Posted in हिन्दू पतन

एक गांव में राजपूत, ब्राह्मण, बनिये, तेली, हरिजन आदि जातिके लोग रहते थे, सभी मिलजुल कर शान्ति से रहते थे।
एक दिन गांव के मुखिया के पास एक मुस्लिम अपनी पत्नी और आठ बच्चों के साथ आया और गांव मे रहने की भीख मांगने लगा।
रातों को जागकर गाँव की देखभाल करने वाले एक चौकीदार ने इसका विरोध किया लेकिन राजपूतों और ब्राह्मणों ने अपनी श्रेष्ठता दिखाने के कारण उसकी बात को नहीं माना और मुस्लिम परिवार को गांव में रहने की अनुमति दे दी।
दिन गुजरते गये और मुस्लिम के आठों बच्चे बड़े हो गए जब उनकी शादी की बारी आई तो मुस्लिम पहले राजपूतों के पास गया और बोला कि हुजूर बच्चों की शादी होनेवाली है और मेरे पास एक ही घर हैं तो राजपूतों ने उसको एक बंजर जमीन दे दी और कहा कि तुम उस पर घर बना कर रहो ।
इसके बाद मुस्लिम बनिये के पास गया और उससे पैसे उधार लिए । कुछ समय बाद उन आठों बच्चों के ७४ बच्चे हुए और देखते ही देखते लगभग ३० सालों मे उस गांव में मुस्लिमों की जनसंख्या ४०% हो गई।
अब मुस्लिम लड़के अपनी आदत अनुसार हिन्दुओं से झगड़ा करने लगे और उनकी औरतों को छेड़ने लगे ।
धीरे धीरे ब्राह्मणों और बनियों ने गांव को स्वेच्छा से छोड़ दिया।
एक दिन गांव के मुख्य मंदिर को मुस्लिमों ने तोड़ दिया और उस पर मस्जिद बनाने लगे तब वहां के राजपूत उनको रोकने लगे तो मुस्लिम बोला कि जो अल्लाह के काम में रुकावट डाले उसे काट डालो । सामना करना ठीक न समझते हुए राजपूतों ने वह गांव छोड़ दिया और जाते जाते चौकीदार से बोले कि हमने तुम्हारी बात न मानकर उस मुल्ले पर भरोसा किया जिसकी वज़ह से आज हमें गांव छोड़कर जाना पड़ रहा है।
उस गांव का नाम पंचवटी से बदलकर अब रहीमाबाद हो चुका है । यह गांव महाराष्ट्र के अमरावती जिले में स्थित है।

जय श्री राम

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💐अपना बच्चा💐

“मिन्नी….रोमा की शादी तय हो गई है… इसी पच्चीस की सगाई है और उससे अगले हफ़्ते शादी है…तू तो सगाई में ही आ जाना।बुआ के बहुत काम होते हैं”, फोन कान में लगाते ही सुधीर का स्वर गूँजा तो मिन्नी चहक उठी,
“अरे…ये तो बड़ी खुशी की बात है.. लड़का कहाँ का है”,
“वो…बैंगलोर का ही है… रोमा के ही आफिस में…”,आख़िरी शब्द कहते हुए सुधीर के स्वर की हिचकिचाहट मिन्नी की पकड़ में आ गई और न चाहते हुए भी उसके मुँह से निकल गया,
“उसकी…जात बिरादरी…?”
“हमारी जात का नहीं हैं… पर क्या करें… रोमा को तुम जानती हो…एक नम्बर की ज़िद्दी… बस अड़ गयी….शादी करूँगी तो इसी लड़के से वरना ज़िन्दगी भर क्वाँरी रहूँगी.. और घर भी नहीं आऊँगी…..अब अपनी बच्ची है तो जा..बेजा सब मानना ही पड़ेगा”,सुधीर कह रहे थे।
“ठीक है भाई… मैं ज़रूर आऊँगी”,कह कर मिन्नी ने फोन तो काट दिया पर बरसों पहले की घटनाएं अचानक ही चलचित्र की तरह उसकी आँखों में एक एक करके जैसे जुड़ने लगी थीं।
तब वो बी.एस.सी.कर रही थी जब सुभाष से रैगिंग के दौरान उसका परिचय कराया गया था।सुभाष उसी विश्वविद्यालय में एम.एस.सी.फाइनल का छात्र था।रैगिंग तो चंद रोज़ में ख़तम हो गई पर एक प्रेम का अंकुर दोनो के दिलों में छोड़ गयी जो समय पा कर पूरा वृक्ष बन चुका था।सुभाष पी एच डी.करके एक शोध संस्थान में नौकरी पा चुका था और मिन्नी बी.एड.कर चुकी थी।पर इससे पहले कि घर में उसके ब्याह की बात ज़ोर पकड़ती उसने माँ को सुभाष के बारे में बता दिया।माँ से पिता और पिता से भाई सुधीर तक बात पहुंची और घर में जैसे तूफ़ान आ गया…”ठाकुर ख़ानदान की लड़की…किसी ग़ैरजात में शादी करे….सपने में भी मत सोचना….और कह देना अपने उस मजनूँ से..कि आइंदा तुझसे मिलने की भी कोशिश की ना …तो शरीर के टुकड़े भी नहीं पता चलेंगे”,सुधीर ने गरजती आवाज़ में कहा था।
चार भाईबहनों में मिन्नी सबसे छोटी थी और सुधीर पहलौठा।दोनों बहिनों की शादी हो चुकी थी।सबसे छोटी होने के नाते वो घर भर की दुलारी थी…पर भाई का ये रूप उसने पहली बार देखा था।पिता दमें के मरीज़ थे…उनका सारा कारोबार अब सुधीर ही देखता था… शायद इसलिए वो भी चुप थे।
“माँ…मैं सुभाष के अतिरिक्त किसी से शादी नहीं करूंगी… ज़बरदस्ती की तो ज़हर खा लूँगी,”उसने रोते हुए माँ से कहा था पर उसका नतीजा ये निकला कि अगले महीने ही सुधीर ने उसकी शादी अपने मित्र के छोटे भाई संजय से तय कर दी।और जब तक वो कुछ और विद्रोह की आवाज़ उठाती आननफानन में ब्याह भी हो गया।इस बीच सुधीर ने उस पर इतनी बंदिशें लगा दी थीं कि सुभाष से मिलना तो दूर वो उसको फोन तक नहीं कर पाई।
पच्चीस वर्ष हो गए इस बात को… पर उसे हर दिन लगता था जैसे कल की ही बात हो।संजय और उसके विचारों तथा आदतों में ज़मीन आस्मान का अंतर था… पर निभाना तो था ही।हालांकि सुधीर को भी बाद में ही पता चला कि संजय क्रोधी होने के साथ बेहद् घमंडी और स्वार्थी भी था।
और आज फिर इतिहास ने स्वयं को दोहरा दिया था…
“पर इस बार बच्ची अपनी है..इसलिये जा..बेजा सब मानना ही है”,आँखें छलकने के साथ ही उसके होंठ बुदबुदा उठे।
मंजू सक्सेना
लखनऊ

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💐💐बड़े बबुआ💐💐
(कहानी)

कम्पनी के टूर से अजय आज रविवार को सुबह तड़के ही वापस आया था और इस समय नाश्ता कर रहा था। अमृता ने आलू के पराठे बनाये थे जिन्हें जीरे से छौंक लगे दही के साथ परोसा था। उसके और राज के बच्चे दूसरे कमरे में पढ़ रहे थे जबकि छोटा भाई राज सब्जी खरीदने मंडी गया था। उसकी पत्नी घर पर रसोई में अमृता की सहायता कर रही थी।

अभी नाश्ता कर रही रहा था कि रोनी सी सूरत लिए राज कमरे में आया।
एक पल को अजय को लगा कि इसने मोटरसाइकिल से किसी का एक्सीडेंट किया है और इसकी जमकर पिटाई हुई है। अजय ने निश्चिंत भाव से पराठे का कौर दही में डुबोते हुए पूछा- क्या हुआ?

  • (सुबकते हुए उसने कहा)भइया, गाँव में पिता जी का रोडवेज बस से एक्सीडेंट हो गया है। राजू भैया का फोन आया था अभी।
  • तो घबरा क्यों रहे हो! क्या कह रहे हैं राजू भैया? (अजय ने उसी प्रकार नाश्ता करते हुए कहा)
  • कह रहे हैं कि वे लोग यहाँ रामादेवी ला रहे हैं उन्हें।
  • ठीक है। आने दो फिर देखते हैं किस अस्पताल में भर्ती कराया जाय।
    तबतक गर्मागर्म पराठा लेकर अमृता भी आ गयी थी और खड़ी होकर हमारी वार्तालाप सुन रही थी। अजय ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा – घर मे पैसे पड़े होंगे?
  • हाँ, चालीस-पचास तो होंगे ही।
  • ठीक है। प्राथमिक कार्यवाही के लिये हो जायेंगे। फिर बैंक से निकाल लेंगे।

तभी राज के फोन की घण्टी बजी। उसने स्पीकर ऑन कर दिया। उधर से राजू भैया का स्वर उभरा, “हेलो! राज बउवा, सब खत्म हो गया। चाचा नहीं रहे। अब तुम लोग जल्दी से आ जाओ। पुलिस है ही। दरोगा जी से पंचनामा करा के पोस्टमार्टम के लिए भेजना है। जल्दी आ जाओ ताकि आज शाम तक बॉडी घर वापस आ जाय। ठीक है.. जल्दी करो.. हम सब इंतजाम कर रहे हैं यहॉं..”

अजय के हाथों से कौर छूट गया। अमृता सुबकती हुई अंदर चली गयी। राज भी वहीं पड़ी कुर्सी में बैठ कर रोने लगा।
हाथ धोकर अजय ने राज के कंधे पर हाथ फेरते हुए कहा – बेटे, घबराने से कुछ नहीं होगा। जाओ, किसी कार की व्यवस्था करो ताकि हमलोग जल्दी से गाँव पहुँचे। तब तक मैं अन्य सभी भाई बहनों को सूचित कर देता हूँ।
सिसकता हुआ राज बाहर निकला। अजय अंदर जाकर रोती हुई अमृता से कहा – गाड़ी आ रही है। ठीक से सभी कुछ सुव्यवस्थित कर दो, कुछ कपड़े आदि रख लो। अब 15-20 दिनों के बाद ही लौटना होगा।
बरामदे में कुर्सी निकाल कर वह बैठ गया और सबसे पहले हल्द्वानी में रह रहे दो छोटे भाइयों प्रकाश और संजय को सूचित करते हुए शीघ्र गाँव पहुँचने को कहा। फिर तीनों छोटी बहनों को पिताजी के एक्सीडेंट की सूचना देकर गाँव आने को बोला। अब उसने सबसे छोटे भाई पंचम को फोन किया जो नेवी में था और इस समय पोर्टब्लेयर में था। लाइन कनेक्ट हुई और अधिकारी को घटना की सूचना देते हुए पंचम से बात कराने का आग्रह किया। उन्होंने फोन काटते हुए कहा – पीपी (पंच प्रताप) को कॉल कर रहे हैं। अब्बी वो आकर कॉल करेगा।

पंचम ने बताया कि वह वहाँ से अभी फ्लाइट से चेन्नई पहुँचेगा। फिर चेन्नई से फ्लाइट लेकर दिल्ली आएगा। दिल्ली से ट्रेन के द्वारा कानपुर और फिर बस से गाँव पहुँचेगा। इस प्रकार कल रात तक या परसों सुबह तक आ सकेगा। अजय से उसे आने के लिए बोला और कहा कि वह उसके आने तक अंतिम संस्कार नहीं करेगा।

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गाँव जाते समय अजय के स्मृतिपटल पर पिताजी के साथ हुई वार्तालाप के के दृश्य चलने लगे।

तब वह खीरी की एक फैक्ट्री में मैनेजर पद पर कार्यरत था। एक दिन फैक्ट्री के काम से लखनऊ गया था। शाम को लौटा और तरोताजा होकर अम्मा पिताजी के साथ भोजन कर रहा था। तभी पिताजी बोले – बड़े बबुआ, आज हम तुम्हरी फैक्ट्री गए रहेन।

  • पर पिताजी गेटमैन ने बिना मेरी अनुमति के आपको अंदर कैसे जाने दिया?
  • यो तो हम नहीं जानित लेकिन जइसे ही बताया कि अजय बाबू के पिता जी हैं तो गेट खोल कर पैर छू लिहिन। फिर तो जैसे जिस जिस को पता चलत गया सब हमार पैर छू कर आशीष लेत रहे। हम पूरी फैक्ट्री भी घूमि आएन।

इतना कह कर मुस्कुराते हुए पिताजी चुप हुए। मुझे शांत देख कर वे फिर से बोले- बबुआ, आदमी के जीवन म तीन ऋण होते हैं। पितृ ऋण, मातृ ऋण और गुरु ऋण। आज जइसन तुम्हार आदर सम्मान दीख और हमार सम्मान भा है वोहसे हमै बड़ी तसल्ली मिली है और एहसे आज के बाद तुम हमरे ऋण से उऋण हुई गए।
अजय ने देखा। उनकी आँखें सजल थीं। पानी तो अजय की आँखों में भी भरा था। उसने खाना खाया, हाथ धोये और फिर पिताजी के चरणस्पर्श किया। साथ ही अम्मा के भी। आशीष देती हुई अम्मा बोल पड़ीं – जिस तरह से तुमने अपने छोटे भाई बहनों की देखरेख, पढाई लिखाई और शादी विवाह निबटाये हैं, हमसे तो तुम पहिले ही उऋण हुई चुके हौ बड़े बबुआ।

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कभी शराब न पीने वाले पिताजी को न जाने कैसे उनदिनों पीने की गंदी लत लग गयी थी। एक दो बार पिताजी से इस विषय पर अजय ने बात भी की थी किन्तु उन्होंने अनसुना कर दिया था। और फिर उनकी तबियत खराब हो गयी। बहुत अधिक। अजय उन्हें कानपुर लाया और इलाज कराया। हर तीसरे चौथे दिन डॉ के पास जाना पड़ रहा था इसलिए उन्हें यहीं अपने साथ रख लिया। लगभग एक माह के इलाज के बाद अब पिताजी बिना सहारे के जीना उतर जाते थे और एक दो किमी की टहल भी कर आते थे।

अजय टूर पर गया था। पिताजी की दवाएं समाप्त हो गई थी अतः अमृता के शाम को उनसे टहलने जाते समय कहा – ” पिताजी ये पैसे और पर्चा ले लीजिए। कोने वाली केमिस्ट की दुकान से दवाएं लेते आइयेगा।”
“ठीक है, लाओ।”
वापस आने पर वे एकदम शांत थे। जबतक अजय टूर से वापस नहीं लौटा तब तक वे शांत रहे, न नीचे उतरे न टहलने गए।

जब अजय ने उनके पास बैठकर उनकी तबियत के विषय मे जानना चाहा तो वे हाथ जोड़कर डबडबाये नयनों के साथ बहुत धीरे धीरे भर्राए स्वर में कहने लगे,”बड़े बबुआ! हमें माफ करि देव। तुम हमसे बार बार कहेव दारू न पीने को लेकिन संगत का असर रहा और हम न माने रहैं। व दिना जब दवाई ले गए रहेन तब पता चला कि एक दिन की दवाई 120 रुपिया की हैं। बड़े बबुआ! 40 दिन म तुम्हार पाँच हजार खर्च करवा दीन.. हमार तो होश उडिगे।”
“पिता जी, जब बचपन मे हम लोगों को तकलीफ होती थी तो क्या आप रुपये देखते थे? नहीं। आप हम सभी का स्वास्थ्य देखते थे। है न.. तो बस आज हम ऐसा कर रहे हैं।” अजय ने उन्हें समझाने का प्रयत्न किया।

सुबकते हुए पिताजी ने अजय को गले लगा लिया और बोले-“भगवान करे अइस लड़िका सब का दें।” और अजय की पीठ सहलाने लगे थे।

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तेरहवीं के समय सभी भाइयों ने बड़े भइया अजय से आग्रह किया था कि तेरहवीं का खर्च वे सभी मिलकर करना चाहते हैं लेकिन अजय ने मना कर दिया और कहा-“अभी तुम सब बच्चे हो मेरे सामने। यह काम मुझे करने दो। तुम लोग तो अपने बच्चों की पढ़ाई लिखाई में ध्यान दो। बस।”

सभी चुप लगा के बैठ गए।
कार्य बड़े सुरुचिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हो गया।
अगले दो दिनों में सभी अपने अपने ठिकानों के लिए चले जायेंगे। अपना अपना सामान कपड़े खोज कर पैक किये जाने लगे। अजय अभी दो तीन दिन और रुकने वाला था क्योंकि खेती बाड़ी में विरासत को दर्ज कराने के लिए लेखपाल आने वाला था।

तभी अजय के फोन में नोटिफिकेशन आया। फिर एक के बाद तीन और.. जाँचा तो पाया कि उसके खाते में पच्चीस पच्चीस हजार रुपये चार बार आ गए थे। उसे हैरानी हुई कि यह कैसे हुआ। उसने छोटे भाई को आवाज़ दी- “पंचम.. ओ पंचम।”
भागता हुआ पंचम आया और बोला – “जी बड़े भइया।”
“अरे! ये देखो । मेरे खाते में एक लाख रुपए कहाँ से आगये। कोई फ्राड तो नहीं है।” चिंतित स्वर में अजय बोला।
“अरे वो तो प्रकाश भैया, संजय भैया, राज भैया और मैंने मिलकर भेजे हैं। और हम सबने निर्णय लिया है कि जैसे पहले हम पाँचों भाई पिताजी को खेती के कार्यों और अन्य खर्चो के लिए हर महीने पन्द्रह हज़ार रुपये देते थे। अब हम चारो भाई मिलकर आपको चालीस हजार हर महीने आपके खाते में भेज दिया करेंगे। आप मना न करें प्लीज।” पंचम ने हाथ जोड़कर कहा।
“ठीक, जब तुम लोगों ने मुझे लाचार और अपंग बनाने की ठान ही लिए हो तो ठीक है, जैसी तुम सबकी मर्ज़ी।” भ्रातृप्रेम के आगे अजय ने अपने शस्त्र डालते हुए कहा। उधर पंचम सहित अन्य तीनो भाई हवा में पंच मारकर अपनी प्रसन्न व्यक्त करने लगे।

मौलिक रचना – जयसिंह भारद्वाज, कानपुर
03-09-2021

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बछ बारस : पौराणिक कथा

गोवत्स द्वादशी/बछ बारस की पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में भारत में सुवर्णपुर नामक एक नगर था। वहां देवदानी नाम का राजा राज्य करता था। उसके पास एक गाय और एक भैंस थी।

उनकी दो रानियां थीं, एक का नाम ‘सीता’ और दूसरी का नाम ‘गीता’ था। सीता को भैंस से बड़ा ही लगाव था। वह उससे बहुत नम्र व्यवहार करती थी और उसे अपनी सखी के समान प्यार करती थी।

राजा की दूसरी रानी गीता गाय से सखी-सहेली के समान और बछडे़ से पुत्र समान प्यार और व्यवहार करती थी।

यह देखकर भैंस ने एक दिन रानी सीता से कहा- गाय-बछडा़ होने पर गीता रानी मुझसे ईर्ष्या करती है। इस पर सीता ने कहा- यदि ऐसी बात है, तब मैं सब ठीक कर लूंगी।

सीता ने उसी दिन गाय के बछडे़ को काट कर गेहूं की राशि में दबा दिया। इस घटना के बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं चलता। किंतु जब राजा भोजन करने बैठा तभी मांस और रक्त की वर्षा होने लगी। महल में चारों ओर रक्त तथा मांस दिखाई देने लगा। राजा की भोजन की थाली में भी मल-मूत्र आदि की बास आने लगी। यह सब देखकर राजा को बहुत चिंता हुई।

उसी समय आकाशवाणी हुई- ‘हे राजा! तेरी रानी ने गाय के बछडे़ को काटकर गेहूं की राशि में दबा दिया है। इसी कारण यह सब हो रहा है। कल ‘गोवत्स द्वादशी’ है। इसलिए कल अपनी भैंस को नगर से बाहर निकाल दीजिए और गाय तथा बछडे़ की पूजा करें।

इस दिन आप गाय का दूध तथा कटे फलों का भोजन में त्याग करें। इससे आपकी रानी द्वारा किया गया पाप नष्ट हो जाएगा और बछडा़ भी जिंदा हो जाएगा। अत: तभी से गोवत्स द्वादशी के दिन गाय-बछड़े की पूजा करने का ‍महत्व माना गया है तथा गाय और बछड़ों की सेवा की जाती है।

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આ લેખ વાંચતા માત્ર 45 સેકન્ડ લાગશે અને તમારો વિચાર બદલાઇ જશે ..

એક દયાળું સ્વભાવની સ્ત્રી હતી. એને એવો નિયમ કરેલો કે રસોઇ બનાવતી વખતે પ્રથમ રોટલી તૈયાર કરીને એને બહારની શેરીમાં પડતી રસોડાની બારી પર મુકવી જેથી જરુરિયાત વાળી વ્યક્તિ એ રોટલીઓ ઉપયોગ કરી શકે.
એક વખત એક ભિખારીની નજર આ રોટલી પર પડી એટલે એ રોટલી લેવા માટે આવ્યો. રોટલી હાથમાં લઇને બોલ્યો “ જે ખરાબ કરે છે તે તેની સાથે જ રહે છે અને જે સારુ કરે છે તે તેને પાછુ મળે છે.” પેલા બહેનને આ કંઇ સમજાયુ નહી.

બીજા દિવસે ભિખારી પાછો આવ્યો. પેલી સ્ત્રી રોટલી મુકે તેની રાહ જોઇને બેઠો જેવી રોટલી મુકી કે ફટાક દઇને ઉઠાવી લીધી અને બોલ્યો “ જે ખરાબ કરે છે તે તેની સાથે જ રહે છે અને જે સારુ કરે છે તે તેને પાછુ મળે છે.” પેલી સ્ત્રી વિચારવા લાગી કે એણે મારો આભાર માનવો જોઇએ કે કૃતજ્ઞતા વ્યકત કરવી જોઇએ એને બદલે એ તો રોજ એક સરખો ઉપદેશ આપે છે.

હવે તો આ રોજનો ક્રમ બની ગયો. જેવી રોટલી બારી પર મુકાય કે ભિખારી એ ઉઠાવીને ચાલતી પકડે. પેલી સ્ત્રીને હવે ગુસ્સો આવ્યો. રોજ મારી રોટલી લઇ જાય છે પણ આભારના બે શબ્દો પણ બોલતો નથી.

એક દિવસ ગુસ્સામાં ને ગુસ્સામાં રોટલી પર ઝેર ચોપડીને બારી પાસે મુકવા ગઇ. ભિખારી ત્યાં રાહ જોઇને બેઠો જ હતો. રોટલી બારી પર મુકતા એ સ્ત્રીનો જીવ ન ચાલ્યો એણે ઝેરવાળી રોટલીને ચુલામાં નાખીને સળગાવી દીધી અને બીજી રોટલી બનાવીને બહાર મુકી જે લઇને ભિખારીએ ચાલતી પકડી.

થોડા સમય પછી કોઇએ એના ઘરનો દરવાજો ખખડાવ્યો. એણે દરવાજો ખોલ્યો તો એ ફાટી આંખે સામે ઉભેલી વ્યક્તિને જોઇ જ રહી. ઘણા સમય પહેલા ઘર છોડીને જતો રહેલો એનો યુવાન દિકરો સામે ઉભો હતો. ભિખારી કરતા પણ ખરાબ હાલત હતી. આખુ શરીર ધ્રુજતું હતું. સ્ત્રી તો પોતાના દિકરાને ભેટીને રડી જ પડી.
છોકરાએ કહ્યુ , “ હું ઘણા દિવસનો ભુખ્યો હતો. માંડ માંડ આપણા ગામના પાદર સુધી પહોંચી શક્યો. વધુ ચાલવાની મારી કોઇ જ ક્ષમતા ન હતી. હું બેભાન જેવી અવસ્થામાં પડેલો હતો. ત્યારે ત્યાંથી એક ભિખારી પસાર થયો એના હાથમાં એક રોટલી હતી. હું ટીકી ટીકીને એ રોટલી જોવા લાગ્યો. ભિખારીએ રોટલી મને આપી અને કહ્યુ , “ હું રોજ આ રોટલી ખાઉં છું પણ આજે મારા કરતા આ રોટલીની તને વધારે જરૂર છે. માટે તું ખાઇ જા.”

પેલી સ્ત્રી ત્યાં જ ફસડાઇ પડી. “ અરે મારા પ્રભુ ! આજે ગુસ્સામાં ને ગુસ્સામાં ઝેરવાળી રોટલી એ ભિખારીને આપી હોત તો ?……..હવે મને સમજાય છે એ જે બોલતો હતો તે બિલકુલ સાચુ હતુ.”

મિત્રો, કોઇપણ કામ કરવામાં આવે ત્યારે વહેલું કે મોડુ એનું પરિણામ અવશ્ય મળે છે. સદભાવથી કરેલા કાર્યનું પરિણામ સુખદ હશે અને દુર્ભાવથી કરેલા કાર્યનું પરિણામ દુ:ખદ હશે.
તમારું શું કહેવુ છે, મિત્રો, ??????

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💐💐बड़े बबुआ💐💐
(कहानी)

कम्पनी के टूर से अजय आज रविवार को सुबह तड़के ही वापस आया था और इस समय नाश्ता कर रहा था। अमृता ने आलू के पराठे बनाये थे जिन्हें जीरे से छौंक लगे दही के साथ परोसा था। उसके और राज के बच्चे दूसरे कमरे में पढ़ रहे थे जबकि छोटा भाई राज सब्जी खरीदने मंडी गया था। उसकी पत्नी घर पर रसोई में अमृता की सहायता कर रही थी।

अभी नाश्ता कर रही रहा था कि रोनी सी सूरत लिए राज कमरे में आया।
एक पल को अजय को लगा कि इसने मोटरसाइकिल से किसी का एक्सीडेंट किया है और इसकी जमकर पिटाई हुई है। अजय ने निश्चिंत भाव से पराठे का कौर दही में डुबोते हुए पूछा- क्या हुआ?

  • (सुबकते हुए उसने कहा)भइया, गाँव में पिता जी का रोडवेज बस से एक्सीडेंट हो गया है। राजू भैया का फोन आया था अभी।
  • तो घबरा क्यों रहे हो! क्या कह रहे हैं राजू भैया? (अजय ने उसी प्रकार नाश्ता करते हुए कहा)
  • कह रहे हैं कि वे लोग यहाँ रामादेवी ला रहे हैं उन्हें।
  • ठीक है। आने दो फिर देखते हैं किस अस्पताल में भर्ती कराया जाय।
    तबतक गर्मागर्म पराठा लेकर अमृता भी आ गयी थी और खड़ी होकर हमारी वार्तालाप सुन रही थी। अजय ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा – घर मे पैसे पड़े होंगे?
  • हाँ, चालीस-पचास तो होंगे ही।
  • ठीक है। प्राथमिक कार्यवाही के लिये हो जायेंगे। फिर बैंक से निकाल लेंगे।

तभी राज के फोन की घण्टी बजी। उसने स्पीकर ऑन कर दिया। उधर से राजू भैया का स्वर उभरा, “हेलो! राज बउवा, सब खत्म हो गया। चाचा नहीं रहे। अब तुम लोग जल्दी से आ जाओ। पुलिस है ही। दरोगा जी से पंचनामा करा के पोस्टमार्टम के लिए भेजना है। जल्दी आ जाओ ताकि आज शाम तक बॉडी घर वापस आ जाय। ठीक है.. जल्दी करो.. हम सब इंतजाम कर रहे हैं यहॉं..”

अजय के हाथों से कौर छूट गया। अमृता सुबकती हुई अंदर चली गयी। राज भी वहीं पड़ी कुर्सी में बैठ कर रोने लगा।
हाथ धोकर अजय ने राज के कंधे पर हाथ फेरते हुए कहा – बेटे, घबराने से कुछ नहीं होगा। जाओ, किसी कार की व्यवस्था करो ताकि हमलोग जल्दी से गाँव पहुँचे। तब तक मैं अन्य सभी भाई बहनों को सूचित कर देता हूँ।
सिसकता हुआ राज बाहर निकला। अजय अंदर जाकर रोती हुई अमृता से कहा – गाड़ी आ रही है। ठीक से सभी कुछ सुव्यवस्थित कर दो, कुछ कपड़े आदि रख लो। अब 15-20 दिनों के बाद ही लौटना होगा।
बरामदे में कुर्सी निकाल कर वह बैठ गया और सबसे पहले हल्द्वानी में रह रहे दो छोटे भाइयों प्रकाश और संजय को सूचित करते हुए शीघ्र गाँव पहुँचने को कहा। फिर तीनों छोटी बहनों को पिताजी के एक्सीडेंट की सूचना देकर गाँव आने को बोला। अब उसने सबसे छोटे भाई पंचम को फोन किया जो नेवी में था और इस समय पोर्टब्लेयर में था। लाइन कनेक्ट हुई और अधिकारी को घटना की सूचना देते हुए पंचम से बात कराने का आग्रह किया। उन्होंने फोन काटते हुए कहा – पीपी (पंच प्रताप) को कॉल कर रहे हैं। अब्बी वो आकर कॉल करेगा।

पंचम ने बताया कि वह वहाँ से अभी फ्लाइट से चेन्नई पहुँचेगा। फिर चेन्नई से फ्लाइट लेकर दिल्ली आएगा। दिल्ली से ट्रेन के द्वारा कानपुर और फिर बस से गाँव पहुँचेगा। इस प्रकार कल रात तक या परसों सुबह तक आ सकेगा। अजय से उसे आने के लिए बोला और कहा कि वह उसके आने तक अंतिम संस्कार नहीं करेगा।

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गाँव जाते समय अजय के स्मृतिपटल पर पिताजी के साथ हुई वार्तालाप के के दृश्य चलने लगे।

तब वह खीरी की एक फैक्ट्री में मैनेजर पद पर कार्यरत था। एक दिन फैक्ट्री के काम से लखनऊ गया था। शाम को लौटा और तरोताजा होकर अम्मा पिताजी के साथ भोजन कर रहा था। तभी पिताजी बोले – बड़े बबुआ, आज हम तुम्हरी फैक्ट्री गए रहेन।

  • पर पिताजी गेटमैन ने बिना मेरी अनुमति के आपको अंदर कैसे जाने दिया?
  • यो तो हम नहीं जानित लेकिन जइसे ही बताया कि अजय बाबू के पिता जी हैं तो गेट खोल कर पैर छू लिहिन। फिर तो जैसे जिस जिस को पता चलत गया सब हमार पैर छू कर आशीष लेत रहे। हम पूरी फैक्ट्री भी घूमि आएन।

इतना कह कर मुस्कुराते हुए पिताजी चुप हुए। मुझे शांत देख कर वे फिर से बोले- बबुआ, आदमी के जीवन म तीन ऋण होते हैं। पितृ ऋण, मातृ ऋण और गुरु ऋण। आज जइसन तुम्हार आदर सम्मान दीख और हमार सम्मान भा है वोहसे हमै बड़ी तसल्ली मिली है और एहसे आज के बाद तुम हमरे ऋण से उऋण हुई गए।
अजय ने देखा। उनकी आँखें सजल थीं। पानी तो अजय की आँखों में भी भरा था। उसने खाना खाया, हाथ धोये और फिर पिताजी के चरणस्पर्श किया। साथ ही अम्मा के भी। आशीष देती हुई अम्मा बोल पड़ीं – जिस तरह से तुमने अपने छोटे भाई बहनों की देखरेख, पढाई लिखाई और शादी विवाह निबटाये हैं, हमसे तो तुम पहिले ही उऋण हुई चुके हौ बड़े बबुआ।

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कभी शराब न पीने वाले पिताजी को न जाने कैसे उनदिनों पीने की गंदी लत लग गयी थी। एक दो बार पिताजी से इस विषय पर अजय ने बात भी की थी किन्तु उन्होंने अनसुना कर दिया था। और फिर उनकी तबियत खराब हो गयी। बहुत अधिक। अजय उन्हें कानपुर लाया और इलाज कराया। हर तीसरे चौथे दिन डॉ के पास जाना पड़ रहा था इसलिए उन्हें यहीं अपने साथ रख लिया। लगभग एक माह के इलाज के बाद अब पिताजी बिना सहारे के जीना उतर जाते थे और एक दो किमी की टहल भी कर आते थे।

अजय टूर पर गया था। पिताजी की दवाएं समाप्त हो गई थी अतः अमृता के शाम को उनसे टहलने जाते समय कहा – ” पिताजी ये पैसे और पर्चा ले लीजिए। कोने वाली केमिस्ट की दुकान से दवाएं लेते आइयेगा।”
“ठीक है, लाओ।”
वापस आने पर वे एकदम शांत थे। जबतक अजय टूर से वापस नहीं लौटा तब तक वे शांत रहे, न नीचे उतरे न टहलने गए।

जब अजय ने उनके पास बैठकर उनकी तबियत के विषय मे जानना चाहा तो वे हाथ जोड़कर डबडबाये नयनों के साथ बहुत धीरे धीरे भर्राए स्वर में कहने लगे,”बड़े बबुआ! हमें माफ करि देव। तुम हमसे बार बार कहेव दारू न पीने को लेकिन संगत का असर रहा और हम न माने रहैं। व दिना जब दवाई ले गए रहेन तब पता चला कि एक दिन की दवाई 120 रुपिया की हैं। बड़े बबुआ! 40 दिन म तुम्हार पाँच हजार खर्च करवा दीन.. हमार तो होश उडिगे।”
“पिता जी, जब बचपन मे हम लोगों को तकलीफ होती थी तो क्या आप रुपये देखते थे? नहीं। आप हम सभी का स्वास्थ्य देखते थे। है न.. तो बस आज हम ऐसा कर रहे हैं।” अजय ने उन्हें समझाने का प्रयत्न किया।

सुबकते हुए पिताजी ने अजय को गले लगा लिया और बोले-“भगवान करे अइस लड़िका सब का दें।” और अजय की पीठ सहलाने लगे थे।

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तेरहवीं के समय सभी भाइयों ने बड़े भइया अजय से आग्रह किया था कि तेरहवीं का खर्च वे सभी मिलकर करना चाहते हैं लेकिन अजय ने मना कर दिया और कहा-“अभी तुम सब बच्चे हो मेरे सामने। यह काम मुझे करने दो। तुम लोग तो अपने बच्चों की पढ़ाई लिखाई में ध्यान दो। बस।”

सभी चुप लगा के बैठ गए।
कार्य बड़े सुरुचिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हो गया।
अगले दो दिनों में सभी अपने अपने ठिकानों के लिए चले जायेंगे। अपना अपना सामान कपड़े खोज कर पैक किये जाने लगे। अजय अभी दो तीन दिन और रुकने वाला था क्योंकि खेती बाड़ी में विरासत को दर्ज कराने के लिए लेखपाल आने वाला था।

तभी अजय के फोन में नोटिफिकेशन आया। फिर एक के बाद तीन और.. जाँचा तो पाया कि उसके खाते में पच्चीस पच्चीस हजार रुपये चार बार आ गए थे। उसे हैरानी हुई कि यह कैसे हुआ। उसने छोटे भाई को आवाज़ दी- “पंचम.. ओ पंचम।”
भागता हुआ पंचम आया और बोला – “जी बड़े भइया।”
“अरे! ये देखो । मेरे खाते में एक लाख रुपए कहाँ से आगये। कोई फ्राड तो नहीं है।” चिंतित स्वर में अजय बोला।
“अरे वो तो प्रकाश भैया, संजय भैया, राज भैया और मैंने मिलकर भेजे हैं। और हम सबने निर्णय लिया है कि जैसे पहले हम पाँचों भाई पिताजी को खेती के कार्यों और अन्य खर्चो के लिए हर महीने पन्द्रह हज़ार रुपये देते थे। अब हम चारो भाई मिलकर आपको चालीस हजार हर महीने आपके खाते में भेज दिया करेंगे। आप मना न करें प्लीज।” पंचम ने हाथ जोड़कर कहा।
“ठीक, जब तुम लोगों ने मुझे लाचार और अपंग बनाने की ठान ही लिए हो तो ठीक है, जैसी तुम सबकी मर्ज़ी।” भ्रातृप्रेम के आगे अजय ने अपने शस्त्र डालते हुए कहा। उधर पंचम सहित अन्य तीनो भाई हवा में पंच मारकर अपनी प्रसन्न व्यक्त करने लगे।

मौलिक रचना – जयसिंह भारद्वाज, कानपुर
03-09-2021

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

जहर पीया कल्याण जी ने और अमृत पाया बीजेपी ने

जब ढांचा टूट रहा था तब कल्याण सिंह जी 5 कालिदास मार्ग… मुख्यमंत्री आवास की छत पर आराम से जाड़े की धूप सेंक रहे थे… अगर तब कल्याण सिंह जी नहीं होते तो आज भूमिपूजन भी नहीं होता

एक छोटे कद का आदमी… जो दिखने में बहुत सुंदर नहीं था… काला रंग…चेहरे पर दाग… लेकिन संघर्षों में तपा हुआ व्यक्तित्व… ऐसी पर्सनेलिटी की जहां वो पहुंच जाए वहां बड़े से बड़े नेता का कद छोटा हो जाए । व्यक्तित्व की धमक ऐसी बड़े बड़े किरदार बौने दिखने लगें… ऐसे थे ” कल्याण सिंह जी “

कल्याण सिंह ऐसे इसलिए थे क्योंकि उनकी कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं था. उनके दिल और दिमाग में कोई अंतर नहीं था… उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा उसूल था… भगवान राम की भक्ति.. ” भगवान राम “ के प्रति उनके समर्पण को लेकर उन्होंने ” कभी कोई समझौता नहीं किया “।
1990 में लाल कृष्ण आडवाणी जी ने राम मंदिर निर्माण के लिए ” जनसमर्थन इकट्ठा “ करने का लक्ष्य लेकर राम रथयात्रा निकाली । बिहार में तब लालू यादव जी मुख्यमंत्री थे और उन्होंने आडवाणी जी को गिरफ्तार करवा दिया । जिसके बाद राम राथ यात्रा को भारी मात्रा में “जनसमर्थन” मिल गया, ” फलस्वरूप ” उत्तर प्रदेश में पहली बार बीजेपी की सरकार चुन ली गई जिसके ” मुख्यमंत्री ” कल्याण सिंह जी चुने गए।

जून 1991 में कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने और इसके बाद राम मंदिर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे ” विश्व हिंदू परिषद ” में उत्साह की लहर दौड़ गई और उसने ये घोषणा कर दी कि 6 दिसंबर 1992 को राम मंदिर का निर्माण आरंभ किया जाएगा।

वीएचपी की घोषणा के वक्त मुख्यमंत्री के पद पर कल्याण सिंह जी थे और प्रदेश की कानून व्यवस्था को संभालने का पूरा जिम्मा कल्याण सिंह जी पर ही था । वीएचपी की घोषणा के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव के कान खड़े हो गए और उन्होंने बातचीत के लिए कल्याण सिंह जी को दिल्ली बुलाया। और उनसे
पी वी नरसिम्हा राव ने कहा कि इस मामले को सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दीजिए, लेकिन कल्याण सिंह जी ने साफ जवाब दिया कि विवाद का एक ही हल है और वो ये कि बाबरी मस्जिद की जमीन हिंदुओं को सौंप दी जाए। इस तरह बात नहीं बनी और केंद्र – राज्य के बीच टकराव तय हो गया।

नरसिम्हा राव ने एहतियात बरतते हुए पहले ही केंद्रीय सुरक्षा बल को अयोध्या रवाना कर दिया केंद्रीय सुरक्षा बल अयोध्या के चारों तरफ फैला दिए गए

6 दिसंबर तक अयोध्या में “राम जन्मभूमि” के आस पास 3 लाख से अधिक कारसेवक इकट्ठे हो गए थे… ऐसे में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन के पास पूरी ताकत थी कि वो कारसेवकों पर गोली चला सकती थी इससे पहले भी जब मुलायम सिंह यादव की सरकार थी, तब मुलायम सिंह यादव ने “कारसेवकों” पर गोली चलवाई थी

कल्याण सिंह जी को इस बात का अंदेशा लग गया था कि ” 6 दिसंबर “ को कारसेवकों को कंट्रोल करने के लिए उनपर फायरिंग का आदेश कोई भी अधिकारी दे सकता है। इसलिए कल्याण सिंह जी ने 5 दिसंबर की शाम को ही समस्त अधिकारियों को एक ” लिखित आदेश ” जारी किया था और वो ये था कि कोई भी कारसेवकों पर गोली नहीं चलाएगा।

ये फैसला लेना… संवैधानिक पद पर बैठे हुए किसी व्यक्ति के लिए आसान नहीं था। कल्याण सिंह जी इस बात को जानते थे कि जब वो ये “फैसला” ले रहे हैं तो अगर अयोध्या में ” कुछ भी हो जाता है तो इससे उनकी कुर्सी चली जाएगी… सारी दुनिया उन पर आरोप लगाएगी… ये कहा जाएगा कि कल्याण सिंह जी एक अराजक मुख्यमंत्री हैं… ये आरोप ही मंदिर आंदोलन का वो ” विष ” था… जिसे कल्याण सिंह जी ने ” अमृत ” मानकर पी लिया।

आखिर वही हुआ और 6 दिसंबर 1992 को दोपहर “साढ़े 11 बजे” कारसेवक ढांचे को तोड़ने लगे…। “कल्याण सिंह जी” को पल पल की खबर मिल रही थी…. लेकिन वो आराम से अपने मुख्यमंत्री आवास पर जाड़े की धूप सेंक रहे थे… दिल्ली से फोन घनघना रहे थे लेकिन कल्याण सिंह ने राम भक्ति को प्राथमिकता दी और किसी की कोई बात नहीं सुनी।

केंद्र से गृहमंत्री चव्हाण का फोन आया और उन्होंने कहा कि ” कल्याण जी ” मैंने ये सुना है कि ‘कारसेवक’ ढांचे पर चढ गए हैं तब कल्याण सिंह जी ने जवाब दिया कि मेरे पास आगे की खबर है और वो ये है कि कारसेवकों ने ढांचा तोड़ना शुरू भी कर दिया है, लेकिन ये जान लो कि ” मैं गोली नहीं चलाऊंगा, गोली नहीं चलाऊंगा मतलब गोली नहीं चलाऊंगा “।

” कल्याण सिंह जी ” के पूरे व्यक्तित्व और महानता का दर्शन सिर्फ इसी एक लाइन से हो जाता है… कि मैं गोली नहीं चलाऊंगा… मैं गोली नहीं चलाऊँगा… मतलब मैं गोली नहीं चलाऊंगा। “ढ़ांचा” टूट रहा था और केंद्रीय सुरक्षा बल ” विवादित स्थल “ पर आने की कोशिश कर रहे थे लेकिन कल्याण सिंह जी ने ऐसी व्यवस्था करवा दी कि केंद्रीय सुरक्षा बल भी ढांचे तक नहीं पहुंच सके और आखिरकार ढांचा टूट गया…” वो कलंक “… वो ” छाती का शूल “… “वो बलात्कार अनाचार” का दुर्दम्य प्रतीक “भारत मां” की छाती से हटा दिया गया… चारों तरफ हर्ष फैल गया… जन्मभूमि मुक्त हो गई।

नरसिम्हा राव अब “कल्याण सिंह जी” की सरकार को बर्खास्त करने का फैसला लेने जा रहे थे लेकिन उससे पहले ही ” शाम साढे 5 बजे ही ” कल्याण सिंह जी राजभवन गए राज्यपाल से मिले और अपना इस्तीफा सौंप दिया… यानी “कुर्सी” छोड़ दी लेकिन गोली नहीं चलाई… सिंहासन को लात मार दिया और श्री राम की गोद में बैठ गए… श्रीराम के प्यारे भक्त बन गए। ऐसे थे हमारे ” कल्याण सिंह जी “

अगर कल्याण सिंह जी नहीं होते तो शायद किसी और मुख्यमंत्री में ये फैसला लेने की ताकत नहीं होती। कल्याण सिंह जी ने इसलिए भी गोली ना चलाने का “लिखित आदेश” दिया ताकि कल को कोई ” अफसरों ” को जिम्मेदार नहीं ठहराए। कल्याण सिंह जी ने कहा कि सारी जिम्मेदारी मेरी है जो करना है वो मेरे साथ करो। सजा मुझे दो।

अगर कल्याण सिंह जी नहीं होते तो बाबरी नहीं गिरती.. और अगर बाबरी की दीवारें नहीं गिरतीं तो “पुरातत्विक सर्वेक्षण” नहीं होता… बाबरी की दीवार के नीचे मौजूद ” मंदिर ” की दीवार नहीं मिलती… और कोर्ट में कभी ये साबित नहीं हो पाता कि यही भगवान ” श्री राम की जन्मभूमि ” है।

उस कलंक के मिटने का जो शुभ कार्य हुआ…. उसका श्रेय स्वर्गीय कल्याण सिंह जी को है… ” 6 दिसंबर ” कल्याण सिंह जी के पॉलिटिकल करियर को “कालसर्प” की तरह ‘डस’ गया लेकिन कल्याण सिंह जी का यश दिग दिगंत में फैल गया।

” सबसे जरूरी बात ” अगर कल्याण सिंह जी ने गोली चलवा दी होती तो बीजेपी और एसपी में कोई फर्क नहीं रह जाता और आज मोदी प्रधानमंत्री भी नहीं होते इसीलिए ये सत्य है कि ” जहर पिया कल्याण ने अमृत पिया बीजेपी ने। “
मैं उस पुण्य आत्मा को अपने हृदय और आत्मा में मौजूद समस्त ऊर्जा के साथ नमन करता हूं… प्रणाम करता हूं… ईश्वर आपको मोक्ष दे

ये लेख “अपने बच्चों” को जरुर पढ़ाना, और इसको हर ग्रुप में शेयर कर देना।

जय श्री राम🙏 🙏

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

*🕉️ श्री हरि नारायण + शिवलहेरी प्रणाम👏🏻

“”वाणी पर नियंत्रण रखे….””

दोस्तों ,

एक बार एक बूढ़े आदमी ने अफवाह फैलाई कि उसके पड़ोस में रहने वाला नौजवान चोर है।

यह बात दूर – दूर तक फैल गई आस – पास के लोग उस नौजवान से बचने लगे।

नौजवान परेशान हो गया कोई उस पर विश्वास ही नहीं करता था।

तभी गाँव में चोरी की एक वारदात हुई और शक उस नौजवान पर गया उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

लेकिन कुछ दिनों के बाद सबूत के अभाव में वह निर्दोष साबित हो गया।

निर्दोष साबित होने के बाद वह नौजवान चुप नहीं बैठा उसने बूढ़े आदमी पर गलत आरोप लगाने के लिए मुकदमा दायर कर दिया।

पंचायत में बूढ़े आदमी ने अपने बचाव में सरपंच से कहा..

मैंने जो कुछ कहा था, वह एक टिप्पणी से अधिक कुछ नहीं था किसी को नुकसान पहुंचाना मेरा मकसद नहीं था।

सरपंच ने बूढ़े आदमी से कहा… आप एक कागज के टुकड़े पर वो सब बातें लिखें, जो आपने उस नौजवान के बारे में कहीं थीं..

…और जाते समय उस कागज के टुकड़े – टुकड़े करके घर के रस्ते पर फ़ेंक दें कल फैसला सुनने के लिए आ जाएँ..

बूढ़े व्यक्ति ने वैसा ही किया..

अगले दिन सरपंच ने बूढ़े आदमी से कहा कि फैसला सुनने से पहले आप बाहर जाएँ और उन कागज के टुकड़ों को…

जो आपने कल बाहर फ़ेंक दिए थे, इकट्ठा कर ले आएं…

बूढ़े आदमी ने कहा मैं ऐसा नहीं कर सकता.. उन टुकड़ों को तो हवा कहीं से कहीं उड़ा कर ले गई होगी…

अब वे नहीं मिल सकेंगें… मैं कहाँ – कहाँ उन्हें खोजने के लिए जाऊंगा ?

सरपंच ने कहा ‘ठीक इसी तरह, एक सरल – सी टिप्पणी भी किसी का मान – सम्मान उस सीमा तक नष्ट कर सकती है…

जिसे वह व्यक्ति किसी भी दशा में दोबारा प्राप्त करने में सक्षम नहीं हो सकता।

इसलिए यदि किसीके बारे में कुछ अच्छा नहीं कह सकते, तो चुप रहें।

वाणी पर हमारा नियंत्रण होना चाहिए, ताकि हम शब्दों के दास न बनें l
आपका दिन शुभ हो

🔆🔅 Uday Raj🔅🔆