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कहानी-मेरी प्यारी ईशा
कई दिनों से मुझे ईशा की बहुत याद आ रही है। ना जाने ऐसा कौन सा रिश्ता जुड़ा है इससे, आज वो लगभग तीस-बत्तीस वर्ष की हो चुकी होगी।
विवाह से पूर्व मैं एक विद्यालय में शिक्षिका थी। मैं प्री नर्सरी और नर्सरी के छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ाती थी। वही प्री नर्सरी में ईशा पढ़ती थी।
छोटी सी, प्यारी सी, भोली भाली, गोरी चिट्टी बिल्कुल गुड़िया जैसी सुंदर मेरी ईशा, लगभग ढाई -पौने तीन वर्ष की ईशा।
मई-जून की छुट्टियों के बाद विद्यालय का पहला दिन था। हम थोड़ी बहुत पढ़ाई अप्रैल में करवा चुके थे। छोटे-छोटे बच्चे और वह भी पहला दिन, कोई बच्चा रो रहा था, कोई हंस रहा था, कोई चुप बैठा था तो कोई शैतानी कर रहा था।
बच्चों का मन बहलाने के लिए मैंने पूछा,”बच्चों, बताओ छुट्टियों में आप लोग कहां कहां घूमने गए थे?”
इतना सुनते ही कक्षा में शोर मच गया। सब बच्चे अपनी अपनी बात बताना चाहते थे। सभी बहुत उत्सुक थे। एक बच्चे ने कहा,”मैं मम्मी पापा के साथ शिमला घूमने गया था।”
दूसरे बच्चे ने कहा,”हम तो नानी के घर गए थे।”
किसी ने कहा,”हम रेलगाड़ी में शिर्डी गए थे।”इन सब बच्चों के शोर में सिर्फ ईशा ही चुप बैठी थी। सब बच्चों की बात सुनने के बाद मैंने ईशा से पूछा,”आपने नहीं बताया, आप कहां घूमने गए थे?”
ईशा की आंखों में आंसू भर आए और उसने कहा,”मैडम, मेरे पापा बाहर गए हैं जब वह आ जाएंगे तो मुझे घुमाने ले जाएंगे।”
(उस समय का ईशा का उदास और मायूस चेहरा आज भी मेरी आंखों के सामने घूमता है)
विद्यालय में किसी बच्चे की कोई बात यदि मुझे कुछ अलग लगती थी तो मैं प्रधानाचार्या को अवश्य बताती थी। ईशा की बात भी मैंने उन्हें बताई। वह चुप थी।
मैंने पूछा,”क्या, कुछ बात है मैडम?”
उन्होंने कहा,”कुछ दिन पहले ईशा के पापा अपने स्कूटर से कहीं जा रहे थे और ट्रैफिक में फंस गए। उनके स्कूटर के आगे एक छोटा टेंपो था, जिसमें लोहे के सरिए लदे हुए थे। उस टेंपो वाले ने एक तेज झटके से टेंपो को आगे बढ़ाने की बजाय पीछे की ओर कर दिया और लोहे के सरिए ईशा के पापा की छाती में धंस गए, यह सब इतनी जल्दी हुआ कि किसी को कुछ समझ नहीं आया। वहां आसपास खड़े लोगों ने उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया। उनकी हालत बहुत नाजुक थी। लगभग 15 दिन बाद थोड़ा सुधार हुआ।
घर के लोग बहुत खुश थे कि हालत धीरे-धीरे सुधर रही है।
लेकिन जैसे दीपक बुझने से पहले एक बार जोर से फड़फड़ाता है, वैसे ही ईशा के पापा भी एक सप्ताह के लिए बिल्कुल ठीक हो गए थे और उन्हें छुट्टी मिलने वाली थी, लेकिन अचानक रात में उनकी तबीयत बहुत खराब हो गई और उनकी मृत्यु हो गई।”
यह सब सुनकर मेरी भी आंखें भर आई और ईशा का आंसुओं से भरा चेहरा मेरी आंखों के सामने घूमने लगा। वह अपने पापा को रोज याद करती थी और कहती थी कि पापा आने वाले हैं।
अपने पिता से ढेर सारा प्यार करने वाली ईशा को सच्चाई कैसे कही जाती और इतनी छोटी उम्र में क्या वह समझ पाती, नहीं।
‌‌ ईशा को पूरा विश्वास था कि उसके पापा आएंगे और उसे घुमाने ले जाएंगे। वह कक्षा में बैठे-बैठे पापा पापा कहकर कभी भी किसी भी समय रो पड़ती थी।
थोड़े समय बाद ईशा की मम्मी उसे लेकर अपने मायके चली गई। ईशा अब बहुत बड़ी हो चुकी होगी। मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि वह जहां भी हो, खुश हो।
स्वरचित, सर्वाधिकार सुरक्षित
गीता वाधवानी दिल्ली

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એક માણસે દુકાનદારને પૂછ્યું —–

“કેળાં અને સફરજન કેમ આપ્યાં ?”
“કેળાં ૨૦ રુપીય્રે કિલો અને સફરજન ૧૦૦ રુપીયે કિલો …..”
બરાબર એક સમયે એક ગરીબ સ્ત્રી લઘરવઘર વસ્ત્રોમાં ત્યાં આવી અને બોલી —-
” મને એક કિલો સફરજન અને એક ડઝન કેળાં આપીદો ……. “” શું ભાવ છે ભાઈ ? “
દુકાનદાર : ” કેળાં ૫ રૂપિયે ડઝન અને સફરજન ૨૫ રૂપિયે કિલો ….. “
સ્ત્રી બહુજ ખુશ થઇ અને બોલી ——
” તો તો જલ્દીથી મને આપી દો ને !!!”
દુકાનમાં પહેલેથીજ મોજુદ ગ્રાહકે દુકાનદાર રેફ ખાઈ જવાની નજરે જોયું
એ કઈ પણ બોલે એ પહેલાં જ દુકાનદારે ગ્રાહકને થોડો ઈન્તેજાર કરવાં કહ્યું !!!!
સ્ત્રી રાજીની રેડ થતી થતી ફળો ખરીદીને બડબડતી નાહર નીકળી
“હે ભગવાન !!!! તારો લાખ લાખ આભાર …….મારાં છોકરાઓ ફળ ખાઈને આજે બહુજ ખુશ થશે ….. !!!”
જેવી પેલો સ્ત્રી બહાર નીકળી કે તરત જ પેલાં હાજર ગ્રાહકે મારી તરફ જોઈને કહ્યું —–” ઈશ્વર સાક્ષી છે ભાઈ સાહેબ ……”
” મેં તમારી સાથે કોઈ જ છેતરપીંડી નથી કરી
કે નથી હું જુઠ્ઠું બોલ્યો તમારી આગળ …..”
” આ એક વિધવા સ્ત્રી છે
અને ૪ અનાથ બાળકોની માતા છે કોઈની પણ પાસે હાથ લંબાવવા તોયાર નથી કે મદદ લેવાં તૈયાર નથી ….. “
“મેં એને અનેકોવાર મદદ કરવાની કોશિશ કરી પણ દરેક વખતે મને નિષ્ફળતા જ મળી છે !!!! “
“ત્યારે મને આ તરકીબ સુઝી કે જ્યારે તે આવે ત્યારે એને ઓછામાં ઓછાં ભાવે હું ફળો આપું છું હું ઇચ્છું છું કે એનો એ અહમ જળવાઈ રહે કે એ કોઇની પણ મોહતાજ નથી ….. !!!!”
” હું આ રીતે ખુદાના બંદાઓની પૂજા કરી લઉં છું આ રીતે !!!”
પછી થોડીવાર અટકીને દુકાનદાર બોલ્યો
” આ સ્ત્રી અઠવાડીયા માં એક જ વાર આવે છે ભગવાન સાક્ષી છે એ વાતના કે એ જયારે પણ આવે છે તે દિવસે મારો ધંધો ખુબજ ધમધોકાર ચાલે છે અને એ દિવસે જાણે ભગવાન મારાં પર મહેરબાન હોય એવું લાગે છે ….. સાહેબ !!!”

આ સાંભળીને ગ્રાહકની આંખમાં આંસુ આવી ગયાં અને આગળ વધીને એણે દુકાનદારને ગળે લગાવી દીધો અને વિના કોઈ શિકાયત કર્યે એણે પોતાનાં ફળો ખરીદી લીધાં
અને એ ખુશ થતો થતો દુકાનના પગથીયાં ઉતરી ગયો !!!
પણ એ જેવો ઉતાર્યો એવો એ પાછો ચડયો
અને પોતાના ઝભ્ભાનાં ખીસામાંથી પાકીટ કાઢીને ૨૦૦૦ની ત્રણ નોટ કાઢીને પેલા દુકાનદાર ના હાથમાં મહા પરાણે પકડાવી દીધી અને કહ્યું —–
” પેલી સ્ત્રી જયારે પણ આવે તો તેને આપવાના ફળોના પૈસા છે આખાં વર્ષના !!!
અને એ જે પૈસા આપે એ તું રાજી લઇ લેજે અને ભગવાનના કાર્યોમાં દાન પુણ્ય કરતો રહેજે એમાંથી !!!!”
આ સંભાળીને દુકાનદાર પણ ગળગળો થઇ ગયો !!!!

ક્થા મર્મ —— ખુશી જો વહેંચવામાં આવે તો ભગવાન એના અનેક રસ્તાઓ સુઝાડતાં જ હોય છે !!!!
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⚖️कर्म और भाग्य⚖️

एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों की सभा बुलाकर प्रश्न किया:- “मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था मैं राजा बना, किन्तु उसी घड़ी मुहूर्त में अनेक जातकों ने जन्म लिया होगा जो राजा नहीं बन सके क्यों ..? इसका क्या कारण है ? राजा के इस प्रश्न से सब निरुत्तर हो गये!!!”

अचानक एक वृद्ध खड़े हुये बोले:- “महाराज आपको यहाँ से कुछ दूर घने जंगल में एक महात्मा मिलेंगे उनसे आपको उत्तर मिल सकता है।”

राजा ने घोर जंगल में जाकर देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठ कर अंगारे ( गरमा गरम कोयला ) खाने में व्यस्त हैं। राजा ने महात्मा से जैसे ही प्रश्न पूछा महात्मा ने क्रोधित होकर कहा:- “तेरे प्रश्न का उत्तर आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं ,वे दे सकते हैं ।”

राजा की जिज्ञासा और बढ़ गयी, पहाड़ी मार्ग पार कर बड़ी कठिनाइयों से राजा दूसरे महात्मा के पास पहुंचा।

राजा हक्का बक्का रह गया देख कर। दृश्य ही कुछ ऐसा था, वे महात्मा अपना ही माँस चिमटे से नोच नोच कर खा रहे थे। राजा को महात्मा ने भी डांटते हुए कहा:- ”मैं भूख से बेचैन हूँ मेरे पास समय नहीं है…

आगे आदिवासी गाँव में एक बालक जन्म लेने वाला है ,जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा..वह बालक तेरे प्रश्न का उत्तर दे सकता है.. राजा बड़ा बेचैन हुआ, बड़ी अजब पहेली बन गया मेरा प्रश्न.. उत्सुकता प्रबल थी..

राजा पुनः कठिन मार्ग पार कर उस गाँव में पहुंचा.. गाँव में उस दंपति के घर पहुंचकर सारी बात कही..जैसे ही बच्चा पैदा हुआ दम्पत्ति ने नाल सहित बालक राजा के सम्मुख उपस्थित किया..

राजा को देखते ही बालक हँसते हुए बोलने लगा .. राजन् ! मेरे पास भी समय नहीं है। किन्तु अपना उत्तर सुन लो:- “तुम,मैं और दोनों महात्मा सात जन्म पहले चारों भाई राजकुमार थे। एक बार शिकार खेलते खेलते हम जंगल में तीन दिन तक भूखे प्यासे भटकते रहे। अचानक हम चारों भाइयों को आटे की एक पोटली मिली। हमने उसकी चार बाटी सेंकी.. अपनी अपनी बाटी लेकर खाने बैठे ही थे कि भूख प्यास से तड़पते हुए एक महात्मा वहां आ गये.. अंगारे खाने वाले भइया से उन्होंने कहा:- “बेटा ,मैं दस दिन से भूखा हूँ ,अपनी बाटी में से मुझे भी कुछ दे दो , मुझ पर दया करो जिससे मेरा भी जीवन बच जाय। इतना सुनते ही भइया गुस्से से भड़क उठे और बोले.. तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या खाऊंगा ? आग ..

चलो भागो यहां से। वे महात्मा फिर मांस खाने वाले भइया के निकट आये उनसे भी अपनी बात कही..

किन्तु उन भईया ने भी महात्मा से गुस्से में आकर कहा कि :- “बड़ी मुश्किल से प्राप्त ये बाटी तुम्हें दे दूंगा तो क्या मैं अपना मांस नोचकर खाऊंगा ?

भूख से लाचार वे महात्मा मेरे पास भी आये..मुझसे भी बाटी मांगी… किन्तु मैंने भी भूख में धैर्य खोकर कह दिया कि चलो आगे बढ़ो मैं क्या भूखा मरुँ …?

अंतिम आशा लिये वो महात्मा , हे राजन !.. आपके पास भी आये,दया की याचना की.. दया करते हुये ख़ुशी से आपने अपनी बाटी में से आधी बाटी आदर सहित उन महात्मा को दे दी।बाटी पाकर महात्मा बड़े खुश हुए और बोले:- “तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा

बालक ने कहा:- “इस प्रकार उस घटना के आधार पर हम अपना अपना भोग, भोग रहे हैं…
और वो बालक मर गया

धरती पर एक समय में अनेकों फल-फूल खिलते हैं,किन्तु सबके रूप, गुण,आकार-प्रकार,स्वाद भिन्न होते हैं ..।
राजा ने माना कि शास्त्र भी तीन प्रकार के है। ज्योतिष शास्त्र, कर्तव्य शास्त्र और व्यवहार शास्त्र।

जातक सब अपना किया, दिया, लिया ही पाते हैं। यही है जीवन!!!
“गलत पासवर्ड से एक छोटा सा मोबाइल नही खुलता..
तो सोचिये गलत कर्मो से सच खंड के दरवाजे कैसे खुलेंगे!!!
अभी भी वक्त है अपने सतगुरु के दिए पासवर्ड ( पांच नामों का सुमिरन) का प्रयोग करें और सच खंड के दरवाजे खोलने के काबिल बने।

जयश्रीराम #रघुनन्दन🚩🚩🚩🚩

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A short story of Swami Vivekananda

Swami Vivekananda was very poor and had huge father debts to be cleared. Many a times he had to sleep hungry with his mother.
Sometimes, he used to tell his mother that he has an invitation from a friend for dinner, would go out, just roam around and come back smiling that he has had the food.

Ramakrishna, his guru got to know about this and told him, “Just this? Go and ask for it from our Maa, Kali Maa”

Swami Vivekananda went inside the temple and came back crying after an hour.
Ramakrishna asked him, “Did you request for it?”
He replied, “Ohh no, I forgot to do that only. Going inside, looking at Maa I just felt too grateful for all things she has given me. My body, my senses and what not.”

Ramakrishna sent him inside again and asked him to request for his wish once more.
Swami Vivekananda did the same thing.

The same thing happened once more. In total 3 times, Ramakrishna sent him inside, and Swami Vivekananda did the same thing.

Ramakrishna now said, “You have passed the test now. I sent you in three times to request for your wish, to which you did not ask and you were only grateful for what you have. If today you would have requested Maa, our relationship would have ended today. You you have now understood the essence of prayer.”

Prayer is in being grateful and not asking. We have become beggars infront of God.
The day you too stop demanding your wishes to be granted is the day true prayer will happen.

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🌷💐🌼🌼💐🌼


मुल्ला नसरुद्दीन एक

धनपति के घर नौकरी करता था।

एक दिन उसने कहा, “सेठ जी,
मैं आपके यहां से नौकरी छोड़ देना चाहता हूं।
क्योंकि यहां मुझे काम करते हुए कई साल हो गए,
पर अभी तक मुझ पर आप को भरोसा नहीं है।’

सेठ ने कहा, “अरे पागल! कैसी बात करता है!

नसरुद्दीन होश में आ! #तिजोरी की सभी चाबियां
तो तुझे सौंप रखी हैं। और क्या चाहता है?
और कैसा भरोसा?’ 🍃🍃

नसरुद्दीन ने कहा, “बुरा मत मानना, हुजूर!
लेकिन उसमें से एक भी #चाबी
तिजोरी में लगती कहां है!’

जिस #संसार में तुम अपने को मालिक समझ रहे हो,
चाबियों का गुच्छा लटकाए फिरते हो,
बजाते फिरते हो,
कभी उसमें से चाबी कोई एकाध लगी,
कोई ताला खुला?
कि बस चाबियों का गुच्छा लटकाए हो।
और उसकी आवाज का ही मजा ले रहे हो।
कई स्त्रियां लेती हैं, बड़ा #गुच्छा लटकाए रहती हैं।
इतने ताले भी मुझे उनके घर में नहीं दिखाई पड़ते जितनी चाबियाँ लटकाई हैं। मगर आवाज, खनक सुख देती है।

जरा गौर से देखो, तुम्हारी सब चाबियाँ #व्यर्थ गई हैं।

क्रोध करके देखा, #लोभ करके देखा,

मोह करके देखा, #काम में डूबे,

धन कमाया, #पद पाया, #शास्त्र पढ़े,

पूजा की, #प्रार्थना की–कोई चाबी लगती है?

संसार की कोई चाबी लगती नहीं।
और जब तुम सब चाबियाँ फेंक देते हो,
उसी क्षण #द्वार खुल जाते हैं।
संसार से सब तरह से

वीतराग हो जाने में ही चाबी है। 🍃💮💐🌻

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osho

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सांच को आंच क्या


बहुत पहले की बात है एक किसान का बेटा अकेले जंगल से जा रहा था। वह एक डंडे में तुमा( सूखा लौकी) को बांधकर जंगल के रास्ते जा रहा था। चलते चलते रास्ते में उसे एक केकड़ा मिला। वह किसान के बेटे के पीछे पीछे चलने लगा। किसान का बेटा केकड़े को देखकर उससे कहता है “तुम मेरे पीछे-पीछे कहां जा रहे हो ,मुझे बहुत दूर जाना है।” तब केकड़ा किसान के बेटे से कहता है “भैया साथ में हमराही होने से रास्ता आसानी से कट जाता है, आप मुझे अपने साथ ले चलिए।” केकड़े की बात सुनकर किसान का बेटा सोचता है यह सही कह रहा है और केकड़े को तुमा में भरकर आगे चलने लगता है ।चलते चलते वह थक जाता है और एक घने पेड़ के नीचे आराम करने लगता है । उस पेड़ में सांप और कौवा रहते थे। जो भी उस पेड़ के नीचे रुकता था उसे मारकर खा लेते थे ।उनका आतंक फैला हुआ था। वहां के राजा ने मुनादी कराई थी कि जो भी सांप और कौवे को मार डालेगा उससे राजकुमारी का विवाह करा दिया जाएगा और आधा राज्य दे दिया जाएगा ।थोड़ी देर बाद किसान का को नींद आ गई। उसे सोता देख सांप नीचे आकर उसे काट लेता है। किसान के बेटे की मृत्यु हो जाती है। कौआ नीचे उतर आता है। सांप और कौवा बंटवारा करने लगते हैं कौवा कहता है तुम पैर के हिस्से को ले लो मैं सिर के हिस्से को ले लेता हूं। उन दोनों की बात केकड़ा सुन रहा था। वह तुमा से बाहर आता है और सांप के गले को अपने पंजे से पकड़ लेता है और कहता है “मेरे मित्र को जीवित करो ,नहीं तो तुम्हारे प्राण भी नहीं बच पाएंगे।” सांप अपने आप को छुड़ाने की बहुत कोशिश करता है ।उतने में लकड़ी का डंडा भी कौवा को मारने लगता है ।वह अधमरा हो जाता है ।दोनों गिड़गिड़ा ने लगते हैं कि हमें माफ कर दो। तब केकड़ा कहता है “तुम्हें तभी माफी मिलेगी जब तुम मेरे मित्र के प्राण वापस कर दोगे।”
सांप किसान के बेटे का जहर खींच लेता है ।जहर खींचने के बाद किसान के बेटे को होश आ जाता है। वह कहता है ” मैं बहुत देर तक सो गया।” केकड़ा किसान के बेटे को सारी बातें बता देता है। किसान का बेटा कहता है इन्हें जीवित छोड़ना ठीक नहीं है ।ये इसी प्रकार और लोगों के प्राण लेंगे ।किसान का बेटा सांप और कौवे के सिर को काटकर गमछे में बांध लेता है और आगे बढ़ता है ।वहीं पास में एक चरवाहा इस घटना को देखते रहता है। जैसे ही किसान का बेटा आगे जाता है वह आता है और सांप और कौवे के शरीर को पकड़कर राजा के दरबार में पहुंच जाता है और राजा से कहता है कि मैंने सांप और कौवा को मार दिया है ।
उसकी बात सुनकर सारी प्रजा के लोग उत्साह से झूमने लगते हैं कि उन्हें सांप और कौवे के आतंक से मुक्ति मिल गयी। अब राजा को अपने वचन का पालन करना था। वह राजकुमारी का विवाह चरवाहा के साथ करने की तैयारी करने की घोषणा करते हैं। राज्य में राजकुमारी के विवाह की तैयारियां होने लगती हैं ।यह समाचार पूरे राज्य भर में फैल जाती है। प्रजा दोगुनी खुशी मनाते रहती है एक तो कौवा और सांप के आतंक से मुक्ति की और दूसरी राजकुमारी के विवाह की। सब चरवाहे की प्रशंसा करते रहते हैं ।
घूमते घूमते किसान का बेटा भी उसी राज्य में पहुंच जाता है। राज्य में उत्साह देखकर वह सब से पूछता है कि क्या हो रहा है। लोग उसे अपनी खुशी का कारण बताते हैं। उनकी बात सुनकर किसान का बेटा आश्चर्य में पड़ जाता है और सबको बताता है कि सांप और कौवे को मैंने मारा है। धीरे-धीरे यह बात राज दरबार पहुंच जाती है। मंत्री राजा से कहते हैं कि एक परदेसी आया है और वह कह रहा है कि सांप और कौवे को उसने मारा है। राजा आज्ञा देते हैं कि उस परदेसी और चरवाहे को बुलाया जाए। चरवाहा और किसान का बेटा दोनों राज दरबार में पहुंचते हैं। राजा उनसे सबूत दिखाने के लिए कहते हैं । किसान का बेटा सांप और कौवे के कटे हुए सिर दिखाता है तथा चरवाहा शरीर को दिखाता है ।अब राजा सोचने लगते हैं किसकी बात सही है।वह कहते हैं कि इस घटना का आपके पास कोई गवाह है क्या? चरवाहा तो चुप रहता है लेकिन तुमा के अंदर से केकड़ा बाहर निकलता है ।उसे देखकर सब हंसने लगे कि यही किसान के बेटे का गवाह है। लेकिन केकड़ा उनकी हंसी की परवाह नहीं करता है और सारी बातें क्रम से बता देता है ।केकड़े की बात सुनकर राजा को विश्वास हो जाता है। अब गवाही देने की बारी चरवाहे की रहती है ।वह कुछ भी नहीं कह पाता है। उसे सजा होती है ।
किसान के बेटे की राजकुमारी के साथ शादी हो जाती है । वह राजमहल में रहने लगता है ।सभी सुख सुविधा के होते हुए भी उसका मन वहां नहीं लगता था ।वह राजकुमारी से कहता है कि मेरे पिताजी ने मुझसे कहा है हमेशा मेहनत करके अपना जीवन बिताना बिना मेहनत किए भोजन करना पाप के समान होता है।वह राजा के खेत में काम करने लगता है। किसान के बेटे को खेत में काम करते देख प्रजा के लोग उसकी हंसी उड़ाने लगते हैं। जितने मुंह उतनी बातें होती हैं ।कोई कहता है कि मजदूर का बेटा तो मजदूर ही रहेगा, चाहे उसे आधा राज्य की क्यों ना मिल गया हो। धीरे-धीरे यह बातें राजा के पास पहुंचती हैं ।राजा किसान के बेटे (अपने दामाद) को बुलाकर कहते हैं कि यह काम तुम्हें शोभा नहीं देता है ।प्रजा में अच्छी बातें नहीं हो रही है।
तब किसान का बेटा कहता है “महाराज मुझे क्षमा कर दीजिए परंतु मेहनत से काम करना कोई अपराध नहीं है ।मैं खेत में मेहनत करता हूं। राजा का दामाद होकर भी जब मैं मेहनत करूंगा तो प्रजा के अंदर मेहनत करने का भाव जागृत होगा ।कोई किसी काम को छोटा या बड़ा नहीं समझेंगे। हमारे राज्य में धन दिन दोगुना रात चौगुना बढ़ेगा। यहां कभी भी अकाल और भुखमरी नहीं होगी ।”अपने दामाद के विचार सुनकर राजा गदगद हो गए और उसे गले से लगा लिया । उन्हें विश्वास हो गया कि उनका दामाद मेहनती होने के साथ-साथ विचार वान भी है। राजा यह घोषणा कर देते हैं कि मेरे बाद मेरे राज्य का उत्तराधिकारी मेरा यही दामाद होगा। राजा की घोषणा सुनकर दरबार में उत्साह फैल गया।

संकलित
छत्तीसगढ़ी लोककथा

नीरजा नामदेव
02/09/2021

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⚜️विश्वास की शक्ति⚜️

किसी गांव में जतिन नाम का एक नवयुवक रहता था। वह बहुत मेहनती था, पर हमेशा अपने मन में एक शंका लिए रहता कि वो अपने कार्यक्षेत्र में सफल होगा या नहीं! कभी-कभी वो इसी चिंता के कारण आवेश में आ जाता और दूसरों पर क्रोधित भी हो उठता।

एक दिन उसके गांव में एक प्रसिद्ध महात्मा जी का आगमन हुआ।

खबर मिलते ही जतिन, महात्मा जी से मिलने पहुंचा और बोला,
“ महात्मा जी मैं कड़ी मेहनत करता हूँ, सफलता पाने के लिए हर-एक प्रयत्न करता हूँ; पर फिर भी मुझे सफलता नहीं मिलती। कृपया आप ही कुछ उपाय बताएँ।”

महात्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा- बेटा, तुम्हारी समस्या का समाधान इस चमत्कारी ताबीज में है, मैंने इसके अन्दर कुछ मन्त्र लिखकर डालें हैं जो तुम्हारी हर बाधा दूर कर देंगे। लेकिन इसे सिद्ध करने के लिए तुम्हे एक रात शमशान में अकेले गुजारनी होगी।”

शमशान का नाम सुनते ही जतिन का चेहरा पीला पड़ गया,
“ लल्ल..ल…लेकिन मैं रात भर अकेले कैसे रहूँगा…”, जतिन कांपते हुए बोला।

“घबराओ मत यह कोई मामूली ताबीज नहीं है, यह हर संकट से तुम्हे बचाएगा।”, महात्मा जी ने समझाया।

जतिन ने पूरी रात शमशान में बिताई और सुबह होती ही महात्मा जी के पास जा पहुंचा, “ हे महात्मन! आप महान हैं, सचमुच ये ताबीज दिव्य है, वर्ना मेरे जैसा डरपोक व्यक्ति रात बिताना तो दूर, शमशान के करीब भी नहीं जा सकता था। निश्चय ही अब मैं सफलता प्राप्त कर सकता हूँ।”

इस घटना के बाद जतिन बिलकुल बदल गया, अब वह जो भी करता उसे विश्वास होता कि ताबीज की शक्ति के कारण वह उसमें सफल होगा, और धीरे-धीरे यही हुआ भी…वह गाँव के सबसे सफल लोगों में गिना जाने लगा।

इस वाकये के करीब १ साल बाद फिर वही महात्मा गाँव में पधारे।

जतिन तुरंत उनके दर्शन को गया और उनके दिए चमत्कारी ताबीज का गुणगान करने लगा।

तब महात्मा जी बोले,- बेटे! जरा अपनी ताबीज निकालकर देना। उन्होंने ताबीज हाथ में लिया, और उसे खोला।

उसे खोलते ही जतिन के होश उड़ गए जब उसने देखा कि ताबीज के अंदर कोई मन्त्र-वंत्र नहीं लिखा हुआ था…वह तो धातु का एक टुकड़ा मात्र था!

जतिन बोला, “ ये क्या महात्मा जी, ये तो एक मामूली ताबीज है, फिर इसने मुझे सफलता कैसे दिलाई?”

महात्मा जी ने समझाते हुए कहा-

“सही कहा तुमने, तुम्हें सफलता इस ताबीज ने नहीं बल्कि तुम्हारे विश्वास की शक्ति ने दिलाई है। पुत्र, हम इंसानों को भगवान ने एक विशेष शक्ति देकर यहाँ भेजा है। वो है, विश्वास की शक्ति। तुम अपने कार्यक्षेत्र में इसलिए सफल नहीं हो पा रहे थे क्योंकि तुम्हें खुद पर यकीन नहीं था…खुद पर विश्वास नहीं था। लेकिन जब इस ताबीज की वजह से तुम्हारे अन्दर वो विश्वास पैदा हो गया तो तुम सफल होते चले गए ! इसलिए जाओ किसी ताबीज पर यकीन करने की बजाय अपने कर्म पर, अपनी सोच पर और अपने लिए निर्णय पर विश्वास करना सीखो, इस बात को समझो कि जो हो रहा है वो अच्छे के लिए हो रहा है और निश्चय ही तुम सफलता के शीर्ष पर पहुँच जाओगे। “


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जुड़े रहे – जोड़ते रहे।

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Satyanarayan Bhagwan ki jai ho
Om namo bhagavate vasudevaye namah ji
((((सौ ऊंट 💐 ))))
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किसी शहर में, एक आदमी प्राइवेट कंपनी में जॉब करता था . वो अपनी ज़िन्दगी से खुश नहीं था , हर समय वो किसी न किसी समस्या से परेशान रहता था .
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एक बार शहर से कुछ दूरी पर एक महात्मा का काफिला रुका . शहर में चारों और उन्ही की चर्चा थी. .

बहुत से लोग अपनी समस्याएं लेकर उनके पास पहुँचने लगे ,
उस आदमी ने भी महात्मा के दर्शन करने का निश्चय किया .
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छुट्टी के दिन सुबह -सुबह ही उनके काफिले तक पहुंचा . बहुत इंतज़ार के बाद उसका का नंबर आया .
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वह बाबा से बोला ,” बाबा , मैं अपने जीवन से बहुत दुखी हूँ , हर समय समस्याएं मुझे घेरी रहती हैं , कभी ऑफिस की टेंशन रहती है , तो कभी घर पर अनबन हो जाती है , और कभी अपने सेहत को लेकर परेशान रहता हूँ ….
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बाबा कोई ऐसा उपाय बताइये कि मेरे जीवन से सभी समस्याएं ख़त्म हो जाएं और मैं चैन से जी सकूँ ?
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बाबा मुस्कुराये और बोले , “ पुत्र , आज बहुत देर हो गयी है मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर कल सुबह दूंगा … लेकिन क्या तुम मेरा एक छोटा सा काम करोगे …?”
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“हमारे काफिले में सौ ऊंट हैं ,
मैं चाहता हूँ कि आज रात तुम इनका खयाल रखो …
जब सौ के सौ ऊंट बैठ जाएं तो तुम भी सो जाना …”,
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ऐसा कहते हुए महात्मा अपने तम्बू में चले गए ..
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अगली सुबह महात्मा उस आदमी से मिले और पुछा , “ कहो बेटा , नींद अच्छी आई .”
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वो दुखी होते हुए बोला :
“कहाँ बाबा , मैं तो एक पल भी नहीं सो पाया. मैंने बहुत कोशिश की पर मैं सभी ऊंटों को नहीं बैठा पाया , कोई न कोई ऊंट खड़ा हो ही जाता …!!!
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बाबा बोले , “ बेटा , कल रात तुमने अनुभव किया कि चाहे कितनी भी कोशिश कर लो सारे ऊंट एक साथ नहीं बैठ सकते …
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तुम एक को बैठाओगे तो कहीं और कोई दूसरा खड़ा हो जाएगा.
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इसी तरह तुम एक समस्या का समाधान करोगे तो किसी कारणवश दूसरी खड़ी हो जाएगी ..
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पुत्र जब तक जीवन है ये समस्याएं तो बनी ही रहती हैं … कभी कम तो कभी ज्यादा ….”
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“तो हमें क्या करना चाहिए ?” , आदमी ने जिज्ञासावश पुछा .
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“इन समस्याओं के बावजूद जीवन का आनंद लेना सीखो …
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कल रात क्या हुआ ?
1) कई ऊंट रात होते -होते खुद ही बैठ गए ,
2) कई तुमने अपने प्रयास से बैठा दिए ,
3) बहुत से ऊंट तुम्हारे प्रयास के बाद भी नहीं बैठे … और बाद में तुमने पाया कि उनमे से कुछ खुद ही बैठ गए ….
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कुछ समझे ….??
समस्याएं भी ऐसी ही होती हैं..
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1) कुछ तो अपने आप ही ख़त्म हो जाती हैं ,
2) कुछ को तुम अपने प्रयास से हल कर लेते हो …
3) कुछ तुम्हारे बहुत कोशिश करने पर भी हल नहीं होतीं ,
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ऐसी समस्याओं को समय पर छोड़ दो … उचित समय पर वे खुद ही ख़त्म हो जाती हैं.!!
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जीवन है, तो कुछ समस्याएं रहेंगी ही रहेंगी …. पर इसका ये मतलब नहीं की तुम दिन रात उन्ही के बारे में सोचते रहो …
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समस्याओं को एक तरफ रखो
और जीवन का आनंद लो…
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चैन की नींद सो …
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जब उनका समय आएगा वो खुद ही हल हो जाएँगी”…

अच्छा या बुरा तो केवल भ्रम है …
जिन्दगी का नाम ही
कभी ख़ुशी कभी ग़म है …

🌹 Satyanarayan Bhagwan ki jai ho

👏 Om namo narayan ji👏

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⚖️कर्म और भाग्य⚖️

एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों की सभा बुलाकर प्रश्न किया:- “मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था मैं राजा बना, किन्तु उसी घड़ी मुहूर्त में अनेक जातकों ने जन्म लिया होगा जो राजा नहीं बन सके क्यों ..? इसका क्या कारण है ? राजा के इस प्रश्न से सब निरुत्तर हो गये!!!”

अचानक एक वृद्ध खड़े हुये बोले:- “महाराज आपको यहाँ से कुछ दूर घने जंगल में एक महात्मा मिलेंगे उनसे आपको उत्तर मिल सकता है।”

राजा ने घोर जंगल में जाकर देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठ कर अंगारे ( गरमा गरम कोयला ) खाने में व्यस्त हैं। राजा ने महात्मा से जैसे ही प्रश्न पूछा महात्मा ने क्रोधित होकर कहा:- “तेरे प्रश्न का उत्तर आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं ,वे दे सकते हैं ।”

राजा की जिज्ञासा और बढ़ गयी, पहाड़ी मार्ग पार कर बड़ी कठिनाइयों से राजा दूसरे महात्मा के पास पहुंचा।

राजा हक्का बक्का रह गया देख कर। दृश्य ही कुछ ऐसा था, वे महात्मा अपना ही माँस चिमटे से नोच नोच कर खा रहे थे। राजा को महात्मा ने भी डांटते हुए कहा:- ”मैं भूख से बेचैन हूँ मेरे पास समय नहीं है…

आगे आदिवासी गाँव में एक बालक जन्म लेने वाला है ,जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा..वह बालक तेरे प्रश्न का उत्तर दे सकता है.. राजा बड़ा बेचैन हुआ, बड़ी अजब पहेली बन गया मेरा प्रश्न.. उत्सुकता प्रबल थी..

राजा पुनः कठिन मार्ग पार कर उस गाँव में पहुंचा.. गाँव में उस दंपति के घर पहुंचकर सारी बात कही..जैसे ही बच्चा पैदा हुआ दम्पत्ति ने नाल सहित बालक राजा के सम्मुख उपस्थित किया..

राजा को देखते ही बालक हँसते हुए बोलने लगा .. राजन् ! मेरे पास भी समय नहीं है। किन्तु अपना उत्तर सुन लो:- “तुम,मैं और दोनों महात्मा सात जन्म पहले चारों भाई राजकुमार थे। एक बार शिकार खेलते खेलते हम जंगल में तीन दिन तक भूखे प्यासे भटकते रहे। अचानक हम चारों भाइयों को आटे की एक पोटली मिली। हमने उसकी चार बाटी सेंकी.. अपनी अपनी बाटी लेकर खाने बैठे ही थे कि भूख प्यास से तड़पते हुए एक महात्मा वहां आ गये.. अंगारे खाने वाले भइया से उन्होंने कहा:- “बेटा ,मैं दस दिन से भूखा हूँ ,अपनी बाटी में से मुझे भी कुछ दे दो , मुझ पर दया करो जिससे मेरा भी जीवन बच जाय। इतना सुनते ही भइया गुस्से से भड़क उठे और बोले.. तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या खाऊंगा ? आग ..

चलो भागो यहां से। वे महात्मा फिर मांस खाने वाले भइया के निकट आये उनसे भी अपनी बात कही..

किन्तु उन भईया ने भी महात्मा से गुस्से में आकर कहा कि :- “बड़ी मुश्किल से प्राप्त ये बाटी तुम्हें दे दूंगा तो क्या मैं अपना मांस नोचकर खाऊंगा ?

भूख से लाचार वे महात्मा मेरे पास भी आये..मुझसे भी बाटी मांगी… किन्तु मैंने भी भूख में धैर्य खोकर कह दिया कि चलो आगे बढ़ो मैं क्या भूखा मरुँ …?

अंतिम आशा लिये वो महात्मा , हे राजन !.. आपके पास भी आये,दया की याचना की.. दया करते हुये ख़ुशी से आपने अपनी बाटी में से आधी बाटी आदर सहित उन महात्मा को दे दी।बाटी पाकर महात्मा बड़े खुश हुए और बोले:- “तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा

बालक ने कहा:- “इस प्रकार उस घटना के आधार पर हम अपना अपना भोग, भोग रहे हैं…
और वो बालक मर गया

धरती पर एक समय में अनेकों फल-फूल खिलते हैं,किन्तु सबके रूप, गुण,आकार-प्रकार,स्वाद भिन्न होते हैं ..।
राजा ने माना कि शास्त्र भी तीन प्रकार के है। ज्योतिष शास्त्र, कर्तव्य शास्त्र और व्यवहार शास्त्र।

जातक सब अपना किया, दिया, लिया ही पाते हैं। यही है जीवन!!!
“गलत पासवर्ड से एक छोटा सा मोबाइल नही खुलता..
तो सोचिये गलत कर्मो से सच खंड के दरवाजे कैसे खुलेंगे!!!
अभी भी वक्त है अपने सतगुरु के दिए पासवर्ड ( पांच नामों का सुमिरन) का प्रयोग करें और सच खंड के दरवाजे खोलने के काबिल बने।

जयश्रीराम #रघुनन्दन🚩🚩🚩🚩

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इटली

आज पहली बार इडली बना रही थी बेटी की फरमाइश पर। बड़ी पसंद है उसे।…..पसंद से याद आया मेरी दादी को भी ये इडली बड़ी पसंद थी। बाबा के रेलवे से रिटायर होने के बाद वो दोनों लोग हर साल घूमने के लिए निकल पड़ते। उस बार दोनों मदुरई घूमकर आये थे। वहाँ की इडली दादी को बेहद पसंद आई। इडली को वे इटली बोलतीं थीं। दादी ने माँ को उसका आकार, स्वाद तो बताया पर बनाते कैसे हैं ये ना दादी बता पाईं और ना माँ बना पाईं। मैं सातवीं-आठवीं में पढ़ने वाली सिर्फ खाना ही जानती थी कुछ बनाना नहीं। दादी के मन की मन में ही रह गई। आज ये सब बनाते-करते बरबस दादी की याद आ गई। यादों में खोई हुई थी कि गेट की खटखटाहट फिर से वापस यहाँ खींच लाई। बाहर निकल कर देखा कोई नज़र नहीं आया। तभी मेरे घर के ठीक सामने गुलमोहर के लाल फूलों से लदे पेड़ के नीचे एक बूढ़ी अम्मा दिखाई दी। दाएँ हाथ की उंगलियों की कली सी बनाकर इशारा करती हुई कुछ खाने को माँग रही थी। शायद भूखी थी। मैनें भी हथेली से थमने का इशारा किया और अंदर कुछ खाने के लिये ढूँढने लगी। बिस्कुट खत्म हो चुके थे। आज रोटी भी नहीं बनाई। “अब क्या दूँ?” मेरी बुदबुदाहट बेटी के कानों में पड़ चुकी थी।

“ये इडली ही दे दो।” बारह साल की बेटी मुझे ही बता रही थी।

इतनी मेहनत से पहली दफ़ा बनाई। अभी तो किसी ने चखी भी नहीं। और मैं ………। देने का मन तो बिल्कुल नहीं किया, पर बेटी को मेरे सिखाये-पढ़ाये आदर्शों और संस्कारों के उन पाठों पर पानी फिरता देख मुझे उसकी बात मानना ही ज्यादा सही लगा।

“पर दूँ किसमें?”

सुनते ही बेटी अपने आर्ट बॉक्स जिसे मैं कबाड़ कहती थी, उसी में से पेपर प्लेट और दोने निकाल ले आई। पेपर प्लेट में इडली और दोने में साम्भर लिये मैं पेड़ के नीचे बैठी उस बूढ़ी अम्मा के पास गई। ऐसा खाना देख कर वो कुछ सकपका सी गई। “अम्मा ये इडली है अभी बनाई, खा लो।” कहकर मैं सड़क पार अपने गेट पर खड़ी हो कर देखने लगी। “और चाहिये क्या?”

अम्मा ने जवाब में सिर हिला कर उँगलियों से दो का इशारा किया। ……अब खा-पीकर जाने के लिये उठ खड़ी हुई। “इटली बहुत अच्छी थी।” अपने दोनों हाथों को ऊपर की ओर उठाकर आशीर्वाद सा देती हुई बोली और चली गई। अब उस बूढ़ी अम्मा ने इटली बोला या इडली ये तो नहीं पता पर मुझे तो अपनी दादी वाला इटली ही सुनाई पड़ा। ………अम्मा की तो क्षुधा तृप्त हुई होगी पर मेरी तो जैसे आत्मा ही तृप्त हो गई।

मीनाक्षी चौहान