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गुलाबी शॉल


माँ की तबियत ,अचानक से ख़राब हो गयी, खबर सुनकर ,शशि का मन बेचैन हो उठा। उसने तुरन्त अपने पतिदेव, सुधीर के ऑफिस में कॉल किया और टिकिट बुक करने को कहा।
सुधीर ने आई. आर .टी .सी. की वेबसाइट में सर्च किया, शशि को बताया कि अभी कन्फर्म टिकिट नही मिल पा रही है, जब मिल जायेगी, तुम तब चली जाना । किन्तु शशि नहीं मानी।
“मुझे तो बस ,आज ही जाना है” जब तक माँ से मिल ना लूँ,मन को शांति नहीं मिलेगी” ,कहकर फोन रख दिया…
आनन फानन में अपना कुछ सामान बटोरकर, जल्दी से शुटकेस तैयार किया।
जाड़े के दिन थे, सो एक ओवर कोट पहनकर, उसके ऊपर ,उसने अपनी पसन्दीदा ‘गुलाबी शॉल’ डाल ली ।

शाम पाँच बजे ट्रेन थी,स्टेशन पहुँची तो,बिलासपुर के लिए ट्रेन आ चुकी थी । प्लेटफार्म पर भागती हुई ट्रेन की ओर गई और जो डिब्बा सामने दिखा, उसमें ही वो चढ़ गयी।
किस्मत से ट्रेन में, खिड़की के पास उसे एक खाली सीट भी दिखाई दे गयी । उसनें अपना बैग सीट के नीचे खाली जगह देख, व्यवस्थित कर दिया। सीट पर बैठने के बाद खिड़की के बाहर झाँका तो, अचानक उसकी नज़र प्लेटफ़ॉर्म पर बैठे एक छोटे बच्चे पर पड़ी। लगभग तीन चार बरस का ,साँवला सलोना, मासूम सा बच्चा, मैले कुचैले फ़टे कपड़ों में, ठण्ड में ठिठुर रहा था।
ट्रेन खड़ी थी,शशि को उसे देख दया हो आयी । मन किया ट्रेन से उतकर ,अपनी शॉल उसे ओढ़ाकर आ जाएं। फिर उसे लगा,कहीं ट्रेन न चल पड़े…
इसी कश्मकश में उसनें,सामने सीट पर बैठे पैसेन्ज़र से पूछा,”भाईसहाब, क्या बता सकते हैं,ट्रेन छूटने में अभी कितना वक़्त है”

” जी, अभी तो टाइम है ,
10 मिनिट बाद ट्रेन चलना शुरू होगी…आज बिफ़ोर आ गयी है” उन्होंने बताया ।

ओह अच्छा, जी धन्यवाद ! कहकर, वह फिर खिड़की से उस बच्चे को देखनें लगी।
अपनी गुलाबी शॉल को कंधे से उतारा..हाथ में ली , कश्मीरी कढ़ाई को सहलाया,अचानक से उसे याद आया ,
“अरे! ये तो वही शॉल है ,जो हनीमून पर ,शिमला की मॉल रोड से सुधीर ने ख़रीदा था और कैसे स्नेह से उसके कांधे पर ओढ़ा दिया था…”
मधुर स्मृति में खोकर ,उस शॉल को ,बच्चे को ओढ़ाने का, उसनें इरादा ही बदल दिया…।
बच्चे पर तरस भी बहुत आ रहा था, लेकिन खुद को वह समझाती रही ,मन ही मन तसल्ली देती रही…
“कितने लोग तो आ जा रहे है प्लेटफार्म में । कोई न कोई उस बच्चे की सुध ले ही लेगा और उसकी माँ भी तो होगी ,यहीं कहीं ,भीख वीक माँग रही होगी। वो ही आकर संभाल लेगी उसे !

तभी ट्रेन चल पड़ी। शशि की नज़रें , खिड़की के बाहर, उस बच्चे को देखती रही…
जैसे जैसे ट्रेन स्पीड पकड़ती गयी , वो बच्चा भी पीछे छूटता गया, आँखों से ओझल होता चला गया।

माँ के घर पहुँची तो,माँ की हालत देख शशि की आँखे नम हो गयी । उनकी सेवा सुश्रुसा में वह पूरी तरह से जुट गयी।
लेकिन, गाहे बगाहे वो ‘प्लेटफॉर्म वाला बच्चा’ उसे याद आ ही जाता…

जब भी वो अपनी गुलाबी शॉल को देखती, ओढ़ने का मन न करता…मन में ‘आत्मग्लानि’ सी होने लगती।

“कैसे ,इतनी स्वार्थी बन गयी ?”
एक शॉल तक न दे सकी ,उस गरीब को..”
“ऐसे तो जाने कितने तीज -त्यौहार ,जप-तप ,पूजा- पाठ करती रहती हूँ, मन मे खूब दया भाव भी रखती हूँ। फिर भी ,कितना मोह कर बैठी ,इस शॉल से मैं “

“सुधीर तो मुझे सुन्दर से सुन्दर और भी शॉल दिला सकते हैं…मैं भी न ,सच में ,बहुत छोटे दिल की निकली, सोंचकर मन ही मन खुद पर खीझती भी रही….”
अक्सर ही घूम फिर कर, शशि को वह ठण्ड में ठिठुरता हुआ बच्चा, स्मरण हो आता…जिससे बेचैन सी हो जाती वह।

ख़ूब सोच -विचार कर, उसने आखिर निश्चय कर लिया कि
चाहे जो हो ,वापसी में ,स्टेशन पर रुककर ,सबसे पहले उस बच्चे को शॉल देगी, तभी घर जायेगी ।
शायद ! तब कहीं जाकर ही,उसके कलेजे में ठंडक मिले…

सप्ताह भर बाद,माँ की हालत में सुधार दिखा। माँ के कहनें पर ही, उसनें वापसी का प्लान बनाया।

आखिर! वह दिन भी आ गया ,जब उसकी ट्रेन वापिस नागपुर स्टेशन पहुँची। स्टेशन आने के पूर्व ही ,उसने अपनी उस गुलाबी शॉल को ऊपर निकाल कर रख लिया था।
सुधीर, स्टेशन लेने आये थे…उन्हें बताया ,तो वे भी शशि के साथ, बच्चे को प्लेटफार्म में ढूंढने लगे ।

बच्चा कहीं दिखाई न दिया..कुछेक बुक स्टॉल,टी-स्टॉल वालों से पूछा ,तो वे हैरत में देखते ,फिर मना कर देते….सुधीर ने झिड़की दी,
” तुम भी न शशि ,थकी हारी आयी हो , कहाँ कहाँ ढूंढोगी,इतना बड़ा स्टेशन है, जाने कहाँ होगा वो…”

“चलो ,अभी घर चलो ,फिर शॉल देने आ जायेंगे, किसी दिन ।

लेकिन शशि ने तो ,जैसे संकल्प कर रखा था ,किसी भी हाल में आज ही शॉल देना है । सो सुधीर की सारी कोशिशे… नाक़ाम.. ..।
आखिरकार, बेमन से,झुंझलाते हुए, सुधीर ने सामान ‘क्लॉक रूम’में रखवाया । फिर सारे प्लेटफ़ॉर्म में ढूँढ़ते रहे उसे ,पर वो बच्चा कहीं न मिला और न ही किसी से उसकी कोई जानकारी मिली।
थक हार कर, उदास मन से अन्ततः सामान उठाकर ,वे घर आ गए…..।
समय बीतता गया…जब कभी भी, शशि का रेल्वे स्टेशन जाना होता ,आँखे उस बच्चे को ही खोज़ती, पर वो बच्चा, दोबारा कभी न दिखा।
लगभग एक साल बाद, उनका ट्रांसफर हो गया । नागपूर से बनारस शिफ्ट होना पड़ा उन्हें।

हर साल जाड़ा आता , शशि अपनें सारे ऊलन के कपडों को धूप दिखाती।
अपनी उस “गुलाबी शॉल” को देख, उसका मन दुःख सा जाता…उसे छूती तो ,जो कोमल अहसास पहले हुआ करते, अब न होते, हाँ ! मन में ‘टीस’ ज़रूर उठती…

उस शॉल को, इतने सालों में, फिर कभी ,ओढ़ ही नहीं पायी वह। कई बार शॉल को निकाला भी ,पर ओढ़ने का मन ही न किया। वापस तह करके, अलमारी में रख देती ,वहीँ पड़ी रहती …..
बनारस में शशि ,अपने पति सुधीर के साथ ,’अस्सी घाट’ पर, शाम को अक़्सर ही जाया करती थी।
सीढ़ियों में बैठ, गंगा के पवन जल को घंटो निहारने में, उसे बड़ा सुकून मिलता था । एकदिन,शशि और सुधीर घाट की सीढ़ियों पर बैठे हुए थे ,तभी शशि का ध्यान, एक पागल सी औरत की ओर गया , जो कटें फ़टे चीथड़ों में लिपटी हुई , ठण्ड की सिरहन से ठिठुर रही थी ।
शशि ,बार बार उसे ही देखती जा रही थी। अचानक वह उठ खड़ी हुई और उसने सुधीर से धीरे से कहा– “सुनो न, मैं घर जाकर, आती हूँ, आप इस पगली को देखते रहना, कहीं चली न जाएं “

“क्यों क्या हुआ” सुधीर ने पूछना चाहा।

“बस अभी कुछ मत पूछों,घर जाकर आती हूँ….”
“तुम भी न शशि ,जाने क्या सनक सवार हो जाती है तुम्हें”
“हद करती हो यार! घूमने आयी हो तो बैठो न शांति से….”
सुधीर ने उसे झिड़की दी।तो
“प्लीज़sss प्लीज़ss हाथ जोड़कर आपसे विनती करती हूँ…बस यूँ गयी और यूँ आयी… मान भी जाओ न “,कहकर शशि ने हाथ जोड़ लिए।
सुधीर चुप ही रहा….उसकी चुप्पी को, हाँ समझकर, जल्दी से ऑटो की ओर भागी । ऑटो में बैठ…ऑटो वाले को पहले ही हिदायत दी।
“भईया घर जाकर तुंरत ही, वापस इसी घाट में आना है ,सो घर के बाहर इन्तज़ार करना “
“मैं जल्द ही वापस आ जाउंगी…..”

घर के सामने, ऑटो रुकवाकर ,कहीं वह भाग न जाये ,डर से, बिना पैसे दिए, तेज कदमों से घर पहुँची,ताला खोलकर, सीधे बेडरूम में गयी और अपनी आलमारी से “गुलाबी शॉल” निकाल ली। उसे एक पॉलीथिन बैग में डाला, फिर तेज़ कदमों से बाहर निकलकर ,ऑटो की ओर देखा,ऑटो वहीँ खड़ा था। वह जाकर ऑटो में बैठ गयी। चलिए भैया जल्दी चलिए वापिस अस्सी घाट, ऑटो वाले से कहा।

ऑटो में बैठे हुए शशि , मन ही मन भगवान को मनाती जा रहा रही थी ,”हे भगवान ! बस वो ‘पगलिया’ मिल जाये…निकल न जाये कहीं…!”
“इनका क्या भरोसा ,रोके न रोके…! झुंझला जो रहे थे….”

“हे गंगा मैया ! वो पगलिया मिल जाये तो, एक सौ एक दीपक छोडूंगी आज ही ..सच्ची में…. “

“भैया थोड़ा, तेज़ चलाओं न”,ऑटो वाले से भी वह बार बार मनुहार करती जा रही थी ।

घाट पहुँची तो देखा , सुधीर उस पगलिया से थोड़े दूर पर ही बैठे थे और वो पगलिया मज़े से कचौरी खा रही थी….
शशि उसके पास गयी और झट से पूरी शॉल को खोलकर उसे ओढ़ा दिया….
वो पगलिया तो बेसुध सी कचौरी खाने में मगन थी…
शशि ने बड़ी तसल्ली के साथ उसे देखा, जैसे जंग जीत ली हो। फिर सुधीर के पास पहुँची तो, उसे देख सुधीर ने मुस्कुराते हुए कहा,”देखो ! रोक रखा था न, तुम्हारी उस ‘अमानत’ को”…

“कचौरी भी लाकर दी, ताकि रुकी रहे वो “
सुनकर ,शशि की आँखो में से मोती झरनें लगे…
“अरे! क्या हुआ” कहकर , सुधीर उठकर खड़े हुए… दुलार करते हुए उन्होंने शशि के कंधे को पकड़ा,उसे सँभालते हुए नदी की सीढ़ियों से उतरते हुए कहा,
चलो गंगा जी में पृच्छालन कर लें। गंगा जी के करीब जाकर, माँ गंगा को देख, शशि का मन शांत हो गया। अपूर्व आनंद की अनुभूति होने लगी । लगा जैसे वर्षों से सीने पर रखा कोई भारी बोझ हट गया हो ,जैसे किसी ऋण से मुक्त हो गयी हो वह आज।

“कुछ कहोगी नहीं शशि “
“इतनी ख़ामोश क्यों हो गयी”
सुधीर के पूछने पर , धीरे से उसने कहा,
“सुनो न, मुझे एक सौ एक दीपक प्रज्जलवित कर, गंगा में प्रवाहित करना है “

“एक सौ एक” ? आश्चर्य से सुधीर ने पूछा ,
“हाँ पूरे “एक सौ एक”
“आज ही…अभी.. “
सुधीर ने जैसे भेद समझ लिया हो, हँसकर शशि की ओर देखकर कहा—“मेरी पगलिया”…

— सपना शिवाले सोलंकी

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🔥!! अक्लमंद बढई!!🔥

एक गाँव में एक बढ़ई रहता था। वह शरीर और दिमाग से बहुत मजबूत था।

एक दिन उसे पास के गाँव के एक अमीर आदमी ने फर्नीचर बनवाने के लिए अपने घर पर बुलाया।

जब वहाँ का काम खत्म हुआ तो लौटते वक्त शाम हो गई तो उसने काम के मिले पैसों की एक पोटली बगल मे दबा ली और ठंड से बचने के लिए कंबल ओढ़ लिया।

वह चुपचाप सुनसान रास्ते से घर की और रवाना हुआ। कुछ दूर जाने के बाद अचानक उसे एक लुटेरे ने रोक लिया।

डाकू शरीर से तो बढ़ई से कमजोर ही था पर उसकी कमजोरी को उसकी बंदूक ने ढक रखा था।

अब बढ़ई ने उसे सामने देखा तो लुटेरा बोला, ‘जो कुछ भी तुम्हारे पास है सभी मुझे दे दो नहीं तो मैं तुम्हें गोली मार दूँगा।’

यह सुनकर बढ़ई ने पोटली उस लुटेरे को थमा दी और बोला, ‘ ठीक है यह रुपये तुम रख लो मगर मैं घर पहुँच कर अपनी बीवी को क्या कहुंगा। वो तो यही समझेगी कि मैने पैसे जुए में उड़ा दिए होंगे।

तुम एक काम करो, अपने बंदूक की गोली से मेरी टोपी मे एक छेद कर दो ताकि मेरी बीवी को लूट का यकीन हो जाए।’

लुटेरे ने बड़ी शान से बंदूक से गोली चलाकर टोपी में छेद कर दिया। अब लुटेरा जाने लगा तो बढ़ई बोला,

‘एक काम और कर दो, जिससे बीवी को यकीन हो जाए कि लुटेरों के गैंग ने मिलकर मुझे लूटा है । वरना मेरी बीवी मुझे कायर ही समझेगी।

तुम इस कंबल मे भी चार-पाँच छेद कर दो।’ लुटेरे ने खुशी खुशी कंबल में भी कई गोलियाँ चलाकर छेद कर दिए।

इसके बाद बढ़ई ने अपना कोट भी निकाल दिया और बोला, ‘इसमें भी एक दो छेद कर दो ताकि सभी गॉंव वालों को यकीन हो जाए कि मैंने बहुत संघर्ष किया था।’

इस पर लुटेरा बोला, ‘बस कर अब। इस बंदूक में गोलियां भी खत्म हो गई हैं।’

यह सुनते ही बढ़ई आगे बढ़ा और लुटेरे को दबोच लिया और बोला, ‘मैं भी तो यही चाहता था।

तुम्हारी ताकत सिर्फ ये बंदूक थी। अब ये भी खाली है। अब तुम्हारा कोई जोर मुझ पर नहीं चल सकता है।

चुपचाप मेरी पोटली मुझे वापस दे दे वरना…

यह सुनते ही लुटेरे की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई और उसने तुरंत ही पोटली बढई को वापिस दे दी और अपनी जान बचाकर वहाँ से भागा।

आज बढ़ई की ताकत तब काम आई जब उसने अपनी अक्ल का सही ढंग से इस्तेमाल किया।

शिक्षा:- मुश्किल हालात मे अपनी अक्ल का ज्यादा इस्तेमाल करना चाहिए तभी आप मुसीबतों से आसानी से निकल सकते हैं।

सदैव प्रसन्न रहिये और मुस्कुराइए
जो प्राप्त है- वो पर्याप्त है
जिसका मन मस्त है
उसके पास समस्त है!!

🚩जय श्री गुरु देव🚩

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🕉️ श्री हरि नारायण + शिवलहेरी प्रणाम 👏🏻

प्रार्थना
एक वृद्ध महिला एक सब्जी की दुकान पर जाती है, उसके पास सब्जी खरीदने के पैसे नहीं होते है।
वो दुकानदार से प्रार्थना करती है कि उसे सब्जी उधार दे दे पर दुकानदार मना कर देता है।
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उसके बार-बार आग्रह करने पर दुकानदार खीज कर कहता है, तुम्हारे पास कुछ ऐसा है, जिसकी कोई कीमत हो, तो उसे इस तराजू पर रख दो..
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मैं उसके वजन के बराबर सब्जी तुम्हे दे दूंगा।
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वृद्ध महिला कुछ देर सोच में पड़ जाती है। क्योंकि उसके पास ऐसा कुछ भी नहीं था।
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कुछ देर सोचने के बाद वह, एक मुड़ा-तुड़ा कागज का टुकड़ा निकालती है और उस पर कुछ लिख कर तराजू पर रख देती है।
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दुकानदार ये देख कर हंसने लगता है। फिर भी वह थोड़ी सब्जी उठाकर तराजू पर रखता है।
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आश्चर्य..!!!
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कागज वाला पलड़ा नीचे रहता है और सब्जी वाला ऊपर उठ जाता है।
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इस तरह वो और सब्जी रखता जाता है पर कागज वाला पलड़ा नीचे नीचे ही रहता है।
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तंग आकर दुकानदार उस कागज को उठा कर पढता है और हैरान रह जाता है।
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कागज पर लिखा था, हे श्री कृष्ण! तुम सर्वज्ञ हो, अब सब कुछ तुम्हारे हाथ में है।
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दुकानदार को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। वो उतनी सब्जी वृद्ध महिला को दे देता है।
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पास खड़ा एक अन्य ग्राहक दुकानदार को समझाता है, कि दोस्त, आश्चर्य मत करो। केवल श्री कृष्ण ही जानते हैं की प्रार्थना का क्या मोल होता है।
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वास्तव में प्रार्थना में बहुत शक्ति होती है। चाहे वो एक घंटे की हो या एक मिनट की। यदि सच्चे मन से की जाये, तो ईश्वर अवश्य सहायता करते हैं।
.अक्सर लोगों के पास ये बहाना होता है, की हमारे पास वक्त नहीं।
.मगर सच तो ये है कि ईश्वर को याद करने का कोई समय नहीं होता।
.🙏जय जय श्री राधे कृष्णा🙏

🔅🔆 Uday Raj🔆🔅

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. पुण्यों का मोल
🙏🙏🙏🙏🙏 🌹🌹🙏🙏🙏🙏🙏
एक व्यापारी जितना अमीर था उतना ही दान-पुण्य करने वाला, वह सदैव यज्ञ-पूजा आदि कराता रहता था।

एक यज्ञ में उसने अपना सब कुछ दान कर दिया। अब उसके पास परिवार चलाने लायक भी पैसे नहीं बचे थे।
व्यापारी की पत्नी ने सुझाव दिया कि पड़ोस के नगर में एक बड़े सेठ रहते हैं। वह दूसरों के पुण्य खरीदते हैं।

आप उनके पास जाइए और अपने कुछ पुण्य बेचकर थोड़े पैसे ले आइए, जिससे फिर से काम-धंधा शुरू हो सके।

पुण्य बेचने की व्यापारी की बिलकुल इच्छा नहीं थी, लेकिन पत्नी के दबाव और बच्चों की चिंता में वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ। पत्नी ने रास्ते में खाने के लिए चार रोटियां बनाकर दे दीं।

व्यापारी चलता-चलता उस नगर के पास पहुंचा जहां पुण्य के खरीदार सेठ रहते थे। उसे भूख लगी थी।

नगर में प्रवेश करने से पहले उसने सोचा भोजन कर लिया जाए। उसने जैसे ही रोटियां निकालीं एक कुतिया तुरंत के जन्मे अपने तीन बच्चों के साथ आ खड़ी हुई।

कुतिया ने बच्चे जंगल में जन्म दिए थे। बारिश के दिन थे और बच्चे छोटे थे, इसलिए वह उन्हें छोड़कर नगर में नहीं जा सकती थी।
व्यापारी को दया आ गई। उसने एक रोटी कुतिया को खाने के लिए दे दिया।
कुतिया पलक झपकते रोटी चट कर गई लेकिन वह अब भी भूख से हांफ रही थी।

व्यापारी ने दूसरी रोटी, फिर तीसरी और फिर चारो रोटियां कुतिया को खिला दीं। खुद केवल पानी पीकर सेठ के पास पहुंचा।

व्यापारी ने सेठ से कहा कि वह अपना पुण्य बेचने आया है। सेठ व्यस्त था। उसने कहा कि शाम को आओ।

दोपहर में सेठ भोजन के लिए घर गया और उसने अपनी पत्नी को बताया कि एक व्यापारी अपने पुण्य बेचने आया है। उसका कौन सा पुण्य खरीदूं।

सेठ की पत्नी बहुत पतिव्रता और सिद्ध थी। उसने ध्यान लगाकर देख लिया कि आज व्यापारी ने कुतिया को रोटी खिलाई है।

उसने अपने पति से कहा कि उसका आज का पुण्य खरीदना जो उसने एक जानवर को रोटी खिलाकर कमाया है। वह उसका अब तक का सर्वश्रेष्ठ पुण्य है।

व्यापारी शाम को फिर अपना पुण्य बेचने आया। सेठ ने कहा- आज आपने जो यज्ञ किया है मैं उसका पुण्य लेना चाहता हूं।
व्यापारी हंसने लगा। उसने कहा कि अगर मेरे पास यज्ञ के लिए पैसे होते तो क्या मैं आपके पास पुण्य बेचने आता!

सेठ ने कहा कि आज आपने किसी भूखे जानवर को भोजन कराकर उसके और उसके बच्चों के प्राणों की रक्षा की है। मुझे वही पुण्य चाहिए।

व्यापारी वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ। सेठ ने कहा कि उस पुण्य के बदले वह व्यापारी को चार रोटियों के वजन के बराबर हीरे-मोती देगा।

चार रोटियां बनाई गईं और उसे तराजू के एक पलड़े में रखा गया। दूसरे पलड़े में सेठ ने एक पोटली में भरकर हीरे-जवाहरात रखे, पलड़ा हिला तक नहीं। दूसरी पोटली मंगाई गई। फिर भी पलड़ा नहीं हिला।

कई पोटलियों के रखने पर भी जब पलड़ा नहीं हिला तो व्यापारी ने कहा- सेठजी, मैंने विचार बदल दिया है. मैं अब पुण्य नहीं बेचना चाहता।

व्यापारी खाली हाथ अपने घर की ओर चल पड़ा। उसे डर हुआ कि कहीं घर में घुसते ही पत्नी के साथ कलह न शुरू हो जाए।

जहां उसने कुतिया को रोटियां डाली थी, वहां से कुछ कंकड़-पत्थर उठाए और थैली में रख लिये।

घर पहुंचने पर पत्नी ने पूछा कि पुण्य बेचकर कितने पैसे मिले तो उसने थैली दिखाई और कहा इसे भोजन के बाद रात को ही खोलेंगे। इसके बाद गांव में कुछ उधार मांगने चला गया।

इधर उसकी पत्नी ने जबसे थैली देखी थी उसे सब्र नहीं हो रहा था। पति के जाते ही उसने थैली खोली।
उसकी आंखे फटी रह गईं। थैली हीरे-जवाहरातों से भरी थी।

व्यापारी घर लौटा तो उसकी पत्नी ने पूछा कि पुण्यों का इतना अच्छा मोल किसने दिया ? इतने हीरे-जवाहरात कहां से आए ??
व्यापारी को अंदेशा हुआ कि पत्नी सारा भेद जानकर ताने तो नहीं मार रही, लेकिन उसके चेहरे की चमक से ऐसा लग नहीं रहा था।

व्यापारी ने कहा- दिखाओ कहां हैं हीरे-जवाहरात। पत्नी ने लाकर पोटली उसके सामने उलट दी। उसमें से बेशकीमती रत्न गिरे। व्यापारी हैरान रह गया।
फिर उसने पत्नी को सारी बात बता दी। पत्नी को पछतावा हुआ कि उसने अपने पति को विपत्ति में पुण्य बेचने को विवश किया।

दोनों ने तय किया कि वह इसमें से कुछ अंश निकालकर व्यापार शुरू करेंगे। व्यापार से प्राप्त धन को इसमें मिलाकर जनकल्याण में लगा देंगे।

ईश्वर आपकी परीक्षा लेता है। परीक्षा में वह सबसे ज्यादा आपके उसी गुण को परखता है जिस पर आपको गर्व हो।
अगर आप परीक्षा में खरे उतर जाते हैं तो ईश्वर वह गुण आपमें हमेशा के लिए वरदान स्वरूप दे देते हैं।

अगर परीक्षा में उतीर्ण न हुए तो ईश्वर उस गुण के लिए योग्य किसी अन्य व्यक्ति की तलाश में लग जाते हैं।

इसलिए विपत्तिकाल में भी भगवान पर भरोसा रखकर सही राह चलनी चाहिए। आपके लिए भी कंकड़-पत्थर अनमोल रत्न हो सकते है। प्रभु पर विश्वास रखे प्रभु जी जो करते वह अच्छा ही करते हैं। इसलिए जरुरतमंदों की सहायता हमेशा करनी चाहिए वो असहाय इंसान हो या पशु या जानवर हो ऐसा करने से भगवान जी भी खुश होते हैं। फिर वो भी आपका ख्याल रखेगे ऐसा मेरा यकीन है।🙏🙏

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

शिवाजी महाराज द्वारा अफ़ज़ल खान के वध की सूचना जब नगर के लोगो को मिली तब व्यापारियों का एक समूह उनसे मिलने गया, उनमे से एक व्यापारी ने पूछा कि आपको अफ़ज़ल के इस धोखे से निपटने का सुझाव कैसे मिला???

तब शिवाजी ने कहा – “मैं जानता हूं कि मुस्लिम सैनिक ताकतवर और कपटी होते है, मैंने अफ़ज़ल को पहले कभी देखा नही था इसलिये उसके कद और शक्ति की परख करने अपने गुप्तचर भेजे। फिर उसी के समान शारीरिक योग्यता वाले विशाजी मोरम्बक के साथ हर प्रकार के युद्धों का अभ्यास किया, तब जाकर मैं अफ़ज़ल का वध कर सका।

फिर व्यापारी ने पूछा – ‘यदि अफ़ज़ल छल कपट नही करता तो आपकी इतनी मेहनत का क्या होता। ‘

शिवाजी ने कहा – यदि वो मुझ पर आक्रमण नही भी करता तब भी उसकी मौत निश्चित ही थी क्योकि जब वो हमारी सीमा में घुसा था तब उसने कई मंदिर और शिवालय ध्वस्त कर दिए थे, मेरे हाथों उसका वध तब ही अटल हो चुका था। जिस प्रकार श्री राम ने सुबाहु का वध करके विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा की थी उसी तर्ज पर मैंने स्वराज की रक्षा अफ़ज़ल को मारकर की। अधर्मियों के लिए हिन्दू स्वराज्य में कोई स्थान नही हो सकता।

शिवाजी के रणकौशल, सामर्थ्य, धर्मपरायणता तथा शस्त्र और शास्त्र की समझ देख व्यापारी उनसे बेहद प्रभावित हुए और अफ़ज़ल द्वारा तोड़े गए मंदिरों के लिये शिवाजी को धन उपलब्ध करवाया साथ ही उनकी प्रशंसा करते रह गए।

नमन मराठा साम्राज्य के प्रथम छत्रपति महाराज शिवाजी शाहजी राजे भौसले को।

🙏🙏🙏

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गौ भक्त राजर्षि दिलीप की कथा!!!!!!!!!

शास्त्रो में राजा को भगवान् की विभूति माना गया है। साधारण व्यक्ति से श्रेष्ट राजा को माना जाता है, राजाओ में भी श्रेष्ट सप्तद्वीपवती पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट को और अधिक श्रेष्ट माना गया है। ऐसे ही पृथ्वी के एकछत्र सम्राट सूर्यवंशी राजर्षि दिलीप एक महान गौ भक्त हुऐ।

महाराज दिलीप और देवराज इन्द्र में मित्रता थी । देवराज के बुलाने पर दिलीप एक बार स्वर्ग गये । देव असुर संग्राम में देवराज ने महाराज दिलीप से सहायता मांगी। राजा दिलीप ने सहायता करने के लिए हाँ कर दी और देव असुर युद्ध हुआ । युद्ध समाप्त होने पर स्वर्ग से लौटते समय मार्ग में कामधेनु मिली; किंतु दिलीप ने पृथ्वीपर आने की आतुरता के कारण उसे देखा नहीं । कामधेनु को उन्होंने प्रणाम नहीं किया , न ही प्रदक्षिणा की। इस अपमान से रुष्ट होकर कामधेनु ने शाप दिया- मेरी संतान (नंदिनी गाय) यदि कृपा न करे तो यह पुत्रहीन ही रहेगा ।

महाराज दिलीप को शाप का कुछ पता नहीं था । किंतु उनके कोई पुत्र न होने से वे स्वयं, महारानी तथा प्रजा के लोग भी चिन्तित एवं दुखी रहते थे । पुत्र प्राप्ति की इच्छा से महाराज दिलीप रानी के साथ कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ के आश्रमपर पहुंचे । महर्षि सब कुछ समझ गए। महर्षि ने कहा यह गौ माता के अपमान के पाप का फल है। सुरभि गौ की पुत्री नंदिनी गाय हमारे आश्रम पर विराजती है । महर्षि ने आदेश दिया- कुछ काल आश्रम में रहो और मेरी कामधेनु नन्दिनी की सेवा करो।

महाराज ने गुरु की आज्ञा स्वीकार कर ली । महारानी सुदक्षिणा प्रात: काल उस गौ माता की भलीभाँति पूजा करती थी । आरती उतारकर नन्दिनी को पतिके संरक्षण-में वन में चरने के लिये विदा करती । सम्राट दिनभर छाया की भाँती उसका अनुगमन करते, उसके ठहरने पर ठहरते, चलनेपर चलते, बैठने पर बैठते और जल पीनेपर जल पीते । संध्या काल में जब सम्राट के आगे-आगे सद्य:प्रसूता, बालवत्सा (छोटे दुधमुँहे बछड़े वाली) नन्दिनी आश्रम को लौटती तो महारानी देवी सुदक्षिणा हाथमें अक्षत-पात्र लेकर उसकी प्रदक्षिणा करके उसे प्रणाम करतीं और अक्षतादिसे पुत्र प्राप्तिरूप अभीष्ट-सिद्धि देनेवाली उस नन्दिनी का विधिवत् पूजन करतीं ।

अपने बछड़े को यथेच्छ पय:पान(दूध पान) कराने के बाद दुह ली जानेपर नन्दिनी की रात्रिमें दम्पति पुन: परिचर्या करते, अपने हाथों से कोमल हरित शष्प-कवल खिलाकर उसकी परितृप्ति करते और उसके विश्राम करने पर शयन करते । इस तरह उसकी परिचर्या करते इक्कीस दिन बीत गये । एक दिन वन में नन्दिनी का अनुराग करते महाराज दिलीप की दृष्टि क्षणभर अरण्य (वन) की प्राकृतिक सुंदरता में अटक गयी कि तभी उन्हें नन्दिनी का आर्तनाद सुनायी दिया ।

वह एक भयानक सिंह के पंजों में फँसी छटपटा रही थी । उन्होंने आक्राम क सिंह को मारने के लिये अपने तरकश से तीर निकालना चाहा, किंतु उनका हाथ जडवत् निश्चेष्ट होकर वहीं अटक गया, वे चित्रलिखे से खड़े रह गये और भीतर ही भीतर छटपटाने लगे, तभी मनुष्य की वाणी में सिंह बोल उठा- राजन्! तुम्हारे शस्त्र संधान का श्रम उसी तरह व्यर्थ है जैसे वृक्षों को उखाड़ देनेवाला प्रभंजन पर्वत से टकराकर व्यर्थ हो जाता है । मैं भगवान् शिव के गण निकुम्भ का मित्र कुम्भोदर हूं।

भगवान् शिव ने सिंहवृत्ति देकर मुझे हाथी आदिसे इस वन के देवदारुओ की रक्षाका भार सौंपा है । इस समय जो भी जीव सर्वप्रथम मेरे दृष्टि पथ में आता है वह मेरा भक्ष्य बन जाता है । इस गाय ने इस संरक्षित वनमें प्रवेश करने की अनधिकार चेष्टा की है और मेरे भोजन की वेलामे यह मेरे सम्मुख आयी है, अत: मैं इसे खाकर अपनी क्षुधा शान्त करूँगा । तुम लज्जा और ग्लानि छोड़कर वापस लौट जाओ ।

किंतु परदु:खकातर दिलीप भय और व्यथा से छटपटाती, नेत्रोंसे अविरल अश्रुधारा बहाती नन्दिनी को देखकर और उस संध्याकाल मे अपनी माँ की उत्कण्ठा से प्रतीक्षा करनेवा ले उसके दुधमुँहे बछड़े का स्मरण कर करुणा-विगलित हो उठे।नन्दिनी का मातृत्व उन्हें अपने जीवन से कहीं अधिक मूल्यवान् जान पड़ा और उन्होंने सिंह से प्रार्थना की कि वह उनके शरीर को खाकर अपनी भूख मिटा हो और बालवत्सा नन्दिनी को छोड़ दे।

सिंह ने राजा के इस अदभुत प्रस्ताव का उपहास करते हुए कहा- राजन्! तुम चक्रवर्ती सम्राट हो । गुरु को नन्दिनी के बदले करोडों दुधार गौएँ देकर प्रसन्न कर सकते हो । अभी तुम युवा हो, इस तुच्छ प्राणीके लिये अपने स्वस्थ-सुन्दर शरीर और यौवन की अवहेलना कर जानकी बाजी लगाने वाले स्रम्राट! लगता है, तुम अपना विवेक खो बैठे हो ।यदि प्राणियों पर दया करने का तुम्हारा व्रत ही है तो भी आज यदि इस गायके बादले में मैं तुम्हें खा लूँगा तो तुम्हारे मर जानेपर केवल इसकी ही विपत्तियों से रक्षा हो सकेगी और यदि तुम जीवित रहे तो पिता की भाँती सम्पूर्ण प्रजा की निरन्तर विपत्तियों से रक्षा करते रहोगे ।

इसलिये तुम अपने सुख भोक्ता शरीर की रक्षा करो । स्वर्गप्राप्ति के लिये तप त्याग करके शरीर की कष्ट देना तुम जैसे अमित ऐश्वर्यशालियों के लिये निरर्थक है । स्वर्ग ?अरे वह तो इसी पृथ्वीपर है । जिसे सांसारिक वैभव-विलास के समग्र साधन उपलब्ध हैं, वह समझो कि स्वर्ग में ही रह रहा है । स्वर्गका काल्पनिक आकर्षण तो मात्र विपन्नो के लिए ही है,सम्पन्नो के लिए नहीं। इस तरह से सिंह ने राजा को भ्रमित करने का प्रयत्न किया।

भगवान् शंकर के अनुचर सिंह की बात सुनकर अत्यंत दयालु महाराज दिलीप ने उसके द्वारा आक्रान्त नंदिनी को देखा जो अश्रुपूरित कातर नेत्रों से उनकी ओर देखती हुई प्राणरक्षाकी याचना कर रही थी ।

राजा ने क्षत्रियत्व के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए उत्तर दिया- नहीं सिह ! नहीं, मैं गौ माता को तुम्हारा भक्ष्य बनाकर नहीं लौट सकता । मैं अपने क्षत्रियत्व को क्यों कलंकित करूं ?क्षत्रिय संसार में इसलिये प्रसिद्ध हैं कि वे विपत्ति से औरों की रक्षा करते हैं । राज्य का भोग भी उनका लक्ष्य नहीं । उनका लक्ष्य तो है लोकरक्षासे कीर्ति अर्जित करना । निन्दा से मलिन प्राणों और राज्य को तो वे तुच्छ वस्तुओ की तरह त्याग देते हैं इसलिये तुम मेरे यश:शरीर पर दयालु होओ ।

मेरे भौतिक शरीर को खाकर उसकी रक्षा करो; क्योंकि यह शरीर तो नश्वर है, मरणधर्मा है । इसलिये इसपर हम जैसे विचारशील पुरुषों की ममता नहीं होती । हम तो यश: शरीरके पोषक हैं। यह मांस का शारीर न भी रहे परंतु गौरक्षा से मेरा यशः शारीर सुरक्षित रहेगा । संसार यही कहेगा की गौ माता की रक्षा के लिए एक सूर्यवंश के राजा ने प्राण की आहुति दे दी । एक चक्रवर्ती सम्राट के प्राणों से भी अधिक मूल्यवान एक गाय है।

सिंह ने कहा – अगर आप अपना शारीर मेरा आहार बनाना ही चाहते है तो ठीक है। सिंह के स्वीकृति दे देने पर राजर्षि दिलीप ने शास्त्रो को फेंक दिया और उसके आगे अपना शरीर मांसपिंड की तरह खाने के लिये डाल दिया और वे जाके सिर झुकाये आक्रमण की प्रतीक्षा करने लगे, तभी आकाश से
विद्याधर उनपर पुष्पवृष्टि करने लगे ।

नन्दिनी ने कहा हे पुत्र ! उठो ! यह मधुर दिव्य वाणी सुनकर राजा को महान् आश्चर्य हुआ और उन्होंने वात्सल्यमयी जननी की तरह अपने स्तनोंसे दूध बहाती हुई नन्दिनी गौ को देखा, किंतु सिंह दिखलायी नहीं दिया । आश्चर्यचकित दिलीप से नन्दिनी ने कहा- हे सत्युरुष ! तुम्हारी परीक्षा लेनेके लिये मैंने ही माया स्व सिंह की सृष्टि की थी ।

महर्षि वसिष्ठ के प्रभावसे यमराज भी मुझपर प्रहार नहीं कर सकता तो अन्य सिंहक सिंहादिकी क्या शक्ति है । मैं तुम्हारी गुरुभक्ति से और मेरे प्रति प्रदर्शित दयाभाव से अत्यन्त प्रसन्न हूं । वर माँगो ! तुम मुझे दूध देनेवाली मामूली गाय मत समझो, अपितु सम्पूर्ण कामनाएं पूरी करनेवाली कामधेनु जानो ।

राजा ने दोनों हाथ जोड़कर वंश चलानेवाले अनन्तकीर्ति पुत्रकी याचना की नन्दिनीने ‘तथास्तु’ कहा। उन्होंने कहा राजन् मै आपकी गौ भक्ति से अत्याधिक प्रसन्न हूं ,मेरे स्तनों से दूध निकल रहा है उसे पत्तेके दोने में दुहकर पी लेनेकी आज्ञा गौ माता ने दी और कहा तुम्हे अत्यंत प्रतापी पुत्र की प्राप्ति होगी।

राजाने निवेदन किया-‘ मां ! बछड़े के पीने तथा होमादि अनुष्ठान के बाद बचे हुए ही तुम्हारे दूध को मैं पी सकता हूं । दूध पर पहला अधिकार बछड़े का है और द्वितीय अधिकार गुरूजी का है।

राजा के धैर्यने नन्दिनो के हृदय को जीत लिया । वह प्रसन्नमना कामधेनु राजा के आगे आगे आश्रम को लौट आयी । राजा ने बछड़े के पीने तथा अग्निहोत्र से बचे दूधका महर्षि की आज्ञा पाकर पान किया, फलत: वे रघु जैसे महान् यशस्वी पुत्र से पुत्रवान् हुए और इसी वंश में गौ भक्ति के प्रताप से स्वयं भगवान् श्रीराम ने अवतार ग्रहण किया।

महाराज दिलीप की गोभक्ति तथा गोसेवा सभी के लिये एक महानतम आदर्श बन गयी । इसीलिये आज भी गो भक्तो के परिगणनामे महाराज दिलीप का नाम बड़े ही श्रद्धाभाव एवं आदर से सर्वप्रथम लिया जाता है। इस चरित्र से यह बात सिद्ध हो गयी की सप्तद्वीपवती पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट से अधिक श्रेष्ठ एक गौ माता है ।

सर्वदेवमयी गौ माता की जय

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સાચો લીડર કઈ રીતે સમસ્યાનો ઉકેલ લાવે છે…

તાતા સ્ટીલના અધ્યક્ષ રતન ટાટા એ જમશેદપુર ખાતે પોતાના કર્મચારીઓ સાથે એક સાપ્તાહિક બેઠક યોજી હતી. એક કર્મચારીએ એક ગંભીર મુદ્દો ચર્ચ્યો. તેણે કહ્યું કે કર્મચારીઓના શૌચાલયની સ્થિતી, ગુણવત્તા અને સ્વચ્છતાની દૃષ્ટિએ ઘણી ખરાબ હતી જે તેમના આરોગ્ય માટે પણ જોખમી બાબત હતી. જ્યારે ઉપરીઓના શૌચાલયની સ્થિતી, ગુણવત્તા અને સ્વચ્છતાની દૃષ્ટિએ ઘણી સારી હતી.

રતન ટાટા એ તેમના એક ઉચ્ચ અધિકારીને આ સમસ્યાનો નિકાલ કેટલા સમયમાં લવાશે એવો પ્રશ્ન કર્યો. તે ઉચ્ચ અધિકારીએ આ માટે એક મહિનાનો સમય માગ્યો.

રતન ટાટા એ કહ્યું, “હું તો કદાચ આ સમસ્યા એક જ દિવસમાં હલ કરી દઈશ. મારી પાસે એક સુથાર મોકલી આપો.”

બીજે દિવસે જ્યારે સુથાર આવ્યો ત્યારે રતન ટાટા એ તેની પાસે કર્મચારીઓ અને ઉપરીઓના શૌચાલયોના નામના પાટીયાઓની અદલાબદલી કરાવી નાખી.

કર્મચારીઓના શૌચાલય પર ‘ઉચ્ચ અધિકારીઓ’ અને ઉચ્ચ અધિકારીઓના શૌચાલય પર ‘કામદારો’ એમ દર્શાવતા પાટિયા લટકી રહ્યાં.

રતન ટાટાએ દર પખવાડિયે આ અદલાબદલી ફરી કરવી એવો આદેશ આપ્યો. ત્રણ જ દિવસમાં બંને શૌચાલયોની સ્થિતી એક સરખી – ઘણી સારી થઈ ગઈ.

સાચો લીડર ઘણી ધીરજથી તમારી વાત સાંભળે છે અને સમય વધુ બરબાદ કર્યા વગર તમારી સમસ્યાનો ઉકેલ સૂઝાડે છે.

લીડરશીપ ખાલી અધિકારી કે ઉપરી બની જવા કરતા કંઈક વિશેષ છે.

સમસ્યા શું છે એ સમજવા ક્રિટિકલ થિંકિંગ કરવું પડે છે પણ સમસ્યાનો ઉકેલ લાવવા ક્રિએટિવ થિંકિંગ કરવું પડે છે..

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इतिहास की वीरता की सत्य घटना

पाटण की रानी रुदाबाई जिसने सुल्तान बेघारा के सीने को फाड़ कर दिल निकाल लिया था, और कर्णावती शहर के बिच में टांग दिया था, ओर धड से सर अलग करके पाटन राज्य के बीचोबीच टांग दिया था।

गुजरात से कर्णावती के राजा थे, राणा वीर सिंह सोलंकी ईस राज्य ने कई तुर्क हमले झेले थे, पर कामयाबी किसी को नहीं मिली, सुल्तान बेघारा ने सन् 1497 पाटण राज्य पर हमला किया राणा वीर सिंह सोलंकी के पराक्रम के सामने सुल्तान बेघारा की 40000 से अधिक संख्या की फ़ौज 2 घंटे से ज्यादा टिक नहीं पाई, सुल्तान बेघारा जान बचाकर भागा।

असल मे कहते है सुलतान बेघारा की नजर रानी रुदाबाई पे थी, रानी बहुत सुंदर थी, वो रानी को युद्ध मे जीतकर अपने हरम में रखना चाहता था। सुलतान ने कुछ वक्त बाद फिर हमला किया।

राज्य का एक साहूकार इस बार सुलतान बेघारा से जा मिला, और राज्य की सारी गुप्त सूचनाएं सुलतान को दे दी, इस बार युद्ध मे राणा वीर सिंह सोलंकी को सुलतान ने छल से हरा दिया जिससे राणा वीर सिंह उस युद्ध मे वीरगति को प्राप्त हुए।

सुलतान बेघारा रानी रुदाबाई को अपनी वासना का शिकार बनाने हेतु राणा जी के महल की ओर 10000 से अधिक लश्कर लेकर पंहुचा, रानी रूदा बाई के पास शाह ने अपने दूत के जरिये निकाह प्रस्ताव रखा,

रानी रुदाबाई ने महल के ऊपर छावणी बनाई थी जिसमे 2500 धर्धारी वीरांगनाये थी, जो रानी रूदा बाई का इशारा पाते ही लश्कर पर हमला करने को तैयार थी, सुलतान बेघारा को महल द्वार के अन्दर आने का न्यौता दिया गया।

सुल्तान बेघारा वासना मे अंधा होकर वैसा ही किया जैसे ही वो दुर्ग के अंदर आया राणी ने समय न गंवाते हुए सुल्तान बेघारा के सीने में खंजर उतार दिया और उधर छावनी से तीरों की वर्षा होने लगी जिससे शाह का लश्कर बचकर वापस नहीं जा पाया।

सुलतान बेघारा का सीना फाड़ कर रानी रुदाबाई ने कलेजा निकाल कर कर्णावती शहर के बीचोबीच लटकवा दिया।और..उसके सर को धड से अलग करके पाटण राज्य के बिच टंगवा दिया साथ ही यह चेतावनी भी दी की कोई भी आक्रांता भारतवर्ष पर या हिन्दू नारी पर बुरी नज़र डालेगा तो उसका यही हाल होगा।

इस युद्ध के बाद रानी रुदाबाई ने राजपाठ सुरक्षित हाथों में सौंपकर कर जल समाधि ले ली, ताकि कोई भी तुर्क आक्रांता उन्हें अपवित्र न कर पाए।

ये देश नमन करता है महान वीरांगना रानी रुदाबाई को,

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। । 3 सितम्बर 1857 । ।

बिठूर में एक पेड़ से बंधी 13 वर्ष की लड़की को, ब्रिटिश सेना ने जिंदा ही आग के हवाले किया, धूँ धूँ कर जलती वो लड़की, उफ़ तक न बोली और जिंदा लाश की तरह जलती हुई, राख में तब्दील हो गई।

ये लड़की थी नाना साहब पेशवा की दत्तक पुत्री मैना कुमारी।
जिसे 160 वर्ष पूर्व, आज ही के दिन, आउटरम नामक ब्रिटिश अधिकारी ने जिंदा जला दिया था।

जिसने 1857 क्रांति के दोरान, अपने पिता के साथ जाने से इसलिए मना कर दिया, की कही उसकी सुरक्षा के चलते, उस के पिता को देश सेवा में कोई समस्या न आये।
और बिठूर के महल में रहना उचित समझा।
नाना साहब पर ब्रिटिश सरकार इनाम घोषित कर चुकी थी।
और जैसे ही उन्हें पता चला नाना साहब महल से बाहर है, ब्रिटिश सरकार ने महल घेर लिया, जहाँ उन्हें कुछ सैनिको के साथ बस मैना कुमारी ही मिली।

मैना कुमारी, ब्रटिश सैनिको को देख कर महल के गुप्त स्थानों में जा छुपी, ये देख ब्रिटिश अफसर आउटरम ने महल को तोप से उड़ने का आदेश दिया।
और ऐसा कर वो वहां से चला गया पर अपने कुछ सिपाहियों को वही छोड़ गया।
रात को मैना को जब लगा की सब लोग जा चुके है, और वो बहार निकली तो 2 सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और फिर आउटरम के सामने पेश किया।

आउटरम ने पहले मैना को एक पेड़ से बंधा, फिर मैना से नाना के बारे में और क्रांति की गुप्त जानकारी जाननी चाही।
पर उस से मुह नही खोला।

यहाँ तक की आउटरम ने मैना कुमारी को जिंदा जलने की धमकी भी दी, पर उसने कहा की वो एक क्रांतिकारी की बेटी है, मोत से नही डरती।
ये देख आउटरम तिलमिला गया और उसने मैना कुमारी को जिंदा जलने का आदेश दे दिया।
इस पर भी मैना कुमारी, बिना कुछ बोले चुपचाप इसलिए आग में जल गई, ताकि क्रांति की मसाल कभी न बुझे।

।।नमन है इस महान वीरांगना को।।

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अम्मा
(कहानी)

पिताजी की तेरहवीं कल ही सम्पन्न हुई थी। आज आँगन में चारो भाई, बहन सुगंधा और तीनों बहुएं बैठी थीं। बड़े भैया अर्जुन ने अविवाहित छोटे भाई आनन्द से कह कर यहॉं पारिवारिक मन्त्रणा के लिए मोहन और शंकर सहित अन्य सभी सदस्यों को एकत्र किया था।

अर्जुन ने एकबार सभी के चेहरों पर दृष्टि डाली। सभी आतुरता से उसी की ओर देख रहे थे। अर्जुन ने कहना आरम्भ किया- “सभी लोग सुनो! पिता जी तो रहे नहीं। तो अब हमें संयुक्त रूप से कुछ निर्णय लेने हैं। पहला यह कि खेत, बाग, घर और घर के लिए प्रयुक्त होने वाले प्लाट का बंटवारा कर लिया जाय। दूसरा यह कि गाँव में कौन आ कर रहना चाहता है क्योंकि किसी एक को तो देखभाल के लिए रहना ही पड़ेगा। तीसरे अम्मा किसके पास रहेंगी।”

एक बार तो चुप्पी छा गयी वहाँ। सभी एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। कुछ पलों के बाद दूसरे नम्बर वाले भाई मोहन ने कहा – “भैया, दुनिया वालों के लिए पिताजी चले गए हैं किंतु हम तीनों भाइयों के लिए पिताजी अभी भी जीवित हैं। वो हो आप, भैया।”

मोहन रोने लगा था। तभी तीसरे नम्बर वाला भाई शंकर भी सुबकते हुए बोला – “भैया, पिताजी हमलोगों से हमेशा कहते थे कि हम चाहें तो पिता जी को भलाबुरा कह सकते हैं लेकिन आपको कभी भी नहीं। परिवार के प्रति आपके त्याग से वे बहुत प्रभावित थे और हम सभी ने उसे जिया ही है। इसलिए बंटवारे के विषय में तो मेरा यही कहना है कि जिसे आप जो कुछ देना चाहें, दे दीजिए। कोई उफ्फ नहीं करेगा। हम इसे पिताजी के द्वारा किया गया बंटवारा मानेंगे।”
एक स्वर में सभी कह उठे- “यह प्रस्ताव हमें स्वीकार्य है।”
तभी छोटा आनन्द बोल पड़ा-“लेकिन यह बंटवारा हो ही क्यों? क्या मुझे अकेला छोड़ने का विचार है? क्या अभी भी हम संयुक्त रूप से नहीं रह सकते?” उसकी आँखें डबडबा आयी थीं।

अर्जुन ने कहा -“बेटे, मैं रहता हूँ कानपुर में, मोहन लखनऊ में, शंकर बनारस में और तुम्हारी पोस्टिंग भी बदलती रहती है। अभी दिल्ली में हो। घर तो गाँव मे एक ही बना है। प्लॉट तीन हैं। मेरा विचार था कि यदि भाइयों की इच्छा न भी हुई हो कभी किन्तु यदि बहुओं की इच्छा हो तो भी बंटवारे का यह विकल्प खुला है। बाद में पारिवारिक चिकचिक नहीं होनी चाहिए।”

सभी बहुओं की तरफ देखने लगे। मंजुला का चेहरा दिख रहा था जबकि मोहन की पत्नी मधु और शंकर की पत्नी मोना घूँघट किये हुए थीं। मधु का स्वर उभरा- “मैंने कभी भी बंटवारे की इच्छा नहीं की। जैसा चल रहा है वही ठीक है।”

मोना ने सभी की अपनी तरफ उठी देख कर बोली- “भैया, बटवारे का तो मैंने जिक्र ही नहीं किया। सब बढ़िया से तो चल रहा है।”

चुप बैठी मंजुला को देख कर भैया बोले-“मंजुला! तुम्हें कुछ कहना है?”

“आपकी इच्छा के विरुद्ध कभी गई होऊँ तो बताइए। जो आप करेंगे वह मुझे मान्य है।” मंजुला ने गम्भीर स्वर में कहा।

“तो ठीक है। बंटवारे के विषय में अभी बात स्थगित करता हूँ। और हाँ सुगंधा तुम्हें जब भी अपना हिस्सा चाहिए हो, बता देना। व्यवस्था कर दी जाएगी।” अर्जुन ने छोटी विवाहिता बहन की तरफ देख कर कहा जो चुपचाप बैठी सुबुक रही थी। मोना उसकी पीठ सहला रही थी।

“अब दूसरी बात कि गाँव में कौन रहेगा?” अर्जुन ने बात आगे बढ़ायी।
मोहन ने कहा – “यह काम मैं कर सकता हूँ। मेरा जॉब भी तनिक हिल रहा है। क्यों मधु?”
“मुझे कोई आपत्ति नहीं।” मधु का स्वर उभरा।
“यदि मोहन और मधु गाँव मे रहते हैं तो उनकी बिटिया की पढ़ाई की जिम्मेदारी मेरी होगी। वे इससे निश्चिंत हो सकते हैं।” अर्जुन ने घोषणा की

शंकर ने कहा – “यदि मोहन भैया गांव में रहते हैं और यहाँ रह कर कोई धन्धा व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं लाख पचास हजार की राशि मैं उपलब्ध करा दूँगा।”

“मैं एक बोलेरो खरीद कर मोहन भैया को दे दूँगा ताकि उन्हें गाँव मे रहते हुए कहीं आने जाने में असुविधा न हो और जरूरत पड़ने पर कुछ आमदनी भी कर सकते हैं।” एयफोर्स में तैनात छोटा आनन्द बोला।

मोहन ने बड़ी विनम्रता के साथ कहा – “मैं शीघ्र ही अपना हिसाब किताब कर के गाँव आ जाता हूँ। अन्य सभी बात बाद में जरूरत पड़ने पर कही सुनी जायेंगी।”

अर्जुन आगे बोला -“चलो, इसका भी समाधान हो गया। अब अंतिम बात पर भी चर्चा हो जाय कि अम्मा किसके साथ रहेंगी। इस विषय पर यही कहना चाहता हूँ कि आप सभी मुझे यह अवसर दें कि अम्मा मेरे पास ही रहें।”
शंकर बोला -“सारी जिंदगी आपने अम्मा पिताजी की सेवा की है। भैया, अब थोड़ा सा पुण्य मुझे भी कमाने दीजिये। भोले की नगरी में रहते हुए और विवाह के सात वर्ष बीतने के बाद भी हम अभी तक माँबाप नहीं बन सके हैं। शायद अम्मा की सेवा से ही हमारे आँगन में किलकारी गूँजने लगे।” शंकर की आवाज़ भर्रा गयी थी।

मोहन ने कहा – “जब मैं गाँव मे रहने आ ही रहा हूँ तो अम्मा की जिम्मेदारी मेरी ही होगी न। अम्मा को इधर उधर जाने की आवश्यकता ही क्या है अब! क्यों भैया?”
अर्जुन कुछ बोलता इसके पहले आनन्द का स्वर सुनाई दिया – “इस विषय पर मेरे अधिकार को ईश्वर ने छीना हुआ है। मैं अविवाहित अम्मा को रखने के विषय में कुछ कह पाने में सर्वथा असमर्थ हूँ।” कह कर वह सुबकने लगा। मंजुला उसकी पीठ पर हाथ फेर कर सांत्वना देने लगी।

“मेरे विषय में निर्णय लेने से पहले मेरी राय भी ले लेते बबुआ।”

स्वर सुनकर चौंक कर सभी ने देखा तो कमरे की चौखट पकड़े अम्मा खड़ी थीं। मोना और मधु शीघ्रता से उठ कर उनके पास गयीं और उन्हें पकड़ कर अर्जुन और मंजुला के बीच में बैठा दिया।

“मैं सभी की बातें सुन रही थी अंदर लेटे लेटे। मुझे बेहद खुशी हो रही थी सब सुन कर। बेटे तो बेटे हैं ही बहुएं भी एक से बढ़ कर एक हैं। खुशी के मारे मेरे आँसू रुक ही नहीं रहे थे। देखो अर्जुन! अभी एक साल तो मुझे पीपल के नीचे प्रतिदिन दीपक जलाना है इसलिए मैं कहीं नहीं जाऊँगी। बीमारी अज़ारी की बात अलग है नहीं तो अब मैं गाँव मे ही रहना चाहती हूँ। यहाँ के जैसा खुलापन और ऐसा अपनापन मुझे कहीं नहीं दिखता। हाँ कानपुर में अधिक समय बिताने के कारण मुझे वहाँ अच्छा लगने लगा है। और ऐ शंकर! तू क्या कह रहा था कि शादी के इतने साल बाद ही तू बाप नहीं बना है.. तो क्या तूने मोना से पिछले पन्द्रह दिनों में ढंग से बातचीत की?”
सब मोना की तरफ देखने लगे तो वह उठकर कमरे के अंदर चली गयी।

“ठीक है। एक दुर्घटना हुई और तुम्हारे पिताजी नहीं रहे। दुःख तो है ही। लेकिन अर्जुन तेरे रहते मुझे कभी चिंता नहीं हुई कि ‘अब क्या होगा’। जिस तरह से आप सब में एकता है वह कहने से भी नहीं कही जा सकती है। अब आनन्द के विवाह के विषय में सोचो क्योकि इसकी शादी के बाद जब यह पहली बार अपनी बहू को ले जाएगा तब मैं भी जाऊँगी साथ में।”अम्मा ने माहौल को हल्काफुलका बनाते हुए बात समाप्त की।

अर्जुन ने अम्मा से धीरे से पूछा – तो क्या मोना..”
मुस्कुरास्ते हुए अम्मा बोली-“हाँ वह गर्भ से है।”
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दो वर्ष बाद
अम्मा आनन्द और उसकी नवोढ़ा पत्नी सीमा के साथ बंगलोर जाने की तैयारी कर रही हैं। आनन्द ने अभी सीमा को ले जाने से मना किया था। लेकिन विवाह के बाद ड्यूटी पर वापसी करते समय अम्मा ने साफ साफ कह दिया था कि अगले छह माह के अंदर वहाँ रहने की व्यवस्था करके सीमा को ले जाए। इस समय कानपुर से अर्जुन, मंजुला, बेटे रितिक और मोहन की बिटिया श्यामा के साथ और बनारस से शंकर मोना और नन्हे मंगल के साथ गाँव में आ चुके हैं।

मौलिक रचना – जयसिंह भारद्वाज, कानपुर