम के पूर्व हुए थे, लेकिन एक उल्लेख अनुसार उनकी लंबी आयु का पता चलता है कि वनवास के समय श्रीराम इनके आश्रम में गए थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। माना जाता है कि भरद्वाजों में से एक भारद्वाज विदथ ने दुष्यन्त पुत्र भरत का उत्तराधिकारी बन राजकाज करते हुए मन्त्र रचना जारी रखी।
ऋषि भारद्वाज के पुत्रों में 10 ऋषि ऋग्वेद के मंत्रदृष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम ‘रात्रि’ था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रदृष्टा मानी गई हैं। ॠग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा भारद्वाज ऋषि हैं। इस मण्डल में भारद्वाज के 765 मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के 23 मन्त्र मिलते हैं। ‘भारद्वाज-स्मृति’ एवं ‘भारद्वाज-संहिता’ के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे।
ऋषि भारद्वाज ने ‘यन्त्र-सर्वस्व’ नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने ‘विमान-शास्त्र’ के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिए विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन मिलता है।
💁🏻‍♀️ 5.अत्रि : ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ब्रह्मा के पुत्र, सोम के पिता और कर्दम प्रजापति व देवहूति की पुत्री अनुसूया के पति थे। अत्रि जब बाहर गए थे तब त्रिदेव अनसूया के घर ब्राह्मण के भेष में भिक्षा माँगने लगे और अनुसूया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगी तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे, तब अनुसूया ने अपने सतित्व के बल पर उक्त तीनों देवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी। माता अनुसूया ने देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश दिया था।
अत्रि ऋषि ने इस देश में कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह योगदान दिया था। अत्रि लोग ही सिन्धु पार करके पारस (आज का ईरान) चले गए थे, जहाँ उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया। अत्रियों के कारण ही अग्निपूजकों के धर्म पारसी धर्म का सूत्रपात हुआ।
अत्रि ऋषि का आश्रम चित्रकूट में था। मान्यता है कि अत्रि-दम्पति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में जन्मे। ऋषि अत्रि पर अश्विनीकुमारों की भी कृपा थी।
👉🏼 6.वामदेव : वामदेव ने इस देश को सामगान (अर्थात् संगीत) दिया। वामदेव ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल के सूत्तद्रष्टा, गौतम ऋषि के पुत्र तथा जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं। भरत मुनि द्वारा रचित भरत नाट्य शास्त्र सामवेद से ही प्रेरित है। हजारों वर्ष पूर्व लिखे गए सामवेद में संगीत और वाद्य यंत्रों की संपूर्ण जानकारी मिलती है।
वामदेव जब मां के गर्भ में थे तभी से उन्हें अपने पूर्वजन्म आदि का ज्ञान हो गया था। उन्होंने सोचा, मां की योनि से तो सभी जन्म लेते हैं और यह कष्टकर है, अत: मां का पेट फाड़ कर बाहर निकलना चाहिए। वामदेव की मां को इसका आभास हो गया। अत: उसने अपने जीवन को संकट में पड़ा जानकर देवी अदिति से रक्षा की कामना की। तब वामदेव ने इंद्र को अपने समस्त ज्ञान का परिचय देकर योग से श्येन पक्षी का रूप धारण किया तथा अपनी माता के उदर से बिना कष्ट दिए बाहर निकल आए।
💁🏻‍♀️ 7. शौनक : शौनक ने दस हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया और किसी भी ऋषि ने ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया। वैदिक आचार्य और ऋषि जो शुनक ऋषि के पुत्र थे।

फिर से बताएं तो वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भरद्वाज, अत्रि, वामदेव और शौनक- ये हैं वे सात ऋषि जिन्होंने इस देश को इतना कुछ दे डाला कि कृतज्ञ देश ने इन्हें आकाश के तारामंडल में बिठाकर एक ऐसा अमरत्व दे दिया कि सप्तर्षि शब्द सुनते ही हमारी कल्पना आकाश के तारामंडलों पर टिक जाती है। इसके अलावा मान्यता हैं कि अगस्त्य, कष्यप, अष्टावक्र, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, ऐतरेय, कपिल, जेमिनी, गौतम आदि सभी ऋषि उक्त सात ऋषियों के कुल के होने के कारण इन्हें भी वही दर्जा प्राप्त है।

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. ””सदा मुस्कुराते रहिये””
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Astrologer
Gopi Ram

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🙏🙏 ઋષિપાંચમ 🙏🙏

આજે ઋષિપાંચમ છે. આપણાં સુખ અને સમૃદ્ધિની સતત ચિંતા કરનારા આપણાં મહાન ઋષિઓ અને આપણાં પ્રતાપી પૂર્વજોનું સ્મરણ કરવાનો દિવસ.

સપ્તમ મનવન્તરના 7 ઋષિઓએ માનવજાતને સુખી અને સમૃદ્ધ બનાવવા માટે અદ્વિતીય યોગદાન આપ્યું છે. આજે આ સાત ઋષિઓનું સ્મરણ કરી એમના જીવનમાંથી પ્રેરણા પ્રાપ્ત કરવાનું પર્વ છે. નવી પેઢીને આ સાત ઋષિનો પાતળો પરિચય જરૂરથી આપજો.

1. કશ્યપ ઋષિ🙏
બ્રહ્માજીના માનસપુત્ર એવા મરીચિ ઋષિના તેઓ પુત્ર છે. સૃષ્ટિના સર્જનમાં એમણે આપેલા યોગદાનને લીધે એમને પ્રજાપતિ તરિકે પણ ઓળખવામાં આવે છે. આજે પણ ધાર્મિક વિધિ વખતે જો કોઈને એના ગોત્રની જાણ ન હોય તો કશ્યપ ગોત્ર તરીકે ઓળખ અપાય છે.

2. અત્રિ ઋષિ🙏
અત્રિ ઋષિના પત્ની અનસૂયાની કથા સૌ કોઈએ સાંભળી જ હશે જેમને બ્રહ્મા, વિષ્ણુ અને મહેશને પોતાના તપના પ્રભાવથી નાના બાળક બનાવી દીધા હતા. મહાન અત્રિ ઋષિ ભગવાન દત્તાત્રેય અને દુર્વાસા ઋષિના પિતા છે. એમના ત્રીજા પુત્ર સોમે સોમનાથ જ્યોતિર્લિંગની સ્થાપના કરી હતી.

3.વસિષ્ઠ ઋષિ🙏
વસિષ્ઠજી રઘુવંશના કુલગુરુ હતા એ રીતે તેઓ ભગવાન શ્રીરામના કુલ ગુરુ હતા. તેઓ મહાન ઋષિ પરાસરના દાદા અને મહાભારત સહિત અનેક ગ્રંથોના રચયિતા વેદવ્યાસજીના પરદાદા થાય.

4.વિશ્વામિત્ર ઋષિ🙏
વિશ્વામિત્ર રાજવી હતા અને રાજપાટ છોડીને સન્યાસી થયા હતા. ભગવાન પરશુરામના પિતા એવા જમદગ્નિ ઋષિના તેઓ મામા થાય. જમદગ્નિ ઋષિના માતા સત્યવતી અને વિશ્વામિત્ર બંને ગાઘી રાજાના સંતાનો હતા.

5.ગૌતમ ઋષિ🙏
ગૌતમ ઋષિને ન્યાયશાસ્ત્રના પંડિત કહેવામાં આવે છે. રસાયણ વિજ્ઞાન સહિતના જુદા જુદા વિષયોના તેઓ જ્ઞાતા હતા. એમના દીકરી અંજની એટલે હનુમાનજીના માતા. આમ ગૌતમ ઋષિ હનુમાનજીના નાના થાય.

6.જમદગ્નિ ઋષિ🙏
તેઓ રુચિક ઋષિના પુત્ર હતા. વિશ્વામિત્રના બહેન સત્યવતીના સંતાન એટલે વિશ્વામિત્ર ઋષિના ભાણેજ થાય. માતા સત્યવતી તેઓને તપસ્વી બનાવવા માંગતા હતા પરંતુ તેનામાં ક્ષત્રિય જેવા શૂરવીરના લક્ષણો હતા. ભગવાન પરશુરામ એમના પુત્ર હતા.

7. ભરદ્વાજ ઋષિ🙏
ભરદ્વાજ ઋષિ યંત્ર વિજ્ઞાનના નિષ્ણાત હતા. તેઓએ લખેલા ‘વૈમાનિકમ્’ નામના ગ્રંથમાં વિમાન બનાવવાની પદ્ધતિનું વિગતવાર વર્ણન કરેલ છે. ‘યંત્ર સર્વસ્વમ’ નામના ગ્રંથમાં યંત્રોના વિજ્ઞાનની વાતો લખી છે. ભરદ્વાજ ઋષિના પુત્ર દ્રોણ કૌરવો અને પાંડવોના ગુરુ હતા.

ઋષિપંચમીના પાવન પર્વે આ સપ્તર્ષિ સહિત આપણાં દિવંગત પૂર્વજોના ચરણોમાં
🙏🙏🙏 🙏🙏
@જયેશભાઈ માલવી (પ્રજાપતિ)

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आज मनाई जाएगी ऋषि पंचमी
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🙏🏻आर के शास्त्री🙏🏻
8696955216
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जय श्री कृष्णा दोस्तों
आज यानी 11 सितम्बर को ऋषि पंचमी है। ऋषि पंचमी का व्रत भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी को किया जाता है। इस दिन सप्तऋषियों की पूजा की जाती है। यह व्रत गणेश चतुर्थी के अगले दिन और हरतालिका तीज के दूसरे दिन किया जाता है। इस व्रत के बारे में ब्रह्माजी ने राजा सिताश्व को बताया था। एक बार राजा सिताश्व ने ब्रह्माजी से ऐसे व्रत के बारे में जानना चाहा जिसके करने से प्राणियों के समस्त पापों का नाश हो जाता है। तब ब्रह्माजी ने उन्हें ऋषि पंचमी के व्रत के बारे में बताया।

ऋषि पंचमी व्रत कथा


विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक सदाचारी ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी बड़ी पतिव्रता थी, जिसका नाम सुशीला था। उस ब्राह्मण के एक पुत्र तथा एक पुत्री दो संतान थी। विवाह योग्य होने पर उसने समान कुलशील वर के साथ कन्या का विवाह कर दिया। दैवयोग से कुछ दिनों बाद वह विधवा हो गई। दुखी ब्राह्मण दम्पति कन्या सहित गंगा तट पर कुटिया बनाकर रहने लगे।

एक दिन ब्राह्मण कन्या सो रही थी कि उसका शरीर कीड़ों से भर गया। कन्या ने सारी बात मां से कही। मां ने पति से सब कहते हुए पूछा- प्राणनाथ! मेरी साध्वी कन्या की यह गति होने का क्या कारण है?
उत्तंक ने समाधि द्वारा इस घटना का पता लगाकर बताया- पूर्व जन्म में भी यह कन्या ब्राह्मणी थी। इसने रजस्वला होते ही बर्तन छू दिए थे। इस जन्म में भी इसने लोगों की देखा-देखी ऋषि पंचमी का व्रत नहीं किया। इसलिए इसके शरीर में कीड़े पड़े हैं।
धर्म-शास्त्रों की मान्यता है कि रजस्वला स्त्री पहले दिन चाण्डालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी तथा तीसरे दिन धोबिन के समान अपवित्र होती है। वह चौथे दिन स्नान करके शुद्ध होती है। यदि यह शुद्ध मन से अब भी ऋषि पंचमी का व्रत करें तो इसके सारे दुख दूर हो जाएंगे और अगले जन्म में अटल सौभाग्य प्राप्त करेगी।

पिता की आज्ञा से पुत्री ने विधिपूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत एवं पूजन किया। व्रत के प्रभाव से वह सारे दुखों से मुक्त हो गई। अगले जन्म में उसे अटल सौभाग्य सहित अक्षय सुखों का भोग मिला।

ऋषि पंचमी पूजा विधि

ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार ऋषि पंचमी के दिन महिलाएं घर में साफ-सफाई करके पूरे विधि विधान से सात ऋषियों के साथ देवी अरुंधती की स्थापना करती हैं। सप्त ऋषियों की हल्दी, चंदन, पुष्प अक्षत आदि से पूजा करके उनसे क्षमा याचना कर सप्तऋषियों की पूजा की जाती है। पूरे विधि- विधान से पूजा करने के बाद ऋषि पंचमी व्रत कथा सुना जाता है तथा पंडितों को भोजन करवाकर कर व्रत का उद्यापन किया जाता है।

ऋषि पंचमी पूजा में इन मंत्रों का करें जाप

कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोय गौतम:।
जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषय: स्मृता:।।
गृह्णन्त्वर्ध्य मया दत्तं तुष्टा भवत मे सदा।।

ऋषि पंचमी व्रत फल

इस दिन व्रत रखकर पूरे विधि- विधान से सप्तर्षियों की पूजा करने से व्यक्ति के सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। अविवाहित स्त्रियों के लिए यह व्रत बेहद महत्त्वपूर्ण और फलकारी माना जाता है। इस दिन हल से जोते हुए अनाज को नहीं खाया जाता अर्थात जमीन से उगने वाले अन्न ग्रहण नहीं किए जाते हैं।
ऋषि पंचमी का व्रत करने से अत्यंत लाभ प्राप्त होता है, यह व्रत करने से महिलाओं को मासिक धर्म में हुई जाने अनजाने में हुई गलतियों के दोषों से मुक्ति प्राप्त होती है। ऋषि पंचमी का व्रत करके महिलाएं जान- अनजाने में हुए पापों से मुक्ति पा सकती है। वैसे भी यह व्रत विशेषकर महिलाओं के लिए ही है। यह व्रत करके महिलाएं अपने जीवन के कई दोषों से मुक्ति पा सकते हैं। इस दिन सप्तऋषियों के साथ- साथ गुरु वशिष्ठ की पत्नी अरुंधति की भी पूजा की जाती है।

ऋषि पंचमी व्रत के लाभ

  1. ऋषि पंचमी का व्रत विशेष रूप से महिलाएं मासिक धर्म में हुई धार्मिक गलतियों और दोषों से रक्षा के लिए करती हैं। माना जाता है यह व्रत करने से इन सभी दोषों से मुक्ति मिल जाती है।
  2. ऋषि पंचमी के व्रत में अपामार्ग (आंधीझाड़ा)के पौधे को विशेष महत्व दिया जाता है। इस दिन अपामार्ग के पौधे से दातुन और स्नान करने के उपरातं ही यह व्रत पूर्ण माना जाता है। ऋषि पंचमी का यह व्रत सभी पापों का नाश करने वाला माना गया है।
  3. ऋषि पंचमी का व्रत प्रत्येक वर्ग की महिला कर सकती है। इस व्रत के पुण्यफल से सभी प्रकार के पापों का क्षय होता है। इसलिए यह व्रत महिलाओं के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण माना जाता है।
  4. ऋषि पंचमी का यह व्रत सुहागन स्त्रियों के साथ-साथ कुंवारी कन्याएं भी कर सकती है लेकिन यह व्रत मनोवांछित और योग्य वर पाने के लिए नहीं किया जाता बल्कि अन्य दोषों से मुक्ति पाने के लिए किया जाता है।
  5. ऋषि पंचमी के दिन गंगा स्नान को अधिक महत्व दिया जाता है। इसलिए गंगा स्नान अवश्य करें और उसके बाद ही सप्तऋषि की पूजा करें।
  6. ऋषि पंचमी के दिन जमीन से बोया हुआ अनाज नहीं खाया जाता अगर कोई महिला ऐसा करती है तो उसे सप्तऋषियों का श्राप मिलता हैं और उसे जीवन में अनेकों कष्टों का सामना करना पड़ता है।
  7. ऋषि पंचमी के दिन ऋषि वशिष्ठ की पत्नी अरुंधति की भी पूजा की जाती है। इसलिए सप्तऋषि के साथ- साथ देवी अरुंधति की भी पूजा अवश्य करें। ऐसा करने से आपको मासिक धर्म में होने वाली पीड़ा से मुक्ति मिलेगी।
  8. ऋषि पंचमी के सात वर्षों के बाद आठवें वर्ष में सप्त ऋषियों की सोने की प्रतिमा बनाकर ब्राह्मण को दान दी जाती है। ऐसा करने से ही यह व्रत पूर्ण माना जाता है।
  9. मासिक धर्म में किसी ब्राह्मण को भोजन कराने के पाप से मुक्ति दिलाता है ऋषि पंचमी का व्रत।
  10. ऋषि पंचमी का व्रत मासिक धर्म में किसी पूजा के समान को हाथ लगाने के पाप से भी मुक्ति दिलाता है।
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    🙏🏻आर के शास्त्री🙏🏻
    श्री रमा वैकुंठ आचार्य संस्कृत महाविद्यालय पुष्कर राजस्थान
    8696955216🍁9460611280